वेदांत के तीन चरण...श्रवण ,मनन, निदिध्यासन का क्या अर्थ है ?क्या अर्थ है 'तत्वमसि' का?

वेदांत के तीन चरण ...श्रवण, मनन और निदिध्यासन;-

02 FACTS;-

1-जब हमने शास्त्रों , गुरुजनों से सुन लिया कि “मैं आत्मा हूं” या ” मैं ही ब्रह्म हूं “तो हमारी बुद्धि, जो बहिर्मुखी थी, वह शांत हो गई।अथार्त अब पाने की अभिलाषा खत्म।लेक़िन वृक्ष को जन्म देने के लिए, बीज को शांत होकर जमीन में बैठना होता हैं।जब तुम्हारे चित्त ने यह फैसला किया कि अंदर की आत्मा अविनाशी है और वह अंदर ही है; तो आनंद की जो तलाश बाहर थी, वह रुकेगी और अंदर बैठना शुरू होगा।इस बैठने को ही हम उपासना कहते हैं। सुनने को कर्म कहते हैं।अनुभव में आ जाने को ज्ञान कहते हैं। यह जो सुनते हैं ..उसे श्रवण कहते हैं। यदि तुमको सुनने में अच्छा लगे और वैसा ही तुम्हारा मन अंदर से शांत होने लगे, तो उसे “मनन” कहते हैं।यदि तुमको जंच गया और मन शांत होकर अंदर आनंद की अनुभूति करने लगा , तो उसे हम “निदिध्यासन” कहते हैं। अंदर साक्षात्कार न हुआ हो; परंतु, अनुभव में आने की तैयारी होने लग जाए, सच्चा लगने लग जाए; तो इसे हम “निदिध्यासन” कहते हैं। यदि पूर्ण साक्षात्कार हो जाए, तो श्रवण, मनन और निदिध्यासन व्यर्थ है।ध्यान शब्द का अर्थ है “निदिध्यासन”। निदिध्यासन को कई जगह ध्यान भी कहा गया है।ध्यान का अर्थ है कि सुने हुए का अनुभव करने के लिए चित्त तद्रूप/ उसी प्रकार/ Corresponding होकर शांत होता जाए।वृत्ति निश्चल होती जाए,तो यह ध्यान है। उस ध्यान के निश्चलता में यदि बुद्धि की वृत्ति बिल्कुल शांत होकर उस आनंद में निमग्न हो जाए, अंतर्साक्षी का अनुभव होने लग जाए, तो उसे हम साक्षात्कार या समाधि कहते हैं।

2-अध्‍यात्‍म उपनिषद के अनुसार सूत्र है: - ’'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों द्वारा जीव -ब्रह्म की एकतारूप अर्थ का अनुसंधान करना, यह श्रवण है। और जो कुछ सुना गया है उसके अर्थ को युक्तिपूर्वक विचार करना, यह मनन है।इस श्रवण और मनन द्वारा निस्संदेह हुए अर्थ में चित्त को स्थापित करके एकतान बनना, यह निदिध्यासन हैफिर ध्याता तथा ध्यान का त्याग करके चित्त केवल एक ध्येय को ही विषय रूप माने और वायुरहित स्थान में रखे हुए दीए के समान निश्चल बन जाए, उसको समाधि कहते हैं''। श्रवण ,मनन ,निदिध्यासन..ये तीन अंग हैं।जब चेतना, मन और शरीर तीनों लग जाते हैं, तो साधना। जब चेतना और मन दोनों लगते हैं, तो मनन। और जब चेतना शुद्ध अकेली सुनती है, तो सम्यक श्रवण। सुनकर ही हो जाए, तो शुद्ध चैतन्य में घट जाता है। सुनकर न हो, तो मन की सहायता की जरूरत है; तो मनन। अगर मनन से भी न हो, तो फिर शरीर की भी साधना में जरूरत है; तो फिर निदिध्यासन।चार शब्दों का प्रयोग हुआ है। एक -एक शब्द अपने आप में एक -एक जगत है। वे चार शब्द हैं श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि। इन चार शब्दों में सत्य की सारी यात्रा समाहित हो जाती है। ये चार चरण जो सम्यक-रूपेण पूरा कर ले, उसे कुछ और करने को शेष नहीं रह जाता है। इन चार शब्दों के आस -पास ही समस्त साधना विकसित हुई है। इसलिए एक -एक शब्द को गहराई से, सूक्ष्मता से समझ लेना उपयोगी है।

श्रवण का क्या अर्थ है?-

06 FACTS;- 1-पहला शब्द है, श्रवण। श्रवण का अर्थ मात्र सुनना नहीं है। हम सभी सुनते हैं। सुनने के लिए कान होना काफी है। सुनना एक यांत्रिक घटना है। ध्वनि हुई, कान पर आवाज पड़ी, आपने सुना। कान सुनने के लिए जरूरी है, आवश्यक है, लेक़िन पर्याप्त नहीं है।भीतर कुछ और भी चाहिए।श्रवण का अर्थ है, कान भी वहां हों और आप भी वहां हों ..तो श्रवण घटित होता है। कठिन बात है। कान के साथ होना साधना की बात है। श्रवण का अर्थ है कि जब आप सुनते हों तो आपकी सारी चेतना कान हो जाए; सुनना ही रह जाए, बाकी कुछ भी न हो; भीतर कोई विचार न चले। क्योंकि भीतर अगर विचार चलता है, तो आपका ध्यान विचार पर चला जाता है, कान से हट जाता है।उदाहरण के लिए जब आपके घर में आग लगी होती है, तो किया गया नमस्कार सुनाई नहीं पड़ता। क्योंकि कान का यंत्र तो वैसा का ही वैसा है लेकिन भीतर ध्यान कान के साथ टूट गया है। मकान में जहां आग लगी है, वहां चला गया है। कान सुन रहा है, लेकिन कान ने जो सुना है, उसे चैतन्य तक पहुंचाने के लिए ध्यान का जो सेतु चाहिए, वह हट गया है। इसलिए कान सुनते हैं,लेक़िन आप नहीं सुन पाते। आप और कान के बीच में जो संबंध है, वह टूट गया है। 2-वास्तव में ,ध्यान बड़ी सूक्ष्म चीज है। जरा सा विचार भीतर चल रहा हो, तो ध्यान वहां चला जाता है।पैर में चींटी काट रही हो तो जितनी देर के लिए आपको पता चलता है कि पैर में चींटी काट रही है, उतनी देर तक श्रवण खो जाता है।सुनना होता है लेक़िन ध्यान हट जाता है।ध्यान की एक और तकलीफ है कि ध्यान एक साथ दो चीजों पर नहीं हो सकता। एक चीज पर एकबारगी होता है। जब दूसरी चीज पर होता है, एक से तत्काल हट जाता है। आप ऐसा कर सकते हैं कि छलांग लगा सकते हैं। हम छलांग लगाते रहते हैं। पैर में चींटी ने काटा, ध्यान वहां गया; फिर वापस ध्यान लौटा, सुना। खुजली आ गई, ध्यान वहां गया, फिर सुना। तो बीच -बीच में जब ध्यान हट जाता है, तो श्रवण में गैप/अंतराल पड़ जाते हैं ।और इसलिए जो आप सुनते हैं, उसमें से बहुत अर्थ नहीं निकल पाता, क्योंकि उसमें बहुत कुछ खो जाता है। और कई बार जो अर्थ आप निकालते हैं, वह आपका ही होता है फिर, क्योंकि उसमें बहुत कुछ खो गया है। फिर जोड़ कर आप जो सोच लेते हैं, वह आपका ही है। 3-जो कहा गया है उसे तो वही समझ सकता है जो श्रवण को उपलब्ध हो।अगर आप सिर्फ सुन रहे हैं, तो आप वही समझेंगे जो आप समझ सकते हैं ...वह नहीं, जो कहा गया है। क्योंकि बीच में बहुत कुछ खो जाएगा। और वह जो खो जाएगा, उसको आप अपने से भर देंगे , क्योंकि खाली जगह भर दी जाती है।आपका मन, आपकी स्मृति, आपकी जानकारी, आपका ज्ञान, अनुभव, वह उसमें समा जाएगा। फिर जो अंतिम रूप बनेगा, उसके निर्माता आप ही हैं ।श्रवण का अर्थ है, कान के पास ही चेतना आ जाए। भीतर कोई विचार , कोई चिंतन , कोई तर्क न चलता हो।इसका यह मतलब नहीं कि जो कहा जाए उसको आप बिना समझे स्वीकार कर लें। श्रवण में स्वीकार का कोई अर्थ नहीं है।श्रवण का अर्थ है सिर्फ सुन लें, स्वीकार -अस्वीकार बाद की बात है; जल्दी न करें।हम क्या करते हैं कि सुनते वक्त ही स्वीकार -अस्वीकार करते रहते हैं। लोगों के सिर हिलते रहते हैं कि बिलकुल ठीक, कोई कहता है कि नहीं जंच रहा ।वह सिर ही नहीं हिल रहा है, भीतर ध्यान हिल रहा है। उस ध्यान की वजह से सिर हिल रहा है।

4-उतने कंपन में आपका श्रवण खो गया।इसका मतलब यह कि आप भीतर सुनने के साथ निर्णय भी ले रहे हैं । तो जितनी देर आप निर्णय लेंगे उतनी देर श्रवण चूक जाएगा।श्रवण करते समय ठीक से वही सुन लेना है जो कहा गया। तब तो आप पीछे निर्णय कर सकेंगे कि स्वीकार करूं या अस्वीकार करूं?तो स्वीकार-अस्वीकार की प्रक्रिया को सुनते समय बीच में ले आना, श्रवण से चूक जाना है।मन दो काम नहीं कर सकता। सुनें या सोचें! जो सोचते हैं वे सुन नहीं पाते, जो सुनते हैं उन्हें सोचने के लिए उस समय कोई उपाय नहीं है। सोचना बाद में भी हो सकता है।और यही न्यायसंगत भी है कि पहले सुन लिया जाए, फिर सोचा जाए। क्योंकि अगर आपने ठीक से सुना ही नहीं है, या जो सुना है उसमें अपना जोड दिया है, या जो सुना है उसमें बीच -बीच में अंतराल रह गए हैं, तो आप जो सोचेंगे, उसका कोई मूल्य नहीं रह जाता। सम्यक सुना न गया हो तो सोचना व्यर्थ हो जाता है।इसलिए ऋषियों ने पहली सीढ़ी 'श्रवण' कही है। किसी संत के पास कोई आता है तो वे पहले कहते है कि तुम ठीक से श्रावक बनो। श्रावक का मतलब है सुनने वाले बनो। सुनने की कला जिसे आ गई हो वह श्रावक है।आपका मन बिलकुल रुक जाना चाहिए, उसकी धारा रुक जानी चाहिए, तो श्रवण घटित होता है और श्रवण पहली सीढ़ी है। और जितनी महत्वपूर्ण बात हो, उतना ही श्रवण प्रगाढ़ हो, तभी समझी जा सकेगी।

5- श्रवण का स्वीकार से कोई संबंध ही नहीं है। श्रवण का संबंध सिर्फ इस बात को ठीक से सुन लेने से है कि क्या कहा गया है।यही मन दुश्मन है और यही है आपका नियंता; इसी को मिटाने चले हैं और इसी के सहारे मिटाने चले हैं; तो कभी न मिटा पाएंगे। तो जरा सी एक बात आपको खटक जाए, कि आपकी मान्यताओं में यह बात नहीं जंचती बस मन आपका द्वार बंद कर लेता है कि अब सुनो ही मत , अनसुना कर दो या भीतर विरोध करते जाओ । मनसविद कहते हैं कि आपसे अगर सौ बातें कही जाएं, तो आपका मन पांच बातों को मुश्किल से भीतर जाने देता है! पंचानबे को बाहर लौटा देता है ..घुसने ही नहीं देता। क्योंकि आपकी मान्यताएं अतीत की निर्भर हैं, तय हैं। कोई मुसलमान है, कोई हिंदू है, कोई जैन है, कोई ईसाई है ...वह भीतर बैठा है। मन अपने अनुकूल को चुनता है और प्रतिकूल को छोड़ देता है। तब बड़ी कठिनाई है! इसी मन को मिटाना है; और यह अनुकूल को चुनता है और प्रतिकूल को सुनता नहीं, तो यह मिटेगा कैसे? हम अपनी सुरक्षा में लगे हैं, जैसे कोई संघर्ष चल रहा है। फिर श्रवण नहीं हो पाएगा ।श्रवण के लिए कुछ बातें खयाल में ले लेनी चाहिए। सुनते समय सुनना ही हो जाएं। सुनने वाला भूल जाए, कान ही रह जाएं; आपका सारा शरीर कान बन जाए; सब तरफ से सुनने लगें, और भीतर कोई चिंतन न हो। सारा चित्त एकाग्र रूप से सुनने में डूब जाए और भीतर कोई विचार न चलाएं।

6-इसलिए यह सूत्र कहता है कि 'तत्त्वमसि आदि वाक्यों द्वारा जीव -ब्रह्म की एकतारूप अर्थ का अनुसंधान करना, श्रवण है।’ जगत में, दो -चार ही महावाक्य हैं लेकिन 'तत्त्वमसि' से बड़ा महावाक्य कोई भी नहीं है। तत्त्वमसि का अर्थ है ..तू भी वही है। परमात्मा का नाम है तत्—वह। यह तत्त्वमसि का अर्थ है, वह कोई दूर अलग नहीं है, तू ही है। वह जिसे हमने कहा था' तत्', उससे ऐसा लगता है कि वह कहीं दूर का इशारा है।तत्त्वमसि का अर्थ है, वह तू ही है। वह दूर नहीं है, बहुत पास है, पास से भी ज्यादा पास है। तेरा होना ही वही है। अगर इस एक वाक्य को भी पकड़ कर कोई पूरा अनुसंधान कर ले, तो जीवन की परम स्थिति को उपलब्ध हो जाए। इसलिए इसको महावाक्य कहते हैं। फिर किसी शास्त्र की कोई भी जरूरत नहीं है, और किसी वेद और किसी कुरान और बाइबिल की कोई जरूरत नहीं है। तत्त्वमसि पर्याप्त वेद है। इस एक वाक्य का कोई ठीक से श्रवण कर ले, मनन कर ले, निदिध्यासन कर ले, समाधि कर ले, तो किसी और शास्त्र की कोई जरूरत नहीं है।

महावाक्य 'तत्त्वमसि' का क्या अर्थ है?-

08 FACTS;- 1-महावाक्य का अर्थ है जिसमें सब आ गया हो ..जैसे कि केमिस्ट्री में फार्मूले होते हैं।उदाहरण के लिए आइंस्टीन की रिलेटिविटी का फार्मूला जिसमें बस दो-तीन शब्दों में पूरी बात आ जाती है। यह महावाक्य आध्यात्मिक केमिस्ट्री का फार्मूला है। इसमें तीन बातें कही हैं तत्, वह, त्वम्, तू; दोनों एक हैं ...तीन बातें हैं। वह और तू एक हैं, बस इतना ही यह सूत्र है। लेकिन सारा वेदांत, ऋषियों का सारा अनुभव , इन तीन में आ जाता है। यह जो गणित जैसा सूत्र है वह अस्तित्व ..परमात्मा और तू; वह जो भीतर छिपी चेतना है वह दो नहीं हैं, ये एक हैं। इतना ही सार है समस्त वेदों का, फिर बाकी सब फैलाव है।इसलिए इस तरह के वाक्य को उपनिषदों में महावाक्य कहा गया है।उदाहरण के लिए एक संन्यासी पंद्रह वर्षों से मौन था।जब उसने मौन लिया था तो उसने कहा था कि कभी जरूरत होगी तो बोलूंगा। फिर पंद्रह वर्ष तक कोई जरूरत न पड़ी और वह नहीं बोला।एक रात वह Defence Sector के पास से वह निकल रहा था। सुरक्षा कर्मिओं ने यह समझ कर कि कोई जासूस होगा ;उसको रोक लिया और पूछने लगे.... कौन हो तुम? तो वह हंसने लगा।

2-वह अगर मौन न होता तो बोलता भी... लेकिन उसकी हंसी को तो गलत समझा गया। उन्होंने उसे घेर लिया और कहा बोलो, अन्यथा मार डालेंगे। तो उसे और जोर से हंसी आई, क्योंकि वे मारने की धमकी दे रहे थे।वह और भी हंसने लगा तो उन्होंने उसकी छाती में गोली मार दी।मरते क्षण में उसने सिर्फ उपनिषदों का एक शब्द बोला ...‘तत्वमसि’ और मर गया। तत्वमसि अथार्त ... तुम वही हो। तुम वही हो जो मैं हूं ..तुम वही हो जो है। जिस दिन पता चलता है कि मैं नहीं हूं उसी दिन पता चलता है कि सभी कुछ मैं हूं। जिस दिन मैं नहीं हूं अथार्त जिस दिन लहर नहीं है उस दिन पास की लहर और दूर की लहर... सब वही हो गई। सारा सागर वही हो गया।संन्यासी ने मरते क्षण में जरूरत समझी और बड़ी अदभुत बात कही थी कि ‘ तुम भी वही हो।’ इस एक से सारे जीवन की साधना, अनुभूति, सब निकल सकती है। रास्ते पर चलते आप बातें सुन लेते हैं, ये वाक्य उस तरह नहीं सुने जा सकते।इस तरह के वाक्य पूर्ण मौन में सुने जाने चाहिए। इस तरह के वाक्य ऐसे नहीं सुने जाने चाहिए, जैसे कोई फिल्मी गाने को सुन लेता है। सुनने की क्वालिटी, सुनने की गुणवत्ता और होनी चाहिए, तभी ये वाक्य भीतर प्रवेश करेंगे। 3-इसलिए हजारों साल तक भारत में हजारों साल तक ऋषियों का आग्रह रहा कि ''जो परम ज्ञान है, वह न लिखा जाए''। उनका आग्रह बड़ा कीमती था। लेकिन उसे पूरा करना असंभव था ..लिखना पड़ा। बहुत लोग, विशेषकर भाषाशास्त्री, लिंग्विस्ट सोचते हैं कि चूंकि लिखने का उपाय नहीं था, इसलिए बहुत दिन तक वेद और उपनिषद नहीं लिखे गए।वे गलत सोचते हैं। क्योंकि जो तत्त्वमसि जैसा अनुभव उपलब्ध कर सकते थे, जो इस महावाक्य को अनुभव में ला सकते थे, वे लिखने की कला न खोज लेते, यह असंभव मालूम पड़ता है। जिनकी प्रतिभा ऐसी ऊंचाई के शिखर छू लेती थी, वे लिखने जैसी साधारण बात भी न खोज पाते, यह उचित नहीं मालूम पड़ता।लिखने की कला तो थी, लेकिन वे लिखने को राजी नहीं थे।क्योंकि ऐसे महावाक्य लिख दिए जाएं, तो हर कोई हर किसी हालत में पढ़ लेता है। और पढ कर इस भ्रांति में पड़ जाता है कि समझ गए। इन वाक्यों को सुनने और पढ़ने के लिए जो एक मनोदशा चाहिए, वह मनोदशा के बिना भी पढ़ा जा सकता है।

4-तत्त्वमसि पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं है ..पहली क्लास का बच्चा भी इसको कंठस्थ कर लेता है और पढ कर इस भ्रांति में भी पड जाएगा कि मैंने समझ लिया कि मैं भी वही हूं। इस वाक्य का यह मतलब हो गया और बात खतम हो गई। फिर इसे जीवन भर दोहराए चला जाता है।बस यहाँ बात ही चूक गई।वह जो असली बिंदु था, खो गया।ये वाक्य किसी विशेष गुण, किसी विशेष अवस्था, चित्त की कोई विशेष परिस्थिति में ही सुनने योग्य हैं। तभी ये प्राणों में प्रवेश करते हैं। हर कभी सुन लेने पर खतरा है। खतरे दो हैं एक तो यह याद हो जाएगा, और लगेगा मैंने जान लिया, और दूसरा खतरा यह है कि इस जानकारी के कारण आप शायद ही कभी उस मनःस्थिति को बनाने की तैयारी करें, जिसमें इसे सुना जाना चाहिए था। बीज डालने का वक्त होता है, समय होता है, मौसम होता है, घड़ी होती है, मुहूर्त होता है। और ये बीज तो महाबीज हैं, इन्हें हर कहीं नहीं डाल सकते हैं। इसलिए गुरु इन्हें शिष्य के कान में डाल देते हैं। 5-इसे थोड़ा समझना हैं, हम सब सुनते हैं कि मंत्र कान में दिया जाता है। परन्तु यह नासमझी की बात है।गुरु शिष्य के कान में इन महाबीजों को देता था अथार्त जब शिष्य बिलकुल कान हो जाता था, उसका सारा व्यक्तित्व जब सुनने के लिए तैयार हो जाता था, जब वह कान से ही नहीं बल्कि रोआं-रोआं से सुनता था, जब उसका पूरा प्राण कान के पीछे इकट्ठा हो जाता था, जब उसकी सारी आत्मा सारी इंद्रियों से हट कर कान में नियोजित हो जाती थी, तब गुरु उसे कान में दे देता था। वह यही कहता था 'तत्त्वमसि'। शब्द यही थे। इन शब्दों में कोई फर्क नहीं पडता था। लेकिन जो शिष्य था सामने, उसके चैतन्य का गुण, उसकी चैतन्य की क्षमता और थी।अभी भी न मालूम कितने नासमझ ..न मालूम कितने नासमझों के कान में मंत्र दे देते हैं; बिना इसकी फिक्र किए कि कान का मतलब क्या है!जो कान आपके सिर में हैं, उनसे बहुत मतलब नहीं है। कान से मतलब है...आपके व्यक्तित्व का एक ढंग, एक खुलाव, भीतर एक शांति , एक मौजूदगी, सुनने की एक तैयारी, आतुर प्यास, अभीप्सा; सारे प्राण सुनने को तैयार हैं। तब गुरु कान में इन महावाक्यों को देता था। 6-और कभी-कभी ऐसा होता था कि इस वाक्य का पहुंचना ही घटना हो जाती थी।बहुत लोग हैं जो केवल सुन कर ज्ञान को उपलब्ध हो गए हैं, बाकी तीन चरणों की जरूरत भी नहीं पड़ी। लेकिन यह आसान नहीं है, सुन कर ज्ञान को वही उपलब्ध हो सकता है, जिसकी समग्रता सुनने में नियोजित हो गई हो। सुनने वाला बचा ही न हो, सुनने की क्रिया ही रह गई हो। ऐसा खयाल भी न रहा हो भीतर कि मैं सुनने वाला हूं। 'मैं हूं' यह भी न रहा हो, बस सुनना ही हो गया हूं;केवल सुनने की प्रक्रिया ही रह गई हो। भीतर सब मौन हो गया, शून्य हो गया! उस शून्य में 'तत्त्वमसि' की इतनी सी चोट प्राणों का विस्फोट कर देती है। मगर इसमें ध्यान रखने की एक बात और है कि शिष्य की, सीखने वाले की, साधक की, इतनी तैयारी चाहिए कि वह शून्य हो। लेकिन हर कोई उसके कान में तत्त्वमसि कह दे तो भी काम नहीं चलेगा।किसी की जरूरत भी नहीं है, टेपरिकार्ड पर लिख कर रख लिया मगर उससे भी काम नहीं चलेगा। क्योंकि शब्दों की भी शक्ति है और शक्ति बोलने वाले पर निर्भर होती है....शब्दों में नहीं होती।

7-शब्द कितने गहरे से आते हैं; और उन शब्दों में कितने प्राण समाविष्ट हैं, और उन शब्दों में कितना अनुभव का रस भरा है, और उन शब्दों को जो कह रहा है, वह भी कहते समय मिट गया हो, कहने वाला ही न हो , सिर्फ आत्मा से 'तत्त्वमसि' गूंज उठी हो। और सुनने वाला भी न हो, तो वह तू ही है। इस मिलन के बिंदु पर बिना कुछ किए भी क्रांति घटित हो जाती है, विस्फोट हो जाता है। वह जो अज्ञानी था, अचानक ज्ञानी हो जाता है।दो ऐसी चेतनाओं का मिलन कि बोलने वाला मौजूद न हो और वाणी प्रकट हो, और सुनने वाला मौजूद न हो और वाणी प्रवेश करे, तो श्रवण से भी यात्रा पूरी हो जाती है।लेकिन ऐसा संयोग खोजना कठिन है। ऐसा संयोग मिल भी जाए तो उसका उपयोग करना कठिन है। इसलिए शिष्य वर्षों तक गुरु के पास रहता था, इस संयोग की प्रतीक्षा में कि कब मौका आ जाए? कब तैयारी हो? तो वर्षों तक चुप रहने की ही साधना चलती थी। उदाहरण के लिए उपनिषद के अनुसार श्वेतकेतु अपने गुरु के पास गया। तो वर्षों तक गुरु ने पूछा ही नहीं, कैसे आए हो? श्वेतकेतु ने कहा कि जब गुरु पूछेगा, तब बता देंगे। वर्षों तक गुरु ने पूछा ही नहीं! 8- कथा है कि कि श्वेतकेतु आया; हवनकुंड को भी श्वेतकेतु पर दया आने लगी कि कितने वर्ष हो गए इसे आए और अब तक गुरु ने यह भी नहीं पूछा कि कैसे आए हो! वह लाकर लकड़ी काटता, आग जलाता, दूध दुहता, गुरु के पैर दाबता। रात हो जाती, वहीं गुरु के चरणों में सो जाता। सुबह उठ कर फिर काम में लग जाता! वह जो चौबीस घंटे हवन जलता रहता, उस अग्नि को भी दया आने लगी कि यह श्वेतकेतु अपनी तरफ से कहता नहीं कि मैं किसलिए आया हूं, और यह उद्दालक है कि पूछता नहीं कि किसलिए आए हो!ऐसी प्रतीक्षा, ऐसा धैर्य, इतनी चुप्पी अपने आप श्रावक बना देती थी। धीरे -धीरे गुरु की वाणी तो दूर, गुरु की श्वास भी सुनाई पड़ने लगती थी। इतनी प्रतीक्षा में, इस मौन में उसकी हृदय की धड़कन भी सुनाई पड़ने लगती थी। वह कुछ कहे, यह जरूरी भी न था, उसका हिलना -डुलना भी सुनाई पड़ने लगता था। और जब ठीक क्षण आता, तो कहने की घटना घट जाती थी। न तो गुरु को कहने की चेष्टा करनी पड़ती थी और न शिष्य को कुछ जानने की चेष्टा करनी पड़ती थी ; ठीक क्षण में घटना घट जाती थी। मनन का क्या अर्थ है?-

13 FACTS;- 1-दूसरा चरण है, मनन।जो कहा गया है उसे सुन कर ,उसकी प्रामाणिकता में मनन करना है। यह मनन की पहली शर्त है। आपने अपने मतलब का चुन लिया, उस पर मनन किया, वह मनन नहीं है, वह धोखा है।तो मनन की पहली शर्त..सुन लिया। निंदा, प्रशंसा, स्वीकार-अस्वीका ..कुछ भी नहीं, कोई मूल्यांकन नहीं, कोई निर्णय नहीं।न पक्ष न विपक्ष; मौन, तटस्थ सुन लिया, क्या कहा है उसे हृदय के आखिरी कोने तक उतर जाने दिया , ताकि उससे परिचय हो जाए। जिससे परिचय है, उसी का तो मनन हो सकता है।यही चिंतन और मनन का फर्क है। चिंतन हम उसका करते हैं, जिसका कोई ठीक से परिचय ही नहीं है। चिंतन है अपरिचित के साथ बुद्धि की प्रक्रिया, व्यायाम। मनन है परिचित के साथ ..जिसे आत्मसात किया, उसे अपने में भीतर डुबा लिया , उस पर विचार किया। 2-चिंतन और मनन ..दोनों में बड़ा फर्क है। चिंतन में कलह है, मनन में सहानुभूति है। चिंतन में द्वंद्व है, मनन में विमर्श है। ये बड़े फर्क हैं। चिंतन का मतलब है, आप लड़ रहे हैं किसी चीज से। अगर न जीत पाए, तो मान लेंगे। लेकिन मानने में पीडा रहेगी।इसलिए जब आप किसी से विवाद करते हैं, और उससे तर्क नहीं कर पाते, और आपको मानना पड़ता है, तो आपको पता है, भीतर कैसी पीड़ा होती है! मान लेते हैं, क्योंकि अब तर्क नहीं कर सकते हैं; लेकिन भीतर तैयारी रहती है कि आज नहीं कल, उखाड़ कर फेंक देंगे ..कल, अस्वीकार कर देंगे।इसलिए इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति को तर्क से रूपांतरित नहीं किया जा सकता; क्योंकि तर्क का मतलब है, पराजय। अगर उसको तर्क से कोई चीज सिद्ध भी कर दी, तो वह हारा हुआ अनुभव करेगा, बदला हुआ नहीं। हारा हुआ अनुभव करेगा कि ठीक है, मैं कुछ जवाब नहीं दे पा रहा हूं, तर्क नहीं खोज पा रहा हूं; जिस दिन तर्क खोज लूंगा, देखूंगा। 3-और ध्यान रहे, हारा हुआ व्यक्ति कभी भी बदला हुआ व्यक्ति नहीं होता। तो आप किसी को तर्क से चुप कर सकते हैं , रूपांतरित नहीं कर सकते। और बात भी ठीक है, तर्क से रूपांतरित किसी को होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि जब दो व्यक्ति विवाद करते हैं, तो जो हार जाता है, जरूरी नहीं है कि वह गलत रहा हो, जो जीत जाता है, जरूरी नहीं है कि सही रहा हो। इतना ही जरूरी है कि जो जीत गया है, वह ज्यादा तर्क कर सकता था; जो हार गया है, वह कम तर्क कर सकता था। इससे ज्यादा कुछ भी पक्का नहीं है। तो स्वाभाविक है कि तर्क से कोई कभी बदलता नहीं; क्रांति कोई घटित नहीं होती। तर्क से अहंकार को,आघात लगता है और अहंकार बदला लेना चाहता है। तर्क एक संघर्ष है।चिंतन में भीतर एक संघर्ष है।आप जो भी चिंतन करते हैं, उससे आप जूझते हैं, लड़ते हैं; एक भीतरी लडाई चलती है।

4-आप अपनी सारी अतीत की स्मृति और सारे अतीत के विचारों को उसके खिलाफ खड़ा कर देते हैं। फिर भी अगर हार जाते हैं, तो मान लेते हैं; लेकिन मानने में एक पीड़ा, एक दंश, एक कांटा चुभता रहता है। वह मानना मजबूरी का है। उस मानने में कोई प्रफुल्लता घटित नहीं होती।इसलिए विचारकों के चेहरे पर प्रफुल्लता नहीं बल्कि चेहरे पर चिंतन की रेखाएं दिखाई पड़ेगी, ।विचार बोझ दे जाएगा; कमर झुक जाएगी। विचारक चिंतित मालूम पड़ने लगेगा।चिंतन और चिंता में कोई गुणात्मक फर्क नहीं है। सब चिंतन चिंता का ही रूप है।उसमें छिपी हुई बेचैनी है ; एक तनाव है। क्योंकि एक भीतरी संघर्ष है, कलह है, लड़ाई है । इसलिए विचारक विचार के ही बोझ से झुक जाता है।लेक़िन Enlightened One के साथ उलटी घटना घटती है। ये मनन और चिंतन का फर्क है।तो मनन और चिंतन का पहला फर्क... चिंतन शुरू होता है तर्क से,संघर्ष से,विरोध से, और वहां सहानुभूति नहीं है।मनन शुरू होता है श्रवण से। श्रवण ग्राहकता है,सहानुभूति है , कोई संघर्ष नहीं है। 5-जब आप किसी चीज को सहानुभूति से सोचते हैं, तो आपकी पूरी आंतरिक आकांक्षा यह होती है कि जो मैंने सुना है वह सही हो सकता है; और सही हो, तो मेरे लाभ का हो सकता है। इसलिए आप पहले वे बिंदु खोजते हैं , जो सही हों। जब आप चिंतन करते हैं, तो आप यह मान कर चलते हैं कि जो सुना है, वह गलत है।इसलिए आप पहले वे बिंदु खोजते हैं ,जो गलत हों। ऐसा समझें कि कोई व्यक्ति गुलाब के फूलों की क्यारी के पास खड़ा है। अगर वह चिंतन कर रहा है तो पहले वह कांटे गिनेगा, अगर वह मनन कर रहा है तो पहले वह फूल गिनेगा। और इससे बुनियादी फर्क पड़ता है कि आप कहां से शुरू करते हैं क्योंकि जो व्यक्ति पहले कांटे गिनेगा, उसका विरोधी रुख जाहिर है।पहले वह कांटे गिनेगा, और कांटे गिनने में हाथ में कांटे चुभेंगे भी, खून भी निकलेगा।वह कांटो की संख्या ,उनका चुभना और खून का बह जाना फूलों की खिलाफत के लिए आधार बन जाएगा। 6-और फिर जब लाख कांटे गिन लेगा और एकाध फूल दिखाई पड़ेंगे, तो मन कहेगा कि ये फूल धोखे के हैं, ये सच नहीं हो सकते। क्योंकि जहां इतने काटे हैं, वहां फूल हो कैसे सकते हैं।यह असंभव मालूम पडता है। और फिर अगर मान भी लेगा कि फूल हैं भी, तो वह कहेगा, कोई मूल्य नहीं है .. धोखा है। यह जो फूल है, कांटो को छिपाए हुए है और उनके षड्यंत्र का भागीदार है।परन्तु जो व्यक्ति फूल से शुरू करेगा ..पहले फूलों को छुएगा, फूलों की सुवास उसके हाथों में भर जाएगी; फूलों का रंग उसकी आंखों में उतर जाएगा; फूलों की कोमलता उसके स्पर्श में लीन होने लगेगी, फूल का सौंदर्य उसे आच्छादित कर लेगा। फिर फूलों को देखने, जानने के बाद वह कांटो के पास आएगा ।अब उसकी दृष्टि में कांटे और ही तरह के होंगे। वह समझेगा कि कांटे फूलों की रक्षा के लिए हैं ; फूलों के विपरीत नहीं हैं। और जिसको एक फूल भी ठीक से दिखाई पड़ गया तो लाख कांटे बेकार हो जाएंगे। क्योंकि लाख कांटो को बेकार करने के लिए एक फूल का होना भी काफी है ।और अगर इतने कांटो के बीच फूल खिल सकता है, तो असंभव भी हो सकता है! तो इस व्यक्ति को दिखाई पड़ेगा कि मैं जरा और खोज करूं, तो शायद कांटे भी फूल ही सिद्ध हों! 7-इस प्रकार मनन सहानुभूति से शुरू होता है; चिंतन विरोध से शुरू होता है। श्रवण की शर्त पूरी हो जाए तो सहानुभूति जग जाती है और चिंतन की धारा ही विपरीत होकर मनन बन जाती है। लेक़िन कोई यह न सोचे कि मनन का अर्थ भी अंधे होकर स्वीकार कर लेना है।इसलिए ऋषि ने कहा है’जो सुना गया है, श्रवण हुआ है उसके अर्थ को युक्तिपूर्वक विचार करना, मनन है।' न तो श्रवण का अर्थ स्वीकार कर लेना है,और न ही मनन का अर्थ स्वीकार कर लेना है, बल्कि युक्ति का उपयोग करना है। युक्ति अपने आप में तटस्थ है जैसे एक तलवार तटस्थ है।चाहो तो किसी की जान ले लो या चाहो तो किसी की जान बचा लो। युक्ति अपने में बुरी नहीं है लेक़िन अलग अलग ढांचे में युक्ति का अर्थ बदल जाता है। अगर दुश्मनी से, विरोध से, संघर्ष से भरा हुआ चित्त हो, तो तर्क हिंसात्मक हो जाता है। अगर सहानुभूति से, श्रवण से, प्रेम से, सत्य की खोज और अभीप्सा से भरा चित्त हो, तो युक्ति रक्षा करने वाली तलवार बन जाती है। । 8-इसलिए दो तरह के तर्क माने जाते हैं.. तर्क और कुतर्क। कुतर्क भी तर्क है और कभी -कभी तो कुतर्क तर्क से भी ज्यादा तर्कपूर्ण मालूम पड़ता है, क्योंकि उसमें पैनी धार होती है, जो मारने के लिए सक्षम होती है।परन्तु फर्क कैसे करेंगे कि क्या कुतर्क है और क्या तर्क है?फर्क केवल यही है कि तर्क शुभ की, सत्य की खोज के लिए है, फूलों से शुरू करता है और फिर कांटों पर जाता है..।इसीलिए अगर आप गलत खोजने को ही सुन रहे हों, तो आप कभी भी मनन न कर पाएंगे।और गलत की खोज आपके इनर ग्रोथ/ भीतरी विकास में कोई तरह का सहारा नहीं बनेगी। आप कितना ही तय कर लें, कि कहां -कहां गलत है, आप सारी दुनिया की सारी गलतियां जान लें, फिर भी उससे आपकी कोई इनर ग्रोथ नहीं होगी।तो जो खोज में लगा है और अपने विकास में उत्सुक है, वह इसकी चिंता नहीं करता कि क्या गलत है, बल्कि वह इसकी चिंता करता है कि क्या ठीक है। जो ठीक से शुरू करता है तो किसी दिन उस जगह पहुंच जाता है कि जो उसे गलत दिखाई पड़ता था ... उसका भी कोई अर्थ है, कोई मूल्य है। और वह जो पहले गलत मालूम पड़ता था, वह पीछे ठीक मालूम पड़ सके। 9-कुतर्क गलत को खोजता है, वहीं से यात्रा शुरू करता है। युक्ति, तर्क /सुतर्क ठीक से शुरू करता है।उदाहरण के लिए कुरान में जो -जो महत्वपूर्ण है, वह एक हिंदू को दिखाई ही नहीं पड़ेगा, जो -जो गलत है, वह अंडरलाइन करके ले आएगा कि यह देखो, यह लिखा हुआ है! हम पहले ही कहते थे कि कुरान भी कोई धर्मशास्त्र है!एक मुसलमान को गीता दे दें। बराबर निकाल लाएगा कि क्या क्या गलत है और अगर यह कला सीखनी हो, आर्यसमाजियों से सीख लेनी चाहिए! कहां और क्या -क्या गलत है, उसमें उनके जैसा कोई भी कुशल नहीं है।मन को आर्यसमाजी बनने से बचाना, तो ही मनन हो सकेगा; नहीं तो मनन नहीं हो सकता, क्योंकि खोज ही गलत को रहे हैं। तो गलत काफी मिल जाएगा।इस संसार में कांटो की कोई कमी नहीं है! पर कांटो की न मालाएं बनानी हैं :न गले में डालनी हैं। प्रयोजन तो केवल फूलों से है। 10-तो अगर युक्ति हो, तो कुरान में से भी फूल चुन लिए जाएंगे, और वे फूल किसी गीता से कम फूल नहीं हैं। अगर युक्ति हो, तो गीता में से भी वे फूल चुन लिए जाएंगे, वे फूल किसी कुरान, किसी बाइबिल से कम नहीं हैं। मनन करने वाला व्यक्ति फूलों की खोज में है; चिंतन करने वाला व्यक्ति कांटो की खोज में है। वह आपको तय कर लेना चाहिए। एक बात खयाल रखनी हैं कि जो आप खोजेंगे, उसी से घिर जाएंगे। कांटे खोजेंगे, कांटो से घिर जाएंगे; फूल खोजेंगे, तो फूलों से घिर जाएंगे। तो ध्यान रखना है कि कांटे खोज कर आप किसी और का अहित नहीं कर रहे हैं, अपना ही अहित कर रहे हैं; क्योंकि जो खोजेंगे, वही मिलेगा। हम सब कांटो के खोजी हैं। धीरे -धीरे हम सबमें भूलें देख लेते हैं, और फिर हमें उन्हीं के बीच रहना पड़ता है।तब जगत नर्क हो जाता है क्योंकि चारों तरफ गलत व्यक्ति ही दिखते हैं, कोई ठीक तो दिखाई ही नहीं पड़ता। इसलिए नहीं कि कोई ठीक नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि आपकी खोज ही गलत व्यक्ति की है।

11-जिंदगी में दोनों हैं ..यहाँ रात भी है और दिन भी, और यहाँ बुरा भी है और भला भी। आप यह मत सोचना कि स्वर्ग कहीं और है जमीन से और नर्क कहीं और है, आपकी दृष्टि में निर्भर है। इसी जमीन पर लोग स्वर्ग में रहते हैं और इसी जमीन पर लोग नर्क में रहते हैं।आप क्या खोजते हैं, वही आपका जगत बन जाता है।मनन फूलों के प्रति सहानुभूति से यात्रा शुरू करता है। गलत पर जल्दी से हमला नहीं करता, सही को पहले आत्मसात कर लेता है। और जब सही पूरी तरह आत्मसात हो जाता है, तो ही जो पहले गलत जैसा दिखा था, उस पर सोचता है। इस दृष्टि के रूपांतरण से बुनियादी अंतर बाद में दिखाई पड़ने शुरू होते हैं। ऐसा व्यक्ति धीरे -धीरे विकसित होता है और सही को आत्मसात करते -करते सही हो जाता है। और गलत की खोज करते करते, गलत को आत्मसात करते -करते गलत हो जाता है। जो व्यक्ति दूसरों में बेईमानी और चोरी और गलत ही देखता है, ज्यादा दिन तक ईमानदार नहीं रह सकता। सच तो यह है कि पहले से ही ईमानदार नहीं हो सकता। 12-वास्तव में कोई चोर किसी दूसरे व्यक्ति आदमी को मान नहीं सकता कि चोर नहीं है।चोर के सोचने का सारा ढंग चोरी का हो जाता है।वह दूसरों में भी तत्काल चोरी खोजता है, देखता है।इसी प्रकार व्यभिचारी यह नहीं मान सकता कि कोई चरित्रवान है।क्योंकि उसका अनुभव बाधा बनता है मानने में।लेकिन यह बड़े आश्चर्य की बात है व्यभिचारी तो कभी नहीं मानते कि कोई ब्रह्मचारी है और ब्रह्मचारी भी नहीं मानते कि कोई ब्रह्मचारी है!तब मामला संदिग्ध है, तब वह भी ब्रह्मचारी नहीं है इसलिए अगर आपको कोई साधु मिले जो दूसरों को असाधु मानता हो, तो समझ लेना कि अभी साधु साधु हो नहीं पाया है। साधु होने का मतलब ही यह है कि सारा जगत तत्‍क्षण साधु हो जाएगा। सारी बात ही बदल गई, क्योंकि देखने का ढंग बदल गया। एक व्यक्ति जब भीतर साधु हो जाता है तो सारे जगत में उसे साधुता दिखाई पड़ने लगती है, क्योंकि जो भीतर है, वही बाहर दिखाई पड़ता है। अगर आपको सब में असाधुता दिखाई पड़ती हो, चोर, बेईमान दिखाई पड़ते हों, तो उनकी फिक्र छोड़ कर अपनी फिक्र में लगना। जो दिखाई पड़ता है, वह आपके भीतर है। वही तत्काल दिखाई पड़ता है, क्योंकि भीतर से उसकी तत्काल संगति बैठ जाती है। 13-हम सबकी सदा यही कोशिश है कि 'मैं सही हूं'! हमारे जीवन की सबसे बड़ी झंझट, सबसे बड़ी परेशानी और संताप यही है कि हम मान कर चलते हैं कि मैं सही हूं। अब जो मेरे अनुकूल न पड़े वह गलत है।साधक को यह तय कर लेना चाहिए कि यह मूढ़तापूर्ण विचार प्रस्थान न बने कि मैं सही हू। अगर आप सही ही हैं, तो अब खोज की कोई जरूरत ही नहीं है। कुंडलिनी जाग्रत हो गई हो और अगर बेचैनी है तो कृपा करके यही मानो कि कुंडलिनी सोई है, अभी जगी नहीं है।जीवन का जो , शुक्ल पक्ष है, उससे 'मनन' शुरू होता है।जीवन का जो कृष्ण, अंधेरा पक्ष है,उससे ' चिंतन' शुरू होता है। यह ध्यान में रहे तो फिर पूरी निष्ठा से युक्ति की जा सकती है और फिर युक्ति से नुकसान नहीं होता क्योंकि सहयोगी , मित्र बन जाती है।

निदिध्यासन का क्या अर्थ है?-

04 FACTS;- 1-निदिध्यासन का अर्थ है कि चित्त को सही होना दिखाई पड़ गया, चेतना को उसके सही होने की प्रतीति होने लगी । अब व्यक्तित्व को भी उसी के अनुकूल ढाल देना निदिध्यासन है।अज्ञान में ही विक्षिप्तता ओढ़ी जाती है। जब दिखाई पड़ने लगे कि सही क्या है, उसकी दिखाई पड़ने की झलक ही आपको भीतर से बदलने लगेगी। आपकी सारी तरंगें, अब धीरे—धीरे जो आपको दिखाई पड़ा है, उसके साथ तालमेल बिठाने लगेंगी।इस तालमेल /हार्मनी का नाम निदिध्यासन है।फिर अगर तालमेल न बने, कठिन मालूम पड़े, तो भी साधक जानता है कि यह मेरी ही कठिनाई है। तो अपने को सुलझाता है। लेकिन जो व्यक्ति अपने को ठीक मान कर चलता है, अगर दो कदम चले, और कोई यात्रा में फल आता न दिखाई पड़े, तो वह समझता है कि यह जो सोचा था 'तत्त्वमसि', यह ही गलत है, छोड़ो!लोग पहली बार ही ध्यान करके कहते है कि कुछ हुआ नहीं..इस पद्धति में कोई सार नहीं दिखाई पडता!वास्तव में मनुष्य की मूढ़ता की भी कोई सीमा नहीं है! इस जगत में ब्रह्म और मूढ़ता, दो ही चीजें असीम मालूम पड़ती हैं। 2- व्यक्ति अपने को सही ही मान कर चल रहा है! इसलिए जहां भी अड़चन आती है, दूसरी चीज ही गलत होगी, वह अपने सहीपन को कायम रख कर यात्रा पर निकल जाता है।फिर तो भटकेंगे जन्मों -जन्मों तक, कभी भी कोई बात बैठ नहीं पाएगी। क्योंकि तालमेल बिठाना श्रम है, एकदम नहीं हो जाएगा।पीछे जन्मों -जन्मों के संस्कार भी तो हैं , उनको तोड़ना पड़ेगा। वास्तव में, हमारा जीवन 'आदत'है। छोटी -छोटी बातों से लेकर बड़ी -बड़ी बातों तक सब आदत है। उस आदत की लंबी रेखा है। और हमारी चेतना उसी रेखा को बांध कर, पकड कर बहने की आदी हो गई है। आज अचानक दिख भी जाता है कि यह रास्ता गलत है, तो दूसरा रास्ता पकड़ने में रास्ता बनाना पड़ेगा। और ध्यान रहे, पिछली जो आदत थी, उससे ज्यादा गहरा रास्ता बनाना पड़ेगा। तभी यह पानी की धार उस यात्रा-पथ को छोड़ कर नए यात्रा -पथ को ग्रहण करेगी। मगर बस आपने सोच लिया कि बस ठीक है, तो इससे कुछ हल नहीं हो जाने वाला। 3-निदिध्यासन का अर्थ है जो सुना, जो समझा कि ठीक है, उसके अनुकूल जीवन को रूपांतरित करना , तो वक्त लगेगा। मन अड़चन डालेगा, शरीर बाधाएं खड़ी करेगा, सब होगा।लेकिन जब ठीक दिखाई पड़ गया हो, तो फिर उस ठीक की यात्रा पर अपने को झोंक देना ..यह हिम्मत आवश्यक है। आज भटकाव की तरफ गए,तो कल ठीक की तरफ आ ही जाओगे। भूल केवल एक ही है, कि तुम चलो ही न और बैठे रहो।यद्यपि जो बैठा रहता है उससे कोई भूल नहीं होती। दुनिया में भूल तो उससे होती है, जो चलता है, जो कुछ करता है। उनसे कहीं कोई भूल होती है जो कुछ करते ही नहीं और बैठे हैं। लेकिन एक ही भूल है दुनिया में ...'बैठे रहना'।जो ठीक लगे उसकी यात्रा पर ल पड़ना।अगर कल वह गलत भी सिद्ध हुआ, तो भी कम से कम एक लाभ तो होगा कि चलना आ जाएगा, तो कल ठीक दिशा भी पकड़ी जा सकती है। असली चीज दिशा नहीं है, असली चीज वह चलने की क्षमता है। 4- यह 'निदिध्यासन' शब्द बहुत अदभुत है।'श्रवण और मनन द्वारा निस्संदेह हुए अर्थ में चित्त को स्थापित करके तल्लीन होना, यह निदिध्यासन है।'फिर जो दिखाई पड़ रहा है, उसके साथ चित्त का तालमेल हो जाए। वह सिर्फ हमारी झलक न रह जाए , बल्कि हमारा चित्त ही बन जाए। ऐसा न लगे कि वह हमारा एक विचार है , बल्कि ऐसा हो जाए कि अब यही हमारा मन है ।जिसका पूरा चित्त ही बदल गया हो , उसकी सभी क्रियाओं में उसकी छाया, और रंग, और ध्वनि फैल ही जाएगी। जैसे भोजन करते वक्त भी एक संसारी के भोजन और एक संन्यासी के भोजन में अंतर पड़ जाना चाहिए; वह जो रंग संन्यास का है, भोजन करने की क्रिया पर भी फैल जाना चाहिए। एक संन्यासी सो रहा हो और एक गृहस्थ सो रहा हो, तो देखने वाला बता सके कि कौन संन्यासी है, कौन गृहस्थ है।संन्यासी के सोने का ढंग बदल जाना चाहिए क्योंकि निदिध्यासन एक विचार की तरह नहीं, तल्लीनता की तरह हैं ।

समाधि का क्या अर्थ है?-

07 FACTS;- 1-'फिर ध्याता तथा ध्यान का त्याग करके, चित्त केवल एक ध्येय को ही विषय रूप माने और वायुरहित स्थान में रखे हुए दीए के समान निश्चल बन जाए, उसको समाधि कहते हैं।'समाधि परम घटना है। ये तीन उसकी तरफ पहुंचने के चरण हैं, चौथा चरण समाधि है। उसके पार शब्द का जगत नहीं है ;कहा जा सके, उसका जगत नहीं है। समाधि तक की बात कही जा सकती है। उस तरफ जो है, उसके लिए कभी कुछ नहीं कहा गया, और कभी कुछ कहा भी नहीं जा सकेगा।पर समाधि के द्वार पर जो खड़ा हो जाता है, वह उसे देख लेता है। जो दिखाई नहीं पड़ता, जिसे जानना असंभव है, उसे जान लेता है, उससे उसका मिलन हो जाता है।उसके बिना मिले ही सारा दुख ,सारी पीड़ा, सारा संताप है। वह जो अज्ञेय है, वह ज्ञेय बन जाता है। और वह जो रहस्य है, खुल जाता है प्रकट हो जाता है। सब ग्रंथियां टूट जाती हैं। खुले आकाश की भांति ..चैतन्य सत्य के बीच, सत्य में एक हो जाता है ।

2-समाधि तो निदिध्यासन के बाद की बात है। जिसने अपने चित्त को ऐसे महावाक्यों के साथ ..तत्त्वमसि ,अहं ब्रह्मास्मि, सोऽहम् तल्लीन कर लिया...जिसका चरित्र और जिसका चित्त इनकी अभिव्यक्ति बन गया। जो उठता है तो उसके उठने में 'तत्त्वमसि' का स्वर है और वह खबर है कि वह ब्रह्म के साथ एक होकर डोल रहा है, ऐसा व्यक्ति समाधि को उपलब्ध हो पाता है। ध्याता और ध्यान, दोनों ही खो जाएं, सिर्फ ध्येय रह जाए ...यही समाधि है।तीन शब्द हैं ध्याता, ध्यान, ध्येय। उदाहरण के लिए, तत्त्वमसि, तू वही है ..यह ध्येय है।यही पाने जैसा है और यही है अंतिम लक्ष्य।फिर' मैं हूं' ..जो ध्याता है, जो इस ध्येय को सोच रहा है, विचार रहा है, इस ध्येय के लिए प्यासा है, आतुर है ..कैसे इस ध्येय तक पहुंच जाए।ध्येय है.. वह मैं ही हूं। यह मैं हूं, ध्याता; इस ध्येय की तरफ जाती है चेतना। और जब ध्याता ध्येय की तरफ दौड़ने लगता है और सारी तरफ दौड़ बंद हो जाती है; तब चेतना की, ध्येय की तरफ बस एक ही दौड़ रह जाती है और उस दौड का नाम ही ध्यान है।

3-जब चेतना की सारी धारा अलग न बहकर ध्येय की तरफ एकजुट होकर बहने लगती है, तो सतत इस बहती हुई चेतना का नाम 'ध्यान' है। जब यह ध्यान सारे के सारे प्राणों को उलीच कर ध्येय में डूब जाए और जब ध्याता कीं अथार्त मेडिटेटर की सारी ऊर्जा, सारी चेतना, इस ध्यान की विधि में यात्रा करके ध्येय के साथ एक हो जाए, और ऐसी घड़ी आ जाए कि ध्याता को पता न रहे कि 'मैं हूं ', ध्याता को यह भी पता न रहे कि ध्यान है, सिर्फ तत्त्वमसि, वह जो ध्येय है, वही मात्र रह जाए, उसी को उपनिषद ने 'समाधि' कहा है। एक ही रह जाए, तीन न रहें ...ध्याता ध्यान, ध्येय।इसे थोड़ा समझना है क्योंकि अलग -अलग साधना पद्धतियों ने, कौन एक रह जाए, इसका अलग -अलग चुनाव किया है।उपनिषद कहते हैं, ध्येय रह जाए, ध्याता और ध्यान खो जाएं। महावीर कहते हैं, ध्याता रह जाए, ध्यान और ध्येय खो जाएं; आत्म भर रह जाए; शुद्ध 'मैं 'रह जाऊं। सांख्य कहता है, ध्याता और ध्येय दोनों खो जाएं, ध्यान रह जाए; सिर्फ चैतन्य रह जाए, सिर्फ बोध, सिर्फ अवेयरनेस।

4-लगता है कि बड़ी विपरीत बातें हैं परन्तु जरा भी विपरीत नहीं हैं। जो शब्द को ही समझते हैं, वे विवाद करेंगे कि ये तीनों तो विपरीत बातें हैं। उपनिषद कहते हैं ध्येय रह जाए, कोई कहता है ध्यान रह जाए, कोई कहता है ध्याता रह जाए, तो फिर समाधि क्या है। यह तो तीन तरह की समाधि हो गई ;तो तय करना पड़ेगा कि सही समाधि कौन सी है। दो गलत होंगी, एक ही ठीक होगी।वास्तव में,ये तीनों एक ही बात हैं क्योंकि ज्ञान और अनुभव में अंतर है। कोई भी दो खो जाएं और एक बच जाए, तो उस एक का नाम देना बिलकुल कृत्रिम है। वह कौन सा नाम आप देते हैं, आप पर निर्भर है।ये तीन हैं ..ध्याता है, ध्यान है, ध्येय है। साधक के लिए, निदिध्यासन वाले साधक के लिए ये तीन हैं। जब इन तीनों का खोना हो जाता है और एक बचता है, तो इन तीन में से वह कोई भी एक नाम चुनता है। वह चुनाव बिलकुल निजी है। उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसको क्या नाम आप देते हैं। चाहें तो उसको चौथा नाम भी चुन सकते हैं।

5-अनेक उपनिषदों ने उसको चौथा ही नाम दे दिया, तीनों ही खो जाते हैं; झगड़ा नहीं रखा। कि इन तीन में से चुनेंगे, तो लगेगा कि वह कोई पक्षपात है. दो छोड़े और एक बचा। तो उन्होंने कहा, तुरीय -दि फोर्थ। उन्होंने चौथे को भी सिर्फ चौथा ही नाम दिया ताकि कोई झंझट न खड़ी हो। लेकिन झंझट करने वालों को कोई अड़चन नहीं है। वे कहते हैं, तीन थे, चौथा आया कहां से? यह चौथा कौन है? उन तीन में से कौन है? या कि वे तीनों ही खो गए, यह चौथा बिलकुल अलग है? या कि तीनों का जोड़ है? जिसको विवाद करना है, उसके लिए कोई भी चीज विवाद शुरू करने के लिए काफी है। जिसको साधना करनी है, उसकी यात्रा बिलकुल अलग है।इन तीन में से एक नाम उपनिषदों ने चुन लिया, ध्येय बच जाता है। महावीर ने चुना, ध्याता बच जाता है। सांख्य ने कहा, ध्यान बच जाता है। ये सिर्फ नाम हैं। तीन नहीं रह जाते, एक रह जाता है, यह तय है। नाम कृत्रिम हैं, कोई भी नाम दे दें। इतना ही याद रखें कि जब एक बच जाता है, तो समाधि है! जब तक दो बचे हैं, तब तक जानना कि तीन बचे हैं। क्योंकि दो जब तक बचते हैं, दोनों को जोड़ने वाला एक तीसरा बीच में खड़ा रहता है। 6- दो का मतलब सदा तीन होता है। इसलिए जो लोग बहुत गणित की भाषा में सोचते हैं, वे जगत को द्वैत नहीं कहते, वे त्रैत कहते हैं। क्योंकि दो होंगे तो तीसरा होगा ही। क्योंकि दो को जोड़ेगा कौन? या दो को अलग कौन करेगा? दो के बीच तीसरा अनिवार्य हो जाता है। तीन अस्तित्व का ढंग है। इसलिए हमने त्रिमूर्ति बनाई। वह त्रैत की सूचक है, कि जगत तीन से मिल कर बना है। लेकिन एक ही व्यक्ति के तीन चेहरे बनाए हैं ; वह है चौथा। तीनों चेहरों के भीतर से कहीं भी प्रवेश करें, भीतर जब पहुंचेंगे तो तीनों चेहरे न रह जाएंगे। लेकिन साधक जहां से प्रवेश करेगा, वहा से पसंद करेगा। कोई भीतर विष्णु के मुंह से प्रवेश करे , कोई ब्रह्मा के, कोई महेश के। तो जहां से वह प्रवेश करेगा, वही नाम दे देगा चौथे को; कहेगा कि विष्णु,या महेश,अथवा कहेगा कि ब्रह्मा। 7-मगर भीतर पहुंच कर तीनों चेहरे खो जाते हैं। भीतर कोई चेहरा नहीं है, भीतर एक है।यह त्रिमूर्ति सिर्फ मूर्ति नहीं है, यह हमारी परम साधना की पूर्णता है।तीन हैं.. आखिरी छलांग के पहले तीन बच जाते हैं : ध्याता, ध्यान, ध्येय। और इन तीन में से जिसने छलांग लगाई ..एक बच जाता है। उसे जो नाम देना चाहें, मर्जी; नाम से कोई अंतर नहीं पड़ता। न देना चाहें, मर्जी। चौथा कहना चाहें, सुंदर। कुछ न कहना चाहें, चुप रह जाएं, उससे बेहतर कुछ भी नहीं।सुनें, सुनने को श्रवण बनाएं। सोचें, सोचने को मनन बनाएं। मनन करें, उद्देश्य की पूर्ति करे, निष्पत्ति लें, उद्देश्य को निदिध्यासन बनने दें, तल्लीनता लाएं और तल्लीनता अंत में ऐक्य बन जाए।और तल्लीनता का अर्थ है ...दोनों के बीच तालमेल बैठ गया है; लेकिन ऐक्य का अर्थ है ’दो खो गए, तालमेल ही रह गया।तल्लीनता है निदिध्यासन और एकता है समाधि।

...SHIVOHAM...