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भारतीय दर्शन विद्या का क्या अर्थ है ? कौन-2 से छह दर्शन है ? PART-01


भारतीय दर्शन विद्या का क्या अर्थ है ?- 09 FACTS;- 1-दर्शन उस विद्या का नाम है जो सत्य एवं ज्ञान की खोज करता है।भारत में 'दर्शन' उस विद्या को कहा जाता है जिसके द्वारा तत्व का साक्षात्कार हो सके। 'तत्व दर्शन' या 'दर्शन' का अर्थ है ''तत्व का साक्षात्कार''।व्यापक अर्थ में दर्शन, तर्कपूर्ण, विधिपूर्वक एवं क्रमबद्ध विचार की कला है। इसका जन्म अनुभव एवं परिस्थिति के अनुसार होता है। यही कारण है कि संसार के भिन्न-भिन्न व्यक्तियों ने समय-समय पर अपने-अपने अनुभवों एवं परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवन-दर्शन को अपनाया।भारतीय दर्शन का इतिहास अत्यन्त पुराना है किन्तु फिलॉसफ़ी (Philosophy) के अर्थों में दर्शनशास्त्र पद का प्रयोग सर्वप्रथम पाइथागोरस ने किया था। 2-मानव के दुखों की निवृति के लिए और तत्व साक्षात्कार कराने के लिए ही भारत में दर्शन का जन्म हुआ है। हृदय की गाँठ तभी खुलती है और शोक तथा संशय तभी दूर होते हैं जब एक सत्य का दर्शन होता है।सम्यक दर्शन प्राप्त होने पर कर्म मनुष्य को बंधन में नहीं डाल सकता तथा जिनको सम्यक दृष्टि नहीं है वे ही संसार के महामोह और जाल में फंस जाते हैं। भारतीय ऋषिओं ने जगत के रहस्य को अनेक कोणों से समझने की कोशिश की है। 3-भारतीय दार्शनिकों के बारे में टी एस एलियट ने कहा था ;- ''भारतीय दार्शनिकों की सूक्ष्मताओं को देखते हुए यूरोप के अधिकांश महान दार्शनिक स्कूल के बच्चों जैसे लगते हैं।'' प्रायः फिलॉसफ़ी को दर्शन का अंग्रेजी समानार्थक समझा जाता है परंतु दोनों में स्पष्ट अंतर है। भारतीय दर्शन और 'फिलॉसफ़ी' (Philosophy) एक नहीं क्योंकि दर्शन यथार्थता, जो एक है, का तत्वज्ञान है जबकी फिलासफी विभिन्न विषयों का विश्लेषण। इसलिये दर्शन में चेतना की मीमांसा अनिवार्य है जो पाश्चात्य फिलासफी में नहीं।

4-सनातन काल से ही मानव में जिज्ञासा और अन्वेषण की प्रवृत्ति रही है।मानव जीवन का चरम लक्ष्य दुखों से छुटकारा प्राप्त करके चिर आनंद की प्राप्ति है।समस्त दर्शनों का भी एक ही लक्ष्य है..दुखों के मूल कारण अज्ञान से मानव को मुक्ति दिलाकर उसे मोक्ष की प्राप्ति करवाना। यानी अज्ञान व परंपरावादी और रूढ़िवादी विचारों को नष्ट करके सत्य ज्ञान को प्राप्त करना ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है।

5-प्रकृति के उद्भव तथा सूर्य, चंद्र और ग्रहों की स्थिति के अलावा परमात्मा के बारे में भी जानने की जिज्ञासा मानव में रही है। इन जिज्ञासाओं का शमन करने के लिए किये गये अनवरत प्रयास का ही यह फल है कि हम लोग इतने विकसित समाज में रह रहे हैं।आरम्भ से ही दो प्रकार के लक्ष्य थे-धन का उपार्जन तथा ब्रह्म का साक्षात्कार। परंतु प्राचीन ऋषि-मुनियों को इस भौतिक समृद्धि से न तो संतोष हुआ और न चिर आनंद की प्राप्ति ही हुई। अत: उन्होंने इसी सत्य और ज्ञान की प्राप्ति के क्रम में सूक्ष्म से सूक्ष्म एवं गूढ़तम साधनों से ज्ञान की तलाश आरंभ की और इसमें उन्हें सफलता भी प्राप्त हुई। उसी असत् एवं सत् पदार्थों का ज्ञान ही दर्शन है।

6-तत्वज्ञान में प्रमुख प्रश्न ये हैं-

6-1. ज्ञान के अतिरिक्त ज्ञाता और ज्ञेय का भी अस्तित्व है या नहीं?

6-2. अंतिम सत्ता का स्वरूप क्या है? वह एक प्रकार की है, या एक से अधिक प्रकार की?

7-ज्ञानमीमांसा में प्रमुख प्रश्न ये हैं-

7-1. ज्ञान क्या है?

7-2. ज्ञान की संभावना भी है या नहीं?

7-3. ज्ञान प्राप्त कैसे होता है?

7-4. मानव ज्ञान की सीमाएँ क्या हैं?

8-दार्शनिक विवेचन में जिन विषयों पर विशेष रूप से विचार होता रहा है, वे

मुख्य विषय हैं-

8-1-ज्ञानमीमांसा (Epistomology) 8-2-तत्वमीमांसा (Metaphysics) 8-3-नीतिमीमांसा (Ethics) 8-4-सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) 8-5-तर्कशास्त्र (Logic) 9- गौण विषय हैं--

9-1-यथार्थवाद 9-2-संदेहवाद

कौन-2 से छह दर्शन है ?-

05 FACTS;-

1-वैदिक परम्परा के 6 दर्शन हैं।छः मुख्य विभाग होने के कारण इसे षड्दर्शन भी कहा जाता है...

(1) मीमांसा (2) न्याय (3) वैशेषिक (4) सांख्य (5) योग (6) वेदान्त 2-वैसे तो समस्त दर्शन की उत्पत्ति वेदों से ही हुई है, फिर भी समस्त भारतीय दर्शन को आस्तिक एवं नास्तिक दो भागों में विभक्त किया गया है। जो ईश्वर तथा वेदोक्त बातों जैसे न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत पर विश्वास करता है, उसे आस्तिक माना

जाता है; जो नहीं करता वह नास्तिक है। भारत में भी कुछ ऐसे व्यक्तियों ने जन्म लिया जो वैदिक परम्परा के बन्धन को नहीं मानते थे वे नास्तिक कहलाये तथा दूसरे जो वेद को प्रमाण मानकर उसी के आधार पर अपने विचार आगे बढ़ाते थे वे आस्तिक कहे गये।

3-आस्तिक दर्शन के छः मुख्य विभाग हैं -

3-1-न्याय दर्शन 3-2-वैशेषिक दर्शन 3-3-सांख्य दर्शन 3-4-योग दर्शन 3-5-वेदान्त दर्शन 3-6-मीमांसा दर्शन

4-नास्तिक या अवैदिक दर्शन;-

अक्सर लोग समझते है कि जो ईश्वर को नहीं मानता वह नास्तिक है पर यहाँ नास्तिक का अर्थ वेदों को न मानने से है इसलिए निम्न दिए गए तीनो दर्शन ..नास्तिक दर्शन में आते है.. 4-1-चार्वाक दर्शन;-

एक भौतिकवादी नास्तिक दर्शन है।यह मात्र प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है तथा पारलौकिक सत्ताओं को यह सिद्धांत स्वीकार नहीं करता है। 4-2-बौद्ध दर्शन;-

03 POINTS;-

1-बौद्धमत में उपनिषदों के आत्मवाद का खंडन करके “अनात्मवाद” की स्थापना की गई है।अनात्मवादी होने के कारण बौद्ध धर्म का वेदांत से विरोध हुआ। फिर भी बौद्धमत में कर्म और पुनर्जन्म मान्य हैं।सिद्धांतभेद के अनुसार बौद्ध परंपरा में चार दर्शन प्रसिद्ध हैं। इनमें वैभाषिक और सौत्रांतिक मत हीनयान परंपरा में हैं। यह दक्षिणी बौद्धमत हैं। इसका प्रचार भी लंका में है। योगाचार और माध्यमिक मत महायान परंपरा में हैं। यह उत्तरी बौद्धमत है। इन चारों दर्शनों का उदय ईसा की आरंभिक शब्ताब्दियों में हुआ। इसी समय वैदिक परंपरा में षड्दर्शनों का उदय हुआ।

2-बुद्ध द्वारा सर्वप्रथम सारनाथ में दिये गये उपदेशों में से चार आर्यसत्य इस प्रकार हैं :- –

2-1-संसार दुखमय है।

2-2-दुख उत्पन्न होने का कारण है (तृष्णा)।

2-3. दुख का निवारण संभव है।

2-4. दुख निवारक मार्ग (आष्टांगिक मार्ग)।

3-बुद्धाभिमत इन चारों तत्त्वों में से दुःखसमुदाय के अन्तर्गत द्वादशनिदान (जरामरण, जाति, भव, उपादान, तृष्णा, वेदना, स्पर्श, षडायतन, नामरूप, विज्ञान, संस्कार तथा अविद्या) तथा दुःखनिरोध के उपायों में अष्टांगमार्ग (सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीव, सम्यक् प्रयत्न, सम्यक् स्मृति तथा सम्यक् समाधि) का विशेष महत्व है। इसके अतिरिक्त पंचशील (अहिंसा, अस्तेय, सत्यभाषण, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह) तथा द्वादश आयतन (पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कर्मेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि), जिनसे सम्यक् कर्म करना चाहिए- भी आचार की दृष्टि से महनीय हैं। वस्तुतः चार आर्य सत्यों का विशद विवेचन ही बौद्ध दर्शन है। 4-3-जैन दर्शन;-

1-जैन दर्शन में अहिंसा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकर (महापुरूष, जैनों के ईश्वर) हुए जिनमें प्रथम ऋषभदेव तथा अन्तिम महावीर (वर्धमान) हुए। इनके कुछ तीर्थकरों के नाम ऋग्वेद में भी मिलते हैं, जिससे इनकी प्राचीनता प्रमाणित होती है।इसमें वेद की प्रामाणिकता को कर्मकाण्ड की अधिकता और जड़ता के कारण मिथ्या बताया गया।

2-जैन दर्शन के अनुसार जीव और कर्मो का यह सम्बन्ध अनादि काल से है। जब जीव इन कर्मो को अपनी आत्मा से सम्पूर्ण रूप से मुक्त कर देता हे तो वह स्वयं भगवान बन जाता है। लेकिन इसके लिए उसे सम्यक पुरुषार्थ करना पड़ता है। यह जैन धर्म की मौलिक मान्यता है।

सत्य का अनुसंधान करने वाले ‘जैन’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘जिन’ से मानी गई है, जिसका अर्थ होता है- विजेता अर्थात् वह व्यक्ति जिसने इच्छाओं (कामनाओं) एवं मन पर विजय प्राप्त करके, हमेशा के लिए संसार के आवागमन से मुक्ति प्राप्त कर ली है।

3-संक्षेप में इनके सिद्धान्त इस प्रकार हैं-

5-प्रमुख दर्शनशास्त्रों के प्रथम सूत्र ;-

नीचे प्रमुख दर्शनशास्त्रों के प्रथम सूत्र दिये गये हैं जो मोटे तौर पर उस दर्शन की विषयवस्तु का परिचय देते हैं- 5-1-अथातो धर्मजिज्ञासा... धर्म के जानने की लालसा। ( पूर्वमीमांसा) 5-2-अथातो ब्रह्मजिज्ञासा..ब्रह्य के जानने की लालसा। ( वेदान्तसूत्र ) 5-3-अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः। ...धर्म की व्याख्या ( वैशेषिकसूत्र ) 5-4-अथ योगानुशासनम्।...याेग एक अनुशासन है, जिससे मनुष्य अपने आत्मस्वरूप में स्थित होता है। ( योगसूत्र ) 5-5-अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः।..जड़ प्रकृति सत्व, रजस एवं तमस् - इन तीनों गुणों की साम्यावस्था का नाम है।जीवन में दिखाई पड़ने वाले वैषम्य का समाधान त्रिगुणात्मक प्रकृति की सर्वकारण रूप में प्रतिष्ठा करके किया जा सकता है।( सांख्यसूत्र ) 5-6-प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवाद जल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्व ज्ञानात्निःश्रेयसाधिगमः । ( न्यायसूत्र ) (अर्थ : प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अयवय, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान का तत्वज्ञान निःश्रेयस या परम कल्याण का विधायक है।)

क्या है भारतीय दर्शन का स्रोत ?- भारतीय दर्शन का आरंभ वेदों से होता है। "वेद" भारतीय धर्म, दर्शन, संस्कृति, साहित्य आदि सभी के मूल स्रोत हैं। ये "आस्तिक दर्शन" कहलाते हैं। प्रसिद्ध षड्दर्शन इन्हीं के अंतर्गत हैं।

"वेद" एक संपूर्ण साहित्य है; वेदमंत्रों के रचनेवाले ऋषि अनेक हैं।वैदिक साहित्य का

विकास चार चरणों में हुआ है।

04 FACTS;-

1-संहिता;-

मंत्रों और स्तुतियों के संग्रह को "संहिता" कहते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद मंत्रों की संहिताएँ ही हैं। इनकी भी अनेक शाखाएँ हैं।

2-ब्राह्मण;-

ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञों की विधि, उनके प्रयोजन, फल आदि का विवेचन है।

3-आरण्यक ;-

आरण्यकग्रंथों में आध्यात्मिकता की ओर झुकाव दिखाई देता है। जैसा कि इस नाम से ही विदित होता है, ये वानप्रस्थों के उपयोग के ग्रंथ हैं।

4-उपनिषद् ;-

उपनिषदों में आध्यात्मिक चिंतन की प्रधानता है।ब्रह्म की साधना ही उपनिषदों का मुख्य लक्ष्य है। ब्रह्म को आत्मा भी कहते हैं।वेदों का अंतिम भाग होने के कारण उपनिषदों को "वेदांत" भी कहते हैं।उपनिषदों की शैली सरल और गंभीर है।अनुभव के गंभीर तत्व अत्यंत सरल भाषा में उपनिषदों में व्यक्त हुए हैं।सन्यास, वैराग्य, योग, तप, त्याग आदि को उपनिषदों में बहुत महत्व दिया गया है।ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य आदि प्राचीन उपनिषद् भारतीय चिंतन के आदिस्त्रोत हैं।

छह दर्शन का संक्षिप्त वर्णन;- 1-न्याय दर्शन;- 08 FACTS;-

1-महिर्ष अक्षपाद गौतम द्वारा प्रणीत न्याय दर्शन एक आस्तिक दर्शन है जिसमें ईश्वर कर्म-फल प्रदाता है।इस दर्शन में पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन है। इस दर्शन का मुख्य विषय ''प्रमाण'' है। न्याय शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त होता है परन्तु दार्शनिक साहित्य में न्याय वह साधन है जिसकी सहायता से किसी प्रतिपाद्य विषय या किसी सिद्धान्त का निराकरण होता

है।अत: न्यायदर्शन में अन्वेषण अर्थात् जाँच-पड़ताल के उपायों का वर्णन किया गया है।

इस ग्रन्थ में पा¡च अध्याय है तथा प्रत्येक अध्याय में दो दो आह्रिक हैं। कुल सूत्रों की संख्या 539 हैं।

2-न्यायदर्शन में अन्वेषण अर्थात् जाँच-पड़ताल के उपायों का वर्णन किया हैऔर कहा है कि सत्य की खोज के लिए सोलह तत्व है। उन तत्वों के द्वारा किसी भी पदार्थ की सत्यता (वास्तविकता) का पता किया जा सकता है। ये सोलह तत्व है-

(1) प्रमाण, (2) प्रमेय, (3)संशय, (4) प्रयोजन, (5) दृष्टान्त, (6) सिद्धान्त, (7)अवयव, (8) तर्क (9) निर्णय, (10) वाद, (11) जल्प, (12) वितण्डा, (13) हेत्वाभास, (14) छल, (15) जाति और (16) निग्रहस्थान

3-इन सबका वर्णन न्याय दर्शन में है और इस प्रकार इस दर्शन शास्त्र को तर्क करने का व्याकरण कह सकते हैं। वेदार्थ जानने में तर्क का विशेष महत्व है। अत: यह दर्शन शास्त्र

वेदार्थ करने में सहायक है।दर्शनशास्त्र में कहा है-इन सोलह तत्वों के ज्ञान से सत्य की खोज में सफलता प्राप्ति होती है।

4-न्याय दर्शन के चार विभाग है-

4-1-सामान्य ज्ञान की समस्या का निराकरण

4-2-जगत की समस्या का निराकरण

4-3-जीवात्मा की मुक्ति

4-4-परमात्मा का ज्ञान

5-न्याय दर्शन में आघ्यात्मवाद की अपेक्षा तर्क एवं ज्ञान का आधिक्य है।इसमें तर्क शास्त्र का प्रवेश इसलिए कराया गया क्योंकि स्पष्ट विचार एवं तर्क-संगत प्रमाण परमानन्द की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। न्याय दर्शन में 1-सामान्य ज्ञान 2-संसार की क्लिष्टता 3-जीवात्मा की मुक्ति एवं 4-परमात्मा का ज्ञान...इन चारों गंभीर उद्देश्यों को लक्ष्य बनाकर प्रमाण आदि 16 पदार्थ उनके तार्किक समाधान के माने गये है किन्तु इन सबमे प्रमाण ही मुख्य प्रतिपाद्य विषय है।

6-किसी विषय में यथार्थ ज्ञान पर पहुंचने और अपने या दूसरे के अयथार्थ ज्ञान की त्रुटि ज्ञात करना ही इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य है।दु:ख का अत्यन्तिक नाश ही मोक्ष है।

न्याय दर्शन की अन्तिम दीक्षा यही है कि केवल ईश्वरीयता ही वांछित है, ज्ञातव्य है और प्राप्य है- यह संसार नहीं।

7-पदार्थ और मोक्ष....मुक्ति के लिए इन समस्याओं का समाधान आवश्यक है जो 16 पदार्थों के तत्वज्ञान से होता है। इनमें प्रमाण और प्रमेय भी है। तत्वज्ञान से मिथ्या-ज्ञान का नाश होता है। राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके यही मोक्ष दिलाता है। सोलह पदार्थों का तत्व-ज्ञान

निम्नलिखित क्रम से मोक्ष का हेतु बनाता है। दु:ख, जन्म, प्रवृति(धर्म-अधर्म),दोष (राग,द्वेष), और मिथ्या ज्ञान-इनमें से उत्तरोतर नाश द्वारा इसके पूर्व का नाश होने से मोक्ष होता है।

इनमें से प्रमेय के तत्व-ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है और प्रमाण आदि पदार्थ उस ज्ञान के साधन है। युक्ति तर्क है जो प्रमाणों की सहायता करता है।पक्ष-प्रतिपक्ष के द्वारा जो अर्थ का निश्चय है, वही निर्णय है। दूसरे अभिप्राय से कहे शब्दों का कुछ और ही अभिप्राय ,कल्पना करना छल है।

8-आत्मा का अस्तित्व...आत्मा, शरीर और इन्द्रियों में केवल आत्मा ही भोगने वाला है। इच्छा,द्वेष, प्रयत्न, सुख-दु:ख और ज्ञान उसके चिह्म है जिनसे वह शरीर से अलग जाना पड़ता है। उसके भोगने का घर शरीर है। भोगने के साधन इन्द्रिय है। भोगने योग्य विषय (रूप,रस,गंध, शब्द और स्पर्श) ये अर्थ है ।उस भोग का अनुभव बुध्दि है और अनुभव कराने वाला अंत:करण मन है। सुख-दु:ख का कराना फल है और अत्यान्तिक रूप से उससे छूटना ही मोक्ष है।

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2-वैशेषिक दर्शन;-

07 FACTS;- 1-वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महिर्ष कणाद है जिसमें धर्म के सच्चे स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसमें सांसारिक उन्नति तथा निश्श्रेय सिद्धि के साधन को धर्म माना गया है। अत: मानव के कल्याण हेतु धर्म का अनुष्ठान करना परमावश्यक होता है।साथ ही यह दर्शन वेदों को, ईश्वरोक्त होने को परम प्रमाण मानता है।चूंकि ये दर्शन परिमण्डल, पंच महाभूत और भूतों से बने सब पदार्थों का वर्णन करता है, इसलिए वैशेषिक दर्शन विज्ञान-मूलक है।

2-मूल पदार्थ-परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति का वर्णन तो ब्रह्यसूत्र में है। ये तीन पदार्थ ब्रह्य कहाते है। प्रकृति के रूपान्तर दो प्रकार के हैं ..महत् अहंकार, तन्मात्रा तो अव्यक्त है, इनका वर्णन सांख्य दर्शन में है। पंच महाभूत तथा महाभूतों से बने चराचर जगत् के सब पदार्थ व्यक्त पदार्थ कहलाते हैं। इनका वर्णन वैशेषिक दर्शन में है।

3-वैशेषिक दर्शन का प्रथम सूत्र है-

''जिससे इहलौकिक और पारलौकिक (नि:श्रेयस) सुख की सिध्दि होती है वह धर्म है।''

कणाद के वैशेषिक दर्शन की गौतम के न्याय-दर्शन से भिन्नता इस बात में है कि इसमें छब्बीस के बजाय 7 ही तत्वों को विवेचन है। जिसमें विशेष पर अधिक बल दिया गया है।

ये तत्व है-द्रव्य, गुण, कर्म, समन्वय,विशेष और अभाव।

4-वैसे वैशेषिक दर्शन बहुत कुछ न्याय दर्शन के समरूप है और इसका लक्ष्य जीवन में सांसारिक वासनाओं को त्याग कर सुख प्राप्त करना और ईश्वर के गंभीर ज्ञान-प्राप्ति के द्वारा अंतत: मोक्ष प्राप्त करना है। न्याय-दर्शन की तरह वैशेषिक भी प्रश्नोत्तर के रूप में ही लिखा गया है।

5-जगत में पदार्थों की संख्या केवल छह है। द्रव्य,गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समन्वय। क्योंकि इस दर्शन में विशेष पदार्थ सूक्ष्मता से निरूपण किया गया है। इसलिए इसका नाम

वैशेषिक दर्शन है।''धर्म-विशेष से उत्पन्न हुए पदार्थ यथा,द्रव्य,गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समन्वय-रूप पदार्थों के सम्मिलित और विभक्त धर्मो के अघ्ययन-मनन और तत्वज्ञान से मोक्ष होता है। ये मोक्ष विश्व की अणुवीय प्रकृति तथा आत्मा से उसकी भिन्नता के अनुभव पर निर्भर कराता है।

6-वैशेषिक दर्शन में वर्णित पदार्थ;-

वैशेषिक दर्शन में पदार्थों का निरूपण निम्नलिखित रूप से हुआ है:-

18 POINTS;-

1-जल:-

यह शीतल स्पर्श वाला पदार्थ है।

2-तेज: -

उष्ण स्पर्श वाला गुण है।

3-काल:-

सारे कायो की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश में निमित्त होता है।

4-आत्मा: -

इसकी पहचान चैतन्य-ज्ञान है।

5-मन: -

यह मनुष्य क अभ्यन्तर में सुख-दु:ख आदिके ज्ञान का साधन है।

6-पंचभूत:-

पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश

7-पंच इन्द्रिय:-

घ्राण, रसना, नेत्र, त्वचा और श्रोत्र

8-पंच-विषय: -

गंध,रस,रूप,स्पर्श तथा शब्द

9-बुध्दि:-

ये ज्ञान है और केवल आत्मा का गुण है।

10-नया ज्ञान;-

अनुभव है और पिछला स्मरण ।

11-संख्या:-

संख्या, परिमाण, पृथकता, संयोग और विभाग ये

12-आदि गुण: -

सारे गुण द्रव्यों में रहते हैं।

13-अनुभव:-

यथार्थ(प्रमा, विद्या) एवं अयथार्थ, (अविद्या)

14-स्मृति:-

पूर्व के अनुभव के संस्कारों से उत्पन्न ज्ञान

15-सुख:-

सुख है इष्ट विषय की प्राप्ति जिसका स्वभाव अनुकूल होता है। अतीत के विषयों के स्मरण एवं भविष्यतमें उनके संकल्प से सुख होता है।सुख मनुष्य का परमोद्देश्य होता है।

16-दु:ख: -

इष्ट के जाने या अनिष्ट के आने से दु:ख होता है जिसकी प्रकृति प्रतिकूल होती है।

17-इच्छा:-

किसी अप्राप्त वस्तु की प्रार्थना ही इच्छा है जो फल या उपाय के हेतु होती है।

18-धर्म,अधर्म या वेद-विहित कर्म;-

जो कर्ता के हित और मोक्ष का साधन होता है, धर्म कहलाता है। अधर्म से अहित और दु:ख होता है जो प्रतिषिद्ध कर्मो से उपजता है। अदृष्ट में धर्म और अधर्म दोनों सम्मिलित रहते हैं।

7-वैशेषिक दर्शन के मुख्य पदार्थ;-

07 POINTS;-

1-द्रव्य:-

द्रव्य गिनती में 9 है जैसे... पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन।

2- गुण:-

गुणों की संख्या चौबीस मानी गयी है जिनमें कुछ सामान्य ओर बाकी विशेष कहलाते हैं। जिन गुणो से द्रव्यों में विखराव न हो उन्हें सामान्य(संख्या, वेग, आदि) और जिनसे बिखराव (रूप,बुध्दि, धर्म आदि) उन्हें विशेष गुण कहते है।

3- कर्म:-

किसी प्रयोजन को सिद्ध करने में कर्म की आवश्यकता होती है, इसलिए द्रव्य और गुण के साथ कर्म को भी मुख्य पदार्थ कहते हैं। चलना,फेंकना, हिलना आदि सभी कर्म मनुष्य के कर्म पुण्य-पाप रूप होते हैं।

4-सामान्य:-

मनुष्यों में मनुष्यत्व, वृक्षों में वृक्षत्व जाति सामान्य है और ये बहुतों में होती है। दिशा, काल आदि में जाति नहीं होती क्योंकि ये अपने आप में अकेली है।

5-विशेष: -

देश काल की भिन्नता के बाद भी एक दूसरे के बीच पदार्थ जो विलक्षणता का भेद होता है

है वह उस द्रव्य में एक विशेष की उपस्थिति से होता है। उस पहचान या विलक्षण प्रतीति का एक निमित्त होता है- जैसे शर्करा में मिठास से।

6-समभाव: -

जहाँ गुण व गुणी का संबंध इतना घना है कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता।

7-अभाव: -

इसे भी पदार्थ माना गया है। किसी भी वस्तु की उत्पत्ति से पूर्व उसका अभाव अथवा किसी एक वस्तु में दूसरी वस्तु के गुणों का अभाव (ये घट नहीं, पट है) आदि इसके उदाहरण है।

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3-सांख्य दर्शन ;-

03 FACTS;- 1-इस दर्शन के रचयिता महर्षि कपिल हैं।सांख्य दृश्यमान विश्व को प्रकृति-पुरुष मूलक मानता है। यह अद्वैत वेदान्त से सर्वथा विपरीत मान्यताएँ रखने वाला दर्शन है।'सांख्य' का शाब्दिक अर्थ है - 'संख्या सम्बंधी' या विश्लेषण। इसकी सबसे प्रमुख धारणा सृष्टि के प्रकृति-पुरुष से बनी होने की है, यहाँ प्रकृति (यानि पंचमहाभूतों से बनी) जड़ है और पुरुष (यानि जीवात्मा) चेतन। योग शास्त्रों के ऊर्जा स्रोत (ईडा-पिंगला), शाक्तों के शिव-शक्ति के सिद्धांत इसके समानान्तर दीखते हैं।भारतीय संस्कृति में किसी समय सांख्य दर्शन का अत्यंत ऊँचा स्थान था। देश के उदात्त मस्तिष्क सांख्य की विचार पद्धति से सोचते थे।

2-इसमें प्रकृति के परम सूक्ष्म कारण तथा उसके सहित 24 कार्य पदाथों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। पुरुष 25 वां तत्व माना गया है, जो प्रकृति का विकार नहीं है। इस प्रकार प्रकृति समस्त कार्य पदाथो का कारण तो है, परंतु प्रकृति का कारण कोई नहीं है, क्योंकि उसकी शाश्वत सत्ता है। पुरुष चेतन तत्व है, तो प्रकृति अचेतन।

3-सांख्य दर्शन के 25 तत्व;-

आत्मा (पुरुष)

अंतःकरण (4) : मन, बुद्धि,चित्त, अहंकार

ज्ञानेन्द्रियाँ (5) : नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण

कर्मेन्द्रियाँ (5) : पाँव, हाथ, उपस्थ(मूत्र का मार्ग), पायु/मलेन्द्रिय, वाणी

तन्मात्रायें (5) : गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द