क्या है स्वास्तिक का रहस्य ?क्या उल्टा स्वास्तिक बनाने से भी दूर होती है समस्या?


क्या है स्वास्तिक का महत्व : -

06 FACTS;-

1-स्वस्तिक को 'सथिया' या 'सतिया' भी कहा जाता है। वैदिक ऋषियों ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों के आधार पर मंगल भावों को प्रकट करने वाले और जीवन में खुशियां भरने वाले कुछ विशेष चिह्नों की रचना की। इन चिह्नों में से एक है स्वास्तिक।उह्नोंने स्वास्तिक के रहस्य को सविस्तार उजागर किया और इसके धार्मिक, ज्योतिष और वास्तु के महत्व को भी बताया। आज स्वास्तिक का प्रत्येक धर्म और संस्कृति में अलग-अलग रूप में इस्तेमाल किया जाता है।सिन्धु घाटी सभ्यता की खुदाई में ऐसे चिह्न व अवशेष प्राप्त हुए हैं जिससे यह प्रमाणित होता है कि कई हजार वर्ष पूर्व मानव सभ्यता अपने भवनों में इस मंगलकारी चिह्न का प्रयोग करती थी। सिन्धु घाटी से प्राप्त मुद्रा और बर्तनों में स्वास्तिक का चिह्न खुदा हुआ मिला है। उदयगिरि और खंडगिरि की गुफा में भी स्वास्तिक के चिह्न मिले हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों में स्वास्तिक का महत्व भरा पड़ा है। मोहन जोदड़ो, हड़प्पा संस्कृति, अशोक के शिलालेखों, रामायण, हरिवंश पुराण, महाभारत आदि में इसका अनेक बार उल्लेख मिलता है। 2-अमेरिका और जर्मन में स्वास्तिक :-

द्वितीय विश्‍वयुद्ध के समय एडोल्फ हिटलर ने उल्टे स्वस्तिक का चिह्न अपनी सेना के प्रतीक के रूप में शामिल किया था। सभी सैनिकों की वर्दी एवं टोपी पर यह उल्टा स्वस्तिक चिह्न अंकित था। उल्टा स्वस्तिक ही उसकी बर्बादी का कारण बना। संयुक्त राज्य अमेरिका की आधिकारिक सेना के नेटिव अमेरिकन की एक 45वीं मिलिट्री इन्फैंट्री डिवीजन का चिह्न एक पीले रंग का स्वस्तिक था। नाजियों की घटना के बाद इसे हटाकर उन्होंने गरूड़ का चिह्न अपनाया। 3-अन्य देशों में स्वास्तिक : -

स्वास्तिक को भारत में ही नहीं, अपितु विश्व के अन्य कई देशों में विभिन्न स्वरूपों में मान्यता प्राप्त है। जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिस्र, ब्रिटेन, अमेरिका, स्कैण्डिनेविया, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वस्तिक का प्रचलन किसी न किसी रूप में मिलता है। नेपाल में 'हेरंब' के नाम से पूजित होते हैं। बर्मा में इसे 'प्रियेन्ने' के नाम से जाना जाता है। मिस्र में 'एक्टन' के नाम से स्वस्तिक की पूजा होती है।प्राचीन यूरोप में सेल्ट नामक एक सभ्यता थी, जो जर्मनी से इंग्लैंड तक फैली थी। वह स्वस्तिक को सूर्यदेव का प्रतीक मानती थी। उसके अनुसार स्वस्तिक यूरोप के चारों मौसमों का भी प्रतीक था।मिस्र और अमेरिका में स्वस्तिक का काफी प्रचलन रहा है। इन दोनों जगहों के लोग पिरामिड को पुनर्जन्म से जोड़कर देखा करते थे। प्राचीन मिस्र में ओसिरिस को पुनर्जन्म का देवता माना जाता था और हमेशा उसे 4 हाथ वाले तारे के रूप में बताने के साथ ही पिरामिड को सूली लिखकर दर्शाते थे। इस तरह हम देखते हैं कि स्वस्तिक का प्रचलन प्राचीनकाल से ही हर देश की सभ्यताओं में प्रचलित रहा है।मध्य एशिया के देशों में स्वस्तिक का निशान मांगलिक एवं सौभाग्य का सूचक माना जाता है। प्राचीन इराक (मेसोपोटेमिया) में अस्त्र-शस्त्र पर विजय प्राप्त करने हेतु स्वस्तिक चिह्न का प्रयोग किया जाता था। 4-बुल्गारिया में स्वास्तिक : -

उत्तर-पश्‍चिमी बुल्गारिया के व्रात्स (vratsa) नगर के संग्रहालय में चल रही एक प्रदर्शनी में 7,000 वर्ष प्राचीन कुछ मिट्टी की कलाकृतियां रखी हुई हैं जिस पर स्वास्तिक का चिह्न बना हुआ है। व्रास्ता शहर के निकट अल्तीमीर (altimir) नामक गांव के एक धार्मिक यज्ञ कुंड के खुदाई के समय ये कलाकृतियां मिली थीं। 5-स्वास्तिक है पिरामिड का प्रतीक : -

स्वास्तिक का आविष्कार आर्यों ने किया और पूरे विश्‍व में यह फैल गया।वास्तव में, स्वास्तिक अपने आप में एक पिरामिड है। एक कागज का स्वस्तिक बनाइए और फिर उसकी चारों भुजाओं को नीचे की ओर मोड़कर बीच में से पकड़िए। ऐसा करने पर यह पिरामिड के आकार का दिखाई देगा।

6-अन्य धर्मों में स्वास्तिक का प्रचलन : -

जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकर और उनके चिह्न में स्वास्तिक को शामिल किया गया है। तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का शुभ चिह्न है । स्वास्तिक की चार भुजाएं चार गतियों- नरक, त्रियंच, मनुष्य एवं देव गति की द्योतक हैं। जैन लेखों से संबंधित प्राचीन गुफाओं और मंदिरों की दीवारों पर भी यह स्वास्तिक प्रतीक अंकित मिलता है।बौद्ध मान्यता के अनुसार स्वास्तिक वनस्पति संपदा की उत्पत्ति का कारण है। बौद्ध धर्म में स्वास्तिक को अच्छे भाग्य का प्रतीक भी माना गया है। यह भगवान बुद्ध के पग चिह्नों को दिखाता है। यही नहीं, स्वास्तिक भगवान बुद्ध के हृदय, हथेली और पैरों में भी अंकित है।यहूदी और ईसाई धर्म में भी स्वास्तिक का महत्व है। ईसाई धर्म में स्वस्तिक क्रॉस के रूप में चिह्नित है। एक ओर जहां ईसा मसीह को सूली यानी स्वस्तिक के साथ दिखाया जाता है तो दूसरी ओर यह ईसाई कब्रों पर लगाया जाता है।स्वास्तिक को किसी एक धर्म का नहीं मानकर इसे प्राचीन मानवों की बेहतरीन खोज में से एक माना जाना चाहिए ।

क्या है स्वास्तिक का अर्थ :-

06 FACTS;-

1-स्वास्तिक शब्द को 'सु' एवं 'अस्ति' का मिश्रण योग माना जाता है। 'सु' का अर्थ है शुभ और 'अस्ति' का अर्थ है- होना अर्थात 'शुभ हो', 'कल्याण हो'।स्वास्तिक अर्थात कुशल एवं कल्याण। स्वस्तिक में एक-दूसरे को काटती हुई 2 सीधी रेखाएं होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएं अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती हैं। प्रथम स्वास्तिक जिसमें रेखाएं आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दाईं ओर मुड़ती हैं। इसे 'दक्षिणावर्त स्वास्तिक ' कहते हैं। दूसरी आकृति पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बाईं ओर मुड़ती है इसे 'वामावर्त स्वास्तिक ' कहते हैं।स्वास्तिक का आरंभिक आकार पूर्व से पश्चिम एक खड़ी रेखा और उसके ऊपर दूसरी दक्षिण से उत्तर आड़ी रेखा के रूप में तथा इसकी चारों भुजाओं के सिरों पर पूर्व से एक-एक रेखा जोड़ी जाती है। इसके बाद चारों रेखाओं के मध्य में एक बिंदु लगाया जाता है।स्वास्तिक को 7 अंगुल, 9 अंगुल या 9 इंच के प्रमाण में बनाए जाने का विधान है। मंगल कार्यों के अवसर पर पूजा स्थान और दरवाजे की चौखट पर स्वस्तिक बनाने की परंपरा है।

2-मांगलिक प्रतीक : -

हिन्दू धर्म में स्वास्तिक को शक्ति, सौभाग्य, समृद्धि और मंगल का प्रतीक माना जाता है। घर के वास्तु को ठीक करने के लिए स्वास्तिक का प्रयोग किया जाता है।स्वास्तिक के चिह्न को भाग्यवर्धक वस्तुओं में गिना जाता है। स्वस्तिक के प्रयोग से घर की नकारात्मक ऊर्जा बाहर चली जाती है।

3-गणेश जी का प्रतीक :-

स्वास्तिक में भगवान गणेश और नारद की शक्तियां निहित हैं। स्वास्तिक को भगवान विष्णु और सूर्य का आसन माना जाता है। स्वास्तिक का बायां हिस्सा गणेश की शक्ति का स्थान 'गं' बीज मंत्र होता है। इसमें जो 4 बिंदियां होती हैं, उनमें गौरी, पृथ्वी, कच्छप और अनंत देवताओं का वास होता है। इस मंगल-प्रतीक का गणेश की उपासना, धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ बही-खाते की पूजा की परंपरा आदि में विशेष स्थान है।स्वास्तिक की खड़ी रेखा सृष्‍टि की उत्पत्ति का प्रतीक है और आड़ी रेखा सृष्‍टि के विस्तार का प्रतीक है। स्वस्तिक का मध्य बिंदु विष्णु का नाभि कमल है तो 4 बिंदु चारों दिशाओं का। ऋग्वेद में स्वास्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है।

4-दिशाओं का प्रतीक :-

स्वास्तिक सभी दिशाओं के महत्व को इंगित करता है। इसका चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं- अग्नि, इन्द्र, वरुण एवं सोम की पूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आशीर्वाद को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है।

5-चार वेद, पुरुषार्थ और मार्ग का प्रतीक : -

हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण 4 सिद्धांत धर्म, अर्थ काम और मोक्ष का प्रतीक भी माना जाता है। चार वेद का प्रतीक- ऋग्, यजु, साम और अथर्व। चार मार्ग ज्ञान, कर्म, योग और भक्ति का भी यह प्रतीक है।

6-जीवन चक्र और आश्रमों का प्रतीक :-

यह मानव जीवन चक्र और समय का प्रतीक भी है। जीवन चक्र में जन्म, जवानी, बुढ़ापा और मृत्य यथाक्रम में बालपन, किशोरावस्था, जवानी और बुढ़ापा शामिल है। यही 4 आश्रमों का क्रम भी है- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।

7-युग, समय और गति का प्रतीक :-

स्वास्तिक की 4 भुजाएं 4 गतियों- नरक, त्रियंच, मनुष्य एवं देव गति की द्योतक हैं वहीं समय चक्र में मौसम और काल शामिल है। यही 4 युग का भी प्रतीक है- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग।

8-योग, जोड़ का प्रतीक :-

इसका आरंभिक आकार गणित के धन चिह्न के समान है अत: इसे जोड़ या मिलन का प्रतीक भी माना जाता है। धन के चिह्न पर एक-एक रेखा जोड़ने पर स्वास्तिक का निर्माण होता है।वास्तुदोष दूर करने के लिए 9 अंगुल लंबा और चौड़ा स्वास्तिक सिंदूर से बनाने से नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मकता में बदल जाती है।

9-मांगलिक, धार्मिक कार्यों में बनाएं स्वास्तिक :-

धार्मिक कार्यों में रोली, हल्दी या सिंदूर से बना स्वास्तिक आत्मसंतुष्‍टी देता है। त्योहारों पर द्वार के बाहर रंगोली के साथ कुमकुम, सिंदूर या रंगोली से बनाया गया स्वास्तिक मंगलकारी होता है। इसे बनाने से देवी और देवता घर में प्रवेश करते हैं। गुरु पुष्य या रवि पुष्य में बनाया गया स्वस्तिक शांति प्रदान करता है। 10-व्यापार वृद्धि ,सुख की नींद सोने हेतु :-

यदि आपके व्यापार या दुकान में बिक्री नहीं बढ़ रही है तो 7 गुरुवार को ईशान कोण को गंगाजल से धोकर वहां सुखी हल्दी से स्वास्तिक बनाएं और उसकी पंचोपचार पूजा करें। इसके बाद वहां आधा तोला गुड़ का भोग लगाएं। इस उपाय से लाभ मिलेगा। कार्य स्थल पर उत्तर दिशा में हल्दी का स्वास्तिक बनाने से बहुत लाभ प्राप्त होता है।यदि आप रात में बैचेन रहते हैं ,नींद नहीं आती या बुरे बुरे सपने आते हैं तो सोने से पूर्व बाएं हाथ में तर्जनी से स्वास्तिक को बनाकर सो जाएं। इस उपाय से नींद अच्छी आएगी।यदि मायावी स्वप्न वाली नींद चाहिए तो बाएं हाथ में तीन बार उल्टा स्वास्तिक बनाएं ।यदि आध्यात्मिक नींद चाहिए तो तीन बार दक्षिण मुखी स्वास्तिक बनाएं।यदि गहरी, आध्यात्मिक नींद चाहिए तो बाएं हाथ में तर्जनी उंगली से तीन बार ओम बनाएं।

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उलटे स्वास्तिक का अर्थ;-

03 FACTS;-

1-हिंदू धर्म में कई सारी ऐसी चीजें हैं। जो बहुत ही महत्व रखती हैं। मगर स्वास्तिक का अपना अलग ही महत्व होता हैं। धार्मिक आस्था के अनुसार इस स्वास्तिक को बहुत ही शुभ माना जाता हैं। पूजा-पाठ और किसी भी शुभ कार्य से पहले स्वास्तिक का महत्व होता हैं। वही स्वास्तिक को पुराणों में परब्रह्म की संज्ञा दिया गया हैं। यह धन की देवी मां लक्ष्मी और भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता हैं।ज्योतिषशास्त्रों के मुताबिक स्वास्तिक के अलग अलग प्रयोग होते हैं। जिन्हें करने से व्यक्ति की सभी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं। वही धन,धान्य और सौभाग्य के साथ मां लक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होती हैं। मगर स्वास्तिक के यह प्रयोग सीधे स्वास्तिक से नहीं बल्कि उल्टे स्वास्तिक को बनाने से होता हैं। घर में उल्टे स्वास्तिक को बनाने से सारे कार्य शुभ हो जाता हैंं। कहते हैं कभी भूलकर भी उल्टा स्वास्तिक नहीं बनाना चाहिए।

2-उल्टा स्वास्तिक बनाने से हर समस्या दूर होती है।अखंड सौभाग्य व लक्ष्मी की होगी प्राप्ति होती है।उल्टे स्वास्तिक बनाने से मनोकामनाएं जल्द पूरी हो जाती है।प्राचीन काल से लेकर अब तक हर मंदिर की कोई न कोई एक अपनी विशेष मान्यताएं रही है।कुछ मंदिर है, जहां केवल उल्टा स्वस्तिक बनाने से हर मनोकामना पूरी होती है।इंदौर स्थित खजराना मंदिर में भगवान गणेश जी के मंदिर के पीछे दीवार यानी गणेश जी की पीठ पर लोग उल्टा स्वास्तिक चिह्न बनाते हैं और मन्नत पूरी होने के बाद दोबारा आकर सीधा स्वास्तिक बनाते हैं। ऐसा कई सालों से चला आ रहा है। यहा आने वाले की हर मुराद पूरी हाेती है और जातक यहाँ दोबारा जरूर आता है।

3-उज्जैन में महाकाल क्षेत्र में माता हरसिद्धि का प्राचीन मंदिर है।यह मंदिर वहां स्थित है जहां सती के शरीर का अंश अर्थात हाथ की कोहनी आकर गिर गई थी।शक्तिपीठ होने के कारण इस मंदिर का महत्व बढ़ जाता है। यहां भी उल्टा स्वास्तिक बनाने से हर मनोकामना पूरी होती है।उज्जैन के पास भैरवगढ़ के पूर्व में विमल जल-वाहिनी शिप्रा के मनोहर तट पर 'सिद्धवट' का स्थान है।यहाँ तीन तरह की सिद्धि होती है संतति, संपत्ति और सद्‍गति। तीनों की प्राप्ति के लिए यहाँ पूजन किया जाता है। सद्‍गति अर्थात पितरों के लिए अनुष्ठान किया जाता है। संपत्ति अर्थात लक्ष्मी कार्य के लिए वृक्ष पर रक्षा सूत्र बाँधा जाता है और संतति अर्थात पुत्र की प्राप्ति के लिए उल्टा सतिया (स्वास्तिक) बनाया जाता है। यह वृक्ष तीनों प्रकार की सिद्धि देता है इसीलिए इसे सिद्धवट कहा जाता है।

उल्टा स्वास्तिक के कुछ खास उपायों के बारे में;-

04 POINTS;-

1-व्यापार में बढ़ोतरी के लिए; -

व्यापार में बढ़ोतरी के लिए व्यापार में बढ़ोतरी के लिए गुरुगुवार को तक घर के ईशान कोण यानी उत्तरी -पूर्वी को गंगा जल से धोकर वहां हल्दी का स्वास्तिक बनाएं। इस स्वास्तिक की विधिवत पूजा कर गुड़ का भोग लगाएं। ऐसा लगातार 7 गुरुवार करने से व्यापार में फायदा होगा ।

2-घर में समृद्धि लाने के लिए; -

घर में समृद्धि लाने के लिए घर के बाहर रंगोली के साथ कुंकुम, सिंदूर या रंगोली से स्वास्तिक बनाएं। इससे देवी -देवता प्रसन्न हो कर घर में प्रवेश करते हैं और घर में रहने वालों को आशीर्वाद देते हैं।मनचाहा आशीर्वाद पाने के लिए घर के पूजा स्थल या मंदिर में स्वास्तिक बनाकर उस पर इष्टदेव की प्रतिमा रख कर पूजा करनी चाहिए। इससे देवता तुरंत प्रसन्न होकर मनचाहा आशीर्वाद देते हैं।

3-घर के क्लेश समाप्त करने के लिए; -

घर के ईशान कोण यानी उत्तरी -पूर्वी दिशा में दीवार पर हल्दी का स्वास्तिक बनाने से घर में सुख-शांति आती है और घर में होने वाले क्लेश समाप्त होते हैं।

4-मनोकामना पूर्ण करने के लिए :-

देव स्थान पर स्वास्तिक बनाकर उसके ऊपर पंच धान्य या दीपक जलाकर रखने से कुछ ही समय में इच्छीत कार्य पूर्ण होता है। इसके अलावा मनोकामना सिद्धी हेतु मंदिर में गोबर या कंकू से उलटा स्वस्तिक बनाया जाता है। फिर जब मनोकामना पूर्ण हो जाती है तो वहीं जाकर सीधा स्वस्तिक बनाया जाता है।

....SHIVOHAM....


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