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क्या है विज्ञानमय कोश की साधना -आत्म -अनुभूति योग का रहस्य ?PART-03

क्या है आत्म-अनुभूति योग का रहस्य ?- 25 FACTS;- 1-मन और आत्मा चेतना के दो रूप है।ये मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और आत्मा अलग अलग नही हैं ।जब सागर में तूफान आ जाए, तो तूफान और सागर एक होते हैं। वास्तव में , जब सागर विक्षुब्ध /Disturbed हो जाता है तो हम कहते हैं, तूफान है। आत्मा जब विक्षुब्ध हो जाती है तो हम कहते हैं, मन है; और मन जब शांत हो जाता है तो हम कहते हैं, आत्मा है।मन जो है वह आत्मा की विक्षुब्ध अवस्था है; और आत्मा जो है वह मन की शांत अवस्था है।चेतना जब हमारे भीतर विक्षुब्ध है, तूफान से घिरी है, तब हम इसे मन कहते हैं। इसलिए जब तक आपको मन का पता चलता है; तब तक आत्मा का पता न चलेगा। और इसलिए ध्यान में मन खो जाता है। इसका मतलब, वे जो लहरें आत्मा पर उठ रही थीं, सो जाती हैं, वापस शांति हो जाती है। तब आपको पता चलता है कि मैं आत्मा हूं। जब तक विक्षुब्ध /Disturbed हैं तब तक पता चलता है कि मन है। विक्षुब्ध मन बहुत रूपों में प्रकट होता है--कभी अहंकार की तरह, कभी बुद्धि की तरह, कभी चित्त की तरह--तो विक्षुब्ध/Disturbed मन के अनेक चेहरे हैं।

2-आत्मा और मन अलग नहीं, आत्मा और शरीर भी अलग नहीं; क्योंकि तत्व तो एक है, और उस एक के सारे के सारे रूपांतरण हैं। और उस एक को जान लें तो फिर कोई झगड़ा नहीं है--शरीर से भी नहीं, मन से भी नहीं। उस एक को एक बार पहचान लें तो फिर वही है--फिर रावण में भी वही है, फिर राम में भी वही है। फिर ऐसा नहीं है कि राम को नमस्कार कर आएंगे और रावण को जला आएंगे; ऐसा नहीं। फिर दोनों को ही नमस्कार कर आएंगे, या दोनों को ही जला आएंगे; क्योंकि दोनों में वही है।तत्व एक है,लेकिन अभिव्यक्तियां अनंत हैं; एक है सत्य,लेकिन रूप अनेक हैं ; एक है अस्तित्व, लेकिन बहुत हैं उसके चेहरे, मुद्राएं।साधना का प्रयोजन यह है कि “हम अपने वास्तविक स्वरूप को समझें, आत्मा का दर्शन और अनुभव करें एवं विचार और कार्यों को उस ढाँचे में ढालें जो आत्मा की रुचि के अनुरूप हो। 3-आत्म दर्शन के लिए इस प्रकार के विचार और विश्वासों को मन में स्थान देना चाहिए कि ‘मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ।” अपने अहम् को शमार से भिन्न अविनाशी आत्मा और शरीर मन बुद्धि को अपना औजार समझने की मान्यता जब सुदृढ़ हो जाती है तो मनुष्य उसी ढाँचे में ढलने लगता है जो आत्मा के स्वार्थ एवं गौरव के अनुरूप है। आमतौर से सभी लोग यह जानते हैं कि प्राणी शरीर से भिन्न है। पर यह उनका ज्ञान मस्तिष्क के अग्रभाव तक ही सीमित होता है। वे इस तथ्य को जानते तो हैं पर मानते नहीं। व्यवहार में लोग अपने को शरीर ही अनुभव करते हैं और शरीर को जिन कामों में लाभ होता है ,सुख मिलता है, मनोरंजन होता है- उन्हें करने के लिए दिन रात लगे रहते हैं। धन कमाने में और इन्द्रिय भोगों में आमतौर से लोगों का समय खर्च होता है। जिन चिन्ताओं में व्यस्त रहते हैं ;वे शरीर के लाभ हानि से ही सम्बन्धित होती हैं। शरीर के लिए आत्मा की परवाह नहीं की जाती, पाप, अनीति, छल, दुराचार असत्य को अपनाकर भी लोग स्वार्थ साधन करते हैं.. वह शरीर से ही सम्बन्धित होते हैं। 4-जन साधारण का स्वार्थ शरीर स्वार्थ से ही सम्बन्धित होता है। संसार में शरीर को ही ‘मैं’ समझने की आम प्रवृत्ति है। ‘मैं’ का अर्थ आत्मा है इसे जानते जरूर हैं पर व्यवहार में मानते यह हैं कि ‘मैं’ का अर्थ है- मेरा शरीर। इस दृष्टि कोण से जीवन की गतिविधि में भारी अन्तर आ जाता है। आत्मवादी और भौतिक दृष्टि कोण में वैसे बहुत थोड़ा अन्तर दिखाई पड़ता है पर अन्तर के कारण जो परिणाम उपस्थित होते हैं। उनमें उतना ही भेद होता है जितना आकाश पाताल में। रेल की पटरी में लाइन बदलने की कैंची जहाँ लगी होती है वहाँ कोई बहुत भारी अन्तर दिखाई नहीं देता पर जब एक गाड़ी एक तरफ की गुजरती है और दूसरी गाड़ी दूसरी तरफ से तो अन्त में जब चलते-चलते दोनों गाड़ियाँ पहुँचती हैं उन स्थानों में सैंकड़ों हजारों मील का अन्तर होता है। एक पूर्व में पहुँचती है तो दूसरी पश्चिमी में, कैंची के काटने में दो चार अंगुल का फर्क होता है पर अन्त में उसका प्रतिफल बहुत ही भिन्न होता है। ठीक यही हालत आत्मिक और भौतिक दृष्टिकोणों के बीच में है। जो व्यक्ति अपने को आत्मा मानता है वह अपना स्वार्थ उसे समझता है.. जिससे आत्मकल्याण होता है। वह आत्मकल्याण करने वाले विचार और कार्यों को अपनाता है। 5-असंख्य मनुष्य स्वर्ग- नरक की, मुक्ति- बंधन की चिन्ता न करके आत्म हनन करते हुए भौतिक संपदायें कमाते हैं जिससे उनको मनोवाँछित सुख सामग्री प्राप्त हो सके। ‘मैं शरीर हूँ' इसलिए शरीर सुख के लिए धर्म अधर्म की परवाह न करता हुआ भौतिक संपदाएं कमाता है उसी के लिए जीवन का प्रत्येक क्षण लगाता है ।आज के इस लोकव्यापी दृष्टिकोण में परिवर्तन किये बिना कोई मनुष्य, कोई समाज, कोई राष्ट्र, सुख शान्ति से नहीं रह सकता। “मैं आत्मा हूँ, ईश्वर का अविनाशी राजकुमार हूँ, अपने औजार शरीर और मन का उपयोग केवल उन्हीं कार्यों में करूंगा -जो मेरे गौरव के, धन के, कर्तव्य के, अनुकूल हैं।” यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण जिन व्यक्तियों ने अपना लिया है उनका जीवन क्रम एक सतोगुणी ढाँचे में ढल जाता है। भौतिक दृष्टिकोण मनुष्य को चिन्ता, क्रोध, शोक, द्वेष, कलह, ईर्ष्या, मद, प्रस्तर, मोह, रोग, उद्वेग आवेश का नारकीय प्रतिफल उपस्थित करता है और आत्मिक दृष्टिकोण के कारण प्रेम सहयोग, प्रसन्नता, साहस, अभय, सन्तोष एवं सात्विक आनन्द का उपहार प्राप्त होता है। इनमें एक को नरक और दूसरे को स्वर्ग कहा जा सकता है। 6-योग साधना द्वारा स्वर्गीय आनन्द की प्राप्ति की जाती है। इस साधना मंदिर का पहिला द्वार आत्म जागरण है। ‘मैं आत्मा हूँ- इस भाव का अन्तःकरण में प्रत्यक्ष होना उस पर पूर्ण श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा तथा इस आस्था का होना साधना का प्रयोजन है। सोते जागते, चलते, काम करते, साधक के मन में यह गहरा विश्वास होना चाहिए कि ''मैं ईश्वर का पवित्र अंश अविनाशी आत्मा हूँ केवल वही विचार और कार्य अपनाऊँगा जो मेरे वास्तविक आत्मिक स्वार्थ के अनुकूल हैं।” यह छोटी शब्दावली एक कागज पर लिखकर उस स्थान पर आत्म जागरण योग टाँग लेनी चाहिए जहाँ बराबर नजर पड़ती हो। इन भावनाओं को जितनी अधिक बार हो सके मानसिक जप की तरह हृदयंगम करना चाहिए। लगातार बहुत दिनों तक इस तथ्य पर अन्तःकरण को केन्द्रित करने से मन पर वैसे ही संस्कार जम जाते हैं और साधक अपने वास्तविक स्वरूप को समझ जाता है। इसको आत्मिक भूमिका का जागरण कहते हैं। 7-आत्म-अनुभूति/आत्मज्ञान शास्त्र से नहीं, स्वयं से उत्पन्न होता है ; शब्द से नहीं, निशब्द से उत्पन्न होता है ; विचार से नहीं निर्विचार से उत्पन्न होता है। आत्मज्ञान विकल्पों के इकट्ठा करने से नहीं निर्विकल्प समाधि में समाधान में उत्पन्न होता है। इसलिए शास्त्र आत्मज्ञता नहीं देता, स्वयं का बोध ही, स्वयं के प्रति जागना ही आत्मज्ञान है। इंजीनियरिंग , डाक्टरी पढ़नी हो शास्त्रज्ञान से हो जाएगा। पर स्व के संबंध में बोध शास्त्र से नहीं हो सकता। शास्त्र तो विचार को परिपक्व कर देंगे। आत्मज्ञान तो विचार के टूटने से होता है। शास्त्र तो बुद्धि को एक विशिष्ट तर्क भर देंगे और आप सोचते हैं कि आपको आत्मा का ज्ञान हो गया है तो आप भी गलती में हैं।एक प्रचार आपके चित्त में बैठा है कि आत्मा है, ईश्वर है।प्रचार से एक विचार परिपक्व हो जाता है, अनुभव नहीं होता है। अगर आपको आत्म-सत्य का अनुभव करना है तो प्रचार के प्रभाव छोड़ देने होंगे। जो स्वयं में भीतर है उसका निष्प्रभाव स्थिति में जागरण होता है। प्रभाव तो बाह्य है। प्रभाव के अभाव में ही स्वयं का बोध अनुभव होता है। 8-इंद्रियों का निर्माण ही इसलिए हुआ है कि हम जगत से परिचित हो सकें। दूसरे से, अन्य से परिचित होने की व्यवस्था है। लेकिन वह जो भीतर छुपा है, वह इस परिचय में अपरिचित हो जाता है।स्वयं को देखने के लिए इंद्रियों की कोई भी जरूरत नहीं है। स्वयं को तो बिना इंद्रियों के ही देखा जा सकता है। इसलिए इंद्रियां भीतर की तरफ नहीं जातीं, बाहर की तरफ जाती हैं।आंख बाहर ही देख सकती है ;भीतर देखने का कोई उपाय नहीं। लेकिन संतो ने , योगियों ने कहा है, ''लौटा लो आंख को, उलटी कर लो धारा''।लौटाने का मतलब इतना है कि बाहर की तरफ मत जाओ। जो ऊर्जा आंख से बाहर जाती है, उसे बाहर मत जाने दो। बाहर की तरफ जाने वाला द्वार बंद हो जाए, तो देखने वाला बाहर न जाकर अपनी तरफ लौट आएगा। स्वयं का देखना बिना आंख के हो जाता है। वह चक्षुरहित दर्शन है। 9-स्वयं को सुनने के लिए कोई कानों को भीतर लौटाने की जरूरत नहीं है। सिर्फ बाहर की ध्वनि ,तरंगों का जाल कान से छूट जाए। कान बाहर के प्रति उपेक्षा से भर जाएं तो जो ऊर्जा कान से बाहर की तरफ जाती है ;वह ऊर्जा भीतर की ध्वनि को अपने आप सुन लेती है। उस ध्वनि को सुनने के लिए कान की कोई भी जरूरत नहीं है।तो जैसे कोई झरना बहता है और अवरुद्ध हो जाए और कहीं जाने का माग न मिले, तो झरना अपनी तरफ लौट आएगा, झरने का बहना बंद हो जाएगा और एक झील बन जाएगी। ऐसे ही चेतना बाहर जा रही है पांचों इंद्रियों से। वह बाहर न जाए तो चैतन्य की झील भीतर निर्मित हो जाती है। वह झील स्वयं बोध संपन्न है। वह झील स्वयं को देखने, स्वयं को सुनने, स्पर्श करने में संपन्न है। लेकिन वे सारे अनुभव अतींद्रिय हैं। उनका इंद्रियों से कोई भी लेना -देना नहीं है।कमरे में, कितना ही गहन अंधकार हो आपको कुछ भी न दिखाई पड़ता हो, लेकिन आप हैं, यह तो कोई भी अंधकार मिटा न सकेगा। कोई भी स्थिति हो आप तो रहेंगे ही और आपको पता चलता ही रहेगा कि मैं हूं। यह होना स्वयंसिद्ध है। यह किसी माध्यम से नहीं है। इसलिए आत्मज्ञानियों ने कहा है कि जगत के सारे अनुभव परोक्ष हैं, सिर्फ आत्म अनुभव प्रत्यक्ष है। 10-यह बड़ी उलटी बात है क्योंकि आमतौर से हम सोचते हैं कि सब चीजें प्रत्यक्ष हैं। वृक्ष दिखाई पड़ रहा है ,आप दिखाई पड़ रहे हैं। सब चीजें प्रत्यक्ष हैं, आंख के सामने हैं। लेकिन आत्मज्ञानी कहते हैं कि जगत के सभी अनुभव परोक्ष हैं क्योंकि बीच में आंख माध्यम का काम कर रही है। तुम पीछे छिपे हो ..ज्ञेय वस्तु बाहर है, बीच में माध्यम आंख है। आंख धोखा दे सकती है।चार्वाकों ने, नास्तिकों ने एक ही प्रत्यक्ष प्रमाण माना है कि जो आंख के सामने है, उसे ही मानेंगे।लेकिन आंख रात में सपने भी देखती है । वे प्रत्यक्ष होते हैं, लेकिन सत्य नहीं होते। कभी राह पर पड़ी रस्सी सांप दिखाई पड़ जाती है और जब आंख रस्सी में, सांप देखती है तो सांप बिलकुल दिखाई पड़ता है। लेकिन बाद में रोशनी आने पर पता चलता है, वहा कोई सांप नहीं। मरुस्थल में मृग -मरीचिका दिखाई पड़ जाती है। इसलिए इंद्रियों का इतना भरोसा नहीं है । सिर्फ आत्मज्ञान ही प्रत्यक्ष है, बाकी सब ज्ञान परोक्ष है क्योंकि बीच में कोई मध्यस्थ है। 11-मध्यस्थ का कोई भरोसा नहीं हैं। लेकिन पदार्थ का ज्ञान तो परोक्ष ही होगा, सिर्फ आत्मा का ज्ञान प्रत्यक्ष हो सकता है। क्योंकि वहां बीच में कोई भी नहीं है ..अकेला मैं ही हूं। कोई धोखा देने वाला तत्व, कोई विकृत करने वाला तत्व बीच में नहीं है। इसलिए सामान्य अनुभव में जो प्रत्यक्ष है, आत्मज्ञानी के लिए परोक्ष है। और सामान्य अनुभव में जिसको हम बिलकुल नहीं देखते, वह आत्मज्ञानी के लिए प्रत्यक्ष है।आत्मा स्वयं प्रकाशित है। उसे देखने के लिए इंद्रियों के प्रकाश की कोई भी जरूरत नहीं है। अंधा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना आंख वाला। बहरा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना कान वाला। उससे शरीर की सामर्थ्य से कोई भेद नहीं पड़ता। सबल, स्वस्थ कि अस्वस्थ, सुंदर कि कुरूप, काला कि गोरा, कोई अंतर नहीं पड़ता। शरीर की कोई उपयोगिता आत्मज्ञान के लिए नहीं है। लेकिन दूसरे को जानना हो तो शरीर की उपयोगिता है। आंखे स्वस्थ होनी चाहिए कान स्वस्थ होने चाहिए। शरीर शक्तिशाली होना चाहिए तो ही दूसरे से संबंध जुड़ेगा। अपने से संबंध तो बना ही हुआ है, उसे जोड़ने का कोई प्रयोजन नहीं है। 12-इसलिए परमेश्वर को जानने के लिए तो इंद्रियों की जरूरत नहीं है, वह तो स्वयं ही प्रगट हो जाता है। लेकिन संसार स्वयं प्रगट नहीं होता, संसार को जानने के लिए इंद्रियों की जरूरत है। इसलिए जितनी ज्यादा इंद्रियां हों, उतना ज्यादा संसार प्रगट होता है।जगत में बहुत इंद्रियों वाले प्राणी हैं। मनुष्य के पास पांच इंद्रियां हैं।एक छोटा सा जीवकोष्ठ है ..'अमीबा'- उसके पास एक ही इंद्रिय है, केवल शरीर है।उसे स्पर्श का अनुभव होता है, और कोई इंद्रिय नहीं है। तो जगत को जानने की दृष्टि से अमीबा सबसे कम विकसित प्राणी है लेकिन आत्मा की दृष्टि से नहीं ।जितनी ज्यादा इंद्रिया होती जाती हैं, जगत की जानकारी उतनी बढ़ती चली जाती है।कोई आश्चर्य न होगा कि किसी ग्रह पर पांच इंद्रियों से ज्यादा इंद्रियों वाले प्राणी हों,. तो मनुष्य का ज्ञान उनके सामने बिलकुल फीका हो जाए। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि छठवीं इंद्रिय क्या होगी क्योंकि हमारा ज्ञान पांच का है। जिन पशुओं के पास चार इंद्रिया हैं, वे कल्पना भी नहीं कर सकते कि पांचवी इंद्रिय क्या होगी? 13-पशुओं को छोड़ दें, एक अंधा व्यक्ति सोच भी नहीं सकता कि प्रकाश क्या होगा। वास्तव में ,आपके ज्ञान का अस्सी प्रतिशत आंख से आता है, बाकी चार इंद्रियों से तो केवल बीस प्रतिशत आता है। इसलिए अंधे पर हमें बहुत दया आती है।दया का कारण है कि उसका अस्सी प्रतिशत जीवन अंधेरे में है। अस्सी प्रतिशत ज्ञान की उसे कोई संभावना नहीं है।स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर बनाए हैं इसलिए अधिक मनुष्य प्राय: बाहर की वस्तुओं को देखने में ही जीवन व्यतीत कर देते हैं ..अंतरात्मा को नहीं ।किसी भाग्यशाली बुद्धिमान मनुष्य ने ही अमरत्व को पाने की आकांक्षा से चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों की ओर से हटाकर अंतरात्मा को देखा है। सारे ध्यान के प्रयोग, अलग—अलग विधियों वाले प्रयोग, एक चीज को मौलिक रूप से स्वीकार करते हैं कि आपकी सारी इंद्रियां शांत हो जाएं। किस ढंग से शांत हो, इसमें भेद है, लेकिन शांत हो जाएं, इसमें कोई विवाद नहीं है। सब इंद्रिया शांत हो जाएं और आप भीतर रह जाएं। जगत बाहर रह जाए आप भीतर रह जाएं और बीच में कोई सेतु न रहे, कोई जोड़ न रहे। उस क्षण में अंतरात्मा आविर्भूत होती है, प्रगट हो जाती है।इंद्रियों को थका डालें, इतना थका डालें कि क्षणभर को भी अगर वे विश्राम में पहुंच जाएं, तो उतने क्षणभर को आपका प्रवेश भीतर हो जाए। 14-जो बाल बुद्धि वाले बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं वे सर्वत्र फैले हुए मृत्यु के बंधन में पड़ते हैं। किंतु बुद्धिमान मनुष्य नित्य अमरपद को विवेक द्वारा जानकर इस जगत में अनित्य भोगों में से किसी को भी नहीं चाहते।विवेक का अर्थ इतना ही है कि जो निरर्थक है, वह हमें निरर्थक दिखाई पड़ जाए; जो सार्थक है, वह सार्थक दिखाई पड़ जाए।जगत में हम कुछ भी चाहें, अगर न मिले तो दुख, और मिल जाए तो भी सुख नहीं।मनुष्य जहां है, वहीं दुखी है। सुखी मनुष्य खोजना कठिन है।सुखी मनुष्य वही हो सकता है, जो जहां है वहीं सुखी है। लेकिन जो जहां है वहीं सुखी है, ऐसे मनुष्य का नाम ही संन्यासी है।और जो जहां है वहीं दुखी है, ऐसे मनुष्य का नाम ही गृहस्थ है। वह हमेशा भविष्य में ही जी रहा है। कल उसका सुख है। स्वर्ग कल है, आज कुछ भी नहीं। आज को समर्पित करेगा, लगाएगा ..कल के लिए। आज को जलाएगा कल के लिए, ताकि कल का स्वर्ग मिल जाए। कल कभी आता नहीं। कल जब आएगा, वह आज ही होगा। वह उस आज को फिर कल के लिए लगाएगा। ऐसे वह लगाता जाता है। और एक दिन सिवाय मृत्यु के हाथ में कुछ भी नहीं आता।जो इस सत्य को जानकर कि बाहर कभी किसी को न कोई आनंद मिला है और न मिल सकता है, अपने ही अनुभव से, अपने ही जीवन के प्रयोगों से इस रहस्य को समझकर, जो बाहर के अनित्य भोगों की आकांक्षा छोड़ देता है, वही विवेकशील है। 15- बाहर की वस्तुओं की आकांक्षा छोड़ना और बाहर की वस्तुओं को छोड़ने में लग जाना बिलकुल और बात है।कुछ नासमझ बाहर की वस्तुओं को छोड़ने में लग जाते हैं।बाहर की वस्तु को तो वही छोड़ने में लगता है, जो पहले बाहर की वस्तु को पकड़ने में लगा था।अब वह छोड़ने में लगता है। लेकिन उसकी नजर बाहर की वस्तु पर ही लगी रहती है।बाहर की वस्तु न तो पकड़ने योग्य है और न छोड़ने योग्य। न तुम उसे पकड़ सकते हो, न तुम उसे छोड़ सकते हो। तुम हो कौन ..तुमने पकड़ा, वह तुम्हारी भ्रांति थी। तुम छोड़ रहे हो, यह तुम्हारी भ्रांति है। बाहर की वस्तु को न तुम्हारे पकड़ने से कुछ फर्क पड़ता है, न तुम्हारे छोड़ने से कुछ फर्क पड़ता है।तुम कल कहते थे, यह मकान मेरा है। मकान ने कभी नहीं कहा था कि तुम मेरे मालिक हो।क्योंकि तुमसे पहले कोई और यही कह रहा था। उससे पहले कोई और यही कह रहा था और फिर एक दिन तुम कहते हो कि मैंने त्याग कर दिया है इस मकान का। न मकान तुम्हारा था, न तुम त्याग कर सकते हो। त्याग करना उतना ही पागलपन की बात है, जितना मालकियत की घोषणा थी। त्याग तो मालिक कर सकता है। ज्ञानी इस सत्य को जान लेता है कि मैं मालिक ही नहीं हूं तो किसी चीज का छोडंगूा -पकडूगा कैसे? 16-इस बोध का भीतर गहरा हो जाना कि न इस जगत में कुछ पकड़ा जा सकता है और न छोड़ा जा सकता है..वासना का त्याग है । पकड़ना, छो