विपश्यना साधना /अनापानसती योग

“ध्यान” की सर्वोच्च स्थिति कौनसी है?


शुरुआत में नए साधक को ये कहा जाता है कि “श्वास” को “देखों।”जबकि उसे तो “सामने” पड़ी “चीज” भी वहां क्यों पड़ी है, इसका भी “चिंतन” वो नहीं कर पाता।तो फिर “श्वास”… जो कि “दिखता” नहीं है, उसेवह कैसे “देखे?”वो तो “श्वास” को “देखना”

भी वैसे ही समझता है,जैसे कि सामने पड़ी हुई “बाल्टी” जिसमें गरम पानी भरा हुआ है और “कुछ वाष्प” (भाप) निकलती दिखाई दे रही हो, विशेषत: सर्दी के मौसम में।सर्दी के मौसम में खुद का “श्वास” उसे वैसा ही दिखाई देता है।परन्तु ये “श्वास” देखना नहीं है।ध्यान” की सर्वोच्च स्थिति है कि उस बात को “महसूस” करना कि “श्वास” जो आ रहा है, वो कहाँ से आया, शरीर के भीतर कहाँ गया और वापस निकल कर कहाँ गया।

विपश्यना साधना /अनापानसती योग

विपश्यना आत्मनिरीक्षण की एक प्रभावकारी विधि है। इससे आत्मशुद्धि होती है। यह प्राणायाम और साक्षीभाव का मिला-जुला रूप है। दरअसल, यह साक्षीभाव का ही हिस्सा है। चिरंतन काल से ऋषि-मुनि इस ध्यान विधि को करते आए हैं। भगवान बुद्ध ने इसको सरलतम बनाया। इस विधि के अनुसार अपनी श्वास को देखना और उसके प्रति सजग रहना होता है। देखने का अर्थ उसके आवागमन को महसूस करना।

इसलिए बुद्ध के सूत्र की गहरी बात अनापानसती योग कही जाती है। आती-जाती श्वास को देखना ही योग है, बुद्ध ने कहा। अगर कोई आती-जाती श्वास के राज को पूरा समझ ले, तो फिर उसको दुनिया में और कुछ करने को नहीं रह जाता। इसलिए बुद्ध तो कहते हैं, अनापानसती योग सध गया कि सब सध गया। बात ठीक कहते हैं। उधर से भी सब सध जा सकता है।


क्रोध आता है, तब आप देखें कि श्वास बदल जाती है। जब आप शांत होते हैं, तब श्वास बदल जाती है, रिदमिक हो जाती है। आप आरामकुर्सी पर भी लेटे हैं, शांत हैं, मौज में हैं, चित्त प्रसन्न है, पक्षियों जैसा हलका है, हवाओं जैसा ताजा है, आलोकित है। तब देखें, श्वास ऐसी हो जाती है, जैसे हो ही नहीं। पता ही नहीं चलता। बहुत हलकी हो जाती है; न के बराबर हो जाती है।


देखें, जब क्रोध मन को पकड़ता है, तो श्वास कैसी हो जाती है? श्वास एकदम अस्तव्यस्त हो जाती है। रक्तचाप बढ़ जाता है; शरीर पसीना छोड़ने लगता है, श्वास तेज हो जाती है और अस्तव्यस्त हो जाती है ।


प्रत्येक समय भीतर की स्थिति के साथ श्वास जुड़ी है। अगर कोई श्वास में बदलाहट करे, तो भीतर की स्थिति में बदलाहट की सुविधा पैदा करता है, और भीतर की स्थिति पर नियंत्रण लाने का पहला पत्थर रखता है।


प्राणयोग का इतना ही अर्थ है कि श्वास बहुत गहरे तक प्रवेश किए हुए है, वह हमारी आत्मा को भी छूती है। एक तरफ शरीर को स्पर्श करती है, दूसरी तरफ आत्मा को स्पर्श करती है। एक तरफ जगत को छूती है बाहर, और दूसरी तरफ भीतर ब्रह्म को भी छूती है। श्वास दोनों के बीच आदान-प्रदान है–पूरे समय, सोते-जागते, उठते-बैठते। इस आदान-प्रदान में श्वास का रूपांतरण प्राणयोग है, ट्रांसफार्मेशन आफ दि ब्रीदिंग प्रोसेस। वह जो प्रक्रिया है हमारे श्वास की, उसको बदलना। और उसको बदलने के द्वारा भी व्यक्ति परमसत्ता को उपलब्ध हो सकता है।

कैसे करें विपश्यना : विपश्यना बड़ा सीधा-सरल प्रयोग है। अपनी आती-जाती श्वास के प्रति साक्षीभाव। प्रारंभिक अभ्यास में उठते-बैठते, सोते-जागते, बात करते या मौन रहते किसी भी स्थिति में बस श्वास के आने-जाने को नाक के छिद्रों में महसूस करें। जैसे अब तक आप अपनी श्वासों पर ध्यान नहीं देते थे लेकिन अब स्वाभाविक रूप से उसके आवागमन को साक्षी भाव से देखें या महसूस करें कि ये श्‍वास छोड़ी और ये ली। श्‍वास लेने और छोड़ने के बीच जो गैप है, उस पर भी सहजता से ध्यान दें। जबरन यह कार्य नहीं करना है। बस, जब भी ध्यान आ जाए तो सब कुछ बंद करके इसी पर ध्यान देना ही विपश्यना है। विपश्यना की शील पालन के पश्चात आनापान दूसरी महत्वपूर्ण सीढ़ी है। इससे समाधि पुष्ट होती है।

आनापान साधना के लाभ

अ) विद्यार्थियों के लिए

1- मन एकाग्र होने लगता है।

2- मन से भय, चिंता, तनाव दूर होने लगते हैं।

3- घबराहट जाती रहती है।

4- पढाई में मन लगता है और इसमे खूब प्रगति होने लगती है।

5- खेल- कूद व विविध कलाओं में कुशलता आती है।

6- कोई भी बात समझने और समझाने की शक्ति बढ़ जाती है।

7- आत्मविश्वास बढ़ता है।

8- सजगता बढ़ती है।

9- आपसी सदभावना बढ़ती है।

10- मन खूब सबल हो जाता है।

बच्चे उक्त लाभ पाने के लिए प्रतिदिन 10-15 मिनिट का दो बार नियमित अभ्यास जरूर करें।

ब) अन्य सभी के लिए---

# सबसे बड़ा लाभ तो यह है की जीवन में जब कभी कोई कठिनाई आए, फट सांस पर काम करना शुरू कर दें। इससे तुरंत लाभ मिलना शुरू हो जाएगा।

1) सामान्य/ प्रतियोगी परीक्षा के समय लोग नर्वस (चिंतित) हो जाते हैं और याद की हुई बातें भूल जाते हैं। प्रश्न पत्र खोलने से पूर्व यदि 2-3 मिनिट तक सांस को जानने का काम कर लिया जाय तो सारी व्याकुलता दूर हो जाती है और याद की हुई बातें स्मृति पर उभर आती हैं। इससे परीक्षा में निश्चित सफलता मिलती है।

2) किसी सार्वजनिक सभा में बोलने से पहले यदि 1-2 मिनिट तक साँस को जानते रहें तो मन अत्यंत स्थिर हो जाता है और बिना किसी घबराहट के धारा प्रवाह बोल सकते हैं।

3) कभी मन भटक रहा हो, बैचैन हो तो आना पान पर काम करने से मन का भटकाव और बेचैनी दूर हो जाती है।

4) वर्तमान में जीने का अभ्यास दृढ होने लगता है। (बिना किसी प्रयोजन के भूतकाल में लोट प्लोट लगाना अथवा भविष्य की चिंता करते रहना हमें दुखी ही बनाते हैं।)

5) दिवास्वप्न जिसमे मानस की बहुत सी शक्ति व्यर्थ चली जाती है, से छुटकारा हो जाता है।

6) यदि किसी से खटपट हो जाए और क्रोध उभरने लगे तो देखेंगे की साँस तेज हो गया। इस तेज साँस को देखने लगेंगे तो देखते देखते गुस्सा शांत हो जाएगा।

7) छोटी उम्र में बच्चों को धूम्रपान या अन्य किसी प्रकार का व्यसन लग जाए तो यदि वह इनकी तलब (राग- क्रेविंग) लगने पर थोड़ी देर आना पान का काम करे तो इन व्यसनों की पकड़ ढीली पड़ने लगती है।

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