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क्या है सपनों का मनोविज्ञान ?PART 01


क्या है स्‍वप्‍न ?-

03 FACTS;-

1-मानव मन की चेतना के तीन स्तर है, जो हैं:- चेतन, अर्धचेतन व अचेतन।(Conscious Mind ,Sub-Conscious Mind and Un-Conscious Mind) अचेतन स्तर के अंतर्गत ऐसी मानसिक क्रियाएँ आती हैं जिनके प्रति लोग जागरूक नहीं होते हैं। यह अचेतन स्तर सभी ऐसी इच्छाओं व विचारों का घर है जो चेतन रूप से जागरूक स्थिति से छिपे हुए होते हैं क्योंकि वे मनोवैज्ञानिक द्वंद्व उत्पन्न करते हैं और व्यक्ति की निजी ज़िंदगी पर प्रभाव डालते हैं। यह विचार अगर मनुष्य की चेतन अवस्था में आ जाएँ तो वह ख़ुद भी भौंचक्का रह जाए। इन स्तम्भित अरमानों को इंसान तक पहुँचाने का ज़रिया हैं स्वप्न।

2-स्वप्न इन्हीं स्तम्भित भावनाओं व इच्छाओं की अभिव्यक्ति का एक ज़रिया है। इस तरह यह दबे अरमान व विचार ख़ुद को सपनों में व्यक्त कर अप्रत्यक्ष रूप से पूर्ण हो जाते हैं और मनुष्य की चेतन अवस्था में न आकर उसे आत्मग्लानि व असहजता के भाव से बचाते हैं। व्यक्ति का हर स्वप्न, किसी न किसी दबी हुई इच्छा या ऐसे स्तम्भित विचार को दर्शाता है जिससे अगर उसका प्रत्यक्ष रूप से साक्षात्कार हो जाए यानि उसकी चेतन अवस्था में आ जाए, तो उसकी व्यक्तिगत ज़िंदगी पे अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए मनुष्य को इन्हीं हानिकारक प्रभावों से बचाने के लिए अचेतन अवस्था के यह विचार सपनों में ख़ुद को व्यक्त कर अचेतन अवस्था में ही रहकर इंसान की इच्छा को तृप्त करते हैं।

3-मनुष्य की नींद दो प्रकार की निद्रा के चक्र से गुज़रती है जो हैं:- Rapid Eye Movement /आर. ई. एम.और Non Rapid Eye Movement /नॉनआर. ई. एम। निद्रा के प्रारम्भ में Non Rapid Eye Movement निद्रा होती है और सोने के 90 मिनट के पश्चात् व्यक्ति Rapid Eye Movement निद्रा में चला जाता है जिसके दौरान उसकी आँखें विभिन्न दिशाओं में तेज़ गति से घूमती हैं। निद्रा चक्र के इसी भाग में इंसान का दिमाग़ सक्रिय होता है जिसके फलस्वरूप उसे स्वप्नों की अनुभूति होती है। इसलिए, अगर सोते समय सपनों का आभास ना हो तो इसका मतलब यह नहीं की मनुष्य गहरी व सुरीली नींद में लीन है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि उसे Rapid Eye Movement निद्रा का अनुभव नहीं हो रहा है और निद्रा चक्र ठीक तरह से पूर्ण नहीं हो पा रहा है, जिसका इंसान की सेहत पर भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

क्या जगत अनित्य है?

05 FACTS;- 1-उपनिषद के अनुसार जगत अनित्य है नित्य उसे कहते हैं, जो है, सदा है। जिसमें कोई परिवर्तन या रूपांतरण नहीं होता। जो वैसा ही है, जैसा सदा था और वैसा ही रहेगा।जगत एक धारा है, प्रवाह है।विज्ञान के अनुसार सात साल में आपके शरीर में एक टुकड़ा भी नहीं बचता... सब बह जाता है, शरीर नया हो जाता है। जो मनुष्य सत्तर साल जीता है, वह दस बार अपने पूरे शरीर को बदल लेता है। एक- एक सेल प्रतिपल बदलता जाता है ।आप सोचते हैं कि आप एक दफा मरते हैं, परन्तु आपका शरीर हजार दफे मर चुका होता है। एक- एक शरीर का कोष्ठ मर रहा है, शरीर के बाहर निकल रहा है। भोजन से रोज नए कोष्ठ निर्मित हो रहे हैं।मल के द्वारा तथा अन्य मार्गों से शरीर अपने मरे हुए पुराने कोष्ठों को बाहर फेंक रहा है। 2-आपने खयाल ही नहीं किया होगा कि नाखून काटते हैं, दर्द नहीं होता; बाल काटते हैं, दर्द नहीं होता। क्योकि ये डेड पार्ट्स हैं, इसलिए दर्द नहीं होता। अगर ये शरीर के हिस्से होते, तो काटने से तकलीफ होती।शरीर के भीतर जो कोष्ठ मर गए हैं, उनको बालों के द्वारा, नाखूनों के द्वारा, मल के द्वारा तथा पसीने के द्वारा बाहर फेंका जा रहा है ।प्रतिपल शरीर अपने मरे हुए हिस्सों को बाहर फेंक रहा है और भोजन के द्वारा नए हिस्सों को जीवन दे रहा है। शरीर एक सरिता है, लेकिन भ्रम तो यह पैदा होता है कि शरीर है।इस जगत में कोई चीज क्षणभर भी वही नहीं है, जो थी ..सब बदला चला जा रहा है। इस परिवर्तन को ऋषि अनित्यता कहते है ।अगर हमें यह स्मरण आ जाए कि जगत का स्वभाव ही अनित्य है, तो हम जगत में कोई भी ठहरा हुआ मोह निर्मित न करें। अगर सब चीजें बदल ही जाती हैं, तो हम चीजों को ठहराए रखने काआग्रह छोड़ देंगे ।जवान फिर यह आग्रह न करेगा कि मैं जवान ही बना रहूं, क्योंकि यह असंभव है।जवानी सिर्फ बूढ़े होने की कोशिश है, और कुछ भी नहीं। जवानी बुढ़ापे के विपरीत नहीं, उसी की धारा का अंग है।यह दो कदम पहले की धारा है और बुढ़ापा दो कदम बाद की। 3-अगर हमें यह खयाल में आ जाए कि इस जगत में सभी चीजें प्रतिपल मर रही हैं, तो हम जीने का जो पागल आग्रह है , वह भी छोड़ देंगे। क्योंकि जिसे हम जन्म कहते हैं, वह मृत्यु का पहला कदम है और मृत्यु जन्म का आखिरी कदम है। जिसे मरना नहीं है, उसे जन्मना भी नहीं है। अगर इसे प्रवाह की तरह देखेंगे, तो कठिनाई न होगी। अगर स्थितियों की तरह देखेंगे, तो जन्म, मृत्यु ,जवानी ,और बुढ़ापा सब अलग -अलग है। जगत एक अनित्य प्रवाह है। यहां जन्म भी मृत्यु से ,जवानी भी बुढ़ापे से,सुख भी दुख से , प्रेम भी घृणा से और मित्रता भी शत्रुता से जुड़ी है। और जो भी चाहता है कि चीजों को ठहरा लूं वह दुख और पीड़ा में पड़ जाता है।मनुष्य की चिंता यही है कि जहां कुछ भी नहीं ठहरता, वहां वह ठहराने का आग्रह करता है। अगर किसी के पास धन है, तो सोचता है कि धन ठहर जाए। जिसके पास जो भी है, वह चाहता है कि ठहर जाए। अगर कोई प्रेम करता है, तो चाहता है कि यह प्रेम स्थिर हो जाए। सभी प्रेमी की यही आकांक्षा है कि प्रेम शाश्वत हो जाए। इसलिए सभी प्रेमी दुख में पड़ते हैं। क्योंकि इस जगत में कुछ भी शाश्वत नहीं हो सकता .. प्रेम भी नहीं।यहां सभी कुछ बदल जाता है। जगत का स्वभाव बदलाहट है। इसलिए जिसने भी चाहा कि कोई चीज ठहर जाए वह दुख में पड़ेगा। क्योंकि हमारी चाह से जगत नहीं चलता। जगत का अपना नियम है और वह अपने नि