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क्या उच्चस्तरीय योग साधना /कुण्डलिनी महाशक्ति साधना में ,प्राणायाम साधना का विशेष महत्व है?क्या है अ


प्राणायाम साधना का महत्व ;- 03 FACTS;- 1-उच्चस्तरीय योग साधना में प्राणायाम साधना का अपना महत्व है। प्राणायाम दिखने में ही सामान्य लगता है, पर यदि उच्चस्तरीय विधान के आधार पर साधा जाए तो शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक प्रगति के लिए उससे महत्वपूर्ण लाभ उठाया जा सकता है। 2-योग का मुख्य उद्देश्य आत्मा का परमात्मा के सन्निकट होता है। इसके अनेक मार्ग ऋषियों और महर्षियों ने देश, काल और पात्र के अनुसार खोज कर निकाले हैं। किसी में शारीरिक विधियों को प्रधानता दी है, किसी में मानसिक वृत्तियों को वशीभूत करने पर जोर दिया है, किसी ने जान का साधन प्रधान माना है तो किसी ने ध्यान पर जोर दिया है। 3-इसी प्रकार जप-योग, मंत्र-योग, लय-योग, दान-योग, स्वर-योग आदि कितनी ही प्रणालियां आत्मा को ऊंचा उठा कर परमात्मा तक पहुंचाने की निकाली गई हैं।

प्राणायाम का अर्थ ;-

02 POINTS;-

1-प्राणायाम (प्राण +आयाम ) अर्थ प्राणों का विस्तार | श्वसन क्रिया द्वारा वातावरण के प्राण तत्वो को खिंचना और मानसिक , शारीरिक और लौकिक शक्तियों को स्वयं में बढ़ाना ही प्राणायाम है |

2- श्‍वास और नि:श्‍वास की गति पर स्वयं का निरंतर प्राणायाम का आधार है |नित्य प्राणायाम करने से बड़ी से बड़ी बीमारी नष्ट हो जाती है |

प्राणायाम के मुख्य तीन भाग :-

प्राणायाम के मुख्य रूप से 3 भाग है ..

03 POINTS;-

1-पूरक

2-कुम्भक

3-रेचक है

1) पूरक;-

अपनी श्वसन क्रिया में श्वास अंदर लेने की क्रिया को पूरक कहते हैं। सांस को आप नियंत्रण करे | आप तेजी से या धीरे धीरे सांस भर सकते है |

(2) कुंभक;-

प्राणायाम का दूसरा भाग है सांस को अन्दर रोके रहना | इस भाग में ना तो हम सांस लेते है ना ही छोड़ते है |कुंभक के मुख्य रूप से 2 भाग है

(2-1)आभ्यान्तर कुम्भक;-

पूरक करके अर्थात् श्वास को अंदर भरकर रोक लेना इसको आभ्यांतर कुम्भक कहते हैं ।

(2-2-)बहिर्कुम्भक;-

03 POINTS;-

1-रेचक करके अर्थात् श्वास को पूर्णतया बाहर निकाल दिया गया हो, शरीर में बिलकुल श्वास न हो, तब दोनों नथुनों को बंद करके श्वास को बाहर ही रोक देना इसको बहिर्कुम्भक कहते हैं ।

2-जितना समय रेचक करो उससे आधा समय बहिर्कुम्भक करना चाहिए । इस क्रिया में दोनों नासा छिद्रों से वायु को बाहर छोड़कर जितनी देर तक सांस रोकना संभव हो, रोककर रखा जाता है और फिर सांस को अंदर खींचा जाता है।

3- प्राणायाम का फल है बहिर्कुम्भक । वह जितना बढ़ेगा उतना ही जीवन चमकेगा । तन मन में स्फूर्ति और ताजगी बढ़ेगी । मनोराज्य न होगा ।

(3) रेचक;-

इस भाग में जो साँसे पहले से ली गयी है उन्हें नियंत्रित रूप से बाहर निकालना हटा है।

मात्रा या अवधि;-

कुम्भक क्रिया का अभ्यास सुबह, दोपहर, शाम और रात को कर सकते हैं। कुम्भक क्रिया का अभ्यास हर 3 घंटे के अंतर पर दिन में 8 बार भी किया जा सकता है।

NOTE;-

04 POINTS;-

1-ध्यान रहे कि कुम्भक की आवृत्तियाँ शुरुआत में 1-2-1 की होनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर यदि श्वास लेने में एक सेकंड लगता है तो उसे दो सेकंड के लिए अंदर रोके और दो सेकंड तक बाहर निकालें।

2-फिर धीरे-धीरे 1-2-2, 1-3-2, 1-4-2 और फिर अभ्यास बढ़ने पर कुम्भक की अवधि और भी बढ़ाई जा सकती है। ॐ के एक उच्चारण में लगने वाले समय को एक मात्रा माना जाता है। सामान्यतया एक सेकंड या पल को मात्रा कहते हैं।

3-पहले आभ्यान्तर कुम्भक और फिर बहिर्कुम्भक करना चाहिए।इन तीनो प्राणायाम की क्रिया का सही रूप और सही आवर्ती से करना ही प्राणायाम

है |

4-कुम्भक को अच्छे से रोके रखने के लिए जालंधर, उड्डियान और मूल बंधों का प्रयोग भी किया जाता है। इससे कुम्भक का लाभ बढ़ जाता है। केवली प्राणायाम को कुम्भक प्राणायाम में शामिल किया गया है।

लाभ;-

06 POINTS;-

कुम्भक के अभ्यास से आयु की वृद्धि होती है। संकल्प और संयम का विकास होता है।

2-भूख और प्यास पर कंट्रोल किया जा सकता है।

3-इससे खून साफ होता है, फेफड़े शुद्ध-मजबूत बनते हैं।

4-शरीर कांतिमान और जवान बना रहता है।

5-नेत्र ज्योति बढ़ती और सुनने की क्षमता बढ़ती है।

6-नकारात्मक चिंतन सकारात्मक बनता है तथा भय और चिंता दूर होते हैं। हठयोग के प्राणायाम के प्रकार ;- 03 FACTS;- 1-प्राणायाम दो तरह के होते है। 1- गहन श्वास- प्रश्वास, व्यायाम परक (डीप ब्रीदिंग एक्सरसाईज) 2-आध्यात्मिक ध्यान परक 2-पहले प्रकार के प्राणायामों में कुम्भक 1.2.1 या 1.4.2. की मात्रा में क्रमशः बढ़ाया जाता है। कपालभाति और भस्त्रिका प्राणायाम तो व्यायाम परक ही होते हैं, शेष अन्य प्राणायामों को दोनों प्रकार से प्रयोग में लाया जा सकता है।

3-दोनों प्रकार के प्राणायामों के बीच इतना समय अवश्य दें कि शरीर और श्वास- प्रश्वास की गति सहज स्थिति में आ जाये। इसमें ध्यान का विशेष प्रयोग होता है। प्राणायाम करने की जगह;- 04 FACTS;- 1-प्राणायाम करने की जगह सर्दीली या भीगी नहीं होना चाहिये, हवा का झपटा शरीर को अधिक जोर से न लगे तथा बिल्कुल हवा न लगे ऐसा स्थान नहीं होना चाहिये अर्थात् मध्यम हवा भान होना चाहिये। 2-गरमी के दिनों में अभ्यास करते समय शरीर पर जितने कपड़े कम हों उतना ही अच्छा, और जाड़े के दिनों में सर्दी शरीर को न लगे मात्र इतने कपड़े रखना चाहिये। 3-जिसके फेफड़े अत्यंत कमजोर हों उन्हें प्राणायाम अत्यंत आहिस्ते से करना चाहिये, जिससे फेफड़ा, हृदय, अवयवों के साधें पेट वगैरह को आराम के साथ फायदा मालूम हो, प्राणायाम करते समय अपने शरीर को सीधा और स्थिर रखना चाहिए अभ्यास की जगह अगरबत्ती, धूप, चंदनादि सुगंधी पदार्थ का धूप करना चाहिये, जिससे मनोभावना पवित्र रहे और शुभ विचारों का प्रवाह चालू रहे। 4-अभ्यास करने के स्थान (कमरे) में अधिक स्त्री पुरुष नहीं होने चाहिये, अनुकूल विचार वाले यदि रहे तो हर्ज नहीं प्रतिकूल विचार वालों को वहाँ खड़े भी नहीं रहने देना चाहिये, कारण इससे किसी समय ग्लानि पैदा होने की संभावना रहती है जमीन पर चटाई गलीचा व ऊन का कंबल आदि बिछाना चाहिये। पूर्ण पद्मासन क्या है?- पद्मासन में बैठ कर दाहिने हाथ को पीठ के पीछे से लाकर दाहिने पैर के अंगूठे को पकड़ना और बायें हाथ को पीठ के पीछे से लाकर बायें पाँव के अंगूठे को पकड़ना कदाचित पाँव मोटा होने के कारण अंगूठे न पकड़ लेना उसके बाद श्वास फेफड़े में भर कर सिर जमीन पर टिकाना श्वाँस रोक सको वहाँ तक सिर जमीन को अड़ा कर रखना और फिर पूर्व असल स्वरूप में ले आने के बाद धीरे-धीरे श्वांस बाहर निकाल देना इस तरह एक वक्त करने में आवे तब एक पूर्ण पद्मासन से पूर्ण होता है।

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उज्जायी प्राणायाम सहज प्राणायाम या अजय प्राणायाम ("सहज" श्वास नियन्त्रण) भी कहलाता है।

5-इसका उपयोग क्रिया योग और ध्यान में किया जाता है। योग ग्रन्थों में कहा गया है कि सहज श्वास समाधि प्राप्ति का मार्ग है या अन्य शब्द में कहा जाये तो चेतना के उच्चतर स्तर की प्राप्ति का मार्ग है। सहज श्वास का अर्थ मंत्र "सो हम" के साथ श्वास लेने की सहज प्रक्रिया पर ध्यान एकाग्र करना है। यह मंत्र अपने अन्दर के स्व को पुकारने के समान है। इस मंत्र के लगातार उच्चारण से "सो और हम" शब्द का एक चक्र बन जाता है : मैं वह हूँ - वह मैं हूँ - मैं वह हूँ...। 5-भ्रामरी प्राणायाम;- 02 FACTS;- 1-भ्रामरी प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य मानसिक शान्ति की प्राप्ति है। प्राणायाम का साधारण लाभ भी उसमें है और अन्य प्राणायामों की तरह फेफड़ों को भी उससे शक्ति प्राप्त होती है। इस प्राणायाम के अभ्यास में भ्रामरी का शब्द सुनते- सुनते ओंकार और अन्य प्रकार के दिव्य शब्द भी सुनाई पड़ने लगते हैं, जिससे मन की शान्ति और तन्मयता की बहुत अधिक वृद्धि हो जाती है। 2-ध्यानात्मक आसन में बैठें। दोनों हाथों की तर्जनी उँगलियों से कानों को बन्द कर लें। दोनों नथुनों से गहरी श्वास खींचें। भौंरे के गुँजन की तरह गहरी और मन्द ध्वनि उत्पन्न करते हुए धीरे- धीरे श्वास बाहर छोड़ें। श्वास छोड़ते समय गुँजन की ध्वनि मधुर, सम और अखण्ड होनी चाहिए। ध्वनि इतनी मृदुल और मधुर हो कि कपाल के अग्र भाग में उसकी प्रतिध्वनि गूँजने लगे। 6-अनुलोम विलोम सूर्यवेधन प्राणायाम;- 07 FACTS;- 1-कुण्डलिनी महाशक्ति के जागरण के लिए प्राण ऊर्जा की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पड़ती है। यह प्रयोजन सूर्यवेधन प्राणायाम द्वारा पूरा होता है। प्राण ऊर्जा का अभिवर्द्धन साधक की भौतिक और आध्यात्मिक सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करता है। यह मस्तिष्क को शुद्ध करता है। वात रोग निवारक एवं कृमिनाशक है। 2-जिस आसन में सहजता से १५ मिनट बैठ सकें, उसमें मेरुदण्ड सीधा रख कर बैठिए। स्वयं को तीर्थ चेतना, गुरुसत्ता के दिव्य आभामण्डल से घिरा हुआ अनुभव कीजिए। प्राणायाम मुद्रा में बायाँ नथुना दबाकर दाहिने नथुने से श्वास खींचना आरम्भ कीजिए। ध्यान कीजिए कि सूर्य की किरणों जैसा प्रवाह वायु में संमिश्रित होकर दाहिने नासिका छिद्र में अवस्थित पिंगला नाड़ी द्वारा अपने शरीर में प्रवेश कर रहा है और उसकी ऊष्मा अपने भीतरी अंग- प्रत्यंगों को तेजस्वी बना रही है। 3-श्वास को कुछ देर भीतर रोकिए और ध्यान कीजिए कि श्वास के साथ खींचा हुआ तेज नाभिचक्र में एकत्रित हो रहा है। सूर्य चक्र प्रकाशवान् हो रहा है। चमक बढ़ रही है। बाएँ नासिका से श्वास को बाहर निकालिए, भाव कीजिए कि सूर्यचक्र को धुँधला बनाए रखने वाला कल्मष छोड़ी हुई श्वास के साथ पीतवर्ण होकर बाएँ नथुने की इड़ा नाड़ी द्वारा बाहर निकल रहा है।

4-सहजता से जितनी देर हो सके, फेफड़ों को बिना श्वास के खाली कीजिए। भाव कीजिए नाभिचक्र में एकत्रित प्राणपुत्र् अग्रि शिखाओं की तरह सुषुम्रा में ऊपर उठकर पेट के ऊर्ध्व भाग, फेफड़े, कण्ठ को प्रकाशित कर रहा है। 5-इसी क्रम को उलटा कीजिए अर्थात् बाएँ से खींचना, अन्दर रोकना, दाएँ से बाहर निकालना और बाहर रोक देना। श्वास खींचते समय भाव कीजिए कि सविता का तेज नाभिचक्र में संगृहीत हो रहा है। अन्तःकुम्भक में ध्यान कीजिए कि नाभिचक्र सूर्यचक्र तेजस्वी हो रहा है। 6-श्वास निकालते समय भाव कीजिए कि आन्तरिक विकार वायु के साथ बाहर जा रहे हैं। बाह्य कुम्भक के समय ध्यान कीजिए कि सूर्यचक्र का निर्मल तेज सुषुम्रा मार्ग से ऊपर की ओर बढ़ रहा है, भीतरी अवयवों में एक दिव्य ज्योति जगमगाती अनुभव कीजिए। 7-दाएँ से खींचकर बाएँ से निकालना, पुनः बाएँ से खींचकर दाएँ से निकालना, अनुलोम विलोम सूर्यवेधन प्राणायाम का एक चक्र पूरा हुआ, ऐसे तीन प्राणायाम कीजिए। जो समय शेष रहे, उस समय सहज लयबद्ध श्वास के साथ शान्ति का अनुभव कीजिए। 7-शक्तिचालिनी मुद्रा( विशिष्ट प्राणायाम);- 07 FACTS;- 1-कुण्डलिनी महाशक्ति की सामान्य प्रवृत्ति अधोगामी रहती है। रति क्रिया में उसका स्खलन होता रहता है। शरीर यात्रा की मल -मूत्र विसर्जन की प्रक्रिया भी स्वभावतः अधोगामी है। शुक्र का क्षरण भी इसी दिशा में होता है। इस प्रकार यह सारा संस्थान अधोगामी प्रवृत्तियों में संलग्र रहता है। इस महाशक्ति के जागरण व उत्थान के लिए शक्तिचालिनी मुद्रा की क्रिया सम्पन्न की जाती है। 2-शक्तिचालिनी मुद्रा को विशिष्ट प्राणायाम कहा जा सकता है। सामान्य प्राणायाम में नासिका से साँस खींचकर प्राण प्रवाह को नीचे मूलाधार तक ले जाते हैं और फिर ऊपर की ओर उसे वापस लाकर नासिका द्वार से निकालते हैं, यही प्राण सच्चरण की क्रिया जब मल- मूत्र संस्थान से की जाती है तो शक्तिचालिनी मुद्रा कहलाती है। 3-इस मुद्रा के द्वारा गुदा की पेशियाँ मजबूत होती हैं। मलाशय सम्बन्धी दोषों जैसे- कब्ज, बवासीर, गर्भाशय या मलाशय भ्रंश जैसे रोगों में लाभ मिलता है। प्राण शक्ति का क्षरण रुकता है। व्यक्तित्व प्रतिभा सम्पन्न बनता है। 4-ध्यानात्मक आसन में बैठें। बाएँ नासिका से श्वास खींचते हुए भाव करें कि प्राण वायु गुदा व जननेन्द्रिय के छिद्रों से प्रवेश कर रही है। अन्तः कुम्भक करें। कुम्भक कैसे करें ? 1-सांस को रोककर रखने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं। इस प्राणायाम में सांस को अंदर खींचकर या बाहर छोड़कर रोककर रखा जाता है। योग ग्रन्थों में कुम्भक 2 प्रकार का (आन्तरिक कुम्भक;बाहरी कुम्भक) बताया गया है। कुम्भक प्राणायाम की विधि;-

07 FACTS;- 1-कुम्भक प्राणायाम करते समय दोनों नासा छिद्रों (नाक के दोनो छिद्र) से शुद्ध वायु को अंदर खींचें।

2-फिर सांस को अंदर जितनी देर तक रोक सकना संभव हो रोकें और फिर बाहर छोड़ दें।

3-फिर वायु को बाहर छोड़कर जितनी देर तक रोकना संभव हो रोकें और फिर अंदर खींचें।

4-इस तरह इस क्रिया को करना कुम्भक कहलाता है। कुम्भक क्रिया का अभ्यास सुबह, दोपहर, शाम और रात को करना चाहिए।

5-इस क्रिया का अभ्यास हर 3 घंटे के अंतर पर दिन में 8 बार किया जा सकता है। कुम्भक क्रिया के समय आप ॐकार मंत्र का जप भी कर सकते हैं। 6-मूलबन्ध एवं जालन्धर बन्ध लगायें। भाव करें कि प्राण का प्रवाह मूलाधार से ऊपर सहस्रार में पहुँच रहा है। दाएँ नासिका से श्वास छोड़ते हुए भाव करें कि दूषित प्राण वायु, नासिकाग्र से बाहर जा रही है। 7- मूल, उड्डियान व जालन्धर बन्धों के साथ बाह्य कुम्भक सम्पन्न करें। भाव करें कि प्राण का प्रवाह मेरुदण्ड मार्ग से ऊपर चढ़ रहा है। इसी प्रकार दायीं नासिका से पूरक तथा बायीं नासिका से रेचक करें। अन्तः कुम्भक व बाह्य कुम्भक में श्वास आसानी से जितना रोक सकें, रोकें। दबाव न डालें। 8- कपालभाति प्राणायाम ;- 02 FACTS;- 1-ध्यानात्मक आसन में बैठें। पेट को फैलाते हुए श्वास लें। पेट की पेशियों को बलपूर्वक संकुचित करते हुए श्वास छोड़ें, किन्तु अधिक जोर न लगायें। अगली श्वास उदर की पेशियों को बिना फैलाते हुए सहज ढंग से लें। पूरक सहज होना चाहिए,उसमें किसी प्रकार का प्रयास नहीं लगना चाहिए। 2-प्रारम्भ मे 10 बार रेचक करें। गिनती मानसिक रूप से करें। 10 बार रेचक करने के बाद गहरी श्वास लेकर गहरी श्वास छोड़ें। यह एक चक्र पूरा हुआ। ३ से ५ चक्र अभ्यास करें। उच्च अभ्यासी १०चक्र या उससे अधिक अभ्यास कर सकते हैं। जैसे- जैसे उदर की पेशियाँ मजबूत होती जायें, श्वास- प्रश्वास की संख्या को 10 से बढ़ाकर 20 तक ले जा सकते हैं। नोटः-

02 POINTS;- 1-श्वास लेते और निकालते समय पसलियों के बीच की मांसपेशियाँ यथासम्भव जैसी की तैसी स्थिति में रखी जाती हैं और केवल पेट की मांसपेशियों को उठाया और गिराया जाता है। 2-पूरक और रेचक में लगने वाले समय में भी बड़ा अन्तर है। उदाहरणार्थ अगर एक रेचक और एक पूरक में मिलकर एक सेकेण्ड लगता हो, तो रेचक में चौथाई सेकेण्ड और पूरक में पौन सेकेण्ड समझना चाहिए। इसका आशय यह है कि कपालभाति में रेचक की ही मुख्यता है। लाभ;-

05 POINTS;- 1-इड़ा और पिङ्गला नाड़ी का शोधन। मन से इन्द्रिय विक्षेपों को दूर करता है।

2-निद्रा, आलस्य को दूर करता है। मन को ध्यान के लिये तैयार करता है।

3-दमा,वातस्फीति,ब्रोन्काइटिस और यक्ष्मा से पीड़ित व्यक्तियों के लिये उत्तम।

4-तन्त्रिका तन्त्र में सन्तुलन लाता एवं पाचन तन्त्र को पुष्ट करता है।

5-आध्यात्मिक साधकों के लिए यह अभ्यास विचारों एवं सूक्ष्म दृश्यों को रोकता है। सावधानियाँ;- हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, चक्कर आना, मिर्गी, हर्नियाँ या गैस्ट्रिक अल्सर से पीड़ित व्यक्ति यह प्राणायाम न करें। 9-भस्रिका प्राणायाम 03 FACTS;- 1-ध्यानात्मक आसन में बैठें। दाहिने नासिका छिद्र को बन्द कर बाएँ से दस बार जल्दी- जल्दी श्वास लें और छोड़ें। श्वास के साथ पेट लयपूर्ण ढंग से फैलना और सिकुड़ना चाहिए। वायु भरने और छोड़ने की क्रिया पेट द्वारा ही होनी चाहिए। वक्ष को न फैलायें और न ही कन्धों को उठायें। 2-नासिका में सूँ- सूँ की आवाज होनी चाहिए ,, किन्तु गले और छाती से कोई आवाज नहीं आनी चाहिए। 10 बार पूरक और रेचक करने के बाद, बाएँ नासिका छिद्र से गहरी श्वास लें। अन्तःकुम्भक करें। बाएँ नासिका छिद्र से ही रेचक करें। इसी प्रकार सारी क्रियाएँ दाहिनी नासिका से 10 बार एवं दोनों नासिका से 10 बार करें। 3-ऊपर बतायी गई विधि के अनुसार पहले बाएँ फिर दाएँ और अन्त में दोनों नासिका छिद्रों से श्वसन करने से अभ्यास का एक चक्र पूरा होता है। अभ्यास के दौरान सजगता नाभि पर बनायें रखें। लाभ;-

03 POINTS;-

1-शरीर के विषैले पदार्थ को जलाता है। वात,पित्त,कफ से सम्बन्धित रोगों को दूर करता है। 2-पाचन संस्थान को पुष्ट करता है। दमा एवं फेफड़े के रोग में उत्तम।

3-गले की सूजन एवं कफ के जमाव को दूर करता है। मानसिक शान्ति और एकाग्रता में उपयोगी। सावधानियाँ;- नये अभ्यासियों को प्रत्येक चक्र के बाद थोड़ा विश्राम कर लेना चाहिए। उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, हर्निया, गैस्ट्रिक, अल्सर, दौरा, मिर्गी या चक्कर आने की बीमारी वाले लोगों को भस्रिका का अभ्यास नहीं करना चाहिए। 10- शीतली प्राणायाम;- 03 FACTS;- 1-ध्यान के सुविधाजनक आसन में बैठें। जिह्वा के दोनों किनारों को इस प्रकार मोड़ें की उसकी आकृति एक नलिका सी हो जाए। 2-जिह्वा को ओष्ठ से एक अंगुल बाहर निकालकर इस प्रकार पक्षी की चोंच के समान आकृति बनाकर बाहर से वायु का आकर्षण करे। इस नली के द्वारा सी- सी की आवाज करते हुए श्वास अन्दर खींचें। 3-पूरक के अन्त में जिह्वा अन्दर कर लें, मुँह को बन्द करें और फिर कुछ कुम्भक करके दोनों नासापुटों से धीरे-धीरे रेचक करे। जिह्वा के ऊपरी भाग में शीतलता का अनुभव करें। लाभ;-

05 POINTS;- 1-शरीर एवं मन शीतल।

2-कामेच्छा और तापमान नियमन से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण मस्तिष्कीय केन्द्रों को प्रभावित करता है।

3-मानसिक और भावनात्मक उत्तेजनाओं को शान्ति प्रदान करता है।

4-भूख- प्यास पर नियन्त्रण कर तृप्ति प्रदान करता है।

5-रक्तचाप और उदर की अम्लता को कम करता है। सावधानियाँ;- इसका अभ्यास प्रदूषित वायुमण्डल और ठण्डे मौसम में नहीं करना चाहिए। निम्न रक्तचाप या श्वसन सम्बन्धी रोगों जैसे- दमा, ब्रोंकाइटिस और बहुत अधिक कफ से पीड़ित व्यक्तियों को यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए। 11- शीतकारी प्राणायाम ;- 03 FACTS;- 1-शीतकारी एक प्राणायाम का नाम है। इस प्राणायाम को करते समय 'सीत्‌ सीत्‌' की आवाज निकलती है, इसी कारण इसका नाम सीत्कारी कुम्भक या प्राणायाम पड़ा है। 2-अपने जबड़े व दाँत सहजता से बन्द रखें। दोनों होठों को थोड़ा सा खोल लें, पूरक करें।धीरे-धीरे मुंह से श्वास को अंदर खिंचें। बाद में त्रिबन्धों के साथ कुम्भक करें। 3- कुछ देर बाद श्वास को नाक से निकाल दें और पुन: श्वास को अंदर खिंचें। यह ‍प्रक्रिया 10 से 12 बार करें। इसके करने से मुंह के अंदर का भाग सूखने लगता है। लाभ;-

02 POINTS;- 1-इससे शरीर में स्थित अतिरिक्त गर्मी समाप्त होती है जिससे पेट की गर्मी और जलन कम हो जाती है। इसके नियमित अभ्यास से ज्यादा पसीना आने की शीकायत दूर होती है। 2-इससे गुल्म, प्लीहा, उदररोग, अतिसार, पेचिश, पित्तवृद्धि, दाह, अम्लपित्त, रक्तपित्त, क्षुधा, तृषा, उन्माद आदि रोग शमन होते हैं। सावधानियाँ;- प्रातः-सायं आधे घंटे तक इस प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। शीतकाल में और कफ प्रकृति के मनुष्य के लिये यह प्राणायाम हितकर नहीं हैं।

शिव संहिता के अनुसार शीतली/शीतकारी प्राणायाम और खेचरी

मुद्रा का महत्व ;-

04 FACTS;-

''1-विधान का जानने वाला जो साधक कौए की चोंच के समान मुख-मुद्रा बनाकर शीतल वायु को पीता है। वह साधक अवश्य ही मोक्ष का भाजन है, जो विद्वान विधि सहित नित्य प्रति सरस वायु का पान करता है, उसके सभी रोग, श्रम-दाह और वृद्धावस्था आदि का शीघ्र नाश हो जाता है। आशय यह है ऐसी साधना करने वालों के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं और उसके लिए वृद्धावस्था कष्टकर साबित नहीं होती।

2-ऊपर कही हुई काकी मुद्रा की विधि से जो योगी दोनों संध्याओं में कुंडलिनी के मुख का ध्यान करता हुआ प्राण वायु का पान करता है उनका क्षय रोग शीघ्र ही शांत हो जाता है, जो विद्वान योगी कौए की चोंच जैसी मुद्रा बनाकर दिन-रात प्राणवायु का पान करते हैं। उनके रोग अवश्य नष्ट हो जाते हैं तथा उन्हें दूर के शब्द श्रवण शक्ति प्राप्त होकर दूर दर्शन की क्षमता भी उपलब्ध हो जाती है। इस प्रकार वह रोगी सुक्ष्म की वस्तुओं को देखने में भी देखने में भी समर्थ हो जाता है।

3-जो मेधावी पुरुष दांत के द्वारा को पीडि़त करके तथा जीभ को ऊपर शर्नः शनैः वायु का पान करता है। वह शीघ्र ही मृत्यु को जीत कर चिरंजीवी हो जाता है जो योगी इस अभ्यास को नित्यप्रति करता है,वह छह महीने में ही सब पापों से मुक्त हो जाता है और उसके सभी रोग नष्ट हो जाते हैं।

4-जो योगी जीभ ऊंची करके अर्थात ब्रह्यरंध्र मार्ग में ले जाकर चंद्रमा से निकलते हुए अमृतरस का पान करता है वह दीर्घजीवी हो जाता है और वह मरने से नहीं डरता। जीभ को ऊंची करके अमृत पान करना खेचरी मुद्रा की प्रक्रिया है, जो योगी नीचे के दांत से राजदंत को दबाकर उसके छिद्र के द्वारा विधिपूर्वक वायु को पीता है और साथ कुंडलिनी देवी का ध्यान करता है, वह छह महीने में ही कवि हो जाता है।''

अदभुत चमत्कारिक यौगिक क्रिया ” केवल निधि (Kevali kumbhaka)”

परिचय;-

05 FACTS;-

1-हठयोग में केवली प्राणायाम ´राजयोग´ का कुम्भक प्राणायाम ही होता है। केवली और कुम्भक इन दोनों प्राणायामों में कोई अंतर नहीं है।इस प्राणायाम का अभ्यास पदमासन, सुखासन या सिद्धासन में बैठकर किया जाता है। इसे साफ व एकान्त स्थान पर करें। इस प्राणायाम का अभ्यास बिना रेचक व पूरक किए ही किया जाता है। इसके अभ्यास में सांस को अपने इच्छानुसार जहां का तहां रोककर रखा जाता है (कुम्भक किया जाता है)। इसलिए इस प्राणायाम को केवली या प्लाविनी प्राणायाम कहा जाता है।

2-केवली प्राणायाम को कुम्भकों का राजा कहा जाता है। दूसरे सभी प्राणायामों का अभ्यास करते रहने से केवली प्राणायाम स्वत: ही घटित होने लगता है। लेकिन फिर भी साधक इसे साधना चाहे तो साध सकता है। इस केवली प्राणायाम को कुछ योगाचार्य प्लाविनी प्राणायाम भी कहते हैं। हालांकि प्लाविनी प्राणायाम करने का और भी तरीका है।

3-जिसको केवली कुम्भक सिद्ध हो जाता है, वह पूजने योग्य बन जाता है । यह योग की एक ऐसी कुंजी है कि छ: महीने के दृढ़ अभ्यास से साधक फिर वह नहीं रहता जो पहले था । उसकी मनोकामनाएँ तो पूर्ण हो ही जाती हैं, उसका पूजन करके भी लोग अपनी मनोकामना सिद्ध करने लगते हैं ।

4-जो साधक पूर्ण एकाग्रता से इस पुरुषार्थ को साधेगा, उसके भाग्य का तो कहना ही क्या ? उसकी व्यापकता बढ़ती जायेगी । महानता का अनुभव होगा । वह अपना पूरा जीवन बदला हुआ पायेगा ।

5-बहुत तो क्या, तीन ही दिनों के अभ्यास से चमत्कार घटेगा । तुम, जैसे पहले थे वैसे अब न रहोगे । काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि षडविकार पर विजय प्राप्त करोगे।काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि :“मेरे चिरजीवन और आत्मलाभ का कारण प्राणकला ही है ।”

केवली प्राणायाम की विधि;-

14FACTS;-

1-स्नान आदि से निपटकर एक स्वच्छ आसन पर पद्मासन लगाकर सीधे बैठ जाओ । मस्तक, ग्रीवा और छाती एक ही सीधी रेखा में रहें । अब दाहिने हाथ के अँगूठे से दायाँ नथुना बन्द करके बाँयें नथुने से श्वास लो । प्रणव का मानसिक जप जारी रखो । यह पूरक हुआ ।

2-अब जितने समय में श्वास लिया उससे चार गुना समय श्वास भीतर ही रोके रखो । हाथ के अँगूठे और उँगलियों से दोनों नथुने बन्द कर लो । यह आभ्यांतर कुम्भक हुआ ।

3-अंत में हाथ का अँगूठा हटाकर दायें नथुने से श्वास धीरे धीरे छोड़ो । यह रेचक हुआ ।