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क्या है विज्ञानमय कोश /WISDOM BODY की सोऽहं साधना और ग्रन्थि-भेदन?PART-01

विज्ञानमय कोश के चार प्रधान अंग हैं।


1- सोऽहं साधना 2-ग्रन्थि-भेदन 3- स्वर संयम 4- आत्म -अनुभूति योग


विज्ञानमय कोश का पहला अंग सोऽहं साधना;-

12 FACTS;-

1-कुण्डलिनी जागरण के लिये प्रयुक्त होने वाली सोहम् साधना-अजपा के विज्ञान एवं विधान के समन्वय को हंसयोग कहते हैं। जिस प्रकार wood में अग्नि और तिलों में तेल रहता है। उसी प्रकार समस्त वेदों में ‘हंस’ ब्रह्म रहता है। जो उसे जान लेता है सो मृत्यु से छूट जाता है। सोहम् ध्वनि को निरन्तर करते रहने से उसका एक शब्द चक्र बन जाता है जो उलट कर हंस सदृश प्रतिध्वनित होता है। इसी आधार पर उस साधना का एक नाम हंसयोग भी रहा गया है।योग रसायन के अनुसार हंस, हंसो —इस क्रम से जप करते रहने पर शीघ्र ही ‘सोहं-सोहं’ ऐसा जप होने लगता है।अभ्यास के अनन्तर चलते, बैठते और सोते समय भी हंस मन्त्र का चिन्तन, (सांस लेते समय ‘सो’ छोड़ते समय ‘ह’ का चिन्तन अभ्यास) परम सिद्धिदायक है। इसे ही ‘हंस’, ‘हंसो ’ या ‘सोहं’ मन्त्र कहते हैं। जब मन उसे हंस तत्व में लीन हो जाता है तो मन के संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं और शक्ति रूप, ज्योति रूप, शुद्ध-बुद्ध, नित्य निरंजन ब्रह्म का प्रकाश... प्रकाशवान होता है।

2-ब्रह्म विद्योपनिषद् के अनुसार ''प्राणियों की देह में भगवान ‘हंस’ रूप में अवस्थित है। हंस ही परम सत्य है, हंस ही परम् बल है। समस्त देवताओं के बीच ‘हंस’ ही परमेश्वर है। हंस ही परम वाक्य है, हंस ही वेदों का सार है, हंस परम् रुद्र है, हंस ही परात्पर है।समस्त देवों के बीच हंस अनुपम ज्योति बनकर विद्यमान है।सदा तन्मयतापूर्वक हंस मन्त्र का जप निर्मल प्रकाश का ध्यान करते हुए करना चाहिए। जो हृदय में अवस्थित अनाहत ध्वनि सहित प्रकाशवान चिदानन्द ‘हंस’ तत्व को जानता है सो हंस ही कहा जाता है।जो अमृत से अभिसिंचन करते हुए ‘हंस’ तत्व का जप करता है उसे सिद्धियों और विभूतियों की प्राप्ति होती है। इस संसार में ‘हंस’ विद्या के समान और कोई साधन नहीं। इस महाविद्या को देने वाला ज्ञानी सब प्रकार सेवा करने योग्य है''। जिस प्रकार हंस स्वच्छन्द होकर आकाश में उड़ता है उसी प्रकार इस हंसयोग का साधक सर्व बन्धनों से विमुक्त होता है।

3-‘ह’ और ‘स’ अक्षरों से कई प्रकार के अर्थ निकलते हैं और दोनों के योग से साधक को एक उपयुक्त धारा मिलती है। श्वास के निकलने में ‘हकार’ और प्रविष्ट होने में साकार होता है। हकार शिवरूप और साकार शक्तिरूपा कहलाता है। हकार से सूर्य या दक्षिण स्वर होता है और साकार से चन्द्र या वाम स्वर होता है। इस सूर्य चन्द्र दोनों स्वरों में समता स्थापित हो जाने का नाम हंसयोग है। हम द्वारा सब दोषों की कारणभूत जड़ता का नाश हो जाता है और तब साधक क्षेत्रज्ञ (परमात्मा) से एकता प्राप्त कर लेता है। जीवात्मा सहज स्वभाव सोहम् का जप श्वास-प्रश्वास क्रिया के साथ-साथ अनायास ही करता रहता है।यह संख्या औसतन चौबीस घंटे में 21600 के लगभग हो जाती है।यह जीव हकार की ध्वनि से बाहर आता है और साकार की ध्वनि से भीतर जाता है ..इस प्रकार वह सदा हंस-हंस जप करता रहता है। इस तरह वह एक दिन रात में जीव इक्कीस हजार छह सो मंत्र सदा जपता रहता है।

4-सोहम् पद में से साकार और हकार का लोप करके संधि योजना करके वह प्रणव ॐकार रूप हो जाता है।हंस योग के अभ्यास का असाधारण महत्व है। उसे कुण्डलिनी जागरण साधना का तो एक अंग ही माना गया है।कुण्डलिनी शक्ति आत्म क्षेत्र में हंसारूढ़ होकर विचरती है। यों हंस पक्षी स्वच्छ धवलता ..नीर क्षीर विवेकयुक्त आहार जैसी उत्कृष्टताओं का प्रतीक माना गया है किन्तु तात्विक दृष्टि से हंस योग की सोहम् की साधना का निर्देश माना जाना ही उचित है। देह देवालय है। इसमें जीव रूप में शिव विराजमान हैं। इसकी पूजा वस्तुओं से नहीं सोऽहम् साधना से करनी चाहिए। अन्तःकरण में हंस वृत्ति की स्थापना की यह अजपा साधना करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता है।इसके संकल्प मात्र से सब पापों से छुटकारा हो जाता है।इसके समान न कोई विद्या है, न इसके समान कोई ज्ञान ही भूत-भविष्य काल में हो सकता है। श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि का और छोड़ते समय ‘हम्’ ध्यान के प्रवाह को सूक्ष्म श्रवण शक्ति के सहारे अन्तः भूमिका में अनुभव करना ..यही हैं संक्षेप में ‘सोऽहम्’ साधना।

5-सो का तात्पर्य परमात्मा और हम् का जीवचेतना ..समझा जाना चाहिए। विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त महाप्राण नासिका द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करता है और अंग प्रत्यंग में जीवकोश तथा नाड़ी तन्तु में प्रवेश करके उसको अपने सम्पर्क संसर्ग का लाभ प्रदान करता है। यह अनुभूति ‘सो’ शब्द ध्वनि के साथ अनुभूति भूमिका में उतरनी चाहिए। और ‘हम्’ शब्द के साथ जीव भाव द्वारा इस काया पर से अपना कब्जा छोड़कर चले जाने की मान्यता प्रगाढ़ की जानी चाहिए।जीव भाव अर्थात् स्वार्थवादी संकीर्णता, काम, क्रोध, लोभ मोह भरी मद मत्सरता ..अपने को शरीर या मन के रूप में अनुभव करते रहने वाली आत्मा की दिग्भ्रान्त स्थिति का नाम ही जीव भूमिका है। इस भ्रम जंजाल भरे जीव भाव को हटा दिया जाय तो फिर अपना विशुद्ध अस्तित्व ईश्वर के अविनाशी अंश आत्मा के रूप में ही शेष रह जाता है, यही है सोऽहम् साधना का तत्वज्ञान। श्वास प्रश्वास क्रिया के माध्यम से सो और हम् ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जागृत किया जाता है कि अपना स्वरूप ही बदल रहा है अब शरीर और मन पर से लोभ-मोह का-वासना-तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है।

6-सोऽहम् साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अन्तःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियन्त्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा सकता है। श्वास ध्वनि ग्रहण करते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम्’ की धारणा में लगना चाहिए। प्रयत्न करना चाहिए कि इन शब्दों के आरम्भ में अति मन्द स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमशः प्रखरता आती चली जाय। चिंतन का स्वरूप यह होना चाहिए कि सांस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काया में भीतर प्रवेश कर रहे हैं। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है, वरन् -एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र की कल्पना करनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थायी रूप से समाविष्ट हो गई। हार्ट, लंग्स , लिवर ,किडनी आदि में भगवान का प्रवेश हो गया। रक्त के साथ प्रत्येक नस नाड़ी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना शासन स्थापित कर लिया। वाह्य अंगों ने, पांच कर्मेन्द्रियों और पांच ज्ञानेन्द्रियों ने भगवान के अनुशासन में रहना और उनका निर्देश पालन करना स्वीकार कर लिया।

7-जीभ वही बोलेगी जो ईश्वरी प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक हो। देखना, सुनना, बोलना, चलना आदि इन्द्रियजन्य गतिविधियां दिव्य निर्देशों का ही अनुगमन करेंगी। ज्ञानेन्द्रिय का उपयोग वासना के लिए नहीं मात्र ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए ही किया जायेगा। हाथ-पांव मानवोचित कर्तव्य पालन के अतिरिक्त ऐसा कुछ न करेंगे जो ईश्वरीय सत्ता को कलंकित करता हो। मस्तिष्क ऐसा कुछ न सोचेगा जिसे उच्च आदर्शों के प्रतिकूल ठहराया जा सके। बुद्धि कोई अनुचित न्यायविरुद्ध एवं अदूरदर्शी अविवेक भरा निर्णय न करेगी। चित्त में अवांछनीय एवं निकृष्ट स्तरीय आकांक्षाएं न जमने पायेंगी।यही हैं वे भावनायें जो शरीर और मन पर भगवान का शासन स्थापित होने के तथ्य को यथार्थ सिद्ध कर सकती हैं।सोहम् साधना के पूर्वार्ध में अपने शरीर पर श्वसन क्रिया के साथ प्रविष्ट हुये महाप्राण की—परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन चिंतन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक प्रत्यक्ष तथ्य के रूप में दृष्टिगोचर होने लगे।

8-वायु जब छोटे छिद्र में होकर वेगपूर्वक निकलती है तो घर्षण के कारण ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है। बांसुरी से स्वर लहरी निकलने का यही आधार है। जंगलों में जहां बांस बहुत उगे होते हैं वहां अक्सर बांसुरी जैसी ध्वनियां सुनने को मिलती हैं। कारण कि बांसों में कहीं कहीं कीड़े छेद कर देते हैं और उन छेदों से जब हवा वेग पूर्वक टकराती है तो उसमें उत्पन्न स्वर प्रवाह सुनने को मिलता है। वृक्षों से टकराकर जब द्रुत गति से हवा चलती है तब भी सनसनाहट सुनाई पड़ती है। यह वायु के घर्षण की ही प्रतिक्रिया है। नासिका छिद्र भी बांसुरी के छिद्रों की तरह हैं। उनकी सीमित परिधि में होकर जब वायु भीतर प्रवेश करेगी तो वहां स्वभावतः ध्वनि उत्पन्न होगी। साधारण श्वास-प्रश्वास के समय भी वह उत्पन्न होती है, पर इतनी धीमी रहती है कि कानों के छिद्र उन्हें सरलतापूर्वक नहीं सुन सकते। प्राणयोग की साधना में गहरे श्वासोच्छवास लेने पड़ते हैं। प्राणायाम का मूल स्वरूप ही यह है कि श्वास जितनी अधिक गहरी, जितनी मन्दगति से ली जा सके लेनी चाहिए और फिर कुछ समय भीतर रोक कर धीरे-धीरे उस वायु को पूरी तरह खाली कर देना चाहिए।

9-गहरी और पूरी सांस लेने से स्वभावतः नासिका छिद्रों से टकरा कर उत्पन्न होने वाला ध्वनि प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता है।परन्तु वह ऐसा नहीं बन पाता कि खुले कानों से उसे सुना जा सके। कर्णेन्द्रियों की सूक्ष्म चेतना में ही उसे अनुभव किया जा सकता है। चित्त को श्वसन क्रिया पर एकाग्र करना चाहिए। और भावना को इस स्तर की बनाना चाहिए कि उससे श्वास लेते समय ‘सो’ शब्द के ध्वनि प्रवाह की मन्द अनुभूति होने लगे। उसी प्रकार जब सांस छोड़ना पड़े तो यह मान्यता परिपक्व करनी चाहिए कि ‘हम्’ ध्वनि प्रवाह हो रहा है। आरम्भ में कुछ समय यह अनुभूति उतनी स्पष्ट नहीं होती, किन्तु क्रम और प्रयास जारी रखने पर कुछ ही समय उपरान्त इस प्रकार का ध्वनि प्रवाह अनुभव में आने लगता है। और उसे सुनने में न केवल चित्त ही एकाग्र होता है वरन् आनन्द का अनुभव होता है।इस साधना का उत्तरार्ध पाप निष्कासन का है अथार्त अवांछनीय इन्द्रिय लिप्साओं -लोभ, मोह आदि।

10-सोऽहम् साधना के पूर्व भाग में श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि के साथ जीवन सत्ता पर उस ‘परब्रह्म परमात्मा का शासन आधिपत्य स्थापित होने की स्वीकृति है। उत्तरार्ध में ‘हम्’ को ..अहंकार को विसर्जित करने का भाव है।सांस निकली साथ-साथ अहम् भाव का भी निष्कासन हुआ।यही ब्राह्मी स्थिति है। अहंता ही लोभ और मोह की जननी है।इस अहंता के विसर्जित कर देने पर ही भगवान का अन्तःक्षेत्र में प्रवेश करना ,निवास करना सम्भव होता है। इस छोटे से मानवी अन्तःकरण में दो के निवास की गुंजाइश नहीं है। पूरी तरह एक ही रह सकता है। दोनों रहे तो लड़ते-झगड़ते रहते हैं और अंतर्द्वंद्व की खींचतान चलती रहती है। भगवान् को बहिष्कृत करके पूरी तरह ‘अहंमन्यता’ को प्रबल बना लिया जाय तो मनुष्य दुष्ट ,दुर्बुद्धि, क्रूर-कर्मा असुर बनता है। ‘सो’ में भगवान का शासन आत्म-सत्ता पर स्थापित करने और ‘हम्’ में अहंता का विसर्जन करने का भाव है।यही है सोऽहम् साधना का भावनात्मक एवं व्यावहारिक स्वरूप।

11-ईश्वर जीव को ऊंचा उठाना चाहता है। जीव ईश्वर को नीचे गिराना चाहता है। अस्तु दोनों के बीच रस्साकशी चलती और खींचतान होती रहती है । न ईश्वर श्रेष्ठ जीवन क्रम देखे बिना सन्तुष्ट होता है और न भक्तअपनी न्याय-निष्ठा, कर्म-निष्ठा, कर्म-व्यवस्था तथाकथित पूजा पाठ के कारण छोड़ने को तैयार होता है। वह अपनी जगह अडिग रहता है और भक्त को तरह-तरह के उलाहने देने, शिकायतें करने, लांछन लगाने की स्थिति बनी ही रहती है। भक्त ईश्वर को अपने इशारे पर नचाना भर चाहता है। उससे उचित अनुदान मनोकामनायें पूरी कराने की पात्रता-कुपात्रता परखने की आदत छोड़ देने का आग्रह करता रहता है। दोनों अपनी जगह पर अडिग रहें ..दोनों की दिशायें एक दूसरे की इच्छा के प्रतिकूल बनी रहें तो फिर एकता कैसे हो, सामीप्य सान्निध्य कैसे सधे? ईश्वर प्राप्ति की आशा कैसे पूर्ण हो? इस कठिनाई का समाधान ‘सोऽहम्’ साधना के साथ जुड़े हुए तत्व ज्ञान में सन्निहित है। दोनों एक-दूसरे से गुंथ जायं ..परस्पर विलीनीकरण हो जाय। भक्त अपने आपको, अन्तःकरण, आकांक्षा एवं अस्तित्व को पूरी तरह समर्पित करदे और उसी के दिव्य संकेतों पर अपनी दिशा धाराओं का निर्धारण करे। इस स्थिति की प्रतिक्रिया द्वैत की समाप्ति और अद्वैत की प्राप्ति के रूप में होती है।

12-जीव ने ब्रह्म को समर्पण किया तो ब्रह्म की सत्ता स्वभावतः जीवधारी में दृष्टिगोचर होने लगेगी। समर्पण एक पक्ष से आरम्भ तो होता है, पर उसकी परिणति उभयपक्षीय एकता में होती है। यही प्रेम योग का रहस्य है। यही भक्त के भगवान बनने का तत्वज्ञान है। ईंधन जब अग्नि को समर्पण करता है तो वह भी ईंधन न रहकर आग बन जाता है। बूंद जब समुद्र में विलीन होती है तो उसकी तुच्छता असीम विशालता में परिणत हो जाता है। नमक और पानी ;दूध और चीनी जब मिलते हैं तो दोनों की पृथकता समाप्त होकर सघन एकता बनकर उभरती है। यही है वेदान्त अनुमोदित जीवन लक्ष्य की पूर्ति ..परम पद की प्राप्ति। इसी स्थिति को ‘अद्वैत’ कहते हैं। शिवोहम्—सच्चिदानन्दोहम्—तत्वमसि -अयमात्मा ब्रह्म की अनुभूति इसे सर्वोत्कृष्ट अन्तःस्थिति पर पहुंचे हुए साधक को होती है इसी को ईश्वर प्राप्ति, आत्म साक्षात्कार एवं ब्रह्म निर्वाण आदि नामों से पूर्णता के रूप में कहा गया है।सोऽहं साधना में आत्मा के सूक्ष्म अन्तराल का पूर्ण ज्ञान मौजूद है।उस ध्वनि पर निरन्तर ध्यान दिया जाए तो अमृत भण्डार आत्मा तक भी पहुँचा जा सकता है।

‘सोऽहं’ साधना विधि ;-

02 FACTS;-

1-जब एक साँस लेते हैं तो वायु प्रवेश के साथ-साथ एक सूक्ष्म ध्वनि होती है जिसका शब्द ‘सो .ऽऽऽ...’ जैसा होता है। जितनी देर साँस भीतर ठहरती है अर्थात् स्वाभाविक कुम्भक होता है, उतनी देर आधे ‘अ ऽऽऽ’ की सी विराम ध्वनि होती है और जब साँस बाहर निकलती है तो ‘हं....’ जैसी ध्वनि निकलती है। इन तीनों ध्वनियों पर ध्यान केन्द्रित करने से अजपा-जाप की ‘सोऽहं’ साधना होने लगती है।प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व नित्यकर्म से निपटकर पूर्व को मुख करके किसी शान्त स्थान पर बैठिए। मेरुदण्ड सीधा रहे। दोनों हाथों को समेटकर गोदी में रख लीजिए, नेत्र बन्द कर रखिये। जब नासिका द्वारा वायु भीतर प्रवेश करने लगे, तो सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय को सजग करके ध्यानपूर्वक अवलोकन कीजिए कि वायु के साथ-साथ ‘सो’ की सूक्ष्म ध्वनि हो रही है। इसी प्रकार जितनी देर साँस रुके ‘अ’ और वायु निकलते समय ‘हं’ की ध्वनि पर ध्यान केन्द्रित कीजिए। साथ ही हृदय स्थित सूर्य-चक्र के प्रकाश बिन्दु में आत्मा के तेजोमय स्फुल्लिंग की धारणा कीजिए। जब साँस भीतर जा रही हो और ‘सो’ की ध्वनि हो रही हो, तब अनुभव कीजिए कि यह तेज बिन्दु परमात्मा का प्रकाश है। ‘स’ अर्थात् परमात्मा, ‘ऽहम्’ अर्थात् मैं। जब वायु बाहर निकले और ‘हं’ की ध्वनि हो, तब उसी प्रकाश-बिन्दु में भावना कीजिए कि ‘यह मैं हूँ।’

2-‘अ’ की विराम भावना परिवर्तन के अवकाश का प्रतीक है। आरम्भ में उस हृदय चक्र स्थित बिन्दु को ‘सो’ ध्वनि के समय ब्रह्म माना जाता है और पीछे उसी की ‘हं’ धारणा में जीव भावना हो जाती है। इस भाव परिवर्तन के लिए ‘अ’ का अवकाश काल रखा गया है। इसी प्रकार जब ‘हं’ समाप्त हो जाए, वायु बाहर निकल जाए और नयी वायु प्रवेश करे, उस समय भी जीवभाव हटाकर उस तेज बिन्दु में ब्रह्मभाव बदलने का अवकाश मिल जाता है। यह दोनों ही अवकाश ‘अऽऽऽ’ के समान हैं, पर इनकी ध्वनि सुनाई नहीं देती। शब्द तो ‘सो’ ‘ऽहं’ का ही होता है।‘सो’ ब्रह्म का ही प्रतिबिम्ब है, ‘ऽ’ प्रकृति का प्रतिनिधि है, ‘हं’ जीव का प्रतीक है। ब्रह्म, प्रकृति और जीव का सम्मिलन इस अजपा-जाप में होता है। सोऽहं साधना में तीनों महाकारण एकत्रित हो जाते हैं, जिनके कारण आत्म-जागरण का स्वर्ण सुयोग एक साथ ही उपलब्ध होने लगता है।

NOTE;-

'सोऽहं’ साधना की उन्नति जैसे-जैसे होती जाती है, वैसे ही वैसे विज्ञानमय कोश का परिष्कार होता जाता है। आत्म-ज्ञान बढ़ता है और धीरे-धीरे आत्म-साक्षात्कार की स्थिति निकट आती चलती है। आगे चलकर साँस पर ध्यान जमाना छूट जाता है और केवल हृदय स्थित सूर्य-चक्र में विशुद्ध ब्रह्मतेज के ही दर्शन होते हैं। उस समय समाधि की सी अवस्था हो जाती है। हंसयोग की परिपक्वता से साधक ब्राह्मी स्थिति का अधिकारी हो जाता है।

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विज्ञानमय कोश का दूसरा अंग... ग्रन्थि-भेदन;-

क्या अर्थ है ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रुद्रग्रंथि का ?-

05 FACTS;-

1-विज्ञान -मय कोष में तीन बंधन हैं ,जो भौतिक शरीर न रहने पर भी देव , गंधर्व ,यक्ष , भूत , पिशाच , आदि योनियों में भी वैसे ही बंधन बंधे रहते हैं | इन्हें रूद्र [तम- वॉटर] , विष्णु [ सत -एयर] और ब्रह्म [ रज-फायर ] ग्रंथियां कहते हैं |अर्थात तम ,रज, सत द्वारा स्थूल , सूक्ष्म , और कारण शरीर बने हुऐ हैं |इन तीन ग्रंथियों से ही जीव बंधा हुआ है | इन तीनों को खोलने की जिम्मेदारी का नाम ही पितृ - ऋण ,ऋषि -ऋण व देव -ऋण कहलाता है |तम को प्रकृति , रज को जीव और सत को आत्मा कहते हैं | संसार में तम को सांसारिक जीवन , रज को व्यक्तिगत जीवन व सत को आध्यात्मिक जीवन कह सकते हैं | देश ,जाति, और समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करना पितृ -ऋण से उऋण होने का मार्ग है | व्यक्तिगत जीवन को शारीरिक ,बौद्धिक और आर्थिक शक्तियों से संपन्न बनाना , अपने को मनुष्य - सुलभ गुणों से युक्त बनाना ऋषि- ऋण से छूटना है | स्वाध्याय, सत्संग ,भक्ति ,चिंतन ,मनन ,आदि साधनाओं द्वारा काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह ,मद ,मत्सर आदि को हटाकर आत्मा को निर्मल ,देव-तुल्य बनाना ,यह देव -ऋण से उऋण होना है |

2-साधक को विज्ञान -मय कोष में तीनों गांठों का अनुभव होता है | प्रथम मूत्राशय के समीप [ रूद्र ] ,दूसरी आमाशय के उपर भाग में [ विष्णु ] और तीसरी सिर के मध्य केंद्र में [ब्रह्म ]ग्रंथि कहलाती है | इन्हें दूसरे शब्दों में महाकाली , महालक्ष्मी , महा-सरस्वती भी कहते हैं | प्रत्येक की दो दो सहायक ग्रन्थियाँ होती हैं | इन्हें चक्र भी कहते हैं |रूद्र की [ मूलाधार , स्वाधिष्ठान ] , विष्णु की [ मणिपुर , अनाहत ] , ब्रह्म की [ विशुद्धि , आज्ञा ] चक्र कहा जाता है | हठ-योग की विधि से भी इन छ: चक्रों का वेधन [ छिद्रण ] किया जाता है | सिद्धों ने इन ग्रंथियों की अंदर की झांकी के अनुसार शिव , विष्णु और ब्रह्मा के चित्रों का निरूपण किया है|एक ही ग्रंथी ,दायें भाग से देखने पर पुरुष - प्रधान ,व बाएं भाग से देखने पर स्त्री -प्रधान आकार की होती है| 3-ब्रह्म - ग्रंथि मध्य-मस्तिष्क में है | इससे उपर सहस्रार शतदल कमल है | यह ग्रंथि उपर से चतुष्कोण [ चार कोने ] और नीचे से फ़ैली हुई है | इसका नीचे का एक तंतु ब्रह्म -रंध्र से जुडा हुआ है | इसी को सहस्रार -मुख वाले शेषनाग की शय्या पर सोते हुए भगवान की नाभि -कमल से उत्पन्न चार मुख वाला ब्रह्मा चित्रित किया गया है | वाम भाग में यही ग्रंथि चतुर्भुजी सरस्वती है | वीणा की झंकार से ओंकार - ध्वनी का यहाँ निरंतर गुंजार होता है | यही तीन ग्रंथियां ,जीव को बाँधे हुए हैं | जब ये खुल जाती हैं ,तो मुक्ति का अधिकार अपने आप मिल जाता है और शक्ति , सम्पन्नता ,और प्रज्ञा का अटूट भण्डार हाथ में आ जाता है |

विज्ञानमय कोश की चतुर्थ भूमिका में पहुँचने पर जीव को प्रतीत होता है कि तीन सूक्ष्म बन्धन ही मुझे बाँधे हुए हैं। पञ्च-तत्त्वों से शरीर बना है, उस शरीर में पाँच कोश हैं। इन पाँच बन्धनों को खोलने के लिए कोशों की अलग-अलग साधनाएँ बताई गई हैं। विज्ञानमय कोश के अन्तर्गत तीन बन्धन हैं, जो पञ्च भौतिक शरीर न रहने पर भी-देव, गन्धर्व, यक्ष, भूत, पिशाच आदि योनियों में भी वैसे ही बन्धन बाँधे रहते हैं जैसा कि शरीरधारी का होता है।

4-इन तीनों गुणों से अतीत हो जाने पर, ऊँचा उठ जाने पर ही आत्मा शान्ति और आनन्द का अधिकारी होता है।इन तीन ग्रन्थियों को खोलने के महत्त्वपूर्ण कार्य को ध्यान में रखने के लिए कन्धे पर तीन तार का यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि तम, रज, सत् के तीन गुणों द्वारा स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर बने हुए हैं। यज्ञोपवीत के अन्तिम भाग में तीन ग्रन्थियाँ लगाई जाती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि रुद्रग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि तथा ब्रह्मग्रन्थि से जीव बँधा पड़ा है। दार्शनिक दृष्टि से विचार करने पर तम का अर्थ होता है-शक्ति, रज का अर्थ होता है-साधन, सत् का अर्थ होता है-ज्ञान। इन तीनों की न्यूनता एवं विकृत अवस्था ..बन्धन कारक तथा अनेक उलझनों, कठिनाइयों और बुराइयों को उत्पन्न करने वाली होती है; किन्तु जब तीनों की स्थिति सन्तोषजनक होती है, तब त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त होती है। हमको भली प्रकार यह समझ लेना चाहिए कि परमात्मा की सृष्टि में कोई भी शक्ति या पदार्थ दूषित अथवा भ्रष्ट नहीं है। यदि उसका सदुपयोग किया जाए तो वह कल्याणकारी सिद्ध होगा।

5-साधक जब विज्ञानमय कोश की स्थिति में होता है तो उसे ऐसा अनुभव होता है मानो उसके भीतर तीन कठोर, गठीली, चमकदार, हलचल करती हुई हलकी गाँठें हैं। इनमें से एक गाँठ मूत्राशय के समीप, दूसरी आमाशय के ऊर्ध्व भाग में और तीसरी मस्तिष्क के मध्य केन्द्र में विदित होती है। इन गाँठों में से मूत्राशय वाली ग्रन्थि को रुद्र-ग्रन्थि, आमाशय वाली को विष्णु-ग्रन्थि और शिर वाली को ब्रह्मग्रन्थि कहते हैं। इन्हीं तीनों को दूसरे शब्दों में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती भी कहते हैं ।इन तीन महाग्रन्थियों की दो सहायक ग्रन्थियाँ भी होती हैं, जो मेरुदण्ड स्थित सुषुम्ना नाड़ी के मध्य में रहने वाली ब्रह्मनाड़ी के भीतर रहती हैं। इन्हें चक्र भी कहते हैं। रुद्रग्रन्थि की शाखा ग्रन्थियाँ मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान कहलाती हैं। विष्णु -ग्रन्थि की दो शाखाएँ मणिपूरक चक्र और अनाहत चक्र हैं। मस्तिष्क में निवास करने वाली ब्रह्मग्रन्थि के सहायक ग्रन्थि-चक्रों को विशुद्धिचक्र और आज्ञाचक्र कहा जाता है। हठयोग की विधि से षट्चक्रों का वेधन किया जाता है।

क्या है रुद्रग्रन्थि का आकार और बीज?-

04 FACTS;-

1-रुद्रग्रन्थि का आकार बेर के समान ऊपर को नुकीला, नीचे को भारी, पैंदे में गड्ढा लिए होता है।इसका वर्ण कालापन मिला हुआ लाल होता है। इस ग्रन्थि के दो भाग हैं। दक्षिण भाग को रुद्र और वाम भाग को काली कहते हैं। दक्षिण भाग के अन्तरंग गह्वर में प्रवेश करके जब उसकी झाँकी की जाती है, तो ऊर्ध्व भाग में श्वेत रंग की छोटी-सी नाड़ी हलका-सा श्वेत रस प्रवाहित करती है; एक तन्तु तिरछा पीत वर्ण की ज्योति-सा चमकता है। मध्य भाग में एक काले वर्ण की नाड़ी साँप की तरह मूलाधार से लिपटी हुई है। प्राणवायु का जब उस भाग से सम्पर्क होता है, तो डिम-डिम जैसी ध्वनि उसमें से निकलती है। रुद्रग्रन्थि की आन्तरिक स्थिति की झाँकी करके ऋषियों ने रुद्र का सुन्दर चित्र अंकित किया है ...मस्तक पर गंगा की धारा, जटा में चन्द्रमा, गले में सर्प, डमरू की डिम-डिम ध्वनि, ऊर्ध्व भाग में त्रिशूल।उस चित्र में आलंकारिक रूप से रुद्रग्रन्थि की वास्तविकताएँ ही भरी गई हैं। उस ग्रन्थि का वाम भाग जिस स्थिति में है, उसी के अनुरूप काली का सुन्दर चित्र सूक्ष्मदर्शी आध्यात्मिक चित्रकारों ने अंकित कर दिया है।

2-रुद्र, विष्णु और ब्रह्म ग्रन्थियों को खोलने के लिए ग्रन्थि के मूल भाग में निवास करने वाली बीज शक्तियों का सञ्चार करना पड़ता है। रुद्रग्रन्थि के अधोभाग में बेर के डण्ठल की तरह एक सूक्ष्म प्राण अभिप्रेत होता है, उसे ‘क्लीं’ बीज कहते हैं।मूलबन्ध बाँधते हुए एक ओर से अपान और दूसरी ओर से कूर्मप्राण को चिमटे की तरह बनाकर रुद्रग्रन्थि को पकड़कर रेचक प्राणायाम द्वारा दबाते हैं। इस दबाव की गर्मी से क्लीं बीज जाग्रत् हो जाता है। वह नोकदार डण्ठल आकृति का बीज अपनी ध्वनि और रक्त वर्ण प्रकाश-ज्योति के साथ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है। इस जाग्रत् क्लीं बीज की अग्रिम नोंक से कुंचुकि क्रिया की जाती है, जैसे किसी वस्तु में छेद करने के लिए नोंकदार कील कोंची जाती है; इस प्रकार की वेधन-साधना को ‘कुंचुकी क्रिया’ कहते हैं।

3-रुद्रग्रन्थि के मूल केन्द्र में क्लीं बीज की अग्र शिखा से जब निरन्तर कुंचुकी होती है, तो प्रस्तुत कलिका में भीतर ही भीतर एक विशेष प्रकार के लहलहाते हुए तड़ित प्रवाह उठाने पड़ते हैं; इनकी आकृति एवं गति सर्प जैसी होती है। इन तड़ित प्रवाहों को ही शम्भु के गले में फुफकारने वाले सर्प बताया है। जिस प्रकार ज्वालामुखी पर्वत के उच्च शिखर पर धूम्र मिश्रित अग्नि निकलती है, उसी प्रकार रुद्रग्रन्थि के ऊपरी भाग में पहले क्लीं बीज की अग्निजिह्वा प्रकट होती है। इसी को काली की बाहर निकली हुई जीभ माना गया है। इसको शम्भु का तीसरा नेत्र भी कहते हैं। मूलबन्ध, अपान और कूर्म प्राण के आघात से जाग्रत् हुई क्लीं बीज की कुंचुकी -क्रिया से धीरे-धीरे रुद्रग्रन्थि शिथिल होकर वैसे ही खुलने लगती है, जैसे कली धीरे-धीरे खिलकर फूल बन जाती है। इस कमल पुष्प के खिलने को पद्मासन कहा गया है।

4-त्रिदेव के कमलासन पर विराजमान होने के चित्रों का तात्पर्य यही है कि वे विकसित रूप से परिलक्षित हो रहे हैं। साधक के प्रयत्न के अनुरूप खुली हुई रुद्रग्रन्थि का तीसरा भाग जब प्रकटित होता है, तब साक्षात् रुद्र का, काली का अथवा रक्त वर्ण सर्प के समान लहलहाती हुई, क्लीं-घोष करती हुई अग्नि शिखा का साक्षात्कार होता है। यह रुद्र जागरण साधक में अनेक प्रकार की गुप्त-प्रकट शक्तियाँ भर देता है। संसार की सब शक्तियों का मूल केन्द्र रुद्र ही है। उसे रुद्रलोक या कैलाश भी कहते हैं। प्रलय काल में संसार संचालिनी शक्ति व्यय होते-होते पूर्ण शिथिल होकर जब सुषुप्त अवस्था में चली जाती है, तब रुद्र का ताण्डव नृत्य होता है। उस महामन्थन से इतनी शक्ति फिर उत्पन्न हो जाती है जिससे आगामी प्रलय तक काम चलता रहे। घड़ी में चाबी भरने के समान रुद्र का प्रलय ताण्डव होता है। रुद्रशक्ति की शिथिलता से जीवों की तथा पदार्थों की मृत्यु हो जाती है, इसलिए रुद्र को मृत्यु का देवता माना गया है।

क्या है विष्णुग्रन्थि का आकार और बीज ?-

03 FACTS;-

1-विष्णुग्रन्थि किस वर्ण की, किस गुण की, किस आकार की, किस आन्तरिक स्थिति की, किस ध्वनि की, किस आकृति की है, यह सब हमें विष्णु के चित्र से सहज ही प्रतीत हो जाता है। नील वर्ण, गोल आकार, शंख-ध्वनि, कौस्तुभ मणि, वनमाला यह चित्र उस मध्यग्रन्थि का सहज प्रतिबिम्ब है।जैसे मनुष्य को मुख की ओर से देखा जाए तो उसकी झाँकी दूसरे प्रकार की होती है और पीठ की ओर से देखा जाए, तब यह आकृति दूसरे ही प्रकार की होती है। एक ही मनुष्य के दो पहलू दो प्रकार के होते हैं। उसी प्रकार एक ही ग्रन्थि दक्षिण भाग से देखने में पुरुषत्व प्रधान आकार की और बाईं ओर से देखने पर स्त्रीत्व प्रधान आकार की होती है। एक ही ग्रन्थि को रुद्र या शक्तिग्रन्थि कहा जा सकता है। विष्णु-लक्ष्मी, ब्रह्मा और सरस्वती का संयोग भी इसी प्रकार है।विष्णुग्रन्थि के मूल में ‘श्रीं’ का निवास है।

2-विष्णुग्रन्थि को जाग्रत् करने के लिए जालन्धर बन्ध बाँधकर ‘समान’ और ‘उदान’ प्राणों द्वारा दबाया जाता है, तो उसके मूल भाग का ‘श्रीं’ बीज जाग्रत् होता है। यह गोल गेंद की तरह है और इसकी अपनी धुरी पर द्रुत गति से घूमने की क्रिया होती है। इस घूर्णन क्रिया के साथ-साथ एक ऐसी सनसनाती हुई सूक्ष्म ध्वनि होती है, जिसको दिव्य श्रोत्रों से ‘श्रीं’ जैसे सुना जाता है। श्रीं बीज को विष्णुग्रन्थि की बाह्य परिधि में भ्रामरी क्रिया के अनुसार घुमाया जाता है। जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, उसी प्रकार परिभ्रमण करने को भ्रामरी कहते हैं। विवाह में वर-वधू की भाँवर या फेरे पड़ना, देव-मन्दिरों तथा यज्ञ की परिक्रमा या प्रदक्षिणा होना भ्रामरी क्रिया का रूप है। विष्णु की उँगली पर घूमता हुआ चक्र सुदर्शन चित्रित करके योगियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से अनुभव किए गए इसी रहस्य को प्रकट किया है। ‘श्रीं’ बीज विष्णुग्रन्थि की भ्रामरी गति से परिक्रमा करने लगता है, तब उस महातत्त्व का जागरण होता है।

3-पूरक प्राणायाम की प्रेरणा देकर समान और उदान द्वारा जाग्रत् किए गए श्रीं बीज से जब विष्णुग्रन्थि के बाह्य आवरण की मध्य परिधि में भ्रामरी क्रिया की जाती है, तो उसके गुञ्जन से उसका भीतरी भाग चैतन्य होने लगता है। इस चेतना की विद्युत् तरंगें इस प्रकार उठती हैं जैसे पक्षी के पंख दोनों बाजुओं में हिलते हैं। उसी गति के आधार पर विष्णु का वाहन गरुड़ निर्धारित किया गया है। इस साधना से विष्णुग्रन्थि खुलती है और साधक की मानसिक स्थिति के अनुरूप विष्णु, लक्ष्मी या पीत वर्ण की अग्निशिखा की लपटों के समान ज्योतिपुञ्ज का साक्षात्कार होता है। विष्णु का पीताम्बर इस पीत ज्योतिपुञ्ज का प्रतीक है। इस ग्रन्थि का खुलना ही बैकुण्ठ, स्वर्ग एवं विष्णुलोक को प्राप्त करना है। बैकुण्ठ या स्वर्ग को अनन्त ऐश्वर्य का केन्द्र माना जाता है। वहाँ सर्वोत्कृष्ट सुख-साधन जो सम्भव हो सकते हैं, वे प्रस्तुत हैं। विष्णुग्रन्थि वैभव का केन्द्र है, जो उसे खोल लेता है, उसे विश्व के ऐश्वर्य पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाता है।

क्या है ब्रह्मग्रन्थि का आकार और बीज ?-

03 FACTS;-

1-ब्रह्मग्रन्थि मध्य मस्तिष्क में है। इससे ऊपर सहस्रार शतदल कमल है। यह ग्रन्थि ऊपर से चतुष्कोण और नीचे से फैली हुई है। इसका नीचे का एक तन्तु ब्रह्मरन्ध्र से जुड़ा हुआ है। इसी को सहस्रमुख वाले शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए भगवान् की नाभि कमल से उत्पन्न चार मुख वाला ब्रह्मा चित्रित किया गया है। वाम भाग में यही ग्रन्थि चतुर्भुजी सरस्वती है। वीणा की झंकार-से ओंकार ध्वनि का यहाँ निरन्तर गुञ्जार होता है। यह तीनों ग्रन्थियाँ जब तक सुप्त अवस्था में रहती हैं, बँधी हुई रहती हैं, तब तक जीव साधारण दीन-हीन दशा में पड़ा रहता है। अशक्ति, अभाव और अज्ञान उसे नाना प्रकार से दु:ख देते रहते हैं। पर जब इनका खुलना आरम्भ होता है तो उनका वैभव बिखर पड़ता है। मुँह बन्द कली में न रूप है, न सौन्दर्य और न आकर्षण। पर जब वह कली खिल पड़ती है और पुष्प के रूप में प्रकट होती है, तो एक सुन्दर दृश्य उपस्थित हो जाता है।

2-ब्रह्मग्रन्थि के नीचे ‘ह्रीं’ तत्त्व का अवस्थान है। ब्रह्म ग्रन्थि मस्तिष्क के मध्य भाग में सहस्रदल कमल की छाया में अवस्थित है। उसे अमृत कलश कहते हैं। बताया गया है कि सुरलोक में अमृत कलश की रक्षा सहस्र फनों वाले शेषनाग करते हैं। इसका अभिप्राय इसी ब्रह्म ग्रन्थि से है।उड्डियान बन्ध लगाकर व्यान और धनञ्जय प्राणों द्वारा ब्रह्मग्रन्थि को पकाया जाता है। पकाने से उसके मूलाधार में वास करने वाली ह्रीं शक्ति जाग्रत् होती है। इसकी गति को प्लावनी कहते हैं। जैसे जल में लहरें उत्पन्न होती हैं और निरन्तर आगे को ही लहराती हुई चलती हैं, उसी प्रकार ह्रीं बीज की प्लावनी गति से ब्रह्मग्रन्थि को दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर प्रेरित करते हैं। चतुष्कोण ग्रन्थि के ऊर्ध्व भाग में यही ह्रीं तत्त्व रुक-रुककर गाँठें सी बनाता हुआ आगे की ओर चलता है और अन्त में परिक्रमा करके अपने मूल संस्थान को लौट आता है।

3-गाँठ बाँधते चलने की नीची-ऊँची गति के आधार पर माला के दाने बनाए गए हैं।108 दचके लगाकर तब एक परिधि पूरी होती है, इसलिए माला के 108 दाने होते हैं। इस ह्रीं तत्त्व की तरंगें मन्थर गति से इस प्रकार चलती हैं जैसे हंस चलता है। ब्रह्मा या सरस्वती का वाहन हंस इसीलिए माना गया है। वीणा के तारों की झंकार से मिलती-जुलती ‘ह्रीं’ ध्वनि सरस्वती की वीणा का परिचय देती है।कुम्भक प्राणायाम की प्रेरणा से ह्रीं बीज की प्लावनी क्रिया आरम्भ होती है। यह क्रिया निरन्तर होते रहने पर ब्रह्मग्रन्थि खुल जाती है। तब उसका ब्रह्म के रूप में, सरस्वती के रूप में अथवा श्वेत वर्ण प्रकम्पित शुभ्र ज्योति शिखा के समान साक्षात्कार होता है। यह स्थिति आत्मज्ञान, ब्रह्मप्राप्ति, ब्राह्मी स्थिति की है। ब्रह्मलोक एवं गोलोक भी इसको कहते हैं। इस स्थिति को उपलब्ध करने वाला साधक ज्ञान-बल से परिपूर्ण हो जाता है। इसकी आत्मिक शक्तियाँ जाग्रत् होकर परमेश्वर के समीप पहुँचा देती हैं, उसे अपने पिता का उत्तराधिकार उसे मिलता है और वह जीवन्मुक्त होकर ब्राह्मीस्थिति का आनन्द.. ब्रह्मानन्द उपलब्ध करता है।षट्चक्र का हठयोग-सम्मत विधान अथवा महायोग का यह ग्रन्थिभेद, दोनों ही समान स्थिति के हैं। साधक अपनी स्थिति के अनुसार उन्हें अपनाते हैं और दोनों से ही विज्ञानमय कोश का परिष्कार होता है।

सहस्रार चक्र का महत्व;-

06 FACTS;-

1-पृथ्वी की समस्त शक्तियों , विशेषताओं और विभूतियों के केन्द्र उसके सन्तुलन बिन्दु ..उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव हैं। यहीं से वह सूत्र संचालन होता है, जिसके कारण यह धरती एक सजीव पिण्ड एवं अगणित जीव-धारियों की क्रीड़ा-स्थली बनी हुई है। यदि ध्रुवों की स्थिति में किसी प्रकार आघात पहुंच जाय या परिवर्तन उपस्थित हो जाय तो फिर इस भू-मण्डल का स्वरूप बदल कर कुछ और ही तरह का हो जायेगा। कारण स्पष्ट है .. दोनों ध्रुव ही तो उसकी क्रिया और चेतना के केन्द्र बिन्दुहैं। जिस प्रकार पृथ्वी में चेतना एवं क्रिया उत्तरी दक्षिणी ध्रुवों से प्राप्त होती है उसी प्रकार मानव पिण्ड देह के भी दो ही अति सूक्ष्म संस्थान हैं। उत्तरी ध्रुव है—ब्रह्मरन्ध्र मस्तिष्क सहस्रार कमल और दक्षिणी ध्रुव है .. कुण्डलिनी केन्द्र मूलाधार चक्र।सहस्रार दोनों कनपटियों से 2-2 इंच अंदर और भौहों से भी लगभग 3-3 इंच अन्दर मस्तिष्क के मध्य में ‘‘महाविवर’’ नामक महाछिद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योति-पुंज के रूप में अवस्थित है।

2-कुण्डलिनी साधना द्वारा इसी छिद्र को तोड़ कर ब्राह्मी स्थिति में प्रवेश करना पड़ता है इसलिये इसे ‘‘दशम द्वार’’ या ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं।सहस्त्रार का वर्णन चक्र की तरह किया जाता है जो की गलत है | सहस्त्रार एक अवस्था है जो की आज्ञा चक्र के उपर कुण्डलिनी शक्ति गति करती है उसके बाद यह अवस्था आता है |इस अवस्था में अति आनन्द की अनुभूति होती है जो वर्णन के परे है |क्योंकि इस अवस्था में मन भी आपका साथ छोड़ देता है और जब मन नहीं होगा तो उस अवस्था की सूचना कौन देगा।

मस्तिष्क क्षेत्र अगणित रहस्यमय शक्तियों से भरा हुआ माना जाता है। मस्तिष्क के सम्बन्ध में वर्तमान वैज्ञानिक मान्यताओं की संगति इस सम्बन्ध में भारतीय दार्शनिक मान्यताओं से भी बैठती है। मोटे विभाजन की दृष्टि से मस्तिष्क को पांच भागों में विभक्त किया जाता है। (1) वृहद् मस्तिष्क (सेरिश्रम) (2) लघुमस्तिष्क (सेरिबेलम) (3) माध्यमिक मस्तिष्क (मिडब्रेन) (4) मस्तिष्क सेतु (पॉन्स) एवं (5) सुषुम्ना शीर्ष (मैडुला ऑबलांगेटा)।

3-इनमें से अन्तिम तीन अर्थात् मिडब्रेन, पॉन्स एवं मैडुला को संयुक्त रूप से मस्तिष्क स्तम्भ (ब्रेनस्टेम) भी कहते हैं। अध्यात्म शास्त्र के अनुसार मस्तिष्क रूपी स्वर्ग लोक में यों तो तेतीस कोटि देवता रहते हैं, पर उनमें से पांच मुख्य हैं। इन्हीं का समस्त देव संस्थान पर नियन्त्रण है। मस्तिष्कीय पांच क्षेत्रों को पांच देव परिधि कह सकते हैं। इन्हीं के द्वारा पांच कोशों की पांच शक्तियों का संचार संचालन होता है । इस ब्रह्मलोक में, देवलोक में निवास करने वाला जीवात्मा स्वर्गीय परिस्थितियों के बीच रहता हुआ अनुभव करता है। सहस्रार चक्र को अमृत कलश भी कहा गया है। उसमें से सोम रसस्रवित होने की चर्चा है। देवता इसी अमृत कलश से सुधापान करते और अमर बनते हैं। वर्तमान वैज्ञानि क मान्यतानुसार मस्तिष्क में एक विशेष द्रव ‘‘सैरिव्रो स्पाइनल फ्ल्यूड’’ भरा रहता है। यही मस्तिष्क के भिन्न भिन्न केन्द्रों को पोषण और संरक्षण देता रहता है। मस्तिष्क की झिल्लियों से यह झरता रहना है और विभिन्न केन्द्रों तथा सुषुम्ना में सोखा जाता है।

4-अमृत कलश के सोलह पटल गिनाये गये हैं। इसी प्रकार कहीं कहीं सहस्रार की 16 पंखुरियों का भी वर्णन है। यह मस्तिष्क के ही 16 महत्वपूर्ण विभाग विभाजन हैं।शिव संहिता में भी सहस्रार की 16 कलाओं का वर्णन है -कपाल के मध्य चन्द्रमा के समान प्रकाशवान् सोलह कला युक्त सहस्रार चक्र का ध्यान करें। सहस्रार की यह सोलह कलाएं मस्तिष्क के ‘‘सैरिव्रोस्माइनल फ्ल्यूड’’ से सम्बन्धित मस्तिष्क के सोलह विभाग हैं। पूर्वोक्त पांच स्थूल विभागों को अधिक विस्तार से व्यक्त किया जाय तो उसके निम्नांकित 16 विभाग होते हैं (1) वृहद्मस्तिष्क (सैरिब्रम) (2) लघुमस्तिष्क (सैरिेबेलम) (3) सुषुम्ना शीर्ष (मैट्रुला ऑबलॉगेटा) (4) सेतु (पॉन्स) (5) मध्य मस्तिष्क (मिडब्रेन) (6) महासंयोजक (कॉर्पस कलोसम) (7) रखी पिण्ड (कॉपर्स स्ट्रेटम) (8) पीयूस ग्रन्थि (पिट्यूटरी ग्लैण्ड) (9) शीर्ष ग्रन्थि (पीनियल ग्लैण्ड (10) चेतक (थैलोमस) (11) अधःचेतक (हाइपो थैलेमस) (12) उपचेतक (सब थैलेमस) (13) अनुचेतक (मैटा थैलेमस) (14) ऊर्ध्व चेतक (एपी थैलेमस) (15) संचार जालिकाएं (कॉराडप्लैक्सैसेज) (16) प्रकोष्ठ (वैन्ट्रिक्लस)। इन सभी विभागों में शरीर को संचालित करने वाले एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं युक्त अनेक केन्द्र हैं। सहस्रार अमृत कलश को जागृत करके उन्हें अत्यधिक सक्रिय बना कर असाधारण लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।

5-शिव संहिता के अनुसार कपाल की गुफा में क्षीर सागर समुद्र का तथा सहस्र दल कमल में चन्द्रमा जैसे प्रकाश का ध्यान करें। जो योगी सहस्रार से स्रवित हो रहे पीयूष का निरन्तर पान करता है, वह मृत्यु की ही मृत्यु का विधान रचने में समर्थ होता है। अर्थात् मृत्यु उसे मृत्यु के समान नहीं प्रतीत होती, वह मृत्यु से परे का जीवन जीता है। यहीं इसी सहस्रार में कुण्डलिनी-शक्ति का लय होता है और तब चारों प्रकार की सृष्टि परमात्मा में ही लीन हो जाती है, सभी कुछ परमात्मामय हो जाता है।सहस्र दल कमल तथा शेषनाग के सहस्र फन माने जाने की उक्ति का आधार भी यही है। ब्रह्मलोक एवं क्षीरसागर के मध्य विष्णु भगवान का कुंडलि भरे हुए शेष नाग पर शयन करना, यह आकृति भी सहस्रार की स्थिति समझने की दृष्टि से ही बनी है।सहस्रार चक्र का सम्बन्ध रन्ध्र से है।

6-ब्रह्म रन्ध्र को दशम द्वार कहा गया है। नौ द्वार तो दो नथुने, दो आंखें, दो कान, एक मुख, दो मलमूत्र छिद्र सर्व विदित हैं। दशवां द्वार ब्रह्म रन्ध्र है। मरणोपरान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी में होकर निकले और ऊर्ध्व गति प्राप्त करे।ब्रह्म सत्ता का ,ब्रह्माण्डीय चेतना का ..मानव शरीर में प्रवेश इसी मार्ग से होता है। इसी ब्रह्मरन्ध्र की सीध में मस्तिष्क की सबसे ऊपरी रहस्यमय कही जाने वाली शीर्ष ग्रन्थि (पीमियल ग्लैण्ड) का स्थान है। यह ब्रह्मरन्ध्र विशिष्ट मार्ग द्वार है। योगी अन्त समय में इसी मार्ग से प्राण निष्कासन करके ब्रह्मलीन होते हैं। स्पष्ट है कि जीवन काल में यह ब्रह्मरन्ध्र मस्तिष्क के सहस्रार चक्र के माध्यम से दिव्य शक्तियों तथा दिव्य अनुभूतियों के आदान-प्रदान का कार्य करता है। सहस्रार चक्र और ब्रह्मरन्ध्र मिलकर एक संयुक्त इकाई-यूनिट के रूप में कार्य करते हैं। अतः योग साधना में भी इन्हें संयुक्त रूप से प्रयुक्त प्रभावित करने का विधान है।

सहस्रार चक्र - अपनी महाशक्ति के साथ।

(1) स्थान - तालु के ऊपर मस्तिष्क में , ब्रह्मरन्ध्र से ऊपर सब शक्तियों का केन्द्र है।

(2) आकृति - नाना रंग के प्रकाश से प्रकाशित सहस्र (1000) पंखुड़ियों (दलों ) वाले कमल के समान है।

(3) दलों के अक्षर - से लेकर क्ष तक सभी स्वर और वर्ण हैं।

(4) तत्व - तत्वातीत है।

(5) तत्व बीज - विसर्ग है।

(6) तत्व बीज गति - बिन्दु है।

(7) लोक - सत्यम् है।

(8) तत्व बीज वाहन - बिन्दु है।





ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रुद्रग्रंथि का छेदन;-

05 FACTS;-

1-"अ" ब्रह्मा का वाचक है; उच्चारण द्वारा हृदय में उसका त्याग होता है। "उ" विष्णु का वाचक हैं; उसका त्याग कंठ में होता है तथा "म" रुद्र का वाचक है और उसका त्याग तालुमध्य में होता है। इसी प्रणाली से ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रुद्रग्रंथि का छेदन हो जाता है।तदनंतर बिंदु है, जो स्वयं ईश्वर रूप है । भ्रूमध्य / आज्ञा चक्र में बिंदु का त्याग होता है।कपाल में ब्रह्मरन्ध्र ,मूर्धनी/ अधिपति , शिवरन्ध्र ..ये तीन मर्म स्थान है;जो क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु , शिव का प्रतीक है ।नाद सदाशिव रूपी है; इसीलिए ललाट से मूर्धा /मुँह के अंदर का तालु तक के स्थान में उसका त्याग करना पड़ता है। यहाँ तक का अनुभव स्थूल है।इसके आगे शक्ति का व्यापिनी तथा समना भूमियों में सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। इस भूमि के वाच्य शिव हैं, जो सदाशिव से ऊपर तथा परमशिव से नीचे रहते हैं।

2-भ्रूमध्य / आज्ञा चक्र में बिंदु का तथा ब्रह्मरन्ध्र में स्पर्श अनुभूति का भी त्याग हो जाता है एवं उसके ऊपर मूर्धनी/ अधिपति में व्यापिनी शक्ति का भी त्याग हो जाता है। उस समय केवल मनन मात्र रूप का अनुभव होता है। यह समना भूमि का परिचय है। इसके बाद ही मनन का त्याग हो जाता है।इसके उपरांत कुछ समय तक मन के विशुद्ध आत्मस्वरूप की झलक दिखती है। इसके बाद अंत में परम अनुग्रह प्राप्त योगी का उन्मना शक्ति में अथार्त शिवरन्ध्र में प्रवेश होता है।इसी को परमपद या परमशिव की प्राप्ति समझना चाहिए और इसी को एक प्रकार से उन्मना का त्याग भी माना जा सकता है। इस प्रकार ब्रह्मा से शिवपर्यन्त अथार्त माया /प्रकृति के छह कारणों का उल्लंघन हो जाने पर अखंड परिपूर्ण सत्ता में स्थिति हो जाती है।

3-ओंकार प्राणायाम/Omkar Pranayam;-

ॐ शब्द 3½ मात्रा का एकाक्षर है।ओमकार आपको शारीरिक, मानसिक,भावनात्मक रूप से आराम देता है।ॐ के उच्चारण से जो सकारात्मक ऊर्जा निकलती है वह आपके आसपास के वातावरण को शांतिपूर्ण तथा आनंदमयी बना देती है। इस प्राणायाम के द्वारा मन के मोह, अहंकार और मल को दूर करने में सहायता मिलती है। इस Omkar Pranayam को साधक जितना चाहे उतना कर सकता है|योगाभ्यास मेंओम के उच्चारण का अनन्य महत्व है। इसमें ओंकार का उच्चारण सुनना व बोलना दोनों का अंतर्भाव होता है। इसका लाभ उसे ही मिलता है जो स्वयं इसका अनुभव लेता है। ओंकार प्राणायाम का अधिक लाभ सामूहिक रीति से एक लय व सुरताल में करने से होता है। ओंकार प्राणायाम को ओंकार साधना/प्रणव साधना/प्रणवोच्चार कहते हैं। इस प्राणायाम के द्वारा सर्वशक्तिमान परमात्मा को संबोधित करतेहैं। ओंकार ही उस परमात्मा का प्रतीक हो सकता है। ओम शब्द साढ़ेतीन (3½ ) मात्रा का एकाक्षर है, यह नाम वैज्ञानिक दृष्टि से परिपूर्ण व सिद्ध है। अकार-1 मात्रा-कंठमूल से उत्पत्ति-ब्रह्म-उत्पत्ति। ऊकार-2 मात्रा-होंठों से उत्पत्ति-विष्णु-स्थिति। मकार-3 मात्रा-बंद होंठों से उत्पत्ति-शिव-लय। हलंत-1/2 मात्रा। ओंकार सभी अक्षरों को व्याप्त करता है। जैसे सारी सृष्टि का प्रतिनिधित्व परमात्मा करता है वैसे ही सारे अक्षरों का प्रतिनिधित्व ओंकार करता है।

4-ओंकार प्राणायाम कैसे करें?

07 STEPS;-

1-इसे करने के लिए एकांत स्थान चुन ले। ध्यान रहे की स्थान बार बार ना बदले |

2-सुखासन और पद्मासन की स्थिति में बैठ जाए। ध्यान रहे की सिर, पीठ, गर्दन और कमर सीधी रेखा में रहे।

3-शांति से आँखे बंद करे और ध्यान करे की सारी इन्द्रियां अपने स्थान पर सजग है|3-2 से 3 बार लम्बी सांसे ले और सांसो को तेजी से छोड़ दे। इस क्रिया को दीर्घ श्वसन कहते है।ऐसे ही 3 से 4 बार दीर्घ श्वसन करने के उपरान्त जितना हो सके लंबी साँस ले।

4-दीर्घ श्वसन/ साँस को रोककर, मुँह खोलकर 'अ' का उच्चारण करे।इसका स्पंदन /वाइब्रेशन आपको अनाहत चक्र/ हृदय में महसूस होगा। इस तरहआप 7 बार ऐसा उच्चारण करें।

5-पुनः लंबी सांस लेकर,साँस को होल्ड करके 'उ' का उच्चारण करें। इसमें एक बात का ध्यान रखना होगा कि आपको अपना मुंह गोल करके 'उ' उच्चारण करना होगा। इसका वाइब्रेशन आपको कंठ / विशुद्धि चक्र में होगा।यहां भी आप 7 बार ऐसा उच्चारण करें।

6-इसके बाद पुनः लंबी सांस लेकर,साँस को होल्ड करके 'म' का उच्चारण करें। इसमें एक बात का ध्यान रखना होगा कि आपको मुंह बंद करके भ्रामरी की तरह नाक से 'गुंजन करके म' उच्चारण करना होगा।इसका वाइब्रेशन आपको तालुमध्य ..आज्ञा चक्र तक में महसूस होगा।ऐसा 7 बार उच्चारण करें।

7-इसके बाद मुंह बंद करके भ्रामरी की तरह नाक से 'गुंजन करके ओम का उच्चारण करें।इसका स्पंदन आपको ब्रह्मरंध में होगा।

NOTE;-

-इस प्रकार से इस ओंकार के उच्चारण की अनुभूति खुद ही करे।आरम्भ के समय में बराबर और दीर्घ उच्चारण अच्छे से नहीं हो पाता है। परन्तु धीरे धीरे अभ्यास के साथ आप इसका उच्चारण करने लगेंगे।ओंकार का उच्चारण करने से एक प्रकार का दीर्घ कंपन पैदा होता है ;जिसका अनुभव मुख, गुहा, नाभि चक्र, कान के पास से होकर पूरे शरीर में होता है|शारीरिक लाभ की दृष्टि से कंपन जरूरी है। यह ओंकार की साधना जब तक साधक को आनंद दे, तब तक वह करे।


5-ओंकार प्राणायाम से लाभ;-

02 POINTS;-

1-ओंकार प्राणायाम से साधक को शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक लाभ होता है। शरीर का सबसे छोटा हिस्सा ऊतकों को नवनिर्मित करनेका कार्यओंकार प्राणायाम करता है। ओंकार से प्रत्येक ऊतक चैतन्य से परिपूर्ण हो जाती है, इससे चेतना की जागृति होती है। शरीर की आंतरिक इंद्रियों की सफाई होती है। सूक्ष्म मल दूर होता है। शरीर स्वस्थ, सुंदर व पवित्र बनता है। कंठनाली में स्वरतंतु की ट्यूनिंग होती है। lungs की कार्यक्षमता बढ़ती है। श्वसन विकार दूर होतेहैं। रक्तशुद्धि होती है। हृदय को विश्राम मिलता है। मज्जा संस्थान सक्रिय होता है। पाचन क्रिया व उत्सर्जक क्रिया सुधरती है।मन के मल, मोह, अहंकार, मद सेछुटकारा मिलता है।मन शांत, प्रसन्न रहता है। मन की आकलन शक्ति बढ़ती है।मन रिक्त, स्वच्छ, पवित्र व हल्कापन महसूस करता है। इतना ही नहीं, एक मंगलमय वातावरण निर्मित होता है। हमारे दैनंदिन व्यवहार मेंआने वालेतनाव के कारण आनेवाली निराशा , उदासी व अशांति ओंकार के स्पष्ट व दीर्घउच्चारण से नष्ट होती है।

2-ओंकार के नि