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क्या है वाणी की उत्पत्ति और 14 माहेश्वर सूत्र? संस्कृत क्यों हैं  देव भाषा ?

क्या है वाणी की उत्पत्ति?-

02 FACTS;-

1-वाक् शक्ति को अग्नि भी कहा गया है क्योकि यह अग्नि सर्वत्र तेजस्विता, ऊर्जा, प्रखरता एवं आभा उत्पन्न करती है।ऋग्वेद के अनुसार ऋषि वाणी द्वारा ही अग्नि को प्राप्त करते रहे हैं। परा वाणी पहली वाणी है जो नादस्वरूपा और मूलाधार से निकली हुई मानी जाती है।

वाणी के चार पाद या रूप हैं-1-परा, 2- पश्यन्ती, 3- मध्यमा, 4- वैखरी। चार प्रकार की वाणियों में‌ तीन शरीर के अंदर होने से गुप्त हैं परन्तु चौथे को अनुभव कर सकते हैं।इन भेदों को तत्वज्ञ या ब्रह्मज्ञ ही जानने में समर्थ होते हैं।इनमें से तीन भेद बुद्धिरूपी गुफा में ही विद्यमान हैं और इनमें किसी भी प्रकार की स्थूल रूप से शारीरिक चेष्टा नहीं होती है अतः ये तीनों सुनने योग्य नहीं होती है।केवल चतुर्थ वैखरी वाणी को ही मनुष्य अपने व्यवहार में प्रयोग कर पाते हैं अथवा उच्चारण के पश्चात् सुन पाते हैं।

2-महृषि पाणिनी के अनुसार... ''वाणी कहां से उत्पन्न होती है, इसकी गहराई में जाकर अनुभूति की गई है।इस आधार पर आत्मा वह मूल आधार है जहां से ध्वनि उत्पन्न होती है। वह इसका पहला रूप है। यह अनुभूति का विषय है। किसी यंत्र के द्वारा सुनाई नहीं देती। ध्वनि के इस रूप को परा कहा गया।इन परा और पश्यन्ति वाणियों को दिव्य वाणी एवं देव वाणी कहा गया है।आगे जब आत्मा, बुद्धि तथा अर्थ की सहायता से मन: पटल पर कर्ता, कर्म या क्रिया का चित्र देखता है, वाणी का यह रूप पश्यन्ती कहलाता है।हम जो कुछ बोलते हैं, पहले उसका चित्र हमारे मन में बनता है। इस कारण दूसरा चरण पश्यन्ती है। इसके आगे मन व शरीर की ऊर्जा को प्रेरित कर न सुनाई देने वाला ध्वनि का बुद्बुद् उत्पन्न करता है। वह बुद्बुद् ऊपर उठता है तथा छाती से नि:श्वास की सहायता से कण्ठ तक आता है। वाणी के इस रूप को मध्यमा कहा जाता है। ये तीनों रूप सुनाई नहीं देते हैं।इसके आगे यह बुद्बुद् कंठ के ऊपर पांच स्पर्श स्थानों की सहायता से सर्वस्वर, व्यंजन, युग्माक्षर और मात्रा द्वारा भिन्न-भिन्न रूप में वाणी के रूप में अभिव्यक्त होता है। यही सुनाई देने वाली वाणी वैखरी कहलाती है और इस वैखरी वाणी से ही सम्पूर्ण ज्ञान, विज्ञान, जीवन व्यवहार तथा बोलचाल की अभिव्यक्ति संभव है।''

वाणी के चार चरण ;-

02 FACTS;-

1-वाणी के चार चरण होते हैं, परा, पश्यन्ति, मध्यमा और बैखरी।इनमें से पृथक तीन अन्तःकरण रूपी गुफा में छिपी रहती है। वे अपने स्थानों से नीचे नहीं हिलती।उसे विद्वान ब्रह्मवेत्ता ही जानते हैं।चौथी बैखरी को ही मनुष्य बोलते हैं।परा पिण्ड में और पश्यन्ति ब्रह्माण्ड क्षेत्र में काम करती है। आत्म-निर्माण का-अपने भीतर दबी हुई शक्तियों को उभारने का काम ‘परा’ करती है। ईश्वर से-देव शक्तियों से-समस्त विश्व से-लोक-लोकान्तरों से संबंध संपर्क बनाने में पश्यन्ति का प्रयोग किया जाता है। इन परा और पश्यन्ति वाणियों को दिव्य वाणी एवं देव वाणी कहा गया है।

2-वाणी का उद्भव परा से होता है। पश्यन्ती में विकसित होकर उसकी दो शाखायें फूटती है। मध्यमा में वह पुष्पों से लद जाती है और बैखरी में वह फलित होती है। जिस क्रम से उसका विकास होता है उसके उलटे क्रम से वह लय भी हो जाती है। भावों के प्रत्यावर्तन/ Alternation में मध्यमा वाणी काम आती है। इसे भाव सम्पन्न व्यक्ति ही बोलते हैं। जीभ और कान के माध्यम से नहीं वरन् हृदय से हृदय तक यह प्रवाह चलता है। भावनाशील व्यक्ति ही दूसरों की भावनायें उभार सकता है।यह बैखरी और मध्यमा वाणी मनुष्यों के बीच विचारों एवं भावों के बीज आदान-प्रदान का काम करती है।

वाणी के चार चरण का विवेचन;-

04 FACTS;-

1-परावाणी :-

02 POINTS;-

1-परा वाणी शुद्ध ज्ञानरूप है और सर्वत्र व्यापक रहने वाली है।यह शान्त समुद्र के तुल्य निश्चलऔर निष्क्रिय है। यह अक्षय है, विनाशरहित है । इस अवस्था में यह अपने शुद्ध शब्दब्रह्म के रूप में विद्यमान रहती है।यह वाणी की अव्यक्त एवं सूक्ष्मतम अवस्था मानी जाती

है।योगी ही इसके शुद्ध स्वरूप का साक्षात्कार कर पाते हैं।परा, वाणी का वह स्तर है जहाँ शब्द, मात्र कुछ तरंगों के रूप में जन्म लेते हैं। यहाँ शब्द का कोई स्पष्ट स्वरुप नहीं होता। मात्र कुछ तरंगें, जिनके स्फुरण को सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है। लगता है कि भीतर कुछ हुआ, लेकिन क्या हुआ ..कुछ पता नहीं।

2-परा वाणी दैवीय होती है। निर्विचार की दशा में बोली गई वाणी ही परा वाणी होती है या फिर जब मन शून्य अवस्था में हो और किसी दैवीय शक्ति का अवतरण हो जाए तब परा वारी का अवतरण होता है।उदाहरण के लिए

कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया था वह परावाणी ही

थी।परा वाणी प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को सत्य, संयम, संकल्प और ध्यान का अभ्यास करते रहना पड़ता है। इस बीच मौन रहकर साक्षीभाव में स्थिर रहना होता है तभी परा वाणी फलित होती है।

NOTE;-

यह वाणी नाभि से निकलती है। हालांकि बोलते वक्त यह होंठों से निकली हुई प्रतीत होती है। यह रुहानी या आसमानी वाणी होती है। इस अवस्था के व्यक्ति के जुबा से निकला प्रत्येक शब्द महत्वपूर्ण होता है, जो बहुत ही

प्रभावकारी होता है।हमारे बहुत से ऋषि मुनि शाप दे देते थे या वे कोई आशीर्वाद दे देते थे तो यह उनकी परा वाणी की शक्ति ही थी जिसके बल पर वे ऐसा कर पाते थे। उनका बोला गया वचन आकाश और अंतरिक्ष में घूमकर वैसी परिस्थिति पैदा कर देता था कि फिर वैसा होता था जैसा उन्होंने कहा।

2-पश्यन्ति वाणी :-

02 POINTS;-

1-जब किसी विचार या भाव को प्रकट करने की इच्छा होती है, तब पश्यन्ति वाणी का कार्य प्रारम्भ होता है।शान्त समुद्र में छोटी तरंग के समान विचाररूपी तरंग वाक् तत्व में प्रकट होते हैं।इन विचारों को व्यक्त करने की भावना का उदय होना और शान्त समुद्र में थोड़ी हलचल का होना, तरंगे उठना और विचारों की अभिव्यक्ति की प्रक्रिया का प्रारम्भ होना पश्यन्ति अवस्था है।यह द्वितीय अवस्था है जो कि मस्तिष्क तक सीमित है, अतः अव्यक्त है । योगी ही विचारों के उदय होने की प्रक्रिया को देख सकते हैं ।ऐसे अनेकों ऋषि-महर्षि हुए हैं जिन्होंने समाधिस्थ होकर सीधे-सीधे ईश्वर से शुद्ध ज्ञान प्राप्त किया और वह ज्ञान मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए होता था।

2-परा स्तर में जन्मी अमूर्त तरंगें जब कुछ स्पष्ट होने लगती हैं, तो बोलने वाला उसे अपने अंतर्मन में देख पाने लगता है। पश्यन्ति के स्तर पर ही शब्द अपना आकार ग्रहण करता है। परा की अस्पष्ट और निराकार तरंगों का भौतिक अस्तित्व वक्ता के अनुभव में आ जाता है।मध्यमा वाणी से कुछ उच्च होती है पश्यंती वाणी। हृदयस्थल से बोली गई भाषा पश्यंती कहलाती है। पश्यंती गहन, निर्मल, निच्छल और रहस्यमय वाणी होती है।उदाहरण के लिए रामकृष्ण परमहंस जैसे बालसुलभ मन वाले साधुओं की वाणी।

NOTE;-

यह वाणी हृदय से निकलती है।बच्चों की वाणी, निर्विचार दशा में,ज्ञान-अज्ञान से परे मनुष्य, और दिल से निकलने वाले वचन सत्य हो जाते हैं।

3-मध्यमा वाणी :-

02 POINTS;-

1-यह तृतीय अवस्था है।इसमें शरीर रूपी यंत्र में हलचल प्रारंभ हो जाती है।नाभि से प्राणशक्ति ऊपर उठती है और सिर से टकराकर स्वरयंत्र तक मुख में पहुँच जाती है । केवल वर्णों के उच्चारण का कार्य ही शेष रह जाता है।यह उच्चारण से पूर्व की अवस्था है, अतः इसे

मध्यमा या मध्यगत वाणी कहते हैं।मध्यमा में वह शब्द, जो उच्चरित होने वाला है, जो परा में मात्र कुछ निराकार तरंगों और पश्यन्ति में सिर्फ अपनी भौतिक उपस्थिति का अनुभव मात्र दे रहा था, अब एक निश्चित ज्यामितीय आकार ग्रहण कर लेता है। उच्चरित होने वाले शब्द के इसी ज्यामितीय आकार के अनुरूप वक्ता के स्वर-यंत्र अपना भी आकार बनाते हैं। स्वर-यन्त्र से तात्पर्य है, गला, मस्तक , तालु, जीभ, दाँत और होंठ।

2-अपने निश्चित ज्यामितीय आकार के अनुरूप शब्द विशेष, गले,मूर्धा (मुँह के अंदर का तालु और ऊपर के दाँतों के पीछे सिर की तरफ़ का भाग ), तालु, जीभ और दाँतों से टकराता हुआ बाहर निकलने के पूर्व अपने अंतिम पड़ाव, होठों तक पहुँचता है। शब्द की यह सारी यात्रा वाणी के जिस स्तर पर घटित होती है, वही है, मध्यमा।वैखरी वाणी से थोड़ी उच्च है मध्यमा वाणी। कुछ विचार कर बोली जाने वाली मध्यमा कहलाती है। किसी सवाल का उत्तर सोच-समझकर देने वाले लोग ; किसी समस्या पर चिंता न करके उसका सोच-समझकर समाधान ढूंढने वाले लोग या किसी क्रिया की प्रतिक्रिया पर सोच-समझकर बोलने वाले लोग इसी वाणी के अंतर्गत आते हैं।

NOTE;-

यह ऊर्ध्व प्रदेश से निकलती है। इस वाणी से किसी का भी अहित नहीं होता लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि किसी का हित होता होगा। हालांकि इस वाणी के भी प्रकार होते हैं। यह भी तब अशुद्ध होती है जब लोग सच छोड़कर गोलमाल जवाब देने के आदी हो जाते हैं, डिप्लोमेटिक हो जाते हैं या चालाकी बरतते हैं।

4-वैखरी वाणी :-

02 POINTS;-

1-यह वाणी की चतुर्थ अवस्था है।इसमें वर्णों का कंठ, तालु आदि स्थानों से उच्चारण प्रारंभ हो जाता है।अब विचार या भाव अव्यक्त या गुप्त न रहकर प्रकट हो जाते हैं।यह वैखरी वाणी ही जन साधारण के व्यवहार में आती है। 2-ज्यादातर लोग बगैर सोचे-समझे बोलते हैं ;किसी के भी हृदय को दुखाते रहते हैं।कटु वचन कहना, क्रोध में कुछ कहना ,कटाक्ष करना, व्यंग्य करना और तमाम तरह के वचन बोलना तो कई लोगों की आदत है। आपके आसपास इस वाणी के पारंगत लोग बहुतायत में मिल जाएंगे। इस वाणी के भी कई प्रकार होते हैं, जैसे कुछ ऐसी बातें भी होती हैं जिसमें बहुत सोच-विचार की आवश्यकता नहीं होती। ‍प्रतिदिन के बोलचाल की भाषा भी वैखरी वाणी है।

NOTE;-

यह कंठ से निकलती है। इस वाणी का प्रभाव सबसे बुरा होता है। यह किसी भी तरह से न खुद का हित करती है और न ही समाज का। सोच-विचारकर, समझकर सर्वहित में बोलने से कई तरह के संकटों से बचा जा सकता है और समाज में श्रेष्ठ माहौल निर्मित किया जा सकता है।

वाणी की अभिव्यक्ति का निरीक्षण कैसे कर सकते हैं?-

05 FACTS;- क से ज्ञ तक वर्ण किस अंग की सहायता से निकलते हैं, इसका सूक्ष्मता से निरीक्षण किया गया है।तथा वह विज्ञान सम्मत है क्योकि उसके अतिरिक्त अन्य ढंग से आप वह ध्वनि निकाल ही नहीं सकते हैं। 1-कंठव्य(By Throat);- क, ख, ग, घ, ङ- कंठव्य कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय ध्वनि कंठ से निकलती है। 2-तालव्य(By Palate );- च, छ, ज, झ,ञ- तालव्य कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ तालु से लगती है। 3-मूर्धन्य;- ट, ठ, ड, ढ , ण- मूर्धन्य कहे गए, क्योंकि इनका उच्चारण जीभ के मूर्धा से लगने पर ही सम्भव है।मुँह के अंदर का तालु और ऊपर के दाँतों के पीछे सिर की तरफ़ का भाग जिसे जीभ का अगला भाग ट्, ठ्, ड्, ढ्, और ण वर्ण का उच्चारण करते समय उलटकर छूता है..मूर्धा कहलाता हैं। 4-दंतीय (By Teerh);- त, थ, द, ध, न- दंतीय कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ दांतों से लगती है। 5-ओष्ठ्य (By Lips );- प, फ, ब, भ, म,- दंतीय कहे गए, क्योंकि इनका उच्चारण ओठों के मिलने पर ही होता है। क्या हैं स्वर का विज्ञान?-

03 FACTS;- 1-सभी वर्ण, संयुक्ताक्षर, मात्रा आदि के उच्चारण का मूल ‘स्वर‘ हैं।उसका गहराई से अध्ययन तथा अनुभव किया गया और निष्कर्ष के रूप में प्रतिपादित किया गया हैं कि स्वर तीन प्रकार के होते हैं। 1-उदात्त-उच्च स्वर 2-अनुदात्त-नीचे का स्वर 3-स्वरित- मध्यम स्वर 2-इनका और सूक्ष्म विश्लेषण किया गया, जो संगीत शास्त्र का आधार बना। संगीत शास्त्र में सात स्वर माने गए जिन्हें'' सा रे ग म प ध नि'' के प्रतीक चिन्हों से जाना जाता है। इन सात स्वरों का मूल तीन स्वरों में विभाजन किया गया।निषाद तथा गांधार (नि ग) स्वर उदात्त हैं। ऋषभ और धैवत (रे, ध) अनुदात्त। षड्ज, मध्यम और पंचम (सा, म, प) ये स्वरित हैं। इन सातों स्वरों के विभिन्न प्रकार के समायोजन से विभिन्न रागों के रूप बने। विभिन्न रागों के गायन व परिणाम के अनेक उल्लेख प्राचीनकाल से मिलते हैं। सुबह, शाम, हर्ष, शोक, उत्साह, करुणा-भिन्न-भिन्न प्रसंगों के भिन्न-भिन्न राग हैं।और उन रागों के गायन में उत्पन्न विभिन्न ध्वनि तरंगों का परिणाम मानव, पशु प्रकृति सब पर पड़ता है। 3-विशिष्ट मंत्रों के विशिष्ट ढंग से उच्चारण से वायुमण्डल में विशेष प्रकार के कंपन उत्पन्न होते हैं, जिनका विशेष परिणाम होता है। यह मंत्रविज्ञान का आधार है। इसकी अनुभूति वेद मंत्रों के श्रवण या मंदिर के गुंबज के नीचे मंत्रपाठ के समय अनुभव में आती है।

क्या हैं पाणिनीय व्याकरण के माहेश्वर सूत्र?-

07 FACTS;- 1-संस्कृत भाषा विशुद्ध रूप से ध्वन्यात्मक है । इस भाषा के लिए जो लिपि विकसित की गयी उसके मूल में इस बात को महत्त्व दिया गया है कि हर ध्वनि के लिए ऐसा चिह्न हो जो एक और मात्र एक ध्वनि को असंदिग्ध रूप से निरूपित करे ।आज यह देवनागरी है जो पूर्ववर्ती – लिपि के निरंतर परिवर्तन के बाद अंततः प्रतिष्ठित लिपि है।इस भाषा का व्याकरण उसकी ध्वनियों को केंद्र में रखते हुए विकसित हुआ है ।

2-संस्कृत का मान्य व्याकरण महर्षि पाणिनि के सूत्रबद्ध नियमों पर आधारित है।इन सूत्रों में व्याकरण की सभी बारीकियां संक्षिप्त रूप से निहित हैं। विभिन्न स्वर एवं व्यंजन ध्वनियों को सूत्रों में संक्षिप्त तौर पर इंगित करने के लिए महर्षि पाणिनि ने इन ध्वनियों को वर्गीकृत करते हुए 14 मौलिक सूत्रों की रचना की है, जिन्हें ‘माहेश्वर सूत्र’ कहा गया है ।

3-इन सूत्रों के बारे में यह कथा प्रचलित है कि महर्षि पाणिनि को इनका ज्ञान भगवान् महेश्वर से प्राप्त हुआ था।महर्षि के सम्मुख महादेव ने नृत्य किया जिसके समापन के समय उनके डमरू से उपरिलिखित सूत्रों की ध्वनि निकली।महर्षि पाणिनि ने इन सूत्रों को देवाधिदेव शिव के आशीर्वाद से प्राप्त किया जो कि पाणिनीय संस्कृत व्याकरण का आधार बना।पाणिनि ने संस्कृत भाषा के तत्कालीन स्वरूप को परिष्कृत एवं नियमित करने के उद्देश्य से भाषा के विभिन्न अवयवों इत्यादि तथा उनके अन्तर्सम्बन्धों का समावेश अष्टाध्यायी में किया है। अष्टाध्यायी में 32 पाद हैं जो आठ अध्यायों मे समान रूप से विभक्त हैं।इस बारे में यह श्लोक प्रचलित हैः

नृत्यावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम् ।

उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥

4-सनक आदि ऋषियों के भले के लिए नर्तक-शिरोमणि ‘नटराज’ ने डमरू को नौ+पांच बार बजाया जिससे शिवसूत्र-समुच्चय [Collection] उपलब्ध हुआ।ताण्डव नृत्य भगवान शिव द्वारा किया जाने वाला अलौकिक नृत्य है।ऐसा माना जाता है कि इसके अंदर भगवान की शक्तियां त्राहि -त्राहि मचाती हैं। यह नृत्य शिव काली माता जैसे देव करते हैं। शिव की तीसरी आंख के खुलने से हाहाकार हो जाता है। तांडव के संस्कृत में कई अर्थ होते हैं। इसके प्रमुख अर्थ हैं उद्धत नृत्य करना, उग्र कर्म करना, स्वच्छन्द हस्तक्षेप करना आदि।

5-भारतीय संगीत में चौदह प्रमुख तालभेद में वीर तथा बीभत्स रस के सम्मिश्रण से बना तांडवीय ताल का वर्णन भी मिलता है। वनस्पति शास्त्र में एक प्रकार की घास को भी तांडव कहा गया है।शास्त्रों में प्रमुखता से भगवान् शिव को ही तांडव स्वरूप का प्रवर्तक बताया गया है। परंतु अन्य आगम तथा काव्य ग्रंथों में दुर्गा, गणेश, भैरव, श्रीराम आदि के तांडव का

भी वर्णन मिलता है।मान्यता है कि रावण के भवन में पूजन के समाप्त होने पर शिव जी ने, महिषासुर को मारने के बाद दुर्गा माता ने, गजमुख की पराजय के बाद गणेश जी ने, ब्रह्मा के पंचम मस्तक के उच्छेदन के बाद आदिभैरव ने एवं रावण के वध के समय श्रीरामचंद्र जी ने तांडव किया था। .

6-सूत्र, किसी बड़ी बात को अतिसंक्षिप्त रूप में अभिव्यक्त करने का तरीका है। इसका उपयोग साहित्य, व्याकरण, गणित, विज्ञान आदि में होता है।सूत्र का शाब्दिक अर्थ धागा या रस्सी होता है।जिस प्रकार धागा वस्तुओं को आपस में जोड़कर एक विशिष्ट रूप प्रदान करता

है, उसी प्रकार सूत्र भी विचारों को सम्यक रूप से जोड़ता है।प्राचीन काल में सूत्र साहित्य का महत्व इसलिये था कि अधिकांश ग्रन्थ कंठस्थ किये जाने के ध्येय से रचे जाते थे; अतः इनका संक्षिप्त होना विशेष उपयोगी था।चूंकि सूत्र अत्यन्त संक्षिप्त होते थे, कभी-कभी इनका अर्थ समझना कठिन हो जाता था।इस समस्या के समाधान के रूप में अनेक सूत्र ग्रन्थों के भाष्य भी लिखने की प्रथा प्रचलित हुई जो सूत्रों की व्याख्या (commentary) करते थे।

7-माहेश्वर सूत्रों की कुल संख्या 14 है जो निम्नलिखित हैं:-

1- अ, इ ,उ ,ण्।

2- ॠ ,ॡ ,क्,।

3-ए, ओ ,ङ्।

4-ऐ ,औ, च्।

5-ह, य ,व ,र ,ट्।

6-ल ,ण्

7-ञ ,म ,ङ ,ण ,न ,म्।

8-झ, भ ,ञ्।

9-घ, ढ ,ध ,ष्।

10- ज, ब, ग ,ड ,द, श्।

11-ख ,फ ,छ ,ठ ,थ, च, ट, त, व्।

12-क, प ,य्।

13-श ,ष ,स ,र्।

14-ह ,ल्।

माहेश्वर सूत्रों की व्याख्या ;--

05 FACTS;-

1-उपर्युक्त्त 14 सूत्रों में संस्कृत भाषा के वर्णों को एक विशिष्ट प्रकार से संयोजित किया गया है।माहेश्वर सूत्रों को ‘प्रत्याहार विधायक’ सूत्र भी कहते हैं। प्रत्याहार का अर्थ होता है – संक्षिप्त कथन।संक्षेप में स्वर वर्णों को अच् एवं व्यञ्जन वर्णों को हल् कहा जाता है।अच् एवं हल् भी प्रत्याहार हैं।यह अच् प्रत्याहार अपने आदि अक्षर ‘अ’ से लेकर इत्संज्ञक च् के पूर्व आने वाले 'औ' पर्यन्त सभी अक्षरों का बोध कराता है। अतः,अच् = अ इ उ ॠ ॡ ए ऐ ओ औ।

2-इन 14 सूत्रों के अंत में क्रमशः विद्यमान् ‘ण्, क्, ङ्, …’ को ‘इत्’ कहा जाता है ।इत् संज्ञा होने से इन अन्तिम वर्णों का उपयोग प्रत्याहार बनाने के लिए केवल अनुबन्ध (Bonding) हेतु किया जाता है, लेकिन व्याकरणीय प्रक्रिया मे इनकी गणना नही की जाती है अर्थात् इनका

प्रयोग नही होता है। इस प्रकार ‘अइउण्’ तीन स्वर ध्वनियों – ‘अ’, ‘इ’ एवं ‘उ’ के लिए प्रयुक्त सामूहिक संकेत है ।

3-ध्यान दें कि उक्त तालिका की पहली पंक्ति में स्वर ध्वनियां हैं, जब कि शेष तीन में व्यंजन ध्वनियां सूत्रबद्ध हैं । चूंकि व्यंजनों का स्वतंत्र तथा शुद्ध उच्चारण असंभव-सा होता है, अतः इन सूत्रों में वे स्वर ‘अ’ से संयोजित रूप में लिखे गये हैं ।ताकि उन्हें सरलता से बोला जा सके । किंतु सूत्रों का प्रयोजन वस्तुतः व्यंजनों के शुद्ध उच्चारण को दर्शाना है । उदाहरणार्थ ‘हयवरट्’ वास्तव में क्रमशः ‘ह्’, ‘य्’, ‘व्’ एवं ‘र्’ की सम्मिलित ध्वनियों का द्योतक है । (यानी ‘अ’ की ध्वनियों तथा इत् ‘ट्’ हटाकर जो बचता है ।)

4-संस्कृत भाषा की विशिष्टता यह है कि इसमें वही ध्वनियां शामिल हैं जिनको परस्पर समानता एवं विषमता के आधार वर्गीकृत किया जा सके।इस प्रकार का अनूठा वर्गीकरण विश्व की किसी भी अन्य भाषा में कदाचित् नहीं है। माहेश्वर सूत्रों के उच्चारण में जो ध्वनियां बोली जाती हैं, लिपिबद्ध निरूपण में विभिन्न ‘वर्ण’ उनके ही संकेतों के तौर पर लिखे गये हैं ।उदाहरणार्थ (एक पंक्ति में लिखित) ‘ञ म ङ ण न’, सभी, अनुनासिक (nasal) हैं, जब कि (एक स्तंभ, column में लिखित) ‘ञ झ ज छ च’, सभी तालव्य हैं । यह असल में विपरीत क्रम में लिखित वर्णमाला का ‘चवर्ग’ है ।

5-स्वरों के संदर्भ में यह भी ज्ञातव्य है कि ‘अक्’ से इंगित सभी स्वर (अ, इ, उ, ऋ, ऌ,) ह्रस्व अथवा दीर्घ, दोनों प्रकार से, प्रयुक्त होते हैं।पाणिनि व्याकरण में ह्रस्व/दीर्घ का यथोचित उल्लेख किया जाता है, किंतु दोनों को एक ही लिपिचिह्न से व्यक्त किया है । अन्य स्वर (ए, ओ, ऐ, औ) केवल दीर्घ होते हैं । संस्कृत में ‘प्लुत’ का भी प्राविधान है । जब स्वरोच्चारण को अतिरिक्त लंबा खींचा जाता है, जैसा कि संगीत में होता है, तब उन्हें प्लुत कहा जाता है।आम

तौर उन्हें व्याकरण के नियमों से मुक्त रखा गया है।स्वरों-व्यंजनों के अलावा संस्कृत में दो विशिष्ट घ्वनियों का भी भरपूर प्रयोग होता है । ये हैं अनुस्वार (वर्णों के ऊपर लिखित बिंदी) और विसर्ग (स्वरों एवं स्वरमात्रा-युक्त व्यंजनों के दायें बगल लिखित कोलन-सदृश,:, चिह्न) ।

क्या हैं ''नन्दिकेश्वरकाशिका '';--

04 FACTS;-

1-नन्दिकेश्वरकाशिका 27 पदों से युक्त दर्शन एवं व्याकरण का एक ग्रन्थ है। इसके रचयिता नन्दिकेश्वर ( 250 ईसापूर्व) हैं। इस ग्रन्थ में शैव अद्वैत दर्शन का वर्णन है, साथ ही

यह माहेश्वर सूत्रों की व्याख्या के रूप में है।नन्दिकेश्वर को पाणिनि, तिरुमूल, पतंजलि, व्याघ्रपाद, तथा शिवयोगमुनि का गुरु माना जाता है।

2-आचार्य नंदिकेश्वर योग, मीमांसा, तंत्र, शैवदर्शन, कामशास्त्र, संगीतशास्त्र और नाट्यशास्त्र के बहुमुखी-प्रतिभा सम्पन्न आचार्य थे।कई जगह उन्हें शिव का अवतार भी कहा गया हैं। उन्होंने कामशास्त्र, नाट्यशास्त्र, दर्शनशास्त्र, अभिनय, नृत्य एवं संगीतकला पर ग्रन्थ लिखे हैं। पुराणों में इनको शिलाद ऋषि का पुत्र एवं शिव का पार्षद बताया गया हैं। इनका पैतृक नाम शैलादि था। वे शिव के प्रमुख गण एवं नाट्याचार्य भारत के उपाध्याय थे।आचार्य नंदिकेश्वर ने ही नाटककला और संगीतकला को शास्त्र का वैज्ञानिक और व्यवस्थित रूप दिया हैं।

3-The "Shiva Sutras," or "Aksarasamamnaya," are 14 verses of Sanskrit phonemes. From these verses, 281 different combinations of letters and bound letters (anubandhas) can be made.The Shiva Sutras are divided into three sections, which correspond to the three “means” (approaches; ways) or upayas, in Kashmir Shaivism - 1st Section - Shambhavopaya or Divine Means. 2nd Section - Shaktopaya or Empowered Means. 3rd Section - Anavopaya or Individual Means.

4-The Shiva Sutras are designed as a central text for use in attaining liberation (enlightenment) and enjoyment of life, in ongoing experience, via direct realization of one’s own true nature - and the inherent wholeness that is its essence.Interestingly, the Shiva Sutras start with the highest, or most advanced means - and then descend to the next highest, and finally, to the lowest or most basic means. This is specifically so that any practitioner can work with the sutras, the related commentaries and practices, based on whatever level of awareness and attainment they currently have.

| नन्दिकेश्वरकाशिका || नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्। उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्।। १।। अत्र सर्वत्र सूत्रेषु अन्त्यवर्णचतुर्दशम्। धात्वर्थं समुपादिष्टं पाणिन्यादीष्टसिद्धये।। २।। ।। अइउण्।। १।। अकारो ब्रह्मरूपः स्यान्निर्गुणः सर्ववस्तुषु। चित्कलामिं समाश्रित्य जगद्रूप उणीश्वरः।। ३।। अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमेश्वरः। आद्यमन्त्येन संयोगादहमित्येव जायते।। ४।। सर्वं परात्मकं पूर्वं ज्ञप्तिमात्रमिदं जगत्। ज्ञप्तेर्बभूव पश्यन्ती मध्यमा वाक ततः स्मृता।। ५।। वक्त्रे विशुद्धचक्राख्ये वैखरी सा मता ततः। सृष्ट्याविर्भावमासाद्य मध्यमा वाक समा मता।। ६।। अकारं सन्निधीकृत्य जगतां कारणत्वतः। इकारः सर्ववर्णानां शक्तित्वात् कारणं गतम्।। ७।। जगत् स्रष्टुमभूदिच्छा यदा ह्यासीत्तदाऽभवत्। कामबीजमिति प्राहुर्मुनयो वेदपारगाः।। ८।। अकारो ज्ञप्तिमात्रं स्यादिकारश्चित्कला मता। उकारो विष्णुरित्याहुर्व्यापकत्वान्महेश्वरः।। ९।। ।। ऋऌक्।। २।। ऋऌक् सर्वेश्वरो मायां मनोवृत्तिमदर्शयत्। तामेव वृत्तिमाश्रित्य जगद्रूपमजीजनत्।। १०।। वृत्तिवृत्तिमतोरत्र भेदलेशो न विद्यते। चन्द्रचन्द्रिकयोर्यद्वद् यथा वागर्थयोरपि।। ११।। स्वेच्छया स्वस्य चिच्छक्तौ विश्वमुन्मीलयत्यसौ। वर्णानां मध्यमं क्लीबमृऌवर्णद्वयं विदुः।। १२।। ।। एओङ्।। ३।। एओङ् मायेश्वरात्मैक्यविज्ञानं सर्ववस्तुषु। साक्षित्वात् सर्वभूतानां स एक इति निश्चितम्।। १३।। ।। ऐऔच्।। ४।। ऐऔच् ब्रह्मस्वरूपः सन् जगत् स्वान्तर्गतं ततः। इच्छया विस्तरं कर्त्तुमाविरासीन्महामुनिः।। १४।। ।। हयवरट्।। ५।। भूतपञ्चकमेतस्माद्धयवरण्महेश्वरात्। व्योमवाय्वम्बुवह्न्याख्यभूतान्यासीत् स एव हि।। १५।। हकाराद् व्योमसंज्ञं च यकाराद्वायुरुच्यते। रकाराद्वह्निस्तोयं तु वकारादिति सैव वाक्।। १६।। ।। लण्।। ६।। आधारभूतं भूतानामन्नादीनां च कारणम्। अन्नाद्रेतस्ततो जीवः कारणत्वाल्लणीरितम्।। १७।। ।। ञमङणनम्।। ७।। शब्दस्पर्शौ रूपरसगन्धाश्च ञमङणनम्। व्योमादीनां गुणा ह्येते जानीयात् सर्ववस्तुषु।। १८।। ।। झभञ्।। ८।। वाक्पाणी च झभञासीद्विराड्रूपचिदात्मनः। सर्वजन्तुषु विज्ञेयं स्थावरादौ न विद्यते।। वर्गाणां तुर्यवर्णा ये कर्मेन्द्रियमया हि ते।। १९।। ।। घढधष्।। ९।। घढधष् सर्वभूतानां पादपायू उपस्थकः। कर्मेन्द्रियगणा ह्येते जाता हि परमार्थतः।। २०।। ।। जबगडदश्।। १०।। श्रोत्रत्वङ्नयनघ्राणजिह्वाधीन्द्रियपञ्चकम्। सर्वेषामपि जन्तूनामीरितं जबगडदश्।। २१।। ।। खफछठथचटतव्।। ११।। प्राणादिपञ्चकं चैव मनो बुद्धिरहङ्कृतिः। बभूव कारणत्वेन खफछठथचटतव्।। २२।। वर्गद्वितीयवर्णोत्थाः प्राणाद्याः पञ्च वायवः। मध्यवर्गत्रयाज्जाता अन्तःकरणवृत्तयः।। २३।। ।। कपय्।। १२।। प्रकृतिं पुरुषञ्चैव सर्वेषामेव सम्मतम्। सम्भूतमिति विज्ञेयं कपय् स्यादिति निश्चितम्।। २४।। ।। शषसर्।। १३।। सत्त्वं रजस्तम इति गुणानां त्रितयं पुरा। समाश्रित्य महादेवः शषसर् क्रीडति प्रभुः।। २५।। शकारद्राजसोद्भूतिः षकारात्तामसोद्भवः। सकारात्सत्त्वसम्भूतिरिति त्रिगुणसम्भवः।। २६।। ।। हल्।। १४।। तत्त्वातीतः परं साक्षी सर्वानुग्रहविग्रहः। अहमात्मा परो हल् स्यामिति शम्भुस्तिरोदधे।। २७।। ।। इति नन्दिकेश्वरकृता काशिका समाप्ता।।

संस्कृत क्यों हैं देव भाषा ?-

05 FACTS;-

1-'संस्कृत' का शाब्दिक अर्थ है परिपूर्ण भाषा। संस्कृत पूर्णतया वैज्ञानिक तथा सक्षम भाषा है। संस्कृत भाषा के व्याकरण ने विश्वभर के भाषा विशेषज्ञों का ध्यानाकर्षण किया है। उसके व्याकरण को देखकर ही अन्य भाषाओं के व्याकरण विकसित हुए हैं।आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार यह भाषा कम्प्यूटर के उपयोग के लिए सर्वोत्तम भाषा है। मात्र 3,000 वर्ष पूर्व तक भारत में संस्कृत बोली जाती थी तभी तो ईसा से 500 वर्ष पूर्व पाणिणी ने दुनिया का पहला व्याकरण ग्रंथ लिखा था, जो संस्कृत का था। इसका नाम 'अष्टाध्यायी' है। 2-आदिकाल में भाषा नहीं थी, ध्वनि संकेत थे। ध्वनि संकेतों से मानव समझता था कि कोई व्यक्ति क्या कहना चाहता है। फिर चित्रलिपियों का प्रयोग किया जाने लगा। उन्होंने अपने-अपने ध्वनि संकेतों को चित्र रूप और फिर विशेष आकृति के रूप देना शुरू किया। इस तरह भाषा का क्रमश: विकास हुआ। संस्कृत ऐसी भाषा नहीं है जिसकी रचना की गई हो। इस भाषा की खोज की गई है। ये वे लोग थे, जो हिमालय के आसपास रहते थे।चूंकि इसका आविष्कार करने वाले देवलोक के देवता थे तो इसे देववाणी कहा जाने लगा। संस्कृत को देवनागरी में लिखा जाता है। देवता लोग हिमालय के उत्तर में रहते थे।

3-संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है तथा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी है। इसकी उत्पत्ति और विकास ब्रह्मांड की ध्वनियों को सुन-जानकर हुआ।यह आम लोगों द्वारा बोली गई ध्वनियां नहीं हैं। धरती और ब्रह्मांड में गति सर्वत्र है। चाहे वस्तु स्थिर हो या गतिमान। गति होगी तो ध्वनि निकलेगी। ध्वनि होगी तो शब्द निकलेगा। देवों और ऋषियों ने उक्त ध्वनियों और शब्दों को पकड़कर उसे लिपि में बांधा और उसके महत्व और प्रभाव को समझा। 4-संस्कृत विद्वानों के अनुसार सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से 9 रश्मियां निकलती हैं और ये चारों ओर से अलग-अलग निकलती हैं। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गईं। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बने। इस तरह सूर्य की जब 9 रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनकी पृथ्वी के 8 वसुओं से टक्कर होती है। सूर्य की 9 रश्मियां और पृथ्वी के 8 वसुओं के आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुईं, वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गईं। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित हैं।ब्रह्मांड की ध्वनियों के रहस्य के बारे में वेदों से ही जानकारी मिलती है। इन ध्वनियों को अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के संगठन नासा और इसरो ने भी माना है।

5-संस्कृत वर्णमाला में 14 स्वर, 33 व्यंजन और – और 4 आयोगवाह ..ऐसे कुल मिलाकर के 50 वर्ण हैं ।स्वर को ‘अच्’ और ब्यंजन को ‘हल्’ कहते हैं । अच् – 14 हल् – 33 ;आयोगवाह – 4 ऐसे कुल मिलाकर के 50 वर्ण हैं ।संस्कृत में हर अक्षर, स्वर और व्यंजन के संयोग से बनता है।

5-1-स्वर’/अच्’ किसे कहते है ?- ‘स्वर’/अच्’ का अर्थ है, ऐसा वर्ण जिसका उच्चारण अपने आप हो सके, जिसको उच्चारण के लिए दूसरे वर्ण से मिलने की आवश्यकता न हो। स्वरों का दूसरा नाम ‘अच्’ भी है। 5-2-व्यंजन‘/इत्’;- ऐसे वर्ण जिसका उच्चारण बिना किसी दूसरे वर्ण – अर्थात् स्वर से मिले बिना नही किया जा सकता , व्यंजन कहलाते है।ऊपर ‘क’ से लेकर ‘ह’ तक के सारे वर्ण व्यंजन कहलाते है। क में अ मिला हुआ है। इसका शुद्ध रुप केवल क् होगा। व्यंजन का दूसरा नाम ‘इत्’ भी है,इसी कारण व्यंजनमूलक चिन्ह को भी ‘इत्’ कहते है। 5-3-संस्कृत व्याकरण को माहेश्वर शास्त्र कहा जाता है।माहेश्वर का अर्थ है- शिव जी।संस्कृत में वर्ण दो प्रकार के होते है.. 1- स्वर 2- व्यञ्जन।संस्कृत में स्वर- ( अच्) तीन प्रकार के होते है 1- ह्रस्व स्वर ( पाँच)--- इसमें एक मात्रा का समय लगता है।जैसे अ , इ , उ , ऋ , लृ। 2- दीर्घ स्वर (आठ)---: इसमें दो मात्रा ईआ समय लगता है। जैसे आ , ई , ऊ , ऋ , ए ,ऐ ,ओ , औ। 3- प्लुत स्वर --: इसमे तीन मात्रा का समय लगता है। जैसे--- हे राम३ , ओ३म । 5-4-सस्कृत में व्यञ्जन (हल् ) चार प्रकार के होते है.. 1- स्पर्श व्यञ्जन - क से म तक = 25 वर्ण 2- अन्तःस्थ व्यञ्जन - य , र , ल , व = 4 वर्ण 3- ऊष्म व्यञ्जन - श , ष , स , ह = 4 वर्ण 4- संयुक्त व्यञ्जन - क्ष , त्र , ज्ञ = 3 वर्ण 5-5-सस्कृत में प्रत्याहारों की संख्या = 42

अक् प्रत्याहार---: अ इ उ ऋ लृ । अच् प्रत्याहार ---:अ इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ । अट् प्रत्याहार ---: अ इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ ह् य् व् र् । अण् प्रत्याहार ---: अ इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ ह् य् व् र् ल् । इक् प्रत्याहार----: इ उ ऋ लृ । इच् प्रत्याहार----: इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ । इण् प्रत्याहार-----: इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ ह् य् व् र् ल् । उक् प्रत्याहार ----: उ ऋ लृ । एड़् प्रत्याहार ----: ए ओ । एच् प्रत्याहार----- : ए ओ ऐ औ । ऐच् प्रत्याहार ----- ऐ औ । जश् प्रत्याहार --- : ज् ब् ग् ड् द् । यण् प्रत्याहार ---': य् व् र् ल् । शर् प्रत्याहार-----: श् ष् स् । शल् प्रत्याहार ---- : श् ष् स् ह् ।

....SHIVOHAM.....