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इटावा में है महाभारतकालीन मंदिर...

कालीवाहन मंदिर इटावा ;-



03 FACTS;-

1-महाभारत कालीन सभ्यता से जुडे उत्तर प्रदेश मे यमुना नदी के किनारे मा काली का एक ऐसा मंदिर है जिसके बारे जनश्रुति है कि इस मंदिर मे महाभारत काल का अमर पात्र अश्वश्थामा अदृश्य रूप मे आकर सबसे पहले पूजा करता है। यह मंदिर इटावा मुख्यालय से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है इस मंदिर का नवरात्रि के मौके पर खासा महत्व हो जाता है।

2-काली वाहन मंदिर शक्ति मत में दुर्गा.पूजा के प्राचीनतम स्वरूप की अभिव्यक्ति है इटावा कालीवाहन मन्दिर। मार्कण्डेय पुराण एवं अन्य पौराणिक कथानकों के अनुसार दुर्गा जी प्रारम्भ में काली थी। एक बार वे भगवान शिव के साथ आलिगंनबद्ध थीं तो शिवजी ने परिहास करते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे श्वेत चंदन वृक्ष में काली नागिन लिपटी हुई हो। पार्वती जी को क्रोध आ गया और उन्होंने तपस्या के द्वारा गौर वर्ण प्राप्त किया। महाभारत में उल्लेख है कि दुर्गाजी ने जब महिषासुर तथा शुम्भ.निशुम्भ का वध कर दिया तो उन्हें काली कराली कल्यानी आदि नामों से भी पुकारा जाने लगा।

3-कालीवाहन मंदिर श्रद्धा का केन्द्र है। महाभारत कालीन सभ्यता से जुड़े यह ऐसा मंदिर है, जिसके बारे में जनश्रुति है कि इस मंदिर में महाभारत काल का अमर पात्र अश्वत्थामा अदृश्य रूप में आकर सबसे पहले पूजा करता है। कहते हैं कि प्रात: काल जब भी मंदिर का गर्भगृह खोला जाता है तो मूर्तियां पूजित मिलती हैं। इटावा के गजेटियर में इसे काली भवन का नाम दिया गया है। इष्टम अथार्त शैव क्षेत्र होने के कारण इटावा में शिव मंदिरों के साथ दुर्गा के मंदिर भी बड़ी संख्या में हैं। महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती की प्रतिभाएं मंदिर में विराजमान हैं, डाकुओं पर बनी कई फिल्मों की शूटिंग इस मंदिर परिसर में हो चुकी है।

पांडवकालीन धूमेश्वर महादेव मंदिर;-


04 FACTS;-

1- साधना के प्राचीन केंद्रों में शुमार पांडवकालीन धूमेश्वर महादेव मंदिर सदियों से शिव साधना के प्राचीन केंद्र के रूप में विख्यात रहा है।महाभारतकालीन इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग की स्थापना पांडवों के गुरु महर्षि धौम्य ने की थी। जिस स्थान पर मंदिर बना है यह स्थान धौम्य ऋषि की साधना स्थली थी। धूमेश्वर महादेव मंदिर यमुना नदी के किनारे छिपैटी घाट पर बना हुआ है। शिव आदिदेव हैं। भारतीय धर्म-दर्शन में शिव-पार्वती को समस्त विश्व का माता-पिता माना गया है।। 2-श्रीमद्भागवत के अलावा अन्य धार्मिक ग्रंथों में महर्षि धौम्य की विस्तार से चर्चा की गई है। इन्हीं ग्रंथों के आधार पर महर्षि धौम्य का आश्रम पावन यमुना नदी के किनारे बताया गया है।महर्षि धौम्य का आश्रम महाभारतकालीन पांचाल क्षेत्र का सबसे बड़ा अध्ययन केंद्र था। यहां दूर-दूर से विद्यार्थी और राजघराने के राजकुमार शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। यहां पर महर्षि के प्रिय शिष्य आरुणि तथा उपमन्यु ने अपने ज्ञान का विस्तार किया था। ये दोनों शिष्य भगवान शंकर के प्रिय भक्त थे। महर्षि धौम्य ने अपने प्रिय शिष्यों के लिए साधना द्वारा शिवलिंग प्रकट किया था और यही शिवलिंग आज 'धूमेश्वर महादेव' के नाम से जाना जाता है। 3-किसी समय इटावा 'इष्टिकापुरी' के नाम से प्रसिद्ध था। इटावा पांचाल क्षेत्र के तहत आता है इसलिए महर्षि धौम्य ने यहां अपनी साधना का केंद्र बनाया था। यहीं पर वे साधना में लीन रहते थे और अपनी तपस्या के बल पर उन्होंने अपने शिष्यों के लिए शिवलिंग की स्थापना की थी।मंदिर की विशेषता यह है कि जहां अन्य शिव मंदिरों में भगवान का पूरा परिवार रहता है, वहीं यहां पर सिर्फ शिवलिंग ही स्थापित है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि भगवान शंकर, भगवान कृष्ण व पांडव भी महर्षि धौम्य के आश्रम में आए थे और इन सभी ने कुछ दिनों तक यहां पर विश्राम भी किया था।

4-धूमेश्वर महादेव मंदिर के महंत विजय गिरि का कहना है कि मंदिर परिसर में ही महर्षि धौम्य की पावन समाधि बनी हुई है। 7 पीढ़ियों से उनके परिवार के लोग मंदिर की देखरेख कर रहे हैं, क्योंकि परिवार के लोग दशनामी जूना अखाड़ा से जुड़े हुए

हैं। उन्होंने बताया कि पहले सिर्फ शिवलिंग व महर्षि धौम्य की समाधि थी, जब सुमेर सिंह किले का निर्माण हुआ उसी समय

राजा सुमेर सिंह ने मंदिर व यमुना के किनारे अन्य घाटों का भी निर्माण कराया है।धौम्य ऋषि के आश्रम में श्रुति, स्मृति व पारायण शैली की शिक्षा दी जाती थी लेकिन उन्होंने अपने शिष्यों को ताड्‍पत्रों व भोजपत्रों पर विभिन्न विषयों के ग्रंथों को लिपिबद्ध कराया था। इस आश्रम में कई यज्ञशालाएं भी थीं जिनमें प्रतिदिन यज्ञ होते थे। मान्यता है कि आज भी इस तपोभूमि में यज्ञ करने वालों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

इटावा का श्री हजारी महादेव मंदिर सरसई;-

03 FACTS;-

1-इटावा का श्री हजारी महादेव मंदिर सरसई.. अपने अंतस में अनेक चमत्कारिक घटनाओं को समेटे है।समझा जाता है कि वनवास काल में पांडव माता कुंती के साथ इस क्षेत्र में आए थे। उन्हीं के द्वारा हजारी महादेव के दिव्य शिवलिंग की स्थापना की गई थी। यहां से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थिति कुंइता गांव का नाम कुंती के नाम पर बताया जाता है। मंदिर का निर्माण कब हुआ यह तो किसी को नहीं मालूम लेकिन एक किवदंती यहां प्रचलित है। जिसके अनुसार एक गोपालदास नाम के सिद्ध पुरुष गांव में आये थे। जिन्होंने इस स्थान पर शिवलिंग देखा और यही ठहर गये। उन्होंने इस मंदिर

के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

2-कहा जाता है कि मंदिर का वर्तमान स्वरूप उन्हीं ने निर्मित कराया। निर्माण के समय बाबाजी शिवलिंग के समीप बने एक कुंड में जाते थे और दीवारों को थपथपाते थे तो पैसे गिरने लगते थे। जिससे वह मजदूरी देते थे। मंदिर में वह कुंड आज भी बना हुआ है। मान्यता है कि उसी दौर में इस मंदिर में एक हजार शिवलिंग स्थापित कराये गये। तभी से इसका नाम हजारी

महादेव मंदिर पड़ गया।संत गोपालदास ने जब समाधि ली तो उनके शिष्यों ने मंदिर के प्रवेश द्वार पर समाधि बनवायी। कुछ दिनों बाद उस स्थान पर एक पीपल का पेड़ खड़ा हो गया। आज भी यह पीपल हरा भरा खड़ा है। हजारों साल बाद भी इस पीपल की लंबाई मात्र 10 फीट है। स्वयंभू शिवलिंग भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाले माने जाते हैं।

3-हर वर्ष महाशिवरात्रि पर लगभग 50 हजार शिव भक्त यहां कांवर चढ़ाते हैं। दूर दूर से लोग महाशिवरात्रि का पर्व यहां मनाने आते हैं।कहा जाता है कि एक बार एक शिव भक्त कांवर लेकर आ रहा था। रास्ते में उसका पेट खराब हो गया और मल त्याग हो गया। साथ में आ रहे अन्य कांवरियों ने उसे अपने समूह से अलग कर दिया लेकिन वह कांवर लिये उसी मनोयोग से सीधा चला आया। जब वह हजारी महादेव मंदिर पर आया तो लाइन लगी थी। अचानक एक आवाज आयी कि सबसे पहले हग्गा कांवर चढ़ायेगा। लोगों ने पीछे मुड़कर पूछा तो वही व्यक्ति आया और उसने अपनी कांवर चढ़ायी। आशय यह है कि सच्चे मन से आराधना करने वाले के लिए इस मंदिर के द्वार कभी बंद नहीं हुए।

...SHIVOHAM...