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क्या है 64 योगिनी रहस्य ?क्या महत्व हैं चौंसठ योगिनी /चौसठ शक्ति तत्व विशेष साधना का ?

योगिनी साधना;- 05 FACTS;- 1-योगिनी साधना एक बहुत ही प्राचीन तंत्र विद्या की विधि है।इसमें सिद्ध योगिनी या सिद्धि दात्री योगिनी की आराधना की जाती है । इस विद्या को कुछ लोग द्वितीय दर्जे की आराधना मानते हैं क्योंकि दुरुपयोग होने पर अनिष्ट होने की आशंका रहती है।माँ शक्ति के भक्तों को योगिनी साधना से बहुत जल्द और काफी उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त होते हैं। इस साधना को करने वाले साधक की प्राण ऊर्जा में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होती है।माँ की कृपा से भक्त के जीवन की सारी मुश्किलें हल हो जाती हैं और उसके घर में सुख और सम्रद्धि का आगमन हो जाता है. 2-जब भाग्यवश काफी प्रयासों के बाद भी कोई काम नहीं बन रहा है या प्रबल शत्रुओं के वश में होकर जीवन की आशा छोड़ दी हो तो इस साधना से इन सभी कष्टों से सहज ही मुक्ति पाई जा सकती है। इस साधना के द्वारा वास्तु दोष, पितृदोष, कालसर्प दोष तथा कुंडली के अन्य सभी दोष बड़ी आसाना से दूर हो जाते हैं। इनके अलावा दिव्य दृष्टि (किसी का भी भूत, भविष्य या वर्तमान जान लेना) जैसी कई सिद्धियां बहुत ही आसानी से साधक के पास आ जाती है।परन्तु इन सिद्धियों का भूल कर भी दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। अन्यथा अनिष्ट होने की आशंका रहती है। 3-अष्ट या चौंसठ योगिनियों आदिशक्ति मां काली का अवतार है। घोर नामक दैत्य के साथ युद्ध करते हुए माता ने ये अवतार लिए थे। यह भी माना जाता है कि ये सभी माता पर्वती की सखियां हैं। इन चौंसठ देवियों में से दस महाविद्याएं और सिद्ध विद्याओं की भी गणना की जाती है। ये सभी आद्या शक्ति काली के ही भिन्न-भिन्न अवतारी अंश हैं।समस्त योगिनियों का संबंध मुख्यतः काली कुल से हैं और ये सभी तंत्र तथा योग विद्या से घनिष्ठ सम्बन्ध रखती हैं। समस्त योगिनियां अलौकिक शक्तिओं से सम्पन्न हैं तथा इंद्रजाल, जादू, वशीकरण, मारण, स्तंभन इत्यादि कर्म इन्हीं की कृपा द्वारा ही सफल हो पाते हैं।मुख्य रूप से योगिनियां अष्ट योगिनी तथा चौसठ योगिनी के नाम से जानी जाती हैं, जो अपने गुणों तथा स्वभाव से भिन्न-भिन्न रूप धारण करती हैं। 4-आदिशक्ति का सीधा सा सम्बन्ध है इस शब्द का जिसमे प्रकृति या ऐसी शक्ति का बोध होता जो उत्पन्न करने और पालन करने का दायित्व निभाती है जिसने भी इस शक्ति की शरणमें खुद को समर्पित कर दिया उसे फिर किसी प्रकार कि चिंताकरने कि कोई आवश्यकता नहीं वह परमानन्द हो जाता है चौंसठ योगिनियां वस्तुतः माता आदिशक्ति कि सहायक शक्तियों के रूप में मानी जाती हैं । जिनकी मदद से माता आदिशक्ति इस संसार का राज काज चलाती हैं एवं श्रृष्टि के अंत काल में ये मातृका शक्तियां वापस माँ आदिशक्ति में पुनः विलीन हो जाती हैं और सिर्फ माँ आदिशक्ति ही बचती हैं फिर से पुनर्निर्माण के लिए । 5-इस मृत्यु लोक में मातृ शक्ति के जितने भी रूप विदयमान हैं सब एक ही विराट महामाया आद्यशक्ति के अंग,भाग , रूप हैं साधकों को वे जिस रूप की साधना करते हैं उस रूप के लिए निर्धारित व्यवहार और गुणों के अनुरूप फल प्राप्त होता है। चौंसठ योगिनियां वस्तुतः माता दुर्गा कि सहायक शक्तियां है जो समय समय पर माता दुर्गा कि सहायक शक्तियों के रूप में काम करती हैं। समस्त योगिनियां अलौकिक शक्तिओं से सम्पन्न हैं तथा इंद्रजाल, जादू, वशीकरण, मारण, स्तंभन इत्यादि कर्म इन्हीं की कृपा द्वारा ही सफल हो पाते हैं। एवं दुसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो यह मातृका शक्तियां तंत्र भाव एवं शक्तियोंसे परिपूरित हैं और मुख्यतः तंत्र ज्ञानियों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र हैं । क्या महत्व हैं चौंसठ योगिनी का ?- 06 FACTS;- 1-64 योगिनियों के भारत में पांच प्रमुख मंदिर है। दो ओडिशा में तथा तीन मध्यप्रदेश में।उड़ीसा में भुवनेश्वर के निकट हीरापुर तथा बोलनगीर के निकट रानीपुर में हैं।मध्यप्रदेश में एक मुरैना जिले के थाना थाना रिठौराकलां में ग्राम पंचायत मितावली में है। इसे 'इकंतेश्वर महादेव मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है। दूसरा मंदिर खजूराहो में स्थित है। 875-900 ई. के आसपास बना यह मंदिर खजुराहो के मंदिरों के पश्चिमी समूह में आता है। तीसरा जबलपुर के निकट भेड़ाघाट में हैं। 2-ये मंदिर लम्बे वक्त से परित्यक्त हैं जिनके कारण आज भी रहस्य बने हुए हैं।कहीं शिव जी तथा भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा बढऩे से इन मंदिरों में सहज रूप से अवनति तो नहीं आ गई थी? इसका कारण ब्रह्मचारी पुरुषों के वर्चस्व वाले वेदांतिक आश्रमों का दबाव तो नहीं था? कहीं ऐसा मुस्लिम आक्रमणकारियों की वजह से तो नहीं हुआ था? इनमें अफगान सेनापति काला पहाड़ भी एक था जिसने उड़ीसा पर हमला करके इसके अधिकतर स्मारकों को तबाह कर दिया था। असलियत न जाने क्या थी क्योंकि इन कारणों के बारे में हम कल्पना ही कर सकते हैं।हालांकि, पुरातत्वविदों ने इन मंदिरों की खोज और जीर्णोद्धार गत एक सदी के दौरान ही किया। 3-इन मंदिरों के देवी-देवताओं के बारे में संस्कृत लेख अस्पष्ट हैं। इनमें नामों की कई सूचियां, अनुष्ठानों का जिक्र है लेकिन पौराणिक कथाएं नहीं हैं, केवल युद्ध पर निकलीं दुर्गा और काली मां की कहानियां हैं।आमतौर पर हिन्दू मंदिर वर्गाकार होते हैं और इनका विन्यास रेखीय होता है। अधिकतर मंदिरों में ईश्वर का मुख पूर्व दिशा की ओर होता है। दूसरी ओर गोलाकार योगिनी मंदिरों में ईश्वर का मुंह हर दिशा की ओर होता है। हालांकि, कुएं जैसी इन संरचनाओं का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर ही है। 4-मंदिरों की आम पहचान गुम्बद या विमान इनमें नहीं हैं। वास्तव में इन मंदिरों की तो छत ही नहीं है। उड़ीसा के हीरापुर तथा रानीपुर के योगिनी मंदिरों की अंदरूनी दीवारों पर योगिनियों की प्रतिमाएं हैं, सभी का मुंह केंद्र में बने मंदिर की ओर है।मध्यप्रदेश के भेड़ाघाट और मितावली मंदिरों में सभी योगिनियों के अलग-अलग मंदिर हैं जिनकी छतें तो हैं परंतु वे सभी गोलाकार प्रांगण की ओर खुलते हैं। योगिनियों की प्रतिमाएं हीरापुर, रानीपुर तथा जबलपुर के मंदिरों में अच्छी हालत में हैं। 5-खजुराहो के मंदिर में केवल तीन प्रतिमाएं बची हैं जबकि मौरेना के मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। कहीं उन्हें हटा कर शिवलिंगों से तो नहीं बदल दिया गया? शायद कोई नहीं जानता।हीरापुर में योगिनी प्रतिमाओं में महिलाओं को विभिन्न दशाओं में प्रदर्शित किया गया है। कुछ नृत्य कर रही हैं, कुछ धनुष-बाण से शिकार कर रही हैं, कुछ संगीत वादन कर रही हैं, कुछ खून अथवा मदिरा पी रही हैं, कुछ हाथों में छानना लेकर घरेलू कामकाज कर रही हैं। अधिकतर ने खूब आभूषण पहने हैं और उनके केश भी सुंदर सज्जित हैं। 6-अन्यों के सिर सर्प, भालू, शेर या हाथी के हैं जो इंसानी मस्तक, नर देहों, कौओं, मुर्गों, मोरों, बैलों, भैंसों, गधों, शूकरों, बिच्छुओं, केकड़ों, ऊंटों, कुत्तों, जल पर अथवा अग्नि के मध्य खड़ी हैं।इनमें से कुछ पहचानी जा सकती हैं जैसे चामुंडा, वीणाधारी सरस्वती, कलश धारी लक्ष्मी और नरसिम्ही व वाराही जैसे विष्णु भगवान के स्त्री रूप के अलावा इंद्राणी। इतना तो स्पष्ट है कि योगिनियां जीवन से परिपूर्ण हैं।यदि योगी जीवन से दूर होते हैं तो योगिनी जीवन को अपनाती है। योगी अमरता की चाह रखता है तो योगिनी को मृत्यु से भय नहीं। यदि योगी इच्छाओं पर काबू पाना चाहता है तो योगिनी सभी इच्छाओं को आजाद करने में विश्वास रखती है। क्या महत्व हैं चौंसठ का? चौंसठ ही क्यों?- 02 FACTS;- 1-इसके बारे में भी हम कल्पना ही कर सकते हैं। शायद यह उन चौंसठ कलाओं की ओर इशारा हो जिनमें अप्सराएं व प्राचीन काल की गणिकाएं पारंगत थीं। हो सकता है कि इनका अर्थ और भी गूढ़ हो और ये दिन के आठ प्रहरों को प्रदर्शित करते हों या भारत में इजाद किए गए शतरंज के खेल की आठ दिशाओं को।इन सभी गोलाकार संरचनाओं के बीचों-बीच केंद्रीय मंदिर हैं।हीरापुर में केंद्रीय संरचना एक मंडप जैसी है जो आकाश की ओर खुली है। इसकी चार दीवारों पर चार भैरवों तथा चार योगिनियों की प्रतिमाएं हैं। 2-रानीपुर में केंद्रीय मंदिर में शिव के क्रोधी स्वरूप भैरव की तीन मस्तक वाली प्रतिमा है। मोरैना में लिंग बना है। भेड़ाघाट वाले मंदिर के केंद्र में असाधारण रूप से नंदी पर बैठे शिव-पार्वती की प्रतिमा है।आमतौर पर शिव मंदिरों में शिव जी के सम्पूर्ण स्वरूप नहीं, उनके प्रतीकों (शिवलिंग) की ही पूजा की जाती है।तांत्रिक परम्पराओं में जब समूह रूप में देवी प्रदर्शित होती हैं, चाहे पंक्ति में हों या गोलाकार, उनके साथ एक भैरव को अक्सर उग्र रूप में दिखाया जाता है। एक रक्षक तथा प्रेमी के रूप में वह उनके साथ होते हैं। महिलाएं उन्हें गोल घेरे होती हैं।कहीं यह प्रकृति का चित्रण तो नहीं है जहां प्रत्येक कोख पवित्र है ;क्या दुनिया को त्याग देने वाले योगी पर स्त्रीत्व को स्वीकार करने का जोर डाला जा रहा है? हम ऐसी कोई भी कल्पना कर सकते हैं चौसठ योगिनी मंदिर...मुरैना 03 FACTS;- 1-भारत में चार चौसठ योगिनी मंदिर हैं, जो दो ओडिशा और दो मध्य प्रदेश में हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के मुरैना में स्थित चौसठ योगिनी मंदिर सबसे प्रमुख और प्राचिन है। यह भारत के उन चौसठ योगिनी मंदिरों में से एक है जो अभी भी अच्छी दशा में बचे हैं। यह मंदिर तंत्र-मंत्र के लिए काफी प्रसिद्ध था, इसलिए इस मंदिर को तांत्रिक यूनिवर्सिटी भी कहा जाता था। यहां देश-विदेश से लाखों तांत्रिक तंत्र-मंत्र जानने आते थे।विदेशी नागरिक भी यहां तंत्र-मंत्र की विद्याएं हासिल करने आते थे। आज भी कुछ तांत्रिक, सिद्धियां प्राप्त करने के लिए यज्ञ करते हैं। 2-भारत मंदिरों का देश है। हम मूर्ति पूजा में विश्वास रखनेवाले लोग हैं। हम मानते हैं कि स्वयं ईश्वर ने भारतवर्ष की इस पावन धरती पर अवतार लिया है। भारतीय ज्योतिष और धर्म विज्ञान में तंत्र का बहुत महत्व है। मध्य प्रदेश के मुरैना में एक ऐस मंदिर स्थित हैं, जो न केवल तंत्र विद्या की यूनिवर्सिटी कहलाता है बल्कि देश के संसद भवन का निर्माण भी इसी की बनावट से प्रभावित होकर किया गया है। 3-यह मंदिर एक वृत्तीय आधार पर निर्मित है और इसमें 64 कमरे हैं। हर कमरे में एक-एक शिवलिंग बना हुआ है। मंदिर के मध्य में एक खुला हुआ मण्डप है, जिसमें एक विशाल शिवलिंग है। यह मंदिर 1323 ई में बना था। इस मंदिर का निर्माण क्षत्रिय राजाओं ने कराया था। चौसठ योगिनी मंदिर के बारे में खास बातें;- 04 FACTS;- 1-मंदिर के मध्य में है खुला मण्डप;- शानदार वास्तुकला और बेहद खूबसूरती से बनाए गए इस मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 200 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। 200 सीढ़ियां चढ़ने के बाद चौसठ योगिनी मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। यह मंदिर एक वृत्तीय आधार पर निर्मित है और इसमें 64 कमरे हैं। हर कमरे में एक-एक शिवलिंग बना हुआ है। मंदिर के मध्य में एक खुला हुआ मण्डप है, जिसमें एक विशाल शिवलिंग है। यह मंदिर 1323 ई में बना था। इस मंदिर का निर्माण क्षत्रिय राजाओं ने करवाया था। 2-इसलिए पड़ा चौसठ योगिनी मंदिर;- हर कमरे में शिवलिंग के साथ देवी योगिनी की मूर्ति साथ थीं। लेकिन कुछ मूर्तियां चोरी हो गईं, जिसकी वजह से अब मूर्तियों को दिल्ली के संग्राहलय में रखा गया है। इसी वजह से इसी मंदिर का नाम चौसठ योगिनी मंदिर पड़ा। यह मंदिर में 101 खंभों पर टिका हुआ है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस मंदिर को प्राचीन ऐतिहसिक स्मारक घोषित किया है। 3-मंदिर की तर्ज पर है संसद का निर्माण;- ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस ने इस मंदिर को आधार मनाकर दिल्ली के संसद भवन का निर्माण करवाया था। जिसकी चर्चा ना तो किताबों में कहीं है और ना ही संसद की वेबसाइट पर है। संसद भवन न केवल बाहर से इस मंदिर की तरह दिखता है बल्कि अंदर से खंभों का ढांचा भी वैसा ही जैसा इस मंदिर के खंभों का। 4-चौसठ योगिनियों को किया जाता है जागृत;- स्थानिय निवासी आज भी मानते हैं कि यह मंदिर आज भी शिव की तंत्र साधना के कवच से ढका हुआ है। यहां आज भी रात में रुकने की इजाजत नहीं है, ना तो इंसानों को और ना ही पंक्षी को। तंत्र साधना के लिए मशहूर इस मंदिर में शिव की योगनियों को जागृत किया जाता था।कहा जाता है कि यह मंदिर तंत्र साधना का भव्य आधार था। यहां भगवान शिव की साधना मां काली के साथ कर योगनियों को जागृत किया जाता था। आज भी स्थानीय निवासी यहां रात में न रूकने की सलाह देते हैं। आज भी कुछ तांत्रिक, सिद्धियां प्राप्त करने के लिए यहां यज्ञ करते हैं। इस मंदिर को इकंतेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। “चौंसठ योगिनी मंदिर” जबलपुर;- 05 FACTS;- 1- जबलपुर का “चौंसठ योगिनी मंदिर” सुप्रसिद्ध पर्यटन स्थल भेड़ाघाट व धुआंधार जलप्रपात के नजदीक एक ऊंची पहाड़ी के शिखर पर स्थापित है। पहाड़ी के शिखर पर होने के कारण यहां से काफ़ी बड़े भू-भाग व बलखाती नर्मदा नदी को निहारा जा सकता है। ”चौंसठ योगिनी मंदिर” को दसवीं शताब्दी में कलचुरी साम्राज्य के शासकों ने मां दुर्गा के रूप में स्थापित किया था। लोगों का मानना है कि यह स्थली महर्षि भृगु की जन्मस्थली है, जहां उनके प्रताप से प्रभावित होकर तत्कालीन कलचुरी साम्राज्य के शासकों ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। 2-इस मंदिर की विषेशता इसके बीच में स्थापित भगवान शिव की प्रतिमा है, जो कि 64 देवियों की प्रतिमा से घिरा हुआ है। इस मंदिर का निर्माण सन् 1000 के आसपास “कलीचुरी वंश” ने करवाया था। योगिनी साधना के अंतर्गत देवी के चौसठ रूपों की आराधना की जाती है। इसके करने से साधक अपने जीवन के सभी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। 3-मंदिर के सैनटोरियम में “रानी दुर्गावती” की मंदिर की यात्रा से संबंधित एक शिलालेख भी देखा जा सकता है। यहां एक सुरंग भी है जो “चौंसठ योगिनी मंदिर” को गोंड रानी दुर्गावती के महल से जोड़ती है। यह मंदिर एक विशाल परिसर में फैला हुआ है और इसके हर एक कोने से भव्यता झलकती है।वर्तमान में मंदिर के अंदर भगवान शिव व मां पार्वती की नंदी पर वैवाहिक वेशभूषा में बैठे हुए पत्थर की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के चारों तरफ़ करीब 10 फुट ऊंची गोलाई में चारदीवारी बनाई गई है, जो पत्थरों की बनी है तथा मंदिर में प्रवेश के लिए केवल एक तंग द्वार बनाया गया है। 4-चारदीवारी के अंदर खुला प्रांगण है, जिसके बीचों-बीच करीब 2-3 फुट ऊंचा और करीब 80-100 फुट लंबा एक चबूतरा बनाया गया है। चारदीवारी के साथ दक्षिणी भाग में मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर का एक कक्ष जो सबसे पीछे है, उसमें शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित है। इसके आगे एक बड़ा-सा बरामदा है, जो खुला है। बरामदे के सामने चबूतरे पर शिवलिंग की स्थापना की गई है, जहां पर भक्तजन पूजा-पाठ करवाते हैं। 5-मंदिर की चारदीवारी जो गोल है, उसके ऊपर मंदिर के अंदर के भाग पर चौंसठ योगिनियों की विभिन्न मुद्राओं में पत्थर को तराश कर मूर्तियां स्थापित की गई हैं। लोगों का मानना है कि ये सभी चौंसठ योगिनी बहनें थीं तथा तपस्विनियां थीं, जिन्हें महाराक्षसों ने मौत के घाट उतारा था। राक्षसों का संहार करने के लिए यहां स्वयं दुर्गा को आना पड़ा था। इसलिए यहां पर सर्वप्रथम मां दुर्गा की प्रतिमा कलचुरी के शासकों द्वारा स्थापित कर दुर्गा मंदिर बनाया गया था तथा उन सभी चौंसठ योगिनियों की मूर्तियों का निर्माण भी मंदिर प्रांगण की चारदीवारी पर किया गया। कालांतर में मां दुर्गा की मूर्ति की जगह भगवान शिव व मां पार्वती की मूर्ति स्थापित की गई है, ऐसा प्रतीत होता है। 64 योगिनियों की साधना;- 03 FACTS;- 1-64 योगिनियों की साधना सोमवार अथवा अमावस्या/ पूर्णिमा की रात्रि से आरंभ की जाती है। साधना आरंभ करने से पहले स्नान-ध्यान आदि से निवृत होकर अपने पितृगण, इष्टदेव तथा गुरु का आशीर्वाद लें। तत्पश्चात् गणेश मंत्र तथा गुरुमंत्र का जप किया जाता है ताकि साधना में किसी भी प्रकार का विघ्न न आएं।इसके बाद भगवान शिव का पूजा करते हुए शिवलिंग पर जल तथा अष्टगंध युक्त अक्षत (चावल) अर्पित करें। इसके बाद आपकी पूजा आरंभ होती है। अंत में जिस भी योगिनि को सिद्ध करना चाहते हैं, उसके मंत्र की कम से कम एक माला (108 मंत्र) अथवा ग्यारह माला (1100 मंत्र) जप करें। 2-प्रमुख रूप से आठ योगिनियां हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं:- 1.सुर-सुंदरी योगिनी, 2.मनोहरा योगिनी, 3. कनकवती योगिनी, 4.कामेश्वरी योगिनी, 5. रति सुंदरी योगिनी, 6. पद्मिनी योगिनी, 7. नतिनी योगिनी और 8. मधुमती योगिनी। 3-चौंसठ योगिनियों के नाम :- 1.बहुरूप, 3.तारा, 3.नर्मदा, 4.यमुना, 5.शांति, 6.वारुणी 7.क्षेमंकरी, 8.ऐन्द्री, 9.वाराही, 10.रणवीरा, 11.वानर-मुखी, 12.वैष्णवी, 13.कालरात्रि, 14.वैद्यरूपा, 15.चर्चिका, 16.बेतली, 17.छिन्नमस्तिका, 18.वृषवाहन, 19.ज्वाला कामिनी, 20.घटवार, 21.कराकाली, 22.सरस्वती, 23.बिरूपा, 24.कौवेरी, 25.भलुका, 26.नारसिंही, 27.बिरजा, 28.विकतांना, 29.महालक्ष्मी, 30.कौमारी, 31.महामाया, 32.रति, 33.करकरी, 34.सर्पश्या, 35.यक्षिणी, 36.विनायकी, 37.विंध्यवासिनी, 38. वीर कुमारी, 39. माहेश्वरी, 40.अम्बिका, 41.कामिनी, 42.घटाबरी, 43.स्तुती, 44.काली, 45.उमा, 46.नारायणी, 47.समुद्र, 48.ब्रह्मिनी, 49.ज्वाला मुखी, 50.आग्नेयी, 51.अदिति, 51.चन्द्रकान्ति, 53.वायुवेगा, 54.चामुण्डा, 55.मूरति, 56.गंगा, 57.धूमावती, 58.गांधार, 59.सर्व मंगला, 60.अजिता, 61.सूर्यपुत्री 62.वायु वीणा, 63.अघोर और 64. भद्रकाली। 8 योगिनियों के 8 चमत्कारी मंत्र ;- योगिनियों की सिद्धि के बारे में केवल एक बात ही उनकी महत्ता दर्शाती है कि धनपति कुबेर उनकी कृपा से ही धनाधिपति हुए थे। इनको प्रसन्न करने से राज्य तक प्राप्त किया जा सकता है।अष्ट योगिनियों में से कोई एक साधना गुरु के मार्गदर्शन में कर अपनी हर मनोकामना पूर्ण की जा सकती है। ये भी मुख्यत: 8 होती हैं तथा मां, बहन तथा भार्या के रूप में सर्वस्व देती हैं। इनकी साधना सावधानी भी मांगती है। पत्नी के रूप में साधना करने से अपनी पत्नी का सुख नहीं रहता है। अतिरेक करने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है। ये योगिनियां निम्नलिखित हैं- (1) सुर-सुंदरी योगिनी;- अत्यंत सुंदर शरीर सौष्ठव अत्यंत दर्शनीय होता है। 1 मास तक साधना की जाती है। प्रसन्न होने पर सामने आती हैं तथा माता, बहन या पत्नी कहकर संबोधन करें। राज्य, स्वर्ण, दिव्यालंकार तथा दिव्य कन्याएं तक लाकर देती हैं। सभी कामनाएं पूर्ण करती हैं। अन्य स्त्रियों पर आसक्त साधक को समूल नष्ट करती हैं। मंत्र- 'ॐ ह्रीं आगच्छ सुरसुंदरि स्वाहा।' (2) मनोहरा योगिनी;- विचित्र वेशभूषा वाली अत्यंत सुंदर, शरीर से सुगंध निकलती हुई मास भर साधना करने पर प्रसन्न होकर प्रतिदिन साधक को स्वर्ण मुद्राएं प्रदान करती हैं। मंत्र- 'ॐ ह्रीं आगच्छ मनोहारी स्वाहा।' (3) कनकावती योगिनी;- रक्त वस्त्रालंकार से भूषित अपनी परिचारिकाओं के साथ आकर वांछित कामना पूर्ण करती हैं। मंत्र- 'ॐ ह्रीं हूं रक्ष कर्मणि आगच्छ कनकावति स्वाहा।' (4) कामेश्वरी योगिनी- इनका जप भी रात्रि में मास भर किया जाता है। पुष्पों से सज्जित देवी प्रसन्न होकर ऐश्वर्य, भोग की वस्तुएं प्रदान करती हैं। मंत्र- 'ॐ ह्रीं आगच्छ कामेश्वरी स्वाहा।' (5) रति सुन्दरी योगिनी;- स्वर्णाभूषण से सज्जित देवी महीनेभर साधना के पश्चात प्रसन्न होकर अभीष्ट वर प्रदान करती हैं तथा सभी ऐश्वर्य, धन व वस्त्रालंकार देती हैं। मंत्र- 'ॐ ह्रीं आगच्छ रति सुन्दरी स्वाहा।' (6) पद्मिनी योगिनी- श्याम वर्ण की ये देवी वस्त्रालंकार से युक्त मास भर साधना के बाद प्रसन्न होकर ऐश्वर्यादि प्रदान करती हैं। मंत्र- 'ॐ ह्रीं आगच्छ पद्मिनी स्वाहा।' (7) नटिनी योगिनी;- अशोक वृक्ष के नीचे रात्रि में साधना की जाकर इनकी प्रसन्नता प्राप्ति कर अपने सारे मनोरथ पूर्ण किए जा सकते हैं। मंत्र- 'ॐ ह्रीं आगच्छ नटिनि स्वाहा।' (8) मधुमति योगिनी;- शुभ्र वर्ण वाली देवी अति सुंदर नाना प्रकार के अलंकारों से भूषित साधना के पश्चात सामने आकर किसी भी लोक की वस्तु प्रदान करती हैं। इनकी कृपा से पूर्ण आयु तथा अच्‍छा स्वास्‍थ्य प्राप्त होता है।राज्याधिकार प्राप्त होता है। मंत्र- 'ॐ ह्रीं अनुरागिणी आगच्छ मैथुन प्रिये स्वाहा।' साधना विधि-विधान:- 03 FACTS;- 1-शक्ति साधना के द्वारा ही इस जीवन में इन सब शक्तियों की प्राप्ति हो सकती हैै।केवल एक ही रूप में साधना करने से शक्ति की सिद्धि सम्भव नहीं है, जीवन में रौद्रता, उग्रता के साथ-साथ शान्ति हो, शत्रुओं के लिये उग्रता, मित्रों के लिये शान्ति, परिवार के लिए लक्ष्मी, ज्ञान के लिये स्मृति, मन के लिये तुष्टि, निर्बल के लिये दया, स्वभाव में नम्रता, क्योंकि नम्र वही हो सकता है, जो शक्ति से परिपूर्ण हो। निर्बल भिक्षुक हो सकता है, याचक हो सकता है, लेकिन सबल अपने स्वभाव को सुरक्षित रखते हुए नम्रता से परिपूर्ण हो सकता है। 2-किसी भी प्रकार की मनोकामना पूर्ण करने हेतु इससे तीक्ष्ण साधना दूसरी कोइ नही हो सकती है,यह विधान कलियुग मे शीघ्र फलप्रद है।योगिनीयों से कोइ भी कार्य शीघ्र सम्पन्न करवाया जा सकता है। इस साधना को महाशिवरात्रि के पर्व पर करने से सफलता प्राप्त की जा सकती है।इस साधना को सोमवार रात्रि मे या अमावस्या/ पूर्णिमा की रात्रि मे सम्पन्न करे। साधना के शुरुआत मे गणेश मंत्र और गुरुमंत्र का जाप भी कर ले । 3-अब किसी पात्र मे शिवलिंग रखे और शिवलिंग का सामान्य पूजन करे,जल भी चढाये । एक सफेद रंग का पुष्प अपना मनोकामना बोलते हुए शिवलिंग पर अर्पित करे। 64 योगिनी मंत्र को एक-एक बार पढना जरुरी है परंतु आप मे पात्रता हो तो 1,3,5,7,11.....108 की संख्या मे आप ज्यादा मंत्र का उच्चारण कर सकते है। यह तांत्रोत्क बीज मंत्रो से युक्त योगिनी मंत्र है,जिसकी अधिष्ठात्री देवि ललिताम्बा है,जो साधक की कोइ भी इच्छा पूर्ण कर सकती है। NOTE;- उपरोक्त योगिनी मंत्र जाप से पूर्व और अंत मे "ॐ नमः शिवाय" का जाप करना भी जरुरी है। आगे योगिनी मंत्रो को बोलते हुए किसी भी प्रकार के शिवलिंग पर अष्टगंध युक्त चावल चढाये पूजन के बाद शिव जी का आरती करे और एक बार फिर उनसे अपना मनोकामना पूर्ण करने हेतु प्रार्थना करे। साधना सम्पूर्ण होते ही चढाये हुए चावल शिवलिंग के उपर से निकालकर सुरक्षित रख दे और दूसरे दिन जल मे प्रवाहित कर दे । चौसठ योगनियों के मंत्र… 1)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा। 2)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कपलिनी नागलक्ष्मी स्वाहा। 3)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा। 4)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा। 5)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विरोधिनी विलासिनी स्वाहा। 6)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा। 7)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्र रक्त भोग रूपा स्वाहा। 8)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा। 9)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा। 10)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा। 11)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री घना महा जगदम्बा स्वाहा। 12)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बलाका काम सेविता स्वाहा। 13)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा। 14)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा। 15)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा। 16)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा। 17)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा। 18)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भगमालिनी तारिणी स्वाहा। 19)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्यकलींना तंत्रार्पिता स्वाहा। 20)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा। 21)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा। 22)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महवज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा। 23)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा। 24)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा। 25)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा। 26)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा। 27)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा। 28)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विजया देवी वसुदा स्वाहा। 29)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा। 30)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा। 31)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चित्रा देवी रक्तपुजा स्वाहा। 32)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा। 33)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री डाकिनी मदसालिनी स्वाहा। 34)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री राकिनी पापराशिनी स्वाहा। 35)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा। 36)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा। 37)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा। 38)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री हाकिनी मनोहारिणी स्वाहा। 39)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री तारा योग रक्ता पूर्णा स्वाहा। 40)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री षोडशी लतिका देवी स्वाहा। 41)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा। 42)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा। 43)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा। 44)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा। 45)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा। 46)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातंगी कांटा युवती स्वाहा। 47)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा। 48)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा। 49)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा। 50)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मोहिनी माता योगिनी स्वाहा। 51)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा। 52)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा। 53)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नारसिंही वामदेवी स्वाहा। 54)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा। 55)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा। 56)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा। 57)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा। 58)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा। 59)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा। 60)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा। 61)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा। 62)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा। 63)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा। 64)―ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; विशेष साधना 'चौसठ शक्ति तत्व';- 09 FACTS;- 1-तंत्र कहता है मातृ शक्ति ही इस जगत की जननी है। वही देवी शक्ति या पराशक्ति के नाम से जानी जाती हैं। शास्त्रों में ऐसा माना गया कि सभी पदार्थों के मूल रूप में शक्ति ही विराजमान हैं। यह शक्ति हम सब के भीतर है। न केवल हमारी देह बल्कि हमारे मन, हमारी आत्मा में भी विराजमान हैंं। शक्ति का कोई अपना निश्‍चित रूप-स्वरूप नहीं है। यह शक्ति विभिन्न रूपों में प्रकट होती है और यही शक्ति विभिन्न तरंगों में भी प्रतीत होती है। वह निराकार भी है, साकार भी है अर्थात वह पदार्थ भी है, वह ऊर्जा भी है। इसी शक्ति के परिणाम स्वरूप चांद, सूरज हैं। मनुष्यों, पक्षियों, पशुओं, वृक्षों, पत्थरों, पृथ्वी, स्वर्ण, चांदी, पानी, चांद, तारों, ग्रहों आदि सब ओर उसी शक्ति का प्रताप दिखाई देता है।हम सब उसी शक्ति के ही व्यक्त रूप हैं। वह स्वयं अव्यक्त रूप हैं। यह शक्ति समूल जगत की मूल हैं और मनुष्य की देह में मूलाधार चक्र में स्थापित हैं और यही शक्ति इस सारे जगत की सृष्टिकर्ता भी हैं। 2-देवी दुर्गा के विभिन्न रूप स्वरूप हैं – ज्ञान भी दुर्गा हैं, विज्ञान भी दुर्गा हैं, तंत्र भी दुर्गा हैं। साथ ही जहां पर भी सात्विक शक्तियां हैं, वे देवी दुर्गा के ही रूप हैं और देवी दुर्गा के राजसिक स्वरूप भी हैं – चंचलता, कला, नृत्य, संगीत, चित्रकारी। ये भी देवी दुर्गा शक्ति के प्रतिबिम्बित स्वरूप हैं।तंत्र की परंपरा में देवी के हजारों रूप हैं, धारणा है। जिनका पूजन और स्मरण किया जाता है। देवी दुर्गा अपने विभिन्न स्वरूपों में संकटों की निवारक हैं।देवी काली के रूप में वह काल और अहंकार को मारती हैं।देवी सरस्वती के रूप में वह ज्ञान-विज्ञान की दात्री हैं,देवी लक्ष्मी के स्वरूप में वही देवी धन का वरदान देती हैं, सम्पदा और समृद्धि का वरदान देती हैं।इन सभी रूपों में दया, क्षमा, करुणा, वीरता जैसी शक्तिशाली स्पंदनकारी शक्तियों का आह्वान किया जाता है। 3-सौंदर्य लहरी की प्रथम पंक्ति में देवी की स्तुति की गई है। जिसमें कहा गया है कि – बिना शक्ति के शिव भी अप्रभावकारी होते हैं। ऋषियों ने भी पहले ‘त्वमेव माता’ कहा , फिर कहा ‘च पिता त्वमेव’।देवी के तीन स्वरूप सृष्टि कर्त्ता, पालन कर्त्ता और संहारक हैं और इन्हीं तीन रूपों की विशिष्टता से नवरात्रि के दिनों में पूजन किया जाता है।जब मनुष्य के मन में धारणा , एकाग्रता की शक्ति पूर्ण हो जाती है, तो यही आगे जाकर ध्यान में परिवर्तित हो जाती है और ध्यान की ऊंची अवस्था को ही समाधि कहा जाता है। 4-एक बार कार्तिकेय जी कैलाश पर्वत पर शिव की स्तुति करते हुये बोले – हे देवाधिदेव! तुम्ही परमात्मा हो, शिव हो, तुम्ही सभी प्राणियों की गति हों, तुम्ही जगत के आधार हो और विश्‍व के कारण हो, तुम्ही सबके पूज्य हो, तुम्हारे बिना मेेरी कोई गति नहीं है। कृपा कर मेरे संशय का निवारण करें। कार्तिकेय ने भगवान शिव से कहा – ''कौन सी वस्तु संसार में समस्त सिद्धियों को देने वाली है? वह कौन सा योग है जो परमश्रेष्ठ है? कौनसा योग है जो स्वर्ग और मोक्ष दोनों देने वाला है? बिना तीर्थ, बिना दान, बिना यज्ञ, लय या ध्यान के मनुष्य किस उपाय से सिद्धि को प्राप्त कर सकता है? यह सृष्टि किससे उत्पन्न हुई? किसमें इसका लय होता है? हे देव! किस उपाय से मनुष्य संसार रूपी सागर को पार उतर सकता है? कृपा कर बतायें''। 5-इसके उत्तर में भगवान शिव बोले कि'' इस जगत के सभी पदार्थ, जड़-चेतन, सजीव-निर्जीव मात्र तीन गुणों के संयोजन से ही गतिशील होते हैं। मनुष्य की समस्त गतिविधियां, मनुष्य की जीवन शैली, जीवन में उतार चढ़ाव, गुण-दोष, स्वभाव मात्र इन तीन गुणों अर्थात् सत्य, रज एवं तम से ही बनते हैं। इन तीनों गुणों का जिस पराशक्ति से प्रादुर्भाव होता है वही भगवती आद्याशक्ति है।'' 6- दुर्गा शक्ति का विस्तार स्वरूप चौसठ कलाएं हैं। जीवन के प्रत्येक पक्ष से सम्बन्धित एक-एक कला है। इन सब कलाओं का पूर्ण स्वरूप दुर्गा है। इसलिये साधक को इन चौसठ शक्ति स्वरूपों की साधना करनी चाहिये, जिससे शरीर और मन का प्रत्येक पक्ष जाग्रत हो सके, यही दुर्गा का आधारभूत स्वरूप है।शक्ति की श्रेष्ठ साधना चौसठ शक्ति साधना है, जिसमें बीज मंत्र सहित चौसठ रूप में ध्यान किया जाये तो शक्ति को साधक का वरण करना ही पड़ता है। 7-मां भगवती दुर्गा का यह स्वरूप शक्ति का साकार स्वरूप है। जहां मां भगवती की आराधना होती है, वहां शक्ति चैतन्य रूप से स्थायी रहती हैं।शक्ति का तात्पर्य केवल बल नहीं है, शक्ति की जो व्याख्या मार्कण्डेय ॠषि ने दी है, वह शक्ति का पूर्ण स्वरूप है। शक्ति का तात्पर्य है – वृद्धि, सिद्धि, सौम्यता, रौद्रता, जगतप्रतिष्ठा, चैतन्यता, बुद्धि, तृष्णा, नम्रता, शान्ति, श्रद्धा, कान्ति, लक्ष्मी, स्मृति, दया, तुष्टि एवं इच्छा हैं। 8-साधना का श्रेष्ठतम काल...मूल प्रकृति से यह मन,पदार्थ और भौतिक जगत उत्पन्न हुआ है। उस मूल शक्ति की ओर अपनी अंतर्यात्रा को बढ़ाने का पर्व ही गुप्त नवरात्रि का आध्यात्मिक लक्ष्य है।गुप्त नवरात्रि वह पर्व है, जिस पर्व में साधक अपने अंदर उस पराशक्ति के साथ एकाकार होने का परिश्रम करता है।गुप्त नवरात्रि देवी शक्ति के चौसठ स्वरूपों से एकाकार होने का श्रेष्ठतम काल है।नवरात्रि ही नहीं जीवन का प्रत्येक दिन साधनाओ के लिये विशेष सिद्धिदायक माना गया है।इस साधना को किसी भी माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को सम्पन्न किया जा सकता है।साधक द्वारा एकाग्र मन से यह साधना करने पर एक विशेष अनुभूति प्राप्त होती है। उसके मन के द्वार खुलने लगते है। शक्ति का प्रवाह रोम-रोम में होने लगता है, जब शक्ति का प्रवाह होता है तभी साधक के अपने कर्म द्वारा कार्य पूर्ण होने लगते है। 9-साधना सामग्री...इस साधना से लिये निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है- नारियल, चौसठ शक्ति दुर्गा यंत्र तथा रुद्राक्ष माला। इसके अतिरिक्त कुंकुम, अक्षत, पुष्प, लौंग, दीपक इत्यादि की व्यवस्था पहले से करके रख देनी चाहिए। साधना विधान;- 02 FACTS;- 1-साधना वाले दिवस साधक स्नान कर उत्तर दिशा की ओर मुंह करके लाल आसन पर बैठ जाये और स्वयं लाल धोती धारण कर लें। अपने सामने लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। उस पर गुरु यंत्र/ गुरु पादुका स्थापित कर साधना में सफलता हेतु दोनों हाथ जोड़कर गुरुदेव निखिल का ध्यान करें – गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः। गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥ निखिल ध्यान के पश्‍चात् गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें – ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः 2-गुरु पूजन के पश्‍चात् चावल की ढेरी बनाकर कर, उस पर नारियल तथा सामने ही किसी प्लेट या थाली में पुष्पों का आसन देकर चौसठ शक्ति यंत्र स्थापित कर दें। यंत्र के चारों और तेल के नौ दीपक लगा दें। नारियल का अक्षत, पुष्प आदि से पंचोपचार पूजन करें। इसके पश्‍चात् चौसठ शक्तियों का पूजन किया जाता है, निम्न प्रत्येक मंत्र जप के पश्‍चात् यंत्र पर कुंकुम, अक्षत और एक लौंग चढ़ाएं – चौसठ शक्तियों के मंत्र – 1-ॐपिं पिगलाक्ष्यै नमः ॐविं विडालाक्ष्यै नमः 2-ॐसं समृद्धयै नमः ॐवृं वृद्धयै नमः 3-ॐश्रं श्रद्धायै नमः ॐस्वं स्वाहायै नमः 4-ॐस्वं स्वधायै नमः ॐमं मातृकायै नमः 5-ॐवं वसुंधरायै नमः ॐत्रिं त्रिलोकरात्र्यै नमः 6-ॐसं सवित्र्यै नमः ॐगं गायत्र्यै नमः 7-ॐत्रिं त्रिदशेश्‍वर्यै नमः ॐसुं सुरुपायै नमः 8-ॐबं बहुरुपायै नमः ॐसकं स्कन्दायै नमः 9-ॐअं अच्युतप्रियायै नमः ॐविं विमलायै नमः 10-ॐअं अमलायै नमः ॐअं अरुणायै नमः 11-ॐआं आरुण्यै नमः ॐप्रं प्रकृत्यै नमः 12-ॐविं विकृत्यै नमः ॐसृं सृत्यै नमः 13-ॐस्थिं स्थित्यै नमः ॐसं सहृत्यै नमः 14-ॐसं सन्धायै नमः ॐमं मात्र्यै नमः 15-ॐसं सत्यै नमः ॐहं हंस्यै नमः 16-ॐमं मर्दिन्यै नमः ॐरें रंजिकायै नमः 17-ॐपं परायै नमः ॐदं देवमात्र्यै नमः 18-ॐभं भगवत्यै नमः ॐदं देवक्यै नमः 19-ॐकं कमलासनायै नमः ॐत्रिं त्रिमुख्यै नमः 20-ॐसं सप्तमुख्यै नमः ॐसुं सुरायै