तिरुपति भगवानवेंकटेश्वर और देवी पद्मावती कौन है?

तिरुपति भगवान वेंकटेश्वर कौन है? -

03 FACTS;-

1-भारत के आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले के तिरुपति में तिरूमाला की पहाड़ी पर विराजमान “तिरुपति बालाजी” विश्व के सबसे प्रतिष्ठित देवी देवतायों में से एक है। तिरुपति बालाजी मंदिर समुद्र तल से 853 फीट ऊंचाई पर स्थित है और सात चोटियों से घिरा हुआ हुआ है जिस वजह से तिरुपति बालाजी मंदिर को “सात पहाडिय़ों का मंदिर” भी कहा जाता है। जिस नगर में यह मंदिर बना है उसका नाम तिरूपति है और नगर की जिस पहाड़ी पर मंदिर बना है उसे तिरूमला (श्री+मलय) कहते हैं। तिरूमला को वैंकट पहाड़ी अथवा शेषांचलम भी कहा जाता है। यह पहड़ी सर्पाकार प्रतीत होती हैं जिसके सात चोटियां हैं जो आदि शेष के फनों की प्रतीक मानी जाती हैं। इन सात चोटियों के नाम क्रमश: शेषाद्रि, नीलाद्रि, गरू़डाद्रि, अंजनाद्रि, वृषभाद्रि, नारायणाद्रि और वैंकटाद्रि हैं।भारत के इस प्रसिद्ध मंदिर में प्रतिदिन 50 हजार से 1 लाख भक्त वेंकटेश्वर के दर्शन के लिए पहुंचते हैं, वहीं विशेष अवसरों पर तीर्थयात्रियों की संख्या 5 लाख तक हो जाती है। जबकि दान और धर्म के संदर्भ में ये देश का सबसे अमीर मंदिर है, जहाँ हर साल करोड़ों रूपय का दान किया जाता है।इसका वास्तविक नाम श्री वेंकेटेश्वर मंदिर है क्यूंकि यहां पर भगवान वेंकेटेश्वर विराजमान हैं जो स्वयं भगवान विष्णु हैं

2-ये प्राचीन मंदिर तिरुपति पहाड़ की सातवीं चोटी जिसे वेंकटचला के नाम से जाना जाता है, पर स्थित हैऐसी मान्यता है कि वेंकट पहाड़ी के स्वामित्व के कारण भगवान विष्णु को भगवान वेंकेटेश्वर कहा गया है भगवान वेंकटेश्वर को भगवान विष्णु के ही अन्य अवतारों में से एक माना जाता है। देवी पदमावती और भगवान वेंकटेश्वर का दिव्य विवाह तिरूमाला मंदिर में संपन्न किया जाता है।ऐसी मान्यताएं हैं कि भगवान वेकंटेश्वर इस धरती पर कलयुग के अंत तक विराजमान रहेंगे। वे कलयुग में अपने भक्तों के दुःख हरने के लिए अवतरित हुए हैं।वराह पुराण में वेंकटाचलम या तिरुमाला को आदि वराह क्षेत्र लिखा गया है। वायु पुराण में तिरुपति क्षेत्र को भगवान विष्णु का वैकुंठ के बाद दूसरा सबसे प्रिय निवास स्थान लिखा गया है जबकि स्कंदपुराण में वर्णन है कि तिरुपति बालाजी का ध्यान मात्र करने से व्यक्ति स्वयं के साथ उसकी अनेक पीढ़ियों का कल्याण हो जाता है और वह विष्णुलोक को पाता है। पुराणों की मान्यता है कि वेंकटम पर्वत वाहन गरुड़ द्वारा भूलोक में लाया गया भगवान विष्णु का क्रीड़ास्थल है। वेंकटम पर्वत शेषाचलम के नाम से भी जाना जाता है। शेषाचलम को शेषनाग के अवतार के रूप में देखा जाता है।

3-तिरुमलाई में पवित्र पुष्करिणी नदी के तट पर भगवान विष्णु ने ही श्रीनिवास के रूप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर स्वयं ब्रह्मदेव भी रात्रि में मंदिर के पट बंद होने पर अन्य देवताओं के साथ भगवान वेंकटेश की पूजा करते हैं । बालाजी के वक्षस्थल पर लक्ष्मीजी निवास करती हैं। हर गुरूवार को निजरूप दर्शन के समय भगवान बालाजी की चंदन से सजावट की जाती है उस चंदन को निकालने पर लक्ष्मीजी की छवी उस पर उतर आती है। बाद में उसे बेचा जाता है।

बालाजी के जलकुंड में विसर्जित वस्तुए तिरूपति से 20 किलोमीटर दूर वेरपेडु में बाहर आती हैं। गर्भगृह मे जलने वाले चिराग कभी बुझते नही हैं, वे कितने ही हजार सालों से जल रहे हैं किसी को पता भी नही है।भगवान वेंकटेश्‍वर की मूर्ति पर लगे बाल असली हैं, जो कभी उलझते नहीं हैं। भगवान वेंकटेश्‍वर की पीठ को कितना भी साफ़ कर लो लेकिन हमेशा वहां गीलापन बना रहता है, और वहा कान लगाने पर समुद्र जैसी ध्वनि सुनी जाती है।इस मंदिर के गर्भगृह में जलने में वाले द्वीप कभी बुझते नही है माना जाता है ये द्वीप कई हजार सालों से जल रहे है।

4-देवी पद्मावती मंदिर कहाँ है? आंध्र प्रदेश में बालाजी तिरुपति के निकट चित्तूर जिले में 5 किमी की दूरी पर तिरुचनूर नामक गांव में अवस्थित है। यह मंदिर तिरुपति बालाजी मंदिर से 5 किलोमीटर दूर तिरुचनूर मार्ग पर स्थित है तथा धन-लक्ष्मी और वैभव प्रदान करने वाली माता लक्ष्मी को समर्पित है। इस मंदिर का दूसरा नाम अलमेलमंगापुरम है। लोक मान्यताएं कहती है कि तिरुपति बालाजी के मंदिर के दर्शन करने वालों की मनोकामना तभी पूर्ण होती है जब श्रद्धालु बालाजी के साथ देवी पद्मावती मंदिर के दर्शन कर आशीर्वाद भी ले लें।मंदिर में देवी की चांदी की विशाल मूर्ति है, जो कमल पुष्प के आसन पर पद्मासन मुद्रा में बैठी हैं। उनके दोनों हाथों में कमल पुष्प सुशोभित हैं। इनमें से एक फूल अभय का प्रतीक है तो दूसरा पुष्प वरदान का। पद्मावती मंदिर में भगवान श्री कृष्ण, भगवान बलराम, सुंदरराज स्वामी, सूर्यनारायण स्वामी का भी उप मंदिर अवस्थित है।देवी पद्मावती को बहुत दयालु कहा जाता है। वह न सिर्फ अपने भक्तों को आसानी से क्षमा कर देती हैं, बल्कि उनकी हर मुराद भी पूरी करती हैं। देवी पद्मावती ; -

03 FACTS;-

1-पौराणिक किदवंतियां कहती है कि देवी पद्मावती का जन्म कमल पुष्प से हुआ है जो यहां मंदिर के तालाब में खिला था।देवी इस क्षेत्र के शासक आकाश राजा की पुत्री अलमेलु थीं जिनका विवाह वेंकटेश्वर से हुआ था।ऐसा कहा जाता है कि वे देवी लक्ष्मी का ही रूप हैं जिन्होंने भगवान विष्णु के वेंकटेश्वर रूप से विवाह के लिए जन्म लिया था।जब आकाशराजा संतान प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ कर रहे थे, तब यज्ञ-स्थल को हल से जोतते समय उनका हल एक जगह अटक गया । उस स्थान को खोदने पर आकाशराजा को एक सोने की पेटी दिखाई पड़ी । उस पेटी को खोलने पर उसमें सहस्त्र दलों वाले कमल पर बिजली के समान चमकने वाली एक बालिका लेटी दिखाई पड़ी । उसी समय आकाशवाणी हुई कि 'आकाशराजा तुम इस बालिका का अच्छे से पालन-पोषण करो । इसके कारण तुम्हारा वंश पवित्र बनेगा ।' आकाशराजा ने पद्म (कमल) में मिलने के कारण बालिका का नाम 'पद्मावती' रखा । पद्म पुराण के उपसंहार खण्ड की कथा के अनुसार मन्दराचल पर्वत हो रहे यज्ञ में ऋषि-मुनियों में इस बात पर विवाद छिड़ गया कि त्रिदेवों (ब्रह्मा-विष्णु-शंकर) में श्रेष्ठ देव कौन है?देवों की परीक्षा के लिए ऋषि-मुनियों ने महर्षि भृगु को परीक्षक नियुक्त किया।

2-त्रिदेवों की परीक्षा लेने के क्रम में महर्षि भृगु सबसे पहले भगवान शंकर के कैलाश पहुॅचे उस समय भगवान शंकर अपनी पत्नी सती के साथ विहार कर रहे थे। नन्दी आदि रूद्रगणों ने महर्षि को प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया। इनके द्वारा भगवान शंकर से मिलने की हठ करने पर रूद्रगणों ने महर्षि को अपमानित भी कर दिया। कुपित महर्षि भृगु ने भगवान शंकर को तमोगुणी घोषित करते हुए लिंग रूप में पूजित होने का शाप दिया।यहाँ से महर्षि भृगु ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी अपने दरबार में विराज रहे थे। सभी देवगण उनके समक्ष बैठे हुए थे। भृगु जी को ब्रह्माजी ने बैठने तक को नहीं कहे। तब महर्षि भृगु ने ब्रह्माजी को रजोगुणी घोषित करते हुए अपूज्य (जिसकी पूजा ही नहीं होगी) होने का शाप दिया। कैलाश और ब्रह्मलोक में मिले अपमान-तिरस्कार से क्षुभित महर्षि विष्णुलोक चल दिये।भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीर सागर में सर्पाकार सुन्दर नौका (शेषनाग) पर अपनी पत्नी लक्ष्मी-श्री के साथ विहार कर रहे थे। उस समय श्री विष्णु जी शयन कर रहे थे। महर्षि भृगुजी को लगा कि हमें आता देख विष्णु सोने का नाटक कर रहे हैं। उन्होंने अपने दाहिने पैर का आघात श्री विष्णु जी की छाती पर कर दिया। महर्षि के इस अशिष्ट आचरण पर विष्णुप्रिया लक्ष्मी जो श्रीहरि के चरण दबा रही थी, कुपित हो उठी। लेकिन श्रीविष्णु जी ने महर्षि का पैर पकड़ लिया और कहा भगवन् ! मेरे कठोर वक्ष से आपके कोमल चरण में चोट तो नहीं लगी।

3-महर्षि भृगु लज्जित भी हुए और प्रसन्न भी।भगवान विष्णु की इस विनम्रता से भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया। उस समय देवी लक्ष्मी भी उसी स्थान पर थी। उनसे अपने पति का यह अपमान सहन नहीं हुआ। उन्होंने क्रोध में आकर भृगु को श्राप दे दिया कि उनके वंश में उत्पन्न होने ब्राह्मण हमेशा दरिद्र रहेगा और भिक्षा मांगकर अपना जीवन व्यतीत करेगा। महर्षि भृगु ने देवी लक्ष्मी के इस श्राप को स्वीकार किया और वहां से चले गए। उस समय महर्षि भृगु ने उनके वंशज दरिद्र न रहे और अपने जीवन का निर्वाह कर सके उस उद्देश्य से श्रीविष्णु से देवी लक्ष्मी का पुत्री भार्गवी के रूप में जनम लेने का वरदान प्राप्त किया तथा ज्योतिष शास्त्र की रचना करने का निश्चय किया। और कुछ समय बाद महर्षि भृगु ने महान ज्योतिष ग्रंथ भृगु संहिता की रचना की।देवी लक्ष्मी ने भृगु ऋषि की पुत्री भार्गवी के रूप में जनम लिया।देवी लक्ष्मी के इस श्राप के कारण भगवान विष्णु के साथ यदि श्रीदेवी पद्मावती का पूजन ना किया जाए तो ब्राह्मण तो हमेशा ही दरिद्र रहेगा । इसलिए भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी और देवी पद्मावती दोनों का पूजन करना जरूरी है।

भगवान वेंकटेश्वर और देवी पद्मावती का कल्याणोत्सव ;-

03 FACTS;-

1-लक्ष्मीजी के वैकुण्ठ छोड़ते ही वहां की शोभा जाती रही, चारों ओर दरिद्रदेव का राज्य हो गया । पत्नी के वियोग में भगवान विष्णु भी एक दिन वैकुण्ठ छोड़कर भूलोक आ गए और पत्नी को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते शेषाद्रि (शेषाचल, वेंकटाचल) पहुंच गए । इस पर्वत को तिरुमलै या तिरुमाला भी कहते हैं, जिसका अर्थ है श्रीयुक्त पर्वत । वेंकटाचल निवासी भगवान श्रीहरि वहां वे एक इमली के वृक्ष की खोडर में छिप कर रहने लगे । परंतु उन्हें एक ग्वाले की कुल्हाड़ी से सिर पर चोट लग गई । भगवान विष्णु औषधि की खोज करते हुए शेषाद्रि पर वराहस्वामी के आश्रम में पहुंचे । वराहस्वामी ने उनका आदर-सत्कार कर वेंकटाचल पर ही रहने को जगह दे दी और कहा-'मेरे पास वकुला देवी नाम की भक्तिन है । वह माता की तरह आपकी सेवा करती रहेगी । उसे आप अपने पास रहने दीजिए ।' वकुला देवी वकुला देवी कृष्णावतार में माता यशोदा थीं जो श्रीकृष्ण का विवाह न देख सकीं थीं । श्रीकृष्ण ने उन्हें वर दिया था कि कलियुग में मैं एक नौजवान के रूप में तुम्हारे पास आऊंगा, तब तुम मेरी शादी देखोगी ।' वकुला देवी ने कहा-'आज से तुम मेरे पुत्र हो । मैं तुम्हें 'श्रीनिवास' के नाम से पुकारुंगी ।' वकुला देवी ने जड़ी-बूटियां लाकर भगवान श्रीनिवास के घावों पर लगा दीं । वे अच्छे-अच्छे फल, कन्द-मूल आदि जंगल से लाकर श्रीनिवासजी को खिलातीं ।

2- आकाशराजा ने पद्म (कमल) में मिलने के कारण बालिका का नाम 'पद्मावती' रखा । पद्मावती शुक्ल पक्ष के चंद्रमा के समान दिनों-नों दिन बड़ी होती गई । वे रती जैसी सुन्दरता, सरस्वती जैसी विद्या, पार्वतीजी जैसी पवित्रता और लक्ष्मी जैसी शोभा और गुणों से संपन्न थीं । पद्मावतीजी के पूर्व जन्म की कथा प्राचीन काल में वेदवती नाम की एक कन्या थी । वह भगवान श्रीहरि के साथ विवाह का निश्चय करके तपस्या करने लगी । एक दिन रावण ने वेदवती को वन में देखा । उसके सौंदर्य से मोहित होकर रावण ने विवाह करके जबरदस्ती लंका की रानी बनने के लिए कहा ' रावण की बात सुनकर वेदवती ने क्रोध में रावण को श्राप दिया कि मेरी जैसी स्त्री के कारण तेरा और तेरे वंश का सर्वनाश हो जाएगा ।'ऐसा शाप देकर वेदवती योगाग्नि में भस्म हो गई । किंतु अग्निदेव ने वेदवती को अपने में सुरक्षित रख लिया ।

3-कुछ समय बाद जब रावण सीताजी का हरण कर ले जा रहा था,तब अग्निदेव ने रावण के पास जाकर कहा-'तुम जिस सीता को ले जा रहे हो, वह सच्ची सीता नहीं है । वह तो माया सीता है । सच्ची सीता को राम ने मेरे पास छिपा कर रखा है । तुम इस सीता को छोड़ दो, मैं तुम्हें सच्ची सीता दूंगा ।' रावण ने अग्निदेव की बातों पर विश्वास कर लिया और अग्निदेव ने वेदवती को रावण को देकर सच्ची सीता को अपने में समा लिया। रावण वध के बाद श्रीराम ने सीताजी की अग्नि परीक्षा कराई । वेदवती जो माया सीता के रूप में थी, अग्नि में प्रवेश कर गई । तब अग्निदेव सच्ची सीताजी और वेदवती को लेकर श्रीराम के पास आए और वेदवती की कथा सुनाकर उसे स्वीकार करने की प्रार्थना की । किंतु श्रीराम ने कहा-'मैंने मैं इस अवतार में 'एक-पत्नी व्रत' धारण किया है; इसलिए मैं सीता के सिवाय अन्य किसी स्त्री को पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता । कलियुग में वेदवती का मेरे साथ विवाह होगा ।' इसी कारण कलियुग में जब भगवान विष्णु 'श्रीनिवास' के रूप में वेंकटाचल पर आए तब वेदवती ही आकाशराजा की पुत्री पद्मावती के रूप में प्रकट हुईं ।

4-वैशाख शुक्ल दशमी, शुक्रवार को हुआ श्रीनिवास और देवी पद्मावती का कल्याणोत्सव;-

06 POINTS;-

1-एक दिन नारदजी आकाशराजा के पास आए । राजा ने पद्मावती का हाथ दिखाते हुए पूछा-'इसे वर कैसा मिलेगा ?' इस पर नारदजी ने कहा-'राजन् ! महालक्ष्मी की हस्त-रेखाएं और तुम्हारी पुत्री की रेखाएं एक-सी हैं । श्रीहरि के साथ ही इसका विवाह होगा । अब विष्णुजी वैकुण्ठ में नहीं हैं, इसी भू लोक में वेंकटाचल पर बकुला देवी के आश्रम में है । कौन जाने, वे पद्मावती के लिए ही भू लोक में आए हैं ?' शेषाद्रि से बकुला देवी भी आकाशराजा के पास नारायणपुर पहुंचीं और कहा-'मेरा निवास-स्थान शेषाचल है । मेरा एक पुत्र श्रीनिवास है । कुछ कारणों से वह लक्ष्मीजी से दूर होने के कारण निर्धन अवस्था में है । उसने एक दिन उद्यान में राजकुमारी पद्मावती को देखा था । वह उसी से शादी करना चाहता है । मैं उसके लिए आपकी बेटी को मांगने आई हूँ ।' बकुला देवी के जाने के बाद आकाशराजा ने अपने गुरु शुक योगी के पास जाकर सब बातें बताईं ।आकाशराजा ने तुरंत देवगुरु बृहस्पति को बुलाकर विवाह के लिए शुभ मुहुर्त निकलवाया ।

2- वेंकटाचल निवासी श्रीनिवास वैशाख शुक्ल दशमी शुक्रवार को श्रीनिवास और पद्मावती के कल्याण महोत्सव के लिए आदिशेष, गरुत्मान (गरुड़), ब्रह्मा, शंकर नारद, कुबेर, इंद्र, अग्निदेव, विश्वकर्मा आदि सभी देवता आ गए । श्रीनिवास ने नारदजी से कहा-'लक्ष्मी मुझे छोड़कर चली गई हैं इसलिए मैं बड़ी निर्धन अवस्था हूँ । आप कृपा करके कोई ऐसा उपाय सोचिए जिससे मैं अपने विवाह के लिए धन जुटा सकूँ ।' नारदजी ने हंसते हुए कहा-'स्वयं दरिद्रता का भोग करने पर आज आपको दरिद्रता की पीड़ा का बोध हुआ न ? इतने दिनों तक लक्ष्मीजी के साथ सुख से रहते हुए संसार के दरिद्रों की दुहाई आप सुनते ही न थे ।' श्रीनिवासजी ने कहा-'नारदजी ! मैं तो अब बड़ी दुर्दशा में हूँ । आप तो कार्य साधक हैं, ऐसा कोई उपाय कीजिए जिससे मेरे कार्य में कोई भंग न पड़े ।' सभी देवताओं की सभा बैठी, तब नारदजी ने कुबेर से कहा-'सारी सृष्टि में आप से अधिक भाग्यवान कोई नहीं है । आज एक अच्छे कार्य के लिए आपकी आवश्यकता आ पड़ी है । आप श्रीनिवास और पद्मावती के विवाह के लिए पर्याप्त धन देकर सहायता कीजिए । स्वामी उस धन को सूद के साथ चुका देंगे ।'

3-कुबेर ने तुरंत नारदजी की बात मान ली । भगवान श्रीनिवास ने एक पत्र लिखा कि 'मैंने मैं कुबेर से अपने विवाह खर्च के लिए एक करोड़ चौदह लाख लिए हैं । कलियुग में भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने से मेरे पास पैसे जमा हो जाएंगे जिन्हें मैं कलियुग के अंत तक सूद सहित लौटा दूंगा । ' ब्रह्मा, शंकर और अश्वत्थ ने उस पत्र पर साक्षी के रूप में हस्ताक्षर किए । विश्वकर्मा ने वेंकटाचल पर सभी मेहमानों के रहने के लिए सुंदर महल, जलाशय आदि बनाकर उसे दूसरा वैकुण्ठ बना दिया । कामधेनु और कल्पवृक्ष की सहायता से सब तरह के पकवान आ गए । वायुदेव ने सब जगह इत्र और सुगंध बिखेर दी । विभिन्न देवियों ने सुगंधित तेल, अंगराग, रेशमी वस्त्र, पीताम्बर, कस्तूरी तिलक, स्वर्ण मुकुट, रत्नजटित अंगूठियां, छत्र, चंवर आदि से श्रीनिवास जी को सजा दिया । भगवान श्रीनिवास पुरोहित वशिष्ठ ऋषि के साथ गरुड़ पर बैठे और उनके एक ओर ब्रह्मा हंस पर और दूसरी ओर नंदी पर शंकर जी बैठ कर वेंकटाचल से नारायणपुर चल दिए । सभी देवी-देवता, महर्षिगण अपने-अपने वाहनों, नों विमानों व पालकियों पर बैठ गए । अनेक प्रकार के मंगल-वाद्यों की ध्वनि, अप्सराओ के नृत्य , गंधर्वों के जयगीत और मुनियों के स्वस्ति वचनों के साथ बारात नारायणपुर की ओर चल दी ।

4-आकाशराजा की राजधानी नारायणपुर को बड़ी ठाट-बाट से विश्वकर्मा ने सजा कर स्वर्ग के समान बना दिया ।आकाशराजा ने श्रीनिवासजी व बारात को सुंदर महलों में ठहरा कर आवभगत की । दूसरे दिन प्रात:काल आकाशराजा समस्त बंधु-बांधवों के साथ श्रीनिवासजी के यहां गए और वशिष्ठ मुनि के आदेशानुसार बहुमूल्य कौशेय वस्त्र और चंदनताम्बूल समर्पित कर श्रीनिवासजी की पूजा की । इसके बाद मंगल-ध्वनियों के बीच श्रीनिवासजी को गजेंद्र पर बिठा कर विवाह-स्थल लाया गया । अंत:पुर में वृद्ध सुवासिनी स्त्रियों ने पद्मावती को रेशमी साड़ी पहनाकर हीरों के गहने से सज्जित किया । फिर कस्तूरी तिलक व काजल आदि लगा कर उनसे गौरी पूजा करवाई । सहेलियां हाथ पकड़ कर पद्मावतीजी को कल्याण मण्डप में लाईं और श्रीनिवास जी के सामने बिठा दिया । भगवान श्रीनिवास ने अपने कंठ में पड़ी हुई माला हाथ में लेकर पद्मावती जी के गले में पहना दी और पद्मावतीजी ने बेला के फूलों की माला भगवान के कण्ठ में पहना दी । श्रीनिवासजी की तरफ से ब्रह्माजी और वशिष्ठ ऋषि ने तो पद्मावतीजी की ओर से बृहस्पतिजी ने वेद-मंत्र पढ़े । श्रीनिवासजी ने पद्मावतीजी के गले में मंगलसूत्र बांधा । आकाशराजा ने पद्मावतीजी का हाथ श्रीनिवासजी के कर-कमलों में समर्पित किया ।आकाशराजा ने श्रीनिवास जी को करोड़ों स्वर्ण-मुद्राएं, स्वर्ण-मुकुट, मणिमालाएं, सोने की मेखला, सोने-चांदी के पात्र, एक हजार हाथी, दस हजार घोड़े व दासदासियां व सौ ग्राम दिए । इस प्रकार पांच दिन तक महान वैभव से विवाह महोत्सव (कल्याणोत्सव) संपन्न हुआ । देवताओं ने नव-दंपति पर पुष्प वर्षा की और महामुनियों ने आशीर्वाद दिया ।

5-विदा के समय श्रीनिवास ने आकाशराज से कहा-'आपने मुझे सदा के लिए अपना आभारी बनाया है, अत: कोई वर मांग लीजिए ।' आकाशराज ने कहा-'मुझे यह वर दीजिए कि मैं कभी भी आपके नाम-स्मरण को न भूलूँ ।' भगवान श्रीनिवास ने कहा-'मैं आपको सायुज्य मोक्ष प्रदान करता हूँ ।' सबसे विदा लेकर भगवान श्रीनिवास और पद्मावती जी अगस्त्य मुनि के आश्रम में आए । विवाह के बाद नव-दम्पत्ति को छ: मास तक पर्वत पर नहीं चढ़ना चाहिए; इसलिए भगवान श्रीनिवास और पद्मावतीजी छ: मास तक अगस्त्याश्रम में रहे । सभी देवता अपने-अपने लोक को चले गए । आकाशराज की मृत्यु के बाद एक दिन तोंडतों मान अगस्त्याश्रम आए और श्रीनिवास से कोई सेवा बताने के लिए कहा । श्रीनिवास ने कहा-'शेषाद्रि पर वराहस्वामी ने जो स्थान मुझे दिया है वहां मेरे लिए ऐसे मंदिर का निर्माण कराओ जिसमें लक्ष्मी और पद्मावती के रहने की योग्यता हो । इसमें गोपुर, शिखर, सिंहद्वार, ध्वजा मण्डप, धान्यशालाएं, पाकशालाएं, गोशाला व फूलो की बावली बनवाओ ।' भगवान की आज्ञा मानकर तोंडतों मान ने शेषाद्रि को 'दूसरा वैकुण्ठ' बना दिया । शुभ मुहुर्त में श्रीनिवास और पद्मावतीजी ने 'आनन्द निलय' में प्रवेश किया । उस समय ब्रह्माजी ने कहा-'स्वामी ! लोक कल्याण के लिए आप वर दीजिए कि जो भक्त आपके निवास शेषाद्रि पर आएं, उनके पाप दूर हो जाएं । मैं आपकी संनिधि में दो अखण्ड ज्योतियां जलाऊंगा । ये ज्योतियां लोक-कल्याण के लिए सदा आपकी संनिधि में जलती रहेंगी। आप कलियुग के अंत तक इसी वेंकटाचल पर निवास कीजिए और अपने भक्तों को दर्शन देते रहिएगा । अब मैं जो ब्रह्मोत्सव करुंगा उसे स्वीकार कीजिएगा ।'

6-भगवान श्रीनिवास ने ब्रह्माजी की बात स्वीकार कर ली । उस दिन से उस स्थान का नाम वेंकटाचलम् हो गया ।अब नारदजी लक्ष्मीजी के पास पहुंचे और उन्हें भगवान श्रीनिवास और देवी पद्मावती के विवाह की बात बताई । यह सुनते ही लक्ष्मीजी को मानो काठ मार गया । वे नारदजी सहित वेंकटाचलम् पहुंची । भगवान श्रीनिवास ने लक्ष्मीजी को कुबेर से लिए कर्ज की बात बताई और कहा- 'कलियुग में तुम मेरे भक्तों को धन-सम्पत्ति प्रदान करती रहो जिससे वे अनेक पाप करके विपत्तियों में फंस जाएंगे । फिर मैं उन्हें स्वप्न में उपाय बताऊंगा जिससे वे मेरी मनौती करके भेंट चढ़ाएंगे । वह धन मैं कुबेर को सूद के रूप में दे दूंगा । यह तुमको कलियुग के अंत तक करना पड़ेगा । फिर हम वैकुण्ठ जाकर सुख से रह सकते हैं । तब तक तुम पद्म सरोवर में स्थित रह कर भक्तों की रक्षा करती रहो । किन्तु तुम अपने एक स्वरूप से मेरे बांये वक्ष:स्थल में रहो । पद्मावती को दक्षिण वक्ष पर रहने दो ।' भगवान ने लक्ष्मीजी व पद्मावतीजी को अपने आलिंगन में लेकर अपने दांये और बायें वक्ष:स्थल में रख लिया । तभी एक भयंकर ध्वनि हुई और वे शिला विग्रह में परिवर्तित हो गए । तभी आकाशवाणी हुई-'अब से मैं कलियुग के अंत तक वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से इसी रूप में रहूंगा । अपने भक्तजनों की मनोकामना पूरी करना ही मेरा व्रत है ।

.... SHIVOHAM....