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वेदांत के तीन चरण...श्रवण ,मनन, निदिध्यासन का क्या अर्थ है ?

वेदांत के तीन चरण ...श्रवण, मनन और निदिध्यासन;-

02 FACTS;-

1-जब हमने शास्त्रों , गुरुजनों से सुन लिया कि “मैं आत्मा हूं” या ” मैं ही ब्रह्म हूं “तो हमारी बुद्धि, जो बहिर्मुखी थी, वह शांत हो गई।अथार्त अब पाने की अभिलाषा खत्म।लेक़िन वृक्ष को जन्म देने के लिए, बीज को शांत होकर जमीन में बैठना होता हैं।जब तुम्हारे चित्त ने यह फैसला किया कि अंदर की आत्मा अविनाशी है और वह अंदर ही है; तो आनंद की जो तलाश बाहर थी, वह रुकेगी और अंदर बैठना शुरू होगा।इस बैठने को ही हम उपासना कहते हैं। सुनने को कर्म कहते हैं।अनुभव में आ जाने को ज्ञान कहते हैं। यह जो सुनते हैं ..उसे श्रवण कहते हैं। यदि तुमको सुनने में अच्छा लगे और वैसा ही तुम्हारा मन अंदर से शांत होने लगे, तो उसे “मनन” कहते हैं।यदि तुमको जंच गया और मन शांत होकर अंदर आनंद की अनुभूति करने लगा , तो उसे हम “निदिध्यासन” कहते हैं। अंदर साक्षात्कार न हुआ हो; परंतु, अनुभव में आने की तैयारी होने लग जाए, सच्चा लगने लग जाए; तो इसे हम “निदिध्यासन” कहते हैं। यदि पूर्ण साक्षात्कार हो जाए, तो श्रवण, मनन और निदिध्यासन व्यर्थ है।ध्यान शब्द का अर्थ है “निदिध्यासन”। निदिध्यासन को कई जगह ध्यान भी कहा गया है।ध्यान का अर्थ है कि सुने हुए का अनुभव करने के लिए चित्त तद्रूप/ उसी प्रकार/ Corresponding होकर शांत होता जाए।वृत्ति निश्चल होती जाए,तो यह ध्यान है। उस ध्यान के निश्चलता में यदि बुद्धि की वृत्ति बिल्कुल शांत होकर उस आनंद में निमग्न हो जाए, अंतर्साक्षी का अनुभव होने लग जाए, तो उसे हम साक्षात्कार या समाधि कहते हैं।

2-अध्‍यात्‍म उपनिषद के अनुसार सूत्र है: - ’'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों द्वारा जीव -ब्रह्म की एकतारूप अर्थ का अनुसंधान करना, यह श्रवण है। और जो कुछ सुना गया है उसके अर्थ को युक्तिपूर्वक विचार करना, यह मनन है।इस श्रवण और मनन द्वारा निस्संदेह हुए अर्थ में चित्त को स्थापित करके एकतान बनना, यह निदिध्यासन हैफिर ध्याता तथा ध्यान का त्याग करके चित्त केवल एक ध्येय को ही विषय रूप माने और वायुरहित स्थान में रखे हुए दीए के समान निश्चल बन जाए, उसको समाधि कहते हैं''। श्रवण ,मनन ,निदिध्यासन..ये तीन अंग हैं।जब चेतना, मन और शरीर तीनों लग जाते हैं, तो साधना। जब चेतना और मन दोनों लगते हैं, तो मनन। और जब चेतना शुद्ध अकेली सुनती है, तो सम्यक श्रवण। सुनकर ही हो जाए, तो शुद्ध चैतन्य में घट जाता है। सुनकर न हो, तो मन की सहायता की जरूरत है; तो मनन। अगर मनन से भी न हो, तो फिर शरीर की भी साधना में जरूरत है; तो फिर निदिध्यासन।चार शब्दों का प्रयोग हुआ है। एक -एक शब्द अपने आप में एक -एक जगत है। वे चार शब्द हैं श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि। इन चार शब्दों में सत्य की सारी यात्रा समाहित हो जाती है। ये चार चरण जो सम्यक-रूपेण पूरा कर ले, उसे कुछ और करने को शेष नहीं रह जाता है। इन चार शब्दों के आस -पास ही समस्त साधना विकसित हुई है। इसलिए एक -एक शब्द को गहराई से, सूक्ष्मता से समझ लेना उपयोगी है।

श्रवण का क्या अर्थ है?-

06 FACTS;- 1-पहला शब्द है, श्रवण। श्रवण का अर्थ मात्र सुनना नहीं है। हम सभी सुनते हैं। सुनने के लिए कान होना काफी है। सुनना एक यांत्रिक घटना है। ध्वनि हुई, कान पर आवाज पड़ी, आपने सुना। कान सुनने के लिए जरूरी है, आवश्यक है, लेक़िन पर्याप्त नहीं है।भीतर कुछ और भी चाहिए।श्रवण का अर्थ है, कान भी वहां हों और आप भी वहां हों ..तो श्रवण घटित होता है। कठिन बात है। कान के साथ होना साधना की बात है। श्रवण का अर्थ है कि जब आप सुनते हों तो आपकी सारी चेतना कान हो जाए; सुनना ही रह जाए, बाकी कुछ भी न हो; भीतर कोई विचार न चले। क्योंकि भीतर अगर विचार चलता है, तो आपका ध्यान विचार पर चला जाता है, कान से हट जाता है।उदाहरण के लिए जब आपके घर में आग लगी होती है, तो किया गया नमस्कार सुनाई नहीं पड़ता। क्योंकि कान का यंत्र तो वैसा का ही वैसा है लेकिन भीतर ध्यान कान के साथ टूट गया है। मकान में जहां आग लगी है, वहां चला गया है। कान सुन रहा है, लेकिन कान ने जो सुना है, उसे चैतन्य तक पहुंचाने के लिए ध्यान का जो सेतु चाहिए, वह हट गया है। इसलिए कान सुनते हैं,लेक़िन आप नहीं सुन पाते। आप और कान के बीच में जो संबंध है, वह टूट गया है। 2-वास्तव में ,ध्यान बड़ी सूक्ष्म चीज है। जरा सा विचार भीतर चल रहा हो, तो ध्यान वहां चला जाता है।पैर में चींटी काट रही हो तो जितनी देर के लिए आपको पता चलता है कि पैर में चींटी काट रही है, उतनी देर तक श्रवण खो जाता है।सुनना होता है लेक़िन ध्यान हट जाता है।ध्यान की एक और तकलीफ है कि ध्यान एक साथ दो चीजों पर नहीं हो सकता। एक चीज पर एकबारगी होता है। जब दूसरी चीज पर होता है, एक से तत्काल हट जाता है। आप ऐसा कर सकते हैं कि छलांग लगा सकते हैं। हम छलांग लगाते रहते हैं। पैर में चींटी ने काटा, ध्यान वहां गया; फिर वापस ध्यान लौटा, सुना। खुजली आ गई, ध्यान वहां गया, फिर सुना। तो बीच -बीच में जब ध्यान हट जाता है, तो श्रवण में गैप/अंतराल पड़ जाते हैं ।और इसलिए जो आप सुनते हैं, उसमें से बहुत अर्थ नहीं निकल पाता, क्योंकि उसमें बहुत कुछ खो जाता है। और कई बार जो अर्थ आप निकालते हैं, वह आपका ही होता है फिर, क्योंकि उसमें बहुत कुछ खो गया है। फिर जोड़ कर आप जो सोच लेते हैं, वह आपका ही है। 3-जो कहा गया है उसे तो वही समझ सकता है जो श्रवण को उपलब्ध हो।अगर आप सिर्फ सुन रहे हैं, तो आप वही समझेंगे जो आप समझ सकते हैं ...वह नहीं, जो कहा गया है। क्योंकि बीच में बहुत कुछ खो जाएगा। और वह जो खो जाएगा, उसको आप अपने से भर देंगे , क्योंकि खाली जगह भर दी जाती है।आपका मन, आपकी स्मृति, आपकी जानकारी, आपका ज्ञान, अनुभव, वह उसमें समा जाएगा। फिर जो अंतिम रूप बनेगा, उसके निर्माता आप ही हैं ।श्रवण का अर्थ है, कान के पास ही चेतना आ जाए। भीतर कोई विचार , कोई चिंतन , कोई तर्क न चलता हो।इसका यह मतलब नहीं कि जो कहा जाए उसको आप बिना समझे स्वीकार कर लें। श्रवण में स्वीकार का कोई अर्थ नहीं है।श्रवण का अर्थ है सिर्फ सुन लें, स्वीकार -अस्वीकार बाद की बात है; जल्दी न करें।हम क्या करते हैं कि सुनते वक्त ही स्वीकार -अस्वीकार करते रहते हैं। लोगों के सिर हिलते रहते हैं कि बिलकुल ठीक, कोई कहता है कि नहीं जंच रहा ।वह सिर ही नहीं हिल रहा है, भीतर ध्यान हिल रहा है। उस ध्यान की वजह से सिर हिल रहा है।

4-उतने कंपन में आपका श्रवण खो गया।इसका मतलब यह कि आप भीतर सुनने के साथ निर्णय भी ले रहे हैं । तो जितनी देर आप निर्णय लेंगे उतनी देर श्रवण चूक जाएगा।श्रवण करते समय ठीक से वही सुन लेना है जो कहा गया। तब तो आप पीछे निर्णय कर सकेंगे कि स्वीकार करूं या अस्वीकार करूं?तो स्वीकार-अस्वीकार की प्रक्रिया को सुनते समय बीच में ले आना, श्रवण से चूक जाना है।मन दो काम नहीं कर सकता। सुनें या सोचें! जो सोचते हैं वे सुन नहीं पाते, जो सुनते हैं उन्हें सोचने के लिए उस समय कोई उपाय नहीं है। सोचना बाद में भी हो सकता है।और यही न्यायसंगत भी है कि पहले सुन लिया जाए, फिर सोचा जाए। क्योंकि अगर आपने ठीक से सुना ही नहीं है, या जो सुना है उसमें अपना जोड दिया है, या जो सुना है उसमें बीच -बीच में अंतराल रह गए हैं, तो आप जो सोचेंगे, उसका कोई मूल्य नहीं रह जाता। सम्यक सुना न गया हो तो सोचना व्यर्थ हो जाता है।इसलिए ऋषियों ने पहली सीढ़ी 'श्रवण' कही है। किसी संत के पास कोई आता है तो वे पहले कहते है कि तुम ठीक से श्रावक बनो। श्रावक का मतलब है सुनने वाले बनो। सुनने की कला जिसे आ गई हो वह श्रावक है।आपका मन बिलकुल रुक जाना चाहिए, उसकी धारा रुक जानी चाहिए, तो श्रवण घटित होता है और श्रवण पहली सीढ़ी है। और जितनी महत्वपूर्ण बात हो, उतना ही श्रवण प्रगाढ़ हो, तभी समझी जा सकेगी।

5- श्रवण का स्वीकार से कोई संबंध ही नहीं है। श्रवण का संबंध सिर्फ इस बात को ठीक से सुन लेने से है कि क्या कहा गया है।यही मन दुश्मन है और यही है आपका नियंता; इसी को मिटाने चले हैं और इसी के सहारे मिटाने चले हैं; तो कभी न मिटा पाएंगे। तो जरा सी एक बात आपको खटक जाए, कि आपकी मान्यताओं में यह बात नहीं जंचती बस मन आपका द्वार बंद कर लेता है कि अब सुनो ही मत , अनसुना कर दो या भीतर विरोध करते जाओ । मनसविद कहते हैं कि आपसे अगर सौ बातें कही जाएं, तो आपका मन पांच बातों को मुश्किल से भीतर जाने देता है! पंचानबे को बाहर लौटा देता है ..घुसने ही नहीं देता। क्योंकि आपकी मान्यताएं अतीत की निर्भर हैं, तय हैं। कोई मुसलमान है, कोई हिंदू है, कोई जैन है, कोई ईसाई है ...वह भीतर बैठा है। मन अपने अनुकूल को चुनता है और प्रतिकूल को छोड़ देता है। तब बड़ी कठिनाई है! इसी मन को मिटाना है; और यह अनुकूल को चुनता है और प्रतिकूल को सुनता नहीं, तो यह मिटेगा कैसे? हम अपनी सुरक्षा में लगे हैं, जैसे कोई संघर्ष चल रहा है। फिर श्रवण नहीं हो पाएगा ।श्रवण के लिए कुछ बातें खयाल में ले लेनी चाहिए। सुनते समय सुनना ही हो जाएं। सुनने वाला भूल जाए, कान ही रह जाएं; आपका सारा शरीर कान बन जाए; सब तरफ से सुनने लगें, और भीतर कोई चिंतन न हो। सारा चित्त एकाग्र रूप से सुनने में डूब जाए और भीतर कोई विचार न चलाएं।

6-इसलिए यह सूत्र कहता है कि 'तत्त्वमसि आदि वाक्यों द्वारा जीव -ब्रह्म की एकतारूप अर्थ का अनुसंधान करना, श्रवण है।’ जगत में, दो -चार ही महावाक्य हैं लेकिन 'तत्त्वमसि' से बड़ा महावाक्य कोई भी नहीं है। तत्त्वमसि का अर्थ है ..तू भी वही है। परमात्मा का नाम है तत्—वह। यह तत्त्वमसि का अर्थ है, वह कोई दूर अलग नहीं है, तू ही है। वह जिसे हमने कहा था' तत्', उससे ऐसा लगता है कि वह कहीं दूर का इशारा है।तत्त्वमसि का अर्थ है, वह तू ही है। वह दूर नहीं है, बहुत पास है, पास से भी ज्यादा पास है। तेरा होना ही वही है। अगर इस एक वाक्य को भी पकड़ कर कोई पूरा अनुसंधान कर ले, तो जीवन की परम स्थिति को उपलब्ध हो जाए। इसलिए इसको महावाक्य कहते हैं। फिर किसी शास्त्र की कोई भी जरूरत नहीं है, और किसी वेद और किसी कुरान और बाइबिल की कोई जरूरत नहीं है। तत्त्वमसि पर्याप्त वेद है। इस एक वाक्य का कोई ठीक से श्रवण कर ले, मनन कर ले, निदिध्यासन कर ले, समाधि कर ले, तो किसी और शास्त्र की कोई जरूरत नहीं है।

महावाक्य 'तत्त्वमसि' का क्या अर्थ है?-

07 FACTS;- 1-महावाक्य का अर्थ है जिसमें सब आ गया हो ..जैसे कि केमिस्ट्री में फार्मूले होते हैं।उदाहरण के लिए आइंस्टीन की रिलेटिविटी का फार्मूला जिसमें बस दो-तीन शब्दों में पूरी बात आ जाती है। यह महावाक्य आध्यात्मिक केमिस्ट्री का फार्मूला है। इसमें तीन बातें कही हैं तत्, वह, त्वम्, तू; दोनों एक हैं ...तीन बातें हैं। वह और तू एक हैं, बस इतना ही यह सूत्र है। लेकिन सारा वेदांत, ऋषियों का सारा अनुभव , इन तीन में आ जाता है। यह जो गणित जैसा सूत्र है वह अस्तित्व ..परमात्मा और तू; वह जो भीतर छिपी चेतना है वह दो नहीं हैं, ये एक हैं। इतना ही सार है समस्त वेदों का, फिर बाकी सब फैलाव है।इसलिए इस तरह के वाक्य को उपनिषदों में महावाक्य कहा गया है। इस एक से सारे जीवन की साधना, अनुभूति, सब निकल सकती है। रास्ते पर चलते आप बातें सुन लेते हैं, ये वाक्य उस तरह नहीं सुने जा सकते।इस तरह के वाक्य पूर्ण मौन में सुने जाने चाहिए। इस तरह के वाक्य ऐसे नहीं सुने जाने चाहिए, जैसे कोई फिल्मी गाने को सुन लेता है। सुनने की क्वालिटी, सुनने की गुणवत्ता और होनी चाहिए, तभी ये वाक्य भीतर प्रवेश करेंगे। 2-इसलिए हजारों साल तक भारत में हजारों साल तक ऋषियों का आग्रह रहा कि ''जो परम ज्ञान है, वह न लिखा जाए''। उनका आग्रह बड़ा कीमती था। लेकिन उसे पूरा करना असंभव था ..लिखना पड़ा। बहुत लोग, विशेषकर भाषाशास्त्री, लिंग्विस्ट सोचते हैं कि चूंकि लिखने का उपाय नहीं था, इसलिए बहुत दिन तक वेद और उपनिषद नहीं लिखे गए।वे गलत सोचते हैं। क्योंकि जो तत्त्वमसि जैसा अनुभव उपलब्ध कर सकते थे, जो इस महावाक्य को अनुभव में ला सकते थे, वे लिखने की कला न खोज लेते, यह असंभव मालूम पड़ता है। जिनकी प्रतिभा ऐसी ऊंचाई के शिखर छू लेती थी, वे लिखने जैसी साधारण बात भी न खोज पाते, यह उचित नहीं मालूम पड़ता।लिखने की कला तो थी, लेकिन वे लिखने को राजी नहीं थे।क्योंकि ऐसे महावाक्य लिख दिए जाएं, तो हर कोई हर किसी हालत में पढ़ लेता है। और पढ कर इस भ्रांति में पड़ जाता है कि समझ गए। इन वाक्यों को सुनने और पढ़ने के लिए जो एक मनोदशा चाहिए, वह मनोदशा के बिना भी पढ़ा जा सकता है।

3-तत्त्वमसि पढ़ने में क्या दिक्कत है ..पहली क्लास का बच्चा भी इसको कंठस्थ कर लेता है और पढ कर इस भ्रांति में भी पड जाएगा कि मैंने समझ लिया कि मैं भी वही हूं। इस वाक्य का यह मतलब हो गया और बात खतम हो गई। फिर इसे जीवन भर दोहराए चला जाता है।बस यहाँ बात ही चूक गई।वह जो असली बिंदु था, खो गया।ये वाक्य किसी विशेष गुण, किसी विशेष अवस्था, चित्त की कोई विशेष परिस्थिति में ही सुनने योग्य हैं। तभी ये प्राणों में प्रवेश करते हैं। हर कभी सुन लेने पर खतरा है। खतरे दो हैं एक तो यह याद हो जाएगा, और लगेगा मैंने जान लिया, और दूसरा खतरा यह है कि इस जानकारी के कारण आप शायद ही कभी उस मनःस्थिति को बनाने की तैयारी करें, जिसमें इसे सुना जाना चाहिए था। बीज डालने का वक्त होता है, समय होता है, मौसम होता है, घड़ी होती है, मुहूर्त होता है। और ये बीज तो महाबीज हैं, इन्हें हर कहीं नहीं डाल सकते हैं। इसलिए गुरु इन्हें शिष्य के कान में डाल देते हैं। 4-इसे थोड़ा समझना हैं, हम सब सुनते हैं कि मंत्र कान में दिया जाता है। परन्तु यह नासमझी की बात है।गुरु शिष्य के कान में इन महाबीजों को देता था अथार्त जब शिष्य बिलकुल कान हो जाता था, उसका सारा व्यक्तित्व जब सुनने के लिए तैयार हो जाता था, जब वह कान से ही नहीं बल्कि रोआं-रोआं से सुनता था, जब उसका पूरा प्राण कान के पीछे इकट्ठा हो जाता था, जब उसकी सारी आत्मा सारी इंद्रियों से हट कर कान में नियोजित हो जाती थी, तब गुरु उसे कान में दे देता था। वह यही कहता था 'तत्त्वमसि'। शब्द यही थे। इन शब्दों में कोई फर्क नहीं पडता था। लेकिन जो शिष्य था सामने, उसके चैतन्य का गुण, उसकी चैतन्य की क्षमता और थी।अभी भी न मालूम कितने नासमझ ..न मालूम कितने नासमझों के कान में मंत्र दे देते हैं; बिना इसकी फिक्र किए कि कान का मतलब क्या है!जो कान आपके सिर में हैं, उनसे बहुत मतलब नहीं है। कान से मतलब है...आपके व्यक्तित्व का एक ढंग, एक खुलाव, भीतर एक शांति , एक मौजूदगी, सुनने की एक तैयारी, आतुर प्यास, अभीप्सा; सारे प्राण सुनने को तैयार हैं। तब गुरु कान में इन महावाक्यों को देता था। 5-और कभी-कभी ऐसा होता था कि इस वाक्य का पहुंचना ही घटना हो जाती थी।बहुत लोग हैं जो केवल सुन कर ज्ञान को उपलब्ध हो गए हैं, बाकी तीन चरणों की जरूरत भी नहीं पड़ी। लेकिन यह आसान नहीं है, सुन कर ज्ञान को वही उपलब्ध हो सकता है, जिसकी समग्रता सुनने में नियोजित हो गई हो। सुनने वाला बचा ही न हो, सुनने की क्रिया ही रह गई हो। ऐसा खयाल भी न रहा हो भीतर कि मैं सुनने वाला हूं। 'मैं हूं' यह भी न रहा हो, बस सुनना ही हो गया हूं;केवल सुनने की प्रक्रिया ही रह गई हो। भीतर सब मौन हो गया, शून्य हो गया! उस शून्य में 'तत्त्वमसि' की इतनी सी चोट प्राणों का विस्फोट कर देती है। मगर इसमें ध्यान रखने की एक बात और है कि शिष्य की, सीखने वाले की, साधक की, इतनी तैयारी चाहिए कि वह शून्य हो। लेकिन हर कोई उसके कान में तत्त्वमसि कह दे तो भी काम नहीं चलेगा।किसी की जरूरत भी नहीं है, टेपरिकार्ड पर लिख कर रख लिया मगर उससे भी काम नहीं चलेगा। क्योंकि शब्दों की भी शक्ति है और शक्ति बोलने वाले पर निर्भर होती है....शब्