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क्या है 'मर्म विद्या?PART-01

'मर्म विद्या';-

04 FACTS;-

भूतकाल वर्तमान व भविष्य का समस्त ज्ञान -विज्ञान एवं विद्याएँ वेद में समाहित हैं।परन्तु विभिन्न सामाजिक, राजनैतिक कारणों से वैदिक ज्ञान का प्रचार- प्रसार बाधित होने से वैदिक ज्ञान की अनेक विद्याएँ लुप्त प्राय हो गई। पर यह सत्य है कि वेद में निहित ज्ञान समग्र रुप से कभी भी विनष्ट नहीं हो सकता। वैदिक काल में प्रचलित शल्य कर्माभ्यास के अतिरिक्त क्षार सूत्र, अग्निकर्म, जलौकावचरण, कर्ण वेधन, मर्म विद्या जैसी अनेक शल्य चिकित्सा विषयक विधाओं को महर्षि सुश्रुत द्वारा प्रतिपादित किया गया है।महर्षि सुश्रुत प्रथम व्यक्ति है, जिन्होंने शल्य तंत्र के वैचारिक आधारभूत सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया, जिसके आधार पर प्राचीन भारतवर्ष में शल्य कर्म किये जाते रहे है।अत्यन्त गूढ़, गोपनीय, आत्मरक्षार्थ, आत्मकल्याणार्थ, आत्म साक्षात्कारार्थ, रोग निवारणार्थ एवं सद्य: फलदायी शल्यापहृत सूत्रों पर आधारित 'मर्म विज्ञान' एवं 'मर्म चिकित्सा' का प्रयोग कर सम्पूर्ण विश्व को रोग रहित किया जा सकता है। 2-मनुष्य शरीर को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष का आधार माना गया है। इस मनुष्य शरीर से समस्त लौकिक एवं पारलौकिक सिद्दियों को पाया जा सकता है। वहीं 'शरीर व्याधि मंदिर' भी कहा गया है।यदि इस शरीर को स्वस्थ रखने एवं इसको माध्यम बनाकर अनेक सिद्दियों को प्राप्त करने का कोई उपाय है तो 'मर्म विद्या' का नाम लिया जा सकता है।'मर्म' शब्द का अर्थ है - जीव स्थान, संधि स्थान व तात्पर्य (आशय)।आचार्य सुश्रुत के अनुसार, शरीर के वे बिन्दु जहाँ पर मांस, सिरा, स्नायु, अस्थि व संधि का संगम होता है, वे मर्म स्थान कहलाते हैं। मर्म प्राण ऊर्जा के घनीभूत केन्द्र हैं। यहाँ पर स्वभावत: प्राणों की स्थिति होती है। अत: इन पर घात होने पर नाना प्रकार के विकार उत्पन्न होते हैं। जिन स्थानों के पीड़ित होने से विभिन्न प्रकार की वेदनाएँ एवं कम्पन्न उत्पन्न होता है, आघात होने से मृत्यु सम्भव है,वह स्थान मर्म स्थान कहलाते हैं।मर्माघात होने पर संज्ञानाश, सुप्तत, भारीपन, मूर्च्छा, स्वेद, वमन, श्वास, विक्षिप्तता, शिथिलता, शीतलता की इच्छा, हृदय प्रदेश में दाह,अस्थिरता, बैचेनी आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं।

3-इस स्रष्टि के निर्माण काल से ही पंचभूतात्मक सत्ता का अस्तित्व रहा है| पृथ्वी, जल तेज, वायु और आकाश के सम्मिश्रण से त्रिदोषात्मक मनुष्य-शरीर की उत्पत्ति हुई हैमहर्षि सुश्रुत के अनुसार मनुष्य शरीर के में 108 मर्मस्थान, 700 सिरायें, 300 अस्थियाँ, 400 स्नायु 500 मांसपेशियां और 210 संधियाँ होती है| मनुष्य की समस्त शरीर क्रियाओं का नियमन त्रिदोष(वाट, पित्त और कफ) के द्वारा किया जाता है वातवह, पित्तवह, कफवह और रक्तवह सभी सिराओं का उदगम स्थल नाभि है, जो की महत्वपूर्ण मर्म स्थान है| नाभि से यह सिरायें ऊधर्व, अध% एवं तिर्यक दिशाओं की ओर फैलती है| नाभि में प्राण का विशेष स्थान है| गर्भावस्था में गर्भस्थ शिशु का पोषण माता के गर्भनाल से होता है| गर्भनाल गर्भस्थ शिशु की नाभि से संलग्न होती है| जीवन के प्रारंभिक काल में नाभि का महत्वपूर्ण कार्य होता है, परन्तु बाद के जीवन में भी नाभि को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है| सात सौ सिराओं में दस सिरायें महत्वपूर्ण होती है| वात / एयर एलिमेंट सिराओं की , पित्त /फायर एलिमेंट सिराओं की और कफ /वॉटर एलिमेंट सिराओं की ...सभी की संख्या 175 /175/175 होती है| 4-मर्मों का वर्गीकरण;- मर्मों की कुल संख्या 107 है। जिन्हें निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है - 1. षडंग शरीर के आधार पर 2. रचना / धातु भेद से 3. प्रभाव / परिणाम के आधार पर

1-शरीर के आधार पर मर्म;-

1-2 हाथ - 11X2 = 22

2-2 पैर - 11X2 = 22

3-पीठ - 14

4-छाती - 9

5-उदर - 3

6-गर्दन - 14

7-सिर - 23...चार कर्ण में, नौ जिव्हा में, छह नासा में और आठ नेत्र में होती है|

Total=107 2. रचना / धातु भेद से

1-मांस मर्म - 11

2-सिरा मर्म - 41

3-स्नायु मर्म - 27

4-अस्थि मर्म - 8

5-सन्धि मर्म - 20

3. प्रभाव / परिणाम के आधार पर

1-सद्य: प्राणाहर/फायर एलिमेंट- - 19

2-कालान्तर प्राणाहर/वॉटर- फायर एलिमेंट - 33

3-विशल्यघ्न /एयर एलिमेंट - 3

4-वैकल्यकर /वॉटर एलिमेंट - 44

6-रुजाकर/ एयर -फायर एलिमेंट - 8



NOTE;- सद्य: प्राणाहर मर्म 'आग्नेय' होते हैं। इन पर आघात होने से अग्नि गुणों के शरीर में आयु क्षीण होने से शीघ्र मृत्यु होती है। कालान्तर प्राणहर मर्म 'सौम्याग्नेय' होते हैं। इन पर आघात होने से अग्नि गुण शीघ्र क्षीण हो जाते हैं, परन्तु सौम्य गुण धीरे-धीरे क्षीण होता है। अत: मृत्यु कुछ काल पश्चात होती है।विशल्यघ्न मर्म 'वायव्य' होते हैं। इन मर्मों में शल्य के विध्द होने से अन्तर्वायु अवरुध्द हो जाती है। मर्म स्थान स्थित शल्य को निकाल देने से अन्तर्वायु के सहसा निकल जाने से मृत्यु सम्भव है, परन्तु शल्ययुक्त मनुष्य जीवित रहता है।वैकल्यकर मर्म 'सौम्य' गुण युक्त होते हैं। सोम स्थिर एवं शीतल है, अतः प्राणों का अवलम्बन करता है।रुजाकर मर्म 'वायव्य' व आग्नि गुण युक्त होते हैं। अत: इन पर आघात होने से वेदना अधिक होती है। षडंंग शरीर के आधार पर मर्मों के नाम ;-- ऊर्ध्वशाखागत मर्म -हाथ के मर्म (22)..

///////////////////////////////////// तलहृदय - 2 क्षिप्र - 2 कूर्च - 2 कूर्च शिर - 2 मणिबन्ध - 2 इन्द्रवस्ति - 2 कूर्पर - 2 आणि - 2 ऊर्वी - 2 लोहिताक्ष - 2 कक्षाधर - 2 अधोशाखागत मर्म- पैर के मर्म.. (22)

//////////////////////////////////// तलहृदय - 2 क्षिप्र - 2 कूर्च - 2 कूर्च शिर - 2 गुल्फ - 2 इन्द्रवस्ति - 2 जानु - 2 आणि - 2 ऊर्वी - 2 लोहिताक्ष - 2 विटप - 2 अन्तराधिगत मर्म (26)

/////////////////////////////////////// पृष्ठ के मर्म (14) कुकुन्दर - 2 कटिकतरुण - 2 नितम्ब - 2 पार्श्वसन्धि - 2 वृहति - 2 अंसफलक - 2 अंस - 2 छाती के मर्म (9) हृदय - 1 स्तनमूल - 2 स्तनरोहित - 2 अपलाप - 2 अपस्तम्भ - 2 उदर के मर्म (3) नाभि - 1 गुद - 1 वस्ति - 1 ऊर्ध्वजत्रुगत मर्म (37)

/////////////////////////////////// गर्दन के मर्म (14) नीला - 2 मन्या - 2 मातृकाएँ - 8 कृकाटिका - 2 सिर के मर्म (23) विधुर - 2 अपांग - 2 आवर्त - 2 उत्क्षेप - 2 शंख - 2 फणा - 2 स्थपनी - 1 श्रृंगाटक - 4 सीमन्त - 5 अधिपति - 1 मर्मों का परिमाप;- 1-उर्वी, कूर्चशिर, विटप, कक्षाधर, पार्श्वसंधि, स्तनमूल ... 1 - 1 अंगुल

2-मणिबन्ध, गुल्फ .... 2 - 2 अंगुल

3-कूर्पर, जानु .....3 - 3 अंगुल

4-हृदय,वस्ति, नाभि, गुद, श्रृंगाटक, सीमन्त, नीला, मन्या, मातृकाएँ, कूर्च, ...1 मुष्टि

5-शेष सभी - अर्द्धांगुल ( ½ अंगुल ) मर्म चिकित्सा के सामान्य नियम एवं सावधानियां;-

10 POINTS;- 1. सामान्यतया लेटी अवस्था में (शवासन की स्थिति में) मर्म चिकित्सा करना है। 2. रोगी की वय, बल, वेदना सहन करने की शक्ति, मन: स्थिति व मर्म के प्रकार को ध्यान में रखकर मर्म चिकित्सा की जानी चाहिये। 3. प्रारम्भ में मर्म बिन्दुओं पर हल्का दबाव देना हैं, बाद में शारीरिक क्षमता के अनुरुप दबाव बढ़ाया जा सकता हैं। 4. मर्म चिकित्सा के दौरान कसे हुये कपड़े, टाई, बेल्ट, जुराब, नी कैप, आदि हटा देना चाहिये। 5. चिकित्सा के दौरान रोगी को लम्बा श्वास प्रश्वास लेने को कहते हैं। 6. चिकित्सा के दौरान होने वाली वेदना को आश्वासन व मन को हटाकर दूर किया जा सकता है। 7. अत्यधिक रोगावस्था में मर्म चिकित्सा को प्रभावित भाग से सुदूरवर्ती मर्म स्थानों से प्रारम्भ करना चाहिये। बाद में प्रभावित भाग की चिकित्सा की जानी चाहिये। सूजन की अवस्था में उसके समीपवर्ती मर्म स्थानों को उपचारित करने से लाभ मिलता है। 8. स्त्रियों में मासिक धर्म व गर्भावस्था के दौरान चिकित्सा नहीं दी जानी है। वह स्त्री स्वयं 'स्व मर्म चिकित्सा' कर सकती है। 9. स्त्रियों में मर्म चिकित्सा बाईं ओर से व पुरुषों में दाईं ओर से करनी चाहिये। 10. मर्म चिकित्सा की समाप्ति पर मर्म बिन्दुओं को चिह्नित कर देना चाहिये, ताकि रोगी बाद में उन बिन्दुओं को स्वत: उपचारित करता रहे। मर्म चिकित्सा की विधि;-

03 FACTS;-

1-प्रत्येक मनुष्य के शरीर में 108 मर्म स्थान पाए जाते हैं। 37 बिंदु गले के ऊपर के हिस्से में होते हैं, जो कि अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इन बिंदुओं का इलाज किसी योग्य चिकित्सक द्वारा किया जाता है। अलग-अलग हिस्से के अपने-अपने मर्म स्थान हैं। शरीर के जिस हिस्से में रोग है, उसके अनुसार उस मर्म स्थान को 0.8 सेकंड के हिसाब से बार-बार दबाया जाता है। यह चिकित्सा पद्धति शरीर की हीलिंग पावर या खुद को ठीक करने की पद्धति को जगाती है।किसी भी अंग में होने वाली परेशानी के लिए उससे संबंधित मर्म स्थान को 0.8 सैकेंड की दर से बार-बार दबाकर स्टिमुलेट करने से फौरन राहत मिलती है।

गर्दन, पीठ, कमर व पैर दर्द में तो मर्म चिकित्सा के जरिए चुटकी में खत्म हो सकता है। यह शरीर और दिमाग की रोगों को ठीक करने के लिए ऊर्जा चैनलों को प्रेरित करती है, जो कि शरीर के अंदर ही होते हैं ।चीनी एक्यूप्रेशर इसी से प्रभावित है।

2-मर्म बिंदु वे स्थान हैं, जो नसों, लिगामेंट्स, हड्डियों, जोड़ों और मांसपेशियों से मिलते हैं। आज ऐसे ऐसे रोग जिनका इलाज एलोपैथी नहीं कर पाती, मर्म पद्धति से उनका इलाज बिना दवाई के हो जाता है। भागदौड़ भरी जिंदगी के चलते कमर दर्द, घुटना दर्द के रोगियों व सरवाईकल स्पोंडलाईटिस रोगों में एक्यू मर्म चिकित्सा पद्घति अब वरदान साबित होने लगी है। इसके द्वारा होने वाले इलाज में रोगी को साईड इफेक्ट का भी खतरा नहीं रहता। सरल, आसान और बिना ऑपरेशन के यह चिकित्सा सुविधाजनक की जा रही है।इस बीमारी से आमजन को राहत दिलाने के लिए दबी हुई नसों को हटाना ही एकमात्र इलाज माना जाता है।

3-इस तकनीक में माइक्रो चुंबकीय उपकरणों द्वारा मुख्य मर्म बिंदुओं पर दबाव द्वारा रोगी को लाभ पहुंचाया जाता है। इस पद्धति में माइक्रो उपकरणों द्वारा विभिन्न तरंगे डिस्क के पास वाले मर्मों पर डाली जाती हैं। जिससे वह एक्टिव और ऑक्सीजनयुक्त बन जाता है जिस कारण ऊर्जा कणों में हलचल उत्पन्न होने लगती है। यह हलचल डिस्क में न्यूक्लियस के प्रोटोग्लीकेस बोड्स को शीघ्र जोड़ देती है। इस उपचार के बाद नसों का दबाव हट जाता है इस मर्म उपचार को माइक्रो एक्यूप्रेशर या माइक्रो एक्यू-मर्म चिकित्सा कहा जाता है। उपचार के बाद एमआरआई कराने पर डिस्क पर आया दबाव कम हो जाता है और दुबारा नहीं होता। ज्यादातर यह बीमारी आधुनिक जीवन शैली और खान-पान के कारण पनप रही हैं। इन बीमारियों का इनका इलाज नसों के पास पाए जाने वाले मुख्य मर्मों कूकुंदर,जानु,इंद्रबस्ती,क्षिप्र,तल,तलहृदय ,कटिकतरुण आदि मर्मों पर पुन: दबाव डालकर किया जाता है। इसका मुख्य कारण व्यायाम का अभाव, अनियमित दिनचर्या, विरुद्घ आहार और मानसिक तनाव मुख्य कारण है। रोग से बचाव के लिए प्रतिदिन 25 मिनट मॉर्निंग वॉक, पैरों के तलवों के मुख्य मर्मों की मालिश और 6 घंटे की निद्रा लेना अनिवार्य है।समस्त चिकित्सा पद्धतियां मनुष्य द्वारा विकसित की गई हैं परन्तु मर्म चिकित्सा प्रकृति/ईश्वर प्रदत्त चिकित्सा पद्धति है।हांलाकि इन मर्म बिंदुओं को दबाने की अलग तकनीक और विधि है। हर एक बिंदु में अलग-अलग अंगुलियों का इस्तेमाल किया जाता है।

NOTE;--

1-सामान्यत: मर्मों को अंगूठे एवं तर्जनी / मध्यमा / अनामिका द्वारा दबाव देना चाहिये।मर्मों को हृदय गति के अनुसार Stimulateकिया जाता है। .8 सेकंड की गति से इन बिंदुओं पर दबाव डाला जाता है, और ऐसा करीब 15-18 बार किया जाता है। जिसका असर लगभग 5 से 6 घंटे तक रहता है। उसके बाद दोबारा यही तकनीक अपनाई जाती है। इस पद्धति से सायनस, डायबिटीज़, गर्दन, पीठ, कमर और पैरों के दर्द के रोग, जोड़ों के रोग से भी आराम पाया जा सकता है।किसी भी मर्म स्थान को 0.8 sec. से अधिक समय तक दबाव नहीं देना चाहिये। और मर्मों का 1-आवाहन 2-पूजन 3- विसर्जन करना चाहिये।स्त्रियों में मर्म चिकित्सा बाईं ओर से व पुरुषों में दाईं ओर से करनी चाहिये। अत्यधिक रोगावस्था में मर्म चिकित्सा को प्रभावित भाग से सुदूरवर्ती मर्म स्थानों से प्रारम्भ करना चाहिये। बाद में प्रभावित भाग की चिकित्सा की जानी चाहिये। सूजन की अवस्था में उसके समीपवर्ती मर्म स्थानों को उपचारित करने से लाभ मिलता है।सामान्यतया लेटी अवस्था में (शवासन की स्थिति में) मर्म चिकित्सा करना है।

2-रोगी की वेदना सहन करने की शक्ति, मन: स्थिति व मर्म के प्रकार को ध्यान में रखकर मर्म चिकित्सा की जानी चाहिये। प्रारम्भ में मर्म बिन्दुओं पर हल्का दबाव देना हैं, बाद में शारीरिक क्षमता के अनुरुप दबाव बढ़ाया जा सकता हैं।

मर्म चिकित्सा के दौरान कसे हुये कपड़े, टाई, बेल्ट, जुराब, नी कैप, आदि हटा देना चाहिये।चिकित्सा के दौरान रोगी को लम्बा श्वास प्रश्वास लेने को कहते हैं। मर्मा पॉइंट को हीलिंग करने के लिए। क्लॉक वाइज सर्किल बनाकर दबाव देना चाहिए।और इसके बाद एंटी क्लॉक वाइज सर्किल बनाने चाहिए।क्लॉक वाइज सर्किल एनर्जी को स्टूमुलेट करने के लिए और एंटी क्लॉक वाइज सर्किल एनर्जी को शांत करने के लिए किए जाते हैं।इस चिकित्सा में ऑयल का भी इस्तेमाल किया जाता है।स्थपनी मर्मा (the point between the eyebrows) के लिए जो FOR mind,brain, and nerves... चंदन का तेल इस्तेमाल करते हैं और क्षिप्र मर्मा (point on the palm between thumb and pointer finger) के लिए जो रेस्पिरेट्री डिसऑर्डर्स को ठीक करता है.. यूकेलिप्टस ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है।परन्तु ध्यान रखें, जेंटल और लाइट टच ही मर्मा के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।


THE 108 MARMAS: VITAL JUNCTION POINTS ;-

05 FACTS;-

1-Marma is a Sanskrit word which refers to any open, exposed, weak or sensitive part of the body. In Ayurveda, it is a point in the human body that’s located at the intersections of veins, muscles, joints, bones, ligaments or tendons. These points are considered to be vital points because they are infused with prana (life force energy) and are influenced by consciousness. Marma points are also stimulated by touch / massageMarma points are an important element of Ayurveda’s healing power. These energy points profoundly affect the body, mind and spirit as well as facilitate the deepest levels of healing. Stimulating marma points directly taps into the individual’s reservoir of energy and promotes good health.Lord Krishna died due to an arrow injury on his lower foot, a vital Marma point. Jesus Christ was nailed onto a cross and all parts of his body where the nails pierced were among 108 points on which the Marma therapy is based. These sensitive points could result in one’s death, if touched or pierced sharply.

2-There are 108 major marma points in the human body (Face, head,arms, legs, abdomen, chest, back and trunk) which are connected to the seven chakras, while the minor marma points are found around the torso and the limbs. Vital energies flow through 72,000 fine channels called Nadis. Any block or obstruction to this flow of energies cause imbalance in the respective body parts leading to diseases or illnesses. The basic principle behind Marma treatment is removing this block or obstructions and thus reviving the free flow of energies to the affected parts of the body. Stimulating the marma points affects the chakras and the doshas (types of energy in the body). It also stimulates the various organs and systems of the body.Marma Point Massage is an effective, yet gentle technique that works similarly to Chinese acupuncture but without the use of needles, to relieve joint and muscle pain in the body. It also treats various other symptoms such as digestive disorders, anxiety, endocrine imbalance , as well as organ weaknesses.

3-It is a beautifully slow, soothing and nurturing treatment .In Ayurvedic medicine, marma points are anatomical locations in your body where a concentration of life energy exists.The size of the particular marma is also mentioned. To find the correct position of marma, they are measured in “angula” (अंगुल) where one “angula” is the width of self finger. This reduces the chances of missing the point. In different ailments marmas points behave in different ways as they may turn stiff, tender, cool, hot, swollen, rough, uneven or depressed. Blocked energy is released by stimulating the affected marma point with the desired depth of pressure applied in tandem with time of pressure, number of rounds or/and vibrating it.

Depending on the quality and nature of marma points, an individual can treat him/herself which helps to protect thyself from various disorders, increases immune power and preserves good state of health.

4-Marma points are said to contain the three doshas: 1-vata (air and space)

2-kapha (earth and water)

3-pitta (fire and water)

These doshas are believed to be linked to your physical and emotional well-being. Like traditional Chinese acupuncture, Ayurvedic medicine believes that stimulation of the marma points can improve your physical and mental health. It’s also believed that injury to the marma points can result in negative health effects in the body and in some cases, further injury and even death.

5-L0CATION OF MARMA POINTS;- It’s said that there are 107 marma points in various locations around the human body: 1-11 marma points in your limbs

2-26 marma points in your trunk

3-37 marma points in your head and neck region

4-33 marma points located elsewhere in your body

6-SP.POINTS OF MARMA ;-

1-The marma on the scalp are connected to the brain as well as to organs situated in other parts of the body. On the chest and upper back, the points are connected with the heart and lungs. The points on the lower back are connected with the kidneys, stomach, and the digestive organs. Each of the areas where marmaṇi reside is associated one of the five constituent elements of the body (space, air, fire, water, and earth), and each marma point activates the energy of the element associated with its location.For example, chest and lung marma points stimulate kapha, umbilical points affect pitta, and colon points will influence vata.

2-There are eight great marma points that are essential to life. These marmaṇi house the greatest concentration of vital energies of all the points. Sushruta described how injuries at these marma points, whether superficial or deep, can disrupt the flow of prana, decreasing vitality and even causing life-threatening damage. These points are known as the sadyah pranahara marmaṇi: murdhani(crown), brahmarandhara (anterior to crown), shivarandhra(posterior to crown), ajna(third eye), shanka(right and left temple), hrdayam(heart), habhi (umbilicus), and uda(anus). The illustration below shows these eight marmaṇi, as well as five other vital points—kantha, griva, basti, vrushana, and yoni jihva—that can cause death or serious injury when traumatized.

3-While marma points are the most vulnerable areas of our body, they also hold great potential to improve our health and well-being. Each of the following marma points provides access to specific health benefits:

1-Shivarandhra – stimulates memory, calms the mind, and balances emotions

2-Hrdayam – directs the healing energy of love to the heart

3-Nabhi – enkindles gastrointestinal agni(digestive fire)

4-Murdhani – stimulates blood flow in the cerebral cortex and the circulation of the cerebrospinal fluid

5-Brahmarandhara – relieves headache and optimizes the functioning of the pituitary gland

6-Shankha – strongly pacifies pitta, relieves stomach pain and excess acidity, improves speech

7-Griva – boosts circulation of plasma and lymphatic fluid, benefits the throat and thyroid

8-Guda – balances strength, vitality, and stability

In general, stimulating the marmaṇi enhances the flow of prana. The manipulation of marma points can be quite effective when used on its own to treat mild and short-term illnesses and dysfunctions. As the complexity of a disease increases, other Ayurvedic therapies become essential. These may include herbal or dietary recommendations, panchakarma, and exercise and lifestyle changes.



WHAT IS MARMA POINTS THERAPHY ?-

02 FACTS;- 1-Ayurvedic medicine proposes marma points therapy as a method of changing or improving your biochemistry.It’s believed to release stagnant energy and stimulate your internal organs, hormones, and other chemicals to help meet the needs of your body.Marma points therapy is done by gently stimulating the marma points around your body through massage therapy.Generally, this is performed by a trained massage therapist who has experience with Ayurvedic medicine. These massage therapists have extensive knowledge of the locations and functions of the various marma points.Aromatic massage oils, sometimes infused with herbs, are typically used to increase the benefits of the massage.

2-Typically, a practice begins with a srota or ahyangha massage to relax the body, apply herb-infused oils to draw out ama (toxicity), and work on specific marma points with circular movements. The direction of the circles—as well as the order the marma points are stimulated—will depend upon one’s dosha and/or intention for treatment. Clockwise circles are used to stimulate energy flow while counter-clockwise movements are used to calm and pacify energy. For general relaxation, counter-clockwise circles are generally suggested. Depending upon individual needs some components may also be incorporated into a marma massage.

3-Colored lights may be used over marma points to direct incoming prana into a particular function. This can be useful when working to heal localized pain and disease.

Energy is a powerful healer. In fact, Ayurveda suggests that it is the only healer. By accessing and working with prana directly, rather than simply modifying its effects in the body, you can experience new levels of health, vitality, and peace of mind.Essential oils contain energy and information from nature. This intelligence communicates with the energy and informational content of each marma point to invoke a specific response. For example, sandalwood oil may be used on the Sthapani marma (the point between the eyebrows) to calm the mind and awaken intuition. Eucalyptus oil may be used on the Kshipra marma (point on the palm between thumb and pointer finger) to help clear respiratory disorders.

4-In order to work on the musculature, the position and structure of the muscles.. firm pressure is necessary. When moving toxins through the lymphatic system, less pressure is required. In fact, if too much pressure is used, the lymphatic system will be bypassed and the muscles activated. To access the layer of energy, a gentle touch is essential. Gentle, light touch is the only way to work on marma points.

WHAT are the benefits of MARMA POINTS THERAPHY ? THE marma point therapy may offer the following benefits ...

1-Enhances immunity

2-Clears emotional blockages

3-Increases energy level

4-Provides pain relief

5-Improves digestion, assimilation, and elimination

6-Encourages deep, revitalizing sleep

7-Increases circulation to the skin

8-Amplifies creativity

9-Releases trauma

10-Expands intuition

11-Facilitates the experience of deep peace

12-Strengthens internal organs

13-Balances doshas

14-Slows the aging process

How to give yourself a marma points massage;- Marma points therapy is a traditional Ayurvedic massage technique that’s believed to help sustain the flow of energy throughout your body.The good thing is that you don’t have to be a certified massage therapist to give yourself a marma points massage. Here’s how you can massage your own marma points without a professional. There are 107 marma points located around your body. Stimulation of these points is said to affect everything from the health of your organs to the production of hormones and more.Below, you’ll find some of the more notable marma points that you can easily stimulate using the massage technique ... Marma point>>>Location>>>Believed to affect..PART-ONE

1-Sthapani marma center of forehead FOR mind,brain, and nerves... sandalwood oil may be used

2-Phana marma either side of the nose at the base of the nostrilss ,FOR sinuses,ears, sense of smell, and stress levels

3-Shringataka marma center of the chin FOR eyes, ears, nose, tongue, and various nerves

4-Talhridayam marma center of the palm of each hand FOR lungs

5-Manibandha marma center of the spot where your inner wrist meets the palm of each hand FOR body stiffness

6-Nabhi marma center of the navel FOR small intestines

7-Janu marma lower inner point at the bottom of each kneecap FOR heart, liver, and spleen

8-Indravasti marma center of each calf muscle FOR digestion and the small intestine

9-Kurcha marma center of the ball of each foot, between the first and second toes FOR vision

10-Talhridayam marmacenter of the sole of each foot FOR lungs (similar to the talhridayam marma points on the hands)

11- Adhipathi (crown) marma to increase prana or guiding life current into

12-Kshipra marma (point on the palm between thumb and pointer finger) to help clear respiratory disorders....Eucalyptus oil may be used.

13-Apang and Sthapani marma center of forehead FOR Migraine and Brain Power.

14-Kshipra,Talhridaya,Gulf,Indrabasti,Janu,Kukunda,Katikatarun,Parshvasandhi FOR

Low Back Pain . 15- Kurchcha marma of both hands ...base of thumb for Navel displacement and base of index finger for Waist pain.NOTE;-

Use the tips of your fingers to gently but firmly stimulate each marma point listed above.Massage each point in a clockwise circular motion and anti clockwise circular motion for up to 5 minutes .Optionally, use herb-infused massage oils during your massage .Tulsi, peppermint, and lavender oil are tri-doshic (balancing to vata, pitta, and kapha).Tulsi or Nutmeg/जायफल essential oil for Vata imbalances, Peppermint or Sandelwood essential oil for Pitta, and Lavender or Eucalyptus oil for Kapha imbalances. ... SHIVOHAM...








...SHIVOHAM....