तीन एलिमेंट का महत्व-IN NUTSHELL

1-मनुष्य केवल दृश्य और अदृश्य पदार्थो का मेल है । फिर भी प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव, बर्ताव और कार्य भिन्न भिन्न होते है। इसका कारण है प्रकृति के तीन एलिमेंट ; जिनके कम और अधिक मात्रा के समन्वय से मनुष्य का स्वभाव बनता है।सांख्य दर्शन के अनुसार प्रत्येक तत्व का अपना गुण है। आकाश का गुण शब्द है। वायु का विकास आकाश से ही हुआ लेकिन आकाश बना रहा। उसके बाद वाले तत्वों में भी पूर्ववर्ती सभी तत्वों के गुण आये।कोई व्यक्ति जल-तत्व प्रधान है,कोई अग्नि-तत्व प्रधान है,तो कोई वायु-तत्व प्रधान है। हमारा स्वभाव और बर्ताव वैसा ही होगा जो अपरिवर्तिनीय है। हम इसे केवल विकृत ही कर सकते है ...परिवर्तित नही कर सकते। प्रत्येक मनुष्य अपने तत्व के अनुसार ही बर्ताव कर रहा है।परंतु हम परेशान हैं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है, उसने ऐसा क्यों किया था... । वास्तव में, प्रत्येक तत्व का एक पॉजिटिव है और एक नेगेटिव! उदाहरण के लिए अग्नि तत्व का सकरात्मक उदाहरण है अर्जुन और नकरात्मक उदाहरण है दुर्योधन। वायु तत्व का पॉजिटिव उदाहरण है युधिष्ठिर और नेगेटिव उदाहरण है शकुनी।जल तत्व का पॉजिटिव एग्जांपल है भीम और नेगेटिव एग्जांपल है दुशासन। माया षट चक्रों में ही चलती है। माया के 6 चक्रों को जाने बिना उसके 6 तत्व को स्वीकार किये बिना हम शिव तक नहीं पहुंच सकते।

2-यह कहना कि हमने किसी को माफ कर दिया है ;हमें अहंकार में फंसा देता है इसलिए हमें किसी भी एलिमेंट को उसी के स्वरूप में स्वीकार करना होगा। त्रिगुण ..जो वर्तमान में हैं, वही भविष्य में है,जो भविष्य में है, वही भूत में भी हैं। ये तीनों ही काल एक दूसरे के विरोधी हैं ,परन्तु आत्मतत्व स्वरुप से एक ही हैं। इसलिए एक उपासक के लिए अनिवार्य है कि वह सभी तीन तत्वों के मनुष्यो से अपना संतुलन बनाए। ऐसा करके ही हम भौतिक और आध्यात्मिक जगत दोनों में ही संतुलन स्थापित कर सकते हैं, सफलता प्राप्त कर सकते हैं ,शिवत्व तक पहुंच सकते हैं। शिव पर बेलपत्र और शमी पत्र चढ़ता है। बेलपत्र का अर्थ है..त्रिगुण को सम्मान देना। और शमी पत्र का अर्थ है..सभी छह एलिमेंट में सम हो जाना।सारी साधना का अर्थ ही है साम्यवस्था। ना बैरागी सफल है ना गृहस्थ और ना रागी सफल है ना बैरागी। सारी विधा साम्यावस्था की है।यदि जल तत्व पैर है ..आधार देता है तो अग्नि तत्व चेहरा है। वायु तत्व चेहरे और पैर दोनों को जोड़ता है तो आप हीं बताइए .. क्या बगैर तीनों के आप कुछ कर सकते हैं?बगैर तीनों के मिले किसी भी काम में सफलता नहीं मिल सकती।जहाँ भी परिवारों का विघटन हुआ अथार्त त्रिगुण के सांख्य का विघटन हुआ।

3-सभी दुखी हैं और दुखी ही रहेंगे जब तक अपना सांख्य पूरा नहीं कर लेंगे।तभी हम इस संसार में भी सफल हो सकते हैं और शिव शक्ति के उपासक भी बन सकते हैं ...निर्णय हमारा है।प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव, बर्ताव और कार्य अपने तत्व के अनुसार ही है;हमें ये स्वीकार करना होगा।और हम किसी का स्वभाव या बर्ताव बदल भी नहीं सकते। यहां तक ..हम अपने तत्व को भी नहीं बदल सकते हैं।प्रत्येक एलिमेंट की साधना भी तीन प्रकार की होती है।अथार्त साधना के दौरान की गति तीन तरह की होती है—(1) पक्षी गति.. एयर एलिमेंट (2) वानर गति... फायर एलिमेंट (3) पिपीलिका(चींटी ) गति....वाटर एलिमेंट।वास्तव में, अपने एलिमेंट के अनुसार व्यवहार करने से ही हमारी उन्नति हो सकती है। सत्य तो यह है कि हमारी मृत्यु के पश्चात भी हमारा एलिमेंट हमारी शरीर की राख में विद्यमान रहता हैं।और पुनर्जन्म होने पर भी वही एलिमेंट हमें प्राप्त होता है। सांख्य विकासवादी दर्शन है। प्रत्येक तत्व के दो रूप होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म। सूक्ष्म ही विकसित होकर स्थूल बनता है।

महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही सांख्य समझाया था। हमें यह भी समझना पड़ेगा कि शिव तक पहुंचने के लिए कोई भी डायरेक्ट सीधा/ मार्ग नहीं है। देवी शक्ति ही हमें उन तक पहुंचा सकती है ।परंतु देवी शक्ति भी हमें तभी पहुंचाती है जब हमारा कारण पर्सनल ना होकर जनकल्याण का होता है।वैष्णव पद्धति में षोडशोपचार पूजन होता है, लेकिन तंत्र में पंचोपचार पूजन होता है।फिर हम पांच तत्वों से त्रिगुण में फिर द्वैत में और अंत में हम अद्वैत तक पहुंच जाते हैं। वैष्णव पद्धति हमें स्थूल का ज्ञान करा देती है ओर तंत्र हमें सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अथार्त 5 से 3; फिर 3 से 2 और अंत में अद्वैत की ओर ले जाता हैं।

..SHIVOHAM...