विज्ञान भैरव तंत्र की श्‍वास-क्रिया से संबंधित,ध्यान की महत्वपूर्ण नौ विधियां क्या है?PART-01


क्या तंत्र विज्ञान है, दर्शन नहीं?-

03 FACTS;-

1-विज्ञान भैरव तंत्र का अर्थ ही है- चेतना के पार जाने की विधि।तंत्र शब्द का अर्थ ही है विधि, उपाय, मार्ग। तंत्र का अर्थ विधि है। इसलिए यह एक विज्ञान ग्रंथ है। विज्ञान 'क्यों' की नहीं, 'कैसे' की फिक्र करता है। दर्शन और विज्ञान में यही बुनियादी भेद है। दर्शन पूछता है.. यह अस्तित्व क्यों है? विज्ञान पूछता है: यह अस्तित्व कैसे है?दर्शन को समझना आसान है, क्योंकि उसके लिए सिर्फ मस्तिष्क की जरूरत पड़ती है। लेकिन, तंत्र को समझने के लिए तुम्हारे बदलने की जरूरत होगी, बदलाहट की नहीं, आमूल बदलाहट की जरूरत होगी। जब तक तुम बिल्कुल भिन्न नहीं हो जाते हो, तब तक तंत्र को नहीं समझा जा

सकता। क्योंकि तंत्र बौद्धिक प्रस्तावना ही नहीं बल्कि एक अनुभव भी है। विज्ञान भैरव तंत्र देवी के प्रश्नों से शुरू होता है। देवी ऐसे प्रश्न पूछती हैं, जो दार्शनिक मालूम होते हैं। लेकिन शिव उत्तर उसी ढंग से नहीं देते। देवी पूछती हैं- प्रभो आपका सत्य क्या है? शिव इस प्रश्न का उत्तर न देकर उसके बदले में एक विधि देते हैं। अगर देवी इस विधि से गुजर जाएँ तो वे उत्तर पा जाएँगी। इसलिए उत्तर परोक्ष है, प्रत्यक्ष नहीं।

2-शिव नहीं बताते कि मैं कौन हूँ, वे एक विधि भर बताते हैं। वे कहते हैं : यह करो और तुम जान जाओगे। तंत्र के लिए करना ही जानना है। तुम एक प्रश्न पूछते हो और दर्शन एक उत्तर दे देता है, उससे तुम चाहे संतुष्ट होते हो या नहीं होते हो, यदि संतुष्ट हुए तो उस दर्शन के अनुयायी हो जाते हो, लेकिन तुम वही के वही रहते हो। और यदि संतुष्ट नहीं हुए तो दूसरे दर्शन की खोज में निकल चलते हो, जिनसे संतुष्टि मिल सके। लेकिन, तुम वही के वही रहते हो, अछूते, अपरिवर्तित।इसलिए तंत्र समाधान

नहीं देता, समाधान को उपलब्ध होने की विधि देता है। अगर तुम अंधे आदमी को प्रकाश के बारे में कुछ कहोगे, तो वह कहना बौद्धिक होगा। और अगर अंधा स्वयं देखने में सक्षम हो जाता है, तो वह अस्तित्वगत बात होगी।

3-इस अर्थ में तंत्र अस्तित्वगत है।तंत्र के सभी ग्रंथ शिव और देवी के बीच संवाद हैं। देवी पूछती हैं और शिव जवाब देते हैं। सभी तंत्र-ग्रंथ ऐसे ही शुरू होते हैं। तंत्र की एक निश्चित अवस्था , ढंग है।दलील के लिए उसमें जगह नहीं है, शब्दों का वहाँ अपव्यय नहीं है। उसमें तथ्यों के सीधे-सादे वक्तव्य हैं, जो तारनुमा भाषा में, संक्षिप्ततम रूप में कहे गए हैं। उसमें किसी से मनवाने का आग्रह नहीं है, मात्र बताने की बात है।शिव के ये वचन अति संक्षिप्त हैं, सूत्र रूप में हैं। लेकिन, शिव का प्रत्येक सूत्र एक वेद की हैसियत का है। उनका एक अकेला वाक्य एक महान शास्त्र का, धर्मग्रंथ का आधार बन सकता है।

ध्यान की नौ विधियां में श्‍वास-क्रिया का महत्व;-

05 FACTS;-

1-आरंभ की नौ विधियां श्‍वास-क्रिया से संबंध रखती है। इसलिए पहले हम श्‍वास-क्रिया के

संबंध में थोड़ा समझ लें ।हम जन्‍म से मृत्‍यु के क्षण तक निरंतर श्‍वास लेते रहते है। इन दो बिंदुओं के बीच सब कुछ बदल जाता है। कुछ भी बदले बिना नहीं रहता। लेकिन जन्‍म और मृत्‍यु के बीच श्‍वास क्रिया अचल रहती है। बच्‍चा जवान होगा, जवान बूढ़ा होगा। वह बीमार होगा ,उसका शरीर रूग्‍ण और कुरूप होगा। सब कुछ बदल जायेगा। वह सुखी होगा, दुःखी होगा, पीड़ा में होगा, सब कुछ बदलता रहेगा। लेकिन इन दो बिंदुओं के बीच व्यक्ति सतत श्‍वास लेता रहेगा।

2-श्‍वास क्रिया एक सतत प्रवाह है, उसमें अंतराल संभव नहीं है। अगर तुम एक क्षण के लिए भी श्‍वास लेना भूल जाओं तो तुम समाप्‍त हो जाओगे। यही कारण है कि श्‍वास लेने का जिम्‍मा तुम्‍हारी नहीं है। नहीं तो मुश्‍किल हो जायेगी। कोई श्‍वास

लेना भूल जाये तो फिर कुछ भी नहीं किया जा सकता।इसलिए यथार्थ में तुम श्‍वास नहीं लेते हो, क्‍योंकि उसमे तुम्‍हारी जरूरत नहीं है। तुम गहरी नींद में हो और श्‍वास चलती रहती है। तुम गहरी मूर्च्‍छा में हो और श्‍वास चलती रहती है। श्‍वासन तुम्‍हारे

व्‍यक्‍तित्‍व का एक अचल तत्‍व है। दूसरी बात यह जीवन कमें अत्‍यंत आवश्‍यक और आधारभूत है। इसलिए जीवन और श्‍वास पर्यायवाची हो गये। इसलिए भारत में उसे प्राण कहते है। श्‍वास और जीवन को हमने एक शब्‍द दिया। प्राण का अर्थ है, जीवन

शक्‍ति,जीवंतता। तुम्‍हारा जीवन तुम्‍हारी श्‍वास है।तीसरी बात श्‍वास तुम्‍हारे और तुम्‍हारे शरीर के बीच एक सेतु है। सतत श्‍वास तुम्‍हें तुम्‍हारे शरीर से जोड़ रही है ,संबंधित कर रही है।

3-श्‍वास सिर्फ तुम्‍हारे और तुम्‍हारे शरीर के बीच ही सेतु नहीं है, बल्कि वह तुम्‍हारे और विश्‍व के बीच भी सेतु है। तुम्‍हारा शरीर विश्‍व का अंग है। शरीर की हरेक चीज, हरेक कण, हरेक कोश विश्‍व का अंश है। यह विश्‍व के साथ निकटतम संबंध है। और श्‍वास सेतु है। और अगर सेतु टूट जाये तो तुम शरीर में नहीं रह सकते। तुम किसी अज्ञात आयाम में चले जाओगे। इस

लिए श्‍वास तुम्‍हारे और देश काल के बीच सेतु हो जाती है। श्‍वास के दो बिंदु है, दो छोर है। एक छोर है जहां वह शरीर और विश्‍व को छूती है। और दूसरा वह छोर है जहां वह विश्‍वातीत को छूती है। और हम श्‍वास के एक ही हिस्‍से से परिचित है। जब वह विश्‍व में, शरीर में गति करती है। लेकिन वह सदा ही शरीर से अशरीर में गति करती है। अगर तुम दूसरे बिंदू को, जो सेतु है, धुव्र है, जान जाओं तो तुम एकाएक रूपांतरित होकर एक दूसरे ही आयाम में प्रवेश कर जाओगे।

4-लेकिन शिव जो कहते है वह योग नहीं तंत्र है। योग भी श्‍वास पर काम करता है। लेकिन योग और तंत्र के काम में बुनियादी फर्क है। योग श्‍वास-क्रिया को व्‍यवस्‍थित करने की चेष्‍टा करता है। अगर तुम अपनी श्‍वास को व्‍यवस्‍था दो तो तुम्‍हारा स्‍वास्‍थ सुधर जायेगा। इसके रहस्‍यों को समझो, तो तुम्‍हें स्‍वास्‍थ और दीर्घ जीवन मिलेगा। तुम ज्‍यादा स्ट्रांग ,ज्‍यादा

ओजस्‍वी, ज्‍यादा जीवंत, ज्‍यादा ताजा हो जाओगे। लेकिन तंत्र का इससे कुछ लेना देना नहीं है। तंत्र स्‍वास की व्‍यवस्‍था की चिंता नहीं करता। भीतर की और मुड़ने के लिए वह श्‍वास क्रिया का उपयोग भर करता है। तंत्र में साधक को किसी विशेष ढंग की श्‍वास का अभ्‍यास नहीं करना चाहिए। कोई विशेष प्राणायाम नहीं साधना है, प्राण को लयवद्ध नहीं बनाना है; बस उसके कुछ विशेष बिंदुओं के प्रति बोधपूर्ण होना है।

5-श्‍वास प्रश्‍वास के कुछ बिंदु है जिन्‍हें हम नहीं जानते। हम सदा श्‍वास लेते है। श्‍वास के साथ जन्‍मते है, श्‍वास के साथ मरते है। लेकिन उसके कुछ महत्‍व पूर्ण बिंदुओं को बोध नहीं है। और यह हैरानी की बात है। मनुष्‍य अंतरिक्ष की गहराइयों में उतर रहा है, खोज रहा है, वह चाँद पर पहुंच गया है। लेकिन वह अपने जीवन के इस निकटतम विंदु को समझ नहीं सका। श्‍वास के कुछ बिंदु है, तुम्‍हारे निकटतम द्वार है, जिनसे होकर तुम एक दूसरे ही संसार में, एक दूसरे ही अस्‍तित्‍व में, एक दूसरी ही

चेतना में प्रवेश कर सकते हो।लेकिन वह बिंदु बहुत सूक्ष्‍म है;जिसे तुमने कभी देखा नहीं है। । जो चीज जितनी निकट हो उतनी ही कठिन मालूम पड़ेगी, श्वास तुम्‍हारे इतना करीब है, कि उसके बीच स्‍थान ही नहीं बना रहता। या इतना अल्‍प स्‍थान है कि उसे देखने के लिए बहुत सूक्ष्‍म दृष्‍टि चाहिए। तभी तुम उन बिंदुओं के प्रति बोध पूर्ण हो सकते हो। ये बिंदु इन विधियों के आधार है।

ध्यान की पहली विधि का वर्णन;-

06 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है: -

हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है। जब श्‍वास भीतर अथवा नीचे को आती है उसके बाद फिर श्‍वास के लौटने के ठीक पूर्व..श्रेयस् है। इन दो बिंदुओं के बीच होश पुर्ण होने से घटना घटती है।

जब तुम्‍हारी श्‍वास भीतर आये तो उसका निरीक्षण करो। उसके फिर बाहर या ऊपर के लिए मुड़ने के पहले एक क्षण के लिए, या क्षण के हज़ारवें भाग के लिए श्‍वास बंद हो जाती है। श्‍वास भीतर आती है, और वहां एक बिंदु है जहां वह ठहर जाती है। फिर श्‍वास बाहर जाती है। और जब श्‍वास बाहर जाती है। तो वहां एक बिंदु पर ठहर जाती है। और फिर वह भीतर के लौटती

है। श्‍वास के भीतर या बाहर के लिए मुड़ने के पहले एक क्षण है जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो। उसी क्षण में घटना घटनी संभव है। क्‍योंकि जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो तो तुम संसार में नहीं होते हो। समझ लो कि जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो तब तुम मृत हो; तुम तो हो, लेकिन मृत। लेकिन यह क्षण इतना छोटा है कि तुम उसे कभी देख नहीं पाते।

2-तंत्र के लिए प्रत्‍येक बहिर्गामी श्‍वास मृत्‍यु है और प्रत्‍येक नई श्‍वास पुनर्जन्‍म है। भीतर आने वाली श्‍वास पुनर्जन्‍म है; बाहर जाने वाली श्‍वास मृत्‍यु है। बाहर जाने वाली श्‍वास मृत्‍यु का पर्याय है; अंदर जाने वाली श्‍वास जीवन का। इसलिए प्रत्‍येक श्‍वास के साथ तुम मरते हो और प्रत्‍येक श्‍वास के साथ तुम जन्‍म लेते हो। दोनों के बीच का अंतराल बहुत क्षणिक है, लेकिन पैनी दृष्‍टि, शुद्ध निरीक्षण और अवधान से उसे अनुभव किया जा सकता है। और यदि तुम उस अंतराल को अनुभव कर सको तो शिव कहते है कि श्रेयस् उपलब्‍ध है। तब और किसी चीज की जरूरत नहीं है। तब तुम आप्‍तकाम हो गए। तुमने जान लिया;

घटना घट गई। श्‍वास को प्रशिक्षित नहीं करना। वह जैसी है उसे वैसी ही बनी रहने देना। फिर इतनी सरल विधि क्‍यों? सत्‍य को जानने को ऐसी सरल विधि? सत्‍य को जानना उसको जानना है। जिसका न जन्‍म है न मरण। तुम बाहर जाती श्‍वास को जान सकते हो, तुम भीतर जाती श्‍वास को जान सकते हो। लेकिन तुम दोनों के अंतराल को कभी नहीं जानते।

3-प्रयोग करो और तुम उस बिंदु को पा लोगे। उसे अवश्‍य पा सकते हो। वह है। तुम्‍हें या तुम्‍हारी संरचना में कुछ जोड़ना नहीं है। वह है ही। सब कुछ है; सिर्फ बोध नहीं है। कैसे प्रयोग करो? पहले भीतर आने वाली श्‍वास के प्रति होश पूर्ण बनो। उसे देखो। सब कुछ भूल जाओ और आने वाली श्‍वास को, उसके यात्रा पथ को देखो। जब श्‍वास नासापुटों को स्‍पर्श करे तो उसको महसूस करो। श्‍वास को गति करने दो और पूरी सजगता से उसके साथ यात्रा करो। श्‍वास के साथ ठीक कदम से कदम मिलाकर नीचे उतरो; न आगे जाओ और ने पीछे पड़ो। उसका साथ न छूटे; बिलकुल साथ-साथ चलो।

स्‍मरण रहे, न आगे जाना है और न छाया की तरह पीछे चलना है। समांतर चलो।श्‍वास और सजगता को एक हो जाने दो। श्‍वास नीचे जाती है तो तुम भी नीचे जाओं; और तभी उस बिंदु को पा सकते हो, जो दो श्‍वासों के बीच में है। यह आसान नहीं

है। श्‍वास के साथ अंदर जाओ; श्‍वास के साथ बाहर आओ।

4-गौतम बुद्ध ने इसी विधि का प्रयोग विशेष रूप से किया; इसलिए यह बौद्ध विधि बन गई। बौद्ध शब्‍दावली में इसे अनापानसति योग कहते है। और स्‍वयं बुद्ध की आत्‍मोपलब्‍धि इस विधि पर ही आधारित थी। संसार के सभी धर्म, संसार के सभी द्रष्‍टा किसी न किसी विधि के जरिए मंजिल पर पहुंचे है। और वह सब विधियां इन एक सौ बारह विधियों में सम्‍मिलित है। यह पहली विधि बौद्ध विधि है। दुनिया इसे बौद्ध विधि के रूप में जानती है। क्‍योंकि बुद्ध इसके द्वारा ही निर्वाण को उपलब्‍ध

हुए थे।गौतम बुद्ध न कहा है। अपनी श्‍वास-प्रश्‍वास के प्रति सजग रहो। अंदर जाती, बाहर आती, श्‍वास के प्रति होश पूर्ण हो जाओ। बुद्ध अंतराल की चर्चा नहीं करते। क्‍योंकि उसकी जरूरत ही नहीं है। बुद्ध ने सोचा और समझा कि अगर तुम अंतराल की, दो श्‍वासों के बीच के विराम की फिक्र करने लगे, तो उससे तुम्‍हारी सजगता खंडित होगी। इसलिए उन्‍होंने सिर्फ यह कहा कि होश रखो, जब श्‍वास भीतर आए तो तुम भी उसके साथ भीतर जाओ और जब श्‍वास बाहर आये तो तुम उसके साथ बाहर आओ।

5-विधि के दूसरे हिस्‍से के संबंध में बुद्ध कुछ नहीं कहते।इसका कारण यह है कि बुद्ध बहुत साधारण लोगों से,

सीधे-सादे लोगों से बोल रहे थे। वे उनसे अंतराल की बात करते तो उससे लोगों में अंतराल को पाने की एक अलग कामना निर्मित हो जाती। और यह अंतराल को पाने की कामना बोध में बाधा बन जाती। क्‍योंकि अगर तुम अंतराल को पाना चाहते हो तो तुम आगे बढ़ जाओगे; श्‍वास भीतर आती रहेगी। और तुम उसके आगे निकल जाओगे। क्‍योंकि तुम्‍हारी दृष्‍टि अंतराल पर है जो भविष्‍य में है। बुद्ध कभी इसकी चर्चा नहीं करते; इसीलिए गौतम बुद्ध की विधि आधी है।लेकिन दूसरा हिस्‍सा अपने आप

ही चला आता है। अगर तुम श्‍वास के प्रति सजगता का, बोध का अभ्‍यास करते गए तो एक दिन अनजाने ही तुम अंतराल को पा जाओगे। क्‍योंकि जैसे-जैसे तुम्‍हारा बोध तीव्र, गहरा और सघन होगा, जैसे-जैसे तुम्‍हारा बोध स्‍पष्‍ट आकार लेगा। जब सारा संसार भूल जाएगा। बस श्‍वास का आना जाना ही एकमात्र बोध रह जाएगा ;तब अचानक तुम उस अंतराल को अनुभव करोगे।

6-जिसमें श्‍वास नहीं है।अगर तुम सूक्ष्‍मता से श्‍वास-प्रश्‍वास के साथ यात्रा कर रहे हो तो उस स्‍थिति के प्रति अबोध कैसे रह सकते हो। जहां श्‍वास नहीं है। वह क्षण आ ही जाएगा जब तुम महसूस करोगे। कि अब श्‍वास न जाती है, न आती है। श्‍वास

क्रिया बिलकुल ठहर गई है। और उसी ठहराव में श्रेयस् का वास है।यह एक विधि लाखों-करोड़ों लोगों के लिए पर्याप्‍त है। सदियों तक समूचा एशिया इस एक विधि के साथ जीया और उसका प्रयोग करता रहा ।इस एक विधि के द्वारा हजारों-हजारों व्‍यक्‍ति ज्ञान को उपलब्‍ध हुए। और यह पहली ही विधि है। दुर्भाग्‍य की बात कि चूंकि यह विधि बुद्ध के नाम से संबंद्ध हो गई। इसलिए हिंदू इस विधि से बचने की चेष्‍टा में लगे रहे। क्‍योंकि यह बौद्ध विधि की तरह बहुत प्रसिद्ध हुई। हिंदू इसे बिलकुल भूल गये। इतना ही नहीं, उन्‍होंने और एक कारण से इसकी अवहेलना की। क्‍योंकि शिव ने सबसे पहले इस विधि का उल्‍लेख किया, अनेक बौद्धों ने इस विज्ञान भैरव तंत्र के बौद्ध ग्रंथ होने का दावा किया। वे इसे हिंदू ग्रंथ नहीं मानते।यह न हिंदू है और न बौद्ध, और विधि मात्र विधि है। बुद्ध ने इसका उपयोग किया, लेकिन यह उपयोग के लिए मौजूद ही थी।और इस विधि के चलते बुद्ध-गौतम बुद्ध हुए। विधि तो बुद्ध से भी पहले थी।अन्‍य विधियों की तुलना में.. यह सरलतम विधियों में से एक है।यही कारण है कि पहली विधि की तरह इसका उल्‍लेख हुआ है।

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ध्यान की दूसरी विधि का वर्णन;-

08 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:

जब श्‍वास नीचे से ऊपर की और मुड़ती है, और फिर जब श्‍वास ऊपर से नीचे की और मुड़ती है ...इन दो मोड़ों के द्वारा

उपलब्‍ध हो।थोड़े फर्क के साथ यह वही विधि है; और अब अंतराल पर न होकर मोड़ पर है। बाहर जाने वाली और अंदर जाने वाली श्‍वास एक वर्तुल बनाती है। याद रहे, वे समांतर रेखाओं की तरह नहीं है। हम सदा सोचते है कि आने वाली श्‍वास और जाने वाली श्‍वास दो समांतर रेखाओं की तरह है। मगर वे ऐसी है नहीं। भीतर आने वाली श्‍वास आधा वर्तुल बनाती है। और शेष आधा वर्तुल बाहर जाने वाली श्‍वास बनाती है।और वे समांतर रेखाएं नहीं है; क्‍योंकि समांतर रेखाएं कही नहीं मिलती है।

दूसरी यह कि आने वाली और जाने वाली श्‍वास दो नहीं है। वे एक है। वही श्‍वास भीतर आती है, बाहर भी जाती है। इसलिए भीतर उसका कोई मोड़ अवश्‍य होगा। वह कहीं जरूर मुड़ती होगी। कोई बिंदु होगा, जहां आने वाली श्‍वास जाने

वाली श्‍वास बन जाती होगी।लेकिन मोड़ पर इतना जोर क्‍यों है?क्‍योंकि शिव कहते है,“जब श्‍वास नीचे से ऊपर की और

मुड़ती है, और फिर जब श्‍वास ऊपर से नीचे की और मुड़ती है..इन दो मोड़ों के द्वारा उपलब्‍ध हो।” लेकिन शिव कहते है कि मोड़ों को प्राप्‍त कर लो तो आत्‍मा को उपलब्‍ध हो जाओगे।

2-वास्तव में, अगर तुम कार चलाना जानते हो तो तुम्‍हें गियर का पता होगा। हर गियर बदलते हो तो तुम्‍हें न्‍यूट्रल गियर से गुजरना पड़ता है जो कि गियर बिलकुल नहीं है। तुम पहले गियर से दूसरे गियर में जाते हो और दूसरे से तीसरे गियर में। लेकिन सदा तुम्‍हें न्‍यूट्रल गियर से होकर जाना पड़ता है। वह न्‍यूट्रल गियर घुमाव का बिंदु है। मोड़ है। उस मोड़ पर पहला