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क्या हैं सातों शरीर के स्वप्नों के आयाम?PART-03

सातों शरीर और सात चक्र;-

1-फिजिकल बॉडी/ भौतिक शरीर>>> मूलाधार चक्र

2-भाव शरीर/ इमोशन बॉडी>>> स्वाधिष्ठान चक्र

3- कारण शरीर/एस्ट्रल बॉडी>>>मणिपुर चक्र

4-मेंटल बॉडी /मनस शरीर >>>अनाहत चक्र

5-स्पिरिचुअल बॉडी/आत्म शरीर>>> विशुद्ध चक्र

6- कास्मिक बॉडी/ब्रह्म शरीर>>>आज्ञा चक्र

7-बॉडीलेस बॉडी/ निर्वाण काया>>>सहस्रार चक्र

सातों शरीर के स्वप्नों के आयाम;- 07 FACTS;-

1-भौतिक शरीर ;-

02 POINTS;- 1-अगर तुम अस्वस्थ हो, अगर तुम ज्वरग्रस्त हो तो भौतिक शरीर अपनी तरह से स्वप्न निर्मित करेगा। भौतिक रुग्णता अपना अलग स्वप्न-लोक निर्मित करती है इसलिए भौतिक स्वप्न को बाहर से निर्मित किया जा सकता है।अगर तुम्हारा पेट गड़बड़ है तो एक विशेष प्रकार का स्वप्न निर्मित होगा। तुम नींद में हो अगर तुम्हारे Legs पर एक भीगा कपड़ा रख दिया जाए तो तुम स्वप्न देखने लगोगे। तुम्हें दिख सकता है कि तुम एक नदी पार कर रहे हो। अगर तुम्हारे सीने पर तकिया रख दिया जाए तो तुम स्वप्न देखने लगोगे कि कोई तुम्हारे ऊपर बैठा है या कोई पत्थर तुम पर गिर पड़ा है। ये स्वप्न भौतिक शरीर से पैदा होते हैं।

2-तुम्हारे भौतिक शरीर के पास सत्य को जानने का उपाय है और इसके बारे में स्वप्न देखने का भी। जब तुम भोजन करते हो, तो यह वास्तविकता है। किंतु जब तुम स्वप्न देखते हो कि तुम भोजन कर रहे हो तो यह वास्तविकता नहीं है बल्कि यह वास्तविक भोजन का एक विकल्प है । भौतिक शरीर की अपनी वास्तविकता है और स्वप्न देखने की अपनी विधि है। ये दो ढंग हैं, जिनसे भौतिक शरीर कार्य करता है। और ये दोनों ढंग एक-दूसरे से पूर्णत: भिन्न हैं।तुम जितना अधिक केंद्र की ओर जाओगे वास्तविकता और स्वप्नों की ये रेखाएं एक-दूसरे के निकट और निकटतर होती चली जाएंगी ।वैसे ही जैसे कि किसी वृत्त की परिधि/ Circumference से वृत्त के केंद्र की ओर खींची गई रेखाएं जैसे-जैसे तुम केंद्र के निकट जाते हो पास आने लगती हैं। अगर तुम परिधि /बाहर की ओर जाओ तो वे दूर और एक-दूसरे से बहुत दूर होती जाती हैं। जहां तक भौतिक शरीर का संबंध है, स्वप्न और सत्य बहुत दूर हैं और उनके बीच की दूरी सर्वाधिक है। इसलिए स्वप्न असत्य हो जाते हैं.. कल्पना बन जाते हैं। 2-भाव शरीर;-

06 POINTS;- 1-दूसरा भाव शरीर–अपने ढंग के स्वप्न देखता है। भाव शरीर के इन स्वप्नों ने अनेक उलझनें और समस्याएं निर्मित कर दी हैं।फ्रायड उन्हें दमित इच्छाओं के रूप में समझता है। ये वे स्वप्न हैं जो भौतिक इच्छाओं के दमन से संबंधित हैं लेकिन वे भी पहले भौतिक शरीर से संबंधित हैं।दूसरा भाव शरीर, इन मनोवैज्ञानिक खोजों से अछूता रह गया है, या इसे भी भौतिक शरीर के रूप में अभिव्यक्त करता है। अगर तुमने अपनी इच्छाओं का किया है ..उदाहरण के लिए अगर तुमने उपवास किया है—तो स्वप्न में इस बात की बहुत संभावना है कि तुम्हें कुछ नाश्ता दिखाई पड़े। 2-भाव शरीर स्वप्नों में यात्रा कर सकता है। इस बात की पूरी संभावना है कि तुम्हारे भौतिक शरीर से तुम्हारा भाव शरीर बाहर निकल जाए। लेकिन जब तुम इसे याद करते हो, तो यह स्वप्न के रूप में याद आता है। लेकिन यह उन अर्थों में स्वप्न नहीं है जिस तरह भौतिक शरीर के स्वप्न हैं। जब तुम सोए हुए होते हो, तो भाव शरीर तुमसे बाहर जा सकता है। तुम्हारा भौतिक शरीर यहीं पर होगा, लेकिन तुम्हारा भाव शरीर बाहर जा सकता है और आकाश में यात्रा कर सकता है। इसके लिए समय और स्थान की कोई सीमा नहीं है। इसके लिए दूरी का भी कोई प्रश्न नहीं है। वे लोग जो इसे नहीं समझते हैं, ऐसा कह सकते हैं कि यह अचेतन का आयाम है, क्योंकि वे मनुष्य के मन को चेतन और अचेतन में बांटते हैं। भौतिक शरीर के स्वप्न चेतन बन जाते हैं, भाव शरीर के स्वप्न अचेतन। 3-भाव शरीर के स्वप्न अचेतन नहीं हैं। ये उतने ही चेतन हैं जितने भौतिक शरीर के स्वप्न लेकिन एक अन्य तल, अलग स्तर पर चेतन हैं। इसलिए अगर तुम अपने भाव शरीर के प्रति चेतन हो सको, तो उस आयाम के स्वप्न चेतन बन जाते हैं। और जैसे भौतिक स्वप्नों को बाहर से निर्मित किया जा सकता है वैसे ही भाव शरीर के स्वप्न भी बाहर से उद्दीपित, निर्मित किए जा सकते हैं। और उनमें से एक उपाय है 'मंत्र'... जिससे भाव-दृश्य निर्मित किए जा सकते हैं। एक विशेष मंत्र, ध्वनि का एक विशेष संयोजन ..भाव शरीर के भाव स्वप्न निर्मित कर सकता है। एक विशेष ध्वनि / शब्द का भाव-केंद्र पर बार-बार उच्चार किया जाए तो भाव शरीर के स्वप्न निर्मित कर सकता है। इसलिए अपने शिष्यों के सम्मुख गुरुओं का प्रकट हो जाना केवल ..भाव शरीर की यात्रा, भाव शरीर का स्वप्न है। 4-अनेक विधियां हैं जिसमे ध्वनि और सुगंध भी एक उपाय है।एक विशेष सुगंध किसी विशेष स्वप्न को निर्मित कर सकती है। सूफियों ने भाव-दृश्य निर्मित करने के लिए सुगंध का उपयोग किया है। मोहम्मद साहब सुगंध के बहुत शौकीन थे।रंग से भी सहायता मिल सकती है। शरीर का आभामंडल…प्रत्येक व्यक्ति का एक विशिष्ट आभामंडल होता है, और उसके रंग ..भाव शरीर के आयाम से आते हैं। जब कोई ध्यान में गहरा उतरता है और अदभुत रंगों को देखता है, और अदभुत सुगंधों का और ध्वनियों का और संगीत का अनुभव करता है जो नितांत अज्ञात हैं, तो वे भी भाव शरीर के स्वप्न है। लेकिन हमने मन के रहस्यों को केवल एक शारीरिक तल पर खोजा है; इसलिए इन स्वप्नों को या तो शरीर के तल पर परिभाषित किया गया या उनकी उपेक्षा कर दी गई । 5- ‘चेतन’ का अभिप्राय है, वह जो जाना हुआ है। ‘अचेतन’ का अभिप्राय है वह जो अभी तक नहीं जाना गया है, अज्ञात है। कुछ भी अचेतन नहीं है किंतु वह प्रत्येक चीज जो किसी गहरे तल पर चेतन है, अपने से पिछले तल पर अचेतन होती है। भौतिक शरीर के लिए भाव शरीर अचेतन है; भाव शरीर के लिए सूक्ष्म शरीर अचेतन है ;सूक्ष्म शरीर के लिए मनस शरीर अचेतन है।सूक्ष्म शरीर के स्वप्नों में तुम अपने पिछले जन्मों में जा सकते हो। यह तुम्हारे स्वप्नों का तीसरा आयाम है। कभी-कभी किसी सामान्य स्वप्न में भी भाव स्वप्न का या सूक्ष्म स्वप्न का अंश हो सकता है। तब वह स्वप्न एक उलझन बन जाता है ..उसे समझना असंभव हो जाता है।क्योंकि तुम्हारे सातों शरीर एक साथ अस्तित्व में हैं, और एक आयाम से कोई चीज दूसरे की सीमा रेखा को पार कर सकती है, प्रवेश कर सकती है या अतिक्रमण कर सकती है।

6-लेकिन भाव शरीर में वास्तविकता और स्वप्न और पास आ जाते हैं। क्या वास्तविक है और क्या स्वप्न है ..यह जानना भौतिक शरीर की तुलना में भाव शरीर में अधिक कठिन है क्योंकि वे निकट आ गए हैं। किंतु फिर भी अंतर जाना जा सकता है। स्वप्न देखने के लिए तुम्हारा नींद में होना जरूरी है और वास्तविक की अनुभूति के लिए तुम्हें जागा हुआ होना चाहिए।

अंतर जानने के लिए तुम्हें भाव शरीर के तल पर जाग्रत होना पड़ेगा अथार्त Highly Sensitive होना पड़ेगा। दूसरे शरीर के तल पर जागने की विधियां भी हैं। मंत्र की पुनरुक्ति की विधि, जप की विधि और आंतरिक कार्यप्रणाली तुम्हें बाहर के संसार से अलग कर देती है। तुम एक भीतरी वर्तुल में होते हो और घूमते ही रहते हो, तुम्हें बाहर के संसार से कुछ समय के अवकाश की जरूरत होती है।यह सतत मंत्र जप एक सम्मोहित निद्रा पैदा कर सकती है। अगर तुम इस मंत्र जप के कारण सो जाते हो तो तुम स्वप्न देखोगे।किंतु अगर तुम अपने जप के प्रति बोधपूर्ण रह सको और इससे तुम पर कोई सम्मोहक प्रभाव न पड़े तो भाव शरीर से सम्बंधित वास्तविकता को जानोगे। 3-सूक्ष्म शरीर;- 04 POINTS;- 1-सूक्ष्म शरीर के तीसरे शरीर के स्वप्नों में तुम न केवल आकाश में यात्रा कर सकते हो बल्कि समय में भी यात्रा कर सकते हो। पहले भौतिक शरीर के स्वप्नों में तुम न तो समय में यात्रा कर सकते हो और न आकाश में। तुम अपनी भौतिक अवस्था और अपने विशिष्ट समय तक ही सीमित हो–जैसे कि रात ग्यारह बजे। यह ग्यारह बजे का समय तय है, एक विशेष कमरे में /एक फिजियोलॉजिकल स्थान में जो तुमने घेर रखा है ..तुम स्वप्न देख सकते हो, लेकिन इनके पार नहीं। भाव शरीर में तुम आकाश में यात्रा कर सकते हो, किंतु समय में नहीं। तुम यहां पर सो रहे हो और किसी अन्य स्थान में हो सकते हो–यह आकाश में यात्रा है किंतु समय में नहीं। अभी भी रात के ग्यारह ही बजे हैं। तीसरे, सूक्ष्म शरीर में तुम समय के अवरोध का अतिक्रमण कर सकते हो लेकिन केवल अतीत की ओर, भविष्य की ओर नहीं। सूक्ष्म मन अतीत में जा सकता है अथार्त अतीत की पूरी अनंत श्रृंखला में, अमीबा से मनुष्य तक–संपूर्ण प्रक्रिया में। 2-मनोविज्ञान में पहले को चेतन दूसरे को अचेतन और तीसरे को सामूहिक अचेतन कहा जाता है। यह सामूहिक अचेतन तुम्हारे जन्मों का निजी इतिहास है। कभी-कभी यह सामान्य स्वप्नों में प्रविष्ट हो जाता है, लेकिन ऐसा अक्सर बीमारी की अवस्था में होता है। स्वस्थ व्यक्ति के साथ यह नहीं होता। कोई व्यक्ति जो मानसिक रूप से रुग्ण है, उसमें ये तीनों मिले-जुले होते हैं। बीमारी की अवस्था में उसके ये तीनों शरीर अपनी सामान्य पृथकता खो देते हैं। इसीलिए बीमार/ मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति आमतौर से अपने पिछले जन्मों का स्वप्न देख सकता है, किंतु कोई उसका विश्वास नहीं करेगा। वह स्वयं भी इस पर विश्वास नहीं करेगा। लेकिन यह साधारण स्वप्न नहीं है बल्कि सूक्ष्म शरीर का स्वप्न है। और सूक्ष्म शरीर के स्वप्न में बहुत अर्थ है, सार्थकता है। 3-लेकिन तीसरा शरीर केवल अतीत के बारे में स्वप्न देख सकता है अथार्त जो हो चुका है, लेकिन उसे नहीं जो होने वाला है।तीसरे शरीर सूक्ष्म शरीर में वास्तविकता और स्वप्न के अंतर को जान पाना और भी कठिन होता है क्योंकि सीमा-रेखाएं और निकट आ चुकी हैं।यदि तुमने असली सूक्ष्म शरीर को जाना है, तो तुम मृत्यु के भय के पार चले जाओगे, क्योंकि उस बिंदु से व्यक्ति अमरत्व को जान लेता है। लेकिन अगर सूक्ष्म शरीर का यह स्वप्न ही है वास्तविकता नहीं है तो तुम मृत्यु के भय से अत्यंत पंगु हो जाओगे।मृत्यु का भय ही पहचान की कसौटी है अथार्त भेद का बिंदु है।अमरत्व में विश्वास नहीं करना है, इसे जानना है। और जानने से पूर्व, इसके बारे में संदेह, अनिश्चितता होनी चाहिए।जो व्यक्ति विश्वास करता है कि आत्मा अमर है और बार-बार इसे दोहराता है और अपने आपको सांत्वना दिए चला जाता है वह यह नहीं जान पाएगा कि सूक्ष्म शरीर में जो यथार्थ है और सूक्ष्म शरीर में जो स्वप्न है उनमें क्या अंतर है।

4- जब यह तथ्य तुम पर उदघाटित हो जाता है कि तुम्हें नहीं मारा जा सकता है ;केवल तब तुम जानोगे कि तुमने इसे जाना है या बस स्वप्न में प्रक्षेपित कर लिया है। अगर तुमने अमरत्व को एक विश्वास के रूप में लिया है और इसका अभ्यास किया है तो यह तुम्हारे सूक्ष्म मन तक पहुंच सकता है। तब तुम स्वप्न देखना शुरू कर दोगे किंतु यह बस एक स्वप्न होगा। अगर तुम्हारे पास ऐसा कोई विश्वास नहीं है, बस जानने की, खोजने की एक प्यास है।तब बिना किसी पूर्व- धारणा या पूर्वाग्रह के तुम शून्य में खोजोगे और अंतर को जान लोगे। जो लोग ऐसे विश्वास की दशा में होते हैं वे बस सूक्ष्म शरीर में स्वप्न देखते रहते हैं और वास्तविकता को नहीं जानते हैं। 4-चौथा शरीर, मनस शरीर;- 05 POINTS;- 1-चौथा शरीर, मनस शरीर है जो दोनों ओर की यात्रा करता है। यह एकतरफा नहीं है बल्कि अतीत और भविष्य में यात्रा कर सकता है। यह मनस शरीर कभी-कभी भविष्य के बारे में स्वप्न देख सकता है। किसी परम आपातकाल में कोई सामान्य व्यक्ति भी भविष्य की एक झलक पा सकता है। कोई प्रियजन या तुम्हारा कोई निकटतम व्यक्ति मर रहा है तो यह आपातकाल की एक ऐसी अवस्था है जिसका संदेश तुम्हें तुम्हारे सामान्य स्वप्नों में भी दिया जा सकता है ।क्योंकि तुम स्वप्नों का कोई और आयाम नहीं जानते हो इसलिए यह संदेश तुम्हारे सामान्य स्वप्न में प्रविष्ट हो जाएगा।लेकिन यह स्पष्ट नहीं होगा,क्योंकि कुछ ऐसे अवरोध हैं जिन्हें पार किया जाना है और प्रत्येक मन के अपने प्रतीक होते हैं।

2-इसलिए जब कोई स्वप्न एक शरीर से दूसरे शरीर में जाता है तो वह उस शरीर के प्रतीक के अनुसार बदल जाता है।दूसरे शरीरों के माध्यम से हर बात उलझ जाती है।अगर तुम स्पष्ट रूप से स्वप्न देखो, जैसे कि चौथे शरीर के स्वप्न होते हैं .. तब तुम भविष्य में झांक सकते हो। किंतु केवल अपने भविष्य में ... तुम दूसरों के भविष्य में नहीं झांक सकते हो।चौथे शरीर के लिए अतीत ,भविष्य और वर्तमान एक हो जाते हैं। चौथे शरीर के लिए समय नहीं होता है, क्योंकि अतीत भी उतना ही वर्तमान है जितना कि भविष्य वर्तमान है। इसीलिए विभाजन अर्थ खो देता है और प्रत्येक बात ‘अभी’ बन जाती है। यहां न अतीत है और न भविष्य लेकिन फिर भी समय है जो ‘वर्तमान’ के रूप में है। यह अब भी काल का प्रवाह है इसीलिए तुम्हें अपने मन को एकाग्र करना पड़ेगा।तुम अतीत की ओर देख सकते हो, किंतु यह एकाग्रता होगी, तब भविष्य और वर्तमान ओझल हो गए होंगे। जब तुम भविष्य की ओर एकाग्र होते हो तब वे दोनों अनुपस्थित होंगे। वहां एक क्रमबद्धता होगी।

3- तुम संपूर्ण को एक साथ नहीं देख सकते हो। समय होगा, किंतु अतीत वर्तमान और भविष्य नहीं होंगे और यह तुम्हारी निजी स्वप्नावस्था होगी।चौथे शरीर में ये दोनों अथार्त,स्वप्न और वास्तविकता पड़ोसी हो जाते हैं। और उनके चेहरे इतने एक रूप हो जाते हैं जैसे कि वे जुड़वा हों और उनमें एक को दूसरे की तरह समझ लेने की पूरी संभावना है। मनस शरीर ऐसे स्वप्न देख सकता है जो इतने यथार्थ लगें कि वास्तविक जैसे प्रतीत हों। और उन स्वप्नों को निर्मित करने के लिए योग की, तंत्र की और बहुत विधियां हैं। अगर कोई व्यक्ति उपवास ,एकांत, अंधकार आदि का अभ्यास कर रहा हो, तो वह चौथे प्रकार के मानसिक स्वप्न निर्मित कर लेगा। और वे उस यथार्थ से भी अधिक वास्तविक होंगे जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है।अब मन सृजन करने के लिए पूर्णत: मुक्त है। वहां पर मन बिना किन्हीं बाह्य बाधाओं के अपनी पूरी सृजनात्मकता में होता है।कवि, चित्रकार आदि इस तरह के लोग स्वप्नों के चौथे प्रकार में जीते हैं। सभी कलाएं स्वप्नों के चौथे प्रकार द्वारा निर्मित हुई हैं। 4-जो व्यक्ति स्वप्नों के इस चौथे आयाम में स्वप्न देख सकता है वह महान कलाकार हो सकता है परंतु ज्ञानी नहीं।मन के चौथे आयाम में, चौथे शरीर में व्यक्ति को किसी भी प्रकार के मानसिक सृजन के प्रति होशपूर्ण रहना पड़ेगा। उसे कुछ भी निर्मित या प्रक्षेपित नहीं करना चाहिए, वरना वही निर्मित हो जाएगा। व्यक्ति को कोई इच्छा नहीं करनी चाहिए वरना इस बात का पूरा खतरा है कि वह इच्छा पूरी हो जाएगी। और न केवल अंतस के लोक में बल्कि बाह्य जगत में भी इच्छा पूरी हो जा सकती है। चौथे शरीर में मन बहुत शक्तिशाली, बहुत सुस्पष्ट होता है। यह मन के लिए अंतिम घर है। इसके बाद अ-मन आरंभ हो जाता है।चौथा शरीर मन का, मूल-स्रोत है इसलिए तुम कुछ भी निर्मित कर सकते हो।व्यक्ति को इस बात के प्रति निरंतर सजग रहना चाहिए कि उसके भीतर कोई भी वासना, कोई भी कल्पना, कोई प्रतिमा कोई देवता, कोई देवी, कोई गुरु न हो।वरना वे सभी तुमसे निर्मित हो जाएंगे।तुम उनके सृष्टा होओगे और ये अनुभूतियां इतनी आनंददायी हैं कि तुम उन्हें निर्मित करना चाहोगे।

5-साधक के लिए यह अंतिम अवरोध है।अगर कोई इसको पार कर लेता है, तो उसे इससे बड़ी कोई और रुकावट नहीं मिलेगी।अगर तुम बोधपूर्ण हो और चौथे शरीर में बस एक साक्षी हो, तो तुम यथार्थ को जान लेते हो।अन्यथा तुम स्वप्न देखते रह सकते हो जो बहुत अच्छे होंगे और किसी भी आनंद या कोई वास्तविकता इनसे तुलना न कर पाएगी।इसलिए व्यक्ति को किसी भी प्रकार की मानसिक प्रतिमा से सावधान रहना है।जैसे ही कोई प्रतिमा आती है, चौथा मन स्वप्न मे