पहला शिव सूत्र .. ''चैतन्‍य आत्मा है''।



NOTE;-महान शास्त्रों और गुरूज्ञान का संकलन क्या सूत्र बीज है?-

04 FACTS;-

योग में नाड़ी वह मार्ग है जिससे होकर शरीर की ऊर्जा प्रवाहित होती है।नाडियाँ शरीर में स्थित नाड़ीचक्रों को जोड़तीं है।योग ग्रंथ 10 नाड़ियों को प्रमुख मानते हैं -परंतु इनमें तीन का उल्लेख बार-बार मिलता है -ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। ये तीनों मेरुदण्ड से जुड़े हैं। सुषुम्ना नाड़ी से श्वास प्रवाहित होने की अवस्था को ही 'योग' कहा जाता है।सुषुम्ना नाड़ी मूलाधार (Basal plexus) से आरंभ होकर यह सिर के सर्वोच्च स्थान पर अवस्थित सहस्रार तक आती है। सभी चक्र सुषुम्ना में ही विद्यमान हैं।अधिकतर लोग इड़ा और पिंगला में जीते और मरते हैं और मध्य स्थान सुषुम्ना निष्क्रिय बना रहता है। परन्तु सुषुम्ना मानव शरीर-विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है, तभी से वास्तविक यौगिक जीवन शुरू होता है।सुषुम्ना नाड़ी का मार्ग साम्यावस्था का मार्ग है ;परंतु पूरा संसार इडा पिंगला के मार्ग में चल रहा है।जीवन सत्य की खोज दो मार्गों से हो सकती है।एक पिंगला का मार्ग है ..आक्रमण का और दूसरा इडा का मार्ग है.. समर्पण का ।

2-विज्ञान पिंगला का मार्ग है और धर्म इडा का मार्ग है..नमन है।इसलिए सभी शास्त्र परमात्मा को नमस्कार से शुरू होते है। वह नमस्कार केवल एक परंपरा और रीति नहीं है बल्कि नमस्कार समर्पण का प्रतीक है।अथार्त जो विनम्र है, केवल वे ही सत्य को उपलब्ध हो सकेंगे न की आक्रमक या अहंकार से भरे ।पदार्थ के संबंध में आसानी से जानकारी मिल जाती है,लेकिन आत्‍मा और परमात्मा की नहीं... ।इसीलिए विज्ञान आत्मा में भरोसा नहीं करता क्योकि इतनी चेष्टा के बाद भी आत्मा की कोई झलक नहीं मिलती।इसलिए नहीं कि आत्मा नहीं है; बल्कि तुमने जो ढंग चुना है, वह आत्मा को पाने का ढंग नहीं है।जीवन का रहस्य तुम्हें मिल सकेगा, अगर तुम नमन के,समर्पण के द्वार से गये।परमात्मा को रिझाने के लिए अति प्रेमपूर्ण, प्रार्थना से भरा हृदय चाहिए। और वहां जल्दी नहीं है ; बड़ा धैर्य चाहिए। तुम्हारी जल्दी और उसका हृदय बंद हो जायेगा। क्योंकि जल्दी भी आक्रमण की खबर है।

3-इसलिए जो परमात्मा को खोजने चलते है,उनके जीवन का ढंग दो शब्दों में समाया हुआ है ..प्रार्थना और प्रतीक्षा। प्रार्थना पहला चरण है जिससे शास्त्र शुरू होते है और प्रतीक्षा पर पूरे होते है।यदि हम भी नमन से शुरू करे तो भगवान शिव के सूत्र समझ में आ सकेंगे।सूत्रों के संबंध में एक बात और खयाल में रखनी है कि तुम्हे ये नहीं तय करना है ठीक है या गलत हैं। वास्तव में,जो अंधेरे में खड़ा है, वह प्रकाश के संबंध में निर्णय नहीं कर सकता। जिसने कभी प्रेम नहीं पहचाना और जो जीवनभर घृणा, ईर्ष्या और द्वेष में जिया है, वह प्रेम के शब्द तो पढ़ सकता है, लेकिन शब्दों में जो छिपा है, वह नहीं समझ सकता । इसलिए क्या ठीक है और क्या गलत... इसका निर्णय मत करना ।दूसरी बात है कि सूत्र का अर्थ होता है ...संक्षिप्त से संक्षिप्त, सारभूत। सूत्र में एक छोटा सा बीज जैसा होता है ; जिसमें सारा वृक्ष समाया होता है।

4-बीज में तुम वृक्ष को नहीं देख सकते क्योंकि उसके लिए बड़ी गहरी आंखें चाहिए ।और वैसी पैनी आंखें तुम्हारे पास अभी नहीं हैं।यदि अभी वृक्ष को देखना हो तो तुम्हें बीज को बोना पड़ेगा, और दूसरा कोई रास्ता तुम्हारे पास नहीं है। और जब बीज जमीन में टूटेगा और वृक्ष अकुंरित होगा, तभी तुम पहचान पाओगे।ये सूत्र बीज है। इन्हें तुम्हें अपने हृदय में बोना होगा।बीज कुरूप भी दिखाई पड़ता हो और उसकी कोई कीमत भी न हो, लेकिन फिर भी उसमें जीवन छिपा है।एक बीज और कीमती से कीमती हीरे में भी एक फर्क है कि तुम हीरे को बो दो, तो उसमें से कुछ पैदा न होगा।एक छोटा सा बीज इस सारे विश्व को पैदा कर सकता है; क्योंकि एक बीज से करोड़ों बीज पैदा होते हैं। फिर करोड़ों बीज से, हर बीज से करोड़ बीज पैदा होते है। एक छोटे से बीज में सारे विश्व का ब्रह्मांड समा सकता है।और सूत्र बीज है। उनके साथ जल्दी नहीं की जा सकती। उनको हृदय में बोओगे तभी अकुंरित होगा, और तभी तुम जान पाओगे। यह भाव ही समर्पण की धारा है।

पहला शिव सूत्र-'चैतन्य आत्मा';-

08 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है 'चैतन्य आत्मा'।इस सूत्र को एक गहरे बीज की तरह हृदय में उतरने देना है।चैतन्य तुम्हारा स्वभाव है। ज्ञान तो उसी को मिलता है, जो स्वयं से परिचित हो जाता है। जो चैतन्य के स्वप्रकाश में नहा लेता है, वही पवित्र है।उससे तुम क्षणभर को भी दूर नहीं गये हो। लेकिन दीये तले अंधेरा है। तुम चाहो तो भी उससे दूर जा भी नहीं सकते। लेकिन भ्रम पैदा हो सकता है कि तुम बहुत दूर चले गये हो। तुम संसार में सपना देख सकते हो । लेकिन, सपना सत्य नहीं हो सकता। सत्य तो सिर्फ एक बात है और वह है तुम्हारा.. चैतन्य स्वभाव।चैतन्य तो आत्मा है और मेरे सिवाय चैतन्य के और कोई भी नहीं है।अगर हममें यह भाव सघन हो जाए, तो संन्यास का जन्म हो जाता है। क्योंकि मेरे अतिरिक्त भी मेरा कोई हो सकता है, यही भाव संसार है।

इसलिए पहले सूत्र में , भगवान शिव हमारी तरफ पहली चिनगारी फेंकते हैं। और वह यह है कि तुम जान लो कि तुम ही बस तुम्हारे हो, बाकी कोई तुम्हारा नहीं है।

2-चैतन्य हम सभी हैं, लेकिन आत्मा का हमें कोई पता नहीं चलता। इस जगत में, सिर्फ चैतन्य ही तुम्हारा अपना है। आत्मा का अर्थ होता है ..अपना । शेष कितना ही अपना लगे, पराया है। मित्र हों, प्रियजन हों, परिवार के लोग हों, धन हो, यश, पद-प्रतिष्ठा हो, बड़ा साम्राज्य हो, वह सब जिसे तुम 'मेरा' कहते हो , वहां धोखा है। क्योंकि वह सभी मृत्यु तुमसे छीन लेगी। मृत्यु जिससे तुम्हें अलग कर दे, वह पराया था। और मृत्यु तुम्हें जिससे अलग न कर पाये, वह अपना था।आत्मा का अर्थ है ,,जो अपना है। लेकिन जैसे ही हम सोचते है अपना, वैसे ही दूसरा प्रवेश कर जाता है। अपने का मतलब ही होता है कोई दूसरा, जो अपना है। तुम्हें यह खयाल ही नहीं आता कि तुम्हारे अतिरिक्त, तुम्हारा अपना कोई भी नहीं है ।सिर्फ तुम ही तुम्हारे हो।यह पहला सूत्र है कि मेरे अतिरिक्त मेरा कोई भी नहीं है।

3-यह क्रांतिकारी सूत्र समाज विरोधी मालूम पड़ सकता है। क्योंकि समाज इसी आधार पर जीता है कि दूसरे अपने है। और धर्म कहता है कि तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा और कोई भी नहीं है।यह बात स्वार्थ की नहीं है। क्योंकि अगर यह तुम्हें खयाल में आ जाये, तो ही तुम्हारे जीवन में परमार्थ पैदा होगा। क्योंकि जो अभी आत्मा के भाव से ही नहीं भरा है, उसके जीवन में कोई परमार्थ नहीं हो सकता।तुम दूसरों को मेरा कहते हो लेकिन,इस ‘मेरे’ के परदे के पीछे तुम्हारे संबंध का मूल आधार तुम्हारा शोषण का हिस्सा है । जिसको भी तुम ‘मेरा’ कहते हो, उसको तुम गुलाम बनाते हो ,शोषण करते हो और उसका उपयोग करते हो। इस दूसरे के उपयोग को तुम परमार्थ सोचते हो तो तुम भ्रांति में हो।अगर तुम्हारा अहंकार ही सेवा से भरता है, तो सेवा भी शोषण है।आत्मज्ञान के पहले कोई व्यक्ति परोपकारी नहीं हो सकता; क्योंकि स्वयं को जाने बिना इतनी बड़ी क्रांति हो ही नहीं सकती।तुम चाहे सोचते हो कि तुम गरीब की सेवा कर रहे हो, लेकिन अगर तुम गौर से खोजोगे, तो तुम कहीं-न-कहीं अपने अहंकार को ही पाओगे।

4-अहंकार रास्ते खोजता है। ऊपर से दिखता है कि तुम परोपकार कर रहे हो; लेकिन, भीतर तुम ही खड़े होते हो।तुम्हारा सत्य भी सदा कड़वा होता है। तुम दूसरे को चोट पहुंचाने के लिए ,अपमान के लिए ..सच बोलते हो ।वास्तव में,तुम सच का उपयोग एक घातक हथियार की तरह कर रहे हो।तुम्हारा झूठ सदा मीठा होता है क्योंकि झूठ को तुम चलाना चाहते हो। तुम सत्य को कड़वी बनाते हो; क्योंकि उसको चलाना नहीं चाहते। तुम सत्य बोलते ही तब हो कि जब तुम सत्य का इस तरह उपयोग कर सको कि वह झूठ से बदतर साबित हो।तुम बेहोश हो ...तुम्हारे कृत्यों का तुम्हें कुछ पता नहीं है कि तुम क्या कर रहे हो।और यात्रा जितनी सूक्ष्म हो जाती है , उतनी ही पकड़ के बाहर हो जाती है। दूसरे तो पकड़ ही नहीं पाते; तुम भी नहीं पकड पाते हो। हम सभी ने अपनी-अपनी भूल-भुलैया बना ली हैं और अपनी बनाई भूल-भूलैयां में हम खुद ही खो गये हैं। इसे थोड़ा होशपूर्वक देखना शुरू करना है कि तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा कोई भी नहीं है।

5-जैसे ही यह स्मरण गहरा होता है कि चैतन्य ही आत्मा है, चैतन्य ही मैं हूं और सब पराया है तो तुम्हारे जीवन में क्रांति की पहली किरण प्रविष्ट हो जाती है; वैसे ही तुम्हारे और तुम्हारे संबंधों के बीच एक दरार पड़ जाती है। लेकिन देखना कठिन भी है; क्योंकि, देखने के पहले एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है ।चैतन्य को बढ़ाओ; तो धीरे धीरे आत्मा की झलक तुम्हारे जीवन में आ जाएगी।पहले इस सूत्र से मन बड़ा दुखी होगा; क्योंकि तुमने दूसरों के साथ बड़े संबंध बना रखे हैं, सपने संजो रखे हैं। दूसरों के साथ तुम्हारी बड़ी आशा जुडी हैं।तुम केवल अपनी तरफ देखो ..न तो पीछे,और न ही आगे। कोई तुम्हारा नहीं है। कोई संबंध तुम्हारी आत्मा नहीं बन सकता। तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा कोई मित्र भी नहीं है। लेकिन तब बड़ा डर लगता है; क्योंकि लगता है कि तुम अकेले हो गये।और मनुष्य इतना भयभीत है कि अकेले में हो, तो भी जोर से गीत गाने लगता है। अपनी ही आवाज सुन के उसे लगता है कि वह अकेला नहीं है। हर मनुष्य दुखी मरता है क्योंकि जो जो स्वप्न वह बांधता है, वे सभी सपने बिखर जाते हैं। हर व्यक्ति यहां अपने सपने देखने के लिए है, तुम्हारे सपने देखने के लिए नहीं। और तुम्हें अगर एक आप्तकाम स्थिति चाहिए तो अपने सपने किसी और के साथ मत बांधना; अन्यथा तुम केवल भटकोगे।

6-यह तथ्य है कि तुम अकेले हो और यह समझना ही तपश्रर्या है। तप का अर्थ नहीं है कि तुम धूप में खड़े हो जाओ। मनुष्य को छोड्कर सभी पशु -पक्षी धूप में खड़े हैं। उनमें से किसी को भी मोक्ष नहीं मिला जा रहा है। और तप का अर्थ यह नहीं है कि तुम भूखे खड़े हो जाओ, उपवास कर लो; क्योंकि कोई उपवास करके मोक्ष नहीं पहुंच जाता है। शरीर को गलाना सिर्फ आत्महिंसा है और महानतम पाप है। जिन्हें थोड़ा भी बोध है, वे ऐसी नासमझियां न करेंगे।दूसरे को भूखा मारना अगर गलत है तो खुद को भूखा मारना सही कैसे हो सकता है? दूसरे को सताना अगर हिंसा है, तो खुद को सताना अहिंसा कैसे हो सकती है?वास्तव में, जो हिम्मतवर हैं वे दूसरे को सताते हैं और जो कमजोर हैं वे खुद को सताते हैं। दूसरे को सताने में एक खतरा भी है कि दूसरा बदला लेगा। खुद को सताने में वह खतरा भी नहीं है।तपश्रर्या का अर्थ है कि तुमने यह सत्य स्वीकार कर लिया कि तुम अकेले हो। जिसने यह जान लिया और स्वीकार कर लिया कि मैं अकेला हूं उसके लिए इस सूत्र में इंगित है कि 'चैतन्य आत्मा है।' वही तुम्हारा है और कोई तुम्हारा नहीं है।

7-संसार का केवल इतना ही अर्थ है कि तुमने अपने सपनों कि नाव दूसरों के साथ बांध रखी है और संन्यास का अर्थ है कि तुम जाग गये हो।अब तुमने एक बात स्वीकार कर ली है , चाहे कितनी ही कष्टकर है कि तुम अकेले हो ...सब संग साथ झूठा है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम कहीं भाग जाओ ।क्योंकि जो चीज झूठ हो गई, उससे भागने में भी कोई सार्थकता नहीं है।हम प्रतिदिन सपना है लेकिन देखते कोई भी सुबह जागकर भागता नहीं है कि सपना झूठा है। सपना झूठा हो गया, बात खत्म हो गई।लेकिन एक व्यक्ति है जो परिवार से ,लोगो से भाग रहा है। तो इसका भागना बताता है कि इसने केवल सुन लिया है कि सपना झूठा है, लेकिन अभी इसे खुद पता नहीं चला।इसलिए तुम्हें चैतन्य आत्मा असंभव मालूम पड़ती है।हमें कुछ पता भी नहीं कि हम कहां जा रहे हैं, क्यों जा रहे है। बस चले जा रहे हैं; क्योंकि भीतर एक बेचैनी है ,एक शक्ति है जो चलाये चली जाती है। फिर हम जो भी करते हैं, उस सब के उलटे परिणाम आते हैं। इसलिए दुख से गुजरना होगा। उसको ही तपश्‍चर्या कहा जाता है।जब कोई व्यक्ति जागना शुरू करता है, तो पहले उसे दुख में से ही गुजरना होगा। क्योंकि तुमने जन्मों जन्मों से अपने चारों तरफ दुख निर्मित किये हैं। इसी को कर्म कहा जाता है।

8-कर्म का कुल इतना ही अर्थ है कि हमने जन्मों जन्मों तक चारों तरफ दुख निर्मित किये हैं। जाने अनजाने हमने दुख की फसल बोयी है।तो जब भी तुम होश में आते हो, तुम्हें फसल दिखायी पड़ती है क्योंकि काटनी भी तो पड़ेगी । डर के मारे तुम वहीं बैठ जाते हो या फिरआँख बंद करके कोई नशा ले लेते हो। लेकिन हर जन्म तुम्हारे कर्म की शृंखला में कुछ और जोड जाता है,न कि घटाता हैं । तुम और भी गर्त में उतर जाते हो। नरक और करीब आ जाता है।अगर तुम होश से भरोगे और हिम्मत रखोगे , तो तुम उस दुख से गुजर गये। जिस दुख से तुम सचेतन रूप से गुजर जाओगे,तो वह फसल कट गई क्योंकि वे तुम्हारी आत्मा की चारों तरफ बंधी हुई जंजीरे थी । उन दुखों से तुम्हें फिर से न गुजरना पड़ेगा ।तुम उन सबसे गुजर जाओ, हिम्मत रखो और संकल्प करो कि कोई फिक्र नहीं है, जितना दुख मैंने पैदा किया है.. मैं अंत तक जाऊंगा। मैं उस प्रथम घड़ी तक जाना चाहता हूं जब मै निर्दोष था, और दुख की यात्रा शुरू न हुई थी। जब मेरी आत्मा परम पवित्र थी, और मैंने दुख का कुछ भी संग्रह नहीं किया था । मैं उस समय तक प्रवेश करूंगा ही ..चाहे कुछ भी परिणाम हो; कितना ही दुख, कितनी ही पीड़ा हो।अगर तुमने इतना साहस रखा तो आज नहीं तो कल, दुख से पार होकर तुम उस जगह पहुंच जाओगे, जहां भगवान शिव का सूत्र तुम्हें समझ में आयेगा कि चैतन्य आत्मा है। और एक बार तुम अपने भीतर के चैतन्य में प्रतिष्ठित हो जाओ, फिर तुमसे कोई दुख पैदा नहीं होता; क्योंकि बेहोश मनुष्य ही अपने चारों तरफ दुख पैदा करता है।


....SHIVOHAM....