हरिद्वार /मायापुरी में स्थित प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर




हरिद्वार;-

03 POINTS;-

1-हिन्दू धर्म में मोक्ष पाने को बेहद महत्व दिया जाता है। हिन्दू पुराणों के अनुसार सात ऐसी पुरियों का निर्माण किया गया है, जहां इंसान को मुक्ति प्राप्त होती है। मोक्ष यानी कि मुक्ति, जो इंसान को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति देती है। इन मोक्ष दायिनी पुरियों में शरीर त्यागना मनुष्य जीवन के लिए सभी मूल्यवान वस्तुओं से ऊपर है।हिन्दू धर्म के अनुसार सातमोक्षदायी पुरियाँ है ..

अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥

2-अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, काञ्चीपुरम, अवन्तिका (उज्जैन), द्वारिकापुरी, ये सात मोक्षदायी पुरियाँ हैं। हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है।3129 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गोमुख (गंगोत्री हिमनद) से 253 किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में मैदानी क्षेत्र में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को 'गंगाद्वार' के नाम से भी जाना जाता है; जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ पर गंगाजी मैदानों में प्रवेश करती हैं। हरिद्वार का अर्थ "हरि (ईश्वर) का द्वार"

होता है।पश्चात्कालीन हिंदू धार्मिक कथाओं के अनुसार, हरिद्वार वह स्थान है जहाँ अमृत की कुछ बूँदें भूल से घड़े से गिर गयीं जब धन्वन्तरी उस घड़े को समुद्र मंथन के बाद ले जा रहे थे। मान्यता है कि चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरी थीं। वे स्थान हैं:- उज्जैन, हरिद्वार, नासिक और प्रयाग। इन चारों स्थानों पर बारी-बारी से हर 12 वें वर्ष महाकुम्भ का आयोजन होता है। एक स्थान के महाकुम्भ से तीन वर्षों के बाद दूसरे स्थान पर महाकुम्भ का आयोजन होता है।

3-इस प्रकार बारहवें वर्ष में एक चक्र पूरा होकर फिर पहले स्थान पर महाकुम्भ का समय आ जाता है। पूरी दुनिया से करोड़ों तीर्थयात्री, भक्तजन और पर्यटक यहां इस समारोह को मनाने के लिए एकत्रित होते हैं और गंगा नदी के तट पर शास्त्र विधि से

स्नान इत्यादि करते हैं।एक मान्यता के अनुसार वह स्थान जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी थीं उसे हर की पौड़ी पर ब्रह्म कुण्ड माना जाता है और सबसे पवित्र घाट माना जाता है। यहाँ स्नान करना मोक्ष प्राप्त करवाने वाला माना जाता है।शैव व वैष्णव साधना का यह गढ़ शाक्त साधना का भी गढ़ है। विल्केश्वर, दक्षेश्वर, कोटिश्वर जैसे सिद्ध शिव मन्दिर के कारण यह महातीर्थ शैव क्षेत्र ‘हरद्वार’ कहलाता है तो हरिपद यानि हर की पैड़ी तीर्थ के कारण वैष्णव क्षेत्र। हरिद्वार व चण्डी देवी समेत माया देवी, मनसा देवी, दक्षिण काली मन्दिर के चलते शाक्त यानि शक्ति की देवी का क्षेत्र- अहोगंग और मायापुरी कहलाता है ।

1-हर की पौड़ी;-

02 POINTS;- 1-हर की पौड़ी या हरि की पौड़ी भारत के उत्तराखण्ड राज्य की एक धार्मिक नगरी हरिद्वार का एक पवित्र और सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। इसका भावार्थ है "हरि यानी नारायण के चरण"।हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मन्थन के बाद जब विश्वकर्माजी अमृत के लिए झगड़ रहे देव-दानवों से बचाकर अमृत ले जा रहे थे तो पृथ्वी पर अमृत की कुछ बूँदें गिर गई और वे स्थान धार्मिक महत्व वाले स्थान बन गए।अमृत की बूँदे हरिद्वार में भी गिरी और जहाँ पर वे गिरी थीं वह स्थान हर की पौड़ी था। यहाँ पर स्नान करना हरिद्वार आए हर श्रद्धालु की सबसे प्रबल इच्छा होती है क्योंकि यह माना जाता है कि यहाँ पर स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। 2-हर की पौड़ी या ब्रह्मकुण्ड पवित्र नगरी हरिद्वार का मुख्य घाट है। ये माना गया है कि यही वह स्थान है जहाँ से गंगा नदी पहाड़ों को छोड़ मैदानी क्षेत्रों की दिशा पकड़ती है। इस स्थान पर नदी में पापों को धो डालने की शक्ति है और यहाँ एक पत्थर में श्रीहरि के पदचिह्न इस बात का समर्थन करते हैं। यह घाट गंगा नदी की नहर के पश्चिमी तट पर है जहाँ से नदी उत्तर दिशा की ओर मुड़ जाती है। हर शाम सूर्यास्त के समय साधु संन्यासी गंगा आरती करते हैं, उस समय नदी का नीचे की ओर बहता जल पूरी तरह से रोशनी में नहाया होता है।

2- माया देवी शक्तिपीठ;-

03 POINTS;- 1-हरिद्वार का माया देवी शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां सती की नाभि गिरी थी ।पौराणिक मान्यता के अनुसार जब सती ने अपने पिता के यज्ञ में अपने पति को नहीं बुलाए जाने से अपमानित होने पर आत्मदाह कर लिया था और अपने शरीर को वहीं सतीकुंड पर छोड़कर महामाया रूप में हरिद्वार के इसी स्थान पर आ गई थीं। इसीलिए इस जगह का नाम मां मायादेवी पड़ा। इसी के बाद से हरिद्वार को भी मायापुरी के नाम से जाना जाने लगा और ये स्थान देश की सात पुरियों में

शामिल हो गया। माया देवी को हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, जिसका इतिहास 11 शताब्दी से उपलब्ध है। प्राचीन काल से माया देवी मंदिर में देवी की पिंडी विराजमान है और 18वीं शताब्दी में इस मंदिर में देवी की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई। इस मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही तंत्र साधना भी की जाती है।

2-हरिद्वार में भगवती की नाभि गिरी थी, इसलिए इस स्थान को ब्रह्मांड का केंद्र भी माना जाता है। हरिद्वार की रक्षा के लिए एक अद्भुत त्रिकोण विद्यमान है। इस त्रिकोण के दो बिंदु पर्वतों पर मां मनसा और मां चंडी रक्षा कवच के रूप में स्थित है तो वहीं त्रिकोण का शिखर धरती की ओर है और उसी अधोमुख शिखर पर भगवती माया आसीन हैं। मां माया देवी मंदिर के साथ ही भैरव बाबा का मंदिर भी मौजूद है और मान्यता है कि मां की पूजा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक भक्त भैरव बाबा का दर्शन पूजन कर उनकी आराधना नहीं कर लेते।

3-मां के इस दरबार में मां माया के अलावा मां काली और देवी कामाख्या के दर्शनों का भी सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है। जहां मां काली देवी माया के बायीं और तो वहीं दाहिंनी ओर मां कामाख्या विराजमान हैं। मां माया के आशीर्वाद से बिगड़े काम भी बन जाते हैं और सफलता की राह में आ रही बाधाएं दूर हो जाती हैं। मां के चमत्कारों की कहानी लंबी है और महिमा अनंत। 3-मनसा देवी मंदिर;-

02 POINTS;- 1-मनसा देवी मंदिर हरिद्वार में बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर देवी मनसा देवी को समर्पित है। यह ‘विल्वक’ पर्वत पर स्थित है।मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। महाभारतके अनुसार इनका वास्तविक नाम जरत्कारु है और इनके समान नाम वाले पति मुनि जरत्कारु तथा पुत्र आस्तिक जी हैं। इन्हें नागराज वासुकी की बहन के रूप में पूजा जाता है, प्रसिद्ध मंदिर एक शक्तिपीठ पर हरिद्वार में स्थापित है। कई पुरातन धार्मिक ग्रंथों में इनका जन्म कश्यप के मस्तक से हुआ हैं, ऐसा भी बताया गया है। कुछ ग्रंथों में लिखा है कि वासुकि नाग द्वारा बहन की इच्छा करने पर शिव नें उन्हें इसी कन्या का भेंट दिया और वासुकि इस कन्या के तेज को न सह सका और नागलोक में जाकर पोषण के लिये तपस्वी हलाहल को दे दिया। इसी मनसा नामक कन्या की रक्षा के लिये हलाहल नें प्राण त्यागा।इन्हें कश्यप की पुत्री तथा नागमाता के रूप में माना जाता था तथा साथ ही शिव पुत्री, विष की देवी के रूप में भी माना जाता है।

2-14 वी सदी के बाद इन्हे शिव के परिवार की तरह मंदिरों में आत्मसात किया गया। यह मान्यता भी प्रचलित है कि इन्होने शिव को हलाहल विष के पान के बाद बचाया था, परंतु यह भी कहा जाता है कि मनसा का जन्म समुद्र मंथन के बाद हुआ।विष की देवी के रूप में इनकी पूजा झारखंड बिहार और बंगाल मे बड़े धूमधाम से हिन्दी और बंग्ला पंचांग के अनुसार भादो

महीने मे इनकी स्तुति होती है। इनके सात नामों के जाप से सर्प का भय नहीं रहता। ये नाम इस प्रकार है जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तिकमाता और विषहरी।मनसा देवी

मुख्यत: सर्पों से आच्छादित तथा कमल पर विराजित हैं 7 नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं। कई बार देवी के चित्रों तथा भित्ति चित्रों में उन्हें एक बालक के साथ दिखाया गया है जिसे वे गोद में लिये हैं, वह बालक देवी का पुत्र आस्तिक है। 4-चंडी देवी मंदिर(शक्तिपीठ);-

02 POINTS;-

1- चंडी देवी मंदिर नील पर्वत के ऊपर स्थित शक्तिपीठ के रूप में माना जाता है , जहाँ सभी की मनोकामना पूर्ण होती है | यह हरिद्वार में स्थित तीन पीठो में से एक है , दूसरा मनसा देवी मंदिर है और तीसरा माया देवी मंदिर है |चंडी देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है ।इस मंदिर को “नील पर्वत” तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है |नील पर्वत को नागवंशीय ‘नील-नाग’ और नीलकंठ तीर्थ से भी जोड़ते हैं। कहते हैं नीलकंठ महादेव भक्तों की रक्षा के लिए इसी पर्वत पर रहे और साथ में आसीन हुई माँ चण्डी देवी।

2- देवी अराधक ‘शाक्त सम्प्रदाय’ में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती इन तीनों के ‘एकीकृत विग्रह’ यानि तीनों महादेवियों के एक संयुक्त अवतार को ही चण्डी अथवा दुर्गा कहा जाता है। चंडी देवी मंदिर का निर्माण 1929 में सुचात सिंह , कश्मीर के राजा ने अपने शासनकाल के दौरान करवाया था परंतू मंदिर में स्थित चंडी देवी की मुख्य मूर्ति की स्थापना 8वी शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने की थी ,जो कि हिन्दू धर्म के सबसे बड़े पुजारियों में से एक है शुंभ निशुंभ को मारने के बाद देवी चंडी ने नील पर्वत के शिखर पर विश्राम किया था।इसी के बाद यहां के मंदिर का निर्माण करवाया गया ।पहाड़पुर स्थित दो चोटियों को शुंभ और निशुंभ कहा जाता है।मनसा और चंडी देवी माता पार्वती के ही दो स्वरुप है , जो गंगा के तटो के सामने मौजूद है |नील पर्वत के आधार पर निल्केश्वर मंदिर भी है |

NOTE;-

इस पावन पीठ की एक और विशेषता यह है कि रामभक्त हनुमान की माताश्री ‘अंजनि’ का जग प्रसिद्ध एकमात्र मन्दिर भी यहीं इसी मन्दिर के पास ही है।चंडी देवी मंदिर के निकट अंजना का मंदिर स्थित है , जो कि हनुमान जी की माता थी | चंडी मंदिर आने वाले सभी श्रद्धालु इस मंदिर में जरुर जाते है | 5-गौरीशंकर महादेव मंदिर;- गौरी-शंकर महादेव का मंदिर हरिद्वार के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है।यह मंदिर चंडी देवी मंदिर के पास ही है। इस मंदिर का वर्णन शिवपुराण में किया गया है।भगवान् शिव को समर्पित यह मंदिर हरिद्वार के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। एक लोककथा के अनुसार यहाँ लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।नील पर्वत की छांव में भगवान शिव और माता गौरी का एक ऐसा अलौकिक व प्राचीन मंदिर है जहां सती के साथ विवाह के बाद भगवान शिव ने निवास किया था।यहां भगवान शंकर और गौरी के निवास कक्ष का ढांचा आज भी मौजूद है।बदलते वक्त के साथ इस स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया, जिसे गौरी शंकर मंदिर के नाम से जाना जाता है। 6-बिल्केश्वर महादेव मंदिर/;- बिल्केश्वर महादेव मंदिर , भगवान शिव शंकर का धाम है एवम् हरिद्वार के पास स्थित “बिल्व पर्वत” पर बना है | यह एक छोटा मंदिर है , जो सामान्य शिवलिंग और नंदी के साथ पत्थर से बना है एवम् यह मंदिर एक पहाड़ी क्षेत्र में जंगल से घिरा हुआ है ।इस जगह में भगवान गणेश , भगवान हनुमान , महादेव और माता रानी के छोटे मंदिर भी स्थित है । यहाँ भगवान शिव के लिए बैल की पत्तियों की पेशकश करने और गंगा नदी के पानी के साथ शिवलिंग के अभिषेक करने की परंपरा है ।इस मंदिर में बिल्वकेश्वर महादेव शेषनाग के नीचे लिंग रूप में विराजे है |स्थानीय लोगों में यह प्राचीन मंदिर बहुत लोकप्रिय है । इस स्थान के बारे में यह कहते हैं कि माता पार्वती यहां बेलपत्र खाकर अपनी भूख शांत किया करती थी , लेकिन जब पीने के लिए पानी की समस्या आती थी तब देवताओं के आग्रह पर स्वयं परमपिता ब्रह्मा अपने कमंडल से गंगा की जलधारा प्रकट करते थे |

7-गौरी कुंड;- बिल्केश्वर महादेव मंदिर से महज 50 कदम की दूरी पर “गौरी कुंड” के नाम से प्रसिद्ध है |बिल्केश्वर महादेव मंदिर के पास ही प्रतिष्ठित चमत्कारी गौरी कुंड में स्नान का महत्व बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर में आराधना से कम नहीं है और ये महत्व मकर संक्रान्ति पर और भी बढ़ जाता है | मान्यता है कि तपस्या के दौरान माता पार्वती इसी गौरी कुंड में स्नान किया करती थी और इसी कुंड का पानी पिया करती थी | यह माता पार्वती की वो तपोस्थली है जहां की गई आराधना और तपस्या से शिव शंकर जल्द प्रसन्न होकर भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं | कहते हैं यहां आकर श्रद्धा से भोलेनाथ को स्मरण करने भर से वो प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों को मनचाहा वरदान देते हैं | 8-सप्तर्षि आश्रम/सप्त सरोवर;- हर-की-पौड़ी से 5 किमी दूर स्थित यह आश्रम हरिद्वार के प्रसिद्ध आध्यात्मिक विरासत स्थलों में से एक है। एक हिंदू लोककथा के अनुसार, यह आश्रम सात ऋषियों का आराधना स्थल था।वैदिक काल के ये प्रसिद्ध सात साधू थे- कश्यप, अत्री, वशिष्ठ, जमदग्नी, गौतम, विश्वामित्र एवं भारद्वाज।कुछ मिथक यह भी कहते हैं कि गंगा नदी ने यहाँ स्वयं को सात धाराओं में विभक्त कर लिया जिससे कि प्रवाह के कारण साधुओं की आराधना में कोई व्यवधान न आये। यही कारण है कि यह स्थान ‘सप्त सरोवर या सप्त ऋषी कुंड भी कहलाता है।आगे चलकर ये सात धाराएं आपस में मिलकर एक सुंदर चैनल बनाती हैं जिसे नील धारा कहा जाता है।सप्त सरोवर, वह स्थान है जहां से गंगा नदी सात अलग-अलग धाराओं में बंट जाती है।हरिद्वार से करीब 5 किमी दूरी स्थित यह आश्रम आज ध्यान लगाने तथा तपस्या करने वाले साधु-संतों के बीच बहुत प्रसिद्ध है। शहर के कोलाहल और भागदौड़ से दूर यह आश्रम ध्यान केन्द्र और मानसिक शांति प्राप्त करने के हेतु एक बेहतरीन स्थल के रूप में जाना जाता है, जहां पर्यटक और इच्छुक व्यक्ति कई कई दिनों के लिए आते हैं और ध्यान आदि लगाते हैं।


/////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////// कनखल में स्थित प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर ;- कनखल, हरिद्वार शहर से बिलकुल सटा हुआ है।महाराजा दक्ष की राजधानी कनखल (हरिद्वार) में थी। कनखल के विशेष

आकर्षण प्रजापति मंदिर, सती कुंड एवं दक्ष महादेव मंदिर हैं। कनखल गंगा के पश्चिमी किनारे पर स्थित है। नगर के दक्षिण में दक्ष प्रजापति का भव्य मंदिर है जिसके निकट सतीघाट के नाम से वह भूमि है जहाँ पुराणों के अनुसार शिव ने सती के प्राणोत्सर्ग के पश्चात् दक्षयज्ञ का ध्वंस किया था। यह हिंदुओं का एक पुण्य तीर्थस्थल है जहाँ प्रति वर्ष लाखों तीर्थयात्री दर्शनार्थ आते हैं। 1-दक्षेश्वर महादेव मंदिर ;-

02 POINTS;- 1-दक्ष महादेव मंदिर का यह प्राचीन मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और नगर के दक्षिण में स्थित है।इस मंदिर को यह नाम भगवान की शिव अद्धांगिनी देवी सती के पिता दक्ष प्रजापति के नाम से मिला है। सती के पिता राजा दक्ष की याद में यह मंदिर बनवाया गया है।यह यज्ञ देवी सती के पिता दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित किया गया था।उन्होंने इस यज्ञ में अपने दामाद भगवान् शिव को छोड़कर सभी को आमंत्रित किया । अपने पिता के ऐसे व्यवहार के कारण सती ने स्वयं को बहुत अपमानित महसूस किया एवं यज्ञ की पवित्र अग्नि में अपने जीवन का बलिदान दे दिया। इस मंदिर में एक छोटा गड्ढा है और ऐसा माना जाता है कि यह वही स्थान है जहाँ देवी सती ने अपने जीवन का बलिदान दिया था।सती ने यज्ञ की अग्नि में कूद कर अपने प्राण त्याग दिये।

2-इससे भगवान शिव क्रोधित हो गए और भगवान शिव ने अपने अर्ध-देवता वीरभद्र, भद्रकाली और शिव गणों को कनखल युद्ध के लिए भेजा। वीरभद्र ने राजा दक्ष का सिर काट दिया। सभी देवताओं के अनुरोध पर भगवान शिव ने राजा दक्ष को जीवन दान दिया और उस पर बकरे का सिर लगा दिया। राजा दक्ष को अपनी गलतियों को एहसास हुआ और भगवान शिव से क्षमा मांगी। तब भगवान शिव ने घोषणा कि हर साल सावन के महीनें में भगवान शिव कनखल में निवास करेगें। यज्ञ कुण्ड के स्थान पर दक्षेस्वर महादेव मंदिर बनाया गया था तथा ऐसा माना जाता है कि आज भी यज्ञ कुण्ड मंदिर में अपने स्थान पर है।

दक्षेस्वर महादेव मंदिर के पास गंगा के किनारे पर ‘दक्षा घाट‘ है जहां शिव भक्त गंगा में स्नान कर भगवान शिव के दर्शन कर आंनद को प्राप्त करते है। मंदिर के मध्य में भगवान् शिव की मूर्ती लैंगिक रूप में रखी गई है। 2-सती कुंड;- यहां गंगा नदी के किनारे स्थित सती कुंड को बेहद पवित्र माना जाता है और इस प्राचीन कुंड का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है।वर्तमान में सती कुण्ड केवल एक क्षेत्र बन कर रह गया है। दक्ष मंदिर परिसर जाते समय मार्ग में ही यह सती कुण्ड है।सती कुण्ड के समक्ष एक सूचना पट्टिका पर ‘प्राचीन सती मंदिर’ लिखा था। किन्तु पूर्णतः उपेक्षित प्रतीत होती इस संरचना के समीप पहुँचने का कोई मार्ग नहीं था। 3-शीतला माता मंदिर;- दक्षेश्वर मंदिर के पृष्ठभाग में शीतला माता का मंदिर है। शीतला माता को अधिकतर चेचक, छोटी माता अथवा शीतला जैसे संचारी रोगों की देवी माना जाता है।इस स्थान को देवी सती का जन्मस्थान भी माना जाता है। मुझे मुख्य प्रतिमा अपेक्षाकृत नवीन प्रतीत हुई। गर्भगृह के पृष्ठभाग में एक प्राचीन पाषाणी प्रतिमा है। इस प्रतिमा की अष्टभुजाएं तथा भेदतीं दृष्टि है । 4-दश महाविद्या मंदिर;- दक्षेश्वर महादेव मंदिर से लगा हुआ यह एक अतिशय मनमोहक मंदिर है जो देवी के 10 महाविद्या रूपों को समर्पित है। इस मंदिर के हृदयस्थली, एक भित्ति पर तांबे का एक विशाल श्रीयंत्र है। इसकी परिधि पर देवी के महाविद्या रूपों की 10 छवियाँ हैं। 5-ब्रम्हेश्वर महादेव मंदिर;- दश महाविद्या मंदिर से लगा हुआ एक छोटा ब्रम्हेश्वर महादेव मंदिर है। जैसा कि नाम से विदित है, यह वह मंदिर है जहां ब्रम्हा ने शिव की आराधना की थी।

6-हरिहर आश्रम;- कनखल के हरिहर आश्रम में निहित पारे के इस शिवलिंग का वजन लगभग 150 किलो है।यह हरिद्वार से लगभग 2 किमी की दूरी पर स्थित है और प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में भक्त यहाँ आते हैं। इस आश्रम में एक रुद्राक्ष का वृक्ष भी है जो इस स्थान का मुख्य आकर्षण है। 7-श्री यन्त्र मंदिर;- श्री यन्त्र के आकार का यह अपेक्षाकृत नवीन तथा अत्यंत मनमोहक मंदिर है। केवल मंदिर ही श्री यन्त्र के आकार का नहीं है, इसके भीतर भी आप कई सुन्दर श्री यंत्र देखेंगे जिनकी निरंतर पूजा अर्चना की जाती है। 8-दिव्य कल्पवृक्ष वन;- दिव्य कल्पवृक्ष वन कनखल स्थित नक्षत्र वाटिका के पास हरितऋषि विजयपाल बघेल के द्वारा कल्पवृक्ष वन लगाया गया है। वैसे तो देवलोक के पेड़ कल्पतरु (पारिजात) को सभी तीर्थ स्थलों पर रोपित किया जा रहा है, परन्तु धरती पर कल्पवृक्ष वन के रूप में एकमात्र यही वन विकसित है, जहाँ दुनिया भर के श्रद्धालु कल्पवृक्ष के दर्शन करके अपनी मनोकामना पूरी करते हैं।

9-श्री तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर;-

1-कनखल में स्थित तिल भांडेश्वर मंदिर की हरिद्वार रेलवे और बस स्टेशन से दूरी तकरीबन पांच से छह किमी है।हरिद्वार के कनखल स्थित प्राचीन सिद्धपीठ श्री तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर यहां के पौराणिक मंदिरों में से प्रमुख है। शिवपुराण में भी इस मंदिर का वर्णन है। मंदिर में लक्ष्मी-नारायण, मां दुर्गा और बजरंग बली की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित किया गया है। इसकी गोलाई करीब पांच फीट और ऊंचाई दो फीट के आसपास है।

2-यहां स्थापित शिवलिंग प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष में शिवलिंग तिल-तिल करके घटता है और शुक्ल पक्ष में तिल-तिल बढ़ता है। पूर्णिमा को यह शिवलिंग पूर्ण स्वरूप में आता है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग में तिलों के साथ जलाभिषेक करने से भक्तों के कष्ट खत्म हो जाते हैं। नाम के अनुरूप मंदिर में माथा टेकने से श्रद्धालुओं की विघ्न-बाधाओं का तिल-तिल करके शमन होता है।वैसे तो इस मंदिर में बारामासी श्रद्धालु पूजा-अर्चना को पहुंचते हैं, लेकिन श्रावण मास में इस मंदिर में दर्शन और जलाभिषेक को बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। //////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////


ऋषिकेश में स्थित प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर;-

ऋषिकेश एक देवभूमि है, जोकि देहरादून जिले का प्रमुख तीर्थ स्थान है। यहाँ बहुत से देवी – देवता निवास किया करते थे, इसलिए इसे देवभूमि कहा जाता है। यह पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित है और तीन ओर से वेदांत शिवालिक पर्वत से घिरा

हुआ है।यहाँ बहुत से प्राचीन मंदिर और आश्रम है, जिनका यहाँ धार्मिक महत्व है। ऋषिकेश योग राजधानी कहा जाता है, क्योंकि योग और ध्यान का यहाँ प्रशिक्षण होता है।हिन्दू साधू-संत यहाँ पर रहकर, योग और ध्यान में मग्न रहते है ; ताकि उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सके। यह चार धाम तीर्थ यात्रा का प्रारंभिक बिंदु है और न केवल तीर्थयात्रियों के लिए बल्कि उन लोगों के लिए आदर्श स्थान है, जो औषधि, योग और हिंदू धर्म के अन्य पहलुओं में रुचि रखते हैं। यहाँ साहसिक चाहने वालों के लिए एडवेंचर स्पॉट भी है। ऋषिकेश में हिमालय की चोटिया है, जो अपने ट्रेकिंग अभियान शुरू करने और राफ्टिंग के लिए महत्वपूर्ण है। 1-वीरभद्र मंदिर ;- भगवान शिव को समर्पित वीरभद्र मंदिर उत्तराखंड के ऋषिकेश के वीरभद्र नगर में स्थित है। यह शिव का एक उग्र रूप है| यह 1,300 साल पुराना मंदिर है, जहां वीरभद्र, भगवान शिव के एक रूप की पूजा की जाती है। शिवरात्रि और सावन के अवसर पर रात्रि जागरण और विशेष पूजाएँ आयोजित की जाती हैं। महाशिवरात्रि पर्व के साथ मेलों का आयोजन होता है। किंवदंतियों के अनुसार वीरभद्र भगवान शिव का एक अवतार माना जाता है जो क्रोध में उनके द्वारा बनाया गया था। जब सती ने यज्ञ की अग्नि में आत्मदाह कर लिया था तो सती के साथ आए गणों ने इसकी सूचना लौटकर भगवान शिव को दी। इस पर शंकर भगवान के क्रोध की कोई सीमा नहीं रही। क्रोध से वीरभद्र नाम के गण का जन्म हुआ। भगवान की आज्ञा लेकर वीरभद्र ने यज्ञस्थल को विध्वंस कर दिया। इसके बाद भगवान शंकर के शरीर में समा गया। इसी गण के नाम से वीरभद्र का मंदिर जाना जाता है। इसी मंदिर के नाम से ही यहां के स्थान का नाम वीरभद्र पड़ा। 2-नीलकंठ महादेव मंदिर ;- उत्तरांचल में हिमालय पर्वतों के तल में बसा ऋषिकेश में नीलकंठ महादेव मंदिर प्रमुख पर्यटन स्थल है। नीलकंठ महादेव मंदिर ऋषिकेश के सबसे पूज्य मंदिरों में से एक है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मंथन से निकला विष ग्रहण किया गया था। उसी समय उनकी पत्नी, पार्वती ने उनका गला दबाया जिससे कि विष उनके पेट तक नहीं पहुंचे। इस तरह, विष उनके गले में बना रहा। विषपान के बाद विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया था। गला नीला पड़ने के कारण ही उन्हें नीलकंठ नाम से जाना गया था। मंदिर परिसर में पानी का एक झरना है जहाँ भक्तगण मंदिर के दर्शन करने से पहले स्नान करते हैं।नीलकंठ महादेव मंदिर ऋषिकेश से लगभग 5500 फीट की ऊँचाई पर स्वर्ग आश्रम की पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। मुनी की रेती से नीलकंठ महादेव मंदिर सड़क मार्ग से 50 किलोमिटर और नाव द्वारा गंगा पार करने पर 25 किलोमिटर की दूरी पर स्थित है। 3-लक्ष्मण झूला ;- पुरातन कथनानुसार भगवान श्रीराम के अनुज लक्ष्मण ने इसी स्थान पर जूट की रस्सियों के सहारे नदी को पार किया था।इस पुल के पश्चिमी किनारे पर भगवान लक्ष्मण का मंदिर है जबकि इसके दूसरी ओर श्रीराम का मंदिर है। कहा जाता है कि श्रीराम स्वयं इस सुंदर स्थल पर पधारे थे। पुल को पार कर बाईं ओर पैदल रास्ता बदरीनाथ को तथा दायीं ओर स्वर्गाश्रम को जाता है। केदारखंड में इस पुल के नीचे इंद्रकुंड का विवरण है, जो अब प्रत्यक्ष नहीं है।ऋषिकेश का मशहूर लक्ष्मण झूला अब बंद हो रहा है। 4-राम झूला;- राम झूला ऋषिकेश के एक प्रमुख लैंडमार्क के रूप में जाना जाता है। ये स्थान मुनि की रेती से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ गंगा नदी के ऊपर एक लोहे के पुल का निर्माण किया गया है। ये पुल लक्ष्मण झूला से भी बड़ा है जो स्वर्गाश्रम को शिवानंद आश्रम से जोड़ता है। 5-वसिष्ठ गुफा;- वशिष्ठ गुफा ऋषिकेश से 16 किमी की दूरी पर गंगा नदी के तट पर स्थित है। यह गुफा ध्यान के लिये एक प्रमुख स्थान है और यह गूलर के पेड़ों के बीच स्थित है। गुफा के पास ही हिन्दुओं द्वारा पवित्र माना जाने वाला एक शिवलिंग है। विख्यात हिन्दू सन्त श्री स्वामी पुरुषोत्तमानन्द का आश्रम गुफा के पास ही स्थित है जहाँ कई पर्यटक आते हैं। 6-त्रिवेणी घाट;- त्रिवेणी घाट वह स्थान है जहाँ तीनों पवित्र नदियाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। ऋषिकेश के मन्दिरों में जाने से पूर्व श्रृद्धालुओं को घाट के पवित्र जल में डुबकी लगानी चाहिये। लोगों के विश्वास के अनुसार यहाँ पर डुबकी लगाने से पापों से मुक्ति मिलती है। संध्या के समय हजारों तीर्थयात्री घाट पर महाआरती को लिये एकत्रित होते हैं। तीर्थयात्री दोने में श्रृद्धास्वरूप फूल और दीपक रखकर नदी में प्रवाहित करते हैं। इस जगह पर गतात्मा की शांति के लिये पिण्ड श्राद्ध नामक कर्मकाण्ड भी किया जाता है।

7-भारत मन्दिर;-

भगवान विष्णु को समर्पित 'भारत मन्दि'र एक प्राचीन मन्दिर है जिसे 12वीं शताब्दी में निर्मित किया गया था। प्रसिद्ध सन्त आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित यह मन्दिर गंगा नदी के तट पर स्थित है और क्षेत्र के सबसे पुराने मन्दिरों में से एक है। भगवान विष्णु की स्थापित मूर्ति शालिग्राम पत्थर के एक ही टुकड़े से बनाई गई है। नेपाल के गंडकी नदी में पाये जाने वाले इस पत्थर को हिन्दुओं द्वारा पवित्र माना जाता है क्योंकि इसे भगवान विष्णु का प्रतिरूप माना जाता है। आपस में गुथे नौ त्रिभुजों वाले श्री यन्त्र को भी इस मन्दिर के अन्दर देखा जा सकता है। इस पवित्र हिन्दू यन्त्र को आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा इस मन्दिर में स्थापित किया गया था। मन्दिर को सन् 1398 में एक मुस्लिम आक्रमणकारी द्वारा नष्ट कर दिया गया था किन्तु मूल मन्दिर के टुकड़ों से ही इसे पुनर्निर्मित किया गया। पुरातत्व वेत्ताओं को हाल की खुदाई में कई प्राचीन मूर्तियाँ, सिक्के, बर्तन और कलात्मक वस्तुयें मिली हैं।

8-भूतनाथ मंदिर (ऋषिकेश के इस मंदिर में रुकी थी भगवान शिव की बारात);-

पौराणिक मंदिरों के लिए प्रसिद्ध तीर्थनगरी ऋषिकेश में शिव का एक मंदिर ऐसा भी है जहां भगवान शिव की बारात रुकी थी.

परमार्थ निकेतन के पीछे खड़ा सात मंजिला मंदिर भूतनाथ बाबा के मंदिर के नाम से जाना जाता हैमाना जाता है की जब शिव

सती से विवाह करने के लिए बारात लेकर निकले थे तब सती के पिता दक्ष ने इसी भूतनाथ मंदिर में शिव और उनकी बारात को ठहराया था। भगवान शिव ने अपनी बारात में शामिल सभी देव, गण, भूत और तमाम जानवरों के साथ यहीं पर रात बितायी थी। इस अलौकिक मंदिर को लेकर एक और बात बेहद प्रचलित है और वह समस्त दर्शनार्थियों को बेहद आश्चर्य में

डाल देती है। वस्तुतः यहां स्थित भगवान शिवलिंग के चारों तरफ 10 घंटियाँ लगी हुई हैं और 10 घंटियों में से अलग-अलग ध्वनि निकलती है। एक साथ बजने पर भी अलग ध्वनि निकलने वाले इन घंटियों को देख कर लोग आश्चर्य में पड़ जाते हैं।

सातवीं मंजिल में जब आप भगवान शिव के दर्शन करेंगे तो इस छोटे से मंदिर में चित्रों के माध्यम से आप शिव की भूतों की बारात को भी देख सकेंगे





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