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क्या है प्राणमय कोश /BREATH BODY की प्राणायाम ,बंध और मुद्रा साधना?PART-02

दस प्राणों का संशोधन कैसे करे ?-

04 FACTS;-

1-प्राणवायु का बहुत मूल्य है। असल में, जितनी मात्रा में तुम अपने शरीर को प्राणवायु से, आक्सीजन से भर लोगे, उतनी ही स्पीड से तुम शरीर के अनुभव से आत्म-अनुभव की तरफ झुक जाओगे।क्योंकि शरीर तुम्हारा डेड एंड है--यानी तुम्हारा वह हिस्सा, जो मर चुका है। इसलिए वह दिखाई पड़ रहा है और आत्मा तुम्हारा वह हिस्सा है जो तरल है, ठोस नहीं ; हवाई है, इसलिए पकड़ में नहीं आता।तो तुम्हारे भीतर जितनी ज्यादा प्राण ऊर्जा होगी और जागरण होगा, उतना ही तुम इन दोनों के बीच साफ फासला कर पाओगे। प्राणमय कोश की भूमिका को पार करते हुए दस प्राणों को संशोधत करना पड़ता है।जहां भी प्राणवायु जल रही है, वहां जीवन है।चाहे वह वृक्ष में हो, चाहे मनुष्य में, चाहे दीये में, चाहे सूरज में--कहीं भी हो।तो जितना तुम प्राणवायु को जला सको, उतनी तुम्हारी जीवन की ज्योति प्रगाढ़ हो जाएगी। मनुष्य शरीर में दस जाति के प्राणों का निवास है । इनमे से पांच को महाप्राण और पांच को लघुप्राण कहते हैं।प्राण, अपान, सामान, उदान, व्यान यह पांच महाप्राण हैं ।नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय, यह पांच लघुप्राण हैं।पाँच महाप्राणो को ओजस् और पांच लघुप्राणो को रेतस कहते हैं । दोनों प्राण एक दूसरे के सहायक एवं पूरक हैं ।

2-दोनों नेत्र, दोनों नथुने, दोनों कान, दोनों हाथ पैर एक दूसरे में सहायक एवं साथी है। इसी प्रकार, महाप्राण व् लघुप्राण भी आपस में सम्बद्ध व् सहायक हैं । इनको एक ही प्राण के दो भाग कहा जा सकता है। एक होते हुए भी कुछ भेदों के कारण मस्तिष्क को अगला व् पिछला दो भागो में बांटा गया है, वैसे ही प्राण तत्वों में भी दो तरह के विभाजन हुए हैं । प्राण वायु का निवास स्थान हृदय है। नाग भी उसके समीप रहता है। अपान गुदा और मूत्रेंद्रियो के बिच में मूलाधार के निकट रहता है, उसी के पास कूर्म लघुप्राण का निवास है । समान और कृकल नाभि में रहते हैं । उदान और देवदत्त का स्थान कंठ है। व्यान और धनञ्जय में आकाश तत्व का अधिक मिश्रण रहने से ये सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहते हैं पर उसका प्रधान केंद्र मस्तिष्क का मध्य भाग है।साधारणतः ऐसा माना जाता है कि प्राण के द्वारा शब्द एवं मस्तिष्क का पोषण होता है । अपान से मल मूत्र स्वेद आदि का विसर्जन होता है। समान से पाचन, परिपाक, और उष्णता का संचार होता है। उदान विविध वस्तुएं बाहर से शरीर के भीतर ग्रहण करता है। व्यान का काम रक्त संचार है ।

3-लघु प्राणों में नाग से डकार आती है। कूर्म से पलक झपकने के क्रिया होती है। कृकल से छींके और देवदत्त से जम्हाई आती है। धनञ्जय जीवित अवस्था में शरीर का पोषण करता है और मरने पर देह को सड़ा गला कर शीघ्र नष्ट करने का प्रबंध करता है। ये मान्यताएं सर्वांगपूर्ण नहीं है। जिस स्थान पर जिस प्राण का निवास बताया गया है, वहां एक प्रकार के वायु भ्रमर होते हैं , जिनमें प्राणों का विशेष संचार रहता है। गर्मी के दिनों में जलवायु अधिक गरम हो जाती है तो एक प्रकार के वायु भ्रमर उत्पन्न होते हैं , जो घूमते हुये नाचते हुये अंधड़ की तरह आगे चलते हैं , उसी प्रकार के कुछ भ्रमर शरीर में पाये जाते हैं । सूक्ष्म निरीक्षण करने पर पता चलता है कि इन स्थानों पर शरीरगत वायु और प्राण की उष्णता के कारण एक प्रकार के भ्रमर चक्र उत्पन्न हो जाते हैं । भ्रमर सदा ऊपर चौड़े होते हैं और नीचे की तरफ ढलवां होते जाते हैं तथा अंत में बहुत ही छोटे नोक मात्र हो जाते हैं । ऊपर के सबसे चौड़े भाग को स्तर और नीचे के सबसे नुकीले भाग को बिंदु कहते हैं। इसी प्रकार भ्रमर के ऊर्ध्व भाग को महाप्राण और अधो भाग को लघुप्राण कहा जाता है । एक स्तर है तो दूसरा बिंदु। वस्तुतः दोनों एक ही महातत्व के दो विभाग मात्र हैं ।

4-पांच उप प्राण इन्हीं पांच प्रमुखों के साथ उसी तरह जुड़े हुए हैं जैसे मिनिस्टरों के साथ सेक्रेटरी रहते हैं। प्राण का कार्य है--जीवनचक्र को चलाना। प्राण के द्वारा ह्रदय धड़कता है और उसके बाद रक्तसंचार होता है। इसलिए जब नवजात शिशु पैदा होता है, यदि वह नहीं रोता है तो उसे उल्टा कर थाप दी जाती है और जैसे ही बच्चा रोना शुरू करता है, प्राण का संचार उसी पल से शुरू हो जाता है। उसका ह्रदय धड़कने लगता है और सारा शरीर कार्य करने लगता है। जैसे-जैसे प्राण शिथिल होता जाता है, वैसे/ वैसे जीवनी शक्ति घटती जाती है।प्राण तत्व को ही एक चेतन ऊर्जा (लाइव एनर्जी) कहा गया है। भौतिक विज्ञान के अनुसार एनर्जी के छह प्रकार माने जाते हैं—1. ताप (हीट) 2. प्रकाश (लाइट) 3. चुम्बकीय (मैगनेटिक) 4. विद्युत (इलेक्ट्रिकसिटी) 5. ध्वनि (साउण्ड) 6. घर्षण (फ्रिक्शन) अथवा यांत्रिक (मैकेनिकल)। एक प्रकार की एनर्जी को किसी भी दूसरे प्रकार की एनर्जी में बदला भी जा सकता है। शरीरस्थ चेतन क्षमता /लाइव एनर्जी इन विज्ञान सम्मत प्रकारों से भिन्न होते हुए भी उनके माध्यम से जानी समझी जा सकती है। एनर्जी के बारे में वैज्ञानिक मान्यता है कि वह नष्ट नहीं होती बल्कि उसका केवल रूपान्तरण होता है। यह भी माना जाता है कि एनर्जी किसी भी स्थूल पदार्थ से सम्बद्ध रह सकती है; फिर भी उसका अस्तित्व उससे भिन्न है और वह एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में स्थानांतरित (ट्रांसफर) की जा सकती है। प्राण के सन्दर्भ में भी भारतीय दृष्टाओं का यही कथन है।

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पांच प्राण हाथ की अंगुलिओं में>>उनके सहायक प्राण>>चक्र>>पांच तत्त्व>>किस अभ्यास से सुदृढ़ और सक्रिय होता है?

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1-अंगूठा/Thumb>>व्यान>>धनञ्जय>>स्वाधिष्ठान>>अग्नि तत्व >>कुंभक (श्वास संग्रह कर रखना) के अभ्यास से

2-तर्जनी/Index Finger>उदान>देवदत्त>विशुद्ध>वायु तत्व>उज्जायी ,भ्रमरी और विपरीत करणी मुद्रा के अभ्यास से

3-मध्यमा/Middle Finger>>अपान>>कूर्म >>मूलाधार>>आकाश तत्व>>अश्विनि मुद्रा और मूल-बन्ध विधियां के अभ्यास से

4-अनामिका/Ring Finger>>समान>>कृकल>>मणिपूर>> पृथ्वी तत्व >>क्रिया योग के अभ्यास से

5-कनिष्ठा/Baby Finger>>प्राण>>नाग>>अनाहत>> जल तत्व >>भस्त्रिका, नाड़ी-शोधन और उज्जायी के अभ्यास से

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दस प्राणों का वर्णन;-

05 FACTS;-

1-प्राण; -

02 POINTS;-

1-प्राण वायु का निवास स्थान हृदय है ।प्रथम प्राण का कार्य श्वास-प्रश्वास क्रिया का सम्पादन है। इस तत्व की ध्यानावस्था में अनुभूति पीले रंग की होती है और षटचक्र वेधन की प्रक्रिया में यह अनाहत चक्र को प्रभावित करता है।प्राण के द्वारा हृदय की धड़कन होती है , फिर उससे रक्त संचार होता है , साँस आ जाती है, इसके बाद शरीर की अन्य क्रियाएँ होती है। प्राण में शिथिलता आने पर जीवनी शक्ति घट जाती है और उसके अत्यंत न्यून होने पर हृदय की धड़कन बंद हो जाती है ।प्राण के साथ नाग जुड़े हुए हैं जो डकार का कार्य संचालित करता है।यह प्राण और अपान के मध्य उत्पन्न रुकावटों को दूर करता है और पाचन तन्त्र में वात (गैस) का बनना रोकता है। डकार को लगातार रोके रखने से हृदय-तन्त्र में गड़बड़ी हो सकती है। अन्य क्रियाओं में अपचन के कारण मितली को रोकने और समान प्राण के अवरोधों का हल करना सम्मिलित है।

2-समाधि लगाने वाले महात्मा दीर्घ काल तक निस्तब्ध रहते हैं पर जब चाहते हैं तब शरीर में प्राण का स्पंदन बढ़ाकर हृदय का धड़कना आरम्भ कर देते हैं और साधारण जीवन जीने लगते हैं । जब तक उनका प्राण खींचकर ब्रह्माण्ड में संचित किया रहता है तब तक हृदय की धड़कन बंद रहती है और शरीर मृत्युतुल्य हो जाता है, इसलिए उनको दीर्घकालीन समाधि का सुख मिलता रहता है ।प्राण पर अधिकार प्राप्त किये बिना लंबे समय तक स्थिर समाधि नहीं लग सकती। प्राण पर अधिकार करके दीर्घकाल तक जीवन स्थिर रखना, मृत्यु को इच्छानुवर्ति बना लेना सम्भव है। एक मनुष्य दूसरे को प्राणदान दे सकता है। जैसे एक मनुष्य का रक्त दूसरे के शरीर में पहुंचाया जा सकता है, वैसे ही एक का प्राण दूसरे के शरीर में प्रवेश करके उसे जीवन एवं मनोबल दे सकता है।कुछ निश्चित व्यायाम विधियां विशेष प्राण-शक्ति को सक्रिय करती हैं, ये हैं भस्त्रिका, नाड़ी-शोधन और उज्जायी - प्राणायाम

2-अपान;-

02 POINTS;-

1-अपान का स्थूल कार्य मलों का ठीक प्रकार विसर्जन करना है । यह नारंगी रंग की आभा में अनुभव किया है और मूलाधार चक्र को प्रभावित करता है। देह के भीतर सदा पैदा होने वाले मल, मूत्र, पसीना, आदि विजातीय व् त्याज्य पदार्थ को अपान अनेक छिद्रों द्वारा शरीर से बाहर निकालता रहता है । यदि अपान अपनी क्रिया न करे शरीर में मल निकालने की शक्ति घट जायेगी और अपच, जुकाम आदि रोग पैदा हो जायेंगे।इसके अतिरिक्त अपान की सूक्ष्म क्रिया जननेन्द्रिय में होती है । काम वासना का आधार इसी पर निर्भर है।अपान का सहवर्ती कूर्म लघुप्राण यदि सुषुप्त अवस्था में होगा तो, शारीरिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ होने पर भी गर्भ के स्थापना कभी न हो सकेगी। रूप सौंदर्य पर नहीं , कामतुष्टि अपान की समानता पर निर्भर करती

है।

2-पुरुष में अपान और स्त्री में कूर्म प्रधान होता है दोनों के परस्पर मिलन से एक प्राण ऊर्जा का विस्फोट होता है , जो शारीरिक और मानसिक अभावों की पूर्ती करता है और नर-नारी को आकर्षित करने और उन्हें आपस में बांधने का एक महत्वपूर्ण कार्य करता है।। अपान पर अधिकार की पद्धति न जानते जिन्हें हठपूर्वक ब्रह्मचर्य रखना पड़ता है वे प्रायः किन्ही रोगों से ग्रसित रहते हैं ।जिनमे अपान की समानता है , वे अकारण ही आपस में घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं । उन्हें एक दूसरे के साथ रहने में बड़ी शांति मिलती है । ऐसे मित्रों को ही प्राणसखा कहते हैं । उन्हें आपसी वियोग मर्मान्तक वियोग देता है।अश्विनि मुद्रा और मूल-बन्ध विधियां अपान प्राण को मजबूत और शुद्ध करने का कार्य करती हैं।

3-समान ;-

02 POINTS;-

सामान प्राण उदर में नाभि के नीचे रहता है और पाचन इसका प्रमुख कार्य है ।यह हरे रंग की आभा वाला है और इसे मणिपूर चक्र से सम्बन्धित बताया गया है।समान अति महत्त्वपूर्ण प्राण है, जो दो मुख्य चक्रों- अनाहत एवं मणिपुर चक्रों को जोड़ता है।गर्मी उष्णता एवं पित्त को समान का प्रतीक कहते हैं । शरीर में चंचलता , स्फूर्ति, उत्साह, छरहरापन, एवं चमक इसी के कारण होती है। त्वचा की चिकनाई, कोमलता, चमक में कृकल प्राण का अस्तित्व परिलक्षित होता है । खूब भूख लगना, अधिक आहार करना, जल्दी पचा लेना, सर्दी के प्रभाव से व्यथित न होना समान की विशेषता है । जिनमे यह प्राण कम होगा, वे सर्दी बर्दाश्त न कर सकेंगे, जाड़ो में उनकी देह लुंज पुंज सी हो जायेगी । कानों को उंगलियो को, पैरों को बड़ी ठण्ड लगेगी, ठन्डे जल में जाड़े के दिनों में स्नान करना उन्हें बड़ा कष्टकर लगेगा। अधिक कपडे लादे रहने पर भी ठण्ड न छूटेगी।ऐसे लोगो का जरा से भोजन से पेट भर जाता है। गरम पदार्थ खाने की , धुप या अग्नि के निकट बैठने की इच्छा रहती है । ऐसे मनुष्य अपनी दुर्बलता के कारण सर्दी को बर्दाश्त नहीं कर पाते, पर गर्मी का मौसम उनकी प्रकृति के अनुकूल पड़ता है। समान की न्यूनता के कारण शरीर में उष्णता कम रहती है, उसकी पूर्ती गर्म मौसम से हो जाती है।

2-समान का स्वास्थ्य से बड़ा सम्बन्ध है।स्वादिष्ट पदार्थ, मनोरम दृष्टि, मधुर ध्वनि, सुखद स्पर्श , सुरभित गंध, को भली प्रकार ग्रहण करने और इससे आनंदित होने की क्षमता समान प्राण वालो में होती है। जिसका समान घट जाता है वह सब प्रकार की सुखद परिस्थितियों के होते हुए भी झुंझलाया हुआ रहेगा, देह का कोई न कोई अंग बीमारी का कष्ट पाता रहेगा।ऐसे लोगों को सन्निपात, मोतीझरा, आदि तीव्र रोग तो नहीं होते पर जुकाम , खांसी, पेट का भारीपन , सर दर्द, दांतो का हिलना, आँखों की कमजोरी , देह का टूटना, थकान जैसे मंद रोग घेरे रहेगे। एक से पीछा छूटने से पहले ही नया उत्पन्न हो जायेगा।समान पित्त का प्रतीक है। कृकल कफ का प्रतिनिधि है जिससे छींके आती है। दोनों के मिलने से वात् बनता है । छींकने से सिर-दर्द में आराम हो सकता है, क्योंकि यह सिर और गर्दन में ऊर्जा प्रवाह की रुकावटों को दूर कर सुगम कर देता है। छींक को दबाना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे ग्रीवा रीढ़ में कशेरुका प्रभावित हो सकती है। लोक-कथाओं में कहा जाता है कि जो जोर से और दृढ़तापूर्वक छींकता है, वह दीर्घकाल तक जीवित रहता है। कमजोर छींक कमजोर स्फूर्ति को दर्शाता है।कहा जाता है कि बीमारी की जड़ पेट में है, इसका अर्थ यही है कि नाभि चक्र के निवासी समान और क्रकल ही हमारे स्वास्थ्य के अधिपति हैं। इन पर अधिकार होने से चिरस्थायी स्वास्थ्य का स्वामित्व प्राप्त होता है ।समान प्राण को जाग्रत करने की सबसे प्रभावकारी विधि क्रिया योग है। क्रिया योग का अभ्यास पूरे शरीर को गरम करता है। यह समान प्राण के जाग्रत होने से होता है।

4-उदान ;-

02 POINTS;-

1-‘उदान’ प्राण का निवास कण्ठ है। यह श्री और समृद्धि का स्थान है। लक्ष्मी जी का केन्द्र कण्ठ- कूप की ‘स्फुटा’ ग्रन्थि को माना गया है। निद्रावस्था तथा मृत्यु के उपरान्त का विश्राम सम्भव करना इसी का काम है। स्थान कण्ठ, रंग बैगनी तथा चक्र विशुद्ध है।लक्ष्मी जी की पूजा एवं ‘स्फुटा’ के उत्तेजन से निर्मित कण्ठ में स्वर्णाभूषण धारण किये जाते हैं। ‘स्फुटों’ पर धातुओं और रत्नों का जो प्रभाव पड़ता है, उसे जानने वाले गले में रत्न, कवच, आभूषण एवं मालायें बनाकर कण्ठ में धारण करते हैं और उनके सूक्ष्म परिणामों से लाभान्वित होते हैं। उदान के परिपूर्ण होने से मनुष्य को वे योग्यताएं, सामर्थ्य, शक्तियां, विशेषताएं, एवं प्रचुरताएं प्राप्त होती हैं, जिनके कारण सांसारिक, आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती रहती हैं। जिनकी स्फुटा ग्रंथि जाग्रत है, वे कभी भी अभावग्रस्त नहीं रह सकते, उनकी हर उचित आवश्यक्ता समय पर पूरी हो जाती है।जब तक स्फुटा जागृत रहती है, तब तक बड़ी-बड़ी हानि होने पर भी स्थायी रूप से दरिद्रता नहीं आ सकती। कारण यह है कि स्फुटा में उदान प्राण के सम्पर्क से एक ऐसी चैतन्य स्कुरणा उत्पन्न होती है, जो अदृश्य लोक में छिपे हुए भविष्य का परिचय पाती रहती है। उसे अज्ञात रूप से अनायास ही ऐसा आभास होता रहता है कि यह करना ठीक है और यह करना अनिष्टकारक होगा। एक अज्ञात शक्ति उसका पथ प्रदर्शन करती सी मालूम होती है। वह खतरों से बचाती है, आगे बढ़ने का मार्ग बताती है और कठिन परिस्थितियों में सहारा देती है। उदान द्वारा चैतन्य स्फुटा को शरीर-वासिनी लक्ष्मी कहा जाता है।

2- जिसका कण्ठ-कूप का ‘देवदत्त’ प्रबुद्ध होता है,’ ऐसा पुरुष महा चमत्कारी, परम सिद्ध पुरुष बन जाता है। देवदत्त’ सूक्ष्म प्राण आध्यात्मिकता और सम्प्रदायों का स्वामी है। अष्ट सिद्धियाँ, नव निद्धियाँ देवदत्त से सम्बन्धित हैं। शाप-वरदान, दूर-दर्शन, दूर-श्रवण, अणिमा, महिमा, लघिमा आदि चमत्कारों का केन्द्र यही है।अमीर, सम्पन्न, बड़े आदमी, व्यापारी, धनी, लक्ष्मीपति बनना, वैसे घर में जन्म माना, वैसी आकस्मिक सहायताये प्राप्त होना, वैसे अवसर, सुझाव या मित्र मिल जाना उदान-प्राण के शक्तिशाली होने पर निर्भर हैं। जब यह प्राण निर्बल हो जाता है तो लक्ष्मी विदा होते देर नहीं लगती। ऐसे गलत कदम उठ जाते हैं, ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जिनके कारण घाटे पर घाटा होने लगता है, चोट पर चोट लगती है और मनुष्य कुछ दिनों में निर्धन एवं दीन-हीन बन जाता है।उदान प्राण वह उच्च आरोही ऊर्जा है, जो हृदय से सिर और मस्तिष्क में प्रवाहित होती है। उदान प्राण कुण्डलिनि शक्ति के जाग्रत होने पर उसके साथ होती है। उदान प्राण की सहायता से आकाशीय शरीर (पिण्ड) स्वयं को शारीरिक शरीर से अलग कर लेता है। एक दृढ़ उदान प्राण मृत्यु के चरण को सुगम कर देता है।

उदान प्राण के नियन्त्रण से शरीर बहुत हल्का हो जाता है और व्यक्ति में हवा में उठ जाने की योग्यता आ जाती है। जब उदान प्राण हमारे नियन्त्रण में होता है, तब बाह्य बाधाएं जैसे जल, भूमि या पत्थर हमें बाधा नहीं डाल सकते।योगी जो जंगलों में रहते हैं और गर्मी, सर्दी, कांटों और कीड़ों से प्रभावित नहीं होते, उदान प्राण के नियन्त्रण से ही सुरक्षित रहते हैं। उज्जायी प्राणायाम, भ्रमरी प्राणायाम और विपरीत करणी मुद्रा के अभ्यास से भी उदान प्राण सक्रिय हो जाता है।

5-‘व्यान’;-

03 POINTS;-

1-व्यान का स्थान मस्तिष्क का मध्य भाग है।यह चार अन्य प्राणों का नियंत्रण करता है। दोनों कानों के बीच एक रेखा खींची जाये और दूसरी रेखा भूमध्य भाग से लेकर सिर के पीछे तक खींची जाये तो दोनों जहाँ मिलेंगी, वह स्थान त्रिकुटी कहा जायेगा। यही ‘ध्यान’ का स्थान माना जाता है। इसका सहायक ‘धनञ्जय’ है। व्यान को कृष्ण, धनञ्जय को अर्जुन कहते हैं। इसी त्रिकुटी में, युद्धस्थली के मध्य भाग में कृष्णार्जुन सम्वाद रूपी गीता का आविर्भाव होता है।व्यान प्राण मानव शरीर के नाड़ी मार्ग से प्रवाहित होता है। इसका प्रभाव पूरे शरीर पर और विशेष रूप में नाडिय़ों पर होता है। व्यान-प्राण में कमी से ही रक्त प्रवाह में कमी, नाड़ी संचरण में खराबी और स्नायु संबंधी गति-हीनता होती है।

2-व्यान प्राण का स्थान सम्पूर्ण शरीर में है; रंग, गुलाबी और चक्र स्वाधिष्ठान है। मध्य मस्तक में शतदल कमल में अवस्थिति जिस अमृतकलश का योगशास्त्रों में वर्णन है, उसे ध्यान और धनञ्जय का प्रसाद ही समझना चाहिये। ‘व्यान’ के प्रबुद्ध होने से ऋतम्भरा प्रज्ञा मिलती है। ऋतम्भरा प्रज्ञा उस उच्च विचारधारा को कहते हैं, जो जीव को आत्मकल्याण की ओर ले जाती है। सत्कर्म ,शुभ-संकल्प, सद्वृत्ति आदि दैवी गुण कर्म स्वभावों का प्रकाश व्यान द्वारा ही होता है। आत्म-साक्षात्कार ईश्वर-दर्शन, ब्रह्म-प्राप्ति, दिव्य-दृष्टि एवं समाधि का केन्द्र व्यान है। व्यान को गरुड़ कहा गया है। भगवान का वाहन गरुड़ है। जिसका व्यान जागृत हो गया उसके मानस में परमात्मा का प्रत्यक्ष विकास परिलक्षित होने लगता है।

3-धनञ्जय;-

02 POINTS;-

1-मस्तिष्क में अनेक शक्तियों हैं, जिनके कारण मनुष्य अपनी सर्वोपरि प्रधानता सिद्ध करता है।धनन्जय समस्त शरीर को प्रभावित करता है और विशेष रूप से हृदय की मांसपेशियों को - हृदय के वाल्वों को खोल एवं बन्द करके। मानव शरीर में 4 क्षेत्र ऐसे हैं, जहां प्राण का प्रवाह विशेष रूप में गहन होता है- दोनों पैरों के तलवों व दोनों हाथों की हथेलियों के माध्यम से। पैरों का पृथ्वी तत्व से निकटतम संबंध है और वे ऋणात्मक ध्रुव का प्रतिनिधित्व करते हैं। अत: ध्यान में कभी भी पैरों (चरणों) पर चित्त एकाग्र नहीं करना चाहिए। इसके विपरीत, हथेलियों की ऊर्जा हृदय से उद्भूत होती है।

2-इसका संबंध हवा तत्व से है और धनात्मक ध्रुवत्व पैदा करती है। संसार में ऐसे कितने ही महापुरुष हुए हैं, जिनकी अद्भुत मानसिक योग्यता एवं प्रतिभा ने लोगों को हैरत में डाल दिया है। यह धनञ्जय प्राण के विकास का चमत्कार है। मस्तिष्क में अनेक शक्तियों का निवास है।सभी प्रकार की भली-बुरी ,तुच्छ-महान, शक्तियों का भण्डार मस्तिष्क है। इस आधार की सुव्यवस्था एवं अव्यवस्था का आधार धनञ्जय प्राण है। यदि उसमें कुछ गड़बड़ी हो तो ऐसे लोग मूर्ख, मन्दबुद्धि चिंतित, दुःखी एवं उलझनों में उलझे रहते हैं। किसी व्यक्ति का पूर्ण मस्तिष्कीय विकास तभी हो सकता है जब उसका व्यान ठीक हो और उसका मंत्री ‘धनञ्जय’ जागृत होकर काम करे।व्यान प्राण कुंभक (श्वास संग्रह कर रखना) के अभ्यास से सुदृढ़ और सक्रिय होता है।

NOTE;-

दस प्राणों को सुसुप्त दशा से उठाकर जागृत करने, उसमें उत्पन्न हुई कुप्रवृत्तियों का निवारण करने, प्राण शक्ति पर परिपूर्ण अधिकार एवं आत्मिक जीवन को सुसम्पन्न बनाने के लिए प्राण-विद्या’ का जानना आवश्यक है। जो इस विद्या को जानता है, उसको प्राण सम्बन्धी न्यूनता एवं विकृति के कारण उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ दुःख नहीं देती ।प्राण विद्या को ही हठयोग भी कहते हैं। हठयोग के अन्तर्गत (1)प्राणायाम के साधन (2) बंध और (3) मुद्रा बताये गये हैं।नौ प्राणायामों का वर्णन नीचे किया जाता है।

नौ प्राणायाम;-

(1) अनुलोम-विलोम प्राणायाम;-

सिद्धासन या पद्मासन पर मूल बंध लगाकर बैठें। मेरुदण्ड को सीधा रखें। भीतर भरी हुई साँस बाहर निकाल दें। अब नासिका से साँस खींचिये और जालंधर बंध लगाकर उड्डियान बंध लगाकर दाहिने नथुने से धीरे-धीरे वायु निकाल दीजिये। फिर एक सैकण्ड बिना वायु के रहिये, तत्पश्चात् दाहिने नथुने से साँस खींचिये, फिर कुछ देर भीतर साँस रोक कर बाएँ नथुने से उसे बाहर निकाल दीजिये। इस प्रकार दो प्राणायाम हो जाते हैं। पुनः एक सेकण्ड बाह्य-कुम्भक करके पहिले की भाँति दुहराना चाहिये। इस प्रकार आरम्भ में 10 प्राणायाम करने चाहिये और प्रति नथुने से रेचक या पूरक करना हो, साँस छोड़ना या खींचना हो तो हाथ की अनामिका और कनिष्ठा उँगलियों से बाएँ नथुने को बन्द कर लें। इसी प्रकार जब बाएँ नथुने से वायु ग्रहण करनी या छोड़नी है तो दाहिने हाथ के अँगूठे से बाएँ हाथ के नथुने को बन्द करें।

(2) सूर्य-भेदन प्राणायाम;-

दाहिने नथुने से वायु खींचिये, यथाशक्ति कुम्भक कीजिए और बाएँ नथुने से बाहर निकाल दीजिये। इस प्रकार इस क्रिया को बार-बार करें। यही सूर्य भेदन प्राणायाम है। अनुलोम, विलोम, प्राणायाम में नथुनों से पूरक और रेचक होता है, परन्तु इसमें एक ही नथुने से (दाहिने में पूरक और बाएँ से रेचक) होता है। इस प्राणायाम से शरीर में उष्णता बढ़ती है, इसलिए यह शीत प्रकृति वालों के लिए अथवा शीत ऋतु में विशेष उपयोगी सिद्ध होता है।

(3) शीतकारी प्राणायाम;-

दोनों नथुने बन्द करके जिह्वा और होठों द्वारा वायु खींचें। यथाशक्ति रोके रहें और फिर धीरे-धीरे दोनों नथुनों से वायु को बाहर निकाल दें। दाँतों के बीच जिह्वा को बाहर होठों तक निकालकर होठों को फुलाकर मुख के बीच में सीत्कार करते हुए श्वास खींचने की क्रिया प्रधान होने के कारण इसे शीतकारी प्राणायाम कहते हैं। इस प्राणायाम में जिह्वा के सहारे वायु भीतर प्रवेश करती है। यह प्राणायाम शीतल है इसलिए उष्ण प्रवृति वालों के लिए अथवा ग्रीष्म ऋतु में यह विशेष उपयोगी है। यह शरीर को निर्विष बनाता है। कहते हैं कि काकभुशुण्डि जी ने इसी विधि से प्राणायाम में सिद्धि प्राप्त की थी।

(4) शीतली प्राणायाम;-

दोनों नथुने बन्द कर दीजिए। होठों को कौए की चोंच की तरह बनाकर जिह्वा को उनमें से थोड़ा बाहर निकाल दीजिए। फिर मुख द्वारा धीरे-धीरे वायु भीतर खींचिए। यथाशक्ति कुम्भक करके दोनों नथुनों से धीरे-धीरे वायु बाहर निकाल दीजिए, यह शीतली प्राणायाम कहलाता है। यह भी शीतल प्रकृति का है। रूप लावण्य में वृद्धि करता है।

(5) भस्त्रिका प्राणायाम;-

पद्मासन लगाकर बायीं नासिका से वेगपूर्वक जल्दी-जल्दी दस बार लगातार पूरक रेचक कीजिए। कुम्भक करने की आवश्यकता नहीं है। फिर ग्यारहवीं बार उसी नासिका से लम्बा पूरक कीजिए। यथाशक्ति कुम्भक करने के उपरान्त दाहिने नथुने से धीरे-धीरे वायु को बाहर निकाल दीजिए। फिर इसी क्रिया को दाहिने-नथुने से दुहुराइये। यह भस्त्रिका प्राणायाम है। आरम्भ में इसे पाँच-पाँच बार से अधिक नहीं करना चाहिये। यह सम-शीतोष्ण है। ब्रह्मग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थि तीनों का यह भेदन करता है। इसके द्वारा सुषुम्ना में से प्राण-तत्व की विहंगम गति ऊर्ध्व-प्रदेश की ओर बढ़ती है। इसी से अग्नितत्व प्रदीप्त होता है।इसे आरम्भ में अधिक संख्या में या अधिक वेग से नहीं करना चाहिये। क्योंकि ऐसा करने से Lungs पर आघात पहुँचने का भय रहता है।

(6) भ्रामरी प्राणायाम;-

पद्मासन लगाकर नेत्र बन्द करके बैठिये। भ्रकुटी के मध्य भाग में ध्यान कीजिए। जालंधर बंध लगाइये फिर नाक द्वारा भ्रमर नाद के समान गुञ्जन स्वर करते हुए पूरक कीजिए। पश्चात् तीन सेकण्ड कुम्भक करके धीरे-धीरे भ्रमर गुञ्जन ध्वनि के साथ रेचक कीजिए। यही भ्रमरी प्राणायाम हैं। कोई योगी दोनों नासापुटों से वायु खींचने और छोड़ने के पक्ष में है और कोई लोम-विलोम प्राणायाम की भाँति दाएँ-बाएँ नथुनों से इसे करने को अच्छा बताते हैं। कुम्भक की अवस्था में रुकी हुई वायु को मस्तिष्क मे बायीं ओर से दायीं ओर लगातार कई बार घुमाकर तथा रेचक करते हैं। इस वायु को भ्रमण कराने की क्रिया के कारण तथा भ्रमण-नाद जैसी धनि होने के कारण इस प्राणायाम का नाम भ्रामरी रखा गया है। यह मन की एकाग्रता एवं प्राण की स्थिरता के लिए लाभदायक है।

(7) मूर्छा प्राणायाम;-

दोनों हाथों के अँगूठे दोनों कानों में, दोनों तर्जनी दोनों आँखों पर, दोनों, मध्यमा नासिका पुटों पर और अनामिकायें तथा कनिष्ठकायें मुख पर रखकर मूल बंध तथा जालंधर बंध को आरम्भ से अन्त तक स्थिर करके बाएँ नथुने से पूरक करें। यथाशक्ति कुम्भक करके दहिने नथुने से रेचक करें। यह मूर्छा प्राणायाम हुआ। इस प्राणायाम में रेचक करते समय बन्द नेत्रों से भूमध्य भागों में ध्यान करने पर पञ्च तत्वों के रंग दिखाई पड़ते हैं। शरीर में जो तत्व अधिक होगा, उसी का रंग अधिक दृष्टिगोचर होगा। पृथ्वी का रंग पीला, जल का नीला , अग्नि का लाल, वायु का हरा और आकाश का सफेद होता है। इन तत्वों का शोधन करने से नादानुसंधान तथा समाधि में सुविधा रहती है।

(8) प्लाविनी प्राणायाम;-

पद्मासन से बैठिए। दोनों भुजाओं को ऊपर की ओर लम्बी तथा सीधी रखिए। अब दोनों नथुनों से पूरक कीजिए और सीधा लेट जाइए। लेटते समय दोनों हाथों को समेट कर तकिए की तरह सिर के नीचे लगा लीजिए, कुम्भक कीजिए और जब तक कुम्भक रहे, तब तक भावना कीजिए कि मेरी देह रुई के समान हल्की है। फिर बैठकर पूर्व स्थिति में आ जाइए और धीरे-धीरे दोनों नथुनों से वायु को बाहर निकाल दीजिए। यह प्लाविनी प्राणायाम