वैदिक ज्योतिष के अनुसार नक्षत्र का प्रतीक चिह्न

नक्षत्र और राशि के बीच क्या अंतर है?

1-पुराणों के अनुसार ऋषि मुनियों ने आसमान का विभाजन 12 हिस्सों में कर दिया था, जिसे हम 12 अलग-अलग राशियों – मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक,धनु, मकर, कुम्भ, मीन – के नाम से जानते हैं। इसके और सूक्ष्‍म अध्‍ययन के लिए उन्होंने इसको 27 भागों में बांट दिया, जिसके बाद परिणामस्वरुप एक राशि के भीतर लगभग 2.25 नक्षत्र आते हैं। अगर देखा जाये तो चन्द्रमा अपनी कक्षा पर चलता हुआ पृथ्वी की एक परिक्रमा को 27.3 दिन में पूरी करता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा प्रतिदिन तक़रीबन एक भाग (नक्षत्र) की यात्रा करता है। ज्योतिष शास्त्र में सही और सटीक भविष्यवाणी करने के लिए नक्षत्र का उपयोग किया जाता हैं।नक्षत्र द्वारा किसी व्यक्ति के सोचने की शक्ति, अंतर्दृष्टि और उसकी विशेषताओं का विश्लेषण आसानी से किया जा सकता है और यहां तक ​​कि नक्षत्र आपकी दशा अवधि की गणना करने में भी मदद करता है। लोग ज्योतिषीय विश्लेषण और सटीक भविष्यवाणियों के लिए नक्षत्र की अवधारणा का उपयोग करते हैं। भारतीय ज्योतिष में, नक्षत्र को चन्द्र महल भी कहा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नक्षत्र पंचांग बहुत ही महत्वपूर्ण अंग होता है।

2-यदि आप आकाश को 12 समान भागों में विभाजित करते हैं, तो प्रत्येक भाग को राशि कहा जाता है, लेकिन अगर आप आकाश को 27 समान भागों में विभाजित करते हैं तो प्रत्येक भाग को नक्षत्र कहा जाता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आकाश किसी भी वृत्तीय आकार की तरह 360 डिग्री का होता है। अब यदि हम 360 डिग्री को 12 भागों में बांटते हैं, तो हमें एक राशि चिन्ह 30 डिग्री के रूप में प्राप्त होता है। इसी प्रकार, नक्षत्रों के लिए, यदि हम 360 डिग्री को 27 भागों बांटते हैं, तो एक नक्षत्र 13.33 डिग्री (लगभग) के रूप में आती है। इसलिए, नक्षत्रों की कुल संख्या 27 और राशियों की कुल संख्या 12 होती है। अगर देखा जाये तो नक्षत्र एक छोटा सा हिस्सा है और राशि एक बड़ा हिस्सा होता है। किसी भी राशि चिन्ह में 2.25 (लगभग) नक्षत्र आते हैं।

कैसे ज्ञात करते हैं नक्षत्र ?

जैसा कि हम सभी जानते हैं जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होता है, वही उस व्यक्ति का जन्म नक्षत्र होता है। यदि किसी व्यक्ति के वास्तविक जन्म नक्षत्र की जानकारी हो तो उस व्यक्ति के बारे में बिलकुल सही भविष्यवाणी की जा सकती है। आपके नक्षत्रों की सही गणना आपको काफी लाभ पहुँचा सकती हैं। साथ ही आप अपने अनेक प्रकार के दोषों और नकारात्मक प्रभावों को दूर करने के उपाय भी ढूंढ सकते हैं। सभी नक्षत्रों के अपने शासक ग्रह और देवता होते हैं। विवाह के समय भी वर और वधू का कुंडली मिलान करते समय नक्षत्र का सबसे अधिक महत्व होता है।




27 नक्षत्र ;-

शास्त्रों में नक्षत्रों की कुल संख्या 27 बताई गयी है।जिस तरह सूर्य मेष राशि में भ्रमण करता है, उसी तरह चन्द्रमा अश्‍विनी से लेकर रेवती तक के 27 नक्षत्रों में विचरण करता है ।सभी 27 नक्षत्रों के चारों ओर चक्कर लगाने में चंद्रमा को कुल 27 दिन लगते हैं। सूर्य ज्योतिषीय संकेतों का स्वामी है और चंद्रमा नक्षत्रों का स्वामी है।

नक्षत्र के नाम:-

1.आश्विन, 2.भरणी , 3.कृति का , 4.रोहि णी , 5.मृगशिरा, 6.आर्द्रा 7.पुनर्वसु, 8.पुष्य, 9.आश्लेषा , 10.मघा ,

12.उत्तरा फाल्गुनी , 13.हस्त, 14.चित्रा , 15.स्वाति , 16.विशाखा, 17.अनुराधा , 18.ज्येष्ठा , 19.मूल, 20.पूर्वाअषाढ़ा

21.उत्तराषाढ़ा , 22.श्रवण, 23.धनिष्ठा , 24.शतभिषा , 25.पूर्वाभाद्रपद, 26.उत्तराभाद्रपद और 27.रेवती ।

नक्षत्रों के गृह स्वामी :-

केतु:- आश्विन, मघा , मूल।

शुक्र:- भरणी , पूर्वाफाल्गुनी , पूर्वाषाढ़ा ।

रवि :- कार्तिक, उत्तराफाल्गुनी , उत्तराषाढ़ा ।

चन्द्र:- रोहिणी , हस्त, श्रवण।

मंगल:- मृगशिरा, चित्रा , धनिष्ठा ।

राहु:- आर्द्रा , स्वाति , शतभिषा ।

बृहस्पति :- पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद।

शनि :- पुष्य, अनुराधा , उत्तराभाद्रपद।

बुध:- आश्लेषा , ज्येष्ठा , रेवत

नक्षत्रों की श्रेणियां ;-

नक्षत्रों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया हैं-

1-अन्ध नक्षत्र:- पुष्य, उत्तराफ़ाल्गुनी , विशाखा ,रेवती और रोहिणी ।

2- मन्दलोचन नक्षत्र:- आश्लेषा , हस्त, अनुराधा , उत्तराषाढ़ा , शतभिषा , अश्विनी और मृगशिरा।

3-मध्यलोचन नक्षत्र:- मघा , चित्रा , ज्येष्ठा , पूर्वा भाद्रपद, भरणी और आर्द्रा ।

4-सुलोचन नक्षत्र:- पूर्वाफाल्गुनी , स्वाति , मूल, श्रवण, उत्तराभाद्रपद, कृत्तिका और पुनर्वसु।

नक्षत्रों के तीन हिस्से ;-

इन 27 नक्षत्रों को भी तीन हिस्सों में बांटा गया है - शुभ नक्षत्र, मध्यम नक्षत्र और अशुभ नक्षत्र।

शुभ नक्षत्र

शुभ नक्षत्र वो होते हैं जिनमें किए गए सभी काम सिद्ध और सफल होते हैं। इनमें 15 नक्षत्रों को माना जाता है – रोहिणी, अश्विन, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, चित्रा, रेवती, श्रवण, स्वाति, अनुराधा, उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढा, उत्तरा फाल्गुनी, घनिष्ठा, पुनर्वसु।

मध्यम नक्षत्र;-

मध्यम नक्षत्र के तहत वह नक्षत्र आते हैं जिसमें आम तौर पर कोई विशेष या बड़ा काम करना उचित नहीं, लेकिन सामान्य कामकाज के लिहाज से कोई नुकसान नहीं होता। इनमें जो नक्षत्र आते हैं वो हैं पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, विशाखा, ज्येष्ठा, आर्द्रा, मूला और शतभिषा।

अशुभ नक्षत्र;-

अशुभ नक्षत्र में तो कभी कोई शुभ काम करना ही नहीं चाहिए। इसके हमेशा बुरे नतीजे होते हैं या कामकाज में बाधा जरूर आती है। इसके तहत जो नक्षत्र आते हैं वो हैं- भरणी, कृतिका, मघा और आश्लेषा। ये नक्षत्र आम तौर पर बड़े और विध्वंसक कामकाज के लिए ठीक माने जाते हैं जैसे - कोई बिल्डिंग गिराना, कब्ज़े हटाना, आग लगाना, पहाड़ काटने के लिए विस्फोट करना या फिर कोई सैन्य या परमाणु परीक्षण करना आदि। लेकिन एक आम आदमी या जातक के लिए ये चारों ही नक्षत्र बेहद घातक और नुकसानदेह माने जाते हैं।

क्या है पंचक?-

हमारे घर के बुजुर्ग अक्सर ये कहते हैं कि पंचक लग गया, या पंचक में कोई काम नहीं करना चाहिए आदि-इत्यादि।

जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि पर होता है तब उस समय को पंचक कहते हैं। इसे शुभ नहीं माना जाता। इस दौराना घनिष्ठा से रेवती तक जो पांच नक्षत्र (घनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती) होते हैं, उन्हें पंचक कहते हैं। इस दौरान आग लगने का खतरा होता है, इस दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए, घर की छत नहीं बनवानी चाहिए, पलंग या कोई फर्नीचर भी नहीं बनवाना चाहिए। पंचक में अंतिम संस्कार भी वर्जित है।

क्या है गंडमूल?-

उसी तरह गंडमूल या मूल नक्षत्र को भी बेहद अशुभ माना जाता है। दरअसल नक्षत्रों के अलग अलग स्वभाव होते हैं और मूल नक्षत्र के तहत आने वाले आश्विन, आश्लेषा, मघा, मूला और रेवती नक्षत्रों को उग्र श्रेणी का माना जाता है। इन्हें ही मूल, गंडात या सतैसा भी कहा जाता है। जो लोग इसमें पैदा होते हैं, उनका जीवन बेहद उथल पुथल और तनावों से भरा होता है, इसीलिए बच्चों के जन्म के 27 दिन के बाद इसकी पूजा करवाई जाती है और इसके बुरे प्रभावों को खत्म किया जाता है।

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27 नक्षत्र का विवरण ;-

ये नक्षत्र आपके व्यक्तित्व और स्वभाव का आईना होते हैं।जिस नक्षत्र में आपका जन्म हुआ है, उसका असर कहीं न कहीं आपके व्यवहार, जीवन शैली और व्यक्तित्व पर जरूर पड़ता है।

1- अश्विनी नक्षत्र ;-

1-अश्विनी को पहला नक्षत्र माना जाता है। घोड़े के सिर को अश्विनी नक्षत्र का प्रतीक चिह्न माना जाता है जो इस नक्षत्र को घोड़े के बहुत से गुणों के साथ जोड़ता है। उदाहरण के लिए घोड़े को यात्रा का प्रतीक माना जाता है तथा यात्रा अपने आप में किसी प्रकार के आरंभ का प्रतीक मानी जाती है। अश्विनी को पुरुष नक्षत्र माना जाता है तथा अश्विनी के उपर अश्विनी कुमारों, केतु तथा मंगल का प्रभाव मानते हैं क्योंकि ये सभी के सभी ग्रह तथा देव पुरुष लिंग के ही हैं। वैदिक ज्योतिष में अश्विनी को वर्ण से वैश्य माना जाता है जिसका कारण कुछ विद्वान इस नक्षत्र का व्यापार क्षेत्र के साथ जुड़ा होना मानते हैं। वैदिक ज्योतिष अश्विनी नक्षत्र को गण में देव तथा गुण में सात्विक मानता है। अश्विनी नक्षत्र पंच तत्वों में से पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।अश्विनी नक्षत्र में जन्मे जातक सामान्यतः सुन्दर, चतुर, सौभाग्यशाली एवं स्वतंत्र विचारों वाले और आधुनिक सोच के लिए मित्रों में प्रसिद्ध होते हैं। इस नक्षत्र में जन्मा व्यक्ति बहुत ऊर्जावान होने के साथ-साथ सदा सक्रिय रहता है। इनकी महत्वाकांक्षाएं इन्हें संतुष्ट नहीं होने देतीं। ये लोग सभी से बहुत प्रेम करने वाले, हस्तक्षेप न पसंद करने वाले, रहस्यमयी प्रवृत्ति के होते हैं। ये लोग अच्छे जीवनसाथी और एक आदर्श मित्र साबित होते हैं।

2- भरणी नक्षत्र ;-

भरणी को दूसरा नक्षत्र माना जाता है।भरणी का शाब्दिक अर्थ भरण-पोषण करना है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्त्री के प्रजनन अंग अर्थात योनि को भरणी नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है।इस नक्षत्र का बहुत सी स्त्री शक्तियों के साथ जुड़ा होना मानते हैं जिनमें इस नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह योनि, इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह शुक्र तथा इस नक्षत्र से जुड़ी देवी महाकाली भी शामिल हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार भरणी नक्षत्र को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है जिसका कारण इस नक्षत्र की अनियंत्रित विनाशकारी शक्ति को माना जाता है।भरणी को गण से मानव माना जाता है जिसका कारण इस नक्षत्र से जुड़ी रचनात्मकता तथा सृजन करने की प्रबल अभिलाषा को मानते हैं।इस नक्षत्र का स्वामी शुक्र ग्रह होता है, जिस कारण इस नक्षत्र में जन्मे लोग एक दृढ़ निश्चयी, चतुर, सदा सत्य बोलने वाले, आराम पसंद और आलीशान जीवन जीने वाले होते हैं। ये लोग काफी आकर्षक और सुंदर होते हैं, इनका स्वभाव लोगों को आकर्षित करता है। इनके अनेक मित्र होंगे और मित्रों में बहुत अधिक लोकप्रिय भी होते हैं। इनके जीवन में प्रेम सर्वोपरी होता है और जो भी ये ठान लेते हैं उसे पूरा करने के बाद ही चैन से बैठते हैं। इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान हमेशा बना रहता है।

3- कृतिका नक्षत्र ;-

कृतिका को तीसरा नक्षत्र माना जाता है। कृतिका शब्द का अर्थ है कार्य को करने वाली। कृतिका नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह का चित्रण सामान्य तौर पर कुल्हाड़ी, कटार या तेज धार वाले ऐसे ही अन्य शस्त्रों तथा औजारों के रुप में किया जाता है जो काटने के काम में प्रयोग किये जाते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अग्नि को भी कृतिका नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रुप में चित्रित किया जाता है जो इस नक्षत्र के अग्नि स्वभाव को दर्शाता है।श्री कार्तिकय को कृतिका नक्षत्र का देवता माना जाता है जिसके चलते इस नक्षत्र पर शिव पुत्र श्री कार्तिकेय का भी प्रबल प्रभाव रहता है तथा उनके कई गुण एवम विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। कृतिका नक्षत्र को राक्षस गण प्रदान किया जाता है जिसका कारण ज्योतिषी इस नक्षत्र का किसी न किसी प्रकार से युद्ध के साथ जुड़ना मानते हैं। कृतिका नक्षत्र को राजसिक गुण प्रदान करता है तथा कृतिका नक्षत्र के इस गुण निर्धारण का कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र पर राजसिक ग्रह सूर्य का प्रभाव मानते हैं।कृतिका नक्षत्र पंच तत्वों में से पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति पर सूर्य का प्रभाव रहता है, जिस कारण से ये लोग आत्म गौरव करने वाले होते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातक सुन्दर और मनमोहक छवि वाला होता है। वह केवल सुन्दर ही नहीं अपितु गुणी भी होते हैं। ना तो पहली नजर में प्यार जैसी चीज पर भरोसा करते हैं और ना ही किसी पर बहुत जल्दी विश्वास करते हैं। इन लोगों का व्यक्तित्व राजा के समान ओजपूर्ण एवं पराक्रमी होता है। ये तेजस्वी एवं तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी, स्वाभिमानी, तुनक मिजाजी और बहुत उत्साहित रहने वाले होते हैं। ये लोग जिस भी काम को अपने हाथ में लेते हैं उसे पूरी लगन और मेहनत के साथ पूरा करते हैं।

4- रोहिणी नक्षत्र;-

रोहिणी को चौथा स्थान दिया जाता है। रोह शब्द का अर्थ है विकास अथवा उन्नति करना तथा रोहण शब्द का अर्थ है किसी प्रकार की सवारी करना अथवा सवारी करने वाला और इसी के अनुसार रोहिणी शब्द का अर्थ बनता है सवारी करने वाली। रोहिणी सवारी करने वाली स्त्री उन्नति तथा विकास की सूचक है।दो बैलों के द्वारा खींची जाने वाली बैलगाड़ी को रोहिणी नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है।त्रिदेवों में सृष्टि के जनक तथा रचियता भगवान ब्रह्मा जी को रोहिणी नक्षत्र के अधिपति देवता माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर ब्रह्मा जी का भी प्रबल प्रभाव रहता है। ब्रहमा जी के प्रभाव में आने के कारण रोहिणी नक्षत्र में सृजन करने की प्रबल शक्ति आ जाती है तथा यह नक्षत्र वैदिक ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक प्रकार के सृजन, उत्पादन, निर्माण तथ विकास को प्रोत्साहित करता है। चन्द्रमा को रोहिणी का स्वामी ग्रह माना जाता है; जिसके कारण रोहिणी नक्षत्र में चन्द्रमा के सहज गुण जैसे कि मातृत्व का गुण, सब प्राणियों को शीतलता प्रदान करने का गुण, सभी का कल्याण चाहने का गुण तथा ऐसे ही कई अन्य गुण भी पाए जाते हैं।रोहिणी में स्थित चन्द्रमा को वैदिक ज्योतिष में उच्च का चन्द्रमा भी कहा जाता है। कुंडली में रोहिणी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को अति सुंदर, आकर्षक तथा मनमोहक बना देता है तथा इनकी सुंदरता की मोहिनी के प्रभाव से बच पाना सामान्यतया किसी के लिए भी बहुत कठिन होता है।

ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण की जन्म कुंडली में लग्न तथा चन्द्रमा पर रोहिणी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव था जिसके कारण भगवान श्री कृष्ण की मोहिनी विश्व विख्यात है।रोहिणी नक्षत्र को एक संतुलित स्त्री नक्षत्र माना जाता है क्योंकि बैल स्वभाव से बहुत स्थिर होता है तथा अपने कार्य को निरंतर करता रहता है। रोहिणी को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है तथा गण से मानव माना जाता है तथा गुण से इस नक्षत्र को राजसिक माना जाता है। रोहिणी नक्षत्र को पंच तत्वों में से पृथ्वी तत्व के साथ जोड़ा जाता है। चंद्रमा के प्रभाव के कारण ये लोग बहुत कल्पनाशील और मनचले स्वभाव के होते हैं। ये लोग काफी चंचल स्वभाव के होते हैं और स्थायित्व इन्हें रास नहीं आता। इन लोगों की सबसे बड़ी कमी यह होती है कि ये कभी एक ही मुद्दे या राय पर कायम नहीं रहते। ये व्यक्ति सदा दूसरों में गलतियां ढूँढते रहते हैं। सामने वाले की त्रुटियों की चर्चा करना इनका शौक होता है। ये लोग स्वभाव से बहुत मिलनसार तो होते ही हैं लेकिन साथ-साथ जीवन की सभी सुख-सुविधाओं को पाने का प्रयास भी करते रहते हैं। विपरीत लिंग के लोगों के प्रति इनके अन्दर विशेष आकर्षण देखा जा सकता है। ये शारीरिक रूप से कमज़ोर होते हैं इसलिए कोई भी छोटे से छोटे वातावरण बदलाव के रोग भी आपको अक्सर जकड़ लेते हैं।

5- मृगशिरा नक्षत्र ;-

इस नक्षत्र के जातकों पर मंगल का प्रभाव होने के कारण ये लोग स्वभाव से बहुत साहसी, दृढ़ निश्चय चतुर एवं चंचल स्वभाव के अध्ययन में अधिक रूचि, माता पिता के आज्ञाकारी और सदैव साफ़ सुथरे आकर्षक वस्त्र पहनने वाले होते हैं। ये लोग स्थायी जीवन जीने में विश्वास रखते हैं और हर काम पूरी मेहनत के साथ पूरा करते हैं। इनका व्यक्तित्व बहुत आकर्षक होता है और ये हमेशा सचेत रहते हैं। यदि कोई व्यक्ति इनके साथ धोखा करता है तो ये किसी भी कीमत पर उसे सबक सिखाकर ही मानते हैं। बुद्धिमान होने के साथ-साथ मानसिक रूप से मजबूत होते हैं। इनको संगीत पसंद होता है और सांसारिक सुखों का उपभोग करने वाले होते हैं।

6- आर्द्रा नक्षत्र;-

इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोगों पर आजीवन बुध और राहु ग्रह का प्रभाव रहता है। राहु का प्रभाव इन्हें राजनीति की ओर लेकर जाता है और इनके प्रति दूसरों में आकर्षण विकसित करता है। अध्ययन में रूचि अधिक और किताबों से विशेष लगाव आपकी पहचान होगी। सदैव ही अपने आस-पास की घटनाओं के बारे में जागरूक और व्यापार करने की समझ इनकी महान विशेषता है। ये लोग दूसरों का दिमाग पढ़ लेते हैं इसलिए इन्हें बहुत सरलता से बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। दूसरों से काम निकलवाने में कलाकार होते हैं इस नक्षत्र में जन्मे लोग अपने निजी स्वार्थ को पूरा करने के लिए नैतिकता को भी छोड़ देते हैं।

7- पुनर्वसु नक्षत्र;-

इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति के भीतर दैवीय शक्तियां होती हैं। पुनर्वसु नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति बेहद मिलन सार, दूसरों से प्रेमपूर्वक व्यवहार रखने वाले होते हैं। इनका शरीर काफी भारी और याद्दाश्त बहुत मजबूत होती है। ये लोग काफी मिलनसार और प्रेम भावना से ओत-प्रोत होते हैं। आप कह सकते हैं कि जब भी इन पर कोई विपत्ति आती है तो कोई अदृश्य शक्ति इनकी सहायता करने अवश्य आती है। ये लोग काफी धनी भी होते हैं। आपके गुप्त शत्रुओं की संख्या अधिक होती है।

8- पुष्य नक्षत्र ;-

पुष्य नक्षत्र 8वां नक्षत्र होता है। ऋग्वेद में पुष्य को तिष्य अर्थात शुभ मांगलिक तारा कहते हैं।गाय के थन को पुष्य नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना गया है तथा ये प्रतीक चिन्ह भी हमें पुष्य नक्षत्र के स्वभाव के बारे में बहुत कुछ समझाता है। पुष्य नक्षत्र गाय के थन से निकले ताजे दूध जैसा पोषणकारी, लाभप्रद व देह और मन को प्रसन्नता देने वाला होता है। इसलिए ऋग्वेद में पुष्य नक्षत्र को मंगल कर्ता, वृद्धि कर्ता और सुख समृद्धि देने वाला भी कहा गया है।ज्योतिषशास्त्र के अंतर्गत शनिदेव के प्रभाव वाले पुष्य नक्षत्र को सबसे शुभ माना गया है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोग दूसरों की भलाई के लिए सदैव तैयार रहते हैं और इनके भीतर सेवा भावना भी बहुत प्रबल होती है। इन्हें नित नए काम करने की प्रवृत्ति होती है और नए काम की खोज, परिवर्तन और अधिक परिश्रम इनकी विशेषता है। ये बहुत परिश्रमी होते हैं और अपनी मेहनत के बल पर धीरे-धीरे ही सही तरक्की हासिल कर ही लेते हैं। पुष्य को नक्षत्रों का राजा भी कहते हैं। वेदों और पुराणों में सभी 27 नक्षत्रों में 'पुष्य नक्षत्र' को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।विवाह को छोड़कर अन्य कोई भी कार्य आरंभ करना हो तो पुष्य नक्षत्र और इनमें श्रेष्ठ मुहूर्तों को ध्यान में रखकर किया जा सकता है। इसके साथ ही खरीदारी, निवेश और बड़े व्यापारिक लेन-देन इस नक्षत्र में करना शुभ माना गया है। इस नक्षत्र में शुरू किए गए सभी कार्य पुष्टि दायक, सर्वार्थसिद्ध होते हैं व निश्चय ही फलीभूत होते हैं। आरंभ काल से ही इस नक्षत्र में किये गये सभी कर्म शुभफलदाई कहे गये हैं, किन्तु माँ पार्वती विवाह के समय इस नक्षत्र को शिव से मिले श्राप के परिणामस्वरुप पाणिग्रहण संस्कार के लिए वर्जित माना गया है। इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह शनि है। शनि के प्रभाव से इस नक्षत्र का स्वभाव स्थायी या लंबे समय तक रहता है। इसलिए पुष्य नक्षत्र में खरीदी हुई वस्तु शनि के प्रभाव के कारण स्थाई रूप से बनी रहती है।

9- अश्लेषा नक्षत्र ;-

यह नक्षत्र विषैला होता है और इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्तियों के भीतर भी विष की थोड़ी बहुत मात्रा पाई जाती है। स्वामी चन्द्रमा के होने के कारण ऐसे जातक उच्च श्रेणी के डॉक्टर, वैज्ञानिक या अनुसंधानकर्ता भी होते हैं। अश्लेषा नक्षत्र में जन्मे व्यक्तियों का प्राकृतिक गुण सांसारिक उन्नति में प्रयत्नशीलता, लज्जा व सौदर्योपासना है। इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति की आँखों एवं वचनों में विशेष आकर्षण होता है। ये लोग कुशल व्यवसायी साबित होते हैं और दूसरों का मन पढ़कर उनसे अपना काम निकलवा सकते हैं। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोगों को अपने भाइयों का पूरा सहयोग मिलता है। चन्द्रमा के औषधिपति होने के कारण इस नक्षत्र में जन्मे जातक बहुत चतुर बुद्धि के होते हैं।

10- मघा नक्षत्र;-

इस नक्षत्र को गण्डमूल नक्षत्र की श्रेणी में रखा गया है। सूर्य के स्वामित्व के कारण ये लोग काफी ज्यादा प्रभावी बन जाते हैं। इनके भीतर ईश्वरीय आस्था बहुत अधिक होती है। इनके भीतर स्वाभिमान की भावना प्रबल होती है और बहुत ही जल्दी इनका दबदबा भी कायम हो जाता है। ये कर्मठ होते हैं और किसी भी काम को जल्दी से जल्दी पूरा करने की कोशिश करते हैं। ये ठिगने कद के साथ सुदृढ वक्षस्थल, मजबूत जंघा, वाणी थोड़ी कर्कश एवं थोड़ी मोटी गर्दन के होते हैं। इनकी आँखें विशेष चमक लिए हुए, चेहरा शेर के समान भरा हुआ एवं रौबीला होता है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति प्रायः अपने पौरुष और पुरुषार्थ के प्रदर्शन के लिए सदा ललायित रहते हैं।

11- पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र ;-

यदि आपका जन्म पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में हुआ है तो आप ऐसे भाग्यशाली व्यक्ति हैं जो समाज में सम्माननीय हैं और जिनका अनुसरण हर कोई करना चाहता है। परिवार में भी आप एक मुखिया की भूमिका में रहते हैं। ऐसे लोगों को संगीत और कला की विशेष समझ होती है जो बचपन से ही दिखाई देने लगती है। ये लोग नैतिकता और ईमानदारी के रास्ते पर चलकर ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। शांति पसंद होने की वजह से किसी भी तरह के विवाद या लड़ाई-झगड़े में पड़ना पसंद नहीं करते। इनके पास धन की मात्रा अच्छी खासी होती है जिसकी वजह से ये भौतिक सुखों का आनंद उठाते हैं। ये लोग अहंकारी प्रवृत्ति के होते हैं।

12- उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र;-

इस नक्षत्र में जन्मा जातक दूसरों के इशारों पर चलना पसंद नहीं करते और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भरपूर प्रयास करते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे लोग समझदार, बुद्धिमान, युद्ध विद्या में निपुण, लड़ाकू एवं साहसी होते हैं। आप देश और समाज में अपने रौबीले व्यक्तित्व के कारण पहचाने जाते हैं। ये दूसरों का अनुसरण नहीं करते अपितु लोग उनका अनुसरण करते हैं। आप में नेतृत्व के गुण जन्म से ही होते हैं अतः आप अपना कार्य करने में खुद ही सक्षम होते हैं। सरकारी क्षेत्र में इनको सफ़लत मिलती है। ये लोग एक काम को करने में काफी समय लगा देते हैं। अपने हर संबंध को ये लोग लंबे समय तक निभाते हैं।इसके दो तारे है जो देखने मे ऐसे प्रतीत होते है मानो चारपाई के चौड़े वाले भाग से हम चारपाई को देख रहे हो।

13- हस्त नक्षत्र ;-

यदि आपका जन्म हस्त नक्षत्र में हुआ है तो आप संसार को जीतने और उस पर शासन करने का पूरा पूरा सामर्थ्य एवं शक्ति रखते है। ये लोग बौद्धिक, मददगार, निर्णय लेने में अक्षम, कुशल व्यवसायिक गुणों वाले और दूसरों से अपना काम निकालने में गुरु माने जाते हैं। इन्हें हर प्रकार की सुख-सुविधाएं मिलती हैं और इनका जीवन आनंद में व्यतीत होता है। दृढ़ता और विचारों की स्थिरता इनको आम आदमी से भिन्नता और श्रेष्ठता प्रदान करती है। ये लोग अपने ज्ञान और समृद्धि के कारण जाने जाते हैं

14- चित्रा नक्षत्र ;-

इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्तियों के स्वभाव में आपको मंगल ग्रह का प्रभाव दिखाई दे सकता है। ये लोग आकर्षक व्यक्तित्व वाले एवं शारीरिक रूप से संतुलित मनमोहक एवं सुन्दर आँखों वाले, साज-सज्जा को पसंद करने वाले और नित नए आभूषण एवं वस्त्र खरीदने वाले होते हैं। हर किसी के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने का प्रयास करते हैं, इन्हें आप सामाजिक हितों के लिए कार्य करते हुए भी देख सकते हैं। ये लोग विपरीत परिस्थिति से बिल्कुल नहीं घबराते और खुलकर कष्टों का सामना करते हैं। परिश्रम और हिम्मत ही इनका बल है।

15- स्वाति नक्षत्र;-

इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक मोती के समान चमकते हैं अर्थात इनका स्वभाव और आचरण स्वच्छ होता है। ये लोग सात्विक और तामसिक दोनों ही प्रवृत्ति वाले होते हैं। एक आकर्षक चेहरे और आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी होते हैं। आपका शरीर भीड़ से अलग सुडौल एवं भरा हुआ होता है। आप जैसा सोचते हैं वैसा करते हैं और दिखावा पसंद नहीं करते है। आप एक स्वतंत्र आत्मा के स्वामी हैं जिसको किसी के भी आदेश का पालन करना बिलकुल पसंद नहीं। ये लोग राजनीतिक दांव-पेंचों को अच्छी तरह समझते हैं और अपने प्रतिद्वंदियों पर हमेशा जीत हासिल करते हैं।

16- विशाखा नक्षत्र;-

यदि आपका जन्म विशाखा नक्षत्र में हुआ है तो आप शारीरिक श्रम के स्थान पर मानसिक कार्यों को अधिक मानते हैं। शारीरिक श्रम करने से आपका भाग्योदय नहीं होता। मानसिक रूप से आप सक्षम व्यक्ति है और कठिन से कठिन कार्य को भी अपनी सूझ-बूझ कर लेते हैं। पठन-पाठन के कार्यों में उत्तम साबित होते हैं। ये लोग शारीरिक श्रम तो नहीं कर पाते लेकिन अपनी बुद्धि के प्रयोग से सभी को पराजित करते हैं। स्वभाव से ईर्ष्यालु परन्तु बोल चाल से अपना काम निकालने का गुण इनमें स्वाभाविक होता है। सामाजिक होने से इनका सामाजिक क्षेत्र भी बहुत विस्तृत होता है। ये लोग महत्वाकांक्षी होते हैं और अपनी हर महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए बहुत परिश्रम करते हैं।


17- अनुराधा नक्षत्र;-

इस नक्षत्र में जन्मे लोग अपने आदर्शों और सिद्धांतों पर जीते हैं। इनका अधिकांश जीवन विदेशों में बीतता है और विदेशों में रहकर ये धन और समाज में मान सम्मान दोनों कमाते है। ये लोग अपने गुस्से को नियंत्रित नहीं कर पाते इस कारण इन्हें कई बार बड़ी हानि उठानी पड़ती हैं। ये लोग अपने दिमाग से ज्यादा दिल से काम लेते हैं और अपनी भावनाओं को छिपाकर नहीं रख पाते। ये लोग वाणी से थोड़े कड़वे होते हैं जिस कारण लोग इन्हें ज्यादा पसंद नहीं करते। आप बहुत साहसी एवं कर्मठ व्यक्तित्व के स्वामी हैं।

18- ज्येष्ठ नक्षत्र;-

गण्डमूल नक्षत्र की श्रेणी में होने से यह भी अशुभ नक्षत्र ही माना जाता है। आप दृढ़ निश्चयी और मज़बूत व्यक्तित्व के स्वामी हैं। आप नियम से जीवन व्यतीत करना पसंद करते हैं। आप शारीरिक रूप से गठीले और मज़बूत होते हैं तथा कार्य करने में सैनिकों के समान फुर्तीले होते हैं। आपकी दिनचर्या सैनिकों की तरह अनुशासित और सुव्यवस्थित होती है। खुली मानसिकता वाले ये लोग सीमाओं में बंधकर अपना जीवन नहीं जी पाते। ये लोग उग्र होते हैं और छोटी-छोटी बातों पर लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। किसी के बारे में आपके विचार शीघ्र नहीं बदलते और दूसरों को आप हठी प्रतीत होते हैं।

19- मूल नक्षत्र;-

मूल का शाब्दिक अर्थ है केन्द्रीय बिन्दु, एक साथ बंधी हुई कुछ पौधों की जड़ों को मूल नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है तथा इस प्रतीक चिन्ह से भी विभिन्न प्रकार के अर्थ निकलते हैं कि मूल नक्षत्र के जातकों में समस्त परिवार तथा समाज को एक साथ बाँध रखने की सामर्थ्य होती है | कुछ विद्वानों की मान्यता है कि जिस प्रकार वृक्ष की जड़ अर्थात मूल भूगर्भा होती है अतः उसके विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार मूल नक्षत्र भी बहुत से रहस्यों, गुप्त विद्याओं तथा अदृश्य शक्तियों का प्रतीक होता है | साथ ही किसी भी रहस्य को गुप्त रखने में सक्षम होते हैं तथा रहस्य विद्याओं के ज्ञाता भी होते हैं |

जिस प्रकार वृक्ष को काट देने के पश्चात भी वह अपनी जड़ों के माध्यम से अपने शरीर और शक्ति को पुन: प्राप्त कर लेने में सक्षम होता है उसी प्रकार मूल नक्षत्र के जातक भी भी अपनी खोई हुई शक्ति तथा आधिपत्य पुन: प्राप्त कर लेने की क्षमता रखते हैं |यदि आपका जन्म मूल नक्षत्र में हुआ है तो आपका जीवन सुख समृद्धि के साथ बीतेगा। धन की कमी न होने के कारण ऐश्वर्य पूर्ण जीवन जीते हैं। आप अपने कार्यों द्वारा अपने परिवार का मान और सम्मान बढ़ाएंगे। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्तियों के परिवार को इनके दोष का भी सामना करना पड़ता है लेकिन इनकी कई विशेषताएं हैं जैसे कि इनका बुद्धिमान होना, इनकी वफादारी, सामाजिक रूप, परिपक्वता आदि। इन्हें आप विद्वानों की श्रेणी में रख सकते हैं। ये कोमल हृदयी परन्तु अस्थिर दिमाग के व्यक्ति होते हैं। कभी आप बहुत दयालु और कभी अत्यधिक घाटा देने वाले होते है

20- पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र ;-

पूर्वाषाढ़ा का अर्थ विजय से पूर्व होता है। वैदिक ज्योतिष में इस नक्षत्र में एक स्त्री नक्षत्र कहा जाता है। इसका कारण इस नक्षत्र का अप: तथा शुक्र के साथ संबंध माना जाता है। इसका तत्व वायु तत्व है।इसका नक्षत्र चिन्ह हाथी का दांत है।पूर्वाषाढ़ा में जन्म लेने वाला जातक थोडा नकचढ़ा और उग्र स्वभाव का होने के साथ कोमल हृदयी और परायों से स्नेह रखने वाला होता है। ये लोग ईमानदार, प्रसन्नचित, कला, सहित्य और अभिनय प्रेमी, अच्छा दोस्त और आदर्श जीवनसाथी होते हैं। जीवन में सकारत्मक विचारधारा से अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। आपका व्यक्तित्व दूसरों पर हावी रहता है किन्तु ये एक संवेदनशील व्यक्ति होते हैं जो दूसरों की मदद के लिए सदैव तैयार रहते है। इन्हें अधिक प्रेम व सम्मान मिलता है परन्तु अपनी चंचल बुद्धि के कारण आप अधिक वफादार नहीं होते हैं और कभी-कभी अनैतिक कार्यों में भी लिप्त हो जाते हैं।

21- उत्तराषाढ़ा नक्षत्र ;-

उत्तराषाढ़ा नक्षत्र शुभ नक्षत्रों की श्रेणी में आता है। इस नक्षत्र के देवता विश्वेदेव हैं। विश्वेदेव में दस देवताओं के नाम शामिल हैं- इन्द्र, अग्नि, सोम, त्वष्ट्रा, रुद्र, पूखन्, विष्णु, अश्विनी, मित्रावरूण और अंगीरस । उत्तराषाढ़ा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह हाथी के दांत को माना जाता है। इस नक्षत्र में जन्में जातक अपने लक्ष्य की प्राप्ति और अपने प्रयासों को सफल बनाने में सक्षम होते हैं,साथ ही ये परंपराओं का सम्मान करने वाले होते हैं। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के स्वामी स्वयं सूर्यदेव हैं और सूर्य देवता सकारात्मकता के प्रतीक हैं, जो अपनी ऊर्जा से पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशित करते हैं और सबके अन्दर तेज कायम करते हैं। सूर्य देव सभी नौ ग्रहों के केन्द्र बिन्दु हैं और अपना प्रकाश उन तक पहुंचाते हैं। पृथ्वी पर प्रकाश और ऊर्जा के स्रोत के रूप में सूर्यदेव की ही उपासना की जाती है। जहां-जहां इनकी रोशनी पहुंचती है, वहां का माहौल अपने आप ही ऊर्जामय हो जाता है और यह रोशनी न केवल किसी भवन, मन्दिर या कार्यालय तक पहुंचती है, बल्कि व्यक्ति के मन तक पहुंचती है और एक तरह से उसकी सोई हुई इन्द्रियों को जगाने का काम करती है।

लिहाजा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में सूर्यदेव की उपासना करना बड़ा ही फलदायी रहता है। पेड़-पौधों में उत्तराषाढ़ा नक्षत्र का संबंध कटहल के पेड़ सेबताया गया है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में जन्में लोगों को कटहल या उससे बनी किसी भी चीज़ को उपयोग में नहीं लाना चाहिये और ना ही कटहल के पेड़ को किसी भी प्रकार की हानि पहुंचानी चाहिए, यानि उसके टहनियों या पत्तों को नहीं तोडना चाहिए। आज के दिन ऐसा करने से आपको शुभ फलों की प्राप्ति होगी और आपके जीवन की गति और तेज दोनों ही बने रहेंगे।उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के दौरान सफेद, पीले और लाल रंग के कपड़े पहनना भी बहुत शुभ माना जाता है उत्तराषाढ़ा में जन्मा जातक ऊँचे कद, गठीले शारीर ,चमकदार आँखे ,चौड़ा माथा और गौर वर्ण के साथ लालिमा लिए हुए होते हैं। सफल एवं स्वतंत्र व्यक्ति, मृदुभाषी और सभी से प्रेम पूर्वक व्यवहार आप में स्वाभाविक हैं। ईश्वर में आस्था, जीवन में प्रसन्नता और मैत्री, आगे बढ़ने में विश्वास आदि आपकी विशेषता है। विवाह उपरान्त जीवन में अधिक सफलता एवं प्रसन्नता होती है। ये लोग आशावादी और प्रसन्नचित स्वभाव के होते हैं। नौकरी और व्यवसाय दोनों ही में सफलता प्राप्त करते हैं। ये लोग अधिकतम धनी भी होते हैं।

22- श्रवण नक्षत्र ;-

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, माता-पिता के लिए अपना सर्वस्व त्यागने वाले श्रवण कुमार के नाम पर ही इस नक्षत्र का नाम पड़ा है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोगों में कई विशेषताएं होती हैं जैसे कि इनका ईमानदार होना, इनकी समझदारी, कर्तव्य परायणता, एक स्थिर सोच, निश्छलता और पवित्र व्यक्ति होते हैं। ये लोग मध्यम कद काठी परन्तु प्रभावी और आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी है। आजीवन ज्ञान प्राप्त करने की लालसा और समाज के बुद्धिजीवियों में आप की गिनती होती है। ये लोग जिस भी कार्य में हाथ डालते हैं उसमें सफलता हासिल करते हैं। ये लोग कभी अनावश्यक खर्च नहीं करते, जिस कारण से लोग इन्हें कंजूस भी समझ बैठते हैं। आप दूसरों के प्रति बहुत अधिक स्नेह की भावना रखते हैं इसलिए औरों से भी उतना ही स्नेह व सम्मान प्राप्त करते हैं।

23- धनिष्ठा नक्षत्र;-

धनिष्ठा नक्षत्र में जन्मा जातक सभी गुणों से समृद्ध होकर जीवन में सम्मान और प्रतिष्ठा पाता है। ये लोग काफी उर्जावान होते हैं और उन्हें खाली बैठना बिल्कुल पसंद नहीं होता। ये स्वभाव से बहुत ही नरम दिल एवं संवेदनशील व्यक्ति होते हैं। दान और आध्यत्म होते हैं। आपका रवैया अपने प्रियजनों के प्रति बहुत सुरक्षात्मक होता है किन्तु फिर भी आप दूसरों के लिए जिद्दी और गुस्सैल ही रहते हैं। ये लोग अपनी मेहनत और लगन के दम पर अपना लक्ष प्राप्त कर ही लेते हैं। इन्हें किसी और को अपने नियंत्रण में रखना अच्छा लगता है और ये अधिकार भावना भी रखते हैं। इन्हें शांतिपूर्ण तरीके से अपना जीवन जीना पसंद है

24- शतभिषा नक्षत्र;-

शतभिषा नक्षत्र में जन्मा जातक बहुत साहसी एवं मजबूत विचारों वाला होता है। शारीरिक श्रम न करके हर समय अपनी बुद्धि का परिचय देते हैं। इस नक्षत्र में जन्में लोग स्वच्छंद विचारधारा के होते है तो साझेदारी की अपेक्षा स्वतंत्र रूप से कार्य करना पसंद करते हैं। ये लोग अत्यधिक सामर्थ्य, स्थिर बुद्धि और उन्मुक्त विचारधारा के होते हैं और मशीनी रूप से जीवन जीना इन्हें बिलकुल सहन नहीं होता। ये अपने शत्रुओं पर हमेशा हावी रहते हैं। समृद्धशाली होने के कारण अपने आस-पास के लोगों से सम्मान प्राप्त होता है


25- पूर्वाभाद्रपद;-

भाद्रपद मूल शब्द है भद्र अर्थात शुभ, सौभाग्य, अनुकूल, प्रसन्नता प्रदान करने वाला | इस नक्षत्र को प्रौष्ठपद भी कहा जाता है – प्रौष्ठ शब्द एक प्रकार की मछली और बैल के लिए प्रयुक्त होता है | भाद्रपद नाम से दो नक्षत्र होते हैं – पूर्वभाद्रपद और उत्तर भाद्रपद और ये नक्षत्र मण्डल के 25वें तथा 26वें नक्षत्र हैं | इन दोनों नक्षत्रों में प्रत्येक में दो तारे होते हैं | इसका अन्य नाम है अजापद – जो कि रूद्र का एक नाम है |इस नक्षत्र को सभी नक्षत्रों में सबसे अधिक साहसी, नाटक करने वाला, रहस्यमय तथा हिंसक प्रवृत्ति का माना जाता है |पूर्वभाद्रपद का शाब्दिक अर्थ है ऐसा भाग्यशाली व्यक्ति जो पहले प्रवेश करे | इस नक्षत्र का सम्बन्ध मृत्यु तथा निद्रा से भी जोड़ा जाता है | इस नक्षत्र के जातक कब हिंसक प्रवृत्ति के बन जाएँ इसके विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता | ये जातक एक पल में हिंसक बन जाते हैं और दूसरे पल बहुत शान्त और सौम्य भी बन जाते हैं | इसी कारण इस नक्षत्र से प्रभावित जातक दोहरे स्वभाव अथवा दोहरे मापदण्ड रखने वाले व्यक्ति भी हो सकते हैं |

गुरु ग्रह के स्वामित्व वाले इस नक्षत्र में जन्में जातक सत्य और नैतिक नियमों का पालन करने वाले होते हैं। साहसी, दूसरों की मदद करने वाले, मिलनसार, मानवता में विश्वास रखने वाले, व्यवहार कुशल, दयालु और नेक दिल होने के साथ-साथ खुले विचारों वाले होते हैं। ये लोग आध्यात्मिक प्रवृत्ति के साथ-साथ ज्योतिष के भी अच्छे जानकार कहे जाते हैं। और ये लोग अपने आदर्शो और सिद्धांतों पर ही आजीवन चलना पसंद करते हैं

26- उत्तराभाद्रपद;-

उत्तर भाद्रपद का अर्थ है ऐसा भाग्यशाली व्यक्ति जो बाद में अपने चरण रखे अर्थात बाद में आए | कुछ कुण्डली मारे हुए सर्प को भी इस नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह मानते हैं, जो कुण्डलिनी शक्ति की जागृत अवस्था का सूचक भी माना जा सकता है | और सम्भवतः इसी कारण कुछ ज्योतिषी इस नक्षत्र को ऊर्जा के अप्रतिम स्रोत के रूप में भी मानते हैं | योग तथा अध्यात्म के क्षेत्र में कुण्डलिनी जागृत होना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण क्रिया मानी जाती है जो मनुष्य की परमात्मतत्व से युति कराती है | इसी आधार पर मान्यता बनती है कि इस नक्षत्र के जातकों का रुझान अलौकिक शक्तियों के अध्ययन के प्रति भी हो सकता हैइस नक्षत्र में जन्में लोग हवाई महल या कल्पनिक संसार में विश्वास नहीं करते। ये लोग बहुत यथार्थवादी और सत्य को समझने वाले होते हैं। व्यापार हो या नौकरी, इनका परिश्रम इन्हें हर स्थान पर सफलता प्राप्त करवाता है। त्याग भावना, स्वभाव से एक दयालु धार्मिक होने के साथ-साथ वैरागी भी होते हैं। समाज में एक धार्मिक नेता, प्रसिद्द शास्त्र विद एवं मानव प्रेमी के रूप में प्रख्यात होते है। कोमल हृदयी हैं एवं दूसरों के साथ सदैव सद्भावना के साथ-साथ दुर्व्यवहार करने वाले को क्षमा और दिल में किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं रखते।

27- रेवती नक्षत्र;-

रेवती नक्षत्र में जन्मे जातक निश्चल प्रकृति के होते है। वो साहसिक कार्य और पुरुषार्थ प्रदर्शन की आपको ललक सदा ही रहती है। वो माध्यम कद गौर वर्ण के होते है। इनके व्यक्तित्व में संरक्षण, पोषण और प्रदर्शन प्रमुख है। परंपराओं और मान्यताओं को लेकर ये लोग रूढ़िवादी होने के बाद भी अपने व्यवहार में लचीलापन रखते हैं। इनकी शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा होता है और अपनी सूझबूझ से ये बहुत सी कठिनाइयों का हल स्वमं कर लेते हैं।

.... SHIVOHAM...