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यज्ञ का क्या अर्थ है?यज्ञों के कितने अंग तथा प्रकार होते है?


यज्ञ का क्या अर्थ है?-

07 FACTS;-

1-यज्ञ संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- "आहुति, चढ़ावा"। यह हिंदू धर्म में प्राचीन भारत के आरंभिक ग्रंथों वेदों में निर्धारित अनुष्ठानों पर

आधारित उपासना पद्धति है।भारतीय परम्परा के अनुसार प्राणियों के ज्ञान, शक्ति, विद्या, बुद्धि, बल आदि की न्यूनाधिकता के कारण अधिकारानुरूप प्राणि-कल्याण के अनेक साधन बताये गये हैं । उनमें यज्ञ भी एक प्राणि-कल्याण का उत्कृष्ट साधन है । यज्ञ का तात्पर्य है- त्याग, बलिदान, शुभ कर्म। अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मूल्यवान् सुगंधित पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित किया जाता है। वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक साँस लेने का अवसर मिलता है। हवन हुए पदार्थ् वायुभूत होकर प्राणिमात्र को प्राप्त होते हैं और उनके स्वास्थ्यवर्धन, रोग निवारण में सहायक होते हैं।

2-यज्ञ काल में उच्चरित वेद मंत्रों की पुनीत शब्द ध्वनि आकाश में व्याप्त होकर लोगों के अंतःकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती है।यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्त्व वायुमण्डल

में फैलाये जाते हैं, उनसे हवा में घूमते असंख्यों रोग कीटाणु सहज ही नष्ट होते हैं। साधारण रोगों एवं महामारियों से बचने का यज्ञ एक सामूहिक उपाय है। दवाओं में सीमित स्थान एवं सीमित व्यक्तियों को ही बीमारियों से बचाने की शक्ति है; पर यज्ञ की वायु तो सर्वत्र ही पहुँचती है और प्रयत्न न करने वाले प्राणियों की भी सुरक्षा करती है। मनुष्य की ही नहीं, पशु-पक्षियों, कीटाणुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों के आरोग्य की भी यज्ञ से रक्षा होती है।इस प्रकार थोड़े ही खर्च एवं प्रयत्न से यज्ञकर्ताओं द्वारा संसार की बड़ी सेवा बन पड़ती है।

3-यज्ञ की ऊष्मा मनुष्य के अंतःकरण पर देवत्व की छाप डालती है। जहाँ यज्ञ होते हैं, वह भूमि एवं प्रदेश सुसंस्कारों की छाप अपने अन्दर धारण कर लेता है और वहाँ जाने वालों पर दीर्घकाल तक प्रभाव डालता रहता है। प्राचीनकाल में तीर्थ वहीं बने हैं, जहाँ बड़े-बड़े यज्ञ हुए थे। जिन घरों में, जिन स्थानों में यज्ञ होते हैं, वह भी एक प्रकार का तीर्थ बन जाता है और वहाँ जिनका आगमन रहता है, उनकी मनोभूमि उच्च, सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनती हैं।

4-महिलाएँ, छोटे बालक एवं गर्भस्थ बालक विशेष रूप से यज्ञ शक्ति से अनुप्राणित होते हैं। उन्हें सुसंस्कारी बनाने के लिए यज्ञीय वातावरण की समीपता बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है।

कुबुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्मों से विकृत मनोभूमि में यज्ञ से भारी सुधार होता है। इसलिए यज्ञ को पापनाशक कहा गया है। यज्ञीय प्रभाव से सुसंस्कृत हुई विवेकपूर्ण मनोभूमि का प्रतिफल जीवन के प्रत्येक क्षण को स्वर्ग जैसे आनन्द से भर देता है, इसलिए यज्ञ को स्वर्ग देने वाला कहा गया है।

5-यज्ञ सामूहिकता का प्रतीक है। अन्य उपासनाएँ या धर्म-प्रक्रियाएँ ऐसी हैं, जिन्हें कोई अकेला कर या करा सकता है; पर यज्ञ ऐसा कार्य है, जिसमें अधिक लोगों के सहयोग की आवश्यकता है। होली आदि पर्वों पर किये जाने वाले यज्ञ तो सदा सामूहिक ही होते हैं। यज्ञ आयोजनों से सामूहिकता, सहकारिता और एकता की भावनाएँ विकसित होती हैं।

6-वैयक्तिक उन्नति और सामाजिक प्रगति का सारा आधार सहकारिता, त्याग, परोपकार आदि प्रवृत्तियों पर निर्भर है। यदि माता अपने रक्त-मांस में से एक भाग नये शिशु का निर्माण करने के लिए न त्यागे, प्रसव की वेदना न सहे, अपना शरीर निचोड़कर उसे दूध न पिलाए, पालन-पोषण में कष्ट न उठाए और यह सब कुछ नितान्त निःस्वार्थ भाव से न करे, तो फिर मनुष्य का जीवन-धारण कर सकना भी संभव न हो। इसलिए कहा जाता है कि मनुष्य का जन्म यज्ञ भावना के द्वारा या उसके कारण ही संभव होता है। गीताकार ने इसी तथ्य को इस प्रकार कहा है कि प्रजापति ने यज्ञ को मनुष्य के साथ जुड़वा भाई की तरह पैदा किया और यह व्यवस्था की, कि एक दूसरे का अभिवर्धन करते हुए दोनों फलें-फूलें।

7-यज्ञ हमेशा उद्देश्यपूर्ण होता है। यहाँ तक कि इसका लक्ष्य ब्रह्मांड की स्वाभाविक व्यवस्था क़ायम रखने जैसा व्यापक भी हो सकता है। इसमें अनुष्ठानों का सही निष्पादन और मंत्रों का शुद्ध उच्चारण अनिवार्य माने जाते हैं तथा निष्पादक और प्रयुक्त सामग्री का अत्यधिक पवित्र होना आवश्यक है।

यज्ञ के अंग तथा प्रकार;-

05 FACTS;-

1-यज्ञ ओर महायज्ञ ये दो भेद प्रधान है ।जो स्वयं के लिये तथा पारलौकिक कल्याण के लिये किया जाता है उसे यज्ञ संज्ञा ।जो सर्वकल्याण विश्वकल्याणार्थ किया जाए वह महायज्ञ संज्ञक।सामान्यतः वैदिक, तान्त्रिक ओर मिश्र ये तीन यज्ञनुष्ठान की शैलियाँ ज्ञात होती हैं। यहाँ तान्त्रिक और मिश्र शब्द की व्याख्या में विचारकों के विभिन्न मत दिख पड़ते हैं । कुछ लोग तान्त्रिक शब्द से तन्त्र दर्शन प्रतिपादित योगादिक्रियाओं का, तथा कई विचारक दक्षिण और वाममार्ग नाम से प्रसिद्ध तन्त्रपद्धति के कार्यों का निर्देश बताते हैं ।

2-परन्तु कात्यायन महर्षि की परिभाषानुसार एक कार्य में ही विभिन्न शाखाओं में प्रतिपादित अनेकताओं का अविरोधी संकलन करना 'तन्त्र' शब्द का अर्थ है । ऐसे ही कार्यों को 'तान्त्रिक' शब्द से निर्दिष्ट किया गया है ।इस अर्थ के मान लेने पर और ऐसे ही तान्त्रिक कार्यों के लिए आजकल स्मार्त शब्द का व्यवहार प्रचलित है ।

3-मिश्र शब्द से ऐसे कार्यों का संकेत है जिसमें वेद और तन्त्र का सम्मिश्रण हो । याज्ञिक परम्परा के विचार से यहाँ मिश्र शब्द से पौराणिक कार्यों का संकेत है । उनकी दृष्टि में वेद और तन्त्र का सम्मिश्रण ही पौराणिक विधान है ।उक्त याज्ञिक विचार से यज्ञ की श्रौत (वैदिक) स्मार्त (तान्त्रिक) और पौराणिक (मिश्र) ये तीन मुख्य शैलियाँ हैं ।

4-इस प्रकार यज्ञ तीन प्रकार के होते है- श्रौत स्मार्त और पौराणिक। श्रुति पति पादित यज्ञो को श्रौत यज्ञ और स्मृति प्रतिपादित यज्ञो को स्मार्त यज्ञ कहते है। श्रौत यज्ञ में केवल श्रुति प्रतिपादित मंत्रो का प्रयोग होता है और स्मार्त यज्ञ में वैदिक पौराणिक और तांत्रिक मंन्त्रों का प्रयोग होता है। 5-यज्ञ कार्य के भेद-उपभेदों की गणना करना साधारण कार्य नहीं है । गीता के चतुर्थाध्याय के यज्ञनिरूपण-प्रकरण में यज्ञ के 15 मुख्य भेद बतलाए गये हैं । यदि इनकी विभिन्न शाखाओं की गणना की जाय, तो यज्ञक्षेत्र को 'अनन्त' कह कर ही विश्राम करनापड़ेगा ।

श्रौत यज्ञ का क्या अर्थ है ?-

03 FACTS;-

1-श्रौतयज्ञ श्रुति अर्थात् वेद के मंत्र और ब्राह्मण नाम के दो अंश हैं । इन दोनों में या दोनों में से किसी एक में सांगोपांग रीति से वर्णित यज्ञों को 'श्रौतयज्ञ' कहते हैं । श्रौत कल्प में 'यज्ञ' और 'होम' दो शब्द हैं । जिसमें खड़े होकर 'वषट्' शब्द के द्वारा आहुति दी जाती है और याज्या पुरोनुवाक्या नाम के मंत्र पढ़े जाते हैं, वह कार्य 'यज्ञ' माना जाता है । जिसमें बैठकर 'स्वाहा' शब्द के द्वारा आहुति दी जाती है यह होम कहा जाता है ।

2-वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन मिलता है। किन्तु उनमें पांच यज्ञ ही प्रधान माने गये हैं - 1. अग्नि होत्रम, 2. दर्शपूर्ण मासौ, 3. चातुर्म स्यानि, 4. पशुयांग, 5. सोमयज्ञ, ये पाॅंच प्रकार के यज्ञ कहे गये है, यह श्रुति प्रतिपादित है।

3-श्रौतयज्ञों के विधान की एक स्वतंत्र परम्परा है, उस प्रयोग परम्परा का जिस कार्य में पूर्णतया उललेख हो उसे 'प्रकृतियाग' कहते हैं और जिस कार्य में विशेष बातों का उल्लेख और शेष बातें प्रकृतियोग से जानी जाएँ उसे 'विकृतियाग' कहते हैं। अतएव श्रौत यज्ञों के तीन मुख्य भेदों में क्रमशः दर्शपूर्णमासेष्टि, अग्नीपोमीय पशुयाग, और ज्योतिष्टोम सोमयाग ये प्रकृतियाग हैं ।अर्थात् इन कर्मों में किसी दूसरे कर्म से विधि का ग्रहण नहीं होता ।इन प्रकृतियागों के जो धर्म ग्राही विकृतियाग हैं वे अनेक हैं ।

श्रौत यज्ञ के तीन मुख्य भाग;-

03 FACTS;-

श्रौत यज्ञ मुख्यतया तीन भागों में विभक्त है...

1-इष्टियाग;-

इष्टियाग में अन्नयम प्रधान रूप से हवि अर्थात् देवताओं के लिए देय द्रव्य हैं ।इष्टियाग प्रायः 4 वैदिक विधान कुशल ब्राह्मण विद्वानों के सहयोग से हो सकता है ।प्रत्येक पन्द्रहवें दिन 'प्रतिपद्' तिथि को इष्टियाग करना आवश्यक है जिसमें हवनीय द्रव्य तथा ऋत्विजों की दक्षिणा आदि भी आवश्यक है ।सबसे मुख्य बात जो परम आवश्यक है और जिसका अत्यन्त अभाव है, वह है वेद की याज्ञिक परम्परा का प्रायोगिक पूर्णज्ञान । आज इसका लोप होता जा रहा है । आज हम वेद के उन अर्थों के सम्बन्ध में अनभिज्ञ हैं, जिनसे जल,स्थल,नभ सम्बंधी चमत्कारी वैज्ञानिक मंत्र क्रियाओं का ज्ञान हो सकता था।

2-पशुयाग ;-

पशुयाग में प्रधान रूप से 'पशु' हवि है ।पशुयाग में 6 ऋत्विज् होना आवश्यक होता है ।

3-सोमयाग;-

सोमयाग में प्रधान हवि सोम होती है ।सोमयाग में 16 ऋत्विज् होते हैं । सोमयाग के महान् यज्ञ सत्र और अहीन नाम से कहलाते हैं । सत्रयाग होते हैं, और इन्हीं में से 16 व्यक्तियों को 'ऋत्विज्' का कार्य करना पड़ता है, इसमें दक्षिणा नहीं दी जाती है और यज्ञ का फल सब यजमानों को बराबर पूरा मिलता है । अहीनयाग में एक या अनेक अग्निहोत्री यजमान हो सकते हैं । परन्तु इसमें 'ऋत्विज्' अलग होते हैं, जिन्जें दक्षिणा दी जाती है । इस अहीनयाग का फल केवल यजमानों को ही मिलता है ।

क्या श्रौतयज्ञ 'त्रयी' साध्य हैं ?-

03 FACTS;-

1-श्रौत यज्ञ आह्वनीय, गार्ह्यपतय, दक्षिणाग्रि इन तीन अग्नियों में होते हैं इसलिए इन्हें 'त्रेताग्नियज्ञ' भी कहते हैं । प्रायः सभी श्रौत-यज्ञों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से, कम या अधिक रूप से तीनों ही वेदों के मंत्रों का उच्चारण होता है । अतः श्रौतयज्ञ 'त्रयी' साध्य हैं । इनमें यजमान स्वयं शरीर क्रिया में उतना व्यस्त नहीं रहता जितने अन्य ब्राह्मण जिन्हें 'ऋत्विज्' कहते हैं वे कार्य संलग्न रहते हैं ।

2-इन श्रौतयज्ञों का प्रचार आजकल भारतवर्ष में नहीं के बराबर है, क्योंकि आजकल का मानव बहुमुखी और बहुधन्धी है । उसे कोई शास्त्रीय बंधन पसन्द नहीं है । श्रौतयाग करने का वही अधिकारी है, जिसने विधिपूर्वक श्रौत अग्नियों का आधार लिया है ।और प्रतिदिन सांय प्रातः अग्निहोत्र में श्रद्धापूर्वक विधानुकूल समय लगता है ।

3-श्रौताग्रिहोत्री को अग्नि की निरन्तर रक्षा करनी पड़ती है । अग्नियों के रखने के लिये एक सुन्दर अग्निहोत्रशाला चाहिए ।अग्निहोत्री स्वयं गौ रखकर आवश्यकता होने पर मंत्रों द्वारा दूध दुहता है और मंत्रों से ही दही जमाता है । अतएव गो रक्षा करना भी आवश्यक है ।

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स्मार्त यज्ञ का क्या अर्थ है ?-

05 FACTS;-

1-इनके मुख्यतया-हुत, अहुत, प्रहुत और प्राशित ये चार भेद हैं । जिन कार्यों में अग्नि में किसी विहित द्रव्य का हवन होता हो, वह हुत यज्ञ हैं । जिससे हवन न होता हो केवल किसी क्रिया का करना मात्र हो वह अहुत यज्ञ है । जिसमें हवन और देवताओं के उद्देश्य से द्रव्य का 'बलि' संज्ञा से त्याग हो, वह प्रहुत यज्ञ है।और जिसमें भोजन मात्र ही हो वह प्राशित यज्ञ है ।

2-स्मार्त यज्ञ का आधार भूत अग्नि शास्त्रीय और लौकिक दोनों प्रकार का होता है ।साधारण अग्नि लौकिक अग्नि है । इसे संस्कारों द्वारा परिशाधित भूमि में स्थापित करके भी स्मार्त यज्ञ होते हैं । स्मार्त यज्ञों की संख्या श्रौत यज्ञों की भाँति अत्यधिक नहीं हैं ।

3-पंचमहायज्ञ, षोडशसंस्कार और और्ध्वदैहिक (प्रचलित मृत्यु के बाद की क्रिया) प्रधानतया स्मार्त हैं । स्मृति ग्रन्थों में उपदिष्ट कार्य जिनका पूर्ण विधान उपलब्ध गृह्यसूत्रों में नहीं मिलता है । वे भी याज्ञिकों की परम्परा में स्मार्त ही कहलाते हैं ।

4-स्मार्त यज्ञ में प्रायः अकेला भी व्यक्ति कार्य कर सकता है । हवन वाले कार्यों में एक ब्रह्मा की तथा भोजनादि में अनेक व्यक्तियों की आवश्यकता होती है ।स्मार्त यज्ञों में यजमान, ब्रह्मा और आचार्य .. इन तीन की आवश्यकता बताई है ।

5-इस समय शास्त्रीय अग्नि कार्य प्रायः लुप्त से हो गये हैं, क्योंकि इनमें भी अग्निरक्षा आदि का कार्य आजकल की प्रवृत्ति के अनुकूल नहीं बैठ पाता । जिनमें लौकिक अग्नि का ग्रहण है वे संस्कार, उपाकर्म, अन्त्येष्टि, आदि प्रचलित हैं ।पर वे भी इनी-गिनी संख्या में हैं । स्मार्त यज्ञों में मानव के नैतिक गुणों के विकास का फल अधिक है । आज इनका प्रचार-प्रसार कम हो गया है ।

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पौराणिक यज्ञ (मिश्र) का क्या अर्थ है ?-

02 FACTS;-

1-श्रुति ,स्मृति कथित कार्यों के अधिकारी, अनाधिकारी सभी व्यक्तियों के लिए पौराणिक कार्य उपयोगी है । आज कल इन्हीं का प्रचार और प्रसार है ।परन्तु अतएव पौराणिक यज्ञों को हवन, दान, पुरश्चरण, शान्तिकर्म, पौष्टिक, इष्ट, पूर्त्त व्रत, सेवा, आदि के रूप से अनके श्रेणियों में विभक्त किया गया है ।गीता के व्यापक क्षेत्र से इनके लिए भी 'यज्ञ' शब्द का व्यवहार होता है ।

2-पौराणिक यज्ञ (मिश्र) का संक्षिप्त परिचय ;-

03 POINTS;-

2-1-यों तो यज्ञ के असंख्य भेद अर्थात् प्रकार शास्त्रों में वर्णित हैं ।उनके स्वरूप का वर्णन, उसके अनुष्ठान के प्रकार एवं अंग उपांग आदि का संक्षेपतः भी वर्णन यहाँ नहीं किया जा सकता है ।

2-2-कई यज्ञ तो ऐसे हैं जिनके अनुष्ठान का न तो आज तक कोई योग्य अधिकारी ही है । न अनेक कारणों से उसका अनुष्ठान किया ही जा सकता है । जैसे भगवान् अनन्त, अपार हैं, वैसे ही उनके स्वरूप भूत वेद तथा तत्प्रतिपाद्य यज्ञ की महिमा भी अनन्त अपार है

2-3-पौराणिक यज्ञों का विस्तार अधिक है, अतएव यहाँ इनका पृथक्-पृथक विवेचन करना संभव नहीं हो सकता । साधारणतया पौराणिक यज्ञों में गणपति पूजन, पुण्याहवाचन, षोडशमातृका पूजन, वसोर्धारा पूजन, नान्दी श्राद्ध इन पाँच स्मार्त अंगों के साथ ग्रहयाग प्रधानपूजन आदि विशेष रूप से होता है । इनमें एक से लेकर हजारों तक कार्यक्षम व्यक्ति कार्य के अनुसार 'ऋत्विज्' बनाए जा सकते हैं । पौराणिक यज्ञों के विस्तार में न जाकर यहाँ संक्षेप में परिचय दिया जा रहा हैं ।

30 प्रकार के यज्ञः- 1- स्मार्त यज्ञः- विवाह के अनन्तर विधिपूर्वक अग्नि का स्थापन करके जिस अग्नि में प्रातः सायं नित्य हनादि कृत्य किये जाते है। उसे स्मार्ताग्नि कहते है। गृहस्थ को स्मार्ताग्नि में पका भोजन प्रतिदिन करना चाहिये। 2- श्रोताधान यज्ञः- दक्षिणाग्नि विधिपूर्वक स्थापना को श्रौताधान कहते है।इसमें पितृ संबंधी कार्य होते है। 3- दर्शभूर्णमास यज्ञः- अमावस्या और पूर्णिमा को होने वाले यज्ञ को दर्श और पौर्णमास कहते है। इस यज्ञ का अधिकार सपत्नीक होता है। इस यज्ञ का अनुष्ठान आजीवन करना चाहिए यदि कोई जीवन भर करने में असमर्थ है तो 30 वर्ष तक तो करना चाहिए। 4- चातुर्मास्य यज्ञः- चार-चार महीने पर किये जाने वाले यज्ञ को चातुर्मास्य यज्ञ कहते है इन चारों महीनों को मिलाकर चतुर्मास यज्ञ होता है। 5- पशु यज्ञः- प्रति वर्ष वर्षा ऋतु में या दक्षिणायन या उतरायण में संक्रान्ति के दिन एक बार जो पशु याग किया जाता है। उसे निरूढ पशु याग कहते है। 6- आग्रजणष्टि (नवान्न यज्ञ) :- प्रति वर्ष वसन्त और शरद ऋतुओं नवीन अन्न से यज्ञ गेहूॅं, चावल से जो यज्ञ किया जाता है उसे नवान्न कहते है। 7- सौतामणी यज्ञ (पशुयज्ञ) :- सौतामणी यज्ञ इन्द्र संबन्धी पशुयज्ञ है। इन्द्र के निमित्त जो यज्ञ किया जाता है .. वह दो प्रकार का है। एक वह जो पांच दिन में पूरा होता है और दूसरा पशुयाग कहा जाता है। 8-सोम यज्ञः- सोमलता द्वारा जो यज्ञ किया जाता है उसे सोम यज्ञ कहते है। यह वसन्त में होता है और एक ही दिन में पूर्ण होता है। इस यज्ञ में 16 ऋत्विक ब्राह्मण होते है। 9-वाजपये यज्ञः- इस यज्ञ के आदि और अन्त में वृहस्पति नामक सोम यज्ञ अथवा अग्निष्टोम यज्ञ होता है यह यज्ञ शरद रितु में होता है। 10-राजसूय यज्ञः- राजसूय यज्ञ करने के बाद क्षत्रिय राजा चक्रवर्ती उपाधि को धारण करता है।रामायण काल में श्रीराम और महाभारत काल में महाराज युधिष्ठिर द्वारा यह यज्ञ किया गया था। 11-अश्वमेघ यज्ञ:- इस यज्ञ में दिग्विजय के लिए ( घोड़ा) छोडा जाता है। यह यज्ञ दो वर्ष से भी अधिक समय में समाप्त होता है। इस यज्ञ का अधिकार सार्वभौम चक्रवर्ती राजा को ही होता है। 12- पुरूष मेघयज्ञ:- इस यज्ञ समाप्ति चालीस दिनों में होती है। इस यज्ञ को करने के बाद यज्ञकर्ता गृह त्यागपूर्वक वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश कर सकता है। 13- सर्वमेघ यज्ञ:- इस यज्ञ में सभी प्रकार के अन्नों और वनस्पतियों का हवन होता है। यह यज्ञ चौतीस दिनों में समाप्त होता है। 14-एकाह यज्ञ:- एक दिन में होने वाले यज्ञ को एकाह यज्ञ कहते है। इस यज्ञ में एक यज्ञवान और सौलह विद्वान होते है। 15-रूद्र यज्ञ:- यह तीन प्रकार का होता हैं रूद्र ,महारूद्र और अतिरूद्र रूद्र।रूद्र यज्ञ 5-7-9 दिन में होता हैं ।महारूद्र 9-11 दिन में होता हैं। अतिरूद्र 9-11 दिन में होता है। रूद्रयाग में 16 अथवा 21 विद्वान होते है। महारूद्र में 31 अथवा 41 विद्वान होते है। तथा अतिरूद्र याग में 61 अथवा 71 विद्वान होते है। रूद्रयाग में हवन सामग्री 11 मन, महारूद्र में 21 मन तथा अतिरूद्र में 70 मन हवन सामग्री लगती है। 16- विष्णु यज्ञ:- यह यज्ञ तीन प्रकार का होता है। विष्णु यज्ञ, महाविष्णु यज्ञ और अति विष्णु यज्ञ । विष्णुयज्ञ 5-7-8 अथवा 9 दिन में होता है। महाविष्णु यज्ञ 9 दिन में तथा अतिविष्णु 9 दिन में अथवा 11 दिन में होता हैं। विष्णु याग में 16 अथवा 41 विद्वान होते है। अति विष्णु याग में 61 अथवा 71 विद्वान होते है। विष्णु याग में हवन सामग्री 11 मन ;महाविष्णु याग में 21 मन;तथा अतिविष्णु याग में 55 मन लगती है। 17- हरिहर यज्ञ:- हरिहर महायज्ञ में हरि (विष्णु) और हर (शिव) इन दोनों का यज्ञ होता है। हरिहर यज्ञ में 16 अथवा 21 विद्वान होते है। हरिहर याग में हवन सामग्री 25 मन लगती हैं। यह महायज्ञ 9 दिन अथवा 11 दिन में होता है। 18-शिव शक्ति महायज्ञ:- शिवशक्ति महायज्ञ में शिव और शक्ति (दुर्गा) इन दोनों का यज्ञ होता है। शिव यज्ञ प्रातः काल और मध्याहन में होता है। इस यज्ञ में हवन सामग्री 15 मन लगती है। 21 विद्वान होते है। यह महायज्ञ 9 दिन अथवा 11 दिन में सुसम्पन्न होता है। 19- राम यज्ञ:- राम यज्ञ विष्णु यज्ञ की तरह होता है। रामजी की आहुति होती है। रामयज्ञ में 16 अथवा 21 विद्वान हवन सामग्री 15 मन लगती है। यह यज्ञ 8 दिन में होता है। 20- गणेश यज्ञ:- गणेश यज्ञ में एक लाख (100000) आहुति होती है। 16 अथवा 21 विद्वान होते है। गणेशयज्ञ में हवन सामग्री 21 मन लगती है। यह यज्ञ 8 दिन में होता है। 21- ब्रह्म यज्ञ (प्रजापति यज्ञ):- प्रजापत्ति याग में एक लाख (100000) आहुति होती हैं इसमें 16 अथवा 21 विद्वान होते है। प्रजापति यज्ञ में 12 मन सामग्री लगती है। 8 दिन में होता है। 22- सूर्य यज्ञ:- सूर्य यज्ञ में एक करोड़ 10000000 आहुति होती है। 16 अथवा 21 विद्वान होते है। सूर्य यज्ञ 8 अथवा 21 दिन में किया जाता है। इस यज्ञ में 12 मन हवन सामग्री लगती है। 23- दूर्गा यज्ञ:- दूर्गा यज्ञ में दूर्गासप्तशती से हवन होता है। दूर्गा यज्ञ में हवन करने वाले 4 विद्वान होते है। अथवा 16 या 21 विद्वान होते है। यह यज्ञ 9 दिन का होता है। हवन सामग्री 10 मन अथवा 15 मन लगती है। 24- लक्ष्मी यज्ञ:- लक्ष्मी यज्ञ में श्री सूक्त से हवन होता है। लक्ष्मी यज्ञ (100000) एक लाख आहुति होती है। इस यज्ञ में 11 अथवा 16 विद्वान होते है। या 21 विद्वान 8 दिन में किया जाता है। 15 मन हवन सामग्री लगती है। 25- लक्ष्मी नारायण महायज्ञ:- लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में प्रातः लक्ष्मी और दोपहर में नारायण का यज्ञ होता है। एक लाख 8 हजार अथ्वा 1 लाख 25 हजार आहुतियां होती है। 30 मन हवन सामग्री लगती है। 31 विद्वान होते है। यह यज्ञ 8 दिन ,9 दिन अथवा 11 दिन में पूरा होता है। 26- नवग्रह महायज्ञ:- नवग्रह महायज्ञ में नव ग्रह और नव ग्रह के अधिदेवता तथा प्रत्याधि देवता के निर्मित आहुति होती हैं नव ग्रह महायज्ञ में एक करोड़ आहुति अथवा एक लाख अथवा दस हजार आहुति होती है। 31, 41 विद्वान होते है। हवन सामग्री 11 मन लगती है। कोटिमात्मक नव ग्रह महायज्ञ में हवन सामग्री अधिक लगती हैं यह यज्ञ ९ दिन में होता हैं इसमें 1,5,9 और 100 कुण्ड होते है। नवग्रह महायज्ञ में नवग्रह के आकार के 9 कुण्डों के बनाने का अधिकार है। 27- विश्वशांति महायज्ञ:- विश्वशांति महायज्ञ में शुक्लयजुर्वेद के 36 वे अध्याय के सम्पूर्ण मंत्रों से आहुति होती है। विश्वशांति महायज्ञ में सवा लाख (123000) आहुति होती हैं इस में 21 अथवा 31 विद्वान होते है। इसमें हवन सामग्री 15 मन लगती है। यह यज्ञ 9 दिन अथवा 4 दिन में होता है। 28- पर्जन्य यज्ञ (इन्द्र यज्ञ):- पर्जन्य यज्ञ (इन्द्र यज्ञ) वर्षा के लिए किया जाता है। इन्द्र यज्ञ में तीन लाख बीस हजार (320000) आहुति होती हैं अथवा एक लाख 60 हजार (160000) आहुति होती है। 31 मन हवन सामग्री लगती है। इस में 31 विद्वान हवन करने वाले होते है। इन्द्रयाग 11 दिन में सुसम्पन्न होता है। 29-अतिवृष्टि रोकने के लिए यज्ञ:- अनेक गुप्त मंत्रों से जल में 108 वार आहुति देने से घोर वर्षा बन्द हो जाती है। 30- गोयज्ञ:- वेदादि शास्त्रों में गोयज्ञ लिखे है। वैदिक काल में बडे-बडे़ गोयज्ञ हुआ करते थे। भगवान श्री कृष्ण ने भी गोवर्धन पूजन के समय गौयज्ञ कराया था। गोयज्ञ में वे वेदोक्त गौ सूक्तों से गोरक्षार्थ हवन गौ पूजन वृषभ पूजन आदि कार्य किये जाते है। जिस से गौसंरक्षण गौ संवर्धन, गौवंशरक्षण, गौवंशवर्धन गौमहत्व प्रख्यापन आदि में लाभ मिलता हैं ।गौयज्ञ में ऋग्वेद के मंत्रों द्वारा हवन होता है। इस में सवा लाख 250000 आहुति होती हैं गौयाग में हवन करने वाले 21 विद्वान होते है। यह यज्ञ 8 अथवा 9 दिन में सुसम्पन्न होता है।

NOTE;-

यज्ञ के बहुत से प्रयोजन हुआ करते है।उनमे स्वर्ग की प्राप्ति भी एक परलौकिक प्रयोजन है । यज्ञ का प्रयोजन मात्र स्वर्ग प्राप्ति नही होती अपितु विविध कामनाओं की प्राप्ति भी हुआ करती है । उसके भी कारण देव पूजा ही हुआ करती है।।क्योकि देवता विविध कामनाओं को पूर्ण किया करते है।

ऋग्वेद केअनुसार;-

''अन्नहीन यज्ञ से राष्ट्र का , मंत्र हीन यज्ञ से पुरोहित का , ब्राह्मण से हीन ओर दक्षिणा से हीन यज्ञ करने से यजमान का नाश होता है । अतः संपूर्ण विधि विधान से रहित यज्ञ न करे ''।

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गृहस्थ धर्म के यज्ञ कौन -कौन से है?;-

05 FACTS;-

हिन्दू धर्म-ग्रन्थों के अनुसार प्रत्येक गृहस्थ हिन्दू को पाँच यज्ञों को अवश्य करना चाहिए-

1-ब्रह्म-यज्ञ ;-

प्रतिदिन अध्ययन और अध्यापन करना ही ब्रह्म-यज्ञ है।

2-देव-यज्ञ; -

देवताओं की प्रसन्नता हेतु पूजन-हवन आदि करना।

3-पितृ-यज्ञ; - 'श्राद्ध' और 'तर्पण' करना ही पितृ-यज्ञ है।

4-भूत-यज्ञ; -

'बलि' और 'वैश्व देव' की प्रसन्नता हेतु जो पूजा की जाती है, उसे 'भूत-यज्ञ' कहते हैं ।पवित्रता की प्रतीक गऊ के निमित्त गोबलि ,कत्तर्व्यनिष्ठा के प्रतीक श्वान के निमित्त कुक्कुरबलि,मलीनता निवारक काक के निमित्त काकबलि,देवत्व संवधर्क शक्तियों के निमित्त देवबलि,श्रमनिष्ठा एवं सामूहिकता की प्रतीक चींटियों के निमित्त- पिपीलिकादिबलि। गोबलि गऊ को, कुक्कुरबलि श्वान को, काकबलि पक्षियों को, देवबलि कन्या को तथा पिपीलिकादिबलि चींटी आदि को खिला दी जाती है।

5-मनुष्य-यज्ञ ;-

5-1-इसके अन्तर्गत अतिथि-सत्कार,श्राद्ध आदिआता है।कन्या भोजन, दीन-अपाहिज, अनाथों को ज़रूरत की चीज़ें देना, इस प्रक्रिया के प्रतीकात्मक उपचार हैं। इसके लिए तथा लोक हितकारी पारमाथिर्क कार्यो ( वृक्षारोपण, विद्यालय निर्माण) के लिए दिये जाने वाले दान की घोषणा श्राद्ध संकल्प के साथ की जानी चाहिए।

5-2-पूवर्जों के छोड़े हुए धन में कुछ अपनी ओर से श्रद्धाञ्जलि मिलाकर उनकी आत्मा के कल्याण के लिए दान कर देना चाहिए ।श्रद्धा की वास्तविक परीक्षा उस श्राद्ध में है कि पूवर्जों की कमाई को उन्हीं की सद्गति के लिए, सत्कर्मो के लिए दान रूप में समाज को वापस कर दिया जाए। अपनी कमाई का जो सदुपयोग, मोह या लोभवश स्वर्गीय आत्मा नहीं कर सकी थी, उस कमी की पूर्ति उसके उत्तराधिकारियों को कर देनी चाहिए। श्राद्धधन परमार्थ प्रयोजन के लिए लगा देना चाहिए, जिससे जनमानस में सद्ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न हो और वे कल्याणकारी सत्पथ पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करें ।

...SHIVOHAM...