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स्वर के प्रवाह की दिशा से तत्त्वों की पहिचान कैसे करे?श्वास देखकर क्या-क्या काम करने चाहिए?

तत्त्वों की पहिचान;-

02 FACTS;-

1- स्वरोदय विज्ञान अपने आप में एक सम्पूर्ण विज्ञान है। स्वरोदय अर्थात नासिका के छिद्रों से ग्रहण किया जाने वाला श्वास जो

कि वायु की शक्ल में होता है। विज्ञान अर्थात जॅहा पर किसी विषय की गूढ़तम बातें एंव प्रयोग कहे जाते है।संसार का प्रत्येक जीव अपनी नासिका के छिद्रों द्वारा सॉंस अर्जन करता है एंव उसका विर्सजन करता है।इसी सांस के द्वारा प्रत्येक जीव के प्राण स्थिर रहते है।स्वरोदय विज्ञान में स्वर के प्रवाह की दिशा में विचलन से तत्त्वों की पहिचान का तरीका बताया गया है। वैसे काफी सजग निरीक्षण के लम्बे अभ्यास के बाद ही इस विधि से स्वर में सक्रिय तत्व की पहिचान सम्भव है। इसमें यह बताया गया है कि पृथ्वी तत्व का प्रवाह मध्य में, जल तत्त्व का नीचे की ओर, अग्नि तत्व का ऊपर की ओर तथा वायु तत्व का प्रवाह तिरछा होता है। जब साँस दोनों नासिका-रन्ध्रों से समान रूप से एक साथ प्रवाहित हो, तो आकाश तत्व को सक्रिय समझना चाहिए। यहाँ श्वाँस में पंच महाभूतों के उदय के अनुसार इसमें (प्रश्वास) की लम्बाई में परिवर्तन की ओर संकेत किया गया है। जब साँस में वायु तत्व की प्रधानता या उसका उदय हो, तो प्रश्वास की लम्बाई आठ अंगुल, अग्नि तत्व के उदय काल में चार अंगुल, पृथ्वी तत्व के समय बारह अंगुल और जलतत्व के समय सोलह अंगुल होती है। 2-जब मन में भौतिकता से संबंधित विचार उठ रहे हों, तो समझना चाहिए कि उस समय पृथ्वी तत्व प्रवाहित हो रहा है, अर्थात स्वर में पृथ्वी तत्व की प्रधानता है। जब खुद के विषय में विचार उठें, तो जल तत्व अथवा वायु तत्व की प्रधानता समझनी चाहिए। अग्नि तत्व की प्रधानता होने पर मन में धातुजनित धन सम्बन्धी विचार उठते हैं। पर आकाश तत्व की प्रधानता के समय व्यक्ति का मन लगभग विचार-शून्य होता है।156 श्लोक में शरीर में पंचमहाभूतों की स्थिति बताई गयी है। अग्नितत्व का स्थान दोनों कंधों में, वायु का नाभि में, पृथ्वी का जाँघों में, जल का पैरों में और आकाश तत्व का स्थान मस्तक में कहा गया है।पृथ्वी और जल तत्वों के प्रवाह काल में प्रारम्भ किए कार्य सिद्धिदायक होते हैं, अग्नि तत्व में प्रारम्भ किए गए कार्य मृत्युकारक, अर्थात नुकसानदेह होते हैं, वायु तत्व में प्रारम्भ किए गए कार्य सर्वनाश करनेवाले होते हैं, जबकि आकाश तत्व के प्रवाह काल में शुरु किए गए कार्य कोई फल नहीं देते।

स्वरों के प्रवाह की लम्बाई;-

04 FACTS;-

1-माँ पार्वती को उत्तर देते हुए भगवान शिव ने कहा- हे वरानने, इस संसार में प्राण ही सबसे बड़ा मित्र और सबसे बड़ा सखा है। इस जगत में प्राण से बढ़कर कोई बन्धु नहीं है।माँ पार्वती भगवान शिव से पूछती हैं- प्राण की हवा में स्थिति किस प्रकार होती है, शरीर में स्थित प्राण का स्वरूप क्या है, विभिन्न तत्वों में प्राण (वायु) किस प्रकार कार्य करता है और योगियों को इसका ज्ञान किस प्रकार होता है?भगवान शिव माँ पार्वती को बताते हैं- इस शरीर रूपी नगर में प्राण-वायु एक सैनिक की तरह इसकी रक्षा करता है। श्वास के रूप में शरीर में प्रवेश करते समय इसकी लम्बाई दस अंगुल और बाहर निकलने के समय बारह अंगुल होता है। 2-स्वरों के प्रवाह की लम्बाई हमारे कार्यों की विभिन्नता के अनुसार इनकी लम्बाई या गति प्रभावित होती है।साँस की स्वाभाविक लम्बाई बारह अंगुल होती है, पर भोजन और वमन करते समय इसकी लम्बाई अठारह अंगुल हो जाती है। गाते समय 12 अंगुल, चलते-फिरते समय प्राण वायु (साँस) की लम्बाई चौबीस अंगुल, भूख लगने पर 20 अंगुल,सामान्य गति से चलते समय 18 अंगुल, दौड़ते समय बयालीस अंगुल, बैठते समय 12 अंगुल,सोते समय 27 अंगुल से 30 अंगुल तक, मैथुन करते समय 27 से 36 अंगुल और तेज चलते समय या शारीरिक व्यायाम करते समय इससे भी अधिक हो सकती है।

3-यदि बाहर निकलने वाली साँस की लम्बाई नौ इंच से कम की जाए तो जीवन दीर्घ होता है और यदि इसकी लम्बाई बढ़ती है तो आन्तरिक प्राण दुर्बल होता है जिससे आयु घटती है।यदि प्राण की लम्बाई कम की जाय तो अलौकिक सिद्धियाँ मिलती हैं। यदि साधक बाह्य श्वास की लम्बाई पर्याप्त मात्रा में कम कर दे तो उसे भोजन की आवश्यकता नहीं पड़ती है और यदि कुछ और कम कर ले तो वह हवा में उड़ सकता है।यदि प्राण-वायु की लम्बाई एक अंगुल कम कर दी जाय, तो व्यक्ति निष्काम हो जाता है, दो अंगुल कम होने से आनन्द की प्राप्ति होती है और तीन अंगुल होने से कवित्व या लेखन शक्ति मिलती है।

4-साँस की लम्बाई चार अंगुल कम होने से वाक्-सिद्धि, पाँच अंगुल कम होने से दूर-दृष्टि, छः अंगुल कम होने से आकाश में उड़ने की शक्ति और सात अंगुल कम होने से प्रचंड वेग से चलने की गति प्राप्त होती हैं।यदि श्वास की लम्बाई आठ अंगुल कम हो जाय, तो साधक को आठ सिद्धियों की प्राप्ति होती है, नौ अंगुल कम होने पर नौ निधियाँ प्राप्त होती हैं, दस अंगुल कम होने पर अपने शरीर को दस विभिन्न आकारों में बदलने की क्षमता आ जाती है और ग्यारह अंगुल कम होने पर शरीर छाया की तरह हो जाता है, अर्थात् उस व्यक्ति की छाया नहीं पड़ती है।श्वास की लम्बाई बारह अंगुल कम होने पर साधक अमरत्व प्राप्त कर लेता है, अर्थात् साधना के दौरान ऐसी स्थिति आती है कि श्वास की गति रुक जाने के बाद भी वह जीवित रह सकता है, और जब साधक नख-शिख अपने प्राणों को नियंत्रित कर लेता है, तो वह भूख, प्यास और सांसारिक वासनाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है।



02 FACTS;-

1-मध्यमा नाड़ी क्रूर है और सभी कार्यो के लिए दुष्ट है। बॉयी नाड़ी सभी शुभ कार्यो को पूर्ण करती है। मध्यमा अर्थात सुषुम्ना जब नाक के दोनों छिद्रों से स्वर चल रहा हो तो प्रत्येक कार्य में विघ्न आते है। बॉई अर्थात इड़ा नाड़ी यानि जब नाक के बॉयें छिद्र से स्वर चल रहा होता है तो उस दौरान प्रारम्भ किया गया प्रत्येक कार्य सफल होता है। घर से जाते वक्त बॉये स्वर का चलना शुभ होता है और घर वापसी करते समय दाहिना स्वर चलना उत्तम रहता है। सूर्य नाड़ी के चलते समय रौद्र कार्य करें। सुषुम्ना नाड़ी भोग और मोक्ष प्राप्त करवाती है।

2-किस स्वर में किस दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिए ?.. पूर्व तथा उत्तर दिशा में चन्द्र स्वर, पश्चिम तथा दक्षिण दिशा में सूर्य रहता है। दाहिना स्वर चलने पर पश्चिम या दक्षिण दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिए। बॉयें स्वर के चलते समय पूर्व तथा उत्तर दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिए। इस यात्रा के करने से यात्री को शत्रु का भय होता है और कभी-कभी तो यात्री घर वापस भी नहीं आता है।बॉया या दाहिना कोई भी स्वर चल रहा हो और साथ ही सुषुम्ना भी चल रही हो तो मुख्य स्वर की तरफ वाला पॉव आगे बढ़ाकर यात्रा करनी चाहिए। ऐसा करने से सफलता प्राप्त होती है।

3-तत्वज्ञान {सॉंस के द्वारा}- तत्वों के अधिकार में होने के कारण तत्व की ही भॉति स्वर भी चलता है। पृथ्वी तत्व युक्त चलने वाली सॉस मध्य में चलती है। जल तत्व से युक्त होकर चलने वाली श्वांस नीचे को बहती है। अग्नि तत्व से युक्त हेाकर चलने वाली श्वांस ऊपर की ओर चलती है। वायु तत्व से युक्त होकर चलने वाली श्वांस तिरछी चलती है और आकाश तत्व से युक्त होकर चलने वाली श्वांस दोनों छिद्रों से प्रवाहित होती है।

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सूर्य, चंद्र और सुषुम्ना स्वर;- सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को महसूस करने का प्रयत्न कीजिए। देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है। स्वरोदय विज्ञान के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा। इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से निःश्वास निकलता महसूस करें तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा। श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वरोदय विज्ञान का आधार हैं। सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिव स्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा। स्वर को पहचानने की सरल विधियाँ;-

03 FACTS;- (1) शांत भाव से मन एकाग्र करके बैठ जाएँ। अपने दाएँ हाथ को नाक छिद्रों के पास ले जाएँ। तर्जनी अँगुली छिद्रों के नीचे रखकर श्वास बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से श्वास का अधिक स्पर्श होगा। जिस तरफ के छिद्र से श्वास निकले, बस वही स्वर चल रहा है। (2) एक छिद्र से अधिक एवं दूसरे छिद्र से कम वेग का श्वास निकलता प्रतीत हो तो यह सुषुम्ना के साथ मुख्य स्वर कहलाएगा। (3) एक अन्य विधि के अनुसार आईने को नासाछिद्रों के नीचे रखें। जिस तरफ के छिद्र के नीचे काँच पर वाष्प के कण दिखाई दें, वही स्वर चालू समझें। जीवन में स्वर का चमत्कार;-

07 FACTS;- स्वर विज्ञान अपने आप में दुनिया का महानतम ज्योतिष विज्ञान है जिसके संकेत कभी गलत नहीं जाते।शरीर की मानसिक और शारीरिक क्रियाओं से लेकर दैवीय सम्पर्कों और परिवेशीय घटनाओं तक को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला स्वर विज्ञान दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है।स्वर विज्ञान का सहारा लेकर आप जीवन को नई दिशा दृष्टि ,दिव्य जीवन का निर्माण कर सकते हैं, लौकिक एवं पारलौकिक यात्रा को सफल बना सकते हैं। यही नहीं तो आप अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति और क्षेत्र की धाराओं तक को बदल सकने का सामर्थ्य पा जाते हैं।अपनी नाक के दो छिद्र होते हैं। इनमें से सामान्य अवस्था में एक ही छिद्र से हवा का आवागमन होता रहता है। कभी दायां तो कभी बांया। जिस समय स्वर बदलता है उस समय कुछ सैकण्ड के लिए दोनों नाक में हवा निकलती प्रतीत होती है। इसके अलावा कभी - कभी सुषुम्ना नाड़ी के चलते समय दोनों नासिक छिद्रों से हवा निकलती है। दोनों तरफ सांस निकलने का समय योगियों के लिए योग मार्ग में प्रवेश करने का समय होता है।

2-बांयी तरफ सांस आवागमन का मतलब है आपके शरीर की इड़ा नाड़ी में वायु प्रवाह है।इसके विपरीत दांयी नाड़ी पिंगला है।दोनों के मध्य सुषुम्ना नाड़ी का स्वर प्रवाह होता है।अपनी नाक से निकलने वाली साँस को परखने मात्र से आप जीवन के कई कार्यों को बेहतर बना सकते हैं। सांस का संबंध तिथियों और वारों से जोड़कर इसे और अधिक आसान बना दिया गया है। जिस तिथि को जो सांस होना चाहिए, वही यदि होगा तो आपका दिन अच्छा जाएगा। इसके विपरीत होने पर आपका दिन बिगड़ा ही रहेगा। इसलिये साँस पर ध्यान दें और जीवन विकास की यात्रा को गति दें।मंगल, शनि और रवि का संबंध सूर्य स्वर से है जबकि शेष का संबंध चन्द्र स्वर से।आपके दांये नथुने से निकलने वाली सांस पिंगला है। इस स्वर को सूर्य स्वर कहा जाता है। यह गरम होती है।जबकि बांयी ओर से निकलने वाले स्वर को इड़ा नाड़ी का स्वर कहा जाता है। इसका संबंध चन्द्र से है और यह स्वर ठण्डा है।

3-तिथि के स्वर;- शुक्ल पक्ष:- • प्रतिपदा, द्वितीया व तृतीया बांया (उल्टा-इड़ा नाड़ी) • चतुर्थी, पंचमी एवं षष्ठी -दांया (सीधा-पिंगला नाड़ी) • सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी बांया (उल्टा) • दशमी, एकादशी एवं द्वादशी –दांया (सीधा) • त्रयोदशी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमा – बांया (उल्टा) कृष्ण पक्ष:- • प्रतिपदा, द्वितीया व तृतीया दांया (सीधा) • चतुर्थी, पंचमी एवं षष्ठी बांया (उल्टा) • सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी दांया(सीधा) • दशमी, एकादशी एवं द्वादशी बांया(उल्टा) • त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या --दांया(सीधा) 4-सवेरे नींद से जगते ही नासिका से स्वर देखें। जिस तिथि को जो स्वर होना चाहिए, वह हो तो बिस्तर पर उठकर स्वर वाले नासिका छिद्र की तरफ के हाथ की हथेली का चुम्बन ले लें और उसी दिशा में मुंह पर हाथ फिरा लें।यदि बांये स्वर का दिन हो तो बिस्तर से उतरते समय बांया पैर जमीन पर रखकर नीचे उतरें, फिर दायां पैर बांये से मिला लें और इसके बाद दुबारा बांया पैर आगे निकल कर आगे बढ़ लें।यदि दांये स्वर का दिन हो और दांया स्वर ही निकल रहा हो तो बिस्तर पर उठकर दांयी हथेली का चुम्बन ले लें और फिर बिस्तर से जमीन पर पैर रखते समय पर पहले दांया पैर जमीन पर रखें और आगे बढ़ लें। यदि जिस तिथि को स्वर हो, उसके विपरीत नासिका से स्वर निकल रहा हो तो बिस्तर से नीचे नहीं उतरें और जिस तिथि का स्वर होना चाहिए उसके विपरीत करवट लेट लें। इससे जो स्वर चाहिए, वह शुरू हो जाएगा और उसके बाद ही बिस्तर से नीचे उतरें। 5-स्नान, भोजन, शौच आदि के वक्त दाहिना स्वर रखें।पानी, चाय, काफी आदि पेय पदार्थ पीने, पेशाब करने, अच्छे काम करने आदि में बांया स्वर होना चाहिए।जब शरीर अत्यधिक गर्मी महसूस करे तब दाहिनी करवट लेट लें और बांया स्वर शुरू कर दें। इससे तत्काल शरीर ठण्ढक अनुभव करेगा।जब शरीर ज्यादा शीतलता महसूस करे तब बांयी करवट लेट लें, इससे दाहिना स्वर शुरू हो जाएगा और शरीर जल्दी गर्मी महसूस करेगा।जिस किसी व्यक्ति से कोई काम हो, उसे अपने उस तरफ रखें जिस तरफ की नासिका का स्वर निकल रहा हो। इससे काम निकलने में आसानी रहेगी।जब नाक से दोनों स्वर निकलें, तब किसी भी अच्छी बात का चिन्तन न करें अन्यथा वह बिगड़ जाएगी। इस समय यात्रा न करें अन्यथा अनिष्ट होगा। इस समय सिर्फ भगवान का चिन्तन ही करें। इस समय ध्यान करें तो ध्यान जल्दी लगेगा। 6-दक्षिणायन शुरू होने के दिन प्रातःकाल जगते ही यदि चन्द्र स्वर हो तो पूरे छह माह अच्छे गुजरते हैं। इसी प्रकार उत्तरायण शुरू होने के दिन प्रातः जगते ही सूर्य स्वर हो तो पूरे छह माह बढ़िया गुजरते हैं। कहा गया है - कर्के चन्द्रा, मकरे भानु। रोजाना स्नान के बाद जब भी कपड़े पहनें, पहले स्वर देखें और जिस तरफ स्वर चल रहा हो उस तरफ से कपड़े पहनना शुरू करें और साथ में यह मंत्र बोलते जाएं - ॐ जीवं रक्ष। इससे दुर्घटनाओं का खतरा हमेशा के लिए टल जाता है।आप घर में हो या आफिस में, कोई आपसे मिलने आए और आप चाहते हैं कि वह ज्यादा समय आपके पास नहीं बैठा रहे। ऎसे में जब भी सामने वाला व्यक्ति आपके कक्ष में प्रवेश करे उसी समय आप अपनी पूरी साँस को बाहर निकाल फेंकियें, इसके बाद वह व्यक्ति जब आपके करीब आकर हाथ मिलाये, तब हाथ मिलाते समय भी यही क्रिया गोपनीय रूप से दोहरा दें।आप देखेंगे कि वह व्यक्ति आपके पास ज्यादा बैठ नहीं पाएगा, कोई न कोई ऎसा कारण उपस्थित हो जाएगा कि उसे लौटना ही पड़ेगा।

7-इसके विपरीत आप किसी को अपने पास ज्यादा देर बिठाना चाहें तो कक्ष प्रवेश तथा हाथ मिलाने की क्रियाओं के वक्त सांस को अन्दर खींच लें। आपकी इच्छा होगी तभी वह व्यक्ति लौट पाएगा।कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है, लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है। ऐसे समय में स्वर की प्रतीक्षा करने पर उत्तम अवसर हाथों से निकल सकता है, अत: स्वर परिवर्तन के द्वारा अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए प्रस्थान करना चाहिए या कार्य प्रारंभ करना चाहिए। स्वर विज्ञान का सम्यक ज्ञान आपको सदैव अनुकूल परिणाम प्रदान करवा सकता है।