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क्या है प्राणमय कोश की प्राणायाम ,बंध और मुद्रा साधना?PART-01

प्राणमय कोश;-

02 FACTS;-

1`-प्राणमय कोश आत्मा पर चढ़ा हुआ दूसरा आवरण है। जब हम हमारे शरीर के बारे में सोचते हैं तो यह पृथ्वी तत्व अर्थात जड़ जगत का हिस्सा है। इस शरीर में प्राणवायु का निवास है। प्राण के अलावा शरीर में पाँचों इंद्रिया हैं जिसके माध्यम से हमें 'मन' और मस्तिष्क के होने का पता चलता हैं। मन के अलावा और भी सूक्ष्म चीज होती है जिसे बुद्धि कहते हैं जो गहराई से सब कुछ समझती और अच्छा-बुरा जानने का प्रयास करती है, इसे ही 'सत्यज्ञानमय' कहा गया है।केवल मानना नहीं ..यदि यह जान लिया है कि मैं आत्मा हूँ शरीर नहीं, प्राण नहीं, मन नहीं, विचार नहीं तब ही मोक्ष का द्वार ‍खुलता है। ऐसी आत्मा 'आनंदमय' कोश में स्थित होकर मुक्त हो जाती है।अन्नमय कोश खाने-सोने, काम करने जैसे प्रयोजन पूरे करता है। इसके भीतर जो ऊर्जा, स्फूर्ति, उमंग काम करती है वह प्राण है। प्राण से ही शरीर चलता और जीवित रहता है। जिसका यह कोश जितना समर्थ है वह उतना ही प्रतापी पराक्रमी, साहसी प्रतीत होगा। उसका बढ़ा-चढ़ा चुम्बकत्व दूसरों का सहयोग, सद्भाव अनायास ही आकर्षित करता रहेगा। ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी व्यक्तियों में यही प्राण प्रखरता आलोकित रहती है।

2-स्थूल अन्नमय कोश के कण-कण में प्राण ऊर्जा संव्याप्त है, पर उसका केन्द्र संस्थान प्रवेश द्वार जननेन्द्रिय मूल में अवस्थित मूलाधार चक्र है। इसकी उमंगें कामेच्छा के रूप में मन को और रति कर्म की ललक बनकर शरीर को उत्तेजित करती रहती है। इसी केन्द्र के रस-रज वीर्य के अन्तर्गत छोटे-छोटे कीटाणुओं में समूचे मनुष्य की आकृति-प्रवृति बीज रूप में विद्यमान रहती है।इसी को कला केन्द्र कहा जाता है। सौन्दर्य बोध से लेकर उल्लास भरे भविष्य की आशा यही से प्रकट होती है। अब इस सूक्ष्म सत्ता के प्रभाव भौतिक विज्ञान के स्थूल उपकरणों की पकड़ में भी आने, लगे हैं। रूस के वैज्ञानिक सेम्योन किर्लियान ने एक ऐसी फोटोग्राफी का आविष्कार किया जो मनुष्य के इर्द-गिर्द होने वाली विद्युतीय हलचलों /Power movements का भी छायांकन करती है। इससे प्रतीत होता है कि स्थूल शरीर के साथ-साथ सूक्ष्म शरीर की भी सत्ता विद्यमान है और वह ऐसे पदार्थो से बनी है जो इलेक्ट्रनों से बने ठोस पदार्थ की अपेक्षा भिन्न स्तर की है और अधिक गतिशील भी। क्या है प्राणशक्ति ;-

02 FACTS;-

1-जैसे पंखा चलाने के लिए, बल्ब जलाने के लिए करंट चाहिए, वैसे ही जड़ पदार्थों से बने मानव शरीर को चलाने के लिए एक प्रकार की शक्ति चाहिए। उसका वर्णन हमारे शास्त्रों में प्राण शक्ति के नाम से आता है।विद्या , चतुराई, अनुभव , दूरदर्शिता , साहस , लगन , शौर्य , जीवनी शक्ति ओज , पुष्टि , पराक्रम पुरुषार्थ , महानता आदि नामों से इस आंतरिक शक्ति का परिचय मिलता है | आध्यात्मिक भाषा मे इसे प्राण-शक्ति कहते हैं | प्राण नेत्रों मे होकर चमकता है , चेहरे पर बिखरता फिरता है , हाव-भाव मे उसकी तरंगे बहती हैं | प्राण की गंध मे एक ऐसी विलक्षण मोहकता होती है जो दूसरों को विभोर कर देती है | प्राणवान स्त्री -पुरुष मन को ऐसे भाते हैं कि उन्हें छोड़ने को जी नहीं चाहता |प्राण शक्ति को एक प्रकार की सजीव शक्ति कहा जा सकता है जो समस्त संसार में वायु, आकाश, गर्मी एवं ईथर,-प्लाज्मा की तरह समायी हुई है। यह तत्व जिस प्राणी में जितना अधिक होता है। वह उतना ही स्फूर्तिवान, तेजस्वी, साहसी दिखाई पड़ता है। शरीर में व्यात इसी तत्त्व को जीवनी शक्ति अथवा ‘ओजस’ कहते हैं और मन में व्यक्त होने पर यह तत्त्व प्रतिभा ‘तेजस्’ कहलाता है। यह प्राणशक्ति ही है जो कहीं सौंदर्य में, कहीं वाणी की मृदुलता व प्रखरता में, कहीं प्रतिभा के रूप में, कहीं कला-कौशल व कहीं भक्ति भाव के रूप में देखी जाती है। यदि इस बहुमूल्य प्राणशक्ति को संरक्षित करने का ढंग समझा जा सके तो स्वयं को ऋद्धि-सिद्धि संपन्न-अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का स्वामी बनाया जा सकता है।

2-क्या है प्राण शक्ति को बढ़ाने की विधि?-

12 POINTS;-

1-प्राण शक्ति को बढ़ाने की विद्या को प्राणायाम कहा जाता है अर्थात प्राणों का विस्तार | 'प्राण' शक्ति एवँ सामर्थ्य का प्रतीक है | मानव शरीर के बीच जो अंतर् पाया जाता है , उसका कारण उसकी आतंरिक शक्ति है |तंत्र-सूत्र 47 कहता है..''अपनी प्राण शक्ति को मेरुदंड में ऊपर उठती एक केंद्र से दूसरे केंद्र की ओर गति करती हुई प्रकाश किरण समझो;और इस भांति तुममें जीवंतता का उदय होता है''।योग के अनेक साधन,अनेक उपाय इस विधि पर आधारित हैं। वास्तव में, मेरुदंड,रीढ़ तुम्हारे शरीर और मस्तिष्क दोनों का आधार है। तुम्हारा मस्तिष्क,तुम्हारा सिर तुम्हारे मेरुदंड का ही अंतिम छोर है। मेरुदंड पूरे शरीर की आधारशिला है। अगर मेरुदंड युवा है तो तुम युवा हो और अगर मेरुदंड बूढ़ा है तो तुम बूढ़े हो। सब कुछ इस मेरुदंड पर निर्भर है। अगर तुम्हारा मेरुदंड जीवंत है तो तुम्हारे मन -मस्तिष्क में मेधा होगी,चमक होगी। और अगर तुम्हारा मेरुदंड जड़ और मृत है तो तुम्हारा मन भी बहुत जड़ होगा। समस्त योग अनेक ढंगों से तुम्हारे मेरुदंड को जीवंत,युवा,ताजा और प्रकाशपूर्ण बनाने की चेष्टा करता है।

3-मेरुदंड के दो छोर हैं। उसके आरंभ में मूलाधार /काम केंद्र है और उसके शिखर पर सहस्रार ..जो सिर के ऊपर सातवां चक्र है। मेरुदंड का जो आरंभ है वह पृथ्वी से जुड़ा है;कामवासना तुम्हारे भीतर सर्वाधिक पार्थिव चीज है। तुम्हारे मेरुदंड के आरंभिक चक्र के द्वारा तुम Nature के संपर्क में आते हो,जिसे सांख्य प्रकृति कहता है ..पृथ्वी,पदार्थआदि। और अंतिम चक्र सहस्रार से तुम परमात्मा के संपर्क में होते हो।तुम्हारे अस्तित्व के ये दो ध्रुव/Two Poles हैं। पहला मूलाधार /काम केंद्र है,और दूसरा सहस्रार है। तुम्हारा जीवन या तो मूलाधार Based होगा या सहस्रार Based होगा। या तो तुम्हारी ऊर्जा काम केंद्र से बहकर पृथ्वी में वापस जाएगी,या तुम्हारी ऊर्जा सहस्रार से निकलकर अनंत आकाश में समा जाएगी। तुम सहस्रार से ब्रह्म में अथार्त परम सत्ता में प्रवाहित हो जाते हो।तुम मूलाधार काम केंद्र से पदार्थ जगत में प्रवाहित होते हो। ये दो प्रवाह , दो संभावनाएं हैं।जब तक तुम ऊपर की ओर विकसित नहीं होते,तुम्हारे दुख कभी समाप्त नहीं होंगे। तुम्हें सुख की झलकें मिल सकती हैं;लेकिन वे झलकें ही होंगी,और बहुत भ्रामक होंगी।

4-जब ऊर्जा ऊर्ध्वगामी होगी, सहस्रार पर पहुंचेगी,तो तुम परम आनंद को उपलब्ध हो जाओगे ..वही निर्वाण है। तब झलक नहीं मिलती,तुम आनंद ही हो जाते हो।योग और तंत्र की पूरी चेष्टा यह है कि कैसे ऊर्जा को मेरुदंड /रीढ़ के द्वारा ऊर्ध्वगामी बनाया जाए,कैसे उसे गुरुत्वाकर्षण के विपरीत गतिमान किया जाए। काम आसान है,क्योंकि वह गुरुत्वाकर्षण के विपरीत नहीं है। पृथ्वी सब चीजों को अपनी तरफ नीचे खींच रही है;तुम्हारी काम ऊर्जा को भी पृथ्वी नीचे खींच रही है।उदाहरण के लिए अंतरिक्ष यात्रियों ने यह अनुभव किया है कि जैसे ही वे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बाहर निकल जाते हैं,उनकी कामुकता बहुत क्षीण हो जाती है। जैसे -जैसे शरीर का वजन कम होता है,कामुकता विलीन हो जाती है।पृथ्वी तुम्हारी जीवन-ऊर्जा को नीचे की तरफ खींचती है,और यह स्वाभाविक है। क्योंकि जीवन ऊर्जा पृथ्वी से आती है। तुम भोजन लेते हो,और उससे तुम अपने भीतर जीवन ऊर्जा निर्मित कर रहे हो। यह ऊर्जा पृथ्वी से आती है,और पृथ्वी उसे वापस खींचती रहती है। प्रत्येक चीज अपने मूलस्रोत को लौट जाती है। और अगर यह ऐसे ही चलता रहा,अथार्त जीवन ऊर्जा फिर पीछे लौटती रही ,तो तुम जन्मों -जन्मों तक सर्किल में ऐसे ही घूमते रहोगे।

5-तुम इस ढंग से अनंत काल तक चलते रह सकते हो,यदि तुम अंतरिक्ष यात्रियों की तरह छलांग नहीं लेते। अंतरिक्ष यात्रियों की तरह तुम्हें छलांग लेनी है और सर्किल के पार निकल जाना है। तब पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का पैटर्न टूट जाता है। यह तोड़ा जा सकता है।यह कैसे तोड़ा जा सकता है, उसकी ही विधि हैं। ये विधि इस बात की फिक्र करती हैं कि कैसे ऊर्जा ऊर्ध्व गति करे,नये केंद्रों तक पहुंचे;कैसे तुम्हारे भीतर नई ऊर्जा का आविर्भाव हो और कैसे प्रत्येक गति के साथ वह तुम्हें नया मनुष्य बना दे। और जिस क्षण तुम्हारे सहस्रार से,कामवासना के विपरीत ध्रुव से तुम्हारी ऊर्जा मुक्त होती है,तुम मनुष्य नहीं रह गए;तब तुम इस धरती के न रहे,तब तुम भगवान हो गए।जब हम कहते हैं कि श्री राम या श्री कृष्ण भगवान हैं तो उसका यही अर्थ है। उनके शरीर तो हमारे जैसे ही हैं; वो भी रुग्ण होंगे और शरीर त्याग करेगे। उनके शरीरों में सब कुछ वैसा ही होता है जैसे तुम्हारे शरीरों में होता है। सिर्फ एक चीज उनके शरीरों में नहीं होती जो तुममें होती है;उनकी ऊर्जा ने गुरुत्वाकर्षण के पैटर्न को तोड़ दिया है। लेकिन वह तुम नहीं देख सकते;क्योंकि वह तुम्हारी आंखों के लिए दृश्य नहीं है।

6-लेकिन कभी-कभी जब तुम किसी Awakened की सन्निधि में बैठते हो तो तुम यह अनुभव कर सकते हो। अचानक तुम्हारे भीतर ऊर्जा का ज्वार उठने लगता है और तुम्हारी ऊर्जा ऊपर की तरफ यात्रा करने लगती है। तभी तुम जानते हो कि कुछ घटित हुआ है। केवल Awakened के सत्संग में ही तुम्हारी ऊर्जा सहस्रार की तरफ गति करने लगती है। वह इतने शक्तिशाली हैं कि पृथ्वी की शक्ति भी उनसे कम पड़ जाती है। उस समय पृथ्वी की ऊर्जा तुम्हारी ऊर्जा को नीचे की तरफ नहीं खींच पाती है। जिन लोगों ने श्री कृष्ण या जीसस की सन्निधि में इसका अनुभव लिया है,उन्होंने ही उन्हें भगवान कहा है। उनके पास ऊर्जा का एक भिन्न स्रोत है जो पृथ्वी से भी शक्तिशाली है। यह विधि इस पैटर्न को तोड्ने में बहुत सहयोगी है। लेकिन पहले कुछ बुनियादी बातें समझनी होंगी ।पहली बात कि अगर तुमने निरीक्षण किया होगा तो तुमने देखा होगा कि तुम्हारी काम ऊर्जा कल्पना के साथ गति करती है। सिर्फ कल्पना के द्वारा भी तुम्हारी काम ऊर्जा सक्रिय हो जाती है। सच तो यह है कि कल्पना के बिना वह सक्रिय नहीं हो सकती है। यही कारण है कि जब तुम किसी के प्रेम में होते हो तो काम ऊर्जा बेहतर काम करती है। क्योंकि प्रेम के साथ कल्पना प्रवेश कर जाती है। अगर तुम प्रेम में नहीं हो तो वह बहुत कठिन है;वह काम नहीं करेगी।

7-यदि कल्पना ऊर्जा को गतिमान करने में सहयोगी है, तो तुम सिर्फ कल्पना के द्वारा उसे चाहो तो ऊपर ले जा सकते हो और चाहो तो नीचे ले जा सकते हो। तुम अपने खून को कल्पना से गतिमान नहीं कर सकते; तुम शरीर में और कुछ कल्पना से नहीं कर सकते। लेकिन काम ऊर्जा कल्पना से गतिमान की जा सकती है; तुम उसकी दिशा बदल सकते हो।काम ऊर्जा के दो हिस्से हैं एक हिस्सा शारीरिक है और दूसरा मानसिक है। तुम्हारे शरीर में हरेक चीज के दो हिस्से हैं। तुम्हारे शरीर और मन की भांति ही तुम्हारे भीतर प्रत्येक चीज के दो हिस्से हैं : एक भौतिक है और दूसरा अभौतिक। तो भाव करो कि ऊर्जा, प्रकाश किरणें तुम्हारे काम केंद्र से उठकर प्रकाश की नदी की भांति नाभि केंद्र की ओर प्रवाहित हो रही हैं। तत्काल तुम अपने भीतर ऊपर उठती हुई ऊष्मा अनुभव करोगे, शीघ्र ही तुम्हारी नाभि गर्म हो उठेगी। तुम उस गरमाहट को अनुभव कर सकते हो; दूसरे भी उस गरमाहट को अनुभव कर सकते हैं। तुम्हारे भाव के द्वारा तुम्हारी काम ऊर्जा ऊर्ध्वगामी हो जाएगी, ऊपर को उठने लगेगी।

8-यह विभाजन इसीलिए जरूरी है, क्योंकि तुम्हारे लिए काम केंद्र को सीधे सहस्रार से जोडना कठिन होगा। तुम काम केंद्र के ऊपर के सभी विभाजन गिरा दे सकते हो; और ऊर्जा, जीवन शक्ति ..प्रकाश की भांति सीधे सहस्रार की ओर उठने लगेगी।जब तुम अनुभव करो कि अब नाभि पर स्थित दूसरा केंद्र प्रकाश का स्रोत बन गया है, कि प्रकाश किरणें वहां आकर इकट्ठी होने लगी हैं, तब हृदय केंद्र की ओर गति करो, और ऊपर बढ़ो। और जैसे -जैसे प्रकाश हृदय केंद्र पर पहुंचेगा,तो उसकी किरणें वहाँ इकट्ठी होने लगेंगी, वैसे-वैसे तुम्हारे हृदय की धड़कन बदल जाएगी, तुम्हारी श्वास गहरी होने लगेगी, और तुम्हारे हृदय में गरमाहट पहुंचने लगेगी। तब उससे भी और आगे, और ऊपर बढ़ो।संवेदनशीलता और अनुभूति पैदा करो। तभी तुम इस विधि का प्रयोग सरलता से कर सकोगे। ...''अपनी प्राण— शक्ति को मेरुदंड में ऊपर उठती एक केंद्र से दूसरे केंद्र की ओर गति करती हुई प्रकाश— किरण समझो; और इस भांति तुममें जीवंतता का उदय होता है।''और तब तुम्हें अपने भीतर जीवन-ऊर्जा के ऊपर उठने का अनुभव होगा।

9-स्मरण रहे कि जब भी तुम यह प्रयोग करो तो इस ऊर्जा को बीच में मत छोड़ो; उसे पूरा करो.. सहस्रार तक जाने दो। यह भी ध्यान रहे कि इस प्रयोग में कोई तुम्हें बाधा न पहुंचाए। अगर तुम इस ऊर्जा को कहीं बीच में छोड़ दोगे तो उससे तुम्हें हानि हो सकती है। इस ऊर्जा को मुक्त करना होगा ..तो उसे सिर तक ले जाओ, और भाव करो कि तुम्हारा सिर एक द्वार बन गया

है।सहस्रार को हजार पंखुड़ियों वाले कमल के रूप में चित्रित किया है। सहस्रार का यही अर्थ है ... सहस्रदल कमल का खिलना। तो धारणा करो कि हजार पंखुड़ियों वाला कमल खिल गया है, और उसकी प्रत्येक पंखुड़ी से यह प्रकाश ऊर्जा ब्रह्मांड में फैल रही है। यह फिर एक अर्थों में मिलन है; लेकिन प्रकृति के साथ नहीं,बल्कि परम के साथ। फिर एक आर्गाज्म घटित होता है।आर्गाज्‍म दो प्रकार का होता है। एक सेक्यूअल और दूसरा स्प्रिचुअल। सेक्यूअल आर्गाज्‍म निम्नतम केंद्र से आता है और स्प्रिचुअल उच्चतम केंद्र से। उच्चतम केंद्र से तुम उच्चतम से मिलते हो और निम्नतम केंद्र से निम्नतम से।ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी बनाओ और तब वह ध्यान बन जाता है।

10-लेकिन ऊर्जा को कहीं शरीर में, किसी बीच के केंद्र पर मत छोड़ो। ऐसे समय में प्रयोग करो जब कोई तुम्हें बाधा न दे, और ऊर्जा को किसी केंद्र पर न छोड़ना पड़े। अन्यथा वह केंद्र, जहां तुम ऊर्जा को छोड़ोगे घाव बन जाएगा और तुम्हें अनेक

1-श्वास को खींचने उसे अंदर रोके रखने और बाहर निकालने की एक विशेष क्रियापद्धति है। साधारण श्वास प्रश्वास प्रक्रिया में वायु के साथ वह प्राण भी इसी प्रकार आता जाता रहता है । किन्तु प्राणायाम विधि के अनुसार जब श्वास प्रश्वास क्रिया होती है तो वायु में से प्राण खींचकर खासतौर से उसे शरीर में स्थापित किया जाता है जैसे कि होटल में यात्री को व्यवस्थापूर्वक टिकाया जाता है ।योगशास्त्रों में षट्चक्र में सूर्यचक्र को बहुत अधिक महत्त्व दिया गया है ।मानव शरीर में प्रतिक्षण होती रहने वाली क्रिया प्रणाली का संचालन इसी के द्वारा होता है ।कुछ विद्वानों ने इसे पेट का मस्तिष्क नाम दिया है । यह सूर्य चक्र या सोलर प्लेक्सस Stomach के ऊपर हृदय की Heartbeat के पीछे Spinal Cord के दोनों ओर स्थित है । यह एक प्रकार की सफ़ेद और भूरि गद्दी से बना हुआ है ।

जैसे -जैसे तुम्हारा ध्यान गहराएगा वैसे -वैसे ऊर्जा ऊपर उठने लगेगी। और जब ऊर्जा ऊपर उठती है तो काम केंद्र अनुत्तेजित, शांत होने लगता है। और जब ऊर्जा बिलकुल सहस्रार पर पहुंचेगी तो काम केंद्र पर कोई उत्तेजना नहीं रहेगी; काम केंद्र बिलकुल स्थिर और शांत और बिलकुल शीतल हो जाएगा। अब उष्णता सिर में आ जाएगी और यह शारीरिक बात है। 11-जब काम केंद्र उत्तेजित होता है तो वह गरम हो जाता है। तुम उस गरमाहट को महसूस कर सकते हो ..वह शारीरिक है। लेकिन जब ऊर्जा ऊपर उठती है तो काम केंद्र बहुत ठंडा होने लगता है, और उष्णता सिर पर पहुंच जाती है। जब ऊर्जा सिर में पहुंचेगी तो तुम्हारा सिर घूमने लगेगा। कभी -कभी तुम्हें घबराहट भी होगी; क्योंकि पहली बार ऊर्जा सिर में पहुंची है, और तुम्हारा सिर उससे परिचित नहीं है।तुम्हें उस ऊर्जा के साथ सामंजस्य बिठाना पड़ेगा।तो डरो मत; उस बेहोशी के बाद

तुम इतने ताजा अनुभव करोगे कि तुम्हें लगेगा कि मैं पहली बार गहनतम नींद से गुजरा हूं। योग में इसका एक विशेष नाम है.. 'योग तंद्रा '। यह बहुत गहरी नींद है; इसमें तुम अपने गहनतम केंद्र पर सरक जाते हो। लेकिन अगर तुम्हारा सिर गरम हो जाए तो वह भी शुभ लक्षण है। ऊर्जा को मुक्त होने दो। भाव करो कि तुम्हारा सिर कमल के फूल की भांति खिल रहा है और ऊर्जा ब्रह्मांड में मुक्त हो रही है, फैलती जा रही है। और जैसे- जैसे ऊर्जा मुक्त होगी, तुम्हें शीतलता का अनुभव होगा।

12-इस उष्णता के बाद जो शीतलता आती है, उसका तुम्हें कोई अनुभव नहीं है। लेकिन विधि को पूरा प्रयोग करो; उसे कभी आधा -अधूरा मत छोड़ो।’ मुक्ति को परम पुरुषार्थ माना गया है | संसार के अन्य सुख साधनों को प्राप्त करने के लिए जितने विवेक , प्रयत्न और पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है , मुक्ति के लिए उससे कम नहीं बल्कि अधिक की ही आवश्यकता है | भगवान अपनी ओर से ना किसी को बंधन देते हैं ना मुक्ति | दूसरा ना कोई स्वर्ग ले जा सकता है ना नर्क मे , हम स्वयं अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर जिस दिशा मे चलें उसी लक्ष्य पर जा पहुचते हैं |प्राण द्वारा ही यह श्रद्धा , निष्ठा , दृढ़ता , एकाग्रता और भावना प्राप्त होती है जो भव बंधनों को काटकर आत्मा को परमात्मा से मिलाती है |


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प्राणमय कोष के अंतर्गत तीन साधन प्रधान रूप से आते हैं।इन तीनो का प्राणमय कोश की साधना में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है ।

1-प्राणायाम

2-बंध

3-मुद्रा

क्या है प्राणायाम?-

08 FACTS;-

1-श्वास को खींचने उसे अंदर रोके रखने और बाहर निकालने की एक विशेष क्रियापद्धति है।साधारण श्वास प्रश्वास प्रक्रिया में वायु के साथ वह प्राण भी इसी प्रकार आता जाता रहता है। किन्तु प्राणायाम विधि के अनुसार जब श्वास प्रश्वास क्रिया होती है तो वायु में से प्राण खींचकर खासतौर से उसे शरीर में स्थापित किया जाता है जैसे कि होटल में यात्री को व्यवस्थापूर्वक टिकाया जाता है ।योगशास्त्रों में षट्चक्र में सूर्यचक्र को बहुत अधिक महत्त्व दिया गया है ।मानव शरीर में प्रतिक्षण होती रहने वाली क्रिया प्रणाली का संचालन इसी के द्वारा होता है ।कुछ विद्वानों ने इसे पेट का मस्तिष्क नाम दिया है । यह सूर्य चक्र या सोलर प्लेक्सस Stomach के ऊपर हृदय की Heartbeat के पीछे Spinal Cord के दोनों ओर स्थित है । यह एक प्रकार की सफ़ेद और भूरि गद्दी से बना हुआ है ।

2-सूर्य चक्र केंद्र पर यदि जरा कड़ी चोट लग जाये तो मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो जाती है।योगशास्त्र इस केंद्र को प्राणकोश मानता है और कहता है कि वहीँ से निकलकर एक प्रकार का मानवी विद्युत् प्रवाह सम्पूर्ण नाड़ियो में प्रवाहित होता है । ओजस शक्ति इस संस्थान में रहती है।प्राणायाम द्वारा सूर्य चक्र की एक प्रकार की हलकी -हलकी मालिश होती है जिससे उसमे गर्मी तेजी और उत्तेजना का संचालन होता है और उसकी क्रियाशीलता बढ़ती है। प्राणायाम से Lungs में वायु भरती है और वे फूलते हैं और यह फूलकर सूर्यचक्र की परिधि में स्पर्श करता है। बार बार स्पर्श करने से जिस प्रकार काम सेवन वाले अंगो में उत्तेजना उत्पन्न होती है उसी प्रकार प्राणायाम द्वारा Lungs से सूर्य चक्र का स्पर्श होना वहां एक सनसनी उत्तेजना और हलचल पैदा करता है। यह उत्तेजना व्यर्थ नहीं जाती वरन सम्बंधित सारे अंग प्रत्यंगों को जीवन और बल प्रदान करती है, जिससे शारीरिक और मानसिक उन्नतियों का द्वार खुल जाता है ।

3-मेरुदंड के दाहिने, बाएं दोनों ओर नाड़ी गुच्छकों/Ganglionकी दो श्रृंखलाएं चलती हैं, इन्हीं को योग में इडा और पिंगला कहा गया है। ये गुच्छक आपस में सम्बंधित हैं और इन्हीं में सर, गले, छाती, पेट आदि के गुच्छक भी आकर शामिल हो गए हैं । अन्य अनेक नाड़ी तंतुओं का भी वहां जमघट है । इनका प्रथम विभाग जिसे Cerebrospinal Division कहते हैं ..इसी संस्थान से असंख्य बहुत ही बारीक Brown Fibers निकालकर रुधिर नाड़ियों में फ़ैल गए हैं और अपने अंदर रहने वाली Electric Powerसे भीतरी Body Parts को संचालित किये रहते हैं । प्राणायाम साधना में इन इडा पिंगला नाड़ियो को नियत विधि के अनुसार बलवान बनाया जाता है , जिससे उनसे सम्बंधित शरीर की क्रिया के विकार दूर होकर आनंदमयी स्वस्थता प्राप्त हो सके ।प्राणायाम विज्ञानं का सबसे पहला और आरंभिक पाठ यही है कि हमें पूरी तरह गहरी साँस लेनी चाहिए । ऐसी आदत डालने का प्रयत्न करना चाहिए कि सदैव इस प्रकार सांस ली जाए कि वायु से पूरे फेफड़े भर जाएँ। यह कार्य झटके से या उतावाली में नहीं होना चाहिए। धीरे धीरे इस प्रकार पूरी साँस खींचनी चाहिए कि छाती भरपूर चौड़ी हो जाये और फिर उसी क्रम में धीरे धीरे वायु को बाहर निकाल देना चाहिए ।

4- योगदर्शन साधनापाद के सूत्र 52, 54 में बताया गया है कि प्राणायाम से अविद्या का अन्धकार दूर होकर ज्ञान की ज्योति प्रकट होती और मन एकाग्र होने लगता है। ऐसी गाथाएं भी सुनी जाती हैं कि प्राण को वश में करके योगी लोग मृत्यु को जीत लेते हैं और जब तक चाहें वे जीवित रह सकते हैं । प्राण शक्ति से अपने और दूसरे के रोगों को नष्ट करने का एक अलग विज्ञान है। यह लाभ कभी कभी इतने विचित्र होते हैं कि उन पर आश्चर्य करना पड़ता है। प्राणायाम आत्मोन्नति की महत्वपूर्ण साधना है । चित्त की एकाग्रता, स्थिर दृढ़ता आदि मानसिक गुणों की मात्रा में प्राण साधना के साथ साथ ही वृद्धि हो जाती है ।प्राण तत्व का वायु से विशेष सम्बन्ध है ।सांस को ठीक तरह से लेने न लेने पर प्राण की मात्रा का घटना बढ़ना निर्भर रहता है। इसलिए कम से कम सांस लेने के सही तरीके से प्रत्येक को परिचित होना चाहिए। श्वास जीवन है ;लेकिन लोग इसकी उपेक्षा कर देते हैं,वे इसकी चिंता नहीं लेते, और इस पर बिलकुल ध्यान नहीं देते।और तुम्हारे जीवन में जो भी बदलाहट आयेगी वह श्वास में बदलाहट द्वारा ही आयेगी।

5-श्वास की नली की मांस-पेशियां एक विशेष ढंग से बनी होती हैं और यदि तुम गलत ढंग से श्वास लेते रहे हो- और लगभग सभी लोग गलत ढंग से लेते हैं- तो मांस-पेशियां जम जाती हैं। अब इन्हें अपने प्रयत्न करके बदलने में बहुत समय व्यर्थ जायेगा। अगर आप सही सांस लेते हैं तो आपका "प्राणमय कोष" स्वस्थ, अखंड और प्राणवान रहता है।इस तरह का व्यक्ति कभी नहीं थकता।उसके पास "छलकती हुई ऊर्जा" है।यह ऊर्जा प्राणमय कोष से आती है।प्राकृतिक सांस लेने को समझना जरूरी है। बच्चा स्वाभाविक रूप से सांस लेता है, और निश्चित रूप से अधिक प्राण और अधिक "ची- ऊर्जा" सांस के द्वारा लेता है, और यह उसके पेट में जमा होती है। पेट इकट्ठा करने की जगह है, भंडार है। जब एक बच्चा सांस लेता है, उसकी छाती पूरी तरह से अप्रभावित होती है। उसका पेट ऊपर और नीचे होता है। मानो वह पेट से सांस ले रहा है। सभी बच्चों का पेट निकला होता है, वह उनके पेट से सांस लेने की वजह से है और वह ऊर्जा का भंडार है।यह सांस लेने का सही तरीका है, ध्यान रहे, अपनी छाती का बहुत ज्यादा उपयोग नहीं करना है। कभी-कभी यह आपातकालीन समय में किया जा सकता है। आप अपने जीवन को बचाने के लिए दौड़ रहे हैं, तब छाती का उपयोग किया जा सकता है।

6- एक बात याद रखनी जरूरी है कि छाती आपात स्थितियों के लिए ही होती है क्योंकि आपात स्थिति में स्वाभाविक रूप से सांस लेना मुश्किल है; क्योंकि अगर आप स्वाभाविक रूप से सांस लेते हैं तो आप इतने शांत और मौन होते हो कि आप दौड़ नहीं सकते, लड़ नहीं सकते। आप इतने शांत और केंद्रित होते हैं कि आप अपने खुद को बचाने के लिए सक्षम नहीं होंगे। तो प्रकृति ने एक आपातकालीन उपकरण दिया है, छाती एक आपातकालीन उपाय है। जब आप पर एक बाघ हमला करता है, तो आपको प्राकृतिक सांस छोड़ देनी होती है और आप को छाती से सांस लेनी होती है। तब दौड़ने के लिए , लड़ने के लिए, ऊर्जा को तेजी से जलाने के लिए आपके पास अधिक क्षमता होगी। और आपात स्थिति में केवल दो ही विकल्प होते हैं: भाग जाना या लड़ाई करना। दोनों के लिए बहुत उथली लेकिन तीव्र ऊर्जा की जरूरत है ।अगर आप लगातार सीने से सांस लेते हैं, आप हमेशा तनावयुक्त और भयभीत होंगे क्योंकि सीने से सांस लेना खतरनाक परिस्थितियों के लिए ही होता है।'एक बच्चे

को देखें और वही प्राकृतिक सांस है, और उसी तरह सांस लें । जब आप सांस लें तब पेट ऊपर आए और जब आप सांस छोड़े तब पेट नीचे जाए और यह एक लय हो।

7-अब सवाल है कि जब सांस लंग्स से लेते हैं तो पेट अंदर या बाहर क्यों जाता है? इसका जवाब है कि पेट और लंग्स के बीच होता है डायफ्राम। जब लंग्स पर दबाव पड़ता है तो डायफ्राम पर भी दबाव होता है और उसका प्रेशर पेट पर पड़ता है। यही वजह है कि लंग्स से सांस लेने या निकालने पर पेट बाहर और अंदर होता है।यदि तुम उदास होते हो, तो तुम्हारे श्वसन की लय अलग होती है। जब भी तुम उदास होते हो, तब अपनी सांस को देखना ..कितना समय तुम सांस खींचने में लेते हो और फिर कितना समय तुम सांस बाहर छोड़ने में लेते हो। जरा इसे ध्यान में लो और भीतर गिनो ..एक, दो, तीन, चार, पांच... .तुम पांच तक या लगभग इतना ही गिनते हो और सांस भीतर खींचना समाप्त हो जाता है। फिर, जब तुमने एक से लेकर दस तक गिन लिया है, सांस बाहर छोड़ना समाप्त हो जाता है। इसे सूक्ष्म तौर पर ही देखना, जिससे कि तुम अनुपात को जान सको। और फिर, जब भी तुम प्रसन्नता अनुभव करो, तुरंत वही उदासी वाला अनुपात आजमाओ—पांच, दस, या जो भी। प्रसन्नता विलीन हो जायेगी।फिर जब कभी तुम उदास होगे, उसी ढांचे को आजमाओ। तुरंत उदासी गायब हो जायेगी। क्योंकि मन शून्य में नहीं जी सकता। यह क्रमबद्धता में जीवित रहता है, और श्वास क्रिया मन के लिए गहनतम क्रमबद्धता है।

8-सांस विचार है ;यदि तुम सांस लेना बंद करते हो, तत्काल ही विचार समाप्त हो जाते हैं। इसका एक पल के लिए परीक्षण करो, सांस लेना बंद करो। सोचने की प्रक्रिया फौरन भंग हो जाती है। वह प्रक्रिया टूट जाती है क्योकि विचार दृश्य श्वसन

प्रक्रिया का अदृश्य छोर है।प्राणायाम विज्ञान की दूसरी शिक्षा नाक से सांस लेना है । यद्यपि मुंह से भी साँस ली जा सकती है पर वह इतनी उपयोगी नहीं हो सकती ।जकाम और सर्दी के रोगों के बारे में भी डाक्टरी जाँच का यही निष्कर्ष है कि मुह खोलकर साँस लेने से इसका प्रकोप विशेष रूप से होता है। और भी अनेक छोटे बड़े रोग इस आदत के कारण होते देखे गए हैं ।प्राणायाम के अभ्यासियों को योगियों की यह कड़ी ताकीद होती है कि वे सदा नाक से सांस लिया करें। यदि नासिका भाग में कुछ रुकावट हो जिसके कारण मुंह से साँस लेने के लिए बाध्य होना पड़ता है तो नासिका रंध्रों की सफाई कर लेनी चाहिए।पूरी साँस लेने का अभ्यास डालने से छाती की चौड़ाई बढ़ती है, फेफड़ों की मजबूती और वजन में वृद्धि होती है, हृदय की कमजोरी में सुधार होकर रक्तसंचार की क्रिया में चैतन्यता दिखाई देने लगती है। /////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////// प्राणों के विस्तार की क्रियाएँ;-

02 FACTS;-

1-साँस निकलने को रेचक, खींचने को पूरक, और रोके रहने को कुम्भक कहते हैं। कुम्भक के दो भेद हैं । सांस को भीतर रोके रहना अंतः कुम्भक और खाली करके बिना साँस रहना बाह्य कुम्भक कहलाता है। रेचक और पूरक में समय बराबर

लगना चाहिए पर कुम्भक में उसका आधा समय ही पर्याप्त है ।पूरक करते समय भावना करनी चाहिए कि मैं जन शून्य लोक में अकेला बैठा हूँ और मेरे चारो ओर विद्युत् जैसी चैतन्य जीवनी शक्ति का समुद्र लहरे ले रहा है। साँस द्वारा वायु के साथ साथ प्राण शक्ति को मैं अपने अंदर खींच रहा हूँ।अंतः कुम्भक करते समय भावना करनी चाहिए कि उस चैतन्य प्राण शक्ति मैं अपने भीतर भरे हूँ। समस्त नस नाड़ियो में, अंग प्रत्यंग में वह शक्ति स्थिर हो रही है। उसे सोखकर देह का रोम रोम चैतन्य, प्रफुल्लित, सतेज एवं परिपुष्ट हो रहा है।रेचक करते समय भावना करनी चाहिये कि शरीर में संचित मल, रक्त में मिले विष, मन में धंसे हुए विकार साँस छोड़ने पर वायु के साथ साथ बाहर निकाले जा रहे हैं ।बाह्य कुम्भक करते समय भावना करनी चाहिए कि अंदर के दोष साँस के द्वारा बाहर निकलकर भीतर का दरवाजा बंद कर दिया गया है, ताकि वे विकार वापस न लौटने पाएं।इन भावनाओ के साथ प्राणकर्षण प्राणायाम करना चाहिए।आरम्भ में निम्न प्राणायाम करे फिर क्रमशः सुविधानुसार बढ़ाते जाएँ। EXERCISE ONE प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर साधना के लिए किसी शांतिदायक स्थान पर आसन बिछाकर बैठिये, दोनों हाथो को घुटनो पर रखिये, मेरुदंड सीधा रहे, नेत्र बंद कर लीजिये।फेफड़ों में भरी हुई हवा बाहर निकाल दीजिये, अब धीरे धीरे नासिका द्वारा साँस लेना आरम्भ कीजिये। जितनी अधिक मात्रा में भर सके फेफड़ों में हवा भर लीजिये। अब कुछ देर उसे भीतर ही रोके रहिये। इसके पश्चात् साँस को बाहर धीरे धीरे नासिका द्वारा निकालना आरम्भ कीजिये। हवा को जितना अधिक खाली कर सकें ..कीजिये। अब कुछ देर साँस को बाहर ही रोक दीजिये अर्थात बिना सांस के ही रहिये। इसके बाद पूर्ववत् वायु को खींचना आरम्भ कीजिये ।यह एक प्राणायाम हुआ । EXERCISE TWO;- कहीं एकांत में जाओ। समतल भूमि पर नरम बिछौना बिछाकर पीठ के बल लेट जाओ, मुंह ऊपर की ओर रहे। पैर कमर छाती सर सब एक सीध में रहें । दोनों हाथ सूर्य चक्र पर (आमाशय का वह स्थान जहाँ पसलियां और पेट मिलते हैं ) रहें। मुंह बंद रखो। शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दो, मानो वह कोई निर्जीव बस्तु है और उससे तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं हैं। कुछ देर शिथिलता की भावना मारने पर शरीर बिलकुल ढीला पड़ जायेगा।अब धीरे धीरे नाक से साँस खींचना आरम्भ करो और दृढ शक्ति के साथ भावना करो कि विश्वव्यापी महान प्राण भण्डार में से मैं स्वच्छ प्राण साँस के साथ खीच रहा हूँ और वह प्राण मेरे रक्त प्रवाह तथा समस्त नाड़ी तंतुओ में प्रवाहित होता हुआ सूर्य चक्र में इकठ्ठा हो रहा है। इस भावना को कल्पना लोक में इतनी दृढ़ता के साथ उतारो कि प्राण शक्ति की बिजली जैसी किरणें नासिका द्वारा देह में घूमती हुई चित्रवत दिखने लगें तथा उसमे प्राण प्रवाह बहता हुआ आये। भावना की जितनी अधिकता होगी उतनी ही अधिक मात्रा में तुम प्राण खीच सकोगे । EXERCISE THREE;- फेफड़ों को वायु से अच्छी तरह भर लो और पांच से दस सेकेण्ड तक उसे रोके रहो। आरम्भ में पांच सेकेण्ड काफी हैं, पश्चात अभ्यास बढ़ने पर दस सेकेण्ड तक रोक सकते हैं । साँस के रोकने के समय अपने अंदर प्रचुर परिमाण में प्राण भरा हुआ है, यह अनुभव करना चाहिए । अब वायु को धीरे धीरे बाहर निकालो । निकालते समय ऐसा अनुभव करो कि शरीर के सारे दोष, रोग और विष इनके द्वारा निकाल बाहर किये जा रहे हैं । दस सेकेण्ड तक बिना हवा के रहो और पूर्ववत् प्राणकर्षण प्राणायाम करना आरम्भ कर दो। स्मरण रखो कि प्राणाकर्षण का मूलतत्व साँस खींचने छोड़ने में नहीं वरन् आकर्षण की उस भावना में है, जिसके अनुसार अपने शरीर में प्राण का प्रवेश होता हुआ चित्रवत दिखाई देने लगता है। NOTE;- इस प्रकार श्वास - प्रश्वास की क्रियाएँ दस मिनट से लेकर धीरे धीरे आधे घंटे तक बढ़ा लेनी चाहिये ।श्वास द्वारा खींचा हुआ प्राण सूर्य चक्र में जमा होता जा रहा है , इसकी विशेष रूप से भावना करो।मुंह द्वारा सांस छोड़ते समय आकर्षित प्राण को छोड़ने की भी कल्पना करने लगें , तो यह सारी क्रिया व्यर्थ जायेगी और कुछ लाभ न मिलेगा । ठीक तरह से प्राणकर्षण करने पर सूर्य चक्र जाग्रत होने लगता है । ऐसा प्रतीत होता है कि पसलियों के जोड़ और आमाशय के स्थान पर जो गड्ढा है , वह सूर्य के सामान एक छोटा सा प्रकाश बिंदु मानव नेत्रों से दिख रहा है। यह गोला आरम्भ में छोटा , थोड़े प्रकाश का और धुंधला मालुम देता है, किन्तु जैसे जैसे अभ्यास बढ़ने लगता है , वैसे वैसे साफ़, स्वच्छ, बड़ा और प्रकाशवान होता है। जिनका अभ्यास बढ़ा- चढ़ा है उन्हें आँख बंद करते ही अपना सूर्य चक्र साक्षात् सूर्य की तरह तेजपूर्ण दिखाई देने आगत है। वह प्रकाशित तत्त्व सचमुच प्राण शक्ति है। इसके शक्ति से कठिन कार्यों में अद्भुत सफलता प्राप्त होगी। अभ्यास पूरा करके उठ बैठो । तुम्हे मालूम पड़ेगा कि रक्त का दौरा तेजी से हो रहा है और सारे शरीर में एक बिजली से सी दौड़ रही है।अभ्यास के उपरान्त कुछ देर शांतिमय स्थान में बैठना चाहिए । अभ्यास से उठकर एकदम किसी काम में जुट जाना, स्नान, भोजन आदि करना निषिद्ध है। दस प्राणों का संशोधन ;-

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