क्या है भारतीय संस्कृति में 16 संस्कार?



संस्कार का क्या अर्थ है?-

03 FACTS;-

1-संस्कृत भाषा का शब्द है संस्कार। मन, वचन, कर्म और शरीर को पवित्र करना ही संस्कार है। हमारी सारी प्रवृतियों और चित्तवृत्तियों का संप्रेरक हमारे मन में पलने वाला संस्कार होता है। संस्कार से ही हमारा सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन पुष्ट होता है और हम सभ्य कहलाते हैं।व्यक्तित्व निर्माण में हिन्दू संस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।संस्कार मनुष्य को पाप और अज्ञान से दूर रखकर आचार-विचार और ज्ञान-विज्ञान से संयुक्त करते हैं।सोलह संस्कार बताए गए हैं।वेदज्ञों अनुसार गर्भस्थ शिशु से लेकर मृत्युपर्यंत जीव के मलों का शोधन, सफाई आदि कार्य को विशिष्ट विधि व मंत्रों से करने को संस्कार कहा जाता है। यह इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति जब शरीर त्याग करे तो सद्गति को प्राप्त हो।इन संस्कारों के अनुसार जीवन-यापन करने से मनुष्य जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

2-हिंदू धर्म में सोलह संस्कारों का बहुत महत्व है।ये संस्कार ही प्रत्येक जन्म में संगृहीत (एकत्र) होते चले जाते हैं, जिससे कर्मों (अच्छे-बुरे दोनों) का एक विशाल भंडार बनता जाता है। इसे संचित कर्म कहते हैं। इन संचित कर्मों का कुछ भाग एक जीवन में भोगने के लिए उपस्थित रहता है और यही जीवन प्रेरणा का कार्य करता है। अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में अच्छे-बुरे कर्म करता है। फिर इन कर्मों से अच्छे-बुरे नए संस्कार बनते रहते हैं तथा इन संस्कारों की एक अंतहीन श्रृंखला बनती चली जाती है, जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

3-प्राचीन काल में हमारा प्रत्येक कार्य संस्कार से आरम्भ होता था। उस समय संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वत: विलुप्त हो गये। इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या निर्धारित होती गई। गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के तथा व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है। वेद, स्मृति और पुराणों में अनेकों संस्कार बताए गए है किंतु उनमें से मुख्य सोलह संस्कारों में ही सारे संस्कार सिमट जाते हैं अत: इन संस्कारों के नाम निम्नानुसार हैं... 1.गर्भाधान संस्कार 2. पुंसवन संस्कार 3.सीमन्तोन्नयन संस्कार 4.जातकर्म संस्कार 5.नामकरण संस्कार 6.निष्क्रमण संस्कार 7.अन्नप्राशन संस्कार 8.मुंडन/चूडाकर्म संस्कार 9.विद्यारंभ संस्कार 10.कर्णवेध संस्कार 11. यज्ञोपवीत संस्कार 12. वेदारम्भ संस्कार 13. केशान्त संस्कार 14. समावर्तन संस्कार 15. विवाह संस्कार 16.अन्त्येष्टि संस्कार/श्राद्ध संस्कार 1.गर्भाधान संस्कार;- हमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गार्हस्थ्य जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए। दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है।विवाह उपरांत की जाने वाली विभिन्न पूजा और क्रियायें इसी का हिस्सा हैं. गर्भाधान मुहूर्त जिस स्त्री को जिस दिन मासिक धर्म हो,उससे चार रात्रि पश्चात सम रात्रि में जबकि शुभ ग्रह केन्द्र (1,4,7,10 ) तथा त्रिकोण (1,5,9 ) में हों,तथा पाप ग्रह (3,6,11) में हों ऐसी लग्न में पुरुष को पुत्र प्राप्ति के लिये अपनी स्त्री के साथ संगम करना चाहिये। मृगशिरा ,अनुराधा ,श्रवण ,रोहिणी ,हस्त ,तीनों उत्तरा, स्वाति ,धनिष्ठा और शतभिषा इन नक्षत्रों में षष्ठी को छोड कर अन्य तिथियों में तथा दिनों में गर्भाधान करना चाहिये,भूल कर भी शनिवार मंगलवार गुरुवार को पुत्र प्राप्ति के लिये संगम नही करना चाहिये। 2.पुंसवन संस्कार;-

04 POINTS;- 1-गर्भ के तीसरे माह में विधिवत पुंसवन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है, क्योंकि इस समय तक गर्भस्थ शिशु के विचार तंत्र का विकास प्रारंभ हो जाता है। शास्त्रों में गर्भ को पूज्य माना गया है, क्योंकि माता के गर्भ के माध्यम से जो जीव मनुष्य रूपी संसार का हिस्सा बनना चाहता है उसे खासतौर पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है।गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाता है।हिन्दू धर्म में, संस्कार परम्परा के अंतर्गत भावी माता-पिता को यह तथ्य समझाए जाते हैं कि शारीरिक, मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के साथ ही संतान पैदा करने की पहल करें । उसके लिए अनुकूल वातवरण भी निर्मित किया जाता है।

2-वेद मंत्रों, यज्ञीय वातावरण एवं संस्कार सूत्रों की प्रेरणाओं से शिशु के मानस पर तो श्रेष्ठ प्रभाव पड़ता ही है, अभिभावकों और परिजनों को भी यह प्रेरणा मिलती है कि भावी माँ के लिए श्रेष्ठ मनःस्थिति और परिस्थितियाँ कैसे विकसित की जाए ।इसके अलावा गर्भवती स्त्री को इस बात का आश्वासन देना भी अनिवार्य होता है कि, वो शिशु के गर्भ में रहने के दौरान हर प्रकार के ईर्ष्या, क्रोध, दोष और अन्य प्रकार के सभी विकारों से खुद को दूर रखेगी और शिशु के उज्जवल भविष्य की कामना में ही अपना ज्यादातर समय देगी।

3-पुंसवन संस्कार के दौरान सबसे पहले गिलोय वृक्ष के तने से कुछ बूँदे निकालकर मंत्रोउच्चारण के साथ गर्भवती महिला की नासिका छिद्र पर लगाया जाता है। गिलोय के रस को खासतौर से कीटाणुरहित और रोगनाशक माना जाता है। इस संस्कार को करते समय विशेष रूप से गिलोय के रस को औषधि के रूप में किसी कटोरे में लेकर गर्भवती स्त्री को दिया जाता है। इस दौरान संस्कार में उपस्थित लोग विशेष रूप से “ॐ अदभ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च, विश्वकर्मणः संवर्त्तताग्रे। तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति, तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे। “ मंत्र का उच्चारण करते हैं। मान्यता है कि मंत्रोउच्चारण के बीच गर्भवती स्त्री अपने दाहिने हाथ से औषधि को अपनी नासिका के ऊपर लगाकर श्वास को अंदर खींचें। जिस दौरान, होने वाले शिशु के पिता सहित परिवार के अन्य सभी सदस्य भी अपना दाहिना हाथ गर्भवती स्त्री के पेट पर रखें और उपरोक्त मन्त्र का जाप करते हुए भगवान से शिशु को अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करने की प्रार्थना करे । 4-क्रिया और भावना...इस क्रिया के दौरान सबसे पहले गर्भवती स्त्री अपने दायें हाथ को पेट पर रखती है और उसके बाद पिता एवं परिवार के अन्य सदस्य भी अपना दाहिना हाथ गर्भवती स्त्री के पेट पर रखकर दैवीय शक्ति को इस मंत्रोउच्चारण के के द्वारा शिशु के उचित विकास के लिए आश्वस्त करते हैं...

“ॐ यत्ते सुशीमे हृदये हितमन्तः प्रजापतौ। मन्येहं मां तद्विद्वांसं, माहं पौत्रमघनिन्याम। …गर्भ पूजन के लिए गर्भिणी के घर परिवार के सभी वयस्क परिजनों के हाथ में अक्षत, पुष्प आदि दिये जाएँ ..मन्त्र बोला जाए ।मंत्र समाप्ति पर एक तश्तरी में अक्षत, पुष्प आदि एकत्रित करके गर्भिणी को दिया जाए । वह उसे पेट से स्पर्श करके रख दे । उस समय भावना की जाए,कि गर्भस्थ शिशु को सद्भाव और देव अनुग्रह का लाभ देने के लिए पूजन किया जा रहा है । गर्भिणी उसे स्वीकार करे कि वह गर्भ को लाभ पहुँचाने में सहयोग कर रही है । 3.सीमन्तोन्नयन;- सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है। 4.जातकर्म;-

02 POINTS;- 1-जब महिला को दर्द शुरू होता है ,तब दीवाल पर उससे एक तेल का हाथ लगवा देते हैं और सवा किलो गेहूं नीचे रख कर उसके दो भाग करा देते है और अपने पितरों को भी याद करके प्रार्थना करते है ।बच्चा के जन्म लेते ही घड़ी देखते है फ़िर

घर के बुजुर्ग व्यक्ति से एक गुड का गोला बना कर घी लगाकर पिंड दान के नाम पर गेहूं के पास रख देते हैं। ऐसा करने से हमारी तीन पीढ़ी के पितर तृप्त हो कर स्वर्ग चले जाते है और उसके बाद बच्चे का नाल काटते है।नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत गुरु मंत्र के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।इसके बाद सूतक माना जाता है जो पाँच दिन का होता है।

2-छठी संस्कार ---लड़की की छठी पञ्च दिन में और लड़का की छठी छः दिन में करते है । इस दिन जच्चा बच्चा स्नान करते है और इस सफाई के बाद सूतक समाप्त हो जाती है।इसके बाद शाम को जहाँ तेल का हाथ लगाया था वहां पर आटे का चौक बना कर गेहूं के ऊपर तेल का दीपक जलावें और बच्चे को गोद में लेकर चौकी पर जच्चा बैठ जावे ।घर की बुजुर्ग महिला अपने कुल देवता और छठी माता की पूजा करते हैं।बच्चे को दीपक का उजाला नही दिखाते हैं। फ़िर मूंग दाल , 6 रोटी , 6 बड़ा , 6 पुड़ी ,6 पकौड़ी ,कड़ी ,चावल ,खीर, पुआ आदि एक थाली में रख कर कुल देवता को भोग लगाते है और नन्द भाभी एक ही थाली में खाते है । 5.नामकरण संस्कार;-

05 POINTS;-

1-यह संस्कार बच्चे के पैदा होने के 10 दिन बाद किसी शुभ मुहुर्त पर किया जाता है। जन्म के 10 वें दिन में 100 वें दिन में या

1 वर्ष के अंदर जातक का नामकरण संस्कार कर देना चाहिए।नामकरण-संस्कार के संबंध में स्मृति-संग्रह में निम्नलिखित श्लोक उक्त है- ऐसा माना जाता है कि शिशु के नाम प्रभाव उसके व्यक्तित्व व आचार-व्यवहार पर पड़ता है। अच्छा नाम उसे गुणकारी व संस्कारी इंसान बनने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए, नाम हमेशा अर्थपूर्ण होना चाहिए। साथ ही नामकरण संस्कार के दिन शिशु को नई पहचान मिलती है, जिससे उसे जीवन भर पहचाना जाता है। यही कारण है कि हिंदू धर्म में नामकरण संस्कार का अपना महत्व है।नामकरण संस्कार के समय शिशु कन्या है या पुत्र, इसके भेदभाव को स्थान नहीं देना चाहिए । भारतीय संस्कृति में शीलवती कन्या को दस पुत्रों के बराबर कहा गया है ।इसके विपरीत पुत्र भी कुल धर्म को नष्ट करने वाला हो सकता है। इसलिए पुत्र या कन्या जो भी हो, उसके भीतर के अवांछनीय संस्कारों का निवारण करके श्रेष्ठतम की दिशा में प्रवाह पैदा करने की दृष्टि से नामकरण संस्कार कराया जाना चाहिए ।

2-नामकरण संस्कार से आयु एवं तेज में वृद्धि होती है। नाम की प्रसिद्धि से व्यक्ति का लौकिक व्यवहार में एक अलग अस्तित्व उभरता है।मंदिर को नामकरण संस्कार के लिए शुभ और शुद्ध स्थान माना जाता है, लेकिन अगर आप इसे घर में करते हैं, तो पहले घर की अच्छी तरह साफ-सफाई जरूर करें।शिशु तथा माता को भी स्नान कराके नये स्वच्छ वस्त्र पहनाये जाते हैं ।यदि दसवें दिन किसी कारण नामकरण संस्कार न किया जा सके ।तो अन्य किसी दिन, बाद में भी उसे सम्पन्न करा लेना चाहिए । घर पर, प्रज्ञा संस्थानों अथवा यज्ञ स्थलों पर भी यह संस्कार कराया जाना उचित है ।बच्चे का नाम उसके आने वाले जीवन पर काफी प्रभाव डालता है। काफी हद तक नाम के अनुसार ही बच्चे का स्वभाव तय होता है। हिंदू धर्म में माना जाता है कि अगर शिशु का नाम उसके कुंडली के अनुसार न रखा जाए, तो उससे शिशु को भविष्य में कई परेशानियां का सामना करना पड़ता है। इसलिए, माता-पिता अपने बच्चे का नाम बड़े ही ध्यान से रखते हैं। आमतौर पर नाम रखते समय पांच प्रकार के सिद्धांतों का पालन किया जाता है, जो इस प्रकार हैं – नक्षत्रनामा (ग्रहों की दशा के अनुसार), देवतानामा (परिवार के ईष्ट देव पर), मासनामा (महीने के आधार पर), संस्कारीकामा (सांसारिक नाम) व राशिनामा (राशि के आधार पर)।भारतीय परंपरा में बच्चे के जन्म पर उस समय और दिन के हिसाब से, सौर्यमंडल की स्थिति को देखकर नामकरण किया जाता है

3-आप जो भी ध्वनि उत्पन्न करते हैं और उस ध्वनि के संकेत के रूप में जिस आकृति का इस्तेमाल करते हैं, उन दोनों का आपस में संबंध होता है और इन्हें ही मंत्र कहा जाता है।संस्कृत की वर्णमाला इस ब्रह्मांड की एक खास समझ से पैदा हुई है। मंत्र का मतलब एक ऐसी ध्वनि है जो पवित्र है और यंत्र का मतलब एक ऐसी आकृति है जो उस ध्वनि से संबंधित है। किसी भी ध्वनि के साथ एक आकृति भी जुड़ी होती है। इसी तरह हर आकृति के साथ एक खास ध्वनि जुड़ी होती है।लोगों के जीवन को बदलने के लिए आपको सही आवृति की ध्वनि पैदा करनी होगी।यह एक बेहद सूक्ष्म पहलू है कि जैसे ही आप कोई शब्द कहें तो वह आपके आसपास का सारा वातावरण ही बदल दे।जब एक बच्चे का जन्म होता है तो उस दिन और समय के हिसाब से लोग सौरमंडल की ज्यामितीय स्थिति का आकलन करते हैं और इसके आधार पर एक ऐसी खास ध्वनि तय करते हैं जो नवजात बच्चे के लिए सर्वश्रेष्ठ हो।

4-नाम सिर्फ अक्षर ही नहीं है बल्कि यह सौभाग्य, अच्छी सेहत, पैसा आदि की कुंजी है। अंकज्योतिष में भी नाम को बहुत अहमियत दी गई है। ज्योतिष विज्ञान में नाम का पहला अक्षर बहुत महत्व रखता है। दो तरह के नाम रखने का विधान है। एक गुप्त नाम जिसे सिर्फ जातक के माता पिता जानते हों तथा दूसरा प्रचलित नाम जो लोक व्यवहार में उपयोग में लाया जाये। नाम गुप्त रखने का कारण जातक को मारक , उच्चाटन आदि तांत्रिक क्रियाओं से बचाना है। प्रचलित नाम पर इन सभी क्रियाओं

का असर नहीं होता.. विफल हो जाती हैं।गुप्त नाम बालक के जन्म के समय ग्रहों की खगोलीय स्थिति के अनुसार नक्षत्र राशि का विवेचन कर के रख जाता है। इसे राशि नाम भी कहा जाता है। बालक की ग्रह दशा भविष्य फल आदि इसी नाम से देखे जाते हैं।नामकरण संस्कार के लिए अनुराधा, पुनर्वसु, माघ, उत्तरा, उत्तराषाढा, उत्तरभाद्र, शतभिषा, स्वाती, धनिष्ठा, श्रवण,

रोहिणी, अश्विनी, मृगशिर, रेवती, हस्त और और पुश्य नक्षत्रों को सबसे उत्तम माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार, नामकरण संस्कार के लिए चंद्र दिवस के चौथे दिन, छठे दिन, आंठवें दिन, नौवें दिन , बारहवें दिन और चौदहवें दिन की तिथि उत्तम मानी जाती है। पूर्णिमा और अमावस्या तिथि पे नामकरण संस्कार बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

5-विशेष व्यवस्था...

1-नामकरण संस्कार के लिए विशेष रूप से इन व्यवस्थाओं पर ध्यान देना चाहिए। अभिषेक के लिए कलश-पल्लव युक्त हो तथा कलश के कण्ठ में कलावा बाँध हो, रोली से ॐ, स्वस्तिक आदि शुभ चिह्न बने हों।

2-शिशु की कमर में बाँधने के लिए मेखला सूती या रेशमी धागे की बनी होती है। न हो, तो कलावा के सूत्र की बना लेनी चाहिए।

3-मधु प्राशन के लिए शहद तथा चटाने के लिए चाँदी की चम्मच। वह न हो, तो चाँदी की सलाई या अँगूठी अथवा स्टील की चम्मच आदि का प्रयोग किया जा सकता है।

4-संस्कार के समय जहाँ माता शिशु को लेकर बैठे, वहीं वेदी के पास थोड़ा सा स्थान स्वच्छ करके, उस पर स्वस्तिक चिह्न बना दिया जाए। इसी स्थान पर बालक को भूमि स्पर्श कराया जाए।

5-नाम घोषणा के लिए थाली, सुन्दर तख्ती आदि हो। उस पर निर्धारित नाम पहले से सुन्दर ढंग से लिखा रहे। चन्दन रोली से लिखकर, उस पर चावल तथा फूल की पंखुड़ियाँ चिपकाकर, नाम लिखे जा सकते हैं। थाली, ट्रे या तख्ती को फूलों से सजाकर उस पर एक स्वच्छ वस्त्र ढककर रखा जाए। नाम घोषणा के समय उसका अनावरण किया जाए।

6-विशेष आहुति के लिए खीर, मिष्टान्न या मेवा जिसे हवन सामग्री में मिलाकर आहुतियाँ दी जा सकें।

7-शिशु को माँ की गोद में रहने दिया जाए। पति उसके बायीं ओर बैठे। यदि शिशु सो रहा हो या शान्त रहता है, तो माँ की गोद में प्रारम्भ से ही रहने दिया जाए। इसके पश्चात् पिता, बुआ या दादी शिशु के दाहिने कान की ओर उसके नाम का उच्चारण करते हैं।नाम की घोषणा के साथ सभी लोग कहें...शिशु चिरंजीवी हो। (तीन बार) शिशु धर्मशील हो। (तीन बार) शिशु प्रगतिशील हो। (तीन बार)इसके बाद माता शिशु को उसके पिता की गोद में दें।पिता अन्य परिजनों को दें।एक दूसरे के हाथ में जाता हुआ, प्यार पाता हुआ शिशु पुनः मां के पास पहुंच जाए।इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर और

प्यार-दुलार के साथ सूर्यदेव के दर्शन कराए जाते हैं।इस अवसर पर कामना की जाती है कि बच्चा सूर्य की प्रखरता एवं ते‍जस्विता धारण करे। 6.निष्क्रमण्;- निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। हमारा शरीर मुख्यतया पांच चीज़ों से मिलकर बना होता है जिनमें अग्नि, वायु, मिट्टी, जल व आकाश होता है। जन्म के कुछ माह तक शिशु इनसे सीधे संपर्क नही कर सकता अन्यथा उसके शरीर में इनका संतुलन बिगड़ सकता है जो उसके लिए हानिकारक होता है। इसलिये तब तक उसे घर में रखा जाता है।इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। 7.अन्नप्राशन संस्कार;-