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WHAT IS THE DECODATION OF WEARING JANEU IN HINDUISM? (IN HINDI)


यज्ञोपवीत यानी जनेऊ धारण करने की परंपरा;- 05 POINTS;- 1-हिंदू धर्म में कई संस्कार होते है जिसमें यज्ञोपवीत संस्कार का बड़ा महत्व है। यज्ञोपवीत संस्कार को जनेऊ संस्कार भी कहते है। जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। जनेऊ धारण करने की परम्परा बहुत ही प्राचीन है। वेदों में जनेऊ धारण करने की हिदायत दी गई है। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। 2-'उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' यानी ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे 'यज्ञोपवीत संस्कार' भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। 3-जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। ब्राह्मणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। तीन सूत्र हिन्दू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है। अविवाहित व्यक्ति तीन धागों वाला जनेऊ पहनेते है जबकि विवाहित व्यक्ति छह धागों वाला जनेऊ। 4-जनेउ में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य में 'यज्ञोपवित संस्कार' यानी जनेऊ की परंपरा है। जनेऊ एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। जनेऊ को मूत्र विसर्जन और मल विसर्जन करने के दौरान पर चढाकर दो से तीन बार बांधा जाता है। यह भी माना जाता है कि इसके धारण करने के सेहत संबंधी भी कई फायदे होते है और कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। 5-जनेऊ को संस्कृत भाषा में ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे। जनेऊ पहनने के होते हैं नियम, इनको ध्यान रखना चाहिए- जनेऊ पहनने के नियम ;- 03 POINTS;- 1-यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए। 2-यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित यज्ञोपवीत शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है। जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। 3-यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित करें । मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए। शुभ समारोह/अशुभ समारोह 06 POINTS;- विभिन्न अवसरों पर पवित्र थ्रेड पहनने के विभिन्न तरीके हैं। उदाहरण के लिए : 1-एक शुभ समारोह करने के दौरान एक उपविती होना चाहिए, अर्थात, पवित्र थ्रेड को अपने बाएं कंधे से लटका देना चाहिए। 2-एक अशुभ समारोह करते समय एक को प्राचनाविटी होना चाहिए, यानी, पवित्र धागा दाहिने कंधे से लटका होना चाहिए। 3-कभी-कभी उसे निविटी कहा जाता है जब पवित्र धागा गर्दन के चारों ओर गर्दन के चारों ओर पहना जाता है। 4-धागा उठाया जाना चाहिए और ऊपरी हिस्से को कान के पीछे रखा जाना चाहिए जब कोई व्यक्ति अपने दैनिक ablutions के लिए जाता है या अशुद्ध कार्य करता है। 5- स्त्री-पुरुष दोनों धागे पहन सकते हैं। हालांकि, महिला को इसे गर्दन पर पहनना चाहिए। अन्यथा, वह इसे एक नारियल पर लपेट सकती है, और इसे पूजा स्थान में रख सकती है। 6-परिवार में जन्म या मृत्यु के बाद, इसे बाहर निकाला जाना चाहिए और फिर घटना के 15 दिन बाद एक नया धागा पहना जाना चाहिए। स्टेय्याम और अपस्तव्यम(Stavyam and Apastavyam ):- 02 POINTS;- 1-एक व्यक्ति पर धागे के अनिवार्य रूप से दो पद हैं। स्टेवा स्थिति ... वह तब होता है जब हमें बाएं कंधे से लटकाते हैं। यदि आप पूजा की अधिकांश हिंदू मूर्तियों का अध्ययन करते हैं तो आप धागे की इस स्थिति को देखेंगे। 2-दाएं कंधे से लटकने वाली विपरीत स्थिति को असाधारण स्थिति कहा जाता है और अंतिम संस्कार के दौरान और प्रकृति की कॉल का जवाब देने पर इसका उपयोग किया जाता है। जनेऊ संस्कार का वैज्ञानिक महत्व/ लाभ;- भारतीय संस्कृति में यज्ञोपवीत यानी जनेऊ धारण करने की परंपरा वैदिक काल से ही चली आ रही है. 'उपनयन' की गिनती सोलह संस्कारों में होती है. पर आज के दौर में लोग जनेऊ पहनने से बचना चाहते हैं. नई पीढ़ी के मन में सवाल उठता है कि आख‍िर इसे पहनने से फायदा क्या होगा? जनेऊ केवल धार्मिक नजरिए से ही नहीं, बल्कि सेहत के लिहाज से भी बेहद फायदेमंद है. धर्म और शास्त्रों से उलट क्या आप जनेऊ के पीछे का वैज्ञानिक महत्वजानते हैं? जनेऊ पहनने के फायदों की यहां संक्षेप में चर्चा की गई है. 10 POINTS;- 1.जीवाणुओं-कीटाणुओं से बचाव : जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैं, वे मल-मूत्र त्याग करते वक्त अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणुओं और कीटाणुओं के प्रकोप से बच जाते हैं। 2.गुर्दे की सुरक्षा : यह नियम है कि बैठकर ही जलपान करना चाहिए अर्थात खड़े रहकर पानी नहीं पीना चाहिए। इसी नियम के तहत बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए