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क्या हैं प्राणिक हीलिंग और प्राणिक ऊर्जा/Pranic Energy ?PART01


क्या हैं प्राणिक ऊर्जा/Pranic Energy ?-

06 FACTS;-

1-जीवन ऊर्जा है इसीलिए शरीर मजबूत और जीवित रहता है. शब्द "प्राण" संस्कृत के शब्द प्र उपसर्ग पूर्वक अन् धातु से बना है और अन् धातु जीवनीशक्ति का प्रतीक या चेतनावाचक है। इस प्रकार प्राण से तात्पर्य ‘‘जीवनीशक्ति’’ से है। और यह लगभग सभी संस्कृतियों द्वारा मान्यता प्राप्त है. यह जापानी में ki कहा जाता है, चीनी में ची, Ebreo में Nephesch, ग्रीक में pneuma, Polynesian में मन, और हिब्रू में ruah, जिसका अर्थ है 'जीवन की सांस'.आप जीवन enery के एक सागर में हैं .प्राणशक्ति उपचार /Pranic healing एक पूरक चिकित्सा पद्धति है जो रोगों के उपचार के लिये प्राणशक्ति (life energy) के उपयोग का दावा करती है। कुछ प्राचीन सभ्यतों में इससे मिलती-जुलती चिकित्सा पद्धतियाँ प्रचलित थीं, जैसे मंत्र चिकित्सा, 'शमनिक हीलिंग' (shamanic healing), 'डिवाइन हीलिंग' आदि।

2-प्राण हमारे जीवन का सार तत्व है और हमारी प्रगति का मूल आधार है। समृद्धि का स्रोत यही प्राण तत्व है। यह प्राण तत्व हमारे अन्दर प्रचुर मात्रा में है। यदि हम अपने भीतर इस प्राण का चुम्बकत्व बढ़ा दें तो ब्रह्माण्डीय प्राण या विश्वप्राण को अभीष्ट मात्रा में धारण कर सकते हैं। मानवीकाय में निहित इस प्राणउर्जा के भण्डार को ‘‘प्राणमयकोश’’ कहा जाता है। सामान्यत: हमारी यह प्राणऊर्जा प्रसुप्त स्थिति में रहती है तथा इससे शरीर के निर्वाह भर के कार्य ही सम्पन्न हो पाते है किन्तु साधना के माध्यम से इस प्रसुप्त प्राण का जागरण संभव है।

3-इस प्रकार विश्वव्यापी प्राण एक महान् तत्व है, जो संसार के समस्त जड़-चेतन पदार्थों में भिन्न-भिन्न मात्रा में पाया जाता है। हमारे शरीर में बहने वाला विद्युत प्रवाह इसी प्राण तत्व का अंश है। जो प्राणी इस प्राण तत्व को समुचित मात्रा में धारण कर लेता है, वह संकल्प बल से युक्त प्रसन्न उत्साहित रहता है और जो इस शक्ति का समुचित मात्रा में ग्रहण नहीं कर पाता है, वह उदास, निराश, निस्तेज देखा जाता है। मनुष्य ने सृष्टि के प्रारंभ में ही इस बात का पता लगा लिया था कि मानवीय प्राण में एक प्रबल रोग निवारक शक्ति होती है। आपने देखा होगा कि जब बच्चा रो रहा हो और उसे गोद में ले लिया जाये तो उसका रोना बंद हो जाता है, क्योंकि उसकी पीड़ा चाहे वह किसी भी प्रकार की क्यों न हो, उसको गोद में उठाने वाले व्यक्ति की प्राण उर्जा का सम्पर्क पाकर कम हो जाती है। रोगी व्यक्ति के मस्तक पर जब हाथ फेरा जाये तो उसे अच्दा अनुभव होता है। इसके पीछे यह वैज्ञानिक कारण है कि एक व्यक्ति की प्राण उर्जा दूसरे व्यक्ति में जो कमजोर या बीमार है, उसमें प्रविष्ट होकर उसे प्रसन्नता एवं आनन्द प्रदान करती है।

4-हमारे शरीर में यह प्राण नाड़ियों में प्रवाहित होता है, किन्तु दूसरे व्यक्ति या प्राणी तक हम इस प्राण उर्जा को नाड़ियों के बिना भी प्रेषित कर सकते हैं हमारे मस्तिष्क से प्रतिक्षण विचार निकलते रहते हैं और आकाश में निरन्तर गति करते रहते हैं। यदि इन विचारों को प्राणशक्ति का बल मिल जाये तो ये विचार उत्पन्न शक्तिशाली बनकर कार्यरूप में परिणत होने लगते हैं। अत: प्राणचिकित्सक उपचार करते समय मानसिक रूप से रोगी के स्वस्थ होने की भावना भी करता है, क्योंकि इसके बिना मार्जन एवं उत्सर्जन की क्रिया पूरी तरह सफल नहीं हो पायेगी।

5-प्राण उर्जा कोई काल्पनिक विचार नहीं है। इस सन्दर्भ में वैज्ञानिकों ने गहन अनुसंधान किये है।वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग किया जिसमें छोटे जानवरों का मस्तिष्क निकाल देने के बावजूद वे पहले की तरह ही सब कार्य करते रहते हैं। इससे स्पष्ट

होता है कि प्राणशक्ति केवल मस्तिष्क में ही नहीं वरन् सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहती है। हम अपनी इच्छाशक्ति का प्रयोग करके इस प्राणऊर्जा द्वारा अद्भुत कार्य कर सकते हैं। जिस प्रकार आतिशी शीशे द्वारा जब सूर्य की किरणों को एक जगह इकट्ठा किया जाता है, तो उर्जा के केन्द्रीकरण के कारण वहाँ अग्नि जल उठती है, इसी प्रकार प्राणचिकित्सा में, जब उपचारक द्वारा प्राण उर्जा को रोगी के अंगविशेष पर जब प्रक्षेपित किया जाता है तो इसके आश्चर्यजनक परिणाम आते हैं, और उसका रोग ठीक होने लगता है।

6-कुछ डॉक्टर यह मानते हैं कि प्राण उर्जा केवल मस्तिष्क में ही रहती है, किन्तु उनकी यह मान्यता ठीक नहीं है। प्राण उर्जा तो हमारे सम्पूर्ण शरीर में प्रवाहित होती है। मस्तिष्क केवल तर्क और बुद्धि का स्थान है। अन्य शक्तियाँ इस स्थान में नहीं रहती। हमारे प्रत्येक कार्य केवल बुद्धि या तर्क के बल पर नहीं किये जा सकते है।निद्रावस्था में मनुष्य का दिमाग सोता रहता है और प्राण तत्त्व द्वारा शरीर की रक्षा होती रहती है।वर्तमान समय में विश्व के अनेक देशों में प्राणचिकित्सा का सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा रहा है और इसके अत्यन्त उत्साहजनक परिणाम सामने आ रहे हैं।

प्राण के स्रोत;-

03 FACTS;-

प्राण चिकित्सा के अनुसार प्राण के तीन मुख्य स्रोत बताये गये हैं- (1) सौर प्राणशक्ति (2) वायु प्राणशक्ति (3) भू या भूमि प्राणशक्ति।

1-सौर प्राणशक्ति -

सूर्य से प्राप्त होने वाली उर्जा को ‘‘सौरप्राणशक्ति’’ कहा जाता है। सूर्य प्राणउर्जा का अक्षय स्रोत है। इसे जगत् की आत्मा कहा जाता है। सूर्य के प्राणीमात्र में नवजीवन का संचार होता है। सूर्य से प्राणशक्ति प्राप्त करने के अनेक तरीके हैं। जैसे सूर्य या धूप स्नान, धूप में रखे हुये पानी या तेल का प्रयोग करके इत्यादि।यह अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है और पूरे शरीर energizes करता है। 5 या 10 मिनट के लिए sunbathing द्वारा सौर प्राण ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं । लेकिन बहुत ज्यादा सौर प्राण शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है। धूप स्नान लेते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि प्रात: कालीन सूर्य की रोशनी ही हमारे लिये स्वास्थ्यवर्द्धक होती है। अत्यधिक तेज धूप में लम्बे समय तक खड़े रहने पर हमारे शरीर को हानि पहुँच सकती है।

2-वायु प्राणशक्ति -

वायुमंडल में पाये जाने वाली उर्जा को वायुप्राणशक्ति या प्राणवायु कहते हैं। वायुप्राण को ग्रहण करने का सर्वाधिक सशक्त माध्यम श्वसन क्रिया है। श्वसन क्रिया के द्वारा हम अधिकतम प्राण उर्जा को ग्रहण कर सकें इस हेतु हमारी श्वास-प्रश्वास दीर्घ हो, उथली नहीं। अत: प्राणायाम के द्वारा हम सहजतापूर्वक वायुप्राणशक्ति को ग्रहण कर सकते हैं। विशेष प्रकार का प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति वायु पा्रण को त्वचा के सूक्ष्म छिद्रों के द्वारा भी ग्रहण कर सकते हैं।हवा में सांस लेने से, प्राण हमारे फेफड़ों द्वारा अवशोषित हो जाती है। यह ऊर्जा भी चक्र केन्द्रों द्वारा सीधे अवशोषित हो जाती है। यह वायु प्राण ऊर्जा धीमी गति से लयबद्ध और गहरी साँस लेने द्वारा अधिक प्राप्त करना संभव है।

3-भू प्राणशक्ति -

पृथ्वी या भूमि में पायी जाने वाली प्राणशक्ति को भू प्राणशक्ति कहते है। भूमि के माध्यम से हम निरन्तर भप्राणशक्ति को ग्रहण करते रहते हैं। यह प्रक्रिया स्वत: ही होती रहती है। भू प्राण को हम पैर के तलुवों के माध्यम से प्राप्त करते हैं। नंगे पैर भूमि पर चलने से भू प्राणउर्जा की मात्रा में वृद्धि होती है। इस प्रकार आप जान गये होंगे की सूर्य, वायुमंडल और भूमि-प्राणशक्ति के ये तीन मुख्य स्रोत हैं।जमीन प्राण पृथ्वी में मौजूद जीवन ऊर्जा से प्राप्त होता है। नंगे पांव चलने से यह ऊर्जा हमारे पैरों के तलवों द्वारा अवशोषित हो जाती है।यह प्राण ऊर्जा अधिक काम करने के लिए शरीर की क्षमता को बढ़ाने के लिए है।

क्या हैं प्राणिक हीलिंग?-

08 FACTS;-

1-प्राणिक हीलिंग का विज्ञान हीलिंग ऊर्जा-शरीर या मानव आभा की अवधारणा पर आधारित है। यह एक वैज्ञानिक विद्या है जो प्राण ऊर्जा पर आधारित है। प्राणिक हीलिंग एक स्पर्श चिकित्सा थेरेपी है जो दो बुनियादी सिद्धांतों Energizing और Cleaning के आधार पर आधारित है। 'आभा' अथार्त चारों ओर से घेरे चमकीले ऊर्जा शरीर... जो दृश्यमान भौतिक शरीर को चार से पांच इंच तक घेरे रहता है... के रूप में समझाया गया है। प्राणिक हीलिंग का आधार व्यक्ति के आस-पास के औरा को माना जाता है। महापुरुषों के चित्र के सिर के आस-पास स्वर्ण आभा होती है, जिसे औरा भी कहते हैं।कोई भी रोग या बीमारी पहले आभा में प्रकट होती है, और उसके बाद भौतिक शरीर में फैल जाती है.. जिन्हे रोकना संभव है।

2-इस विद्या के अन्तर्गत ऊर्जा को आधार बनाते हुए पीड़ित (बीमार) व्यक्ति के शरीर की नकारात्मक ऊर्जा तथा बीमारी पैदा

करने वाले कारकों को दूर किया जाता है और रोग लाभ दिलाया जाता है।प्राणिक हीलिंग, एक तरह का प्राणायाम है जो प्राण बढ़ाने के लिए किया जाता है।प्राण शरीर और इसमें स्थित चक्रों को देख कर रोग का पता लगाया जाता है। इस ऊर्जा से कई प्रकार के रोगों का उपचार किया जाता है।यह एक तरह की चिकित्सा थेरेपी है जिसकी मदद से बिना किसी दवा का इस्तेमाल किये कई तरह के जटिल रोगों का इलाज किया जाता है।प्राणिक हीलिंग के अंतर्गत शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक रोगों तथा इसके अलावा सौंन्दर्य सम्बन्धी रोगों का उपचार संभव है।

3-प्राचीन समय के महापुरुष आदि के सिर के पीछे हमेशा एक प्रकाश फैला रहता था, उनके सिर के सन्मुख स्वर्ण आभा बनी रहती थी। इस चिकित्सा प्रणाली में व्यक्ति का उपचार रंगों के माध्यम से किया जाता है।इस सृष्टि में विभिन्न रंग हैं और प्रत्येक रंग के अनगिनत भेद हैं, इन्ही में से कई हमें सुखद अनुभूति कराते हैं तो कुछ निराशा के प्रतीक भी होते हैं। प्राणिक हीलिंग एक अत्यंत शक्तिशाली विज्ञान है, एक आध्यात्मिक चिकित्सक को इस विज्ञान का प्रयोग करने से पूर्व ध्यान एवं योग की कुछ क्रियाओं का नियमित अभ्यास कर स्वयं को चेतना के एक स्तर पर लाना होता है।

4-प्राणिक हीलिंग की मदद से मनोविज्ञानिक रोगों भी का इलाज किया जाता है। हीलिंग की मदद से मनोविकार, मिर्गी, चिन्ता, उदासी, भय, आत्महत्या की प्रवृति, शराब या किसी अन्य नशे की लत आदि का उपचार संभव है।प्राणिक हीलिंग की मदद से डायबिटिज, एन्जाईना, हृदय रोग, गुर्दे की पथरी और विकार, आंतों की सूजन, अल्सर, रक्त स्त्राव, आधे सिर का दर्द, आँखों की कम होती रौशनी, मोतियाबिन्द, बहरापन, सांस का रोग, दमा, पाचन तंत्र के रोग, भूख न लगना, उल्टी, कब्ज व दस्त, पीलिया व लीवर के रोग, गठिया, चर्म रोग, प्रजनन संबंधित रोग , लकवा, गर्दन का दर्द, स्पान्डलाईटिस, हाई ब्लड प्रेशर, गाल

ब्लैडर स्टोन, ट्यूमर, फ्रोजन सोल्डर आदि तमाम तरह के विकारों का इलाज संभव है ...वह भी बिना किसी दवा के।इतना ही नहीं प्राणिक हीलिंग सौन्दर्य सम्बन्धी विकार भी दूर करता है जैसे मोटापे की समस्या, कील-मुहांसे की समस्या, लम्बाई ना बढ़ना, जले-कटे निशानो को मिटाना आदि।

5-प्राण चिकित्सा के अन्तर्गत उपचारक अपने हाथों के माध्यम से ब्रह्माण्डीय प्राणऊर्जा को ग्रहण करके हाथों द्वारा ही रोगी व्यक्ति में प्रक्षेपित करता हैं। इस प्रकार इस चिकित्सा पद्धति में चिकित्सक रोगी की प्राणशक्ति को प्रभावित करके उसे

स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है।प्राण चिकित्सा के द्वारा न केवल दूसरों का वरन् स्वयं का भी उपचार किया जा सकता है। इस प्रकार यह पद्धति स्वयं के लिये और दूसरों के लिये समान रूप से उपयोगी हैं। प्राण चिकित्सा को अनेक नामों से जाना जाता है। जैसे औषधि धिवगांग, अतिभौतिक उपचार, मानसिक उपचार, हाथ का स्पर्श, चिकित्सकीय छुअन, चुम्बकीय उपचार, विश्वास उपचार, चमत्कारी उपचार, ओज उपचार आदि।अपने अनेक बार अनुभव किया होगा कि जो लोग अत्यधिक प्राणवान्

होते हैं, उनके आसपास रहने वाले लोग भी उनके सान्निध्य में स्वयं को ऊर्जावान एवं अच्छा महसूस करते हैं क्योंकि जिनमें प्राणऊर्जा की कमी होती है, वे अनायास ही अधिक उर्जा वाले व्यक्ति से जीवनीशक्ति ग्रहण करते हैं। इसलिये कमजोर एवं निर्बल प्राणशक्ति वाले ही स्वयं को अत्यधिक थका हुआ अनुभव करते हैं।

6-इस प्रकार स्पष्ट है कि प्राणशक्ति अधिक से कम की ओर स्थान्तरित होती है और प्राण चिकित्सा में उपचारक प्रयास पूर्वक इस जीवनीशक्ति को रोगी में प्रक्षेपित करते हैं। न केवल इंसान वरन् कुछ पेड़-पौधे भी ऐसे हैं, जो अन्य पौधों की तुलना में अधिक प्राणऊर्जा छोड़ते है और इनके पीछे बैठने या लेटने पर हम स्वयं को अत्यधिक प्राणवान् अनुभव करते हैं। इस दृष्टि से पीपल का वृक्ष अत्यन्त उपयोगी है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘‘वृक्षों में मैं पीपल हूँ।’’ पीपल के पेड़ को अत्यधिक चैतन्य माना जाता है और यह एक ऐसा पेड़ है जो दिन एवं रात दोनों समय ऑक्सीजन छोड़ता है। इसलिये भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक दृष्टि से भी पीपल के वृक्ष का अत्यन्त महत्व है और इसकी पूजा की जाती है। प्राणियों एवं वनस्पतियों के समान कुछ स्थान विशेष भी अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक प्राणशक्ति से युक्त होते हैं। जैसे-मंदिर, चर्च, तीर्थस्थल में जाकर हमें अत्यधिक शांति महसूस होती है। यह सब प्राण ऊर्जा की ही विशेषता है।

7-शरीर में प्राण ऊर्जा संतुलित एवं लयबद्ध रूप से परिक्रमा करती रहती है तथा यही मनुष्य के जीवन का सार एवं उसका आधार भूत तथ्य है। यह शक्ति एवं वैचारिक क्षमताओं में वृद्धि करने के साथ-साथ मानवीय गुणों को विकसित करने में भी अपूर्व सहयोग प्रदान करती है। जब कभी वाह्य या किन्हीं आंतरिक कारणों से शरीर में परिभ्रमित प्राण ऊर्जा में असंतुलन पैदा हो जाता है, तो इसके फलस्वरूप शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का घटना और बीमारियों का उत्पन्न होना आरंभ हो जाता है। बीमारी का कारण समझने के लिए शरीर के बाहर और अंदर की स्थिति को भी समझना चाहिए तथा दृश्य अदृश्य कारणों का मंथन करना चाहिए। बाहर के कारणों का तात्पर्य उन भौतिक कारणों से है जिनकी वजह से बीमारी हुई है। जैसे कीटाणु , कुपोषण, विषाणु युक्त प्रदूषित पदार्थ, व्यायाम की कमी, वायुमंडल में प्रदूषण तथा शुद्ध वायु एवं ऑक्सीजन की कमी और पानी कम पीना आदि। आंतरिक कारणों से तात्पर्य है शारीरिक अवयवों का ठीक प्रकार से कार्य न करना, पेट से संबंधित रोग, भावनात्मक एवं मानसिक कारण आदि। इनके कारण विभिन्न शक्ति-चक्रों का कमजोर होना या चक्रों में अत्यधिक शक्ति का एकाएक एकत्रित हो जाना आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं।

8-सांस लेने के समय ऑक्सीजन तथा दूसरी गैसें एवं रासायनिक पदार्थ, जो वायु के रूप में फेफड़ों में जाते हैं, कुछ अंश में सोख लिए जाते हैं तथा शेष सांस के साथ बाहर आ जाते हैं। सोख ली गई गैसों को ‘‘स्पेक्ट्रम-एनालिसिस’’ द्वारा जाना जा सकता है। रंगीन प्रकाश पुंज , जो प्राण वायु का रूप है, शोषित गैसों का ही अभिन्न हिस्सा होता है। इसी प्रकार हमारे खाद्य पदार्थों का वह भाग जो पाचन क्रिया के द्वारा तरल रूप में सोख लिया जाता है, हमारी जीवन ऊर्जा का स्रोत है। इस प्रकार जल, वायु, ताप व भोजन के द्वारा जो ऊर्जा, किरण-रश्मियों एवं प्राण वायु के द्वारा शरीर में शोषित की जाती है, उसका लगातार उत्सर्जन भी होता रहता है। इस प्रकार ये उत्सर्जित किरणें शरीर के चारों तरफ एक कंबल की तरह लिपटी रहती हैं और जीव विशेष के आभा मंडल या प्रभा मंडल के रूप में जानी जाती हैं। यह आभा मंडल शरीर के बाहर ढाई से चार इंच की मोटाई में परिव्याप्त रहता है जिसे अनुभव द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। मृतक के शव पर यह आभा मंडल नहीं होता क्योंकि यह आभा मंडल जीवित प्राणी की ऊर्जा का ही उत्सर्जन है।

प्राण चिकित्सा के सिद्धान्त;-

02 FACTS;-

प्राण चिकित्सा दो सिद्धान्तों पर आधारित है-

1. रोग से स्वमुक्ति का सिद्धान्त 2. प्राणउर्जा या जीवनीशक्ति का सिद्धान्त।

1-रोग से स्वमुक्ति का सिद्धान्त;-

02 POINTS;-

1-प्राणचिकित्सा का पहला सिद्धान्त ‘‘रोग से स्वमुक्ति’’ का सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त का आशय यह है कि हमारे शरीर में स्व-उपचार की क्षमता होती है। शरीर में जब किसी भी प्रकार की विकृति उत्पन्न हो जाती है तो शरीर स्वयं इसे ठीक करता है।

आपने देखा होगा कि जब किसी व्यक्ति की हड्डी टूट जाती है तो कुछ समय के बाद वह स्वत: जुड़ जाती है। प्लास्टर तो उसे जुड़ने में केवल सहयोग देता है, किन्तु हड्डी को जोड़ने का कार्य शरीर स्वयं करता है। इसी प्रकार जुकाम या बुखार अथवा खाँसी होने पर चाहे हम दवा लें अथवा ना ले कुछ दिनों बाद ये स्वयं ही ठीक हो जाते हैं। ये सभी तथ्य शरीर की स्वउपचार की क्षमता को सिद्ध करते हैं।

2-जिस प्रकार रसायन विज्ञान में रासायनिक क्रियाओं की गति को बढ़ाने के लिये विद्युत उर्जा का उपयोग उत्प्रेरक (केटेलिस्ट) के रूप में किया जाता है, उसी प्रकार प्राण चिकित्सा में प्राण उर्जा उत्प्रेरक के रूप में उन जीव रासायनिक प्रतिक्रियाओं की गति को तीव्र कर देती है जो शरीर की स्वयं चिकित्सा से संबंधित है। प्राण चिकित्सा के द्वारा सम्पूर्ण शरीर या

प्रभावित अंग विशेष को उर्जा देने पर उसके उपचार की गति अत्यन्त तीव्र हो जाती है।इस प्रकार स्पष्ट है कि विभिन्न चिकित्सा पद्धतियाँ शरीर की स्वयं उपचार की गति को बढ़ाने में सहायक बनती है, लेकिन रोग को ठीक करने की सामथ्र्य शरीर में स्वयं में है।

2-प्राण उर्जा या जीवनीशक्ति का सिद्धान्त-

यह प्राण चिकित्सा का दूसरा प्रमुख सिद्धान्त है, जिसके अनुसार जीवित रहने के लिये हमारे शरीर में प्राणशक्ति का होना अत्यन्त आवश्यक है।जब व्यक्ति मर जाता है तो कहा जाता है कि अमुक व्यक्ति के प्राण निकल गये। इस प्रकार स्पष्ट है कि जीवन को बनाये रखने के लिये जीवनीशक्ति का होना अनिवार्य है। इस प्रकार रोग से स्वमुक्ति तथा प्राणउर्जा इन दो सिद्धान्तों पर प्राणचिकित्सा आधारित है।

प्राणिक हीलिंग उपचार की विशेषता;-

02 FACTS;-

1-उपचार की इस विधि में ना तो मरीज को स्पर्श किया जाता है और न ही किसी प्रकार की कोई दवा दी जाती है।यह कोई जादू ,अन्ध विश्वास या सम्मोहन कला नहीं है।यह कोई परासामान्य विद्या नहीं, बल्कि प्रकृति के उन नियमों पर आधारित है जिससे हम अनभिज्ञ हैं । यह एक वैज्ञानिक विद्या है जो प्राण ऊर्जा पर आधारित है । प्राण शरीर और इसमें स्थित चक्रों को देख कर रोग का पता लगाया जाता है। इलाज के पूर्व इसी द्वारा जांच की जाती है । इस ऊर्जा से कई प्रकार के रोगों का उपचार किया जाता है ।

2-रैकी, एक्यूप्रेशर, स्पर्श चिकित्सा, मानसिक उपचार, विश्वास उपचार, एक्यूपन्चर, चुम्बक थैरेपी, आदि अनेक चिकित्सा प्रणालियां प्राण ऊर्जा पर ही आधारित है।'प्राण' सूक्ष्म ऊर्जाएं होती है जो स्थूल शरीर बनाती है । इसी सूक्ष्म शरीर को आभामण्डल कहते हैं । किरलियन फोटोग्राफी द्वारा आभामण्डल का फोटो लेना इसका प्रमाण है । इसमे रोगी को स्पर्श नहीं किया जाता है न ही कोई दवाई दी जाती है ।बुरी ऊर्जा नष्ट करने के उपरांत प्राणिक हीलर दोनों हाथों से शुद्ध-वायु, पेड़-पौधे, वनस्पति एवं प्राणदाता सूर्य आदि से खगोलीय ऊर्जा को संग्रहीत कर रोगग्रस्त व्यक्ति के अंग विशेष संबंधी ऊर्जा-चक्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए उसे ऊर्जा प्रदान करता है। ऊर्जा देने की प्रक्रिया को हीलिंग कहते हैं।प्राणिक हीलिंग उपचार के भी कई अलग अलग रूप हैं...

2-1-सीधा उपचार :-

इस प्रकार के उपचार में प्राणिक हीलर द्वारा रोगी को अपने ठीक सामने बैठाकर उपचार किया जाता है।हीलर रोगी को अपने समक्ष बैठाकर उसकी खराब ऊर्जा को इलाज करने वाला अपने हाथों से दूर करता है। इस पद्धति में रोगग्रस्त व्यक्ति के सामने की ओर एक पात्र में नमक मिश्रित जल रख दिया जाता है और माना जाता है कि उसके शरीर से निकाली गई बुरी ऊर्जा का उस जल में विलय कर दिया जाता है।

2-2-दूरस्थ उपचार :-

प्राणिक हीलिंग से उपचार का यह माध्यम उन लोगों के लिए ज्यादा कारगर साबित होता है जो इलाज कराने हीलर के पास नहीं आ पाते, इस प्रक्रिया में रोगी की अनुपस्थिति में भी उपचार संभव है।

2-3-स्वयं की हीलिंग: -

ध्यान देने वाली बता यह हैं कि प्राणिक हीलिंग का एक खास लाभ यह भी है कि इसकी मदद से ना सिर्फ आप खुद को प्रशिक्षित कर सकते हैं बल्कि स्वयं अपने को स्वस्थ भी रख सकते है।

प्राण चिकित्सा की विधि;-

02 FACTS;-

1-प्राणशक्ति उपचार या प्राणचिकित्सा अपने आप में कोई नयी चिकित्सा प्रणाली नहीं है, वरन् हमारे ऋषि-मुनियों, योगियों,

महापुरुषों के वरदानों-ेआशीर्वादों के रूप में अत्यन्त प्राचीन काल से चली आ रही है।प्राण चिकित्सा में सभी रोगों का मूल कारण एक ही माना जाता है और वह है-प्राणऊर्जा का असंतुलित होना। इसलिये सभी रोगों के इलाज की पद्धति भी एक ही है। प्राण चिकित्सा की सभी प्रक्रियायें मूलत: मार्जन एवं उर्जन की दो आधारभूत विधियों पर आधारित है। दूषित प्राण को शरीर से बाहर निकालना अर्थात् मार्जन या सफाई करना और स्वस्थ प्राण ऊर्जा को रोगी के शरीर में प्रवेश करना अर्थात उत्र्जन।

2-इस प्रकार प्राणचिकित्सा में हर रोग की दवा अलग-अलग नहीं है, वरन् रोग का निदान करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है अर्थात रोग शरीर के किस भाग में है? रोग की स्थिति क्या है? रोग शरीर में क्या विकृति उत्पन्न कर रहा है? इन सभी बातों को ध्यान में रखकर रोग का सफल निदान करने के बाद उपचार प्रारंभ करना चाहिये। उपचारक को इलाज करते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि जब रोग शरीर में प्रवेश करता है तो उसकी गति बाहर से भीतर की और एवं नीचे से ऊपर की ओर रहती है, लेकिन रोग जब ठीक होने की स्थिति में होता है तो उसकी गति बदल जाती है अर्थात् उसकी गति भीतर से बाहर की ओर एवं ऊपर से नीचे की ओर हो जाती है। अत: रोग की गति की दिशा के आधार पर हम यह आसानी से पता लगा सकते है कि इस समय रोग का प्रकोप हो रहा है या रोग ठीक हो रहा है।

प्राण चिकित्सा की सावधानियॉ;-

06 FACTS;-

1-प्राण चिकित्सा में सभी रोगों का मूल कारण एक ही माना जाता है और वह है-प्राणउर्जा का असंतुलित होना ।

रोगी की आन्तरिक आभा की जाँच के दौरान जिन अंगों की आभा में खोखलापन प्रतीत हो तो वहाँ उर्जा कम होती है। यह प्राणशक्ति के कम होने का संकेत है।

2-स्वास्थ्य आभा को जाँचने के लिये पहले वाली स्थिति में ही रहते हुये धीरे-धीरे थोड़ा आगे की ओर बढ़ना चाहिये।

अब उपचारक को अपने हथेलियों के मध्यभाग में ध्यान केन्द्रित करते हुये धीरे-धीरे रोगी की ओर बढ़ना चाहिये और रोगी की बाहरी आभा को महसूस करना चाहिये।

3-हाथों की संवेदनशीलता के लिये लगभग एक महीने की अवधि तक इस प्रकार का अभ्यास करना चाहिये।

सर्वप्रथम उपचारक को जीभ को तालू पर लगाना चाहिये। उपचारक को इलाज करते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि जब रोग शरीर में प्रवेश करता है तो उसकी गति बाहर से भीतर की और एवं नीचे से ऊपर की ओर रहती है, लेकिन रोग जब ठीक होने की स्थिति में होता है तो उसकी गति बदल जाती है अर्थात् उसकी गति भीतर से बाहर की ओर एवं ऊपर से नीचे की ओर हो जाती है। अत: रोग की गति की दिशा के आधार पर हम यह आसानी से पता लगा सकते है कि इस समय रोग का प्रकोप हो रहा है या रोग ठीक हो रहा है।अब जब हथेलियों में पुन: संवेदना महसूस होने पर रूक जाना चाहिये। ये संवेदन पहले की अपेक्षा थोड़े तीव्र हो सकते हैं। ये स्वास्थ्य आभा की निशानी हैं।

4-निदान - रोग की पहचान करना तथा उसके कारणों का पता लगाना।

5-प्रक्षेपित प्राणउर्जा - उपचारक या हीलर द्वारा रोगी को दी गई जीवनशक्ति

6-चक्र - उर्जा केन्द्र । प्राणचिकित्सा में 11 बड़े या प्रमुख चक्र तथा अन्य छोटे चक्र माने गये है।

रंग प्राण या जीवन ऊर्जा के प्रकार;-

07 FACTS;-

1-सभी रंग के अलग- अलग गुण है जो हमारे शरीर के आंतरिक कामकाज को प्रभावित करते हैं. सभी चक्र के भिन्न भिन्न रंग है और उनके अर्थ और विशिष्ट कार्य है.भिन्न-भिन्न रंग, प्रेम, दिव्यता, सत्ता, क्रोध आदि के भी प्रतीक हैं। प्रत्येक रंग दूसरे से भिन्न है; इसलिए शरीर पर प्रत्येक का प्रभाव भी दूसरे से भिन्न होता है।इन रंगों के प्रयोग से एक आध्यात्मिक चिकित्सक

रोगी के सूक्ष्म कोशो में प्रवेश कर रोग के मूल कारणों में परिवर्तन करता है।सूर्य की किरणों में 3 रंग ही प्रमुख माने गए हैं।

यह है पीला ,लाल और नीला।

2-पीला रंग एयर एलिमेंट का ,लाल रंग फायर एलिमेंट का और नीला रंग वाटर एलिमेंट का प्रतिनिधित्व करता है।

आयुर्वेद में आयुर्वेद में चिकित्सा उपचार का मूलभूत आधार भी 3 एलिमेंट की स्थिति को ही माना गया है तीन एलिमेंट के दोष से ही विभिन्न रोग उत्पन्न होते हैं।एयर फायर के मिश्रण से नारंगी रंग;एयर और वाटर एलिमेंट के मिश्रण से हरा ;और फायर एवं वाटर एलिमेंट के मिलन से बैंगनी रंग उत्पन्न होता है।त्रिदोष जन्य विकार से सन्निपात की उत्पत्ति मानी जाती है जिससे शरीर सफेद दिखाई देने लगता है।सफेद यानी श्वेत दरअसल कोई रंग ही नहीं है। लेकिन साथ ही श्वेत रंग में सभी रंग होते हैं। सफेद प्रकाश को देखिए, उसमें सभी सात रंग होते हैं।

3-आप सफेद रंग को अपवर्तन (Refraction ) द्वारा सात रंगों में अलग-अलग कर सकते हैं अथार्त श्वेत में सब कुछ

समाहित है।जब आप आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ते हैं और कुछ खास तरह से जीवन के संपर्क में आते हैं, तो सफेद वस्त्र पहनना सबसे अच्छा होता है।श्वेत रंग सात रंगों का मिश्रण है। श्वेत रंग पवित्रता, शुद्धता, विद्या और शांति का प्रतीक है। इससे मानसिक, बौद्धिक और नैतिक स्वच्छेता प्रकट होती है। विद्या ज्ञान का रंग सफेद है। ज्ञान हमें सांसारिक संकुचित भावना से ऊपर उठाता है और पवित्रता की ओर अग्रसर करता है। श्वेत रंग चंद्ममा जैसी शीतलता प्रदान करता है । सूर्य के प्रकाश के केवल 7 रंगों का ही हमें ज्ञान है, परंतु उनके मिलन से 10 लाख रंग बन सकते हैं।

4-लाल प्राण ;-

रोगोपचार में विभिन्न रंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लाल रंग की मुख्य विशेषता यह है कि वह स्नायु और रक्त की क्रियाशीलता को ब