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प्रस्तावना


ॐ गुरवे आदि शंकराचार्य नमः ॐ गं गणपतये नमः ॐ सकारात्मक / नकारात्मक ऊर्जा नमः ॐ कामाख्या देव्यै नमः ॥ऊं ह्रीं दक्षिणामूर्तये नमः ॥ 16 FACTS;-

क्या होगा आत्मज्ञान प्राप्त करने से? व्यक्ति खुद को छोड़कर तमाम तरह के ज्ञान को जानने का दंभ करता है। जैसे, ईश्वर, धर्म, देश, विदेश, ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, साहित्य, समाज, राजनीति आदि। लेकिन यदि आप खुद को छोड़कर सब कुछ पा भी लेते हैं तो मरने के बाद जो पाया है वह खोने ही वाला है। हालांकि कोई भी खुद को नहीं जानना चाहता, सभी यही चाहते हैं कि लोग उन्हें जानें । खैर...आप यह लेख तो मन मारकर पढ़ ही सकते हैं।

आपने आत्मज्ञान नामक शब्द तो सुना होगा। सभी जानते हैं कि इसका अर्थ आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना। लेकिन इसका सही भावार्थ है खुद को देख लेना। आप कांच या दर्पण में जिसे देखते हैं वह आपका शरीर होता है आप नहीं। आपने खुद को कभी नहीं देखा। कब से नहीं देखा ऐसा कहना गलत होगा। दरअसल आपने कभी देखा ही नहीं। इस देख लिए जाने को ही आत्मज्ञान कहते हैं। देखने का एकमात्र तरीका : ध्यान ही है। ध्यान कई प्रकार का होता है। इसे बोधपूर्ण जीवन, साक्षीभाव में रहने की आदत कह सकते हैं। यह सारे उपक्रम निर्विचार होकर स्थितप्रज्ञ हो जाने के लिए है। योग ही एक मात्र ऐसा रास्ता है जिसने खुद तक पहुंचने के लिए क्रमवार सीढ़ियां बना रखी है। आप सबसे पहले यम का पालन करें, फिर नियम को अपनाएं, फिर थोड़े बहुत आसन इसलिए करें ताकि खुद के साक्षात्कार करने के मार्ग में आपका शरीर अस्वस्थ न हो। अन्यथा रोड़ा अटक जाएगा। फिर प्राणायाम करते रहें जिससे मस्तिष्क में भरपूर ऑक्सिजन मिलेगी तो यहां स्थित जो छटी इंद्री है उसे जागने में सहयोग मिलेगा। दरअस्ल आप यहीं तो बैठे हैं। फिर प्रत्याहार, धारणा और ध्यान की ओर कदम बढ़ाते हुए अंत में खुद को प्राप्त कर लें। 16 कलाएं : जब योगी आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है तो धर्मानुसार वह 16 कलाओं में पारंगत हो जाता है। 16 कलाएं दरअसल बोध प्राप्त योगी की भिन्न-भिन्न स्थितियां हैं। बोध की अवस्था के आधार पर आत्मा के लिए प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा के प्रकाश की 15 अवस्थाएं ली गई हैं। अमावास्या अज्ञान का प्रतीक है तो पूर्णिमा पूर्ण ज्ञान का। सोलहवीं कला पहले और पन्द्रहवीं को बाद में स्थान दिया है। इससे निर्गुण सगुण स्थिति भी सुस्पष्ट हो जाती है। सोलह कला युक्त पुरुष में व्यक्त अव्यक्त की सभी कलाएं होती हैं। यही दिव्यता है। 19 अवस्थाएं : भगवदगीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने आत्म तत्व प्राप्त योगी के बोध की उन्नीस स्थितियों को प्रकाश की भिन्न-भिन्न मात्रा से बताया है। इसमें अग्निर्ज्योतिरहः बोध की 3 प्रारंभिक स्थिति हैं और शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ की 15 कला शुक्ल पक्ष की 01..हैं। इनमें से आत्मा की 16 कलाएं हैं।

आत्मा की सबसे पहली कला ही विलक्षण है। इस पहली अवस्था या उससे पहली की तीन स्थिति होने पर भी योगी अपना जन्म और मृत्यु का दृष्टा हो जाता है और मृत्यु भय से मुक्त हो जाता है। अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ अर्थात : जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।- (8-24) भावार्थ : श्रीकृष्ण कहते हैं जो योगी अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के छह माह में देह त्यागते हैं अर्थात जिन पुरुषों और योगियों में आत्म ज्ञान का प्रकाश हो जाता है, वह ज्ञान के प्रकाश से अग्निमय, ज्योर्तिमय, दिन के सामान, शुक्लपक्ष की चांदनी के समान प्रकाशमय और उत्तरायण के छह माहों के समान परम प्रकाशमय हो जाते हैं। अर्थात जिन्हें आत्मज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान का अर्थ है स्वयं को जानना या देह से अलग स्वयं की स्थिति को पहचानना। 1.अग्नि:- बुद्धि सतोगुणी हो जाती है दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव विकसित होने लगता है। 2.ज्योति:- ज्योति के सामान आत्म साक्षात्कार की प्रबल इच्छा बनी रहती है। दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव ज्योति के सामान गहरा होता जाता है। 3.अहः- दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव दिन के प्रकाश की तरह स्थित हो जाता है। 4. 16 कला - 15 कला शुक्ल पक्ष + 01 उत्तरायण कला = 16

1.बुद्धि का निश्चयात्मक हो जाना। 2.अनेक जन्मों की सुधि आने लगती है। 3.चित्त वृत्ति नष्ट हो जाती है। 4.अहंकार नष्ट हो जाता है। 5.संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं। स्वयं के स्वरुप का बोध होने लगता है। 6.आकाश तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। कहा हुआ प्रत्येक शब्द सत्य होता है। 7.वायु तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। स्पर्श मात्र से रोग मुक्त कर देता है। 8.अग्नि तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। दृष्टि मात्र से कल्याण करने की शक्ति आ जाती है। 9.जल तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। जल स्थान दे देता है। नदी, समुद्र आदि कोई बाधा नहीं रहती। 10.पृथ्वी तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। हर समय देह से सुगंध आने लगती है, नींद, भूख प्यास नहीं लगती। 11.जन्म, मृत्यु, स्थिति अपने आधीन हो जाती है। 12.समस्त भूतों से एक रूपता हो जाती है और सब पर नियंत्रण हो जाता है। जड़ चेतन इच्छानुसार कार्य करते हैं। 13.समय पर नियंत्रण हो जाता है। देह वृद्धि रुक जाती है अथवा अपनी इच्छा से होती है। 14.सर्व व्यापी हो जाता है। एक साथ अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है। पूर्णता अनुभव करता है। लोक कल्याण के लिए संकल्प धारण कर सकता है। 15.कारण का भी कारण हो जाता है। यह अव्यक्त अवस्था है। 16.उत्तरायण कला- अपनी इच्छा अनुसार समस्त दिव्यता के साथ अवतार रूप में जन्म लेता है जैसे राम, कृष्ण यहां उत्तरायण के प्रकाश की तरह उसकी दिव्यता फैलती है। ध्यान में जल्दी ही गहराई में उतरना चाहते है तो आत्मज्ञान ध्यान की विधि को एक बार जरूर आजमाए।आत्मज्ञान ध्यान की ये विधि कम समय में अच्छे परिणाम देने वाली होती है। क्यों की आत्मज्ञान ध्यान की ये विधि हमारे अंतर की यात्रा को सरल बनाती है और चेतन्यता को बढ़ाती है। आत्मज्ञान के लिए जैसे ऋषि मुनि प्राचीन समय में ध्यान लगाते थे वैसे ही ये विधि है। इस विधि से आपकी आत्मिक चेतना का विकास होता है और कम समय में चेतना का विकास करने वाली एकमात्र विधि जिसे आपको जरूर करना चाहिए।

पुरातन विधि है आत्मज्ञान ध्यान की विधि क्या आपने कभी अँधेरे कमरे में ध्यान करने के बारे में सुना है। ध्यान की हजारो सालो पुरानी है जब संत मुनि अँधेरी गुफाओं में ध्यान और तपस्या करते थे। माना जाता है की अँधेरे कमरे में गहरे आध्यात्मिक अनुभव की सफलता के chance ज्यादा होते है। आत्म-ज्ञान के लिए अँधेरे कमरे को ज्यादा बेहतर माना गया है। क्यों की आँखों के देखने की क्षमता तक हमारे मन में विचार चलते रहेंगे लेकिन अगर देखने के लिए कुछ ना हो तो जल्दी ही मन एकाग्रता को प्राप्त कर लेता है। पुराने समय में भी आत्मज्ञान के लिए गहरे अँधेरे वाली जगह का चुनाव किया जाता था। इसके विश्वभर से कई उदहारण मिलते है जैसे कीचेतना को आत्मज्ञान द्वारा ब्रह्माण्ड से जोड़ना ये सभी जगह आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए सबसे बढ़िया जगह के रूप में बनाई और इस्तेमाल की गई है। Taoists and master Mantak Chia के अनुसार अँधेरे कमरे में ( जगह ) ध्यान करने से हमारे मस्तिष्क के अंदर Di-methamphetamine का उत्सर्जन होता है जो हमारी चेतना को जाग्रत कर उसे ब्रह्मांड से जोड़ता है। और जल्दी ही कम समय में आत्मज्ञान की अवस्था में ले जाता है। अगर देखा जाये तो प्रकाश और अँधेरा हमारे मस्तिष्क में अलग अलग धुन की तरह काम करते है जैसे ही अँधेरा होता है चेतना सुप्त होने लगती है।

अँधेरा मस्तिष्क में melatonin कण का उत्सर्जन करता है जिससे हमें नींद आती है। इसकी वजह से नींद में सपने देखे जाते है। ध्यान से जुडी ये विधि सिर्फ 15 दिन की है जिसमे हम निम्न अनुभव करते है। आइए देखे ध्यान की ये विधि और इससे जुड़े अनुभव

आत्मज्ञान ध्यान की विधि : ध्यान की इस विधि में आपको एक अँधेरे कमरे का चुनाव करना है। जिसमे आप ध्यान कर सके. ध्यान की विधि सामान्य है जैसा की सुखासन में ध्यान लगाते है। बस ध्यान इस बात का रखे की आपका सारा ध्यान तीसरे नेत्र पर हो। इसके अलावा जिस कमरे में ध्यान लगा रहे है उसमे कोई और ना जाये न ही उसमे कोई सामान हो। आत्मज्ञान ध्यान की विधि में अनुभव अनुभव वैसे तो 2 से 3 दिन में होने लगते है लेकिन 15 दिन के अभ्यास में अलग अलग अनुभव होते रहते है। दिन के अनुसार ये अनुभव इस तरह हो सकते है।

दिन 1-3 अँधेरे कमरे में 3 दिन के अभ्यास के बाद आप देखते है की सपने में जो चेतना आप महसूस करते है वही चेतना आप इसमें अनुभव करते है। कहने का मतलब है की जब शुरू में आप अँधेरे कमरे में ध्यान करते है तो अँधेरे की परत आँखों के सामने रहती है जो कुछ दिन बाद रौशनी में बदल जाती है। इसके कारण आप अँधेरे कमरे में चेतना का अनुभव करते है जैसा आप सपने में करते है। दिन 3-5 शुरू के 3 दिन सिर्फ आपके melatonin level को बढ़ाया जाता है जिससे की आपका पीनियल gland सुपर कंडक्टर pino-lene को जाग्रत करने लगता है। वैसे ये pinolene lucid dream की स्टेज में अपने आप जाग्रत होने लगता है। ये अवस्था कहलाती है बाह्य रूप से जाग्रत होना जिसमे हम अपने मस्तिष्क की कल्पना को साकार रूप दे सकते है।

Clair sentience यानि किसी अनुभव को साक्षात् महसूस करना और सुनने की क्षमता जैसी शक्ति भी इसी अवस्था में जाग्रत होने लगती है। इस अवस्था में कॉस्मिक universal पार्टिकल चेतना, आवाज और प्रकाश इसके अलावा ज्ञान और अनुभव के रूप में बदलने लगता है।

पढ़े : कल्पना को हकीकत में कैसे बदले

इस अवस्था में आप एक कंडक्टर बन जाते है जो ब्रह्मांड से ऊर्जा को प्राप्त करने लगता है।

दिन 6-8 इस अवस्था में आपका पीनियल ग्लैंड न्यूरो हार्मोन 5-MeO-DMT(5-methoxy-dimethyltryptamine). 5-MeO-DMT switches on 40% तक उत्सर्जित करना शुरू कर देता है। जिससे आपकी चेतना और अवचेतन मन की शक्तियां बढ़ जाती है, आपका शरीर पहले से ज्यादा जाग्रत और सूक्ष्म ( समझ ) होने लगता है। इस अवस्था में आपका पीनियल ग्लैंड अँधेरे रूम से एक चमकीला प्रकाश छोड़ने लगता है। इस प्रकाश की अवस्था नए और जाग्रत मानसिकता लिए हुए होती है।

दिन 9-12 ( DMT यानि Darkroom meditation technique ) जब DMT का लेवल 25 MG से ज्यादा हो जाता है। तब आप दृश्य को ज्यादा स्पस्ट देख सकने लगते है। ये आपके शरीर के ऊर्जा रूप यानि सूक्ष्म शरीर को यात्रा करने में मदद करता है। इसी की वजह से आप तीसरे नेत्र की शक्ति को जाग्रत कर सकते है। जो हमें तीनो लोक में झाँकने की क्षमता प्रदान करती है।

12 वे दिन के आसपास आप इंफ्रा-रेड और अल्ट्रा-वायलेट किरणों को महसूस कर सकते है। इसके अलावा किसी भी इंसान को उसकी किरणों के पैटर्न यानि औरा से पहचान और छू सकते है।

इन दिनों की अलग अलग अवस्थाएं हमारे DNA में बदलाव लाने लगती है और सबसे ज्यादा असर हमारे पीनियल ग्लैंड पर होता है।

समाधि क्या है? किसी ने कहा है : बूंद का सागर में मिल जाना। किसी ने कहा : सागर का बूंद में उतर जाना। मैं कहता हूं : बूंद और सागर का मिट जाना। जहां न बूंद है, न सागर है, वहां समाधि है। जहां न एक है, न अनेक है, वहां समाधि है। जहां न सीमा है, न असीम है, वहां समाधि है। समाधि सत्ता के साथ ऐक्य है। समाधि सत्य है। समाधि चैतन्य है। समाधि शांति है।

'मैं' समाधि में नहीं होता हूं, वरन जब 'मैं' नहीं होता हूं, तब जो है, वह समाधि है। शायद, यह 'मैं' जो कि मैं नहीं है, वास्तविक 'मैं' है। 'मैं' की दो सत्ताएं हैं : अहं और ब्रह्मं। अहं वह है, जो मैं नहीं हूं, पर जो 'मैं' जैसा भासता है। ब्रह्मं वह है, जो मैं हूं, लेकिन जो 'मैं' जैसा प्रतीत नहीं होता है। चेतना, शुद्ध चैतन्य ब्रह्मं है। मैं शुद्ध शाक्षि चैतन्य हूं; पर विचार-प्रवाह से तादात्म्य के कारण वह दिखाई नहीं पड़ता है। विचार स्वयं चेतना नहीं है। विचार को जो जानता है, वह चैतन्य है।

विचार विषय है, चेतना विषयी है। विषय से विषयी का तादात्म्य मूर्छा है। यही समाधि है। यही प्रसुप्त अवस्था है। विचार विषय के अभाव में जो शेष है, वही चेतना है। इस शेष में ही होना समाधि है। विचार-शून्यता में जागरण सतता के द्वार खोल देता है। सत्ता अर्थात वही 'जो है'। उसमें जागो- यही समस्त जाग्रत पुरुषों की वाणी का सागर है। "

आत्म-साक्षात्कार का क्या अर्थ होता है ! उसका अर्थ है : इतनी परम शांति जो किसी चीज से बिगाड़ी न जा सके ! ऐसा परम अन-आस्तित्व ! मालकियत , महत्वाकांक्षा , ईर्ष्या कैसे बनी रह सकती है उसमे ? अ-मन के साथ कैसे तुम अधिकार जमा सकते हो , कैसे तुम शासन जमाने की कोशिश कर सकते हो ? आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है----अहंकार का संपूर्ण तिरोहित हो जाना ! और अहंकार के साथ , हर चीज तिरोहित हो जाती है ! ध्यान रहे , अहंकार स्वप्नों की व्याख्या द्वारा तिरोहित नही हो सकता है ! इसके विपरीत , अहंकार ज्यादा मजबूत हो सकता है , क्योंकि चेतन और अचेतन के बीच का अंतराल कम होगा ! तुम्हारा अहंकार मजबूत हो जाएगा ! जितनी कम तकलीफ होती है मन में , उतना ज्यादा मजबूत हो जाएगा मन ! अहंकार के लिए तुम्हारे पास नई भूमि होगी , तो मनोविश्लेषण तुम्हारे लिए ऐसा कर सकता है कि तुम्हारा अहंकार ज्यादा जड़ पकड़ ले , ज्यादा केंद्र में आ जाए ; तुम्हारा अहंकार ज्यादा मजबूत हो जाए ; तुम ज्यादा निश्चयपूर्ण हो जाओ ! निस्संदेह पहले की अपेक्षा तुम संसार में बेहतर ढंग से जी पाओगे , क्योंकि संसार अहंकार में विशवास रखता है ! जीवित रहने के संघर्ष में लड़ने के लिए तुम ज्यादा सक्षम हो जाओगे ! तुम्हारे स्वयं के बारे में तुम ज्यादा आशवत हो जाओगे , कम घबराओगे ! ---- ओशो ( पतंजलि योग सूत्र )

... शिवोहम.....