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हरिद्वार /मायापुरी में स्थित प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर




हरिद्वार;-

03 POINTS;-

1-हिन्दू धर्म में मोक्ष पाने को बेहद महत्व दिया जाता है। हिन्दू पुराणों के अनुसार सात ऐसी पुरियों का निर्माण किया गया है, जहां इंसान को मुक्ति प्राप्त होती है। मोक्ष यानी कि मुक्ति, जो इंसान को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति देती है। इन मोक्ष दायिनी पुरियों में शरीर त्यागना मनुष्य जीवन के लिए सभी मूल्यवान वस्तुओं से ऊपर है।हिन्दू धर्म के अनुसार सातमोक्षदायी पुरियाँ है ..

अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥

2-अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, काञ्चीपुरम, अवन्तिका (उज्जैन), द्वारिकापुरी, ये सात मोक्षदायी पुरियाँ हैं। हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है।3129 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गोमुख (गंगोत्री हिमनद) से 253 किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में मैदानी क्षेत्र में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को 'गंगाद्वार' के नाम से भी जाना जाता है; जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ पर गंगाजी मैदानों में प्रवेश करती हैं। हरिद्वार का अर्थ "हरि (ईश्वर) का द्वार"

होता है।पश्चात्कालीन हिंदू धार्मिक कथाओं के अनुसार, हरिद्वार वह स्थान है जहाँ अमृत की कुछ बूँदें भूल से घड़े से गिर गयीं जब धन्वन्तरी उस घड़े को समुद्र मंथन के बाद ले जा रहे थे। मान्यता है कि चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरी थीं। वे स्थान हैं:- उज्जैन, हरिद्वार, नासिक और प्रयाग। इन चारों स्थानों पर बारी-बारी से हर 12 वें वर्ष महाकुम्भ का आयोजन होता है। एक स्थान के महाकुम्भ से तीन वर्षों के बाद दूसरे स्थान पर महाकुम्भ का आयोजन होता है।

3-इस प्रकार बारहवें वर्ष में एक चक्र पूरा होकर फिर पहले स्थान पर महाकुम्भ का समय आ जाता है। पूरी दुनिया से करोड़ों तीर्थयात्री, भक्तजन और पर्यटक यहां इस समारोह को मनाने के लिए एकत्रित होते हैं और गंगा नदी के तट पर शास्त्र विधि से

स्नान इत्यादि करते हैं।एक मान्यता के अनुसार वह स्थान जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी थीं उसे हर की पौड़ी पर ब्रह्म कुण्ड माना जाता है और सबसे पवित्र घाट माना जाता है। यहाँ स्नान करना मोक्ष प्राप्त करवाने वाला माना जाता है।शैव व वैष्णव साधना का यह गढ़ शाक्त साधना का भी गढ़ है। विल्केश्वर, दक्षेश्वर, कोटिश्वर जैसे सिद्ध शिव मन्दिर के कारण यह महातीर्थ शैव क्षेत्र ‘हरद्वार’ कहलाता है तो हरिपद यानि हर की पैड़ी तीर्थ के कारण वैष्णव क्षेत्र। हरिद्वार व चण्डी देवी समेत माया देवी, मनसा देवी, दक्षिण काली मन्दिर के चलते शाक्त यानि शक्ति की देवी का क्षेत्र- अहोगंग और मायापुरी कहलाता है ।

1-हर की पौड़ी;-

02 POINTS;- 1-हर की पौड़ी या हरि की पौड़ी भारत के उत्तराखण्ड राज्य की एक धार्मिक नगरी हरिद्वार का एक पवित्र और सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। इसका भावार्थ है "हरि यानी नारायण के चरण"।हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मन्थन के बाद जब विश्वकर्माजी अमृत के लिए झगड़ रहे देव-दानवों से बचाकर अमृत ले जा रहे थे तो पृथ्वी पर अमृत की कुछ बूँदें गिर गई और वे स्थान धार्मिक महत्व वाले स्थान बन गए।अमृत की बूँदे हरिद्वार में भी गिरी और जहाँ पर वे गिरी थीं वह स्थान हर की पौड़ी था। यहाँ पर स्नान करना हरिद्वार आए हर श्रद्धालु की सबसे प्रबल इच्छा होती है क्योंकि यह माना जाता है कि यहाँ पर स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। 2-हर की पौड़ी या ब्रह्मकुण्ड पवित्र नगरी हरिद्वार का मुख्य घाट है। ये माना गया है कि यही वह स्थान है जहाँ से गंगा नदी पहाड़ों को छोड़ मैदानी क्षेत्रों की दिशा पकड़ती है। इस स्थान पर नदी में पापों को धो डालने की शक्ति है और यहाँ एक पत्थर में श्रीहरि के पदचिह्न इस बात का समर्थन करते हैं। यह घाट गंगा नदी की नहर के पश्चिमी तट पर है जहाँ से नदी उत्तर दिशा की ओर मुड़ जाती है। हर शाम सूर्यास्त के समय साधु संन्यासी गंगा आरती करते हैं, उस समय नदी का नीचे की ओर बहता जल पूरी तरह से रोशनी में नहाया होता है।

2- माया देवी शक्तिपीठ;-

03 POINTS;- 1-हरिद्वार का माया देवी शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां सती की नाभि गिरी थी ।पौराणिक मान्यता के अनुसार जब सती ने अपने पिता के यज्ञ में अपने पति को नहीं बुलाए जाने से अपमानित होने पर आत्मदाह कर लिया था और अपने शरीर को वहीं सतीकुंड पर छोड़कर महामाया रूप में हरिद्वार के इसी स्थान पर आ गई थीं। इसीलिए इस जगह का नाम मां मायादेवी पड़ा। इसी के बाद से हरिद्वार को भी मायापुरी के नाम से जाना जाने लगा और ये स्थान देश की सात पुरियों में

शामिल हो गया। माया देवी को हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, जिसका इतिहास 11 शताब्दी से उपलब्ध है। प्राचीन काल से माया देवी मंदिर में देवी की पिंडी विराजमान है और 18वीं शताब्दी में इस मंदिर में देवी की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई। इस मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही तंत्र साधना भी की जाती है।

2-हरिद्वार में भगवती की नाभि गिरी थी, इसलिए इस स्थान को ब्रह्मांड का केंद्र भी माना जाता है। हरिद्वार की रक्षा के लिए एक अद्भुत त्रिकोण विद्यमान है। इस त्रिकोण के दो बिंदु पर्वतों पर मां मनसा और मां चंडी रक्षा कवच के रूप में स्थित है तो वहीं त्रिकोण का शिखर धरती की ओर है और उसी अधोमुख शिखर पर भगवती माया आसीन हैं। मां माया देवी मंदिर के साथ ही भैरव बाबा का मंदिर भी मौजूद है और मान्यता है कि मां की पूजा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक भक्त भैरव बाबा का दर्शन पूजन कर उनकी आराधना नहीं कर लेते।

3-मां के इस दरबार में मां माया के अलावा मां काली और देवी कामाख्या के दर्शनों का भी सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है। जहां मां काली देवी माया के बायीं और तो वहीं दाहिंनी ओर मां कामाख्या विराजमान हैं। मां माया के आशीर्वाद से बिगड़े काम भी बन जाते हैं और सफलता की राह में आ रही बाधाएं दूर हो जाती हैं। मां के चमत्कारों की कहानी लंबी है और महिमा अनंत। 3-मनसा देवी मंदिर;-

02 POINTS;- 1-मनसा देवी मंदिर हरिद्वार में बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर देवी मनसा देवी को समर्पित है। यह ‘विल्वक’ पर्वत पर स्थित है।मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। महाभारतके अनुसार इनका वास्तविक नाम जरत्कारु है और इनके समान नाम वाले पति मुनि जरत्कारु तथा पुत्र आस्तिक जी हैं। इन्हें नागराज वासुकी की बहन के रूप में पूजा जाता है, प्रसिद्ध मंदिर एक शक्तिपीठ पर हरिद्वार में स्थापित है। कई पुरातन धार्मिक ग्रंथों में इनका जन्म कश्यप के मस्तक से हुआ हैं, ऐसा भी बताया गया है। कुछ ग्रंथों में लिखा है कि वासुकि नाग द्वारा बहन की इच्छा करने पर शिव नें उन्हें इसी कन्या का भेंट दिया और वासुकि इस कन्या के तेज को न सह सका और नागलोक में जाकर पोषण के लिये तपस्वी हलाहल को दे दिया। इसी मनसा नामक कन्या की रक्षा के लिये हलाहल नें प्राण त्यागा।इन्हें कश्यप की पुत्री तथा नागमाता के रूप में माना जाता था तथा साथ ही शिव पुत्री, विष की देवी के रूप में भी माना जाता है।

2-14 वी सदी के बाद इन्हे शिव के परिवार की तरह मंदिरों में आत्मसात किया गया। यह मान्यता भी प्रचलित है कि इन्होने शिव को हलाहल विष के पान के बाद बचाया था, परंतु यह भी कहा जाता है कि मनसा का जन्म समुद्र मंथन के बाद हुआ।विष की देवी के रूप में इनकी पूजा झारखंड बिहार और बंगाल मे बड़े धूमधाम से हिन्दी और बंग्ला पंचांग के अनुसार भादो

महीने मे इनकी स्तुति होती है। इनके सात नामों के जाप से सर्प का भय नहीं रहता। ये नाम इस प्रकार है जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तिकमाता और विषहरी।मनसा देवी

मुख्यत: सर्पों से आच्छादित तथा कमल पर विराजित हैं 7 नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं। कई बार देवी के चित्रों तथा भित्ति चित्रों में उन्हें एक बालक के साथ दिखाया गया है जिसे वे गोद में लिये हैं, वह बालक देवी का पुत्र आस्तिक है। 4-चंडी देवी मंदिर(शक्तिपीठ);-

02 POINTS;-

1- चंडी देवी मंदिर नील पर्वत के ऊपर स्थित शक्तिपीठ के रूप में माना जाता है , जहाँ सभी की मनोकामना पूर्ण होती है | यह हरिद्वार में स्थित तीन पीठो में से एक है , दूसरा मनसा देवी मंदिर है और तीसरा माया देवी मंदिर है |चंडी देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है ।इस मंदिर को “नील पर्वत” तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है |नील पर्वत को नागवंशीय ‘नील-नाग’ और नीलकंठ तीर्थ से भी जोड़ते हैं। कहते हैं नीलकंठ महादेव भक्तों की रक्षा के लिए इसी पर्वत पर रहे और साथ में आसीन हुई माँ चण्डी देवी।

2- देवी अराधक ‘शाक्त सम्प्रदाय’ में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती इन तीनों के ‘एकीकृत विग्रह’ यानि तीनों महादेवियों के एक संयुक्त अवतार को ही चण्डी अथवा दुर्गा कहा जाता है। चंडी देवी मंदिर का निर्माण 1929 में सुचात सिंह , कश्मीर के राजा ने अपने शासनकाल के दौरान करवाया था परंतू मंदिर में स्थित चंडी देवी की मुख्य मूर्ति की स्थापना 8वी शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने की थी ,जो कि हिन्दू धर्म के सबसे बड़े पुजारियों में से एक है शुंभ निशुंभ को मारने के बाद देवी चंडी ने नील पर्वत के शिखर पर विश्राम किया था।इसी के बाद यहां के मंदिर का निर्माण करवाया गया ।पहाड़पुर स्थित दो चोटियों को शुंभ और निशुंभ कहा जाता है।मनसा और चंडी देवी माता पार्वती के ही दो स्वरुप है , जो गंगा के तटो के सामने मौजूद है |नील पर्वत के आधार पर निल्केश्वर मंदिर भी है |

NOTE;-

इस पावन पीठ की एक और विशेषता यह है कि रामभक्त हनुमान की माताश्री ‘अंजनि’ का जग प्रसिद्ध एकमात्र मन्दिर भी यहीं इसी मन्दिर के पास ही है।चंडी देवी मंदिर के निकट अंजना का मंदिर स्थित है , जो कि हनुमान जी की माता थी | चंडी मंदिर आने वाले सभी श्रद्धालु इस मंदिर में जरुर जाते है | 5-गौरीशंकर महादेव मंदिर;- गौरी-शंकर महादेव का मंदिर हरिद्वार के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है।यह मंदिर चंडी देवी मंदिर के पास ही है। इस मंदिर का वर्णन शिवपुराण में किया गया है।भगवान् शिव को समर्पित यह मंदिर हरिद्वार के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। एक लोककथा के अनुसार यहाँ लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।नील पर्वत की छांव में भगवान शिव और माता गौरी का एक ऐसा अलौकिक व प्राचीन मंदिर है जहां सती के साथ विवाह के बाद भगवान शिव ने निवास किया था।यहां भगवान शंकर और गौरी के निवास कक्ष का ढांचा आज भी मौजूद है।बदलते वक्त के साथ इस स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया, जिसे गौरी शंकर मंदिर के नाम से जाना जाता है। 6-बिल्केश्वर महादेव मंदिर/;- बिल्केश्वर महादेव मंदिर , भगवान शिव शंकर का धाम है एवम् हरिद्वार के पास स्थित “बिल्व पर्वत” पर बना है | यह एक छोटा मंदिर है , जो सामान्य शिवलिंग और नंदी के साथ पत्थर से बना है एवम् यह मंदिर एक पहाड़ी क्षेत्र में जंगल से घिरा हुआ है ।इस जगह में भगवान गणेश , भगवान हनुमान , महादेव और माता रानी के छोटे मंदिर भी स्थित है । यहाँ भगवान शिव के लिए बैल की पत्तियों