मंत्र साधना के प्रकार...क्रिया योग के चमत्कारी मंत्र ...

NOTE;-महान शास्त्रों और गुरूज्ञान का संकलन...

मंत्र एक ऐसी ध्वनि है जिसके लगातार उच्चारण मात्र से मानसिक शक्ति की प्राप्ति होती है क्योंकि मंत्र शक्तिपुंज को लिए होता है ।मन्त्रों के लगातार बोलने की क्रिया को जप कहा जाता है।इन मंत्रों के बोलने से एक खास तरह का उतार-चढ़ाव होता है। इस प्रक्रिया से साधक की सोई हुई चेतना को जगाया जाता है। मंत्रों की साधना करते समय उसकी उच्चारण ध्वनि निकलती हुई प्रतीत होती है परंतु जब वह मानसिक रूप से होने लगता है तो साधना सर्वोच्च रूप में परिवर्तित हो जाती है।जब मंत्र मन के अंदर से स्वयं ही उपचारित होने लगता है तो यह स्थिति समाधि की स्थिति कहलाती है। इस स्थिति में साधक ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ने लगता है।मंत्र क्रिया योग के माध्यम से हमारे देह के अंदर नाद का स्वर पैदा होता है। यह अनहद नाद होता है।

वास्तव में, साधना की चरम स्तर ब्रह्मांड के शब्दों के साथ एकरूपता स्थापित करना हैऔर इस कारण से साधक ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने में योग्य सिद्ध हो जाता है।साधक जब इस साधना के ब्रह्मांड शब्दों (ध्वनि) से खुद को जोड़ लेता है तो साधक सृष्टि के रहस्यों को जानने लगता है।मन बड़ा ही चंचल होता है । इसलिए जब मन को मंत्रों के माध्यम से एकत्र किया जाता है तो मंत्र क्रिया योग कहलाता है।

मंत्र जप के प्रकार;-

04 FACTS;-

मंत्र क्रिया योग में मंत्रों की शक्ति अपना सूक्ष्म प्रभाव डालती है। मंत्र योग क्रिया में कई तरीके से मंत्र का जप किया जाता है अंततः आत्म चेतना मिले हो जाने का प्रयास किया जाता है और इस उपलब्धि से साधक को दिव्यता की प्राप्ति होती है।

1-सार्वभौमिक;-

यह मंत्र कोई भी व्यक्ति कर सकता है। यह व्यक्तिगत मंत्र विशेष परिस्थितियों के लिए बनाए गए है। इस मंत्र का उच्चारण सभी सुन सकते हैं।

2-उपांशु;-

इस मंत्र में ध्वनि स्पष्ट सुनाई नहीं देती फुसफुसाहट ध्वनि निकलती है।इसमें शारीरिक क्रियाओं की संचालन होता है।

3-पश्यंति;-

सहज मानसिक आवृत्ति के साथ मंत्र होता है।श्वांश के साथ या माला फेरने के साथ इस मंत्र को किया जाता है।

4-परा;-

इस मंत्र प्रकार में स्वयं ही मानसिक क्रियाकलाप द्वारा मंत्र का उच्चारण मन में स्वतः ही होता है

मंत्र साधना के प्रकार;-

सभी प्रकार के मंत्रों के जप क्रियायोग मन में एकाग्रता लाकर ध्यान केंद्रित करके किया जाना चाहिए।एक बार गुरु की आज्ञा लेकर और उनसे सीख कर मंत्र उच्चारण करना चाहिए।

13 FACTS;-

1-नित्य ;-

सुबह और शाम को गुरु द्वारा दिए गए मंत्र का नित्य जाप करना किसके अंतर्गत आता है।

2-नैमित्त;-

किसी विशेष पूजा पाठ आध्यात्मिक मुहूर्त के समय उसी ने नैमित्त मंत्र क्रिया योग किया जाने वाला मंत्र जाप या कहलाता है जैसे दीपावली में लक्ष्मी पूजन के समय।

3.-काम्य;-

जब मन में कोई कामना हो या कुछ पाने के लिए इस मंत्र का विशेष तौर पर जाप किया जाता है।

4- निषिद्ध ;-

गलत तरीके से मंत्रों का उच्चारण करके मंत्र करना या अनजाने में किसी तरह से इस तरह का जप करना जो अनाधिकृत है निषिद्ध मंत्र कहलाता है।

5-प्रायश्चित जप;-

किसी कार्य के प्रायश्चित (भूल या गलती के कारण हुए पछतावा) के कारण किया जाने वाला जप प्रायश्चित जप कहलाता है। इसका भी एक अलग विधान है, जिसके अनुसार जप किया जाता है।

6-अचल ;-

इस क्रिया योग में बिना हिले यानी स्थिर होकर बैठकर किए जाने वाले मंत्र क्रिया योग अचल जप कहा जाता है। साधक पूरी दृढ़ इच्छाशक्ति से अपने आसन पर बैठकर मंत्र उच्चारण करता है।

7- चल;-

जब साधक चलते-चलते या खड़े होकर या कोई काम करते हुए मंत्र का उच्चारण करता है तो यह चल जप कहलाता है।

8-वाचिका ;-

जिस जप को बार-बार ऊंची आवाज (ध्वनि) में किया जाता है, उसे वाचिका-जप कहते हैं।

9उपांशु;-

इस पद्धति में होठों से बुदबुदा कर मन्त्र का जप किया जाता है, किसे उपांशु क्रिया मंत्र योग कहते हैं।

10-मनस्त ;-

इस क्रिया मंत्र योग (Kriya Mantra Yoga) में मन के माध्यम से मानसिक मंत्र क्रिया योग किया जाता है । मन के अंदर मंत्र जप चलता है, जिसकी ध्वनि बाहर सुनाई नहीं देती है। साधक जब अपनी आंखें बंद कर लेता है तो मन की गहराइयों में उतर कर इस मंत्र क्रिया योग का जाप करता है तो उसके अंदर के भटकाने वाले विचार दब जाते हैं, और मंत्र का भाव उभर कर आता है।

11-अखण्ड जप

लगातार मंत्रों का उच्चारण अखंड क्रिया मंत्र योग जाप कहलाता है। लगातार मंत्र जाप की प्रक्रिया चलती रहती है। इसके लिए समय निश्चित कर लिए जाते हैं और लगातार इस समय के बीच मंत्रों का उच्चारण होता है।

12-अजपा

मन्त्र के अर्थ को मन में आत्मसात् करते हुए उसमें लय हो जाने की प्रक्रिया कोअजपा जप कहते हैं।

13-प्रदक्षिणा

किसी मंदिर या पवित्र स्थान के चारों को चक्कर लगाते हुए जप करना प्रदक्षिणा जप कहलाता है।

क्रिया योग के चमत्कारी मंत्र ;-

07 FACTS;- संस्कृत के शब्द 'क्रिया' का मतलब 'करना' है। इसलिये क्रिया योग का मतलब है कि वे प्रणालियां जिनके द्वारा आध्यात्मिक विकास, या एकता-चेतना का अनुभव हो।महृषि पतंजलि के 2000 साल पुराने 'योग सूत्र' में लिखा है कि क्रिया योग का मतलब है कि मन और इन्द्रियों को वश मे रखना, स्वयं विल्क्षेषण, स्वाध्याय, ध्यान का अभ्यास, और अहंकार की भावना का ईश्वर प्राप्ति के लिये त्याग। शुरुआत में ध्यान के अभ्यासियों को आमतौर पर एक सरल शब्द या ध्वनि (मंत्र) के उपयोग के बारे मे सिखाया जाता है ताकि वे ध्यान केंद्रित कर सकें। प्रारंभिक अध्ययन और अभ्यास के कुछ समय बाद, उन्नत ध्यान क्रियायों की दीक्षा के लिये अनुरोध किया जा सकता है।परमहंस योगानन्द के अनुसार क्रियायोग एक सरल मनःकायिक प्रणाली है, जिसके द्वारा मानव-रक्त कार्बन से रहित तथा ऑक्सीजन से प्रपूरित हो जाता है। इसके अतिरिक्त ऑक्सीजन के अणु जीवन प्रवाह में रूपान्तरित होकर मस्तिष्क और मेरूदण्ड के चक्रों को नवशक्ति से पुनः पूरित कर देते है।प्राणशक्ति के द्वारा मन को नियन्त्रित करने वाला क्रियायोग अनन्त तक पहुँचने के लिये सबसे सरल प्रभावकारी और अत्यन्त वैज्ञानिक मार्ग है। 1-बाबाजी के क्रिया योग का गुरुमंत्र;-

03 FACTS;-

ॐ क्रिया बाबाजी नमः ॐ

..प्रणव, यह प्राणों में व्याप्त होने वाला ब्रह्माण्ड का अदिनाद है ;अन्तःकरण में गुंजायमान आदिनाद है। क्रिया ... अपने सभी कर्मों को अपनी चेतना की विषय वस्तु मान कर सजगतापूर्वक किया गया कर्म ही क्रिया है। यह क्रिया योगियों के लिए साधन भी है और साध्य भी। बाबाजी ..क्रिया योग परम्परा के गुरु हैं जिन्होंने इस प्राचीन शिक्षा का संश्लेषण कर इसे आधुनिक काल में प्रवर्तित किया। परमहंस योगानन्द की पुस्तक "योगी कथामृत" में महावतार बाबाजी का उल्लेख है । नमः ...अभिवादन एवं आवाहन |

1-ॐ क्रिया बाबाजी नमः ॐ, यह गुरुमंत्र हिमालय के सिद्ध क्रिया बाबाजी नागराज से तारतम्य स्थापित कर हमें उनकी कृपा से जोड़ने की शक्ति रखता है |, इस मंत्र के माध्यम से वह अपने भक्तों को दर्शन देते हैं | इस मंत्र के जप से सहस्रार चक्र में अवस्थित परम चेतना अर्थात अन्तःगुरु से सान्निध्य हो जाता है | इस मंत्र में चैतन्य ऊर्जा है | इस मंत्र में शक्ति है क्योंकि मंत्र से ही गुरु अपनी चैतन्य ऊर्जा अपने शिष्य में प्रविष्ट करते हैं | मंत्र के मूल में गुरु के शब्द हैं और मंत्र तो स्वयं साक्षात् गुरु हैं |

महावतार बाबाजी के बारे में परमहंस योगानंद ने अपनी पुस्तक योगी कथामृत में 1945 में बताया था। उन्होंने बताया कि किस प्रकार हिमालय में रहते हुए बाबाजी ने सदियों से आध्यात्मिक लोगों का मार्गदर्शन किया है। बाबाजी सिद्ध हैं जो साधारण मनुष्य कि सीमाओं को तोड़ कर समस्त मानव मात्र के आध्यात्मिक विकास के लिए चुपचाप काम कर रहे हैं। बाबाजी ने ही आदि शंकराचार्य और संत कबीर को दीक्षा दी थी।

2-महावतार बाबाजी ;- बाबाजी के जन्मस्थान और परिवार के बारे में किसी को कुछ पता नहीं चल सका। जो लोग भी उनसे जब भी मिले, उन्होंने हमेशा उनकी उम्र 25-30 वर्ष ही बताई। लाहिड़ी महाराज ने बताया था कि उनकी शिष्य मंडली में दो अमेरिकी शिष्य भी थे। वे अपनी पूरी शिष्य मंडली के साथ कहीं भी कभी भी पहुंच जाया करते थे। परमहंस योगानंद ने अपनी पुस्तक में बाबाजी से जुड़ी दो घटनाओं का उल्लेख किया है जिनपर एक बार तो भरोसा नहीं होता।पहली घटना का उल्लेख करते हुए योगानंद ने लिखा है कि एक बार रात में बाबाजी अपने शिष्यों के साथ थे। पास ही में अग्नि जल रही थी। बाबाजी ने उस अग्नि से एक जलती हुई लकड़ी उठाकर अपने एक शिष्य के कंधे पर मार दी। जलती हुई लकड़ी से इस तरह मारे जाने पर बाबाजी के शिष्यों ने विरोध किया। इस पर बाबाजी ने उस शिष्य के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि मैंने तुम्हें कोई कष्ट नहीं पहुंचाया है बल्कि आज होने वाली तुम्हारी मृत्यु को टाल दिया है।

3-इसी तरह जो दूसरी बात का उल्लेख योगानंद ने किया है, उसके अनुसार एक बार बाबाजी के पास एक व्यक्ति आया और वह जोर-जोर से उनसे दीक्षा देने की जिद करने लगा। बाबाजी ने जब मनाकर दिया तो उसने पहाड़ से नीचे कूद जाने की धमकी दी। इसपर बाबाजी ने कहा 'कूद जाओ', उस शख्स ने आव देखा न ताव पहाड़ी से कूद गया। यह दृश्य देख वहां मौजूद लोग अचंभित रह गए। तब बाबाजी ने शिष्यों से कहा- 'पहाड़ी से नीचे जाओ और उसका शव लेकर आओ।' शिष्य पहाड़ी से नीचे गए और क्षत-विक्षत शव लेकर आ गए। शव को बाबाजी के सामने रख दिया। बाबाजी ने शव के ऊपर जैसे ही हाथ रखा, वह मरा हुआ व्यक्ति सही सलामत जिंदा हो गया। इसके बाद बाबाजी ने उससे कहा कि 'आज से तुम मेरी टोली में शामिल हो गए। तुम्हारी ये अंतिम परीक्षा थी।'बाबाजी दुनियादारी से दूर रहकर योग साधकों को इस तरह सहायता करते हैं कि कई बार साधकों को उनके बारे में मालूम तक नहीं रहता। परमहंस योगानन्द ने ये भी बतलाया है कि सन् 1861 में लाहिड़ी महाशय को क्रिया योग की शिक्षा देने वाले बाबाजी ही हैं। बाद में लाहिड़ी महाशय ने अनेक साधकों को क्रिया योग की दीक्षा दी। 2-चेतना सिद्धि ;- चेतना सिद्धि का अर्थ है पूरे शरीर को चैतन्य करने की क्रिया। शरीर चैतन्य होगा तो हम कुण्डलिनी जागरण कर सकेंगे | शरीर चैतन्य होगा तो हम रोग रहित रह सकेंगे।शरीर चैतन्य होगा तो हम क्रिया योग की और अग्रसर हो सकेंगे।मंत्रात्मक प्रयोग से भी क्रिया योग हो सकता है। अगर आप नित्य 1 माला इस मंत्र का जप करते हैं तो आपका पूरा शरीर चैतन्य होता ही है। यदि आप 5-7 दिन इसका प्रयोग करेंगे तो आप देखेंगे कि एक दम से आपको नयी चेतना और न नय विचार नई भावनाएं नई कल्पनाएं जीवन की नई उमंग आपको प्राप्त हो सकेंगी। जड़ शरीर को चेतना युक्त बनाने के लिए नित्य 1 माला मंत्र जप किया जाना चाहिए। "ॐ ह्रीं मम् प्राण देह रोम प्रतिरोम चैत्तन्य जाग्रय ह्रीं ॐ नमः" 3- प्राणमय सिद्धि;- जब शरीर चैतन्य हो जाए तो उसमे प्राण संस्कारित करने पड़ते हैं । यदपि हमारे शरीर में जीव संस्कारित है, यह जीवात्मा है, हम प्राणात्मा होना चाहते हैं ।प्राणों का संचार करना अलग चीज़ है, जीव का संचार तो भगवान ने किया ही है। यह शरीर में जो कुछ है, आत्मा है वह जीवमय है, हम प्राणमय होना चाहते हैं क्योंकि हम चेतनायुक्त बनना चाहते हैं। केवल 21बार उच्चारण करना चाहिये प्राणश्चेतना मंत्र का, और प्राणश्चेतना मंत्र है ...."सोऽहं"। 4-ब्रह्मवर्चस्व सिद्धि ;- जब प्राण शरीर में प्रवाहित होंगे तो व्यक्ति ब्रह्म की और अग्रसर होगा, ब्रह्म को पहचानने की और, सहस्रार की और अग्रसर होगा ।उस सहस्रार की और निरंतर अग्रसर होने की लिये जिस मंत्र की जरूरत है और जिस मंत्र के माध्यम से व्यक्ति सीधा उस सहस्रार की और अग्रसर हो सकता है ।वो मंत्र जिसे ब्रह्मवर्चस्व कहते हैं वो मंत्र है ... "ॐ ब्रह्मवै रसोऽहं "। 5-तांत्रोक्त गुरु सिद्धि;- तांत्रोक्त गुरु सिद्धि का तात्पर्य यह है कि गुरु को अपने आज्ञा चक्र में स्थापित कर लेने की क्रिया।मंत्रोक्त रूप से ..मंत्र के माध्यम से भी गुरु को आज्ञा चक्र में स्थापित किया जा सकता है। अथार्त निरंतर 16 माला मंत्र जाप करने से 16 माला नहीं कर सके तो आठ करें 8 नहीं कर सकते तो चार करें 4 नहीं कर सके तो दो करेंअन्यथा एक करें वह तो आपकी क्षमता है। शास्त्रों में विधान है कि यदि आज्ञा चक्र में गुरु को स्थापित करना है तो मंत्रात्मक रूप से निरंतर इसकी 16 माला मंत्र जाप होनी चाहिए। मंत्र है ..."ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः"। 6-सहस्रार सिद्धि;- जब व्यक्ति प्राणमय बन जाता है तो सहस्रार की ओर अग्रसर होता है ताकि सहस्रार सिद्धि प्राप्त हो। सहस्रार जागृत कर सकेंगे तो ही अमृत पूरे शरीर में प्रवाहित हो सकेगा.. जिसको अमृतत्व शरीर कहा जाता है। इस मंत्र का निरंतर जाप करने से सहस्रार जागृत होता है । निरंतर का मतलब है माला फेर करके नहीं ...5 मिनट या 15 मिनट या 25 मिनट या 1 घंटा जितना आपको टाइम हो ।इतने समय तक इस मंत्र का जाप करने से सहस्रार जागृत होता है।मंत्र है ... "ॐ प्राणः सोऽहं प्राणः "। 7-क्रियायोग सिद्धि;- मंत्र के माध्यम से भी क्रियायोग सिद्धि होती है| इसका 24 मिनट तक मंत्र जाप अहर्निश करता रहे ...निरंतर बिना माला के और निरंतर करें तो अपने आप में पूर्ण क्रिया योग सिद्धि प्राप्त होती है।क्रिया योग मंत्र है .."ॐ क्लीं क्लीं जीवः प्राणः आत्माः क्लीं क्लीं फट "। ...SHIVOHAM...