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क्या है विज्ञानमय कोश की साधना -आत्म -अनुभूति योग का रहस्य ?PART-03

क्या है आत्म-अनुभूति योग का रहस्य ?- 25 FACTS;- 1-मन और आत्मा चेतना के दो रूप है।ये मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और आत्मा अलग अलग नही हैं ।जब सागर में तूफान आ जाए, तो तूफान और सागर एक होते हैं। वास्तव में , जब सागर विक्षुब्ध /Disturbed हो जाता है तो हम कहते हैं, तूफान है। आत्मा जब विक्षुब्ध हो जाती है तो हम कहते हैं, मन है; और मन जब शांत हो जाता है तो हम कहते हैं, आत्मा है।मन जो है वह आत्मा की विक्षुब्ध अवस्था है; और आत्मा जो है वह मन की शांत अवस्था है।चेतना जब हमारे भीतर विक्षुब्ध है, तूफान से घिरी है, तब हम इसे मन कहते हैं। इसलिए जब तक आपको मन का पता चलता है; तब तक आत्मा का पता न चलेगा। और इसलिए ध्यान में मन खो जाता है। इसका मतलब, वे जो लहरें आत्मा पर उठ रही थीं, सो जाती हैं, वापस शांति हो जाती है। तब आपको पता चलता है कि मैं आत्मा हूं। जब तक विक्षुब्ध /Disturbed हैं तब तक पता चलता है कि मन है। विक्षुब्ध मन बहुत रूपों में प्रकट होता है--कभी अहंकार की तरह, कभी बुद्धि की तरह, कभी चित्त की तरह--तो विक्षुब्ध/Disturbed मन के अनेक चेहरे हैं।

2-आत्मा और मन अलग नहीं, आत्मा और शरीर भी अलग नहीं; क्योंकि तत्व तो एक है, और उस एक के सारे के सारे रूपांतरण हैं। और उस एक को जान लें तो फिर कोई झगड़ा नहीं है--शरीर से भी नहीं, मन से भी नहीं। उस एक को एक बार पहचान लें तो फिर वही है--फिर रावण में भी वही है, फिर राम में भी वही है। फिर ऐसा नहीं है कि राम को नमस्कार कर आएंगे और रावण को जला आएंगे; ऐसा नहीं। फिर दोनों को ही नमस्कार कर आएंगे, या दोनों को ही जला आएंगे; क्योंकि दोनों में वही है।तत्व एक है,लेकिन अभिव्यक्तियां अनंत हैं; एक है सत्य,लेकिन रूप अनेक हैं ; एक है अस्तित्व, लेकिन बहुत हैं उसके चेहरे, मुद्राएं।साधना का प्रयोजन यह है कि “हम अपने वास्तविक स्वरूप को समझें, आत्मा का दर्शन और अनुभव करें एवं विचार और कार्यों को उस ढाँचे में ढालें जो आत्मा की रुचि के अनुरूप हो। 3-आत्म दर्शन के लिए इस प्रकार के विचार और विश्वासों को मन में स्थान देना चाहिए कि ‘मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ।” अपने अहम् को शमार से भिन्न अविनाशी आत्मा और शरीर मन बुद्धि को अपना औजार समझने की मान्यता जब सुदृढ़ हो जाती है तो मनुष्य उसी ढाँचे में ढलने लगता है जो आत्मा के स्वार्थ एवं गौरव के अनुरूप है। आमतौर से सभी लोग यह जानते हैं कि प्राणी शरीर से भिन्न है। पर यह उनका ज्ञान मस्तिष्क के अग्रभाव तक ही सीमित होता है। वे इस तथ्य को जानते तो हैं पर मानते नहीं। व्यवहार में लोग अपने को शरीर ही अनुभव करते हैं और शरीर को जिन कामों में लाभ होता है ,सुख मिलता है, मनोरंजन होता है- उन्हें करने के लिए दिन रात लगे रहते हैं। धन कमाने में और इन्द्रिय भोगों में आमतौर से लोगों का समय खर्च होता है। जिन चिन्ताओं में व्यस्त रहते हैं ;वे शरीर के लाभ हानि से ही सम्बन्धित होती हैं। शरीर के लिए आत्मा की परवाह नहीं की जाती, पाप, अनीति, छल, दुराचार असत्य को अपनाकर भी लोग स्वार्थ साधन करते हैं.. वह शरीर से ही सम्बन्धित होते हैं। 4-जन साधारण का स्वार्थ शरीर स्वार्थ से ही सम्बन्धित होता है। संसार में शरीर को ही ‘मैं’ समझने की आम प्रवृत्ति है। ‘मैं’ का अर्थ आत्मा है इसे जानते जरूर हैं पर व्यवहार में मानते यह हैं कि ‘मैं’ का अर्थ है- मेरा शरीर। इस दृष्टि कोण से जीवन की गतिविधि में भारी अन्तर आ जाता है। आत्मवादी और भौतिक दृष्टि कोण में वैसे बहुत थोड़ा अन्तर दिखाई पड़ता है पर अन्तर के कारण जो परिणाम उपस्थित होते हैं। उनमें उतना ही भेद होता है जितना आकाश पाताल में। रेल की पटरी में लाइन बदलने की कैंची जहाँ लगी होती है वहाँ कोई बहुत भारी अन्तर दिखाई नहीं देता पर जब एक गाड़ी एक तरफ की गुजरती है और दूसरी गाड़ी दूसरी तरफ से तो अन्त में जब चलते-चलते दोनों गाड़ियाँ पहुँचती हैं उन स्थानों में सैंकड़ों हजारों मील का अन्तर होता है। एक पूर्व में पहुँचती है तो दूसरी पश्चिमी में, कैंची के काटने में दो चार अंगुल का फर्क होता है पर अन्त में उसका प्रतिफल बहुत ही भिन्न होता है। ठीक यही हालत आत्मिक और भौतिक दृष्टिकोणों के बीच में है। जो व्यक्ति अपने को आत्मा मानता है वह अपना स्वार्थ उसे समझता है.. जिससे आत्मकल्याण होता है। वह आत्मकल्याण करने वाले विचार और कार्यों को अपनाता है। 5-असंख्य मनुष्य स्वर्ग- नरक की, मुक्ति- बंधन की चिन्ता न करके आत्म हनन करते हुए भौतिक संपदायें कमाते हैं जिससे उनको मनोवाँछित सुख सामग्री प्राप्त हो सके। ‘मैं शरीर हूँ' इसलिए शरीर सुख के लिए धर्म अधर्म की परवाह न करता हुआ भौतिक संपदाएं कमाता है उसी के लिए जीवन का प्रत्येक क्षण लगाता है ।आज के इस लोकव्यापी दृष्टिकोण में परिवर्तन किये बिना कोई मनुष्य, कोई समाज, कोई राष्ट्र, सुख शान्ति से नहीं रह सकता। “मैं आत्मा हूँ, ईश्वर का अविनाशी राजकुमार हूँ, अपने औजार शरीर और मन का उपयोग केवल उन्हीं कार्यों में करूंगा -जो मेरे गौरव के, धन के, कर्तव्य के, अनुकूल हैं।” यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण जिन व्यक्तियों ने अपना लिया है उनका जीवन क्रम एक सतोगुणी ढाँचे में ढल जाता है। भौतिक दृष्टिकोण मनुष्य को चिन्ता, क्रोध, शोक, द्वेष, कलह, ईर्ष्या, मद, प्रस्तर, मोह, रोग, उद्वेग आवेश का नारकीय प्रतिफल उपस्थित करता है और आत्मिक दृष्टिकोण के कारण प्रेम सहयोग, प्रसन्नता, साहस, अभय, सन्तोष एवं सात्विक आनन्द का उपहार प्राप्त होता है। इनमें एक को नरक और दूसरे को स्वर्ग कहा जा सकता है। 6-योग साधना द्वारा स्वर्गीय आनन्द की प्राप्ति की जाती है। इस साधना मंदिर का पहिला द्वार आत्म जागरण है। ‘मैं आत्मा हूँ- इस भाव का अन्तःकरण में प्रत्यक्ष होना उस पर पूर्ण श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा तथा इस आस्था का होना साधना का प्रयोजन है। सोते जागते, चलते, काम करते, साधक के मन में यह गहरा विश्वास होना चाहिए कि ''मैं ईश्वर का पवित्र अंश अविनाशी आत्मा हूँ केवल वही विचार और कार्य अपनाऊँगा जो मेरे वास्तविक आत्मिक स्वार्थ के अनुकूल हैं।” यह छोटी शब्दावली एक कागज पर लिखकर उस स्थान पर आत्म जागरण योग टाँग लेनी चाहिए जहाँ बराबर नजर पड़ती हो। इन भावनाओं को जितनी अधिक बार हो सके मानसिक जप की तरह हृदयंगम करना चाहिए। लगातार बहुत दिनों तक इस तथ्य पर अन्तःकरण को केन्द्रित करने से मन पर वैसे ही संस्कार जम जाते हैं और साधक अपने वास्तविक स्वरूप को समझ जाता है। इसको आत्मिक भूमिका का जागरण कहते हैं। 7-आत्म-अनुभूति/आत्मज्ञान शास्त्र से नहीं, स्वयं से उत्पन्न होता है ; शब्द से नहीं, निशब्द से उत्पन्न होता है ; विचार से नहीं निर्विचार से उत्पन्न होता है। आत्मज्ञान विकल्पों के इकट्ठा करने से नहीं निर्विकल्प समाधि में समाधान में उत्पन्न होता है। इसलिए शास्त्र आत्मज्ञता नहीं देता, स्वयं का बोध ही, स्वयं के प्रति जागना ही आत्मज्ञान है। इंजीनियरिंग , डाक्टरी पढ़नी हो शास्त्रज्ञान से हो जाएगा। पर स्व के संबंध में बोध शास्त्र से नहीं हो सकता। शास्त्र तो विचार को परिपक्व कर देंगे। आत्मज्ञान तो विचार के टूटने से होता है। शास्त्र तो बुद्धि को एक विशिष्ट तर्क भर देंगे और आप सोचते हैं कि आपको आत्मा का ज्ञान हो गया है तो आप भी गलती में हैं।एक प्रचार आपके चित्त में बैठा है कि आत्मा है, ईश्वर है।प्रचार से एक विचार परिपक्व हो जाता है, अनुभव नहीं होता है। अगर आपको आत्म-सत्य का अनुभव करना है तो प्रचार के प्रभाव छोड़ देने होंगे। जो स्वयं में भीतर है उसका निष्प्रभाव स्थिति में जागरण होता है। प्रभाव तो बाह्य है। प्रभाव के अभाव में ही स्वयं का बोध अनुभव होता है। 8-इंद्रियों का निर्माण ही इसलिए हुआ है कि हम जगत से परिचित हो सकें। दूसरे से, अन्य से परिचित होने की व्यवस्था है। लेकिन वह जो भीतर छुपा है, वह इस परिचय में अपरिचित हो जाता है।स्वयं को देखने के लिए इंद्रियों की कोई भी जरूरत नहीं है। स्वयं को तो बिना इंद्रियों के ही देखा जा सकता है। इसलिए इंद्रियां भीतर की तरफ नहीं जातीं, बाहर की तरफ जाती हैं।आंख बाहर ही देख सकती है ;भीतर देखने का कोई उपाय नहीं। लेकिन संतो ने , योगियों ने कहा है, ''लौटा लो आंख को, उलटी कर लो धारा''।लौटाने का मतलब इतना है कि बाहर की तरफ मत जाओ। जो ऊर्जा आंख से बाहर जाती है, उसे बाहर मत जाने दो। बाहर की तरफ जाने वाला द्वार बंद हो जाए, तो देखने वाला बाहर न जाकर अपनी तरफ लौट आएगा। स्वयं का देखना बिना आंख के हो जाता है। वह चक्षुरहित दर्शन है। 9-स्वयं को सुनने के लिए कोई कानों को भीतर लौटाने की जरूरत नहीं है। सिर्फ बाहर की ध्वनि ,तरंगों का जाल कान से छूट जाए। कान बाहर के प्रति उपेक्षा से भर जाएं तो जो ऊर्जा कान से बाहर की तरफ जाती है ;वह ऊर्जा भीतर की ध्वनि को अपने आप सुन लेती है। उस ध्वनि को सुनने के लिए कान की कोई भी जरूरत नहीं है।तो जैसे कोई झरना बहता है और अवरुद्ध हो जाए और कहीं जाने का माग न मिले, तो झरना अपनी तरफ लौट आएगा, झरने का बहना बंद हो जाएगा और एक झील बन जाएगी। ऐसे ही चेतना बाहर जा रही है पांचों इंद्रियों से। वह बाहर न जाए तो चैतन्य की झील भीतर निर्मित हो जाती है। वह झील स्वयं बोध संपन्न है। वह झील स्वयं को देखने, स्वयं को सुनने, स्पर्श करने में संपन्न है। लेकिन वे सारे अनुभव अतींद्रिय हैं। उनका इंद्रियों से कोई भी लेना -देना नहीं है।कमरे में, कितना ही गहन अंधकार हो आपको कुछ भी न दिखाई पड़ता हो, लेकिन आप हैं, यह तो कोई भी अंधकार मिटा न सकेगा। कोई भी स्थिति हो आप तो रहेंगे ही और आपको पता चलता ही रहेगा कि मैं हूं। यह होना स्वयंसिद्ध है। यह किसी माध्यम से नहीं है। इसलिए आत्मज्ञानियों ने कहा है कि जगत के सारे अनुभव परोक्ष हैं, सिर्फ आत्म अनुभव प्रत्यक्ष है। 10-यह बड़ी उलटी बात है क्योंकि आमतौर से हम सोचते हैं कि सब चीजें प्रत्यक्ष हैं। वृक्ष दिखाई पड़ रहा है ,आप दिखाई पड़ रहे हैं। सब चीजें प्रत्यक्ष हैं, आंख के सामने हैं। लेकिन आत्मज्ञानी कहते हैं कि जगत के सभी अनुभव परोक्ष हैं क्योंकि बीच में आंख माध्यम का काम कर रही है। तुम पीछे छिपे हो ..ज्ञेय वस्तु बाहर है, बीच में माध्यम आंख है। आंख धोखा दे सकती है।चार्वाकों ने, नास्तिकों ने एक ही प्रत्यक्ष प्रमाण माना है कि जो आंख के सामने है, उसे ही मानेंगे।लेकिन आंख रात में सपने भी देखती है । वे प्रत्यक्ष होते हैं, लेकिन सत्य नहीं होते। कभी राह पर पड़ी रस्सी सांप दिखाई पड़ जाती है और जब आंख रस्सी में, सांप देखती है तो सांप बिलकुल दिखाई पड़ता है। लेकिन बाद में रोशनी आने पर पता चलता है, वहा कोई सांप नहीं। मरुस्थल में मृग -मरीचिका दिखाई पड़ जाती है। इसलिए इंद्रियों का इतना भरोसा नहीं है । सिर्फ आत्मज्ञान ही प्रत्यक्ष है, बाकी सब ज्ञान परोक्ष है क्योंकि बीच में कोई मध्यस्थ है। 11-मध्यस्थ का कोई भरोसा नहीं हैं। लेकिन पदार्थ का ज्ञान तो परोक्ष ही होगा, सिर्फ आत्मा का ज्ञान प्रत्यक्ष हो सकता है। क्योंकि वहां बीच में कोई भी नहीं है ..अकेला मैं ही हूं। कोई धोखा देने वाला तत्व, कोई विकृत करने वाला तत्व बीच में नहीं है। इसलिए सामान्य अनुभव में जो प्रत्यक्ष है, आत्मज्ञानी के लिए परोक्ष है। और सामान्य अनुभव में जिसको हम बिलकुल नहीं देखते, वह आत्मज्ञानी के लिए प्रत्यक्ष है।आत्मा स्वयं प्रकाशित है। उसे देखने के लिए इंद्रियों के प्रकाश की कोई भी जरूरत नहीं है। अंधा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना आंख वाला। बहरा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना कान वाला। उससे शरीर की सामर्थ्य से कोई भेद नहीं पड़ता। सबल, स्वस्थ कि अस्वस्थ, सुंदर कि कुरूप, काला कि गोरा, कोई अंतर नहीं पड़ता। शरीर की कोई उपयोगिता आत्मज्ञान के लिए नहीं है। लेकिन दूसरे को जानना हो तो शरीर की उपयोगिता है। आंखे स्वस्थ होनी चाहिए कान स्वस्थ होने चाहिए। शरीर शक्तिशाली होना चाहिए तो ही दूसरे से संबंध जुड़ेगा। अपने से संबंध तो बना ही हुआ है, उसे जोड़ने का कोई प्रयोजन नहीं है। 12-इसलिए परमेश्वर को जानने के लिए तो इंद्रियों की जरूरत नहीं है, वह तो स्वयं ही प्रगट हो जाता है। लेकिन संसार स्वयं प्रगट नहीं होता, संसार को जानने के लिए इंद्रियों की जरूरत है। इसलिए जितनी ज्यादा इंद्रियां हों, उतना ज्यादा संसार प्रगट होता है।जगत में बहुत इंद्रियों वाले प्राणी हैं। मनुष्य के पास पांच इंद्रियां हैं।एक छोटा सा जीवकोष्ठ है ..'अमीबा'- उसके पास एक ही इंद्रिय है, केवल शरीर है।उसे स्पर्श का अनुभव होता है, और कोई इंद्रिय नहीं है। तो जगत को जानने की दृष्टि से अमीबा सबसे कम विकसित प्राणी है लेकिन आत्मा की दृष्टि से नहीं ।जितनी ज्यादा इंद्रिया होती जाती हैं, जगत की जानकारी उतनी बढ़ती चली जाती है।कोई आश्चर्य न होगा कि किसी ग्रह पर पांच इंद्रियों से ज्यादा इंद्रियों वाले प्राणी हों,. तो मनुष्य का ज्ञान उनके सामने बिलकुल फीका हो जाए। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि छठवीं इंद्रिय क्या होगी क्योंकि हमारा ज्ञान पांच का है। जिन पशुओं के पास चार इंद्रिया हैं, वे कल्पना भी नहीं कर सकते कि पांचवी इंद्रिय क्या होगी? 13-पशुओं को छोड़ दें, एक अंधा व्यक्ति सोच भी नहीं सकता कि प्रकाश क्या होगा। वास्तव में ,आपके ज्ञान का अस्सी प्रतिशत आंख से आता है, बाकी चार इंद्रियों से तो केवल बीस प्रतिशत आता है। इसलिए अंधे पर हमें बहुत दया आती है।दया का कारण है कि उसका अस्सी प्रतिशत जीवन अंधेरे में है। अस्सी प्रतिशत ज्ञान की उसे कोई संभावना नहीं है।स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर बनाए हैं इसलिए अधिक मनुष्य प्राय: बाहर की वस्तुओं को देखने में ही जीवन व्यतीत कर देते हैं ..अंतरात्मा को नहीं ।किसी भाग्यशाली बुद्धिमान मनुष्य ने ही अमरत्व को पाने की आकांक्षा से चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों की ओर से हटाकर अंतरात्मा को देखा है। सारे ध्यान के प्रयोग, अलग—अलग विधियों वाले प्रयोग, एक चीज को मौलिक रूप से स्वीकार करते हैं कि आपकी सारी इंद्रियां शांत हो जाएं। किस ढंग से शांत हो, इसमें भेद है, लेकिन शांत हो जाएं, इसमें कोई विवाद नहीं है। सब इंद्रिया शांत हो जाएं और आप भीतर रह जाएं। जगत बाहर रह जाए आप भीतर रह जाएं और बीच में कोई सेतु न रहे, कोई जोड़ न रहे। उस क्षण में अंतरात्मा आविर्भूत होती है, प्रगट हो जाती है।इंद्रियों को थका डालें, इतना थका डालें कि क्षणभर को भी अगर वे विश्राम में पहुंच जाएं, तो उतने क्षणभर को आपका प्रवेश भीतर हो जाए। 14-जो बाल बुद्धि वाले बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं वे सर्वत्र फैले हुए मृत्यु के बंधन में पड़ते हैं। किंतु बुद्धिमान मनुष्य नित्य अमरपद को विवेक द्वारा जानकर इस जगत में अनित्य भोगों में से किसी को भी नहीं चाहते।विवेक का अर्थ इतना ही है कि जो निरर्थक है, वह हमें निरर्थक दिखाई पड़ जाए; जो सार्थक है, वह सार्थक दिखाई पड़ जाए।जगत में हम कुछ भी चाहें, अगर न मिले तो दुख, और मिल जाए तो भी सुख नहीं।मनुष्य जहां है, वहीं दुखी है। सुखी मनुष्य खोजना कठिन है।सुखी मनुष्य वही हो सकता है, जो जहां है वहीं सुखी है। लेकिन जो जहां है वहीं सुखी है, ऐसे मनुष्य का नाम ही संन्यासी है।और जो जहां है वहीं दुखी है, ऐसे मनुष्य का नाम ही गृहस्थ है। वह हमेशा भविष्य में ही जी रहा है। कल उसका सुख है। स्वर्ग कल है, आज कुछ भी नहीं। आज को समर्पित करेगा, लगाएगा ..कल के लिए। आज को जलाएगा कल के लिए, ताकि कल का स्वर्ग मिल जाए। कल कभी आता नहीं। कल जब आएगा, वह आज ही होगा। वह उस आज को फिर कल के लिए लगाएगा। ऐसे वह लगाता जाता है। और एक दिन सिवाय मृत्यु के हाथ में कुछ भी नहीं आता।जो इस सत्य को जानकर कि बाहर कभी किसी को न कोई आनंद मिला है और न मिल सकता है, अपने ही अनुभव से, अपने ही जीवन के प्रयोगों से इस रहस्य को समझकर, जो बाहर के अनित्य भोगों की आकांक्षा छोड़ देता है, वही विवेकशील है। 15- बाहर की वस्तुओं की आकांक्षा छोड़ना और बाहर की वस्तुओं को छोड़ने में लग जाना बिलकुल और बात है।कुछ नासमझ बाहर की वस्तुओं को छोड़ने में लग जाते हैं।बाहर की वस्तु को तो वही छोड़ने में लगता है, जो पहले बाहर की वस्तु को पकड़ने में लगा था।अब वह छोड़ने में लगता है। लेकिन उसकी नजर बाहर की वस्तु पर ही लगी रहती है।बाहर की वस्तु न तो पकड़ने योग्य है और न छोड़ने योग्य। न तुम उसे पकड़ सकते हो, न तुम उसे छोड़ सकते हो। तुम हो कौन ..तुमने पकड़ा, वह तुम्हारी भ्रांति थी। तुम छोड़ रहे हो, यह तुम्हारी भ्रांति है। बाहर की वस्तु को न तुम्हारे पकड़ने से कुछ फर्क पड़ता है, न तुम्हारे छोड़ने से कुछ फर्क पड़ता है।तुम कल कहते थे, यह मकान मेरा है। मकान ने कभी नहीं कहा था कि तुम मेरे मालिक हो।क्योंकि तुमसे पहले कोई और यही कह रहा था। उससे पहले कोई और यही कह रहा था और फिर एक दिन तुम कहते हो कि मैंने त्याग कर दिया है इस मकान का। न मकान तुम्हारा था, न तुम त्याग कर सकते हो। त्याग करना उतना ही पागलपन की बात है, जितना मालकियत की घोषणा थी। त्याग तो मालिक कर सकता है। ज्ञानी इस सत्य को जान लेता है कि मैं मालिक ही नहीं हूं तो किसी चीज का छोडंगूा -पकडूगा कैसे? 16-इस बोध का भीतर गहरा हो जाना कि न इस जगत में कुछ पकड़ा जा सकता है और न छोड़ा जा सकता है..वासना का त्याग है । पकड़ना, छोड़ना, दोनों ही नासमझी हैं। इस जगत में न पकड़ने योग्य कुछ है और न छोड़ने योग्य कुछ है। ऐसी तटस्थता में जो मनुष्य ठहर जाता है, वह विवेकशील है। उसकी वासना गिर जाती है। वह बाहर के जगत में दौड़ना बंद कर देता है। तुम्हारे भीतर छिपा हुआ जो चैतन्य है, वह जो कांशसनेस है, वह जो बोध की शक्ति है, वह जो तुम्हारे जीवन का मूल है, यही है वह परमात्मा ।यहां इस जगत में जो रस, सौंदर्य, सुख, जिसके कारण भोग रहे हैं, जो इस सबके भीतर छिपा है, जिसके बिना यह कोई भी घटना न घट पाएगी,.। आप रस ले रहे हैं, क्योंकि भीतर आप मौजूद हैं। आप भीतर से तिरोहित हो जाएंगे, शरीर कोई रस न ले सकेगा। आपको सुगंध मालूम पड़ रही है, क्योंकि भीतर आप मौजूद हैं। आप मौजूद न होंगे, सुगंध मालूम न पड़ेगी। इस जगत के जो भी अनुभव हो रहे हैं, वे उस चैतन्य के आधार पर हो रहे हैं, जो भीतर छिपा है।तुम्हारे भीतर छिपा हुआ जो चैतन्य / कांशसनेस है, वही तुम्हारे जीवन का मूल है, यही है वह परमात्मा। जब फूल में सुगंध आती है, तो हमारा ध्यान फूल पर जाता है। हमारा ध्यान उस पर नहीं जाता, जिसको सुगंध आ रही है। फूल खिला, सुगंध फैली, आप पास में बैठे हैं या खड़े हैं ..सुगंध आई। यहां तीन हैं। एक तो फूल है, एक आप हैं, और दोनों के बीच में तैरती हुई सुगंध है। 17-एक ज्ञेय है, एक ज्ञाता है, और एक ज्ञान है..Knowledge, Knower & Known । हर जगह त्रिवेणी है। हर जगह ये तीन मौजूद हैं। लेकिन हमारा ध्यान हमेशा ज्ञेय पर जाता है, आब्जेक्ट पर, वह जो जाना गया। हम कहते हैं, कैसा सुंदर फूल है! हम यह नहीं कहते कि कैसी सुंदर आत्मा है कि फूल की गंध ले सकी! ,वह भीतर जो छिपा है, कैसा सुंदर चैतन्य हैं,उसका हमें स्मरण ही नहीं आता। न तो सुगंध उतनी कीमती है,न फूल उतना कीमती है, जितना वह कीमती है जिसके आधार पर ये सब घट रहा है। इस जीवन में जो भी हो रहा है,उस सबके पीछे छिपी हुई चेतना है।सभी स्वप्न स्वप्न के भीतर सत्य होते हैं। स्वप्न के बाहर जब आप जागते हैं, तब असत्य हो जाते हैं। जैसे ही आप जागते हैं और पाते हैं कि अपने कमरे में सोया हुआ ..आप कहते हैं, सब झूठा था।स्वप्न जागृति से भी ज्यादा गहरा अनुभव है। क्योंकि जागृति स्वप्न को पूरी तरह नहीं पोंछ पाती, सुबह कुछ न कुछ याद रह जाता है। लेकिन स्वप्न पूरी तरह आपकी जागृति को पोंछ डालता है..कुछ भी याद नहीं रहता। स्वप्न में जागरण असत्य हो जाता है। जागरण में स्वप्न असत्य हो जाता है। फिर सत्य क्या है? 18-वास्तव में , सत्य दोनों में से कोई भी नहीं है। सत्य तो सिर्फ देखने वाला है, जिसको दोनों ही असत्य नहीं कर पाते। रात भी एक चीज मौजूद रहती है, देखने वाला; सपने देखता है। और दिन भी वह चीज मौजूद रहती है, देखने वाला; जागृति के अनुभव देखता है। सपने बदल जाते हैं, जागरण बदल जाता है, लेकिन देखने वाला अपरिवर्तित रूप से सतत मौजूद रहता है। वह द्रष्टा ही केवल सत्य है। जो देखा जाता है, वह तो सब असत्य हो जाता है। जो देखने वाला है, वही केवल सत्य रह जाता है। स्मरण रखें, असत्य देखने के लिए भी सत्य देखने वाला चाहिए। झूठ स्वप्न को भी देखने के लिए एक सच्चा देखने वाला चाहिए। अगर देखने वाला भीतर न हो, तो असत्य भी नहीं देखा जा सकता।जो उसको पकड़ लेता है जो देखने वाला है, फिर वह शोक नहीं करता।अगर आपको द्रष्टा का अनुभव होने लगे—दर्शन से आंख हटे, दृश्य से आंख हटे और पीछे छिपे द्रष्टा से थोड़ा सा भी तालमेल बैठने लगे—तो आप पाएंगे कि परमात्मा से ज्यादा समीप और कोई भी नहीं। अभी उससे ज्यादा दूर और कोई भी नहीं है। अभी परमात्मा सिर्फ कोरा शब्द है। और जब भी हम सोचते हैं, तो ऐसा लगता है कि आकाश में कहीं बहुत दूर परमात्मा बैठा होगा ..किसी सिंहासन पर। यात्रा लंबी मालूम पड़ती है। और परमात्मा यहां बैठा. है, ठीक सासों के पीछे!तो परमात्मा पास से भी पास है, क्योंकि तुम स्वयं वही हो। लेकिन यह खयाल तभी आएगा जब द्रष्टा पर ध्यान जाने लगे। तो परमात्मा एकदम निकट है। 19-और जिसको परमात्मा इतना निकट मालूम होगा अपने भीतर, ध्यान रहे, उसे सबके भीतर भी मालूम होने लगेगा। यह एक जीवन का अनिवार्य नियम है कि जो आपको अपने भीतर दिखाई पड़ता है, वही आपको दूसरों के भीतर दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है। अगर आप चोर हैं, तो आपको चारों तरफ चोर दिखाई पड़ते हैं, और लगता है, सब साजिश कर रहे हैं। अगर आप बेईमान हैं, तो आपको कोई ईमानदार नहीं दिखाई पड़ता। लगता है कि सब बेईमान हैं ..जल्दी धोखा देंगे।दूसरे के संबंध में, हमारी जो भी धारणा होती है, वह बहुत गहरे में अपनी ही धारणा होती है। इसलिए बुरा व्यक्ति कभी नहीं मान पाता कि कोई अच्छा व्यक्ति हो सकता है। अगर आप उससे कहें कि फलां व्यक्ति अच्छा है, तो अविश्वास से सिर हिलाएगा। वह कहेगा कि ठहरो, थोड़े दिन में समझोगे। ज्यादा देर तक चीजें छिपी नहीं रहतीं ..पता चल ही जाएगा। वह पता लगाने की पूरी कोशिश करेगा कि बुरा होना तो पक्का भरोसा है..अच्छा होना तो आवरण ही हो सकता है। 20-सिर्फ अच्छा व्यक्ति ही भरोसा करता है कि दूसरा अच्छा हो सकता है। अच्छा व्यक्ति मुश्किल पाता है कि कोई बुरा कैसे हो सकता है? और ध्यान रहे, अगर आपको दूसरे के बुरे होने पर तत्काल भरोसा आ जाता हो, तो भूलकर मत समझना कि आप अच्छे व्यक्ति हैं। वह कसौटी है। अच्छे व्यक्ति को तो बड़ा मुश्किल है यह भरोसा लाना कि दूसरा बुरा है ..बुरा हो तो भी। ठीक वैसे ही जैसे बुरे व्यक्ति को भरोसा लाना मुश्किल है कि दूसरा अच्छा है ..अच्छा हो तो भी।हम अपने से बाहर सोच ही नहीं सकते । इसलिए जिस व्यक्ति को द्रष्टा का अनुभव होने लगता है, उसे सबके भीतर भी द्रष्टा का अनुभव होने लगता है। वह आपके शरीर को नहीं देखता, आपके भीतर की झलक उसे मिलने लगती है। उसे सब तरफ परमात्मा मौजूद मालूम होता है, इसलिए निंदा असंभव हो जाती है। निंदा असंभव तभी हो सकती है,जब दूसरे में हमें परमात्मा दिखाई पड़ने लगे। तब तो स्तुति हो सकती है, निंदा होने का कोई कारण नहीं रह जाता। 21-हमें सब तरफ शैतान दिखाई पड़ता है, इसलिए निंदा चलती है। शैतान को शैतान दिखाई पड़ता है, परमात्मा को परमात्मा दिखाई पड़ता है। आप जो हैं, वही आपके जगत का अनुभव है..उसी का फैलाव है। उसी दिन समझना कि आपके भीतर संतत्व का उदय हुआ, जिस दिन आपको शैतान दिखाई पड़ना मुश्किल हो जाए।जैसे ही किसी व्यक्ति को अनुभव होता है कि वह समीपतम है, उसके बाद वह किसी की निंदा नहीं करता .. स्तुति सहज हो जाती है। उसे सबके भीतर उसकी झलक दिखाई पड़ने लगती है ...सब दीयों में उसी की रोशनी।इस शरीर की गुफा में छिपा हुआ कोई अजन्मा है, जिसका कोई जन्म नहीं हुआ है और जो कभी मिटेगा नहीं,उसे जो देखता है, वही देखता है। बस उसके पास ही आंख है, भीतर की दृष्टि से ..बाकी सब अंधे हैं। बाहर कितना ही दिखाई पड़ता हो, जो स्वयं को ही नहीं देख पाते, उनका आंखों का होना- न होना बराबर है।केवल वही ठीक देखता है जो अजन्मा को हृदय की गुफा में पहचान लेता है।जो देवी अदिति प्राणों के सहित उत्पन्न होती है; जो हृदयरूपी गुहा में प्रवेश करके वहीं रहने वाली है उसे जो पुरुष देखता है वही यथार्थ देखता है।प्राण की ऊर्जा / जीवन ऊर्जा का नाम अदिति है। यह जो भीतर जीवन की धारा बह रही है,जो इस धारा को पहचान लेता है ..यही है वह परमात्मा। 22-अग्नि की पूजा बड़ी प्राचीन है।अग्नि की एक खूबी है कि वह सदा ऊपर की तरफ जाती है,उसकी गति सदा ऊपर की तरफ है। अगर आप दीए को उलटा भी कर दें, तो भी ली ऊपर की तरफ जाएगी। और अग्नि की पूजा का मौलिक कारण यही था, कि जैसे अग्नि छिपी होती है पदार्थों में और प्रगट करनी पड़ती है, वैसे ही परमात्मा भी छिपा है और प्रगट करना पड़ता है। पानी नीचे की तरफ बहता है, आग ऊपर की तरफ बहती है। आग का सहारा अगर पानी भी ले ले तो पानी तक ऊपर की तरफ बहने लगता है। गरम हो जाए, उबल जाए, भाप बन जाए यात्रा बदल जाती है। पानी का गुणधर्म बदल जाता है। वह जो नीचे की तरफ बहता था, वह भी आकाश की तरफ उठने लगता है। पुराने दिनों में मनुष्य को अनुभव हुआ कि आग के अतिरिक्त किसी चीज में ऊपर की तरफ जाने की क्षमता नहीं है। आग ग्रेविटेशन के विपरीत है। जमीन खींचती है, आग को नहीं खींच पाती। आग ऊपर की तरफ जाती है, जमीन उस पर कुछ भी नहीं कर पाती। 23-जो चेतना ऊपर की तरफ जाने लगती है, वह आग उसका प्रतीक बन गई। और परमात्मा निरंतर ऊपर की तरफ जाती हुई चेतना का नाम है। यह आग सबके भीतर छिपी है। थोड़ी सी रगड़ की जरूरत है। उस रगड़ का नाम साधना है।थोड़ा भीतर छिपी हुई अरणियों को टकराना पड़ेगा।पुराने जमाने में जब आग को पैदा करने के और कोई उपाय न थे, तो दो लकड़ियों को रगड़कर आग पैदा की जाती थी। वह जिस लकड़ी को रगड़कर आग पैदा करते थे, उसका नाम अरणि था। रगड़ने से जो छिपी आग थी, वह प्रगट हो जाती। रगड़ से कोई चीज पैदा नहीं होती, केवल प्रगट हो सकती है। जो छिपी हो, वह प्रगट हो सकती है। ध्यान के प्रयोग वस्तुत: अरणियों का टकराना हैं।आपके भीतर की ऊर्जा को थोड़ा संघर्षण से गुजरना पड़ेगा।उस आग को जगाने के लिए थोड़ा सा श्रम जरूरी है।परमेश्वर सबका मूल उदगम और सबका अंतिम अंत है। उसके पार जाने का कोई उपाय नहीं। परमात्मा का कोई अतिक्रमण नहीं हो सकता, क्योंकि सभी चीजों का अतिक्रमण करके जो उपलब्ध होता है, वह परमात्मा है।वह अस्तित्व की आखिरी सीमा है । 24-अगर कोई कहता हो कि परमात्मा यहां नहीं वहां है, तो वह भ्रांति में है। क्योंकि वह सब जगह है। परलोक में परमात्मा है, ऐसा नहीं है, इस लोक में भी वही है। देखने वाली आंख चाहिए। और जिसके पास देखने वाली आंख है, उसे यहां ही दिखाई पड़ जाएगा। और ध्यान रहे, जिसे यहां दिखाई नहीं पड़ता, उसे वहां भी दिखाई नहीं पड़ेगा। वह आंख पैदा हो जाए, तो सब जगह वह प्रगट हो जाता है। वह आंख पास में न हो, तो वह कहीं भी प्रगट नहीं होता।लेकिन लोग अपने को धोखा देते रहते हैं। वे कहते हैं, वह यहां प्रगट नहीं हो रहा है क्योंकि यहां नहीं है, वहां परलोक में है। इस तरह अंधे अपना बचाव कर लेते हैं। उनको फिर यह खयाल नहीं होता कि हम अंधे हैं इसलिए दिखाई नहीं पड़ रहा।अंधों ने बैकुंठ, स्वर्ग, परलोक, न मालूम क्या -क्या निर्माण किए हैं। वह उनकी इस बात की कोशिश है कि हममें कोई गलती नहीं है कि वह हमें दिखाई नहीं पड़ रहा है; वह यहां है ही नहीं, वह परलोक में है। जब हम परलोक पहुंचेंगे, तब वह दिखाई पड़ेगा। इससे अंधों को बड़ी सुविधा हो जाती है, सांत्वना मिलती है। 25-इसीलिए जैसे- जैसे मनुष्य बूढ़ा होने लगता है और परलोक करीब आने लगता है, वैसे -वैसे धार्मिक होने लगता है। मंदिरों में, मस्जिदों में, गुरुद्वारों में बूढ़े इकट्ठे हैं, जवान वहां दिखाई नहीं पड़ते। और कभी कोई जवान भी दिख जाए, तो समझना कि कोई न कोई गड़बड़ हो गई है।बूढ़े भी अपने बेटों को समझाते हैं कि धर्म अभी तुम्हारे काम का नहीं। इसकी एक उम्र होती है। जब बूढ़े हो जाओ, तब।असल में मरने की घटना जब बिलकुल करीब आने लगे, जब ऐसा शक होने लगे कि अब परलोक जाना ही पड़ेगा, तो मनुष्य धार्मिक होना शुरू होता है।क्योंकि इस लोक में तो परमात्मा है नहीं।लेकिन यह व्यवस्था धोखे की है। जो यहां धार्मिक नहीं है, वह सिर्फ मौत के कारण धार्मिक नहीं हो जाएगा।लेकिन मुक्तपुरुष को यहां इस संसार में भी मोक्ष ही दिखाई पड़ता है। कुछ और दिखाई पड़ने का उपाय नहीं है क्योंकि जो परब्रह्म यहां है. वही वहां परलोक में भी है। जो वहां है वही यहां इस लोक में भी है।इस जगत में जितना भी अस्तित्व है, जितने रूप हैं, वे एक के ही प्रतिबिंब हैं। आपके भीतर, एक सरोवर की भांति आपकी चेतना में, उस एक की ही छाया बनी है।हम इस जगत को अनेक की भांति देखते हैं। वृक्ष, पत्थर अलग, आप अलग,मैं अलग, पड़ोसी अलग; सब अलग .. सब टूटे हुए, खंड -खंड ।आकाश में, एक ही चांद होता है लेकिन सब पानी में ,झीलें सरोवरआदि में हजारों -लाखों प्रतिबिंब बनते हैं ।जो इस जगत में उस परमात्मा को अनेक की भांति देखता है;वह भटकता है जन्म-मरण में।वह मनुष्य बारंबार जन्म-मरण को प्राप्त होता है । जो यहां भी उसे एक की भांति देख लेता है , वह तत्‍क्षण मुक्त हो जाता है। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;';;;;;;;;;;;;; ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;';;;;;;;;;;;;; ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;';;;;;;;;;;;;; आत्म जागरण योग की पहली साधना;- 04 STEPS;- 1-किसी शान्त या एकान्त स्थान में जाइए। निर्जन, कोलाहल रहित स्थान इस साधना के लिए चुनना चाहिए। इस प्रकार के स्थान पर घर का स्वच्छ, हवादार कमरा भी हो सकता है और नदी तट अथवा उपवन भी। हाथ मुँह धोकर साधना के लिए बैठना चाहिए। आराम कुर्सी पर अथवा दीवार वृक्ष या मसनद के सहारे बैठ कर यह साधना भली प्रकार होती है। सुविधापूर्वक बैठ जाइए। 2-तीन लम्बे-लम्बे साँस लीजिए पेट में भरी हुई वायु को पूर्ण रूप से बाहर निकालना और फिर फेफड़ों में पूरी हवा भरना एक पूरा साँस कहलाता है। तीन पूरे साँस लेने से हृदय की भी उसी प्रकार एक धार्मिक शुद्धि होती है जैसे स्नान करने, हाथ पाँव धोकर बैठने से शरीर की शुद्धि होती है। तीन पूरे साँस लेने के बाद शरीर को शिथिल कीजिए। शरीर के हर अंग में से खिंचकर प्राण शक्ति हृदय में एकत्रित हो रही है ऐसा ध्यान कीजिए। 3-हाथ पाँव आदि सभी अंग प्रत्यंग शिथिल ढीले निर्जीव, निष्प्राण हो गये हैं ...ऐसी भावना करनी चाहिए। मस्तिष्क से सब विचारधाराएं और कल्पनाएं शान्त हो गई हैं, और समस्त शरीर के अन्दर एक शान्त नीलवर्ण आकाश व्याप्त हो रहा है। इस शान्त शिथिल व्यवस्था को प्राप्त करने के लिए कुछ दिन लगातार प्रयत्न करना पड़ता है। अभ्यास से दिन-दिन अधिक शिथिलता एवं शान्ति अनुभव होती जाती है। 4-शरीर के भली प्रकार शिथिल हो जाने पर हृदय स्थान में एकत्रित अंगूठे के बराबर शुभ श्वेत ज्योति स्वरूप प्राण शक्ति का ध्यान करना चाहिए। ''अजर, अमर, शुद्ध, बुद्धि चेतन, पवित्र ईश्वरीय अंश आत्मा मैं हूँ। मेरा वास्तविक स्वरूप वही है। मैं सत् चित आनन्द स्वरूप आत्मा हूँ''। उस ज्योति के कल्पना नेत्रों से दर्शन करते हुए उपरोक्त भावनाएं मन में रखनी चाहिए।उपरोक्त शिथिलासन के साथ आत्म दर्शन करने की साधना इस योग में प्रथम साधना है। आत्म जागरण योग की दूसरी साधना; - जब पहली साधना भली प्रकार अभ्यास में आ जाय तो आगे सीढ़ी पर पैर रखना चाहिए। ऊपर लिखी हुई शिथिलावस्था में अखिल आकाश में नील वर्ण आकाश का ध्यान कीजिए। उस आकाश में बहुत ऊपर सूर्य के समान ज्योति स्वरूप आत्मा को अवस्थित देखिए। “मैं ही यह प्रकाशवान आत्मा हूँ,” ऐसा निश्चित संकल्प कीजिए। अपने शरीर को नीचे भूतल पर निस्पंद अवस्था में पड़ा हुआ देखिए ;उसके अंग प्रत्यंगों का निरीक्षण एवं परीक्षण कीजिए। ''वह हर एक कल पुर्जा मेरा औजार है। मेरा वस्त्र है ,यह यंत्र मेरी इच्छानुसार क्रिया करने के लिए प्राप्त हुआ है''- इस बात को बार-बार मन में दुहराइए। इस निस्पंद में मन और बुद्धि को दो सेवक शक्तियों के रूप में देखिए। वे दोनों हाथ बाँधे आपकी इच्छानुसार कार्य करने के लिए नतमस्तक खड़े हैं।मैं इस शरीर और मन बुद्धि का उपयोग सच्चे आत्मस्वार्थ के लिए ही करूंगा- यह भावनाएं बराबर उस ध्यानावस्था में आपके मन में गूँजती रहनी चाहिए। आत्म जागरण योग की तीसरी साधना;- जब दूसरी भूमिका का ध्यान भली प्रकार होने लगे तो तीसरी भूमिका का ध्यान कीजिए। अपने को सूर्य की स्थिति में ऊपर आकाश में अवस्थित देखिए। ''मैं समस्त भूमंडल पर अपनी प्रकाश किरणें फेंक रहा हूँ। संसार मेरा कर्म क्षेत्र और लीला भूमि है, भूतल की वस्तुओं और शक्तियों को इच्छित प्रयोजन के लिए काम में लाता हूँ पर ये मेरे ऊपर प्रभाव नहीं डाल सकतीं।पंच भूतों की गतिविधि के कारण जो हलचलें संसार में हर घड़ी होती हैं वे मेरे लिए एक विनोद और मनोरंजक आत्म जागरण योग दृश्य मात्र हैं। मैं किसी की साँसारिक हानि लाभ से प्रभावित नहीं होता। मैं शुद्ध चैतन्य सत्यस्वरूप पवित्र निर्लिप्त अविनाशी आत्मा हूँ। मैं महान आत्मा हूँ। महान परमात्मा का विशुद्ध स्फुल्लिंग हूँ। ''तीसरी भूमिका का ध्यान जब अभ्यास में कारण पूर्ण रूप से पुष्ट हो जाय और हर घड़ी वही भावना रोम रोम में प्रतिभाषित होने लगे तो समझना चाहिए कि इस साधना की सिद्धावस्था प्राप्त हो गई यही जागृत समाधि या जीवन मुक्त अवस्था है। MEDITATION based ON IDEA;-

10 POINTS;- This is meditation based on Nirguna Brahman ,on OM / AN ABSTRACT IDEA

1-Sit in Padmasana. Repeat OM mentally. Keep the meaning of OM always in the mind. Feel that you are the All-pervading, Infinite Light. Feel that you are the "Suddha-Sat-Chit-Ananda, Vyapaka Atman, Nitya Suddha Buddha Mukta, eternally free Brahman." 2-Feel you are Chaitanya. Feel that you are the "Akhanda Paripurna, Ekarasa, Santa, Infinite, Eternal, Unchanging Existence."---- Every atom, every molecule, every nerve, vein, artery should powerfully vibrate with these ideas. 3- Lip repetition of OM will not produce much benefit. It should be through heart, head and soul. Your whole soul should feel that you are the subtle, all-pervading Intelligence. Negate the body-idea when you repeat OM mentally.This feeling should be kept up continuously. 4-Meditate on the above ideas constantly. Constant effort with zeal and enthusiasm is indispensable. Repeat mentally the above ideas incessantly. You will realise. You will have Atma-Darshan within two or three years. 5-Will and Manana(to ponder) are two important factors which play a conspicuous part in Nirguna meditation or Vedantic Sadhana. Manana is preceded by Sravana or hearing of Srutis and followed by Nididhyasana of a constant nature with zeal and enthusiasm. Nididhyasana is profound meditation. Sakshatkara or Aparoksha realisation follows Nididhyasana. 6-Just as the drop of water when dropped on a hot iron is absorbed by the hot iron, so also the mind and the Abhasa Chaitanya (reflected consciousness) become absorbed in Brahman. The balance left is Chinmatra or Chaitanya Matra (Consiciousness-Absolute). Sravana, Manana and Nididhyasana of the Vedantic Sadhana correspond to Dharana, Dhyana and Samadhi of Raja Yoga of Patanjali Maharshi. 7-By worship and meditation or Japa of Mantras, the mind is actually shaped into the form of the object of worship and is made pure for the time being through the purity of the object (namely, Ishta Devata). By continual practice (Abhyasa), the mind becomes full of the object to the exclusion( the act of not allowing someone)of all else, steady in its purity and does not wander into impurity. So long as the mind exists it must have an object and the object of Sadhana is to present it with a pure one.

8-The sound repeatedly and harmoniously uttered in Japa of Mantra must create or project into perception the corresponding thing, Devata. The Mantras gather creative momentum by repetition through the force of Samskaras. 9-In Samadhi, the mind loses its own consciousness and becomes identified with the object of meditation . The meditator and meditated, the worshipper and worshipped, the thinker and the thought become one. The subject and the object, Aham and Idam (I and this), Drik and Drisya (seer and seen), the experiencer and the experienced become one. Prakasa and Vimarsa get blended into one. Unity, identity, homogeneity (all of the same kind), oneness, sameness refer to Nirvikalpa Samadhi. 10-There is a living universal Power or Intelligence that underlies at the back of all these names and forms. Meditate on this Power or Intelligence which is formless. This will form an elementary Nirguna meditation without any form. This will lead to the realisation of the Absolute, Nirguna, Nirakara consciousness eventually. IN NIRGUN MEDITATION ;-

03 POINTS;- 1- The aspirant takes himself as Brahman. He denies and sublates the false adjuncts or fictitious environments as egoism, mind and body. He depends upon himself and upon himself alone. 2-The aspirant asserts boldly. He reflects, reasons out, investigates, discriminates and meditates on the Self. He does not want to taste sugar but wants to become a solid mass of sugar itself. He wants merging. He likes to be identical with Brahman. This method is one of expansion of lower self. 3-Suppose there is a circle. You have a position in the centre. You so expand by Sadhana to a very great extent that you occupy the whole circle, and envelop the circumference. This method of meditation is suitable for persons of fine intellect, bold understanding, strong and accurate reasoning and powerful will. Only a microscopic minority of persons is fit for this line of meditation. THE KEY POINT;--- 1-It is comparatively easy to meditate on 'Aham Brahma Asmi' when you are seated in a steady posture in a solitary closed room. But it is very, very difficult to keep up this idea amidst crowded surroundings, while the body moves. If you meditate for one hour and feel that you are Brahman, and if you feel for the remaining twenty-three hours that you are the body, the Sadhana cannot produce the desired result; Until at all times, you try to keep up the idea that you are Brahman. This is very difficult but very important.

2-A worldly mind needs thorough overhauling and a complete psychological transformation. Concentration and meditation bring about the construction of a new mind, with a new mode of thinking. Contemplative life is diametrically opposite to worldly life. It is an entire change altogether. Old negative deeds ( Vishaya- Samskaras )have to be thoroughly annihilated through constant and intense practices carried on with zeal for a long time and thereby new spiritual Samskaras have to be created.. TYPES OF NIRGUN MEDITATION :- 05 FACTS;- 1-AIR;-

Sit in Padmasana. Concentrate on the air. This will lead to the realisation of the nameless and formless Brahman, the one living Truth. 2-AKHANDA JYOTI;--

Imagine that there is a Parama, Ananta, Akhanda Jyotis (Supreme, Infinite effulgence) hidden behind all the phenomena with an effulgence that is tantamount to the blaze of crores of suns. Meditate on that. This is also another form of Nirguna meditation. 3-SKY;-

Concentrate and meditate on the expansive sky. This is also another kind of Nirguna, Nirakara meditation. By the previous methods in concentration the mind will stop thinking of finite forms. It will slowly begin to melt in the ocean of Peace, as it is deprived of its contents, viz., forms of various sorts. It will become subtler and subtler also. 4-AUM TECHNIQUE;-

03 POINTS;- 1-The sacred Aum vibration can be heard in meditation through the supersensory medium of intuition. First, the devotee realizes Aum as the manifested cosmic energy in all matter. The earthly sounds of all atomic motion, including the sounds of the body—the heart, lungs, circulation, cellular activity—come from the cosmic sound of the creative vibratory activity of Aum. 2-The sounds of the nine octaves (A series of eight note) perceptible to the human ear, as well as all cosmic low or high vibrations that cannot be registered by the human ear, have their origin in Aum. So also, all forms of light—fire, sunlight, electricity, astral light—are expressions of the primal cosmic energy of Aum. When the devotee's consciousness is able not only to hear the cosmic sound of Aum, but also to feel its actual presence in every unit of space, in all finite vibrating matter, then the soul of the devotee becomes one with BRAHMAN.His consciousness vibrates simultaneously in his body, in the sphere of the earth, the planets, the universes, and in every particle of matter, space, and astral manifestation. 3- In these highest states of meditation, the body itself becomes spiritualised, loosening its atomic tenacity to reveal its underlying astral structure as life force. The aura often depicted around saints is not imaginative, but the inner divine light suffusing the whole being.This Holy Vibration working in the subtle spinal centers of the astral body, sending forth life force and consciousness into the physical body, manifests as wonderful astral sounds—each one characteristic of its particular center of activity. Nirguna meditation is abstract meditation on Nirguna Brahman. Repeat OM mentally with Bhava (feeling). Associate the ideas of Sat-Chit-Ananda-Purity, Perfection, "All Joy I am: All Bliss I am: I am Svarupa: Asangoham-I am unattached: Kevaloham-I am alone: Akhanda-Eka-Rasa- Chinmatroham. 5-Chakras sounds;--

02 POINTS;-

1-These astral sounds are likened to melodic strains of the humming of a bee, the tone of a flute, a stringed instrument such as a harp, a bell-like or gong sound, the soothing roar of a distant sea, and a cosmic symphony of all vibratory sound.Their effects will be automatically realized by the advanced devotee .The Self-Realization technique of meditation on Aum teaches one to hear and locate these astral sounds. This aids the awakening of the divine consciousness locked in the spinal centers, opening them to "make straight" the way of ascension to God-realization. 2-As the devotee concentrates on Aum, first by mentally chanting Aum, and then by actually hearing that sound, his mind is diverted from the physical sounds of matter outside his body to the circulatory and other sounds of the vibrating flesh. Then his consciousness is diverted from the vibrations of the physical body to the musical vibrations of the spinal centers of the astral body. His consciousness then expands from the vibrations of the astral body to the vibrations of consciousness in the causal body and in the omnipresence of the supersoul. ...SHIVOHAM...

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