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क्या है विज्ञान भैरव तंत्र का सार?PART-01



विज्ञान भैरव तंत्र;- 09 FACTS;- 1-विज्ञान का अर्थ है चेतना, भैरव का अर्थ वह अवस्था है, जो चेतना से भी परे है और तंत्र का अर्थ विधि है, चेतना के पार जाने की विधि। हम मूर्छित हैं, अचेतन हैं, इसलिए सारी धर्म-देशना अचेतन के ऊपर उठने की; चेतन होने की देशना है। विज्ञान का मतलब है चेतना। और भैरव एक विशेष शब्द है, तांत्रिक शब्द, जो पारगामी के लिए कहा गया है। इसलिए शिव को भैरव कहते हैं और देवी को भैरवी- वे जो समस्त द्वैत के पार चले गए हैं। 2-शिव के उत्तर में केवल विधियाँ हैं। सबसे पुरानी, सबसे प्राचीन विधियाँ। लेकिन, तुम उन्हें अत्याधुनिक भी कह सकते हो, क्योंकि उनमें कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकता। वे पूर्ण हैं- 112 विधियाँ। उनमें सभी संभावनाओं का समावेश है, मन को शुद्ध करने के, मन के अतिक्रमण के सभी उपाय उनमें समाए हुए हैं। और यह ग्रंथ, विज्ञान भैरव तंत्र, 5 हजार वर्ष पुराना है। 3-उसमें कुछ भी नहीं जोड़ा जा सकता, कुछ जोड़ने की गुंजाइश ही नहीं है। यह सर्वांगीण है, संपूर्ण है, अंतिम है। यह सबसे प्राचीन है और साथ ही सबसे आधुनिक, सबसे नवीन।ध्यान की इन 112 विधियों से मन के रूपांतरण का पूरा विज्ञान निर्मित हुआ है। ये विधियाँ किसी धर्म की नहीं हैं। वे ठीक वैसे ही हिंदू नहीं हैं, जैसे सापेक्षितवाद का सिद्धांत आइंस्टीन के द्वारा प्रतिपादित होने के कारण यहूदी नहीं हो जाता। 4-रेडियो और टेलीविजन ईसाई नहीं हैं। कोई नहीं कहता कि बिजली ईसाई है, क्योंकि ईसाई मस्तिष्क ने उसका आविष्कार किया है। विज्ञान किसी वर्ण या धर्म का नहीं है। और तंत्र विज्ञान है। तंत्र धर्म नहीं, विज्ञान है। इसीलिए किसी विश्वास की जरूरत नहीं है। प्रयोग करने का महासाहस पर्याप्त है।तंत्र बहुत माना-जाना नहीं है। यदि माना-जाना है भी तो बहुत गलत समझा गया है। उसके कारण हैं। जो विज्ञान जितना ही ऊँचा और शुद्ध होगा, उतना ही कम जनसाधारण उसे समझ सकेगा। 5-हमने सापेक्षतावाद के सिद्धांत का नाम सुना है। कहा जाता था कि आइंस्टीन के जीतेजी केवल 12 व्यक्ति उसे समझते थे। यही कारण है कि जनसाधारण तंत्र को नहीं समझा। और यह सदा होता है कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो तो उसे गलत जरूर समझते हो, क्योंकि तुम्हें लगता है कि तुम समझते जरूर हो।दूसरी बात कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो, तुम उसे गाली देने लगते हो। यह इसलिए कि यह तुम्हें अपमानजनक लगता है। तुम सोचते हो, मैं और नहीं समझूँ, यह असंभव है। 6-तीसरी बात कि तंत्र द्वैत के पार जाता है। इसलिए उसका दृष्टिकोण अतिनैतिक है। कृपा कर इन शब्दों को समझें- नैतिक, अनैतिक, अति नैतिक। नैतिक क्या है, हम समझते हैं; अनैतिक क्या है, वह भी हम समझते हैं। लेकिन जब कोई चीज अतिनैतिक हो जाती है, नैतिक-अनैतिक दोनों के पार चली जाती है, तब उसे समझना कठिन हो जाता है। तंत्र अतिनैतिक है।ऐसे समझो, औषधि अति नैतिक है। वह न नैतिक है, न अनैतिक। चोर को दवा दो तो उसे लाभ पहुँचाएगी। संत को दो तो उसे भी लाभ पहुँचाएगी। वह चोर और संत में भेद नहीं करेगी। दवा वैज्ञानिक है। तुम्हारा चोर या संत होना उसके लिए अप्रासंगिक है। 7-तंत्र कहता है, तुम आदमी को बदलाहट की प्रामाणिक विधि के बिना नहीं बदल सकते। मात्र उपदेश से कुछ नहीं बदलता। पूरी जमीन पर यही हो रहा है। इतने उपदेश, इतनी नैतिक शिक्षा..पृथ्वी उनसे पटी है। और फिर भी सब कुछ इतना अनैतिक है! इतना कुरूप है। ऐसा क्यों हो रहा है? 8-तंत्र तो वैज्ञानिक विधि बताता है कि चित्त को कैसे बदला जाए। और एक बार चित्त दूसरा हुआ कि तुम्हारा चरित्र दूसरा हो जाएगा। एक बार तुम्हारे ढाँचे का आधार बदला कि पूरी इमारत दूसरी हो जाएगी।ये 112 विधियाँ तुम्हारे लिए चमत्कारिक अनुभव बन सकती हैं। शिव ने ये विधियाँ प्रस्तावित की हैं। इसमें सभी संभव विधियाँ हैं। ये विधियाँ समस्त मानव जाति के लिए हैं। और वे उन सभी युगों के लिए हैं जो गुजर गए हैं। और जो आने वाले हैं। प्रत्येक ढंग के चित्त के लिए यहाँ गुंजाइश है। 9-तंत्र में प्रत्येक किस्म के चित्त के लिए विधि है। कई विधियाँ हैं। जिनके उपयुक्त मनुष्य अभी उपलब्ध नहीं हैं, वे भविष्य के लिए हैं। ऐसी विधियाँ भी हैं, जिनके उपयुक्त लोग रहे नहीं, वे अतीत के लिए हैं।अनेक विधियाँ हैं, जो तुम्हारे लिए ही हैं। विज्ञान भैरव तंत्र का सार;- 07 FACTS;- 1-भारतीय दर्शनों में एक दर्शन अद्भुत है- वह है रहस्यमय तंत्र मार्ग। इस तंत्र की शुरुआत ही प्रेम से होती है- शिव और पार्वती के संवाद के रूप में।माता-पार्वती पूछती हैं, हे शिव! मैं आपको कैसे पाऊं? आप इतने विराट, अमूर्त, अगम्य हैं -आप तक पहुंचने का क्या उपाय है? 2-शिव देवी को समझाते हैं कि आप मेरा जो बाह्य रूप देख रही हैं, वह मैं नहीं हूं। न तो मैं कोई वर्ण हूं, न नाद हूं, न शब्द हूं -मैं हूं वह शून्य फैलाव जो इस सृष्टि को घेरे हुए है। और मुझे खोजने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है। जो दैनंदिन अनुभूतियां हैं -शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध की, आप इन्हीं में गहरे प्रवेश करें और आप मुझे पा लेंगी। इंद्रियों का निषेध नहीं, उन को स्वीकार करके, क्योंकि प्रत्येक इंद्रिय द्वार है आत्मा का। इसके बाद शिव एक-एक इंद्रिय की अनुभूति को लेकर उसी को ध्यान में परिवर्तित करने की विधि बताते चले जाते हैं। 2-1-जैसे, यदि आपका प्रियजन दीर्घकाल के बाद मिल रहा है और उसे देखकर आपको जो आनंद होता है, उस आनंद पर ध्यान करें, मित्र पर नहीं। क्योंकि जिसे आनंद हो रहा है वह आपके भीतर है। 2-2-यदि आप सौंदर्य देख कर तरंगायित होते हैं तो शुभ है। उस सुंदरता को देखने और उसका रसास्वादन करने वाली आंखों द्वारा ध्यान करने की विधियां हैं, जो आपको तीसरी आंख की अनुभूति करा देंगी। 2-3-मृत्यु से डर लगता है? कोई हर्ज नहीं, जहां-जहां मृत्यु है, उस पर ध्यान करिए और आप उनके पीछे छिपे हुए अमर्त्य को देख लेंगी। इस तरह शिव सांसारिक जीवन के एक-एक अनुभव को लेकर उसमें गहरे प्रवेश करने की विधियां बताते हैं। 3-विज्ञान भैरव तंत्र में इस तरह कुल एक सौ बारह विधियां बताई गई हैं, जिन्हें पढ़ कर आश्चर्य होता है कि कितनी सुगमता से हम परम को पा सकते हैं। विज्ञान भैरव तंत्र का चिंतन आधुनिक मनोविज्ञान की खोज एनएलपी (न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोसेस) से मिलती-जुलती है। 4-एनएलपी का मूल विचार यह है कि सभी की पांच इंद्रियों होती हैं, लेकिन हर व्यक्ति में उनमें से कोई एक इंद्रिय ज्यादा सक्रिय होती है। किसी की आंख अधिक तेज होती है तो किसी के कान। कोई स्पर्श के प्रति अधिक संवेदनशील होता है, तो कोई स्वाद के प्रति। जिस व्यक्ति की जो इंद्रिय अधिक संवेदनशील या जाग्रत होती है, उससे संबंधित अभिव्यक्ति का उपयोग कर उसे कोई बात जल्दी समझाई जा सकती है। 5-इस तकनीक का प्रयोग सम्मोहन शास्त्र में भी किया जाता है। उदाहरण के लिए कोई आंख प्रधान व्यक्ति पहाड़ों में घूमकर आएगा तो वह बताएगा कि 'वहां का नजारा इतना खूबसूरत था, चारों ओर हरियाली छायी थी और आसमान का गहरा नीला रंग आंखों को बड़ा सुकून देता था। दूर-दूर तक खिले रंगबिरंगे फूल पूरे परिवेश को सजा रहे थे।' इस आदमी ने पूरा अनुभव और आनंद आंखों के माध्यम से लिया। वहीं श्रवण के प्रति संवेदनशील व्यक्ति कहेगा, 'शोरगुल से ऊबे मन को वहां का सन्नाटा बहुत राहत देता था। हवा की सरसराहट, पक्षियों की चहचहाहट और नदियों की कल-कल ध्वनि पूरे परिवेश को संगीतमय बना रही थी।' ये दोनों व्यक्ति एक ही स्थान का विवरण दे रहे हैं, लेकिन उनका नजरिया बिल्कुल अलग है। 6-इंद्रियां अनुभव का द्वार हैं, इसलिए उनका उचित सम्मान कर ही कोई मनुष्य विभिन्न अनुभवों में प्रवेश कर सकता है। तंत्र के चिंतन में और अन्य आध्यात्मिक दर्शनों में फर्क यह है कि अन्य दर्शन इंद्रियों का दमन सिखाते हैं, और तंत्र इंद्रिय जनित अनुभवों में गहरे उतरना सिखाते हैं। 7-इसका अंत अत्यंत हृदयस्पर्शी है। इन ध्यान विधियों को समझने के बाद अंतत: माता पार्वती भगवान शिव का आलिंगन करती हैं। इसके बाद उनका द्वैत शेष नहीं रहता, दोनों अर्धनारीश्वर हो जाते हैं विज्ञान भैरव तंत्र के सूत्र;- 60 FACTS;- 1-माता पार्वती के यह प्रश्न पूछने पर की ” ईश्वर कौन है” और “क्या है ?” भगवन शंकर उन्हें सीधे उत्तर न देके निम्नलिखित विधियां बताते है, जोकि 112 है। किसी न किसी रूप में, सभी ग्रन्थ, धर्मो में इन्ही 112 विधियों का प्रयोग है । 2-मन के रूपांतरण की श्रेष्ठ विधियों को मानव मात्र के कल्याण के लिए भगवान् शिव ने माता पार्वती के माध्यम से प्रकाशित किया । इन विधियों के माध्यम से पुराने कर्मों की सीमाओं के बंधन को शिथिल किया जा सकता है. इन विधियों के महत्त्व को जानने के लिए बुद्धि के प्रयोग की अपेक्षा अभ्यास अधिक महत्वपूर्ण है। इसका कारण यह है कि जब तक बुद्धि को मन से स्वतंत्र नहीं किया जाता वह स्वतंत्र रूप से सही निर्णय नहीं ले सकती। 3-इसलिए माता पार्वती के इश्वर सम्बन्धी प्रश्न पूछने पर प्रभु शिव प्रश्न का सीधे उत्तर ना देकर वह क्रियाएं बताते है, जिनका अभ्यास कर ईश्वर को अनुभव किया जा सकता है। तंत्र हमारे अस्तित्व से जुड़ी हर चीज का उपयोग कर उससे पार होने में सहायता करता है चाहे वह कामना, भय, क्रोध , नींद, कल्पना , श्वास अथवा छींक जैसी शारीरिक क्रिया ही क्यों ना हो। और हर भावना अथवा क्रिया में महत्वपूर्ण है सजग रहना। सजगता ही चेतना की गहराई को नापने का महत्वपूर्ण साधन है।जब यह साधन साध जाता है तो आत्म ज्ञान स्वयं प्रकाशित हो जाता है। विज्ञान भैरव तंत्र की विधियां;- 03 FACTS;- जागृति के लिए महायोगी शिव द्वारा कथित 112 विधियां इस प्रकार है :- 1) दो श्वासो के मध्य ध्यान केंद्रित करे। श्वासो की अंदर जाती और बाहर आती प्रकिया को सजग रूप से देखे। 2) जब श्वास नीचे से ऊपर की ओर जाती है और ऊपर से नीचे की ओर आती है, तो इस संधि काल को देखे। 3) जब अंतः श्वास और वाह्य श्वास एक दूसरे से मिलते है, उस प्रक्रिया के केंद्र को स्पर्श करे। 4) जब प्रश्वास पूरी तरह बाहर हो या पूरी तरह भीतर हो, उसके मध्य के अंतराल पर ध्यान केंद्रित करे। 5) भ्रकुटी के मध्य स्थान अर्थात आज्ञाचक्र पर ध्यान केंद्रित करे और प्राण-ऊर्जा को सहस्त्रार चक्र में भरे। 6) सांसारिक कार्य करते हुए , ध्यान को दो श्वासो के मध्य केंद्रित करे। 7) ललाट के मध्य श्वास को स्थिर करे। इस अभ्यास से प्राण-ऊर्जा हृदय में पहुंचती है, जिससे स्वयं के स्वप्न और मृत्यु पर अधिकार हो जाता है। 8) पूर्ण भक्तिभाव के साथ दो श्वासो की संधि के समय एकाग्र होकर ज्ञाता को जान लो। 9) ऐसे लेट जाए जैसे मृत हो, क्रुद्ध भाव में स्थिर हो जाये अथवा बिना पलक झपकाए घूरे या कुछ मुँह में लेके चूसे और उस प्रक्रिया में विलीन हो जाये। 10) प्रेम के स्पर्शमय क्षणों में ऐसे प्रवेश करे, जैसे वह नित्यअक्षय हो। 11 )जब चीटियों के रेंगने का अनुभव हो, तो अपने इन्द्रियॉ के द्वार बंद कर ले। 12) जब शय्या पर हो तो मन के पास जाकर भार शून्य हो जाए। 13) मोर पंख के पांच रंग के वरतुल में पांचो इन्द्रियॉ की कल्पना करनी है , और यह भाव करना है कि यह पांचो रंग भीतर किसी बिंदु पर मिल रहे है। 14) अपने पूरे ध्यान को मेरुदण्ड के मध्य, कमलतन्तु सी इस कोमल स्नायु में स्थित करो और उसमें समा जाओ । 15) सिर के सात द्वारो में(आँख,कान , नाक और मुख ) आँखों के बीच का स्थान (आज्ञाचक्र) सर्व ग्राही हो जाता है। 16) जब इंद्रियां हृदय में विलीन हो, तब कमल के केंद्र पर पहुंचो (सहस्त्रार)। 17) मन को भूल कर मध्य में रहो – जब तक (मन स्थिर न हो जाये)। 18) किसी भी विषय को प्रेम पूर्वक देखे , दूसरे विषय पर मत जाये,विषय के मध्य में – आनंद। 19) पाँव या हाथ का सहारा लिए बिना नितम्बों पर बैठे- अचानक केंद्रित हो जाएंगे। 20) किसी चलते वाहन में जब शरीर हिलता है तो लयबद्ध डोलकर अनुभव को प्राप्त हो। 21) शरीर के किसी भाग को सुई से भेदो, उस पीड़ा में प्रवेश करो और आतंरिक शुद्धता को सिद्ध करो। 22) अतीत की घटना का स्मरण होते समय चेतना को ऐसी जगह रखे जिससे शरीर को भी साक्षी रख सके और घटना को भी। 23) अपने सामने किसी विषय का अनुभव करे और अन्य विषयों की अनुपस्थिति को अनुभव करे ,फिर विषय भाव और अनुपस्थिति के भाव को भी छोड़ दे और आत्मा को उपलब्ध हो जाये। 24) जब किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में कोई भाव उठे तो उसे, उस व्यक्ति पर आरोपित नहीं करे । 25) जैसे ही कुछ करने की वृत्ति हो रुक जाये। 26) जब कोई कामना उठे तो उसको देखो और अचानक उसे छोड़ दो। 27) तब तक घुमते रहे जब तक पूरी तरह थक ना जाये, फिर जमीन पर गिरकर , गिरने में पूर्णता का अनुभव करे। 28) शक्ति या ज्ञान से धीरे- धीरे वंचित होने कि कल्पना करे, और वंचित किये जाने के समय में अतिक्रमण करे (दृष्टा बन जाए)। 29) भक्ति मुक्त करती है। 30) आँखे बंद करके, अपने अंदर अस्तित्व को विस्तार से देखो, इस प्रकार अपने सच्चे अस्तित्व को देख लो। 31) एक पात्र / कटोरी को उसके किनारों और सामग्री के बिना देखो और आत्मबोध को प्राप्त हो जाओ । 32) किसी सूंदर व्यक्ति या सामान्य विषय को ऐसे देखो , जैसे उसे पहली बार देख रहे है। 33 ) बादलों के पास नीले आकाश को देखते हुए शांति और सौम्यता को उपलब्ध हो। 34) जब परम उपदेश दिया जा रहा हो, अविचल , अपलक आँखों से उसे श्रवण करो और मुक्ति को उपलब्ध हो । 35) किसी गहरे कुएं के किनारे खड़े होकर उसकी गहराईओं को निरन्तर देखते रहो जबतक विस्मय मुग्ध न हो जाओ । 36) किसी विषय को देखो फिर धीरे – धीरे उससे अपनी दृष्टि हटा लो और फिर अपने विचार भी उससे हटा लो। 37) दृष्टि पथ में संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों की कल्पना करो,पहले अक्षरों की भाँति , फिर सूक्ष्मतर ध्वनि की भाँति , फिर सूक्ष्मतर भाव की भाति, और फिर उसे छोड़ कर मुक्त हो जाओ। 38) जलप्रपात की अखण्ड ध्वनि के केंद्र में स्नान करो। 39) ॐ मंत्र जैसी ध्वनि का मंद मंद उच्चारण करो । 40) किसी भी वर्ण के शाब्दिक उच्चारण के आरंभ और क्रमिक परिष्कार के समय जागृत हो । 41) तार वाले वाद्यों को सुनते हुए, उनकी सयुक्त केंद्रित ध्वनि को सुनो और सर्वव्यापक हो जाओ । 42) किसी ध्वनि का उच्चारण ऐसे करो कि वह सुनाई दे,फिर उस उच्चारण को मंद से मंद किये जाओ , की स्वयं को भी सुनाने के लिए प्रयत्न करना पड़े, और भाव, मौन लयद्धता में लीन होता जाये। 43) मुँह को थोड़ा खुला रखते हुए मन को जीभ के बीच में स्थिर करे , अथवा जब स्वास अंदर आये तब हकार् ध्वनि का अनुभव करो । 44) अ और म के बिना ॐ ध्वनि पर (अर्थात केवल उ की ध्वनि) पर मन केंद्रित करो। 45) अः से अंत होने वाले किसी शब्द का उच्चारण मन में करो। 46) कानो को दबाकर, गुदा को सिकोड़कर बंद करो और ध्वनि में प्रवेश करो । 47) अपने नाम की ध्वनि में प्रवेश करो और उस ध्वनि के द्वारा सभी ध्वनियो में । 48) आलिंगन के आरम्भ के क्षणों की उत्तेजना के भाव पर मन को केंद्रित करो। 49) आलिंगन के समय शरीर में हो रहे परिवर्तन जैसे कंपन के साथ आत्मसाथ हो जाए। 50) मानसिक रूप से एकाकार की प्रक्रिया का स्मरण भी ऊर्जा के रूपांतरण में महत्वपूर्ण होता है । 51) प्रियंजन अथवा मित्र के बहुत समय बाद होने वाले हर्ष के प्रसन्नता में लीन हो जाए । 52) भोजन करते हुए या पानी पीते हुए, भोजन और पानी के स्वाद में समाहित हो जाओ । 53) अपने होने के प्रति सजग हो जाओ , हर कर्म करते हुए जैसे गाते हुए , खाते हुए और स्वाद लेते हुए आपने अस्तित्व का बोध बनाए रखे, तब शास्वत प्रगट होगा । 54) जिन- जिन कर्मों में संतोष मिलता है , मिल रहे संतोष के साथ रहो और संतुष्टता का अनुभव करो । 55) निद्रा और जागृत अवस्था के मध्य बिंदु पर चेतना को टिकाने से आत्मा प्रकाशित करो । 56) माया की भ्रांतियाँ छलती है , रंग भी सीमित करते है, वस्तुतः जो विभाज्य दिखता है वह भी अविभाज्य है । 57) तीव्र कामना की स्थिति में मन को स्थिर रखते हुए, उद्विग्नता से दूर रहे । 58) यह जगत चित्रपट / चित्रगति जैसा है , सुखी होने के लिए उसे इसी भांति देखो । 59) ना ही सुख में, ना ही दुःख में , वरन दोनो के मध्य में चेतना को स्थिर करो। 60) विषय और वासना जैसी दूसरों में है वैसी ही मुझमें भी है, इस तथ्य को स्वीकार करके उन्हें रूपांतरित होने दो । 61-’जैसे जल से लहरें उठती है और अग्‍नि से लपटें, वैसे ही सर्वव्‍यापक हम से लहराता है।‘’ 62-‘’जहां कहीं तुम्‍हारा मन भटकता है, भीतर या बाहर, उसी स्‍थान पर, यह।‘’ 63-’जब किसी इंद्रिय-विषय के द्वारा स्‍पष्‍ट बोध हो, उसी बोध में स्‍थित होओ।‘’ 64-‘’छींक के आरंभ में, भय में, खाई-खड्ड के कगार पर, युद्ध से भागने पर, अत्‍यंत कुतूहल में, भूख के आरंभ में और भूख के अंत में, सतत बोध रखो।‘’ 65-’अन्‍य देशनाओं के लिए जो शुद्धता है वह हमारे लिए अशुद्धता ही है। वस्‍तुत: किसी को भी शुद्ध या अशुद्ध की तरह मत जानों।‘’ 66-‘मित्र और अजनबी के प्रति, मान और अपमान में, असमता और समभाव रखो।’ 67-‘यह जगत परिवर्तन का है, परिवर्तन ही परिवर्तन का। परिवर्तन के द्वारा परिवर्तन को विसर्जित करो।’ 68-जैसे मुर्गी अपने बच्‍चों का पालन-पोषण करती है, वैसे ही यथार्थ में विशेष ज्ञान और विशेष कृत्‍य का पालन-पोषण करो। 69-‘यथार्थत: बंधन और मोक्ष सापेक्ष है; ये केवल विश्‍व से भयभीत लोगों के लिए है। यह विश्‍व मन का प्रतिबिंब है। जैसे तुम पानी में एक सूर्य के अनेक सूर्य देखते हो, वैसे ही बंधन और मोक्ष को देखो।’ 70-‘अपनी प्राण शक्‍ति को मेरुदंड के ऊपर उठती, एक केंद्र की और गति करती हुई प्रकाश किरण समझो, और इस भांति तुममें जीवंतता का उदय होता है।’ 71-‘या बीच के रिक्‍त स्‍थानों में यह बिजली कौंधने जैसा है—ऐसा भाव करो। थोड़े से फर्क के साथ यह विधि भी पहली विधि जैसी ही है। या बीच के रिक्‍त स्‍थानों में यह बिजली कौंधने जैसा है—ऐसा भाव करो।’ 72-‘’भाव करो कि ब्रह्मांड एक पारदर्शी शाश्‍वत उपस्‍थिति है।‘’ 73-‘ग्रीष्‍म ऋतु में जब तुम समस्‍त आकाश को अंतहीन निर्मलता में देखो, उस निर्मलता में प्रवेश करो।‘’ 74-‘हे शक्‍ति, समस्‍त तेजोमय अंतरिक्ष मेरे सिर में ही समाहित है, ऐसा भाव करो।’ 75- ‘जागते हुए सोते हुए, स्‍वप्‍न देखते हुए, अपने को प्रकाश समझो।’ 76-‘वर्षा की अंधेरी रात में उस अंधकार में प्रवेश करो,जो रूपों का रूप है।’ 77-‘जब चंद्रमाहीन वर्षा की रात में उपलब्‍ध न हो तो आंखें बंद करो और अपने सामने अंधकार को देखो। फिर आंखे खोकर अंधकार को देखो। इस प्रकार दोष सदा के लिए विलीन हो जाते है।’ 78-‘’जहां कहीं भी तुम्‍हारा अवधान उतरे, उसी बिंदु पर अनुभव। 79- ‘भाव करो कि एक आग तुम्‍हारे पाँव के अंगूठे से शुरू होकर पूरे शरीर में ऊपर उठ रही है। और अंतत: शरीर जलकर राख हो जाता है। लेकिन तुम नहीं।’ 80-‘यह काल्‍पनिक जगत जलकर राख हो रहा है, यह भाव करो; और मनुष्‍य से श्रेष्‍ठतर प्राणी बनो। 81-‘जैसे विषयीगत रूप से अक्षर शब्‍दों में और शब्‍द वाक्‍यों में जाकर मिलते है और विषयगत रूप से वर्तुल चक्रों में और चक्र मूल-तत्‍व में जाकर मिलते है, वैसे ही अंतत: इन्‍हें भी हमारे अस्‍तित्‍व में आकर मिलते हुए पाओ।’ 82-अनुभव करो: मेरा विचार,मैं-पन, आंतरिक इंद्रियाँ—मुझ 83-(कामना के पहले और जानने के पहले मैं कैसे कह सकता हूं कि मैं हूं। विमर्श करो। सौंदर्य में विलीन हो जाओ।) 84-‘शरीर के प्रति आसक्‍ति को दूर हटाओं और यह भाव करो कि मैं सर्वत्र हूं। जो सर्वत्र है वह आनंदित है।’ 85-''ना-कुछ का विचार करने से सीमित आत्‍मा असीम हो जाती है।’' 86-‘भाव करो कि मैं किसी ऐसी चीज की चिंतना करता हूं जो दृष्‍टि के परे है, जो पकड़ के परे है। जो अनस्‍तित्‍व के, न होने के परे है—मैं।’ 87-मैं हूं, यह मेरा है। यह-यह है। हे प्रिये, भाव में भी असीमत: उतरो। 88-प्रत्‍येक वस्‍तु ज्ञान के द्वारा ही देखी जाती है। ज्ञान के द्वारा ही आत्‍मा क्षेत्र में प्रकाशित होती है। उस एक को ज्ञाता और ज्ञेय की भांति देखो।’ 89-‘हे प्रिये, इस क्षण में मन, ज्ञान, प्राण, रूप, सब को समाविष्‍ट होने दो।’ 90-आँख की पुतलियों को पंख की भांति छूने से उनके बीच का हलकापन ह्रदय में खुलता है। और वहां ब्रह्मांड व्‍याप जाता है।’ 91-‘’हे दयामयी, अपने रूप के बहुत ऊपर और बहुत नीचे, आकाशीय उपस्‍थिति में प्रवेश करो।‘’ 92-‘चित को ऐसी अव्‍याख्‍य सूक्ष्‍मता में अपने ह्रदय के ऊपर, नीचे और भीतर रखो।’ 93-अपने वर्तमान रूप का कोई भी अंग असीमित रूप से विस्‍तृत जानो। 94-अपने शरीर, अस्‍थियों मांस और रक्‍त को ब्रह्मांडीय सार से भरा हुआ अनुभव करो। 95-‘अनुभव करो कि सृजन के शुद्ध गुण तुम्‍हारे स्‍तनों में प्रवेश करके सूक्ष्‍म रूप धारण कर रहे है।’ 96-'किसी ऐसे स्‍थान पर वास करों जो अंतहीन रूप से विस्‍तीर्ण हो, वृक्षों, पहाड़ियों, प्राणियों से रहित हो। तब मन के भारों का अंत हो जाता है।' 97-'अंतरिक को अपना ही आनंद-शरीर मानो।'- 98-किसी सरल मुद्रा में दोनों कांखों के मध्‍य–क्षेत्र (वक्षस्‍थल) में धीरे-धीरे शांति व्‍याप्‍त होने दो। 99-‘स्‍वयं को सभी दिशाओं में परिव्‍याप्‍त होता हुआ महसूस करो—सुदूर, समीप।’ 100-‘वस्‍तुओं और विषयों का गुणधर्म ज्ञानी व अज्ञानी के लिए समान ही होता है। ज्ञानी की महानता यह है कि वह आत्‍मगत भाव में बना रहता है। वस्‍तुओं में नहीं खोता।’ 101- ‘सर्वज्ञ, सर्वशक्‍तिमान, सर्वव्‍यापी मानो।’ 102-‘अपने भीतर तथा बाहर एक साथ आत्‍मा की कल्‍पना करो। जब तक कि संपूर्ण अस्‍तित्‍व आत्‍मवान न हो जाए।’ 103-अपनी संपूर्ण चेतना से कामना के, जानने के आरंभ में ही जानो। 104-‘हे शक्‍ति, प्रत्‍येक आभास सीमित है, सर्वशक्‍तिमान में विलीन हो रहा है।’ 105-‘सत्‍य में रूप अविभक्‍त है। सर्वव्‍यापी आत्‍मा तथा तुम्‍हारा अपना रूप अविभक्‍त है। दोनों को इसी चेतना से निर्मित जानो।’ 106-'हर मनुष्‍य की चेतना को अपनी ही चेतना जानो। अंत: आत्‍मचिंता को त्‍यागकर प्रत्‍येक प्राणी हो जाओ।’ 107-‘यह चेतना ही प्रत्‍येक प्राणी के रूप में है। अन्‍य कुछ भी नहीं है।’ 108-‘यह चेतना ही प्रत्‍येक की मार्ग दर्शक सत्ता है, यही हो रहो।’ 109-अपने निष्‍क्रिय रूप को त्‍वचा की दीवारों का एक रिक्‍त कक्ष मानो—सर्वथा रिक्‍त। 110-‘हे गरिमामयी, लीला करो। यह ब्रह्मांड एक रिक्‍त खोल है जिसमें तुम्‍हारा मन अनंत रूप से कौतुक करता है।’ 111-‘हे प्रिये, ज्ञान और अज्ञान, अस्‍तित्‍व और अनस्‍तित्‍व पर ध्‍यान दो। फिर दोनों को छोड़ दो ताकि तुम हो सको।’ 112-‘आधारहीन, शाश्‍वत, निश्‍चल आकाश में प्रविष्‍ट होओ।’ कौन हैं शिव 02 FACTS;- 1-शिव पशुपति हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं,उनकी शादी में बड़े से बड़े और छोटे से छोटे लोग शामिल हुए। सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीव उनकी शादी में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे।सभी देवता तो वहां मौजूद थे ही, साथ ही असुर भी वहां पहुंचे। आम तौर पर जहां देवता जाते थे, वहां असुर जाने से मना कर देते थे और जहां असुर जाते थे, वहां देवता नहीं जाते थे। 2-पर्वत राज ने शिव से अनुरोध किया, ‘कृपया अपने वंश के बारे में कुछ बताइए।’ नारद ने सभी को बताया कि... '' इनके माता-पिता ही नहीं हैं। इनकी कोई विरासत नहीं है। इनका कोई गोत्र नहीं है। इसके पास कुछ नहीं है। इनके पास अपने खुद के अलावा कुछ नहीं है।क्योंकि यह स्वयंभू हैं। इन्होंने खुद की रचना की है। इनके न तो पिता हैं न माता। इनका न कोई वंश है, न परिवार। यह किसी परंपरा से ताल्लुक नहीं रखते और न ही इनके पास कोई राज्य है। इनका न तो कोई गोत्र है, और न कोई नक्षत्र। न कोई भाग्यशाली तारा इनकी रक्षा करता है। यह इन सब चीजों से परे हैं। यह एक योगी हैं और इन्होंने सारे अस्तित्व को अपना एक हिस्सा बना लिया है। इनके लिए सिर्फ एक वंश है – ध्वनि। आदि, शून्य प्रकृति जब अस्तित्व में आई, तो अस्तित्व में आने वाली पहली चीज थी – ध्वनि। इनकी पहली अभिव्यक्ति एक ध्वनि के रूप में है। ये सबसे पहले एक ध्वनि के रूप में प्रकट हुए। उसके पहले ये कुछ नहीं थे। यही वजह है कि मैं यह तार(वीणा का) खींच रहा हूं।''शिव सिखाते हैं,सच्चे प्रेम का मतलब क्‍या है? 16 FACTS;- 1-शिव जैसा सरल और सहज कोई नहीं.शिव का प्रेम सरल है, सहज है, उसमें समर्पण के साथ सम्मान भी है। 2-शिव प्रथम पुरुष हैं, फिर भी उनके किसी स्वरूप में पुरुषोचित अहंकार यानी मेल ईगो नहीं झलकता। सती के पिता दक्ष से अपमानित होने के बाद भी उनका मेल ईगो उनके दाम्पत्य में कड़वाहट नहीं जगाता।अपने लिए न्‍योता नहीं आने पर भी सती के मायके जाने की जिद का शिव ने सहजता से सम्मान किया। 3-आज के समय में भी कितने ऐसे मर्द हैं, जो पत्नी के घरवालों के हाथों अपमानित होने के बाद उसका उनके पास वापस जाना सहन कर पाएंगे? शिव का पत्नी के लिए प्यार किसी तीसरे के सोचने-समझने की परवाह नहीं करता।लेकिन जब पत्नी को कोई चोट पहुंचती है, तब उनके क्रोध में सृष्टि को खत्म कर देने का ताप आ जाता है। 4-हिंदू मान्यताएं कहती हैं कि बेटा राम सा हो, प्रेमी कृष्ण सा, लेकिन पति शिव सा होना चाहिए।क्योंकि शिव सा पति पाने के लिए केवल माता पार्वती ने ही तप नहीं किया, शिव ने भी शक्ति को हासिल करने लिए खुद को उतना ही तपाया। 5-शक्ति के प्रति अपने प्रेम में शिव खुद को खाली कर देते हैं। कहते हैं, माता पार्वती का हाथ मांगने शिव, उनके पिता हिमालय के दरबार में सुनट नर्तक का रूप धरकर पहुंच गए थे।हाथों में डमरू लिए, अपने नृत्य से हिमालय को प्रसन्न कर.. जब शिव को कुछ मांगने को कहा गया, तब उन्होंने माता पार्वती का हाथ उनसे मांगा। 6-यूं व्यावहारिकता के मानकों पर देखा जाए, तो शिव के पास ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे देख-सुनकर ब्याह पक्का कराने वाले मां-बाप अपने बेटी के लिए ढूंढते हैं।औघड़, फक्कड़, शिव, कैलाश पर पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए एक घर तक नहीं बनवा पाए, तप के लिए परिवार छोड़ वर्षों दूर रहने वाले शिव।साथ के जो सेवक वो भी मित्रवत, जिनके भरण की सारी जिम्मेदारी माता पार्वती पर।माता पार्वती के पास अपनी भाभी, लक्ष्मी की तरह एश्वर्य और समृद्धि का भी कोई अंश नहीं। 7-फिर भी माता पार्वती के पास कुछ ऐसा है, जिसे हासिल कर पाना आधुनिक समाज की औरतों के लिए आज भी बड़ी चुनौती है।माता पार्वती के पास अपने फैसले स्वयं लेने की आजादी है।वो अधिकार, जिसके सामने दुनिया की तमाम दौलत फीकी पड़ जाए। 8-माता पार्वती के हर निर्णय में शिव उनके साथ है।पुत्र के रूप में गणेश के सृजन का फैसला पार्वती के अकेले का था, वो भी तब, जब शिव तपस्या में लीन थे।लेकिन घर लौटने पर गणेश को स्वीकार कर पाना शिव के लिए उतना ही सहज रहा, बिना कोई प्रश्न किए, बिना किसी संदेह के।माता पार्वती का हर निश्चय शिव को मान्य है। 9-शिव अपनी पत्नी के संरक्षक नहीं, पूरक हैं।वह अपना स्वरूप पत्नी की तत्कालिक जरूरतों के हिसाब से निर्धारित करते हैं। माता पार्वती के मातृत्व रूप को शिव के पौरुष का संरक्षण है, तो रौद्र रूप धर विनाश के पथ पर चली काली के चरणों तले लेट जाने में भी शिव को कोई संकोच नहीं। 10-शिव के पौरुष में अहंकार की ज्वाला नहीं, क्षमा की शीतलता है।किसी पर विजय पाने के लिए शिव ने कभी अपने पौरुष को हथियार नहीं बनाया, कभी किसी के स्त्रीत्व का फायदा उठाकर उसका शोषण नहीं किया। शिव ने छल से कोई जीत हासिल नहीं की। शिव का जो भी निर्णय है, प्रत्यक्ष है। 11-वहीं दूसरी ओर शक्ति अपने आप में संपूर्ण है, अपने साथ पूरे संसार की सुरक्षा कर सकने में सक्षम। उन्हें पति का साथ अपने सम्मान और रक्षा के लिए नहीं चाहिए, प्रेम और साहचर्य के लिए चाहिए। इसलिए शिव और शक्ति का साथ बराबरी का है। माता पार्वती, शिव की अनुगामिनी नहीं, अर्धांगिनी हैं। 12-कथाओं की मानें, तो चौसर खेलने की शुरुआत शिव और माता पार्वती ने ही की। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि गृहस्थ जीवन में केवल कर्तव्य ही नहीं होते, स्वस्थ रिश्ते के लिए साथ बैठकर मनोरंजन और आराम के पल बिताना भी उतना ही जरूरी है। शिव और माता पार्वती का साथ सुखद गृहस्थ जीवन का अप्रतिम उदाहरण है। 13-अलग-अलग लोक कथाओं में शिव और शक्ति कई बार एक-दूसरे से दूर हुए, लेकिन हर बार उन्‍होंने एक-दूसरे को ढूंढकर अपनी संपूर्णता को पा लिया। इसलिए शिव और माता पार्वती का प्रेम हमेशा सामयिक रहेगा, स्थापित मान्यताओं को चुनौती देता हुआ। क्योंकि शिव होने का मतलब प्रेम में बंधकर भी निर्मोही हो जाना है, शिव होने का मतलब प्रेम में आधा बंटकर भी संपूर्ण हो जाना है। 14-शिव न अपने प्रेम का हर्ष छिपाना जानते हैं, न अपने विरह का शोक। . उनका प्रेम निर्बाध और नि:संकोच है, वह मर्यादा और अमर्यादा की सामयिक और सामाजिक परिभाषा की कोई परवाह नहीं करता। महाकाली ने रक्तबीज का वध किया लेकिन तब तक महाकाली का गुस्सा इतना विक्राल रूप से चुका था की उनको शांत करना जरुरी था.. मगर हर कोई उनके समीप जाने से भी डर रहा था। 15-सभी देवता भगवान शिव के पास गए और महाकाली को शांत करने के लिए प्रार्थना करने लगे। भगवान् शिव ने उन्हें बहुत प्रकार से शांत करने की कोशिश करी जब सभी प्रयास विफल हो गए तो वह उनके मार्ग में लेट गए। जब उनके चरण भगवान शिव पर पड़े तो वह एकदम से ठिठक गई। उनका क्रोध शांत हो गया।भोलेनाथ स्वयं माता के सामने लेट गए, तथा इसी वक़्त अपने पति के ऊपर पैर रखने के कारण काली रूप में स्थित माता पार्वती की जीभ बाहर आ गयी। इसीलिए हर काली रूप में माता की जीभ बाहर निकली हुई होती है।केवल भगवान शिव ही ऐसे पति है.. जो अपनी पत्नी महाकाली को वक्षस्थल में स्थान देकर गौरवान्वित महसूस करते है। 16-भगवती श्री पार्वती भगवान शिव की आदिशक्ति हैं। उन्होंने जहां विनय और प्रेम की प्रतिमूर्ति होकर पति के आधे अंग में स्थान प्राप्त किया और उन्हें अर्धनारीश्वर बनाया, वहीं स्वामी को अपनी विराट शक्ति देकर मृत्युंजय के रूप में प्रतिष्ठित किया। भगवती श्री पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों को सेनानी और गणाध्यक्ष बनाया तथा स्वयं भी लोक कल्याण के लिए शस्त्र उठाकर चंड मुंड विनाशिनी चामुंडा बनीं। वेद, उपनिषद, पुराण सभी उनकी अनंत महिमा का गान करते हैं। भोलेनाथ भावुक प्रेमी और के रूप में;- 03 FACTS;- 1-शिव या महादेव हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक है। वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव भी कहते हैं। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ,गंगाधार के नाम से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धांगिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश हैं, तथा पुत्री अशोक सुंदरी हैं। शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। शिव के गले में नाग देवता विराजित हैं और हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं। कैलाश में उनका वास है। यह शैव मत के आधार है। इस मत में शिव के साथ शक्ति सर्व रूप में पूजित है। 2-भगवान शिव तो वैरागी हैं, न उन्हें सम्मान का मोह है, न अपमान का भय। पर वैरागी से यह मतलब नहीं कि उन्हें किसी चीज से कोई मतलब नहीं रहता। वे सांसारिक मोह माया से दूर रहकर भी अपने दाम्पत्य जीवन को बखूबी निभाते हैं।विवाह के नियमों का पालन करते हुए खुद को माया से दूर रखने वाले हैं हमारे महादेव। 3-यह सब उनके वैराग्य का ही एक रूप है। भोलेनाथ भावुक प्रेमी के साथ भयंकर रूप से क्रोधित होनेवाले हैं। इस तरह के उनके कई रूप हैं। लेकिन भावुक प्रेमी वाला रूप सबसे सुंदर है। दरअसल यह रूप वो अपनी प्रिय पत्नी सती के सामने रखते हैं – वो रूप है प्रेम का। लेकिन प्रेम के इस रूप में भी शिव आध्यात्म का संपूर्ण ज्ञान बांट देते हैं। सती के बीच हुए छोटे से संवाद में भी अपनी प्रिय सती को वो मोक्ष और प्रेम, दोनों की परिभाषा समझाने की कोशिश करते हैं। प्यार के माध्यम से संसार की शक्ति, संसार में एकरूपता की बात करते है। क्या माता भोलेनाथ की इड़ा है? भगवान शिव और माता वास्‍तव में युगल नहीं हैं ..बल्कि स्वयं में ध्यानलीन होना है।माता वास्‍तव में भोलेनाथ की इड़ा है और भोलेनाथ माता की पिंगला। दोनों एकरूप, अर्धनारीश्वर है। क्या है इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का रहस्य;- 09 FACTS;- 1-अस्तित्व में सभी कुछ जोड़ों में मौजूद है - स्त्री-पुरुष, दिन-रात, तर्क-भावना आदि। इस दोहरेपन को द्वैत भी कहा जाता है। हमारे अंदर इस द्वैत का अनुभव हमारी रीढ़ में बायीं और दायीं तरफ मौजूद नाड़ियों से पैदा होता है। 2-‘नाड़ी’ का मतलब धमनी या नस नहीं है। नाड़ियां शरीर में उस मार्ग या माध्यम की तरह होती हैं जिनसे प्राण का संचार होता है, शरीर के ऊर्जा‌-कोष में, जिसे प्राणमयकोष कहा जाता है, 72,000 नाड़ियां होती हैं। ये 72,000 नाड़ियां तीन मुख्य नाड़ियों- बाईं, दाहिनी और मध्य यानी इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना से निकलती हैं। 3-रीढ़ के दोनों ओर दो छिद्र होते हैं, जो वाहक नली की तरह होते हैं, जिनसे होकर सभी धमनियां गुजरती हैं। ये इड़ा और पिंगला, यानी बायीं और दाहिनी नाड़ियां हैं। 4-इड़ा और पिंगला जीवन की बुनियादी द्वैतता की प्रतीक हैं। इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव और शक्ति का नाम देते हैं। या आप इसे बस पुरुषोचित और स्त्रियोचित कह सकते हैं, या यह आपके दो पहलू – लॉजिक या तर्क-बुद्धि और इंट्यूशन या सहज-ज्ञान हो सकते हैं। जीवन की रचना भी इसी के आधार पर होती है। इन दोनों गुणों के बिना, जीवन ऐसा नहीं होता, जैसा वह अभी है। सृजन से पहले की अवस्था में सब कुछ मौलिक रूप में होता है। उस अवस्था में द्वैत नहीं होता। लेकिन जैसे ही सृजन होता है, उसमें द्वैतता आ जाती है। 5-पुरुषोचित और स्त्रियोचित का मतलब लिंग भेद से - या फिर शारीरिक रूप से पुरुष या स्त्री होने से - नहीं है, बल्कि प्रकृति में मौजूद कुछ खास गुणों से है। प्रकृति के कुछ गुणों को पुरुषोचित माना गया है और कुछ अन्य गुणों को स्त्रियोचित। आप भले ही पुरुष हों, लेकिन यदि आपकी इड़ा नाड़ी अधिक सक्रिय है, तो आपके अंदर स्त्रियोचित गुण हावी हो सकते हैं। आप भले ही स्त्री हों, मगर यदि आपकी पिंगला अधिक सक्रिय है, तो आपमें पुरुषोचित गुण हावी हो सकते हैं। 6-अगर आप इड़ा और पिंगला के बीच संतुलन बना पाते हैं तो दुनिया में आप प्रभावशाली हो सकते हैं। इससे आप जीवन के सभी पहलुओं को अच्छी तरह संभाल सकते हैं। अधिकतर लोग इड़ा और पिंगला में जीते और मरते हैं, मध्य स्थान सुषुम्ना निष्क्रिय बना रहता है। लेकिन सुषुम्ना मानव शरीर-विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है, जीवन असल में तभी शुरू होता है। 7-मूल रूप से सुषुम्ना गुणहीन होती है, उसकी अपनी कोई विशेषता नहीं होती। वह एक तरह की शून्‍यता या खाली स्थान है। अगर शून्‍यता है तो उससे आप अपनी मर्जी से कोई भी चीज बना सकते हैं। सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवेश होते ही, आपमें वैराग्‍य आ जाता है। ‘राग’ का अर्थ होता है, रंग। ‘वैराग्य’ का अर्थ है, रंगहीन यानी आप पारदर्शी हो गए हैं। 8-आप अगर इड़ा या पिंगला के प्रभाव में हैं तो आप बाहरी स्थितियों को देखकर प्रतिक्रिया करते हैं। लेकिन एक बार सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवेश हो जाए, तो आप एक नए किस्म का संतुलन पा लेते हैं। अगर आप पारदर्शी हो गए, तो आपके पीछे लाल रंग होने पर आप भी लाल हो जाएंगे। अगर आपके पीछे नीला रंग होगा, तो आप नीले हो जाएंगे। आप निष्पक्ष हो जाते हैं। आप जहां भी रहें, आप वहीं का एक हिस्सा बन जाते हैं लेकिन कोई चीज आपसे चिपकती नहीं। आप जीवन के सभी आयामों को खोजने का साहस सिर्फ तभी करते हैं, जब आप आप वैराग की स्थिति में होते हैं। 9-अगर आप इड़ा या पिंगला के प्रभाव में हैं तो आप बाहरी स्थितियों को देखकर प्रतिक्रिया करते हैं। लेकिन एक बार सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवेश हो जाए, तो आप एक नए किस्म का संतुलन पा लेते हैं, एक अंदरूनी संतुलन, जिसमें बाहर चाहे जो भी हो, आपके अंदर एक खास जगह होती है, जो किसी भी तरह की हलचल में कभी अशांत नहीं होती, जिस पर बाहरी स्थितियों का असर नहीं पड़ता। आप चेतनता की चोटी पर सिर्फ तभी पहुंच सकते हैं, जब आप अपने अंदर यह स्थिर अवस्था बना लें। सृष्टि की मुख्य दो प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति क्या है ?- 04 FACTS;- 1-सृष्टि की मुख्य दो प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति है ;- 1-1- देव प्रवृत्ति(peacock tendency) 1-2-दानवी प्रवृत्ति(pig tendency) 2-दानवी प्रवृत्ति/अंधकार प्रवृत्ति, मानव की जन्मजात प्रवृत्ति है परंतु देव प्रवृत्ति/प्रकाश प्रवृत्ति अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर जाना कठिन है। 3-रावण भगवान शंकर का बड़ा भक्त था। वह महा तेजस्वी, प्रतापी, पराक्रमी, रूपवान तथा विद्वान था।श्री रामचंद्र जी की सभी चेष्टाएं धर्म, ज्ञान, नीति, शिक्षा, गुण, प्रभाव, तत्व एवं रहस्य से भरी हैं। परंतु श्रीराम और रावण में मुख्य रूप से केवल एक ही अन्तर हैं...,विषयासक्त (self-indulgent )और एक आत्म-संयमित (self restraint )व्यक्ति का। 4-आत्म संयम क्या है ? अपनी मानसिक वृत्तियों, बुरी आदतों एवं वासनाओं पर काबू पाना ही संयम शीलता के पथ पर अग्रसर होना है जिससे मनुष्य की शक्तियों का व्यर्थ ही ह्रास न होकर केन्द्रीयकरण होने लगता है जो जीवन में एक विशेषता ला देता है जिसके कारण मनुष्य जीवन में क्या से क्या बन जाता है। 4-1-विश्व के महान पुरुषों की जीवनियों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि उन्होंने जीवन में जो भी सफलता, उन्नति, श्रेय, महानता, आत्म कल्याण आदि की प्राप्ति की, उनके कारणों में संयम शीलता की प्रधानता है। संयम के पथ पर अग्रसर होकर ही उन्होंने अपने जीवन को महान बनाया। इसमें कोई संदेह नहीं कि संयम शीलता के पथ पर चल कर ही मनुष्य सही मानव बनता है, देवता बनता है, बनता है जन-जन का प्रिय, जैसे श्री राम ..जिसके पीछे चलकर मानव जाति धन्य हो जाती है। विज्ञान भैरव तंत्र के 112 सूत्र विधियां का वर्णन;;- 03 FACTS;- 1-यदि''रावण के अनुसार'' ...अध्ययन करना है तो विषयासक्ति को हटाना होगा... भोलेनाथ के, विज्ञान भैरव तंत्र के 112 सूत्र ,चार पुरुषार्थ के प्रतिपादक हैं। पुरुषार्थ से तात्पर्य मानव के लक्ष्य या उद्देश्य से है पुरुषार्थ पुरुष+अर्थ = अर्थात मानव को 'क्या' प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। प्रायः मनुष्य के लिये वेदों में चार पुरुषार्थों का नाम लिया गया है - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसलिए इन्हें 'पुरुषार्थ चतुष्टय' भी कहते हैं। 2-चार्वाक दर्शन/ वर्तमान दर्शन केवल दो ही पुरुषार्थ को मान्यता देता है- अर्थ और काम। वह धर्म और मोक्ष को नहीं मानता। 3-योगवासिष्ठ के अनुसार सद्जनो और शास्त्र के उपदेश अनुसार चित्त का विचरण ही पुरुषार्थ कहलाता है। भारतीय संस्कृति में इन चारों पुरूषार्थो का विशिष्ट स्थान रहा है ।वस्तुतः इन पुरूषार्थो ने ही भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता के साथ भौतिकता का एक अद्भुत समन्वय स्थापित किया है ।CONTD.... ....SHIVOHAM...