बारहवां शिवसूत्र-विस्मय योग की भूमिका है।



NOTE;-महान शास्त्रों और गुरूज्ञान का संकलन...

09 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है -''विस्मय योग की भूमिका है''। यानी योग की भूमिका या आरंभ विस्मय से होता है। गौर करने वाली बात यह है कि योग का आरंभ विस्मय है और अंत समाधि, यानी यही जिज्ञासा और अचंभे का भाव साधक को समाधि की अतल गहराइयों में पहुंचा देता है।मनुष्य जाति के इतिहास का अध्ययन करें तो पाएंगे कि यह पूरी तरह विस्मय के भाव पर टिका है। जब मनुष्य ने पहले-पहल आसमान में बिजली कड़कती देखी, वर्षा देखी, नदी को बहते हुए देखा, विराट पर्वत शृंखलाओं पर दृष्टिपात किया तो सहसा उसका मन विस्मय बोध से परिपूर्ण हो गया। इसी विस्मय से पहले आदिम धर्म की उत्पत्ति हुई। उसने प्रकृति की पूजा करना शुरू किया। साफ तौर पर विस्मय ही धर्म के मूल में है। हम ऋग्वेदकालीन ऋषि के इसी विस्मय-भाव को सौंदर्यपूर्ण कविता में देखते हैं,''सृष्टि से पहले सत् नहीं था, असत् भी नहीं,अंतरिक्ष भी नहीं,आकाश भी नहीं था। छिपा था क्या, कहां किसने ढका था,उस पल तो अगम, अतल जल भी कहां था''। 'सृष्टि के आदि काल में न सत् था न असत्, न वायु था न आकाश, न मृत्यु थी और न अमरता , न रात समय केवल वही एक था जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से सांस ले रहा था ।

2- विस्मय के भाव से भरे इस मन से ही धर्म और दर्शन की उत्पत्ति हुई। आगे चलकर यही विस्मय जिज्ञासा में पल्लवित होकर अध्यात्म के रहस्यों की तह तक पहुंच सका। धार्मिक होने की पहली शर्त है, चित्त का विस्मय से भर जाना। सुबह उदित होता हुआ सूर्य, रात्रि को रजत-कणों को बिखेरता श्वेत चंद्रमा, खिलता हुआ पुष्प, अनंत ब्रह्मांड और अथाह जल-राशि हर सजीव व्यक्ति को विस्मय से भर देते हैं। बाहर देखें तो चारों तरफ विस्मय ही विस्मय बिखरा पड़ा है। अंदर देखें तो और भी ज्यादा विस्मय पैदा करने वाली चीजें दिखाई देती हैं। बाहर के ब्रह्मांड की अपेक्षा अंदर के ब्रह्मांड का फैलाव कहीं ज्यादा है। बाह्य ब्रह्मांड तो अंदर की ही किसी चीज का प्रक्षेपण मात्र है। इसलिए जो बाहर और भीतर विस्मय से भर जाते हैं, वे ही अध्यात्म और विज्ञान को जन्म देते हैं। वे लोग ही सत्य के पथ पर निश्चिंत और निर्भय होकर आगे बढ़ते जाते हैं, जब तक कि अभीष्ट की प्राप्ति न हो जाए। हमारे इतिहास और धर्म की ही तरह विज्ञान भी इसी भाव की एक अभिव्यक्ति है। जब इंसान बाहर की दुनिया में अचंभित होकर जानने का यत्न करता है तो विज्ञान का जन्म होता है। जब आंतरिक तौर पर यही भाव घटित होता है तो अध्यात्म की उत्पत्ति होती है।

3-शिव सूत्र में आता है- विस्मयो योगभूमिकाः, यानी योग की भूमिका या आरंभ विस्मय से होता है।विस्मय योग की भूमिका है।विस्मय संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है आश्चर्य, अचंभा, अचरज, सरप्राइज, सेंस ऑफ अमेजमेंट। यह भाव जितना गहरा होता जाता है, अहंकार उतना ही कम होता चला जाता है। जिसे घमंड है कि उसे सब पता है और जो विस्मय से दूर है, उसका अहंकार उतना ही कठोर और पुष्ट है। अहंकार अज्ञान के धरातल पर ही खड़ा होता है क्योंकि जो घड़ा पूरा भरा है उसमें और कुछ नहीं भरा जा सकता। ज्ञान की प्राप्ति के लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि अहंकार से मुक्ति पाई जाए। इस अहंकार को विस्मय की कुल्हाड़ी से ही काटा जा सकता है। जिसके हृदय में विस्मय है, जिज्ञासा है, जानने की इच्छा है, उसे कोई दर्प हीं नहीं है।उसका अहंकार गिर चुका है या कम से कम क्षीण होने की प्रक्रिया में है। ऐसे व्यक्ति का मन-मस्तिष्क ज्ञान के लिए खुल जाता है। स्वयं का अहंकार से भरा घड़ा खाली हो जाता है और सत्य- प्राप्ति के लिए परिपक्व हो जाता है। हम स्वयं को इस विस्मय के महाभाव से ओत-प्रोत कर लें। विस्मय का अर्थ शब्दकोश में दिया है—आश्‍चर्य; पर, आश्‍चर्य और विस्मय में एक बुनियादी भेद है।

4-आश्‍चर्य विज्ञान की भूमिका है, विस्मय योग की; आश्चर्य बहिर्मुखी है, विस्मय अंतर्मुखी; आश्‍चर्य दूसरे के संबंध में होता है, विस्मय स्वयं के संबंध में ।जिसे हम नहीं समझ पाते; जो हमें अवाक कर' जाता है; उससे विस्मय पैदा होता है। लेकिन, अगर यह जो विस्मय की दशा भीतर पैदा होती है ..इस धारा को हम बहिर्मुखी कर दें, तो विज्ञान पैदा होता है। पदार्थ के संबंध में विचार करने लगें ,खोज करने लगें रहस्य की, जो हमारे चारों ओर है तो विज्ञान का जन्म होता है।विज्ञान आश्‍चर्य है। आश्‍चर्य का अर्थ है—विस्मय बाहर की यात्रा पर निकल गया। और आश्‍चर्य और विस्मय में यह भी फर्क है कि जिस चीज के प्रति हम आश्‍चर्यचकित होते है, हम आज नहीं कल उस आश्‍चर्य से परेशान हो जायेंगे । इसलिए आश्‍चर्य को मिटाने की कोशिश होती है।विज्ञान आश्‍चर्य से पैदा होता है, फिर आश्‍चर्य को नष्ट करता है; व्याख्या खोजता है, सिद्धांत खोजता है, सूत्र चाबियां खोजता है और तब तक चैन नहीं लेता जब तक कि रहस्य मिट न जाये।विज्ञान जगत से आश्‍चर्य को मिटाने में लगा है। अगर विज्ञान सफल हुआ तो जगत में कोई परमात्मा न बचेगा; क्योंकि परमात्मा का अर्थ ही यह होता है कि जिसे हम जान भी लें तो भी दावा न किया जा सके कि हम जानते है ।परमात्मा अज्ञेय है। वह तीसरा तत्व है। विज्ञान इसलिए परमात्मा को स्वीकार नहीं करता; क्योंकि विज्ञान कहता है कि ऐसा कुछ भी नहीं है, जो न जाना जा सके।

5-विज्ञान आश्‍चर्य से पैदा होता है और धर्म बिलकुल विपरीत है। धर्म भी एक आश्‍चर्य भाव से पैदा होता है; इस आश्‍चर्य—भाव को शिवसूत्र में विस्मय कहा है। फर्क इतना ही है कि जब किसी स्थिति में धार्मिक खोजी आश्‍चर्य से भर जाता है , तो वह बाहर की यात्रा पर नहीं जाता, वह भीतर की यात्रा पर जाता है।विस्मय कभी चुकता नही; जितना ही हम जानते हैं, उतना ही बढ़ता है। इसलिए विस्मय एक विरोधाभास है; क्योंकि जानने से विस्मय नष्ट होना चाहिए। लेकिन शिव या श्री कृष्ण या जीसस का विस्मय नष्ट नहीं होता। जिस दिन वे परम ज्ञान को उपलब्ध होते हैं, उस दिन भी उनका विस्मय परम होता है। उस दिन वे ऐसा नहीं कहते कि हमने सब जान लिया; वे ऐसा कहते हैं कि सब जानकर भी, सब जानने को शेष रह गया।उपनिषदों ने कहा है कि पूर्ण से पूर्ण निकाल लिया जाये, तो भी पीछे पूर्ण शेष रह जाता है। सब जान लिया जाए, तो भी सब जानने को शेष रह जाता है। इसलिए, धार्मिक ज्ञान अहंकार का जन्म नहीं बनता; वैज्ञानिक ज्ञान अहंकार का जन्म बनेगा।

6-धार्मिक ज्ञान में तुम जाननेवाले कभी भी न बनोगे; तुम सदा विनम्र रहोगे। और, जितना तुम जानते जाओगे, उतनी ही तुम्हें प्रतीति होगी कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूं। परम ज्ञान के क्षण में तुम कह सकोगे कि मेरा कोई भी ज्ञान नहीं। परम ज्ञान के क्षण में यह पूरा अस्तित्व विस्मय हो जायेगा।विज्ञान अगर सफल हो तो सारा जगत ज्ञात हो जायेगा; धर्म अगर सफल हो तो सारा जगत अज्ञात हो जायेगा।विज्ञान अगर सफल हो तो तुम, जाननेवाले, अस्मिता से भर जाओगे और सारा जगत साधारण हो जायेगा; क्योंकि जहां विस्मय नहीं है, वहां सब साधारण हो जाता है। जहां रहस्‍य नहीं है, वहां सारी आत्मा खो जाती है; आगे की यात्रा बंद हो जाती है। जहां जिज्ञासा पूरी हो गयी, कुतूहल समाप्त हो गया। तो जगत में ऐसी ऊब पैदा होगी, जैसी ऊब कभी भी पैदा नहीं हुई थी। इसलिए विज्ञान के कारण लोगों की विस्मय क्षमता घटती जा रही है। लोग किसी भी चीज से चकित नहीं होते ।लेकिन, धर्म की यात्रा बड़ी उलटी है। जितने हम पर्दे उघाडते है, पाते हैं कि रहस्‍य उतना सघन होता जाता है; जितने हम करीब आते हैं, उतना ही पता चलता है कि जानना बहुत मुश्किल है।और, जिस दिन हम परमात्‍मा के ठीक केंद्र में प्रवेश कर जाते हैं; उस दिन सभी कुछ रहस्यपूर्ण हो जाता है।

7-एक बीज का जमीन से अंकुरित होना भी उतना ही रहस्यपूर्ण है, जितना इस पूरी सृष्टि का जन्म। जैसे -जैसे विस्मय घना होगा, वैसे-वैसे तुम्हारी आंखें छोटे बच्चे की तरह होती जायेंगी; क्योंकि छोटे बच्चे के लिए सभी कुछ विस्मय होता है। छोटे बच्चे को चलते देखो। वह रास्ते से जा रहा है, हर चीज उसे चौंकाती है।एक तितली भी उसे इतना सम्मोहित कर लेती है, जितना परमात्मा भी तुम्हें मिल जाए तो इतना सम्मोहित नहीं करेगा। वह तितली के पीछे दौड़ना शुरू कर देता है।एक छोटे बच्चे की जैसी निर्मल दशा है, ऐसे विस्मय की परम स्थिति में किसी भी व्यक्ति की हो जाती है। इसलिए विस्मय योग का प्रथम चरण है। तुम्हारे पास जितना ज्ञान होगा, उतनी ही योग की भूमिका मुश्किल हो जायेगी।जितने शास्त्र तुम्हारे चित्त पर भारी होंगे, उतना ही तुम्हारा विस्मय नष्ट हो गया। एक पंडित को परमात्मा के संबंध में पूछो, उसके पास सूत्र सब निश्‍चित हैं, वह तो तत्क्षण समझा देता है।परमात्मा भी उसे अवाक नहीं करता।

8- जो व्यक्ति योग में प्रवेश करना चाहे, विस्मय उसके लिए द्वार है। अपने बचपन को वापस लौटाओ। फिर से पूछो, फिर से कुतूहल करो, जिज्ञासा जगाओ। जहां जीवन के स्रोत सूख गये हैं, फिर हरे हो जायेंगे। तुम फिर से आंख खोलो और चारों तरफ देखो। सब उत्तर झूठे हैं। क्योंकि सब तुम्हारे उत्तर उधार हैं। तुमने खुद कुछ भी नहीं जाना है। लेकिन, तुम उधार ज्ञान से ऐसे भर गये हो कि तुम्हें प्रतीति होती है कि मैंने जान लिया।विस्मय को जगाओ। तुम्हारे आसन, प्राणायाम से कुछ भी न होगा, जब तक विस्मय न जग जाए। क्योंकि आसन, प्राणायाम से शरीर शुद्धि होगी, शरीर स्वस्थ होगा; लेकिन शरीर की शुद्धि और शरीर का स्वास्थ्य तुम्हें परमात्मा से न मिला देगा।विस्मय मन की शुद्धि है। विस्मय का अर्थ है मन सभी उत्तरों से मुक्त हो गया।ज्ञान से विवाद पैदा होता है; विस्मय से संवाद होता है। जब तुम विस्मय से भरोगे तो तुम्हारे जीवन में एक संवाद आयेगा।

9-विस्मय का अर्थ है -मुझे पता नहीं; पांडित्य का अर्थ है -मुझे पता है। जितना तुम्हें पता है, उतने ही तुम गलत हो। जब तुम सरल भाव से कहते हो कि मुझे कुछ भी पता नहीं है, सारा जगत अज्ञान है। ऐसी प्रतीति जैसे ही तुम्हारे हृदय में जितनी गहरी बैठ जायेगी, तो तुमने योग का पहला कदम उठाया। फिर दूसरे कदम आसान हैं। लेकिन अगर पहला कदम ही चूक जाये, तो फिर तुम कितनी ही यात्रा करो, उससे कुछ हल नहीं होता। क्योंकि, जिसका पहला कदम गलत पड़ा वह मंजिल पर नहीं पहुंच सकेगा। पहला कदम जिसका सही है, उसकी आधी यात्रा पूरी हो गयी। और, विस्मय पहला कदम है।दो छोर है ; दो अतियां है। एक तरफ जूते है, एक तरफ सिर है, दोनों के मध्य में तुम हो। और वह जो तुम्हारा मध्यबिंदु है , वहां सभी विपरीत मिल रहे हैं। वहां तुम्हारे पैर और वहां तुम्हारा सिर मिल रहा है ..वही हृदय है।यह एक नया जन्म है। इसको हिंदू 'द्विज' कहते है। सभी ब्राह्मण द्विज नहीं हैं। द्विज का मतलब है जिसका दुबारा जन्म हो। द्विज शब्द का मतलब केवल जनेऊ पहन लेने से नहीं है। विस्मय से अगर तुम गुजरोगे तो तुम्हारा पुराना मर जाएगा और नये का जन्म होगा। और अगर तुम विस्मय में ठहर गये, तो प्रतिपल नया जन्मता है और पुराना नष्ट होता है और तुम्हारी धारा शाश्वत है। फिर तुम कभी जरा,जीर्ण न होओगे फिर तुम्हें शाश्वत जीवन का Sparkle मिल गया। इसलिए, शिव कहते हैं; विस्मय योग की भूमिका है।

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