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ज्ञानगंगा -PART-02

1-ये सारा संसार एक मैराथन रेस की तरह है, यहाँ पर हर मनुष्य दौड़ रहा है।मगर फर्क इतना है जो अपनी मंजिल जानता है और उसकी ओर भाग रहा है ..वो एक दिन मंजिल पर पहुंच जायेगा।और जो बिना किसी लक्ष्य के, मंजिल को बिना पहचाने ही भाग रहा है वो बस भागता ही रहता है ।

2-महर्षि दधीची कहते है,, मैंने पूरे भाव और एकाग्रता से लोहितांग को 'ॐ ' का और बारह ज्योतिर्लिंग का ज्ञान दिया।मगर एक भक्त उस ज्ञान से क्या सीखता और लोहितांग ने क्या सीखा... वो तुम्हारे सामने है।ज्ञान वही है.. पर एक भक्त के लिए और लोहितांग के लिए बहुत अलग मतलब है।बल्कि लोहितांग ने उस ज्ञान का दुरूपयोग किया ;जबकि कोई भक्त उसी ज्ञान से अपने जीवन को धन्य कर लेता है।


3-हमारा शरीर एक यन्त्र है, इसका अध्यन करो और एकाग्र हो जाओ।जिस तरह तीन तत्व हैँ...अग्नि, जल, वायु।अगर आप सिर्फ अपने हाथ को ही अग्नि मे डालते है और वो अग्नि आपके पूरे शरीर को महसूस होती है।आप जल का एक घूंट पीते है और पूरा शरीर तृप्त हो उठता है।आप एक साँस लेते हैँ और पूरे शरीर को जीवन मिल जाता है।इनमे किसी एक चीज पर अपने आपको टिका देने पर आप एकाग्र होना सीख जाते हैँ।

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