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क्या है विज्ञानमय कोश /WISDOM BODY की सोऽहं साधना और ग्रन्थि-भेदन?PART-01

विज्ञानमय कोश के चार प्रधान अंग हैं।


1- सोऽहं साधना 2-ग्रन्थि-भेदन 3- स्वर संयम 4- आत्म -अनुभूति योग


विज्ञानमय कोश का पहला अंग सोऽहं साधना;-

12 FACTS;-

1-कुण्डलिनी जागरण के लिये प्रयुक्त होने वाली सोहम् साधना-अजपा के विज्ञान एवं विधान के समन्वय को हंसयोग कहते हैं। जिस प्रकार wood में अग्नि और तिलों में तेल रहता है। उसी प्रकार समस्त वेदों में ‘हंस’ ब्रह्म रहता है। जो उसे जान लेता है सो मृत्यु से छूट जाता है। सोहम् ध्वनि को निरन्तर करते रहने से उसका एक शब्द चक्र बन जाता है जो उलट कर हंस सदृश प्रतिध्वनित होता है। इसी आधार पर उस साधना का एक नाम हंसयोग भी रहा गया है।योग रसायन के अनुसार हंस, हंसो —इस क्रम से जप करते रहने पर शीघ्र ही ‘सोहं-सोहं’ ऐसा जप होने लगता है।अभ्यास के अनन्तर चलते, बैठते और सोते समय भी हंस मन्त्र का चिन्तन, (सांस लेते समय ‘सो’ छोड़ते समय ‘ह’ का चिन्तन अभ्यास) परम सिद्धिदायक है। इसे ही ‘हंस’, ‘हंसो ’ या ‘सोहं’ मन्त्र कहते हैं। जब मन उसे हंस तत्व में लीन हो जाता है तो मन के संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं और शक्ति रूप, ज्योति रूप, शुद्ध-बुद्ध, नित्य निरंजन ब्रह्म का प्रकाश... प्रकाशवान होता है।

2-ब्रह्म विद्योपनिषद् के अनुसार ''प्राणियों की देह में भगवान ‘हंस’ रूप में अवस्थित है। हंस ही परम सत्य है, हंस ही परम् बल है। समस्त देवताओं के बीच ‘हंस’ ही परमेश्वर है। हंस ही परम वाक्य है, हंस ही वेदों का सार है, हंस परम् रुद्र है, हंस ही परात्पर है।समस्त देवों के बीच हंस अनुपम ज्योति बनकर विद्यमान है।सदा तन्मयतापूर्वक हंस मन्त्र का जप निर्मल प्रकाश का ध्यान करते हुए करना चाहिए। जो हृदय में अवस्थित अनाहत ध्वनि सहित प्रकाशवान चिदानन्द ‘हंस’ तत्व को जानता है सो हंस ही कहा जाता है।जो अमृत से अभिसिंचन करते हुए ‘हंस’ तत्व का जप करता है उसे सिद्धियों और विभूतियों की प्राप्ति होती है। इस संसार में ‘हंस’ विद्या के समान और कोई साधन नहीं। इस महाविद्या को देने वाला ज्ञानी सब प्रकार सेवा करने योग्य है''। जिस प्रकार हंस स्वच्छन्द होकर आकाश में उड़ता है उसी प्रकार इस हंसयोग का साधक सर्व बन्धनों से विमुक्त होता है।

3-‘ह’ और ‘स’ अक्षरों से कई प्रकार के अर्थ निकलते हैं और दोनों के योग से साधक को एक उपयुक्त धारा मिलती है। श्वास के निकलने में ‘हकार’ और प्रविष्ट होने में साकार होता है। हकार शिवरूप और साकार शक्तिरूपा कहलाता है। हकार से सूर्य या दक्षिण स्वर होता है और साकार से चन्द्र या वाम स्वर होता है। इस सूर्य चन्द्र दोनों स्वरों में समता स्थापित हो जाने का नाम हंसयोग है। हम द्वारा सब दोषों की कारणभूत जड़ता का नाश हो जाता है और तब साधक क्षेत्रज्ञ (परमात्मा) से एकता प्राप्त कर लेता है। जीवात्मा सहज स्वभाव सोहम् का जप श्वास-प्रश्वास क्रिया के साथ-साथ अनायास ही करता रहता है।यह संख्या औसतन चौबीस घंटे में 21600 के लगभग हो जाती है।यह जीव हकार की ध्वनि से बाहर आता है और साकार की ध्वनि से भीतर जाता है ..इस प्रकार वह सदा हंस-हंस जप करता रहता है। इस तरह वह एक दिन रात में जीव इक्कीस हजार छह सो मंत्र सदा जपता रहता है।

4-सोहम् पद में से साकार और हकार का लोप करके संधि योजना करके वह प्रणव ॐकार रूप हो जाता है।हंस योग के अभ्यास का असाधारण महत्व है। उसे कुण्डलिनी जागरण साधना का तो एक अंग ही माना गया है।कुण्डलिनी शक्ति आत्म क्षेत्र में हंसारूढ़ होकर विचरती है। यों हंस पक्षी स्वच्छ धवलता ..नीर क्षीर विवेकयुक्त आहार जैसी उत्कृष्टताओं का प्रतीक माना गया है किन्तु तात्विक दृष्टि से हंस योग की सोहम् की साधना का निर्देश माना जाना ही उचित है। देह देवालय है। इसमें जीव रूप में शिव विराजमान हैं। इसकी पूजा वस्तुओं से नहीं सोऽहम् साधना से करनी चाहिए। अन्तःकरण में हंस वृत्ति की स्थापना की यह अजपा साधना करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता है।इसके संकल्प मात्र से सब पापों से छुटकारा हो जाता है।इसके समान न कोई विद्या है, न इसके समान कोई ज्ञान ही भूत-भविष्य काल में हो सकता है। श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि का और छोड़ते समय ‘हम्’ ध्यान के प्रवाह को सूक्ष्म श्रवण शक्ति के सहारे अन्तः भूमिका में अनुभव करना ..यही हैं संक्षेप में ‘सोऽहम्’ साधना।

5-सो का तात्पर्य परमात्मा और हम् का जीवचेतना ..समझा जाना चाहिए। विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त महाप्राण नासि