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क्या है चौंसठ कलाओं और चन्द्रमा की सोलह कलाओं का अर्थ ?

क्या है चौंसठ कलाओं का अर्थ?-

05 FACTS;-

1-प्राचीन काल में भारतीय शिक्षा-क्रम का क्षेत्र बहुत व्यापक था। शिक्षा में कलाओं की शिक्षा भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती थीं ।भारतीय साहित्य में कलाओं की अलग-अलग गणना दी गयी है।कला का लक्षण हैं कि जिसको एक मूक (गूँगा) व्यक्ति भी, जो वर्णोच्चारण भी नहीं कर सकता, कर सके, वह 'कला' है।काम और अर्थ कला के ऊपर आश्रय पाते हैं।राम 12 कलाओं के ज्ञाता थे तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं के ज्ञाता हैं। चंद्रमा की सोलह कलाएं होती हैं। सोलह श्रृंगार के बारे में भी आपने सुना होगा। उपनिषदों अनुसार 16 कलाओं से युक्त व्यक्ति ईश्‍वरतुल्य होता है। जो व्यक्ति मन और मस्तिष्क से अलग रहकर बोध करने लगता है वहीं 16 कलाओं में गति कर सकता है।कुमति, सुमति, विक्षित, मूढ़, क्षित, मूर्च्छित, जाग्रत, चैतन्य, अचेत आदि शब्दों का संबंध हमारे मन और मस्तिष्क से होता है। भारतीय साहित्य में 'प्रबन्ध कोश' तथा 'शुक्रनीति सार' में कलाओं की संख्या 64 है।

2-'ललितविस्तर' में तो 86 कलाएँ गिनायी गयी हैं।परन्तु शैव तन्त्रों में चौंसठ कलाओं का उल्लेख मिलता है।लीला-पुरुषोत्तम-योगेश्वर श्रीकृष्ण चौसठ कला सम्पन्न माने जातें है। ये 64 कलाएं नाम भेद से अन्य ग्रन्थों में भी उल्लेखित है।जीवन को सुखपूर्वक जीने के लिए, जिन्दगी को बेहतर बनाने के लिए हुनर व कौशल की आवश्यकता होती है। यह कला बुद्धि, विवेक व अभ्यास से आती है। धन-सम्पदा, साधन-सुविधाएँ उसके उपार्जन में सहायक तो हो सकती हैं किन्तु सब कुछ नहीं। इसीलिए कलाहीन को असभ्य कहा जाता है। ऐसा व्यक्ति कल्पनाहीन होता है, रूचिसंपन्न नहीं होता।मन पर संयम, पूर्ण स्वास्थ्य और सच्ची प्रसन्नता के लिए जीने की कला का जानना जरूरी है। भोगमात्र को जीवन का लक्ष्य मानने वाले यह कला नहीं सीख सकते। जीवन जीने की कला का अर्थ है कि हमारे हर काम में उत्कृष्टता हो ।

3-इन चौंसठ कलाओं को मुख्यतः पाँच वर्गों में विभाजित किया जा सकता है -

1. चारू (ललितकला):-

नृत्य, गीत, वाद्य, चित्रकला, प्रसाधन आदि कलाएँ चारू अर्थात् ललितकला के अन्तर्गत आती हैं।

2. कारू (उपयोगी कलाएँ):-

नाना प्रकार के व्यंजन बनाने की कला, कढ़ाई, बुनाई, सिलाई की कला तथा कुर्सी, चटाई आदि बुनने की कलाएँ “कारू” वर्ग के अन्तर्गत आती हैं।

3. औपनिषदिक कलाएँ:-

औपनिषदिक कलाओं के अन्तर्गत वाजीकरण, वशीकरण, मारण, मोहन, उच्चाटन, यन्त्र, मन्त्रों एवं तन्त्रों के प्रयोग, जादू-टोना आदि से सम्बन्धित कलाओं का परिगणन किया जा सकता है।

4. बुद्धिवैचक्षण्य कलाएँ ;-

इसके अन्तर्गत पहेली बुझाना, अन्त्याक्षरी, समस्यापूत्र्ति, क्लिष्ट काव्य रचना, शास्त्रज्ञान, भाषाज्ञान, वाक्पटुता, भाषणकला, भेड़-मुर्गा-तीतर-बटेर आदि को लड़ाने की कला, तोता-मैनादि पक्षियों को बोली सिखाने की कला आदि का समावेश होता है।

5. क्रीड़ा-कौतुक:-

क्रीड़ाकौतुक के अन्तर्गत द्यूतक्रीड़ा, शतरंज, व्यायाम, नाट्यकला, जलक्रीड़ा, आकर्षक्रीड़ा आदि से सम्बन्धित कलाओं का परिगणन किया जा सकता है।

4-निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि चौंसठ कलाएँ न केवल प्राचीन काल में उपयोगी रही हैं अपितु वर्तमान काल में भी इसकी उपयोगिता और आवश्यकता बरकरार है।भारतवर्ष की इन प्राचीन कलाओं को विशिष्ट रूप से संरक्षित करते हुए भावी पीढ़ी को इसे सिखाने की जिम्मेदारी भी हमारी बनती है। कला हमारे अन्दर कर्मण्यता का भाव जगाती है ,हमें कर्मशील बनाती है। इसलिए कर्म को पूजा का पर्याय कहा जाता है। यदि शिक्षा, ज्ञान, अनुभव तथा नया व अच्छा सीखने की ललक हो तो जीवन जीने की कला आसानी से सीखी जा सकती है। इसके लिए सद्गुणों व सदाचरण की आवश्यकता पड़ती है। दुर्गुणों से दूर रहकर व्यसनों को तिलांजलि देनी पड़ती है।

5-64 कलायें निम्नलिखित हैं-

1- गानविद्या

2- वाद्य - भांति-भांति के बाजे बजाना

3- नृत्य

4- नाट्य

5- चित्रकारी

6- बेल-बूटे बनाना

7- चावल और पुष्पादि से पूजा के उपहार की रचना करना

8- फूलों की सेज बनान

9- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना

10- मणियों की फर्श बनाना

11- शय्या-रचना (बिस्तर की सज्जा)

12- जल को बांध देना

13- विचित्र सिद्धियाँ दिखलाना

14- हार-माला आदि बनाना

15- कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना

16- कपड़े और गहने बनाना

17- फूलों के आभूषणों से शृंगार करना

18- कानों के पत्तों की रचना करना

19- सुगंध वस्तुएं-इत्र, तैल आदि बनाना

20- इंद्रजाल-जादूगरी

21- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना

22- हाथ की फुर्ती के काम

23- तरह-तरह खाने की वस्तुएं बनाना

24- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना

25- सूई का काम

26- कठपुतली बनाना, नाचना

27- पहेल

28- प्रतिमा आदि बनाना

29- कूटनीति

30- ग्रंथों के पढ़ाने की चातुरी

31- नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना

32- समस्यापूर्ति करना

33- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना

34- गलीचे, दरी आदि बनाना

35- बढ़ई की कारीगरी

36- गृह आदि बनाने की कारीगरी

37- सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा

38- सोना-चांदी आदि बना लेना

39- मणियों के रंग को पहचानना

40- खानों की पहचान

41- वृक्षों की चिकित्सा

42- भेड़ा, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति

43- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना

44- उच्चाटन की विधि

45- केशों की सफाई का कौशल

46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना

47- म्लेच्छित-कुतर्क-विकल्प...वस्तुतः यह बीजलेखन (क्रिप्टोग्राफी) और गुप्तसंचार की कला है।ऐसे संकेत से लिखना, जिसे उस संकेत को जानने वाला ही समझे।

48- विभिन्न देशों की भाषा का ज्ञान

49- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना

50- नाना प्रकार के मातृकायन्त्र बनाना

51- रत्नों को नाना प्रकार के आकारों में काटना

52- सांकेतिक भाषा बनाना

53- मन में कटक रचना करना

54- नयी-नयी बातें निकालना

55- छल से काम निकालना

56- समस्त कोशों का ज्ञान

57- समस्त छन्दों का ज्ञान

58- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या

59- द्यू्त क्रीड़ा

60- दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण

61- बालकों के खेल

62- मन्त्रविद्या

63- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या

64- बेताल आदि को वश में रखने की विद्या

क्या है चन्द्रमा की सोलह कला ?-

07 FACTS;-

1-प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तीन अवस्थाओं का ही बोध होता है:- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। जगत तीन स्तरों वाला है- 1.एक स्थूल जगत, जिसकी अनुभूति जाग्रत अवस्था में होती है। 2.दूसरा सूक्ष्म जगत, जिसका स्वप्न में अनुभव करते हैं और 3.तीसरा कारण जगत, जिसकी अनुभूति सुषुप्ति में होती है। तीन अवस्थाओं से आगे: सोलह कलाओं का अर्थ संपूर्ण बोधपूर्ण ज्ञान से है। मनुष्‍य ने स्वयं को तीन अवस्थाओं से आगे कुछ नहीं जाना और न समझा। प्रत्येक मनुष्य में ये 16 कलाएं सुप्त अवस्था में होती है। अर्थात इसका संबंध अनुभूत यथार्थ ज्ञान की सोलह अवस्थाओं से है। इन सोलह कलाओं के नाम अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न-भिन्न मिलते हैं।

2-The Moon has 16 kalas, or phases. Out of these 15 are visible to us and the 16th is beyond our visibility. 16 कलाएं दरअसल बोध प्राप्त योगी की भिन्न-भिन्न स्थितियां हैं। बोध की अवस्था के आधार पर आत्मा के लिए प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा के प्रकाश की 15 अवस्थाएं ली गई हैं। अमावास्या अज्ञान का प्रतीक है तो पूर्णिमा पूर्ण ज्ञान का। 16 कलाओं के नाम हैं...

1-अमृता , 2.मानदा , 3.पूषा , 4.तुष्टि , 5.पुष्टि , 6.रति , 7.धृति , 8.ससीचिनी , 9.चन्द्रिका , 4.तुष्टि , 10.कांता , 11.ज्योस्तना , 12.श्री , 13.प्रीती , 14.अँगदा , 15. पूर्णा 16.पूरनमृता ये चंद्रमा के प्रकाश की 16 अवस्थाएं हैं उसी तरह मनुष्य के मन में भी एक प्रकाश है। मन को चंद्रमा के समान ही माना गया है। जिसकी अवस्था घटती और बढ़ती रहती है। चंद्र की इन सोलह अवस्थाओं से 16 कला का चलन हुआ।इसी को प्रतिपदा, दूज, एकादशी, पूर्णिमा आदि भी कहा जाता है। व्यक्ति का देह को छोड़कर पूर्ण प्रकाश हो जाना ही प्रथम मोक्ष है।

3-These 16 kalas are ruled by the 16 Nitya Devis. They are called Shodasa Nityas. They are: 1.महा त्रिपुरा सुंदरी , 2.कामेश्वरी , 3.भगमालिनी , 4.नित्यक्लिन्ना , 5.भेरुण्डा , 6.वन्हीवासिनी , 7.महा वज्रेश्वरी , 8.शिवदूती (रौद्री ), 9.त्वरिता , 10.कुलसुंदरी , 11.नित्या , 12.नीलपताका , 13.विजया , 14.सर्वमंगला , 15.ज्वालामालिनी 16.चिद्रूपा (चित्रा )। नित्याओ में से पहिली नित्या श्रीकामेश्वरी हैं।कामेश्वरी देवी शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि हैं , जो उगते हुए सूर्य अथवा अंधेरे से रोशनी की ओर ले जाने वाली । यह इच्छाओं की देवी हैं , आपके गहनतम विचारों में छुपी हुई इच्छाओं को प्रगट करना और पूर्ति करना यही उसका कार्य हैं। इस देवी का तेज दस करोड़ सूर्य की तेज की भांति हैं। यह देवी दो तिथियो पर कमांड करती हैं , अमावस्या के बाद आने वाली प्रतिपदा और पूर्णिमा के बाद आने वाली प्रतिपदा तिथि

पर।

4-कामदेव को भस्म करने से पूर्व उसे अपने नेत्रों में सुरक्षित रखने वाली , तथा उसे अपने नेत्रो से फिरसे पुनः जीवन देने वाली जो शक्ति हैं , वह यही हैं ।कामदेव के पाँच बाण और पाँच कामदेव के रूप में जो तेज है , वह इसी देवी के कारण उसे प्राप्त होता हैं।

1. कामराज ह्रीं

2. मन्मथ क्लीं

3. कंदर्प ऐं

4. मकरकेतन ब्लूम

5. मनोभव स्त्रीं

5-ईस तरह से ये देवी की 5 शक्तियाँ 5 कामदेव के रूप हैं। जो पाँच बाण है , वह देवी के हाथों में हैं ।वह देवी लाल रंग की हैं , छह हाथ , तीन नेत्र , चंद्रकोर और पूर्ण आभूषण से युक्त उसका शरीर हैं। ईख का दंडा , पुष्पबाण सहित हैं ।सूर्य की सुबह की पहली किरण की ऊर्जा , सृजन की मूल शक्ति प्रेरणा और ब्रम्हा को सृष्टि सृजन की जो शक्ति थी वह यही श्रीकामेश्वरी नित्या हैं। कामदेव को जन्म देने वाली , उसे पुनः जीवन देने वाली अर्थात …. इन सबका मूल कामदेव ही हैं , और उसकी शक्ति कामेश्वरी नित्या ।कामेश्वरी नित्या कामनाओं की कामना , इच्छाओं की इच्छा को भी पूर्ण करने की क्षमता रखती हैं। जो अंधेरे में है उसे उजाले में लाती हैं । व्यक्ति के गुणों को बढ़ावा देती हैं।इच्छा, ज्ञान ,क्रिया में यह 'इच्छा शक्ति' है ।

6-भगवान् आद्य शङ्कराचार्य ने सौन्दर्यलहरी में ललिताम्बा षोडशी श्रीविद्या की स्तुति करते हुए कहा है कि "अमृत के समुद्र में एक मणि का द्वीप है, जिसमें कल्पवृक्षों की बारी है, नवरत्नों के नौ परकोटे हैं उस वन में चिन्तामणि से निर्मित महल में ब्रह्ममय सिंहासन है जिसमें पञ्चकृत्य के देवता ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर आसन के पाये हैं और सदाशिव फलक हैं। सदाशिव की नाभि से निर्गत कमल पर विराजमान भगवती षोडशी त्रिपुरसुन्दरी का जो ध्यान करते हैं वे धन्य हैं। भगवती ललिता के प्रभाव से उन्हें भोग और मोक्ष दोनों सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं।''षोडशी महाविद्या के ललिता, त्रिपुरा, राज-राजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बालापञ्चदशी आदि अनेक नाम हैं। लक्ष्मी, सरस्वती, ब्रह्माणी - तीनों लोकों की सम्पत्ति एवं शोभा का ही नाम श्री है।'त्रिपुरा' शब्द का अर्थ है- जो ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश- इन तीनों से पुरातन हो वही त्रिपुरा हैं। 'त्रिपुरार्णव' ग्रन्थ में कहा गया है- 'सुषुम्ना, पिंगला और इडा - ये तीनों नाडियां हैं और मन, बुद्धि एवं चित्त - ये तीन पुर हैं। इनमें रहने के कारण इनका नाम त्रिपुरा है।

7-षोडशी महाविद्या हैं भुक्ति-मुक्ति-दायिनी ।सोलह अक्षरों के मन्त्रवाली ललिता देवी की अङ्गकान्ति उदीयमान सूर्यमण्डल की आभा की भांति है।तन्त्रशास्त्रों में महाविद्या षोडशी देवी को पञ्चवक्त्रा अर्थात् पाँच मुखों वाली बताया गया है। चारों दिशाओं में चार मुख और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें पञ्चवक्त्रा कहा जाता है। देवी के पाँचों मुख तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव अघोर और ईशान शिव के पाँचों रूपों के प्रतीक हैं। भगवती महात्रिपुरसुंदरी ललिता महाविद्या अपने उपासक को भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती हैं।भगवान् शङ्कराचार्य ने भी श्रीविद्या के रूप में इन्हीं षोडशी देवी की उपासना की थी। इसीलिये आज भी सभी शाङ्करपीठों में भगवती षोडशी राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी की श्री यन्त्र के रूप में आराधना करने की परम्परा चली आ रही है। षोडशी महाविद्या हैं भुक्ति-मुक्ति-दायिनी।दुर्वासा ऋषि श्रीविद्याके परमाराधक हुए हैं। षोडशी महाविद्या की उपासना श्रीचक्र में होती है।इन आद्याशक्ति षोडशी महाविद्या के स्थूल, सूक्ष्म, पर तथा तुरीय चार रूप हैं।ध्यान की महिमा मन्त्र जप से भी अधिक बतलाई गई है।

IMPORTANT NOTES;-

1-Out of these, the first one, Maha Tripura Sundari is the Devi Para Shakti herself, and hence the kala ruled by her is not visible to the normal mortals. Hence we see only the other 15 kalas or phases ruled by the other nityas. In the Sri Chakra these 15 nityas are present in the innermost circle, and the Devi is in the central bundu. These 15 Nityas rule the famous 15 letters Devi mantra known as Panchadasakshari Mantra: Ka E Aie La Hreem Ha Sa Ka Ha La Hreem Sa Ka La Hreem These 15 Nityas in the form of the 15 Tithis (Phases) have two aspects each – Prakashamsa, which rules the day portion of the Tithi, and Vimarshamsa, which rules the night part of the Tithi. At night they collect the divine nectar and during the day they release it.

2-On Poornima or full moon day all the 15 Nityas are in the moon and the moon is shining brightly. On the 1st Thithi after the Poornima, i.e., Pratipada, one Nitya leaves the moon and goes to the sun and the moon is reduced slightly in size. On the next Dwiteeya Tithi another Nitya leaves the moon and goes to the sun and the moon is further reduced in size. This way they leave one by one till the moon becomes totally dark on the 15th day, which is called Amavasya or the new moon day. This is known as Krishna Paksha or the waning phase.

3-After Amavasya they return one by one on each Tithi and the moon starts shining again till its full on the Poornima when the last Nitya returns to it. This is called Shukla Paksha. Kameswari to Chitra are the Nityas ruling the Krishna Paksha Tithis from Pratipada to Amavasya. In Shukla Paksha the order of the Nityas is reversed, i.e., Chitra to Kameswari. The Nitya of the Asthami or 8th Tithi, Twarita, is common and constant to both the Pakshas. Hence she adorns the crown of Devi.

4-सोलहवीं कला पहले और पन्द्रहवीं को बाद में स्थान दिया है। इससे निर्गुण -सगुण स्थिति भी सुस्पष्ट हो जाती है। सोलह कला युक्त पुरुष में व्यक्त अव्यक्त की सभी कलाएं होती हैं ।यही दिव्यता है...।

1.बुद्धि का निश्चयात्मक हो जाना।

2.अनेक जन्मों की सुधि आने लगती है।

3.चित्त वृत्ति नष्ट हो जाती है।

4.अहंकार नष्ट हो जाता है।

5.संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं। स्वयं के स्वरुप का बोध होने लगता है।

6.आकाश तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। कहा हुआ प्रत्येक शब्द सत्य होता है।

7.वायु तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। स्पर्श मात्र से रोग मुक्त कर देता है।

8.अग्नि तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। दृष्टि मात्र से कल्याण करने की शक्ति आ जाती है।

9.जल तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। जल स्थान दे देता है। नदी, समुद्र आदि कोई बाधा नहीं रहती।

10.पृथ्वी तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। हर समय देह से सुगंध आने लगती है, नींद, भूख प्यास नहीं लगती।

11.जन्म, मृत्यु, स्थिति अपने आधीन हो जाती है।

12.समस्त भूतों से एक रूपता हो जाती है और सब पर नियंत्रण हो जाता है। जड़ चेतन इच्छानुसार कार्य करते हैं।

13.समय पर नियंत्रण हो जाता है। देह वृद्धि रुक जाती है अथवा अपनी इच्छा से होती है।

14.सर्वव्यापी हो जाता है। एक साथ अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है। पूर्णता अनुभव करता है। लोक कल्याण के लिए संकल्प धारण कर सकता है।

15.कारण का भी कारण हो जाता है। यह अव्यक्त अवस्था है।

16.उत्तरायण कला- अपनी इच्छा अनुसार समस्त दिव्यता के साथ अवतार रूप में जन्म लेता है जैसे राम, कृष्ण। यहां उत्तरायण के प्रकाश की तरह उसकी दिव्यता फैलती है।

..SHIVOHAM...