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क्या है रहस्य बिन्दु चक्र का?बिन्दु चक्र जागरण के क्या लाभ है?


बिन्दु चक्र ;- 07 FACTS;- 1-बिन्दु चक्र सिर के शीर्ष भाग पर केशों के गुच्छे के नीचे स्थित है। बिन्दु चक्र के चित्र में २३ पंखुडिय़ों वाला कमल होता है। इसका प्रतीक चिह्न चन्द्रमा है, जो वनस्पति की वृद्धि का पोषक है। 2-भगवान कृष्ण ने कहा है : ''मैं मकरंद कोष चंद्रमा होने के कारण सभी वनस्पतियों का पोषण करता हूं" । इसके देवता भगवान शिव हैं, जिनके केशों में सदैव अर्धचन्द्र विद्यमान रहता है। मंत्र है शिवोहम्(शिव हूं मैं)। यह चक्र रंगविहीन और पारदर्शी है।

3-बिंदु विसर्ग सातवें लोक ‘सत्यम्’ तथा आनंदमय कोश से संबंधित है। ऐसा समझा जाता है कि जब बिंदु विसर्ग का जागरण होता है, तो वहाँ से अनेक प्रकार के नाद की उत्पत्ति होती है, जिसका चरमोत्कर्ष ॐ नाद के विकास के रूप में होता है। इस स्थिति में साधक को ॐ वर्ण के ऊपर स्थित बिंदु तथा अर्द्धचन्द्र से सृष्टि के सभी स्रोत निकलते हुए दिखलाई देने लगते हैं।

4-बिंदु की स्थिति सिर के ऊपरी हिस्से में उस स्थान पर है, जहाँ हिंदू परंपरा में शिखा रखी जाती है। शिखा को कसकर बाँधने और गाँठ लगाने का विधान हैं ऐसा करने से उक्त स्थान में तनाव और खिंचवा आता है, जिससे बिंदु के प्रति सजगता बनी रहती है।

5-तांत्रिक मतानुसार मस्तिष्क के ऊपरी कार्टेक्स में एक छोटा सा गड्ढा है, जहाँ अत्यल्प मात्रा में स्राव भरा रहता है। इस स्राव मध्य द्वीप के सदृश की एक बिंदु संरचना हैं इसे ही बिन्दु विसर्ग कहा गया है।

6-तांत्रिक ग्रंथों में बिंदु को पूर्णचंद्र तथा अर्द्धचंद्र के रूप में दर्शाया गया है। पूर्णचंद्र अमृत की अति सूक्ष्म बूँद का तथा अर्द्धचंद्र चंद्रमा की कला का द्योतक है। यह अर्द्धचंद्र इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि बिंदु का चंद्रमा की कलाओं से उसी प्रकार अत्यंत निकट का संबंध है, जिस प्रकार मनुष्य अंतः स्रावी ग्रंथियाँ, भावनात्मक तथा मानसिक उतार-चढ़ाव योग के गहन अभ्यास से क्रमिक रूप से बढ़ती हुई सहस्रार की अनंतता का अनुभव उसी प्रकार किया जा सकता है, जिस प्रकार शुल्क पक्ष में चंद्रमा धीरे-धीरे बढ़ते हुए पूर्णिमा के दिन पूर्ण हो जाता हैं ऐसे ही बिंदु के पीछे सहस्रार भी शनैः शनैः उद्घाटित होने लगता है।

7-रात्रिकालीन विस्तृत आकाश की पृष्ठभूमि में बिंदु की अभिव्यक्त किया जाता है। यह इस बात का द्योतक है कि सहस्रार भी इस आकाश की तरह व्यापक तथा विस्तृत है, किन्तु अहंभाव के रहते सहस्रार का संपूर्ण अनुभव कर पाना संभव नहीं।

बिन्दु चक्र जागरण के लाभ ;-

06 FACTS;-

1-साधना-ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि बिंदु से एक प्रकार का रस स्राव होता है, जिसका संचयन नासा ग्रसनी के पीछे कोमल तालु के ऊपर एक छोटे से गड्ढे में होता है। यह केन्द्र ‘ललना चक्र’ कहलाता है। विशुद्धि चक्र से इसका निकट का संबंध है। दोनों के बीच पारस्परिक संबंध तभी स्थापित हो पाता है, जब विशुद्धि चक्र जाग्रत अवस्था में होता है। ऐसी दशा में ललना से स्रवित द्रव विशुद्धि चक्र द्वारा पूर्णतः अवशोषित हो जाता है। यहाँ उक्त रस की प्रकृति अमृतोपम जैसी होती है और साधक को चिर यौवन प्रदान करती है,

2-किन्तु तब विशुद्धि केंद्र अक्रियाशील स्थिति में रहता है, तब ललना से यह द्रव सीधे मणिपूरित चक्र तक पहुँच जाता है और उसके द्वारा आत्मसात् कर लिया जाता है।यह स्थिति विषतुल्य होती है। ऐसी दशा में शरीर कोशिकाओं का क्षय प्रारम्भ हो जाता है और शीघ्र बुढ़ापा आ धमकता है। इसीलिए ललना को उत्तेजित करने से पूर्व विशुद्धि चक्र का जागरण अनिवार्य माना गया है।

3-इस चक्र की सहायता से हम भूख और प्यास पर नियंत्रण रखने में सक्षम हो जाते हैं, और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाने की आदतों से दूर रहने की योग्यता प्राप्त कर लेते हैं। बिन्दु पर एकाग्रचित्तता से चिन्ता एवं हताशा और अत्याचार की भावना तथा हृदय दमन से भी छुटकारा मिलता है।

4-बिन्दु चक्र शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, स्फूर्ति और यौवन प्रदान करता है, क्योंकि यह "अमरता का मधुरस" (अमृत) उत्पन्न करता है। यह अमृतरस साधारण रूप से मणिपुर चक्र में गिरता है, जहां यह शरीर द्वारा पूरी तरह से उपयोग में लाए बिना ही जठराग्नि से जल जाता है। इसी कारण प्राचीन काल में ऋषियों ने इस मूल्यवान अमृतरस को संग्रह करने का उपाय सोचा और ज्ञात हुआ कि इस अमृतरस के प्रवाह को जिह्वा और विशुद्धि चक्र की सहायता से रोका जा सकता है।

5-जिह्वा में सूक्ष्म ऊर्जा केन्द्र होते हैं, इनमें से हरेक का शरीर के अंग या क्षेत्र से संबंध होता है। उज्जाई प्राणायाम और खेचरी मुद्रा योग विधियों में जिह्वा अमृतरस के प्रवाह को मोड़ देती है और इसे विशुद्धि चक्र में जमा कर देती है। एक होम्योपैथिक दवा की तरह सूक्ष्म ऊर्जा माध्यमों द्वारा यह संपूर्ण शरीर में पुन: वितरित कर दी जाती है, जहां इसका आरोग्यकारी प्रभाव दिखाई देने लगते हैं 6-बिन्दु चक्र स्वास्थ्य के लिए एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र है, हमें स्वास्थ्य और मानसिक पुनर्लाभ प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करता है। यह चक्र नेत्र दृष्टि को लाभ पहुंचाता है, भावनाओं को शांत करता है और आंतरिक सुव्यवस्था, स्पष्टता और संतुलन को बढ़ाता है। इस चक्र की सहायता से हम भूख और प्यास पर नियंत्रण रखने में सक्षम हो जाते हैं, और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाने की आदतों से दूर रहने की योग्यता प्राप्त कर लेते हैं। ललना को उद्दीप्त करने के उपाय ;-

03 FACTS;-

1-साधना विज्ञान में ललना को उद्दीप्त करने के कई उपाय बताए गए हैं। इस प्रक्रिया में वायुमार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है और बिंदु से विशुद्धि में झरने वाला द्रव संपूर्ण शरीर में फैल जाता है। इससे शरीर को पर्याप्त शक्ति और स्फूर्ति मिलती है एवं शरीर की चयापचय क्रिया एकदम मंद पड़ जाती है। ऐसी स्थिति में जीवित रहने के लिए वायु या आहार की आवश्यकता नहीं रह जाती और व्यक्ति इनके बिना भी लंबे समय तक आसानी से जिंदा रह सकता है।

2-बिंदु में ब्रह्माण्ड की अनंत क्षमताओं का विकास निहित है। यहीं सृष्टि की समग्र रूपरेखा छिपी रहती है। वहाँ पर विकास का तात्पर्य है-वह अनुभवातीत प्रक्रिया, जिसका संबंध अस्तित्व की संपूर्ण प्रणाली से है।इस प्रकार मस्तिष्क के भीतर और बाहर के केन्द्र बिन्दुओं में परस्पर संगीत बैठ जाती है। दोनों ही अपार संभावनाओं से युक्त हैं।

3-मस्तिष्क के जिस बिंदु का ललना चक्र से संबंध है, उस चक्र में नासा छिद्रों से होकर कुछ नाड़ियाँ गुजरती हैं, लेकिन न तो ललना, न बिंदु जागरण के केन्द्र हैं। जब विशुद्धि का जागरण होता है, तब साथ-साथ ललना तथा बिन्दु का भी स्वयमेव जागरण हो जाता है, इसलिए साधना-विज्ञान में ललना तथा बिन्दु को पृथक् से जगाने का कोई विधान या उपचार नहीं है। बिंदु का महत्व;-

05 FACTS;-

1-बिंदु अनंत संभावनाओं को संजोए हुए है। वह चाहे पदार्थ कण के रूप में हो, रज वीर्य या मस्तिष्कीय स्राव के रूप में, उसमें ऐसी क्षमता और सामर्थ्य है कि उसे गागर में सागर भरने जैसी उपमा दी जा सकती है। इसलिए बिंदु विसर्ग की साधना प्रकारांतर से उस शक्ति के एक अंश का अनावरण और उद्घाटन ही है, जिससे यह सम्पूर्ण सृष्टि उद्भूत है। हमें इस भली-भाँति समझ लेना चाहिए।एक नीले बिंदु से संपूर्ण ब्रह्माण्ड तक।

2-मानव जन्म एक बिरला वरदान है। अत: आपको आत्म-बोध प्राप्त करने के लिये प्रयास करने की आवश्यकता है।जब कुंडलिनी जगा दी जाती है तब प्राणवायु ऊर्ध्वमुखी हो जाती है और साँसों मे स्वत:स्फूर्त ठहराव आ जाता है। यह स्वयम्-चालित प्राणायाम शरीर के प्रत्येक रंध्र में एक नई जीवन-शक्ति भर देता है और उपासक को भौतिक और सूक्ष्म दोनों ही स्तरों पर रहस्यानुभूति होने लगती हैं। उपासक को उनींदापन, कंपन, पसीना, विद्युत तरंग, तीव्र ऊष्मा, स्वतःस्फूर्त आसन की मुद्राएँ और शारीरिक स्तर पर प्राणायाम का अनुभव होता है जो उसे चेतना के भीतरी आकाश-क्षेत्र में ऊंची उड़ान भरने के लिये तैयार कर देता है।

3-सूक्ष्म स्तर पर उपासक दैवी दीप्ति को देखता है जो भिन्न रंगों में प्रकट होती है और गहरी समाधि की स्थिति में स्वर्गीय संगीत सुनता है जो उसे हर्षोन्माद से भरकर चेतना के उच्चतर स्तरों तक उठा देता है।दैवी संगीतसुनते वक्त उपासक की चेतना आंतरिक कान की जड़ पर एकाग्र हो जाती है और जीभ स्वतःस्फूर्त उर्ध्वमुखी होकर तालू से चिपक जाती है। इस चक्र में जाग्रत कुंडलिनी अमृत की नन्ही बूंदें बनाती है जो उपासक के तालू पर टपक कर उसका नवीकरण करके उसे व्याधियों से मुक्त कर देतीं हैं। इस चक्र पर उच्चतर उपासक और ऊँचे असीम अंतरिक्षों मे जाने के लिये गहरी एकाग्रता के साथ ;उपासक ज्योति का अनुभव कर सकता है, और दिव्य गंध को साँसों में भर सकता है।

4-अंत मेँ उपासक प्रदीप्त ज्योति में, अचंभे के साथ चरम सुंदर तिल के आकार का एक नीला बिंदु देखता है जो तब तक फैलता चला जाता है जब तक समस्त ब्रह्माण्ड को घेर नहीं लेता है। तब उपासक की वैयक्तिकता पूरी तरह से इस दैवी ज्योति में विलीन हो जाती है और वह एक सिद्ध , आत्म-प्रबुद्ध व्यक्ति की तरह उत्तीर्ण हो जाता है। आज्ञा चक्र के भीतर निरंतर प्रदीप्त अग्निशिखा के सम्मान के चिन्ह के रूप में लोग दो भौहों के बीच में कुमकुम या चंदन लगाते है। दक्षिण भारतीय अपने माथे पर त्रिपुंड ओर एक लाल बिंदी लगाते है, पहला तीन गुणों का प्रतीक है और दूसरा उच्चतर शक्ति का प्रतीक है जो तीनो गुणों से परे जाती है। 5-अंत मेँ उपासक प्रदीप्त ज्योति में, अचंभे के साथ चरम सुंदर तिल के आकार का एक नीला बिंदु देखता है जो तब तक फैलता चला जाता है जब तक समस्त ब्रह्माण्ड को घेर नहीं लेता है। तब उपासक की वैयक्तिकता पूरी तरह से इस दैवी ज्योति में विलीन हो जाती है और वह एक सिद्ध , आत्म-प्रबुद्ध व्यक्ति की तरह उत्तीर्ण हो जाता है।

निरोधावस्था क्या है?-

06 FACTS;- 1-साधना और भी सूक्ष्म होने पर योग की सातवीं भूमिका तुर्यगा आती है। महापुरुषों ने मन को तुरंग अर्थात् घोड़े की संज्ञा दी है क्योंकि यह अत्यन्त चपल है, गतिमान है, वेगवान् है। इस अवस्था का योगी मनरूपी तुरंग पर सवार हो जाता है। वह मन का गुलाम नहीं, संचालक हो जाता है। वह मन को जहाँ चाहे (चिन्तन में, श्वास में, रूप में, ब्रह्मविद्या में) कहीं भी रोक सकता है। 2-यह मन की लगभग निरोधावस्था है; किन्तु मन अभी जीवित है। वह मन भी इतना शान्त हो जाय कि संकल्प-विकल्प की प्रक्रिया ही शान्त हो जाय, वहाँ मन मिट गया, क्योंकि संकल्प का ही दूसरा नाम मन है- ‘मन मिटा माया मिटी, हंसा बेपरवाह। जाका कछू न चाहिए सोई शहंशाह।।’ मन मिटते ही माया मिट गयी, अब (हंस) यह संत स्थिति का योगी बेपरवाह हो जाता है। 3-मानस में हंस का लक्षण बताया गया- ‘जड़ चेतन गुन-दोष मय, विश्व कीन्ह करतार। सन्त हंस गुन गहहिं पय, परिहरि वारि विकार।।’ विधाता ने गुण-दोष मिलाकर संसार को रचा; किन्तु वे सन्त हंस होते हैं जो ईश्वरीय गुणरूपी दूध को तो ग्रहण कर लेते हैं परन्तु विकाररूपी वारि का त्याग कर देते हैं। 4-ऐसी स्थितिवाले सन्त हंस होते हैं। शेर को घास खिलायें तो क्या वह जीएगा? मछली को जल से बाहर रखें, तो क्या वह जीवित रह सकेगी? इसी प्रकार ईश्वरीय गुण हंस की खुराक है। कदाचित् दुर्गुण खाने लगा तो हंस कहाँ? वह तो कौवा हो गया। इस प्रकार ईश्वरीय गुणों का संधान करते-करते मन का निरोध और निरुद्ध मन भी जिस क्षण विलय पा गया, तत्क्षण वह परम चेतन का प्रतिबिम्ब प्राप्त कर लेता है। यही तुर्यातीत, विदेह, जीवन्मुक्त पुरुष है। 5-जिसे पाना था पा लिया, जिस तत्त्व को ढूँढ़ता था विदित हो गया तो वह योगी निश्चिन्त हो जाता है। ‘जाका कछू न चाहिए’- यदि आगे कुछ होता तो चाह अवश्य होती। जब चाहने लायक भी आगे कुछ न बचा तो ‘सोई शहंशाह’- वह बादशाहों का भी बादशाह आत्मतृप्त हो जाता है। 6-आगम ग्रन्थों में योग के इन सप्त सोपानों की परिकल्पना शरीरस्थ सात चक्रों के रूप में की गई है, जैसे- शुभेच्छा योग का मूलाधार है। सुविचारणा स्वाधिष्ठान चक्र है। तनुमानसा मणिपूरक चक्र है। सत्वापत्ति-अनाहत, असंसक्ति-विशुद्ध, पदार्थभावनी- आज्ञा और तुर्यगा सहस्त्रार चक्र हैं।

कुण्डलिनी योग का संक्षिप्त परिचय ;-

08 FACTS;- 1-स्वामी ब्रह्मानन्द जी का पद ;- ''निरंजन पद को साधु कोई पाता है।।............ मूल द्वार से खींच पवन को, उलटा पंथ चलाता है। नाभी पंकज दल में सोयी, नागिन जाइ जगाता है। मेरुदण्ड की सीढ़ी बनाकर, शून्य शिखर चढ़ जाता है। भँवर गुफा में जाय विराजै, सुरता सेज बिछाता है। शशि मण्डल से अमृत टपके, पीकर प्यास बुझाता है। सब कर्मों की धूनी जलाकर, तन में भस्म रमाता है। ब्रह्मानन्द स्वरूप मगन हो, आप ही आप लखाता है। निरंजन पद को साधु कोई पाता है''।।.... 2-‘मूल द्वार से खींच पवन को, उलटा पंथ चलाता है।’ मूलद्वार में चार पंखुडि़यों का कमल अधोमुख है, साधना द्वारा उसे ऊध्र्वमुख किया जाता है। अन्तःकरण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) यही चतुर्दल कमल हैं। ये अधोमुख हैं। प्रकृति की ओर, आवागमन की ओर हैं। इनको बाँधो, उधर जाने से रोको। यही मूलबन्ध है। 3-यदि हम इनको न बाँध सके तो भजन नहीं होगा। क्योंकि जिन्हें भजन करना है वे अधोमुखी चिन्तन कर रहे हैं- मन संकल्प प्रकृति का कर रहा है, चित्त प्रकृति का चिन्तन कर रही है, बुद्धि प्रकृति का ही निर्णय ले रही है और इसमें कदाचित् सफलता मिली तो अहंकार भी प्रकृति का। यही तो छुड़ाना है। इसलिए मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार जो अधोमुखी प्रवृत्तियों की ओर उन्मुख हैं, उन्हें उधर से बन्द करें, ऊध्र्वमुखी करें, इष्टोन्मुखी करें। 4-संकल्प करनेवाली प्रशक्ति का नाम मन है, संकल्प का बार-बार चिन्तन करनेवाली शक्ति चित्त है। चिन्तन करते-करते किसी निश्चय पर पहुँचे तो निश्चय करनेवाली शक्ति बुद्धि, और निश्चय कर्म में परिणित हो गया तो ‘हमने किया’ यह अहंकार- यही चार दल वाला कमल है। यह प्रकृति की ओर उन्मुख है, पहले इसी को बाँधो। 5-मन संकल्प करे तो हरि का, चिन्तन करे तो इष्ट का, निश्चय करे तो उसी का और अहंकार भी हो तो प्रभु का- ‘अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।।’ यही है मूलबन्ध। इतना होते ही भजन की शुरुआत हो गयी। इसका नाम है मूलद्वार। यह योग-साधना का प्रथम द्वार है, आत्म-दर्शन की पहली खिड़की है। 6-चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। किसी ने परिश्रम कर निरोध कर लिया तो उससे लाभ...उस समय द्रष्टा यह आत्मा अपने सहज स्वरूप परमात्मा में स्थित हो जाता है। द्रष्टा का वैसा ही स्वरूप है, जैसी उसकी वृत्तियाँ सात्त्विक, राजसी अथवा तामस हैं, क्लिष्ट, अक्लिष्ट इत्यादि। इन वृत्तियों का निरोध के लिए जो प्रयत्न किया जाता है उसका नाम अभ्यास है। 7-देखी-सुनी सम्पूर्ण वस्तुओं में राग का त्याग वैराग्य है। अभ्यास करें तो किसका करें?..... क्लेश, कर्म, कर्मों के संग्रह और परिणाम भोग से जो अतीत है वह पुरुष-विशेष ईश्वर है। वह काल से भी परे है, गुरुओं का भी गुरु है। उसका वाचक नाम ‘ओम्’ है। 8-उस ईश्वर के नाम प्रणव का जप करो, उसके अर्थस्वरूप उस ईश्वर के स्वरूप का ध्यान धरो, अभ्यास इतने में ही करना है। इस अभ्यास के प्रभाव से अन्तराय (विघ्न) शान्त हो जायेंगे, क्लेशों का अन्त हो जायेगा और द्रष्टा स्वरूप में स्थिति तक की दूरी तय कर लेगा। बिन्दु‘त्राटक’/अन्तःत्राटक ;-

06 FACTS;-

बिन्दु‘त्राटक’ .. पतंजलि ने 5000 वर्ष पूर्व इस पद्धति का विकास किया था। कुछ लोग इसे ‘त्राटक’ कहते हैं। योगी और संत इसका अभ्यास परा-मनोवैज्ञानिक शक्ति के विकास के लिये भी करते हैं।बिन्दु पर एकाग्रचित्तता से चिन्ता एवं हताशा और अत्याचार की भावना तथा हृदय दमन से भी छुटकारा मिलता है।यह विधि आपकी स्मरण-शक्ति को तीक्ष्ण बनाती है । प्राचीन ऋषियों द्वारा प्रयोग की गई यह बहुत ही उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण पद्धति है।

1-समय;–

अच्छा यह है कि इसका अभ्यास सूर्योदय के समय किया जाए। किन्तु यदि अन्य समय में भी इसका अभ्यास करें तो कोई हानि नहीं है।

2-स्थान;–

किसी शान्त स्थान में बैठकर अभ्यास करें। जिससे कोई अन्य व्यक्ति आपको बाधा न पहुँचाए।प्रथम चरण;-स्क्रीनपर बने पीले बिंदु आरामपूर्वक देखें।

3-द्वितीय चरण;-

जब भी आप बिन्दु को देखें, हमेशा सोचिये – “मेरे विचार पीत बिन्दु के पीछे जा रहे हैं”। इस अभ्यास के मध्य आँखों में पानी आ सकता है, चिन्ता न करें। आँखों को बन्द करें, अभ्यास स्थगित कर दें। यदि पुनः अभ्यास करना चाहें, तो आँखों को धीरे-से खोलें। आप इसे कुछ मिनट के लिये और दोहरा सकते हैं।

4-अन्त में, आँखों पर ठंडे पानी के छीटे मारकर इन्हें धो लें। एक बात का ध्यान रखें, आपका पेट खाली भी न हो और अधिक भरा भी न हो।

5-यदि आप चश्में का उपयोग करते हैं तो अभ्यास के समय चश्मा न लगाएँ।

6-यदि आप पीत बिन्दु को नहीं देख पाते हैं तो अपनी आँखें बन्द करें एवं भौंहों के मध्य में चित्त एकाग्र करें । इसे अन्तःत्राटक कहते हैं”। कम-से-कम तीन सप्ताह तक इसका अभ्यास करें। परन्तु, यदि आप इससे अधिक लाभ पाना चाहते हैं तो निरन्तर अपनी सुविधानुसार करते रहें।

उज्जायी प्राणायाम ;-

06 FACTS;-

1-उज्जायी प्राणायाम स्वर यंत्र में श्वास के प्रवाह पर ध्यान एकाग्र कर गहरी श्वास लेना है। गहरी निद्रा में इस प्रकार की श्वास प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से होती है किन्तु इसके पूरे लाभ प्राप्त करने के लिए पूरी तरह सचेत रहते हुए इसका अभ्यास करना महत्त्वपूर्ण बात है।

2-उज्जायी प्राणायाम सहज प्राणायाम या अजय प्राणायाम ("सहज" श्वास नियन्त्रण) भी कहलाता है। इसका उपयोग क्रिया योग और ध्यान में किया जाता है। योग ग्रन्थों में कहा गया है कि सहज श्वास समाधि प्राप्ति का मार्ग है या अन्य शब्द में कहा जाये तो चेतना के उच्चतर स्तर की प्राप्ति का मार्ग है।

3-सहज श्वास का अर्थ मंत्र "सो हम" के साथ श्वास लेने की सहज प्रक्रिया पर ध्यान एकाग्र करना है। यह मंत्र अपने अन्दर के स्व को पुकारने के समान है। इस मंत्र के लगातार उच्चारण से "सो और हम" शब्द का एक चक्र बन जाता है : मैं वह हूँ - वह मैं हूँ - मैं वह हूँ...।

4-उज्जायी प्राणायाम शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बनाये रखने में बहुत सहायक है। यह उच्च रक्तचाप को सामान्य करता है और परिणामत: एक गहन शारीरिक और मानसिक शुद्धिकरण होता है।उज्जायी प्राणायाम प्रदूषण के हानिकारक परिणामों और अन्य हानिप्रद पर्यावरणीय प्रभावों को दूर करता है।

5-अश्विनी मुद्रा या मूल बंध के साथ उज्जायी प्राणायाम का अभ्यास नकारात्मक विचारों, मानसिक पीड़ा व उदासीनता को कुछ ही क्षणों में दूर कर देता है।

6-सर्वाधिक सघन या गहन विषहरण गुण की प्राप्ति तब होती है जब उज्जायी प्राणायाम का अभ्यास नासिका से पूरक करने और मुख से रेचक से कि या जाता है। इस तकनीक को भुजंगनी प्राणायाम "सर्प श्वास" कहा जाता है।.

अभ्यास :

-SEVEN STEPS;-

1-चेहरे, निचले जबड़े और होठों को ढीला छोड़ दें।

2-जालन्धर बंध करें।

3-कंठ द्वार को सिकोड़ें जिससे श्वास के साथ एक धीमी ध्वनि उत्पन्न हो। कंठ में श्वास के प्रवाह को महसूस करें।

4-पूरक करते हुए मानसिक रूप से "सो" शब्द को दोहरायें और श्वास की चेतनता को नाभि से कंठ तक अनुसरण करें।

5-रेचक करते हुए मानसिक रूप से "हम" शब्द को दोहरायें और कंठ से नाभि तक श्वास चेतनता का अनुसरण करें।नियमित और निरन्तर श्वास लेना जारी रखें।

6-इस प्रकार पूरक और रेचक 25 बार करें, फिर जालंधर बंध खोल दें और लगभग तीन मिनट तक सामान्य श्वास के साथ ऐसे ही बने रहें।

7-यह एक चक्र है। इस व्यायाम को आगे 3-5 बार करें।

जालंधर बंध;-

इसे चिन बंध भी कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस बंध का अविष्कार जालंधरिपाद नाथ ने किया था इसीलिए उनके नाम पर इसे जालंधर बंध कहते हैं। हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता में इस बंध के अनेक लाभ बताएँ गए हैं। कहते हैं कि यह बंध मौत के जाल को भी काटने की ताकत रखता है, क्योंकि इससे दिमाग, दिल और मेरुदंड की नाड़ियों में निरंतर रक्त संचार सुचारु रूप से संचालित होता रहता है।

विधि :-

किसी भी सुखासन पर बैठकर पूरक करके कुंभक करें और ठोड़ी को छाती के साथ दबाएँ। इसे जालंधर बंध कहते हैं। अर्थात कंठ को संकोचन करके हृदय में ठोड़ी को दृढ़ करके लगाने का नाम जालंधर बंध है।

लाभ :-

03 FACTS;-

1-जालंधर के अभ्यास से प्राण का संचरण ठीक से होता है। इड़ा और पिंगला नाड़ी बंद होकर प्राण-अपान सुषुन्मा में प्रविष्ट होता है।

2- इस कारण मस्तिष्क के दोनों हिस्सों में सक्रियता बढ़ती है। इससे गर्दन की माँसपेशियों में रक्त का संचार होता है, जिससे उनमें दृढ़ता आती है।

3-कंठ की रुकावट समाप्त होती है। मेरुदंड में ‍खिंचाव होने से उसमें रक्त संचार तेजी से बढ़ता है। इस कारण सभी रोग दूर होते हैं और व्यक्ति सदा स्वस्थ बना रहता है।

सावधानी :-

02 FACTS;-

1- शुरू में स्वाभाविक श्वास ग्रहण करके जालंधर बंध लगाना चाहिए। यदि गले में किसी प्रकार की तकलीफ हो तो न लगाएँ।

2-शक्ति से बाहर श्वास ग्रहण करके जालंधर न लगाएँ। श्वास की तकलीफ या सर्दी-जुकाम हो तो भी न लगाएँ। योग शिक्षक से अच्छे से सीखकर इसे करना चाहिए।

खेचरी मुद्रा (समाधि और सिद्धि);-

03 FACTS;-

1-मनुष्य की जीभ (जिह्वा) दो तरह की होती हैं- लंबी और छोटी। लंबी जीभ को सर्पजिह्वा कहते हैं। कुछ लोगों की जीभ लंबी होने से वे उसे आसानी से नासिकाग्र पर लगा सकते हैं और खेचरी-मुद्रा कर सकते हैं।

2-मगर जिसकी जीभ छोटी होती है उसे तकलीफों का सामना करना पड़ता है। सबसे पहले उन्हें अपनी जीभ लंबी करनी पड़ती है और उसके लिए घर्षण व दोहन का सहारा लेना पड़ता है। जीभ नीचे की ओर से जिस नाड़ी से जुड़ी होती है उसे काटना पड़ता है।

3-खेचरी मुद्रा को सिद्ध करने एवं अमृत के स्राव हेतु आवश्यक उद्दीपन में कुछ वर्ष भी लग सकते हें। यह व्यक्ति की योग्यता पर भी निर्भर करता है। योग में कुछ मुद्राएं ऐसी हैं जिन्हें सिर्फ योगी ही करते हैं। सामान्यजनों को इन्हें नहीं करना चाहिए। खेचरी मुद्रा साधकों के लिए मानी गई है।

खेचरी मुद्रा के लाभ ;-

06 FACTS;-

1-इस मुद्रा से प्राणायाम को सिद्ध करने और सामधि लगाने में विशेष सहायता मिलती है।

2-इस मुद्रा को करने से मुंह के अंदर लार ज्यादा मात्रा में बनती है। जिससे भूख बढती है और प्यास दूर होती है।इसको करने से बवासीर का रोग भी समाप्त हो जाता है

3-शरीर के अंदर की कुंडलिनी शक्ति जाग उठती है।इस मुद्रा को करने से देवताओं के समान सुंदर शरीर और शाश्वत युवा अवस्था प्राप्त होती है।

4-जमीन के नीचे रहने वाले योगी-महात्मा हर समय खेचरी मुद्रा लगाकर बैठे रहते हैं। इसलिए वे अपनी इच्छा के मुताबिक सांस को जब तक चाहे रोक सकते हैं।

5-इस मुद्रा को करने से प्राणों का संचय होता है और कुण्डलिनी शक्ति जाग जाती है।इसको करने से चेतना की ताकत सूक्ष्म और स्थूल स्तर के बीच अर्थात आकाश में हो जाती है।

6- इसे खेचरी मुद्रा इसलिए कहते है क्योकि (ख मतलब आकाश और चर मतलब घूमने वाला) इस मुद्रा को सिद्ध करने पर हवा में उड़ने की शक्ति मिल जाती है ! भगवान हनुमान जी को उनकी वायु में अति तीव्र गति से उड़ने की शक्ति की वजह से उन्हें सबसे बड़ा खेचर कहा जाता है।

खेचरी मुद्रा की विधि;-

04 FACTS;-

NOTE;-इस मुद्रा का अभ्यास बहुत ही ज्यादा कठिन होता है इसलिए इसे किसी योग्य गुरू की देखरेख में ही करना चाहिए।

1-सबसे पहले उत्कटासन की मुद्रा में बैठकर अपनी जीभ को जबड़े से जोड़ने वाले पतले सूत्र को उठाकर सेंधानमक के धारदार टुकड़े से रगड़ ले तथा रोजाना सुबह के समय जीभ को दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी उंगली से पकड़कर दोहन करें जैसे गाय का दोहन करते हैं।

2-इसके बाद जीभ पर त्रिफला का चूर्ण लगा लें। इस क्रिया को तब तक करते रहें जब तक जीभ लंबी होकर नाक, भौंह और सिर को न छूने लगे। बहुत से लोग जीभ के जबड़े से जुड़ने वाले तन्तु को ब्लेड से काटकर जीभ को लंबा करने की कोशिश करते हैं जो कि सही तरीका नहीं है। इस काम मे जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। इसके अभ्यास में कम से कम 6 महीने से ज्यादा का समय लग जाता है।

''धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय''

3-इस क्रिया के पूरी होने पर जब जीभ इतनी लंबी हो जाए कि सिर तक पहुंचने लगे तो जो आसन आपने सिद्ध किया हो उसमें बैठकर जीभ को गले के अंदर सिर को जाने वाले छेद में घुसाने की कोशिश करें।

4-इस अभ्यास को सुबह और शाम को करना चाहिए। इस तरह से जीभ घुसाने से इड़ा-पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी के खुले हुए द्वार बंद हो जाते हैं। ब्रह्म रंध्र से टपकने वाला रस जीभ पर टपकता है। हठयोग में इसे अमृतपान कहा जाता है। समय :-इस मुद्रा को जब तक मन चाहे तब तक कर सकते हैं।

सावधानी :-

02 FACTS;-

1- इस मुद्रा को शुरूआत में रोजाना 20 बार और 2 महीने के बाद रोजाना 8 बार करना अच्छा रहता है।

2- कोई भारी शारीरिक मेहनत वाला काम करने के बाद इस मुद्रा को नहीं करना चाहिए।3-अगर नाक के ऊपर के भाग से कड़वा सा रस टपकने लगे तो यह मुद्रा तुरंत ही बंद कर देनी चाहिए।