ध्यान... SET 08-चक्र ध्यान साधना /सात चक्रों के इमोशनल ब्लॉकेज को कैसे ओपन किया जाए?

श्री यंत्र में वास्तु;-

03 FACTS;-

1-श्रीयंत्र आदिकालीन वास्तुकला विद्या का द्योतक हैं।वास्तव में प्राचीनकाल में भी वास्तुकला अत्यन्त समृद्व थी।श्री यंत्र वास्तु का प्रतीक है।16 कमल दल अथार्त वास्तु के 16 Zone।अंदर के अष्ट कमल भी वास्तु के आठ जोन हैं । बिंदु ब्रह्मस्थान है। वास्तु चक्र में 45 देवता होते हैं।इसी प्रकार श्रीयंत्र में 43 त्रिकोण और दो शिव-शक्ति त्रिकोण होते हैं। एक बिंदु है। श्री यंत्र के द्वारा ही सभी देवताओं का स्थान निश्चित होता है। इसमें 12 असुर भी होते हैं। उनका भी स्थान निश्चित होता है। 33 कोटि के देवता होते हैं यानी 33 प्रकार के और 12 प्रकार के असुर होते हैं। श्रीयंत्र संपूर्ण वास्तु का प्रतीक है।

2-भगवान श्री कृष्ण की द्वारका नगरी भी श्री यंत्र के आकार में बनी हुई थी। आचार्य शंकर ने सौंदर्य लहरी में देवी के सौंदर्य वर्णन के द्वारा संपूर्ण कुंडलिनी जागरण ,संपूर्ण वास्तु ,संपूर्ण ज्योतिष का ज्ञान दे दिया है। परंतु यह सब वही देख सकता है ; जो डी-कोड करना जानता है।डी-कोड वही कर सकता है जिसको आत्मा की अनुभूति है, शिव तत्व का ज्ञान है।अन्यथा केवल एक पवित्र ग्रंथ की तरह 'सौंदर्य लहरी' की पूजा करता रहेगा ;लेकिन समझ में कुछ भी नहीं आएगा।

3-श्री यंत्र संपूर्ण ब्रह्मांड की संरचना का वर्णन कर रहा है। हमारे मनुष्य शरीर के सभी चक्र, मर्म स्थानों आदि का वर्णन कर रहा है।लेकिन श्री यंत्र की केवल पूजा की जा रही है समझ में कुछ नहीं आ रहा है।''यत्र पिंडे,तत्र ब्रह्मांडे ''--' जो कुछ मानव शरीर में है;वही सब कुछ ब्रह्मांड में है' और जो वर्णन श्री यंत्र में किया गया है वही सब कुछ मानव शरीर में है। जरूरत है केवल शोध करने की और यह तभी संभव है जब हमें आत्मा की अनुभूति हो ,स्व की अनुभूति हो।

//////////////////////////////////////////////////////////////////////////////// 3-प्रत्येक चक्र के अनुसार अथार्त मूलाधार में 4 बार, स्वाधिष्ठान में 6 बार, मणिपुर में 10 बार, अनहत में 12 बार, विशुद्ध में 16 बार, आज्ञा नेगटिव में18 बार, आज्ञा पाजिटिव में 20 बार, अन्तःकुम्भक (Fission) और बाह्याकुम्भक(Fusion) कीजिए!प्रत्येक चक्र के अनुसार हस्तमुद्रा बनाये ! कूटस्थ मे दृष्टि रखे!मन को जिस चक्र मे ध्यान कर रहे है उस चक्र मे रखिए और उस चक्र पर तनाव डालिए! पूरब दिशा अथवा उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठिए! शरीर को थोडा ढीला रखें !मन को जिस चक्र मे ध्यान कर रहे है उस चक्र मे रखिए और उस चक्र पर तनाव डालिए!प्रत्येक चक्र के देवता ,प्रतीक चिन्ह ,रंग ,बीजाक्षर का ज्ञान सहित ध्यान करे!

चक्रों मे ध्यान साधना ;-

07 FACTS;-

1-मूलाधार चक्र मे ध्यान साधना ;-

03 POINTS;-

1-मूलाधार चक्र मे तनाव डालिये!पृथ्वी मुद्रा... अनामिका अंगुलि को अंगुष्ठ से लगायें और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। अब मूलाधार चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अपनी शक्ति के अनुसार 4 बार लंबा श्वास लेवे और छोडे! श्वास को

रोकना नही है!मूलाधार चक्र मे चार पंखडियाँ होती है! मूलाधा रचक्र को व्यष्टि मे पाताललोक और समिष्टि मे भूलोक कहते है! जब तक मनुष्य ध्यान नही करता तब तक उस मनुष्य का ह्र्दय काला अर्थात अन्धकारमय है,कलियुग मे है!जब

मनुष्य ध्यान साधना शुरु करता है तब वो क्षत्रिय यानि योद्धा बन जाता है, उसका हृदय 'चालक हृदय' बन जाता है परन्तु वह साधक फिर भी कलियुग मे ही है!

2-मूलाधारचक्र पृथ्वी तत्व का प्रतीक है! पृथ्वी तत्व का अर्थ गंध है!इस चक्र को महाभारत मे सहदेवचक्र कहते है! कुंडलिनी शक्ति को पांडव पत्नी द्रौपदि कहते है! श्री सहदेव का शंख मणिपुष्पक है!श्री सहदेव ध्यान कर रहे साधक को जो नकारात्मक शक्तियाँ रोक रही होती है उन का दमन करते है ! कुंडलिनी शक्ति जो शेष नाग जैसी होती है वह मूलाधारचक्र के नीचे अपना फ़ण नीचे की ओर एवम पूँछ उपर की और करके साढे तीन लपेटे लिये हुए सुषुप्ती अवस्था मे रह्ती है!

3-साधना के कारण ये शेषनाग अब जागना आरंभ करता है! जाग्रत हो रहा शेष नाग मूलाधारचक्र को पार करेगा और स्वाधिस्ठानचक्र की ओर जाना शुरु करेगा! मूलाधारचक्र शेष के उपर होता है, इसी कारण कुंडलिनी को श्री पद्मावति देवी कहते है और मूलाधारचक्र को शेषाद्रि कहते है!यहां जो समाधि मिलती है उस को सविकार संप्रज्ञात समाधि कहते है!

संप्रज्ञात का अर्थ मुझे परमात्मा के दर्शन लभ्य होगे या नही होगे ऐसा संदेह होना! इस चक्र मे ध्यान साधक को इच्छा शक्ति की प्राप्ति कराता है! ध्यान फल को साधक को अपने पास नही रखना चाहिये, इसी कारण ‘’ध्यानफल श्री विघ्नेश्वरार्पणमस्तु’’ कहके उस चक्र के अधिदेवता को अर्पित करना चाहिये!

2-स्वाधिष्ठान चक्र मे ध्यान साधना ;-

03 POINTS;-

1-अब स्वाधिष्ठान चक्र मे जाए! तनाव डाले! वरुण मुद्रा लगाए! कनिष्ठा अंगुलि को अंगुष्ठ से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें।स्वाधिष्ठान चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अपनी शक्ति के अनुसार छः बार लंबी श्वास लेवे और छोडे! श्वास को रोके नही! स्वाधिष्ठान चक्र को व्यष्टि मे महातल लोक और समिष्टि मे भुव लोक कहते है! साधक अब द्वापर युग मे है!

2-स्वाधिस्ठान चक्र मे छः पंखडियाँ होती है! इस चक्र को महाभारत मे श्रीनकुलजी का चक्र कहते है! श्रीनकुलजी का शंख सुघोषक है! यह चक्र ध्यान कर रहे साधक को आध्यात्मिक सहायक शक्तियों की तरफ मन लगा के रखने मे सहायता करता है! स्वाधिस्ठान चक्र मे ध्यान करने से पवित्र बांसुरी वादन की ध्वनी सुनाई देगी! साधक का हृदय पवित्र बांसुरी वादन सुनके स्थिर होने लगता है! यहाँ साधक को द्विज कहते है! द्विज का अर्थ है दुबारा जन्म लेना! क्योकि साधक को पश्चाताप होता है कि मैने इतना समय बिना साधना किए व्यर्थ ही गवाया, इसी कारण द्विज कहते है!

3-सुनाई देने को संस्कृत भाषा मे वेद कहते है! इसी कारण स्वाधिस्ठानचक्र को वेदाद्रि कहते है! इधर जो समाधि मिलती है उस को सविचार संप्रज्ञात समाधि या सामीप्य समाधि कहते है! इस चक्र मे ध्यान करने से साधक को क्रिया शक्ति की प्राप्ति होती है! इस का अर्थ हाथ, पैर, मुख, शिश्न( मूत्रपिडों मे) और गुदा यानि कर्मेंद्रियों को शक्ति प्राप्त होती है!ध्यान फल को साधक को ‘’ध्यानफल श्री ब्रह्मार्पणमस्तु’’ कहके उस चक्र के अधिदेवता को अर्पित करना चाहिये!

3-मणिपुर चक्र मे ध्यान साधना ;-

03 POINTS;-

1-अब मणिपुर चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, अग्नि मुद्रा मे बैठे! अनामिका अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। मणिपुरचक्र मे तनाव डाले! मणिपुरचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अपनी शक्ति के अनुसार दस बार लंबी श्वास लेवे और छोडे ! श्वास को रोके नही! मणिपुरचक्र को व्यष्टि मे तलातल लोक और समिष्टि मे स्वर लोक कहते है! साधक अब त्रेता युग मे है!

2-मणिपुर चक्र मे दस पंखडियाँ होती है! इसी कारण इसे रावण चक्र भी कहते है!इस चक्र को महाभारत मे श्रीअर्जुनजी का चक्र कहते है! श्रीअर्जुनजी का शंख दैवदत्त है!श्रीअर्जुनजी ध्यान कर रहे साधक को दिव्य आत्मनिग्रह शक्ति लभ्य कराते है ! मणिपुरचक्र मे ध्यान करने से वीणा वादन की ध्वनी सुनाई देगी! साधक का हृदय इस वीणा वाद्य नाद को सुन कर भक्तिवान हृदय बनेगा! साधक विप्र बन जायेगा!

3-इधर जो समाधि मिलती है उस को सानंद संप्रज्ञात समाधि या सायुज्य समाधि कहते है! इस चक्र मे ध्यान साधक को ज्ञान शक्ति की प्राप्ति होती है! इस का अर्थ कान (शब्द), त्वचा (स्पर्श), आँख (रूप), जीब (रस) और नाक (गंध), ये ज्ञानेंद्रियों को शक्ति प्राप्त होती है!इधर ज्ञान(ग) आरूढ(रुड) होता है! इसी कारण मणिपुर चक्र को गरुडाद्रि कहते है!ध्यान फल को साधक को ‘’ध्यानफल श्री श्रीविष्णुदेवार्पणमस्तु’’ कहके उस चक्र के अधिदेवता को अर्पित करना चाहिये!

4-अनाहत चक्र मे ध्यान साधना ;-

03 POINTS;-

1-अब अनाहत चक्र मे जाए, उस चक्र मे तनाव डाले, वायु मुद्रा मे बैठे! तर्जनी अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें।अनाहतचक्र मे तनाव डाले! अनाहतचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अपनी शक्ति के अनुसार बारह बार लंबी श्वास लेवे और छोडे! अनाहत चक्र को व्यष्टि/micro... on a small scale मे रसातल लोक और समिष्टि/Macro ....very large in scale, मे महर लोक कहते है! साधक अब सत्य युग मे है!

2-अनाहत चक्र मे बारह पंखडियाँ है! श्री भीम और आंजनेय दोनों वायु देवता के पुत्र है! इसी कारण इसे वायु चक्र, आंजनेयचक्र भी कहते है!इस चक्र को महाभारत मे श्रीभीम का चक्र भी कहते है! श्रीभीमजी का शंख पौंड्रं है! ध्यान कर रहे

साधक को दिव्य प्राणायाम नियंत्रण शक्ति का लाभ कराते है!अनाहत चक्र मे ध्यान करने से घंटा वादन की ध्वनी सुनाई देगी! साधक का हृदय इस घंटावाद्य नाद को सुनकर शुद्ध हृदय बनेगा! साधक ब्राह्मण बन जायेगा! कुंडलिनी अनाहत चक्र तक नही आने तक साधक ब्राह्मण नही बन सकता! मनुष्य जन्म से ब्राह्मण नही बनता, प्राणायाम क्रिया करके कुंडलिनी अनाहत चक्र तक आने पर ही ब्राह्मण बनता है!

3-इधर जो समाधि मिलती है उस को सस्मित संप्रज्ञात समाधि या सालोक्य समाधि कहते है! इस चक्र मे ध्यान साधक बीज शक्ति की प्राप्ति कराता है! इधर साधक को वायु मे उड रहा हूँ जैसी भावना आती है! इसी कारण अनाहतचक्र को अंजनाद्रि कहते है!ध्यान फल साधक को “ध्यानफल श्री रुद्रार्पणमस्तु’’ कहके उस चक्र के अधिदेवता को अर्पित करना चाहिए!

5-विशुद्ध चक्र मे ध्यान साधना ;-

03 POINTS;-

1-अब विशुद्ध चक्र मे जाए, इस चक्र पर तनाव डाले, शून्य यानि आकाश मुद्रा मे बैठे! मध्यमा अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। विशुद्ध चक्र मे तनाव डाले! अनाहत चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अपनी शक्ति के अनुसार सोलह बार लंबा श्वास लेवे और छोडे! श्वास को रोक्ना नही है!विशुद्धचक्र को व्यष्टि मे सुतल लोक और समिष्टि मे जन लोक कहते है!

2-विशुद्धचक्र मे सोलह पंखडियाँ होती है! कालकूटविष जैसी अति कडवी रुचि होती है! इस चक्र को महाभारत मे श्रीयुधिष्ठिर का चक्र कहते है! श्रीयुधिष्ठिर का शंख अनंतविजय है ;जो ध्यान कर रहे साधक को दिव्य शांति का लाभ कराते है ! विशुद्धचक्र मे ध्यान करने से प्रवाह ध्वनी सुनाई देगी!

3-इधर असंप्रज्ञात समाधि या सारूप्य समाधि लभ्य होती है! असंप्रज्ञात का अर्थ है 'निस्संदेह'! साधक को सगुण रूप मे यानि अपने अपने इष्ट देवता के रूप मे परमात्मा दिखायी देते है! इस चक्र मे ध्यान साधक को आदि शक्ति की प्राप्ति कराता है!असंप्रज्ञात समाधि या सारूप्य समाधि लभ्य होने से संसार चक्रों से विमुक्त हो के साधक सांड के जैसा परमात्मा के तरफ दौड पडता है! इसी कारण विशुद्ध चक्र को वृषभाद्रि कहते है!ध्यान फल को साधक ‘’ध्यानफल श्री आत्मार्पणमस्तु’’ कहके उस चक्र के अधिदेवता को अर्पित करना चाहिये!

6-आज्ञा चक्र मे ध्यान साधना ;-

03 POINTS;-

1-अब आज्ञा नेगेटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे बैठे! अंगुठें को तर्जनी अंगुली के सिरे से लगाए! शेष तीन अंगुलिया सीधी रखें। आज्ञा नेगेटिव चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा नेगेटिव चक्र मे दो पंखडियाँ होती है! अपने शक्ति के अनुसार 18 बार लंबा श्वास लेवे और छोडे! श्वास को रोके नही! अब आज्ञा पॉजिटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे ही बैठे रहे! आज्ञा पॉजिटिव चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अपनी शक्ति के अनुसार 20 बार लंबा श्वास लेवे और छोडे! श्वास को रोके नही!

2-आज्ञा पॉजिटिव को व्यष्टि मे वितल लोक और समिष्टि मे तपो लोक कहते है! श्री विवेकानंद जैसे महापुरुष सूक्ष्म रूपों मे इधर तपस करते है! इसी कारण इस को तपोलोक कहते है! आज्ञा पॉजिटिव चक्र मे दो पंखडियाँ है! आज्ञा पॉजिटिव चक्र मे प्रकाश ही प्रकाश दिखायी देता है!इस को श्रीकृष्ण चक्र कहते है!श्रीकृष्ण का शंख पांचजन्य है!पंचमहाभूतों को कूटस्थ मे

एकत्रीत करके दुनिया रचाते है, इसी कारण इस को पांचजन्य कहते है!

3-सविकल्प समाधि अथवा स्रष्ठ समाधि लभ्य होती है! यहा परमात्मा और साधक आमने सामने है! इस चक्र मे ध्यान साधक को परा शक्ति की प्राप्ति कराता है! ध्यान फल साधक को ‘’ध्यानफल श्री ईश्वरार्पणमस्तु’’ कहके उस चक्र के अधिदेवता को अर्पित करना चाहिये!इस चक्र से ही द्वंद्व शुरु होता है! केवल एक कदम पीछे जाने से फिर संसार चक्र मे पड़ सकता है साधक! इसी कारण आज्ञा पॉजिटिव चक्र को वेंकटाद्रि कहते है! एक कदम आगे यानि अपने ध्यान को और थोडा करने से अपने लक्ष्य परमात्मा मे लय हो जाता है!

7-सहस्रार चक्र मे ध्यान साधना ;-

साधक अब सहस्रार चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, लिंग मुद्रा मे बैठे! मुट्ठी बाँधे और अंदर के अंगुठें को खडा रखे, अन्य अंगुलियों को बंधी हुई रखे। सहस्रार चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अपनी शक्ति के अनुसार 21 बार लंबा श्वास लेवे और छोडे! सहस्रार चक्र को व्यष्टि मे अतल लोक और समिष्टि मे सत्य लोक कहते है! ये एक ही सत्य है बाकी सब मिथ्या है, इसी कारण इस को सत्यलोक कहते है! सहस्रारचक्र मे हजार पंखडियाँ होती है! यहा निर्विकल्प समाधि का लाभ होता है! परमात्मा, ध्यान और साधक एक हो जाते है! इस चक्र मे ध्यान साधक को परमात्म शक्ति की प्राप्ति कराता है!

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सात चक्रों के इमोशनल ब्लॉकेज को कैसे ओपन किया जाए?-

03 FACTS;-

1-आँखें बन्द कर तीब्र श्वांस-प्रश्वांस की अनुभूति को आत्मसात करने का नित्य अभ्यास करो ।

महर्षि याज्ञवल्क्य तो कहते हैं कि छः महीने के सतत अभ्यास से नाड़ियां पूर्ण शुद्ध हो जाती हैं,यानि कि फिर सामान्य झाड़न-पोछन से काम चल जाता है।सर्वांगीण नाड़ीशुद्धि के पश्चात् कुछ दिनों के लिए क्रमशः इडादि तीनों प्रधान नाडियों की शुद्धि का अभ्यास करना चाहिए। क्योंकि यही वो मार्ग है,जहां से होकर कुण्डलिनी शक्ति को गुजरना है। यदि ये मार्ग शोधित(जागृत) न हुए,और चक्र पर काम करना शुरु कर दिये,तो इसका परिमाम गलत होगा।

2-अतः, प्रत्येक वैठक में एक से तीन चक्र नाड़ीशोधन आवश्यतानुसार कर लेना चाहिए।यह ठीक वैसे ही है,जैसे बन-बनाये

घर में नित्य झाड़ू-पोछा तो लगाना ही पड़ता है न।अन्यथा गर्द गुब्बार,मकड़ियों के जाले अपना स्थान बना लेंगे।फिर तत्वों की शुद्धि पर आ जाओ,ध्यान रहे प्रत्येक पद्मों पर एक-एक तत्त्व हैं- उन बीजों से स्वांस प्रहार करो।शनैः-शनैः एक-एक पद्मों पर काम करते हुए आगे बढ़ो।तत्त्व,बीज,वाहन,आकृति, वर्ण, मात्रिका आदि सबका चिन्तन होना चाहिए।तुम पाओगे कि धीरे-धीरे सारे वर्ण स्पष्ट हो रहे हैं, और फिर वहां की अन्य चीजें भी।क्रिया में जल्दबाजी और उत्सुकता जरा भी न हो।बस एक द्रष्टा

की भूमिका में रहना है,भोक्ता और कर्ता बनने का प्रयास करोगे तो परेशानी में पड़ोगे।

3-सात चक्रों के सात इमोशनल ब्लॉकेज है...

1-भय/Fear 2-ग्लानि/ Guilt feeling 3-लज्जा/Dishonour 4-दर्द/Pain 5-असत्य/Untrue 6-भ्रम /Illusion7-सांसारिक आसक्ति/Worldy attachments

एक-एक पद्मों की शुद्धि पर आ जाओ। मानसिक ध्यान करते हुए एक हवन कुंड बनाओ। और प्रत्येक चक्र के इमोशनल ब्लॉकेज का हवन करो।उदाहरण के लिए मूलाधार चक्र के 'भय' का कम से कम एक माला या तीन माले हवन करो..''ॐ सत् चित् एकम ब्रह्म भय स्वाहा''।प्रत्येक दिन एक एक करके अपने ब्लॉकेज को दूर करो! ध्यान में ,स्वप्न में तुम्हें कुछ ऐसे दृश्य दिखाई देंगे जो तुम्हें तकलीफ दे सकते हैं।उन सब को साक्षी बनकर देखो! बचपन से लेकर आज तक के सभी 'भय,ग्लानि' आदि को सुमिरन करके हवन कर दो।और इसी प्रकार से सभी सातों 'ब्लॉकेज' को हवन कर दो। इन 7 दिनों में आपको तकलीफ होगी परंतु यह समस्याएं हमेशा के लिए दूर हो जाएगी औरपद्मों की शुद्धि हो जाएगी।

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सात चक्रों के इमोशनल ब्लॉकेज को कैसे ओपन किया जाए?-

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चक्रो के नाम(ऑल फाइव सेंसेज।)>>संबंधित>>ब्लॉकेज>>ओपनिंग ऑफ 5 एलिमेंट्स

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1-पृथ्वी चक्र/मूलाधार चक्र(गंध)>अस्तित्व/ सरवाइवल >फियर/भय >फियर को सरेंडर करो.

2-जलचक्र/स्वाधिष्ठान चक्र(स्वाद)>प्लेजर /आनंद>ग्लानि की भावना/गिल्ट फीलिंग>स्वयं को माफ करो,

3-अग्निचक्र/मणिपुर चक्र(देखना)>स्ट्रांग विल >लज्जा/ Dishonour/ Shame गहरी निराशा>अग्नि को ऊपर की ओर मोड़ दो.

4-वायुचक्र /अनाहत चक्र(स्पर्श )>लव >ग्रीफ /दर्द >दर्द को जाने दो.

5-आकाश चक्र/ साउंड /विशुद्ध चक्र( सुनना )>सत्य /ट्रुथ>असत्य / लाइज>स्वीकार करो कि तुम शिव हो.

6-प्रकाश चक्र/लाइट/आज्ञा चक्र>इनसाइट/अंतर्दृष्टि>भ्रम/इल्यूजन ऑफ सिपरेशन>जानो-एवरीवन इज कनेक्टेड.

7- विचार चक्र/सहस्त्रार चक्र>ब्रह्मांडीय ऊर्जा>सांसारिक आसक्ति/अर्थली अटैचमेंट>सभी मोह का त्याग करो.

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षट्चक्रों का वर्णन किया गया है।यह चक्र शरीर के अलग-अलग अंगों में स्थित है तथा इनके नाम भी भिन्न है।पुराणों अनुसार सात लोक को मूलत: दो लोक में विभाजित किया गया हैं- कृतक लोक और 2.अकृतक लोक। कृतक लोक में ही प्रलय और उत्पत्ति का चक्र चलता रहता है अकृतक लोक समय और स्थान शून्य है।

(A) कृतक लोक :

कृतक त्रैलोक्य जिसे त्रिभुवन या मृत्युलोक भी कहते हैं। इसके बारे में पुराणों की धारणा है कि यह नश्वर है, कृष्ण इसे परिवर्तनशील मानते हैं। इसकी एक निश्‍चित आयु है। उक्त त्रैलोक्य के नाम हैं- भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक। यही लोक पाँच तत्वों से निर्मित है- आकाश, अग्नि, वायु, जल और जड़। इन्हीं पाँच तत्वों को वेद क्रमश: जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंदमय कोष कहते हैं।

(1)भूलोक : जितनी दूर तक सूर्य, चंद्रमा आदि का प्रकाश जाता है, वह पृथ्वी लोक कहलाता है, लेकिन भूलोक से तात्पर्य जिस भी ग्रह पर पैदल चला जा सकता है।

(2)भुवर्लोक : पृथ्वी और सूर्य के बीच के स्थान को भुवर्लोक कहते हैं। इसमें सभी ग्रह-नक्षत्रों का मंडल है।

(3)स्वर्गलोक : सूर्य और ध्रुव के बीच जो चौदह लाख योजन का अन्तर है, उसे स्वर्गलोक कहते हैं। इसी के बीच में सप्तर्षि का मंडल है।

(B) अकृतक लोक :

जन, तप और सत्य लोक तीनों अकृतक लोक कहलाते हैं। अकृतक त्रैलोक्य अर्थात जो नश्वर नहीं है अनश्वर है। जिसे मनुष्य स्वयं के सद्‍कर्मों से ही अर्जित कर सकता है। कृतक और अकृतक लोक के बीच स्थित है 'महर्लोक' जो कल्प के अंत के प्रलय में केवल जनशून्य हो जाता है, लेकिन नष्ट नहीं होता। इसीलिए इसे कृतकाकृतक लोक कहते हैं। 'महर्लोक' जनशून्य अवस्था में रहता है जहा आत्माएं स्थिर रहती हैं, यहीं पर महाप्रलय के दौरान सृष्टि भस्म के रूप में विद्यमान रहती है। यह लोक त्रैलोक्य और ब्रह्मलोक के बीच स्थित है।इस प्रकार सात लोक हैं जिसमें से तीन लोक 1.भू लोक (धरती), 2.भुवर्लोक (आकाश नक्षत्र मंडल), 3.स्वर्लोक (अंतरिक्ष/सप्तर्षि मंडल/ध्रुवलोक) में ही प्रलय होता है, जबकि 4.महर्लोक, 5.जनलोक, 6.तपलोक और 7.सत्यलोक- उक्त 4 लोक प्रलय से अछूते रहते हैं।

1-शरीर के अन्दर यह सात लोक ही सात चक्र है।सात उपरी या ऊर्ध्व लोक है...1.भूर्लोक (प्रथ्वी), 2.भुवर्लोक (आकाश/ राक्षस तथा भूत पिशाच), 3.स्वर्लोक (अंतरिक्ष ) , 4. महर्लोक (आदित्य लोक) 5. जनः लोक (चन्द्रलोक) 6. तपः लोक(नक्षत्र लोक) तथा 7. सत्यलोक (ब्रह्मा धाम) |

2-सात अधोलोक है ...जो मूलाधार चक्र के अंदर विद्यमान रह है। यहाँ सूर्य का प्रकाश नही जाता, अतः काल दिन या रात में विभाजित नही है जिसके फलस्वरूप काल से उत्पन्न भय नही रहता |

2-1.अतल - मय दानव का पुत्र बल नाम का असुर जिसने 64 प्रकार की माया रचते रखी है |

2-2.वितल - स्वर्ण खानों के स्वामी भगवान् शिव अपने गणों, भूतों, तथा ऐसे ही अन्य जीवों के साथ रहते है और माता भवानी के साथ विहार करते हैं |

2-3.सुतल - महाराज विरोचन के पुत्र महाराज बलि आज भी श्री भगवान् की आराधना करते हुए निवास करते हैं तथा भगवान् महाराज बलि के द्वार पर गदा धारण किये खड़े रहते हैं |

2-4.तलातल - यह मय दानव द्वारा शासित है जो समस्त मायावियों के स्वामी के रूप में विख्यात है |

2-5.महातल - यह सदैव क्रुद्ध रहने वाले अनेक फनों वाले कद्रू की सर्प-संतानों का आवास है जिनमे कुहक, तक्षक, कालिय तथा सुषेण प्रमुख हैं |

2-6.रसातल - यहाँ दिति तथा दनु के आसुरी पुत्रों का निवास है, ये पणि, निवात-कवच, कालेय तथा हिरण्य-पुरवासी कहलाते हैं | ये देवताओं के शत्रु हैं और सर्पों के भांति बिलों में रहते हैं |

2-7.पाताल – यहाँ अनेक आसुरी सर्प तथा नागलोक के स्वामी रहते हैं, जिनमे वासुकी प्रमुख है | जिनमे से कुछ के पांच, सात, दस, सौ और अन्यों के हजार फण होते हैं | इन फणों में बहुमूल्य मणियाँ सुशोभित हैं जिनसे अत्यन्त तेज प्रकाश निकलता है | पाताल लोक के मूल में भगवान् अनन्त अथवा संकर्षण निवास करते हैं, जो सदैव दिव्य पद पर आसीन हैं तथा इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण किये रहते हैं | भगवान् अनन्त सभी बद्धजीवों के अहं तथा तमोगुण के प्रमुख देवता हैं तथा शिवजी को इस भौतिक जगत के संहार हेतु शक्ति प्रदान करते हैं |

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चक्रों के नाम>>> सम्बंधित >>> तत्व>>>> प्रतीक चिह्न >>>स्थित>>>लोक>>>देवता>>>प्राप्ति

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1-मूलाधार चक्र;- भौतिक>पृथ्वीतत्व>7 सूंडों वाला एक हाथी>जननेन्द्रिय और गुदा के बीच स्थित>भूः लोक(प्रथ्वी) >ब्रह्मा - शक्ति डाकिनी>Pure Concept

2-स्वाधिष्ठान चक्र;-प्राणाधार>जलतत्व>मगरमच्छ >उपस्थ में स्थित>भुवः लोक (वायु/राक्षस तथा भूत पिशाच)>विष्णु -शक्ति राकिनी>Faith

3-मणिपूर चक्र;-काम या विद्युत केंद्र>अग्नितत्व,>मेढ़ा >नाभिमंडल में स्थित>स्वः लोक/अन्तरिक्ष/ ध्रुवलोक>रूद्र - शक्ति लाकिनी>Devotion

4-अनाहद चक्र;-आदित्य केन्द्र >वायुतत्व,>हिरण>हृदय के पास स्थित>महर्लोक /आदित्य लोक >रुद्र -काकिनी शक्ति>Love

5-विशुद्धि चक्र;-चंद्र केन्द्र>आकाशतत्व> एक सफेद हाथी>कंठकूप में स्थित> जनः लोक/ चन्द्र लोक >सदाशिव -शक्ति शाकिनी>Surrender

6-आज्ञा चक्र;- नक्षत्र केन्द्र >प्रकाशतत्व >एक श्वेत शिवलिंगम् /शुद्ध मानव और दैवीय गुण>भ्रमध्य में स्थित >तपः लोक/ नक्षत्रलोक >ज्ञानदाता शिव -शक्ति हाकिनी >Solution

7-बिन्दु चक्र;-ब्रह्मा केन्द्र>दैवीय गुण>सिर के शीर्ष भाग पर केशों के गुच्छे के नीचे स्थित>सत्य लोक(ब्रह्मा धाम)

8-सहस्त्रार चक्र;-दिव्‍य>शिवतत्व>दैवीय>मस्तिष्क के शिखर पर स्थित/"ब्रह्म रन्ध्र” में स्थित>निर्गुण ब्रह्म ...कई विद्वान इसे चक्र नहीं मानते क्योंकि इसमें ईड़ा और पिंगला का प्रभाव नहीं पड़ता।

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ॐ हुम् विष्णवे नमः ...

1-"ह्रौं";-

"ह्रौं" शिव बीज । यह भगवान शिव का बीज मंत्र है। अकाल मृत्यु से रक्षा, रोग नाश, चहुमुखी विकास व मोक्ष की कामना के लिए श्वेत आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।इस बीज में ह्- शिव, औ- सदाशिव एवं बिंदु- दुखहरण है। इस बीज का अर्थ है- भगवान शिव मेरे दुख दूर करें।

2-हुम् ;- हुम् एक ध्वनि है जिसको mantra के अंत मे बोलने से हमारे आसपास एक कवच बन जाता है।हुम् का मतलब हमारी रक्षा हो।जब हम तांत्रिक प्रयोग या मंत्र करते है तो हमारी खुद की रक्षा करना भी जरूरी हो जाता है । 3-फट् ;- फट् शब्द का मतलब है बाण छोड़ना । किसी ध्येय को प्राप्त करने या किसी इन्सान को नज़र मे रख के कोई मंत्र पढ़ा जाता हो तो अंत मे फट् बोला जाता है ।फट् बोलने से वो मंत्र सीधा वो इन्सान या वस्तु की तरफ जाता है।अंत मे अगर ' हुम् फट् ' बोला जाय तो उसका मतलब है .... मैं अपनी रक्षा करते हुए उसकी तरफ ये मंत्र छोड़ता हूं ।

NOTE;-

जिसके अंत मे वषट और फट जैसे शब्द आते हो ऐसे मंत्र सावधानी पूर्वक करने चाहिए क्योंकि किसी का नुकसान करने वाले मंत्रो का रिएक्शन भी हो सकता है ।ध्यान रहे मंत्र में जहाँ पर फट् शब्द आता है वहा फट् बोलने के साथ-साथ 2 उँगलियों से दूसरे हाथ की हथेली पर ताली बजानी है।

हम जिस ब्रह्माण्ड में रहते है उसमे ओ३म् (ॐ) सर्वव्यापी है अर्थात सभी जगह व्याप्त है |ओ३म् (ॐ) के बिना इस संसार कि कल्पना भी नहीं कि जा सकती है |

3-ओ३म् किसी भी एक देव का नाम या संकेत नहीं है, अपितु हर धर्म को मानने वालों ने इसे अपने तरीके से प्रचलित किया है | जैसे ब्रह्मा-वाद में विश्वास रखने वाले इसे ब्रह्मा, विष्णु के सम्प्रदाय वाले वैष्णवजन इसे विष्णु तथा शैव या रुद्रानुगामी इसे शिव का प्रतीक मानते है और इसी तरीके से इसको प्रचलित करते है | परन्तु वास्तव में ओ३म् तीनों देवो का मिश्रित तत्त्व

है| ओ३म् (ॐ) शब्द में "अ" ब्रह्मा का पर्याय है, और इसके उच्चारण द्वारा हृदय में उसके त्याग का भाव होता है। "उ" विष्णु का पर्याय है, इसके उच्चारण द्वारा त्याग कंठ में होता है तथा "म" रुद्र का पर्याय है और इसके उच्चारण द्वारा त्याग तालुमध्य में होता है। इन तीनो देवों (त्रिदेवों) के संगम से यह ओ३म् (ॐ) बना है |

अद्वैत ब्रह्म मंत्र/NON DUALITY''OM'' MANTRA;-

1-ॐ सच्चिदएकम ब्रह्म ll

अथवा

2-ॐ सत्- चित् -एकम ब्रह्म ll Om Sachchidekam Brahma ll Or Om Sat- chit -ekam -Brahma ll मंत्र

''ॐ सत् चित् एकम ब्रह्म ''..यह ब्रह्म मंत्र ही है कुण्डलिनी जागरण का मंत्र ..

This mantra comprises of 5 words.. Om/ॐ - I am Sat/सत् -Truth/ Pure Chit /चित्- Spiritual mind stuff/Consciousness/शुद्ध चेतना Ekam /एकम - one, without a second/United साथ/एकजुट Brahma/ब्रह्म –This entire cosmos, with all of its contents/Supreme/सर्वोच्च ‘I am pure consciousness united with the supreme .

.....SHIVOHAM..... /