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क्या है भारतीय संस्कृति के आधारभूत तथ्य?

रतीय संस्कृति के आधारभूत तथ्य ;-

27 FACTS;-

1-क्या है दो पक्ष?- 1-कृष्ण पक्ष , 2-शुक्ल पक्ष 2-क्या है पञ्च ऋण ?- 1-ब्रह्म ऋण , 2-देवऋण 3-पितृऋण, 4-अतिथि / मानव ऋण - 5-भूतऋण 3-क्या है चार युग? - 1-सतयुग , 2-त्रेतायुग , 3-द्वापरयुग , 4-कलियुग❗ 4-क्या है चार धाम ?- 1-द्वारिका , 2-बद्रीनाथ , 3-जगन्नाथपुरी , 4-रामेश्वरमधाम❗ 5-क्या है चार पीठ ?- 1-शारदा पीठ (द्वारिका) 2-ज्योतिष पीठ (जोशीमठ बद्रिधाम) 3-गोवर्धन पीठ (जगन्नाथपुरी), 4-शृंगेरीपीठ❗ 6-चार वेद के नाम;- 1-ऋग्वेद , 2-अथर्वेद , 3-यजुर्वेद , 4-सामवेद! 7-चार आश्रम ;- 1-ब्रह्मचर्य , 2-गृहस्थ , 3-वानप्रस्थ , 4-संन्यास 8-चार अंतःकरण ;- 1-मन , 2-बुद्धि , 3-चित्त 4-अहंकार❗ 9-पञ्च गव्य ;- 1-गाय का घी , 2-दूध , 3-दही , 4-गोमूत्र , 5-गोबर❗ 10-पञ्च देव ;- 1-गणेश , 2-विष्णु , 3-शिव , 4-देवी , 5-सूर्य! 11-पंच तत्त्व ;- 1-पृथ्वी , 2-जल , 3-अग्नि , 4-वायु ,5-आकाश❗ 12-क्या है छह दर्शन के नाम ? - 1-वैशेषिक , 2-न्याय , 3-सांख्य , 4-योग , 5-पूर्वमीमांसा , 6-उत्तर मीमांसा 13-क्या है सप्त ऋषि के नाम ?- 1-विश्वामित्र , 2-जमदाग्नि , 3-भरद्वाज , 4-गौतम , 5-अत्री , 6-वशिष्ठ 7- कश्यप❗ 14-सप्तपुरी 5 सरोवर के नाम; - 1-अयोध्यापुरी

2-मथुरापुरी 3-मायापुरी (हरिद्वार)

4-काशीपुरी 5-कांचीपुरी 6-अवंतिकापुरी 7-द्वारिकापुरी

5 सरोवर के नाम; - ये भारत के 5 पवित्र सरोवर है, हाँ स्नान करने से मिलता है मोक्ष... 1-कैलाश मानसरोवर... संस्कृत शब्द ‘मानसरोवर’, का शाब्दिक अर्थ होता है- ‘मन का सरोवर’। पौराण‌िक कथाओं के अनुसार, यह सरोवर ब्रह्माजी मन से उत्पन्न हुआ था। इस सरोवर के पास ही कैलाश पर्वत है जो भगवान शिव का निवास स्‍थान माना जाता है।यहां देवी सती के शरीर का दायां हाथ गिरा था इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। यहां शक्तिपीठ है।

2-नारायण सरोवर...गुजरात के कच्छ जिले के लखपत तहसील में स्थित यह सरोवर भगवान का विष्‍णु का सरोवर माना जाता है। मान्यता है कि इस सरोवर में स्वयं भगवान विष्णु ने स्नान किया था।यहां सिंधु नदी का सागर से संगम होता है। नारायण सरोवर में श्रद्धालु अपने पितरों का श्राद्ध भी करते हैं।

3-पंपा सरोवर...मैसूर के पास स्थित पंपा सरोवर एक ऐतिहासिक स्थल है। हंपी के निकट बसे हुए ग्राम अनेगुंदी को रामायणकालीन किष्किंधा माना जाता है।यहीं पर एक पर्वत है, जहां एक गुफा है जिससे शबरी की गुफा कहा जाता है। वास्तव में रामायण में वर्णित विशाल पंपा सरोवर यही है।

4-पुष्कर सरोवर...राजस्थान में अजमेर शहर से 14 किलोमीटर दूर पुष्कर झील है। इस झील का संबंध भगवान ब्रह्मा से है। यहां ब्रह्माजी का एकमात्र मंदिर बना है। यह कई प्राचीन ऋषियों की तपोभूमि भी रहा है। पुष्कर की गणना पंच तीर्थों में भी की गई है।पुष्कर सरोवर 3 हैं- ज्येष्ठ (प्रधान) पुष्कर, मध्य (बूढ़ा) पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर। ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्माजी, मध्य पुष्कर के देवता भगवान विष्णु और कनिष्ठ पुष्कर के देवता रुद्र हैं। 5-बिंदु सरोवर...गुजरात अहमदाबाद से उत्तर में 130 किमी दूरी सिद्धपुर, पर बसे बिंदु सरोवर को लेकर माना जाता है कि यहीं सरोवर के किनारे बैठ कर कर्दम ऋषि ने कई हजार वर्षों तक तपस्या की थी।साथ ही भगवान परशुराम ने अपनी मां का श्राद्ध भी किया था।

15-आठ योग ;- 1-यम , -नियम , 3-आसन 4-प्राणायाम , 5-प्रत्याहार 6-धारणा , 7-ध्यान, 8-समाधि 16-आठ लक्ष्मी के नाम; - 1- धनलक्ष्मी या वैभवलक्ष्मी 2- गजलक्ष्मी 3 अधिलक्ष्मी 4- विजयालक्ष्मी 5- ऐश्वर्य लक्ष्मी 6- वीर लक्ष्मी 7- धान्य लक्ष्मी 8- संतान लक्ष्मी 17-नव दुर्गा के नाम; - 1-शैल पुत्री 2-ब्रह्मचारिणी , 3-चंद्रघंटा , 4-कुष्मांडा , 5-स्कंदमाता , 6-कात्यायिनी , 7-कालरात्रि, 8-महागौरी 9-सिद्धिदात्री 18-दस दिशाएं ;- 1-पूर्व , 2-पश्चिम 3-उत्तर , 4-दक्षिण , 5-ईशान , 6-नैऋत्य , 7-वायव्य , 8-अग्नि 9-आकाश, 10-पाताल 19-मुख्य 10 अवतार ;- 1-मत्स्य , 2-कश्यप , 3-वराह, 4-नरसिंह , 5-वामन , 6-परशुराम , 7-श्री राम , 8-श्रीकृष्ण 9-बुद्ध 10-कल्कि 20-बारह मास ;- 1-चैत्र , 2-वैशाख , 3-ज्येष्ठ 4-अषाढ , 5-श्रावण , 6-भाद्रपद , 7-अश्विन , 8-कार्तिक , 9-मार्गशीर्ष , 10-पौष , 11-माघ , 12-फागुन❗ 21-बारह राशी ;- 1-मेष , 2-वृषभ , 3-मिथुन 4-कर्क , 5-सिंह , 6-कन्या , 7-तुला , 8-वृश्चिक , 9-धनु , 10-मकर , 11-कुंभ , 12-कन्या❗ 22-बारह ज्योतिर्लिंग के नाम ;- 1-सोमनाथ 2-मल्लिकार्जुन , 3-महाकाल , 4-ओमकारेश्वर , 5-बैजनाथ , 6-रामेश्वरम , 7-विश्वनाथ , 8-त्र्यंबकेश्वर , 9-केदारनाथ , 10-घुष्नेश्वर, 11-भीमाशंकर , 12-नागेश्वर! 23-पंद्रह तिथियाँ ;- 1-प्रतिपदा , 2-द्वितीय , 3-तृतीय , 4-चतुर्थी , 5-पंचमी , -षष्ठी , 7-सप्तमी , 8-अष्टमी , 9-नवमी , 10-दशमी , 11-एकादशी 12-द्वादशी , 13-त्रयोदशी , 14-चतुर्दशी , 15-पूर्णिमा, अमावास्या❗ 24-स्मृतियो के नाम ;- 1.मनु स्मृति, 2.व्यास स्मृति, 3.लघु विष्णु स्मृति, 4.आपस्तम्ब स्मृति, 5.वसिष्ठ स्मृति, 6.पाराशर स्मृति, 7.वृहत्पाराशर स्मृति, 8.अत्रि स्मृति, 9.लघुशंख स्मृति, 10.विश्वामित्र स्मृति, 11.यम स्मृति, 12.लघु स्मृति, 13.बृहद्यम स्मृति, 14.लघुशातातप स्मृति, 15.वृद्ध शातातप स्मृति, 16.शातातप स्मृति, 17.वृद्ध गौतम स्मृति, 18.बृहस्पति स्मृति, 19.याज्ञवलक्य स्मृति 20.बृहद्योगि याज्ञवल्क्य स्मृति❗ 25-18 मख्य स्मृतिकार के नाम ;-

मनु, बृहस्पति, दक्ष, गौतम, यम, अंगिरा, योगीश्वर, प्रचेता, शातातप, पराशर, संवर्त, उशना, शंख, लिखित, अत्रि, विष्णु, आपस्तम्ब, हारीत।

26-जीव की दुर्गति का कारण ;-

1-आध्‍यात्मिक, 2-अधिदैविक 3-अधिभौतिक पाप।

27-सांख्‍य दर्शन के अनुसार मूल तत्‍व ;-

1-प्रकृति 2- महत्अं 3-हकार, 4-11 इन्द्रियां, 5- पांच तन्मात्राएं, 6-पांच महाभूत 7- पुरूष।

27-1-प्रकृति :-

प्रकृति बना है प्र और कृति के संयोग से। प्र का अर्थ है प्रकर्ष और कृति का अर्थ है निर्माण करना। जिन मूल तत्वों से मिलकर बाकी सब कुछ बनता है, उसे प्रकृति कहते हैं।

सत्व, रजः, तमः – इन तीन गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति कहा जाता है। इस अवस्था में प्रकृति निष्क्रिय रहती है। इन तीनों गुणों में जब कभी कमी आती है या बढोत्तरी होती है, तब उस विषमता से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है। उसमें विकृति आती है। प्रकृति की विकृति से ही जीव और जगत की सृष्टि होती है।

27-2-महतः

प्रकृति का प्रथम परिणाम महत्तत्व या बुद्धितत्व है।

27-3- अहंकार:

महत्तव की विकृति अहंकारतत्व है।

27-4-ग्‍यारह इन्द्रियां:

अंहकार तत्‍व के परिणाम हैं इन्द्रिय --- विषय।

इन्द्रियां दो प्रकार की है –

बाह्य इन्द्रियां – दो प्रकार की होती है –

27-4a-ज्ञानेन्‍द्रियां

1- चक्षु

2- कर्ण

3- नासिका

4- जिह्वा

5- त्‍वक्

27-4b-(आ) कर्मेन्द्रियां

1- वाक्

2- पाणि

3- पाद

4- पायु

5- उपस्‍थ

( 11-) अन्‍तरेन्द्रिय – मन

27-(5) पंच तन्मात्राएं

पांच तन्मात्राएं अहंकारतत्‍व का एक परिणाम है। पांच तन्मात्राएं है --

1- रूप

2- रस

3- गन्‍ध

4- स्‍पर्श और

5- शब्‍द

27-(6) पंच महाभूत

उपर्युक्‍त वर्णित पंचतमात्रओं से ही पांच स्‍थूल त‍त्‍वों की उत्‍पति होती है। ये हैं –

1- क्षिति,

2- अप् (जल)

3- तेज (पावक)

4- व्‍योम (गगन , आकाश )

5- मरूत् (समीर)

27-(7) पुरूष

सांख्‍य मत के अनुसार इन 25 तत्‍वों का सम्‍यक ज्ञान ही पुरूषार्थ है। सांख्‍य मत में, जीव और जगत की सृष्टि में ईश्‍वर को प्रमाणरूप में नहीं माना जाता। जगत के दो भाग हैं -पुरुष और प्रकृति। पुरूष और प्रकृति के अविभक्‍त संयोग से सृष्टि की क्रिया निष्‍पन्‍न होती है।

पुरूष चेतन है, प्रकृति जड़।

पुरूष और प्रकृति दोनों ही अनादि है।

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सिद्ध तिथियां, रात्रियाँ और पर्व—

06 FACTS;-

कुछ तिथियां अपने आप में ही महत्वपूर्ण एवं सिद्धिप्रद मानी गई है, जिसका प्रयोग करने से साधना में स्वतः सिद्धि प्राप्त होती हैं ..

1-दस महाविद्या जयन्ति तिथियां;-

1- काली भाद्रपद कृष्ण अष्टमी

2- तारा चैत्र शुक्ल नवमी

3- ललिता माघ शुक्ल पूर्णिमा

4- भुवनेश्वरी भाद्रपद शुक्ल द्वादशी

5- भैरवी मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा

6- छिन्नमस्ता वैशाख शुक्ल चतुर्दशी

7- धूमावती ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी

8- बगलामुखी वैशाख शुक्ल चतुर्थी

9- मातंगी वैशाख शुक्ल चतुर्दशी

1०- कमला कार्तिक कृष्ण अमावस्या

2-दस सिद्धविद्या जयन्ति तिथियां;-

1- कुब्जिका वैशाख कृष्ण त्रयोदशी की मध्य रात्रि को

2- चण्डिका वैशाख शुक्ल पूर्णिमा

3- मात्रा मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी

4- सिद्धलक्ष्मी वैशाख शुक्ल चतुर्दशी

5- सरस्वती माघ शुक्ल पंचमी

6- अन्नपूर्णा मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी

7- गायत्री श्रावण शुक्ल पूर्णिमा

8- पार्वती आषाढ़ शुक्ल नवमी

9- अपराजिता आश्विन शुक्ल नवमी

1०- विन्ध्यवासिनी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी

3-दशावतार जयन्ति तिथियां;-

1- मत्स्यावतार कार्तिक शुक्ल नवमी

2- राम चैत्र शुक्ल नवमी

3- कृष्ण भाद्रपद कृष्ण अष्टमी

4- वामन भाद्रपद शुक्ल द्वादशी

5- नृसिंह वैशाख शुक्ल चतुर्दशी

6- परशुराम वैशाख शुक्ल तृतीया

7- वाराह आश्विन शुक्ल चतुर्दशी

8- कल्कि श्रावण शुक्ल षष्ठी

9- बुद्ध भाद्रपद पूर्णिमा

10- बलभद्र मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा

4-युगारम्भ तिथियां;-

1- सतयुग वैशाख शुक्ल तृतीया

2 - द्वापरयुग भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी

3- द्वापरयुग भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी

4- कलियुग माघ कृष्ण अमावस्या

5-चार नवरात्र;-

1- चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी

2- आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी (गुप्त)

3- आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी

4- माघ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी (गुप्त)

6-चार महारात्रि

1. मोहरात्रि (जन्माष्टमी) ।

2. कालरात्रि (नरक चतुर्दशी) ।

3. दारुण रात्रि (होली) ।

4. अहोरात्रि (महाशिवरात्रि) ।


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क्या है पूर्णांक संख्या 108 का रहस्य?- 19 FACTS;-

1-हमारे धर्म में 108 की संख्या महत्वपूर्ण मानी गई है। ईश्वर नाम के जप, मंत्र जप, पूजा स्थल या आराध्य की परिक्रमा, दान इत्यादि में इस गणना को महत्व दिया जाता है। जपमाला में इसीलिए 108 मणियाँ या मनके होते हैं। उपनिषदों की संख्या भी 108 ही है। विशिष्ट धर्मगुरुओं के नाम के साथ इस संख्या को लिखने की परंपरा है। तंत्र में उल्लेखित देवी अनुष्ठान भी इतने ही हैं “ओ३म्” का जप करते समय १०८ प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है।

2-108 मणियाँ या मनके होते हैं। उपनिषदों की संख्या भी 108 ही है। ब्रह्म के 9 व आदित्य के 12 इस प्रकार इनका गुणन 108 होता है। जैन मतानुसार भी अक्ष माला में 108 दाने रखने का विधान है। यह विधान गुणों पर आधारित है। 3-सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति 21600 बार सांस लेता है।जाग्रत अवस्था में शरीर की कुल 10 हजार 800 श्वसन की कल्पना की गई है अतः समाधि या जप के दौरान भी इतने ही आराध्य के स्मरण अपेक्षित हैं। यदि इतना करने में समर्थ नहीं तो अंतिम दो शून्य हटाकर न्यूनतम 108 जप करना ही चाहिए। 4-108 की संख्या परब्रह्म की प्रतीक मानी जाती है। 9 का अंक ब्रह्म का प्रतीक है। विष्णु व सूर्य की एकात्मकता मानी गई है अतः विष्णु सहित 12 सूर्य या आदित्य हैं। ब्रह्म के 9 व आदित्य के 12 इस प्रकार इनका गुणन 108 होता है। इसीलिए परब्रह्म की पर्याय इस संख्या को पवित्र माना जाता है। 5-मानव जीवन की 12 राशियाँ हैं। ये राशियाँ 9 ग्रहों से प्रभावित रहती हैं। इन दोनों संख्याओं का गुणन भी 108 होता है। 6-नभ में 27 नक्षत्र हैं। इनके 4-4 पाद या चरण होते हैं। 27 का 4 से गुणा 108 होता है। ज्योतिष में भी इनके गुणन अनुसार उत्पन्न 108 महादशाओं की चर्चा की गई है। 7-ऋग्वेद में ऋचाओं की संख्या 10 हजार 800 है। 2 शून्य हटाने पर 108 होती है। 8-शांडिल्य विद्यानुसार यज्ञ वेदी में 10 हजार 800 ईंटों की आवश्यकता मानी गई है। 2 शून्य कम कर यही संख्या शेष रहती है। 9-जैन मतानुसार भी अक्ष माला में 108 दाने रखने का विधान है। यह विधान गुणों पर आधारित है। अर्हन्त के 12, सिद्ध के 8, आचार्य के 36, उपाध्याय के 25 व साधु के 27 इस प्रकार पंच परमिष्ठ के कुल 108 गुण होते हैं।

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9-2- 9 पूर्णता का सूचक है।1+0+8==9 यह 9 अंक राज राजेश्वरी का प्रिय है ।जिस प्रकार भगवती नित्य पूर्ण है यह अंक भी पूर्ण है। 10 -जैन मतानुसार;- अरिहंत के गुण – 12 सिद्ध के गुण – 8 आचार्य के गुण – 36 उपाध्याय के गुण – 25 साधु के गुण – 27 कुल योग – 108 ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; 11 - वैदिक विचार धारा में मनुस्मृति के अनुसार;- अहंकार के गुण = 2 बुद्धि के गुण = 3 मन के गुण = 4 आकाश के गुण = 5 वायु के गुण = 6 अग्नि के गुण = 7 जल के गुण = 8 पॄथ्वी के गुण = 9 2+ 3+ 4+ 5+ 6+ 7+ 8+ 9 =अत: प्रकॄति के कुल गुण = 44 जीव के गुण = 10 इस प्रकार संख्या का योग = 54 अत: सृष्टि उत्पत्ति की संख्या = 54 एवं सृष्टि प्रलय की संख्या = 54 दोंनों संख्याओं का योग = 108 ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

12-संस्कृत भाषा में 54 वर्णमाला है। इनमें एक स्त्री और दूसरा पुरुष रूप है। दोनों रूपों के अक्षरों की संख्या जुड़कर 108 हो जाती है। 13- पवित्र त्रेतवाद ( Holy Trinity );- संख्या “1” एक ईश्वर का संकेत है।संख्या “0” जड़ प्रकृति का संकेत है। संख्या “8” बहुआयामी जीवात्मा का संकेत है।यह तीन अनादि परम वैदिक सत्य हैं ।यही पवित्र त्रेतवाद ( Holy Trinity ) है ] 14-संख्या “ 2” से “ 9” तक एक बात सत्य है कि इन्हीं आठ अंकों में “0” रूपी स्थान पर जीवन है। इसलिये यदि “0” न हो तो कोई क्रम गणना आदि नहीं हो सकती।“ 1” की चेतना से “ 8” का खेल । “ 8” यानी “ 2” से “ 9” । यह “ 8” है ...मन के “ 8” वर्ग या भाव । ये आठ भाव ये हैं – 1- काम ( विभिन्न इच्छायें / वासनायें) 2-क्रोध 3-. लोभ 4-मोह 5-मद ( घमण्ड ) 6-मत्सर ( जलन ) 7-भय 8-आलस्य एक सामान्य आत्मा से महानात्मा तक की यात्रा का प्रतीक है -108.. इन आठ भावों में जीवन का ये खेल चल रहा है ।

15-समुद्र मंथन के समय जब क्षीर सागर पर मंदार पर्वत पर बंधे वासुकि नाग को देवता और असुरों ने अपनी-अपनी ओर खींचा था तब उसमे 54 देव और 54 राक्षस, कुल मिलाकर 108 लोग ही शामिल थे।

16-दक्षिण भारत की शाखा के सिद्धांत के अनुसार मानव शरीर में 108 प्रकार के प्रेशर प्वॉइंट्स होते हैं। जहां चेतना और देह मिलकर जीवन का सृजन करते हैं।108 डिग्री फ़ारेनहाइट शरीर का आंतरिक तापमान होता है इससे अधिक गर्म होने के कारण मानव अंग विफल हो सकते हैं।कहते हैं मनुष्य में कुल 108 भावनाएं होती हैं जिसमें से 36 भावनाओं का सम्बन्ध हमारे अतीत से, 36 का सम्बन्ध वर्तमान से और 36 का सम्बन्ध भविष्य से होता है। वहीं दूसरी ओर बौद्ध धर्म में 108 प्रकार के गुण विकसित करने और 108 प्रकार के अवगुणों से बचने के लिए भी मनुष्य को कहा जाता है। 17-भगवान शंकर द्वारा किया जाने वाला अलौकिक नृत्य होता है तांडव। इस नृत्य में कुल 108 मुद्राएं होती हैं। इतना ही नहीं महादेव के पास कुल 108 गण भी हैं, यही कारण है कि लिंगायत 108 मोतियों वाली माला का उपयोग करते हैं।

18- गंगा नदी जिसे हिंदू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है, वह 12 डिग्री के देशांतर और 9 डिग्री के अक्षांश पर फैली हुई है। अगर इन दोनों अंकों को गुना किया जाए तो 108 अंक मिलता है।

19-जापान के बौद्ध मंदिरों में, घंटों को नए साल का स्वागत करने और पुराने को समाप्त करने के लिए 108 बार बजाया जाता है।यह 108 सांसारिक प्रलोभन से संबंधित है। मनुष्य का लक्ष्य इसे हराकर मोक्ष प्राप्त करना होता है। बौद्ध धर्म की कई शाखाओं में यह स्वीकार किया गया है कि व्यक्ति के भीतर 108 प्रकार की भावनाएं जन्म लेती हैं। भंते गुणरत्न के अनुसार यह संख्या, सूंघने, सुनने, कहने, खाने, प्रेम, आक्रोश, दर्द, खुशी आदि को मिलाकर बनाई गई है।बोधिसत्व महामती ने भी भगवान् बुद्ध से 108 सवाल पूछे थे। इसके अलावा बौद्ध धर्म 108 निषेधों को भी बताता है। कई बौद्ध मंदिरों में सीढ़ियां भी 108 रखी गई हैं।

.....SHIVOHAM....