शिवसूत्र 41-''आत्‍मा नर्तक है''।

NOTE;-महान शास्त्रों और गुरूज्ञान का संकलन ....

सूत्र है ''आत्मा नर्तक है'' ;-

हिन्दू धर्म में परमात्मा को नटराज कहा गया है।वह नृत्य कर रहें है और 'नटराज' शब्द में भी बड़ा अर्थ है।कोई व्यक्ति चित्र बनाये, कविता लिखे , मूर्ति गढ़े,तो बनाने वाला अलग और चित्र , कविता, मूर्ति अलग हो जाती है।सिर्फ नृत्य एक मात्र कृत्य है, जहां नर्तक और नृत्य एक होता है;अथार्त जिसमें कर्ता और कृत्य बिलकुल एक हो जाते हैं। उन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। अगर नर्तक चला जाएगा तो नृत्य खो जाएगा।और जिसका नृत्य खो गया,उसे नर्तक कहने का कोई अर्थ नहीं।वे दोनों संयुक्त हैं।इसलिए परमात्मा को नर्तक कहना सार्थक है।सृष्टि और सृष्टा के बीच नृत्य और नर्तक का संबंध है।यह सृष्टि उससे भिन्न नहीं है।यह उसका नृत्य है।यह उसकी कृति या कोई बनायी हुई मूर्ति नहीं है कि परमात्मा ने बनाया और वह अलग हो गया।प्रतिपल परमात्मा इसके भीतर मौजूद है।वह अलग हो जाएगा तो नर्तन बंद हो जाएगा और नर्तन बंद हो जाएगा तो परमात्मा भी खो जाएगा।वह पत्ते -पत्ते में, कण -कण में प्रकट हो रहा है।सृष्टि कभी पीछे अतीत में होकर समाप्त नहीं हो गयी; प्रतिपल हो रही है।प्रतिपल सृजन का कृत्य जारी है।इसलिए सब कुछ नया है।

परमात्मा नृत्य कर रहें है -बाहर भी और भीतर भी।भगवान शिव कहते है ''आत्मा नर्तक है''।तुम्हारे कृत्य और तुम्हारा अस्तित्व अलग -अलग नहीं है।तुम्हारे कृत्य तुम्हारे ही अस्तित्व से निकलते है; जैसे नृत्य निकलता है नर्तक से।और, नर्तक अगर चिल्लाने लगे कि मैं इस नृत्य से परेशान हूं ..मैं इसे नहीं करना चाहता तो तुम कहोगे ..‘'रुक जाओ।तुम ही तो नाच रहे हो।''अगर नृत्य नृत्य से तुम्हें दुख मिलता है तो वह तुमसे ही निकला है। ठहर जाने से नृत्य खो जाएगा ।जैसे वृक्षों से पत्ते निकलते हैं, ऐसे ही तुम्हारे अस्तित्व से तुम्हारे कृत्य निकलते हैं। लेकिन रुक जाने से कृत्य खो जाएंगे।अगर इस दुख के नृत्य को अथार्त विषाद और संताप से भरे जीवन को तुम रोक दोगे तो नृत्य तो नहीं रुकेगा, बल्कि रूप बदल जायेगा। क्योंकि नृत्य तो तुम्हारे जीवन का अंग है ,स्वभाव है। नाचते तो तुम रहोगे ही, लेकिन तब आंसू नहीं होंगे, मुस्कराहट होगी ...एक आनंद होगा।अभी तुम्हारा नृत्य नरकीय है और तब स्वर्गीय होगा।

परमात्मा नृत्य कर रहें है और उनके साथ हम नाच रहे हैं।जैसे परमात्मा श्रीकृष्ण होकर बांसुरी बजा रहें है और हम गोपी होकर नाच रहे हैं।गगन मंडल में रास रचा है और अब तो अंतर-आकाश में रास रचा है।यह शुद्ध निर्विकल्प समाधि की अवस्था आ गई... जो आखिरी पड़ाव है।जहां सहस्त्रदल कमल खुल जाता है और जीवन चेतना अपनी परिपूर्णता को उपलब्ध होती है।उसके ऊपर कुछ भी नहीं हैं।उसको ही पाने के लिए हम अनंत-अनंत जन्मों से यात्रा कर रहे हैं।परमात्मा से मनुष्य का कभी मिलन नहीं होता क्योकि मनुष्य होता है, तब तक परमात्मा नहीं होते।और जब परमात्मा होते है तो मनुष्य नहीं होता। परमात्मा से मिलना अपनी महामृत्यु से मिलना है।लेकिन महामृत्यु से मिलना ही महाजीवन का द्वार है ।परमात्मा भीतर आ जाये तो जीवन आ जाता है।तब एक नृत्य का जन्म होता है ..जिसमें गति नहीं है ,सब ठहरा हुआ है और फिर भी नृत्य चल रहा है ।जैसे एक गीत, जहां ध्वनि नहीं है, परिपूर्ण शून्य मौन है, फिर भी स्वर बज रहा है।उसको ही अनाहत नाद या नाद ब्रह्म कहा गया है।ध्वनि खो जाती है, फिर भी नाद रह जाता है।

यह कहना भी बड़ा कठिन है और समझना भी...लेकिन होता है।लेकिन बुद्धि की समझ बहुत दूर नहीं जाती।आत्मा नर्तक है..इसका अर्थ है कि तुमने जो भी किया है, तुम जो भी कर रहे हो और करोगे, वह तुमसे भिन्न नहीं है। वह तुम्हारा ही खेल है। अगर तुम दुख झेल रहे हो तो यह तुम्हारा ही चुनाव है।अगर तुम आनंदमग्न हो, यह भी तुम्हारा चुनाव है; कोई और जिम्मेवार नहीं है।तुम अपने परमात्मा को अपनी ही प्रतिमा में ढालते हो। तुम उदास हो तो तुम्हारा परमात्मा उदास होगा। तुम प्रसन्न हो तो तुम्हारा परमात्मा प्रसन्न होगा। तुम नाच सकते हो तो तुम्हारा परमात्मा भी नाच सकेगा। तुम जैसे हो, वैसा ही तुम्हें अस्तित्व दिखाई पड़ता है। तुम्हारी दृष्टि का फैलाव ही सृष्टि है। और जब तक तुम नाचते हुए परमात्मा में भरोसा न कर सको, तब तक जानना कि तुम स्वस्थ नहीं हुए। उदास, रोते हुए, रुग्ण परमात्मा की धारणा तुम्हारी रुग्ण दशा की सूचक है।यही तुम्हारा जीवन है। हंसो तो तुम हंस रहे हो, रोओ तो तुम रो रहे हो; जिम्मेवार कोई भी नहीं। यह हो सकता है कि बहुत दिन रोने से तुम्हारी रोने की आदत बन गयी हो और तुम हंसना भूल गये हो।

या तुम इतने रोये हो कि अब यही तुम्हारा अभ्यास हो गया।अथवा तुम इतने जन्मों से रो रहे हो कि तुम्हें याद ही नहीं कि कभी मैने ही यह रोना चुना था ।लेकिन तुम्हारे भूलने से सत्य असत्य नहीं होता है। तुमने ही चुना है तो तुम ही मालिक हो।और, इसलिए जिस क्षण तुम तय करोगे, उसी क्षण रोना रुक जाएगा।इस बोध से भरने का नाम ही कि ‘मैं ही मालिक हूं, ‘मैं ही सृष्टा हूं,, ‘जो भी मैं कर रहा हूं उसके लिए मै ही जिम्मेवार हूं, जीवन में क्रांति हो जाती है। जब तक तुम दूसरे को जिम्मेवार समझोगे, तब तक क्रांति असंभव है; क्योंकि तब तक तुम निर्भर रहोगे। तुम सोचते हो कि दूसरे तुम्हें दुखी कर रहे हैं, तो फिर तुम सुखी नहीं हो सकते ।यह असंभव है ,क्योंकि दूसरों को बदलना तुम्हारे हाथ में नहीं है। तुम्हारे हाथ में तो केवल स्वयं को बदलना है।अगर तुम सोचते हो कि तुम भाग्य के कारण दुखी हो .. तो फिर बात तुम्हारे हाथ के बाहर हो गयी। भाग्य को तुम बदल नहीं सकते क्योंकि भाग्य तुमसे ऊपर है।जो भी हो रहा है वो तो विधाता ने ही तुम्हारी विधि में लिख दिया है ....फिर तुम परतंत्र हो जाओगे...आत्मवान न रहोगे।आत्मा का अर्थ ही यह है कि तुम स्वतंत्र हो; और, चाहे कितनी ही पीड़ा तुम भोग रहे हो, तुम्हारे ही निर्णय का फल है। और जिस दिन तुम निर्णय बदलोगे, उसी दिन जीवन बदल जाएगा। फिर..जीवन को देखने के ढंग पर सब कुछ निर्भर करता है।

आत्‍मा का स्वभाव नर्तन है, और आत्मा दो तरह से नाच सकती है। इस तरह से भी नाच सकती है कि चारों तरफ अंधकार पैदा हो , दुख का जाल और उदासी भर जाए। और,आत्मा ऐसे भी नाच सकती है कि चारों तरफ प्रकाश की किरणें भर जाए।नरक कहीं और नहीं है ...संन्यास आनंद का नृत्य है और गृहस्थ दुख का नृत्य।तुम्हारे गलत नाचने का ढंग ही नरक है, जिससे दुख पैदा होता है।और स्वर्ग तुम्हारे ठीक नाचने का ढंग है जिससे तुम जहां भी हो, वहां स्वर्ग पैदा हो जाता है। स्वर्ग और नर्क दोनो ही तुम्हारे नृत्य का गुण है।एक लोकोक्ति है... 'नाच न जाने आँगन टेढ़ा '।तुम नाचना नहीं जानते; लेकिन सदा सोचते हो कि आंगन टेढ़ा है, इसलिए नाच ठीक नहीं हो रहा है।नाचना आंगन के सीधे होने पर निर्भर नहीं है, वह सीखना पड़ेगा। और वास्तव में, तुम बिलकुल अकेले हो ...कोई और सिखानेवाला नहीं है।वह जीवन का नृत्य इतना भीतर और गहरा है कि वहां तुम्हारे सिवाय किसी का प्रवेश नहीं है। वहां तुम निपट अकेले हो ..शेष सब बाहर है।

आत्मा नर्तक है इसीलिए सुख और दुख दों ढंग से नाच सकती है। अगर तुम दुखी हो तो तुमने नाचने के गलत ढंग सीख लिए हैं । इसीलिए किसी के ऊपर दोष मत डालों बल्कि ढंग को बदलों।जब तक तुम शिकायत करोगे ...गलत ही नाचते रहोगे। अपनी तरफ देखो और खोजो ।जहां-जहां तुम्हें दुख पैदा होता है ,उसके कारण तुम्हारे भीतर ही मिलेंगे।कुछ देर के लिए रुक जाओ ...कुछ मत करो। जब तक ठीक से करना न आ जाए, तब तक न करना ही बेहतर है; क्योंकि हर गलत कृत्य, एक गलत कृत्यों की शृंखला पैदा करता है।उसको ही कर्मों का जाल कहा जाता है।तुम्हारा खाली बैठना ही ध्यान है, ताकि पुरानी आदत छूट जाए और तुम्हें साफ -साफ दिखाई पड़ने लगे।वास्तव में, तुम इतने व्यस्त हो कि देखने का समय ही नहीं है।ध्यान का इतना ही अर्थ है कि तुम एक या दो घंटा.. जितनी देर तुम्हें मिल जाए, खाली बैठ जाओ और कुछ मत करो। सिर्फ देखते रहो , ताकि धीरे -धीरे तुम्हारी आंखे पैनी और गहरी हो जाए और तुम्हें यह दिखाई पड़ने लगे कि जो सब मेरे जीवन में हुआ, मैं ही उसका कारण था। यह प्रतीति आते ही व्यर्थ का रोना बंद हो जाएगा। तब एक सार्थक नृत्य पैदा होता है।सही धर्म हमेशा नृत्य है , परम आनंद है।धर्म त्याग या उदासी नहीं है बल्कि अस्तित्व के नृत्य के साथ एक हो जाना है।

...SHIVOHAM...