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क्या है वाणी की उत्पत्ति और 14 माहेश्वर सूत्र? संस्कृत क्यों हैं  देव भाषा ?

क्या है वाणी की उत्पत्ति?-

02 FACTS;-

1-वाक् शक्ति को अग्नि भी कहा गया है क्योकि यह अग्नि सर्वत्र तेजस्विता, ऊर्जा, प्रखरता एवं आभा उत्पन्न करती है।ऋग्वेद के अनुसार ऋषि वाणी द्वारा ही अग्नि को प्राप्त करते रहे हैं। परा वाणी पहली वाणी है जो नादस्वरूपा और मूलाधार से निकली हुई मानी जाती है।

वाणी के चार पाद या रूप हैं-1-परा, 2- पश्यन्ती, 3- मध्यमा, 4- वैखरी। चार प्रकार की वाणियों में‌ तीन शरीर के अंदर होने से गुप्त हैं परन्तु चौथे को अनुभव कर सकते हैं।इन भेदों को तत्वज्ञ या ब्रह्मज्ञ ही जानने में समर्थ होते हैं।इनमें से तीन भेद बुद्धिरूपी गुफा में ही विद्यमान हैं और इनमें किसी भी प्रकार की स्थूल रूप से शारीरिक चेष्टा नहीं होती है अतः ये तीनों सुनने योग्य नहीं होती है।केवल चतुर्थ वैखरी वाणी को ही मनुष्य अपने व्यवहार में प्रयोग कर पाते हैं अथवा उच्चारण के पश्चात् सुन पाते हैं।

2-महृषि पाणिनी के अनुसार... ''वाणी कहां से उत्पन्न होती है, इसकी गहराई में जाकर अनुभूति की गई है।इस आधार पर आत्मा वह मूल आधार है जहां से ध्वनि उत्पन्न होती है। वह इसका पहला रूप है। यह अनुभूति का विषय है। किसी यंत्र के द्वारा सुनाई नहीं देती। ध्वनि के इस रूप को परा कहा गया।इन परा और पश्यन्ति वाणियों को दिव्य वाणी एवं देव वाणी कहा गया है।आगे जब आत्मा, बुद्धि तथा अर्थ की सहायता से मन: पटल पर कर्ता, कर्म या क्रिया का चित्र देखता है, वाणी का यह रूप पश्यन्ती कहलाता है।हम जो कुछ बोलते हैं, पहले उसका चित्र हमारे मन में बनता है। इस कारण दूसरा चरण पश्यन्ती है। इसके आगे मन व शरीर की ऊर्जा को प्रेरित कर न सुनाई देने वाला ध्वनि का बुद्बुद् उत्पन्न करता है। वह बुद्बुद् ऊपर उठता है तथा छाती से नि:श्वास की सहायता से कण्ठ तक आता है। वाणी के इस रूप को मध्यमा कहा जाता है। ये तीनों रूप सुनाई नहीं देते हैं।इसके आगे यह बुद्बुद् कंठ के ऊपर पांच स्पर्श स्थानों की सहायता से सर्वस्वर, व्यंजन, युग्माक्षर और मात्रा द्वारा भिन्न-भिन्न रूप में वाणी के रूप में अभिव्यक्त होता है। यही सुनाई देने वाली वाणी वैखरी कहलाती है और इस वैखरी वाणी से ही सम्पूर्ण ज्ञान, विज्ञान, जीवन व्यवहार तथा बोलचाल की अभिव्यक्ति संभव है।''