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क्या है आनन्दमय कोश/BLISS BODY की नाद साधना ?PART-02

आनन्दमय कोश के चार अंग प्रधान हैं।इन साधनों द्वारा साधक अपनी पंचम भूमिका को उत्तीर्ण कर लेता है , तो उसे और प्राप्त करना कुछ शेष नहीं रह जाता।आनन्दमय कोश के चार प्रधान अंग ... 1- नाद, 2- बिन्द 3- कला और 4-तुरीया क्या है नाद साधना?- 06 FACTS;-

1-शब्द-ब्रह्म का दूसरा रूप जो विचार सन्देश की अपेक्षा कुछ सूक्ष्म है, वह नाद है। प्रकृति के अन्तराल में एक ध्वनि प्रतिक्षण उठती रहती है, जिसकी प्रेरणा से आघातों द्वारा परमाणुओं में गति उत्पन्न हुई है और सृष्टि का समस्त क्रिया-कलाप चलता है। यह प्रारम्भिक शब्द ‘ॐ’ है, यह ‘ॐ’ ध्वनि जैसे-जैसे अन्य तत्वों के क्षेत्र में होकर गुजरती है, वैसे ही वैसे उसकी ध्वनि में अन्तर आता है। बंशी के छिद्रों में हवा फेंकते हैं, तो उसमें एक ध्वनि उत्पन्न होती है। पर आगे के छिद्रों में से जिस छिद्र से जितनी हवा निकाली जाती है, उसी के अनुसार भिन्न-भिन्न स्वरों की ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। इसी प्रकार ॐ ध्वनि भी विभिन्न तत्वों के सम्पर्क में आकर विविध प्रकार की स्वर लहरियों में परिणत हो जाती हैं। इन स्वर लहरियों का सुनना ही नाद योग है।पञ्च- तत्वों की प्रतिध्वनित हुई ॐकार की स्वर लहरियों को सुनने की, नाद-योग साधना कई दृष्टियों से बड़ी महत्त्वपूर्ण है। प्रथम तो इस दिव्य संगीत के सुनने में इतना आनन्द आता है, जितना किसी मधुर से मधुर वाद्य या गायन सुनने में नहीं आता। दूसरे इस नाद श्रवण से मानसिक तन्तुओं का Bloom/प्रस्फुटन होता है।

2-सर्प जब संगीत सुनता है, तो उसकी नाड़ी में एक विद्युत लहर प्रवाहित हो उठती है, मृग का मस्तिष्क मधुर संगीत सुनकर इतना उत्साहित हो जाता है कि उसे तन बदन का होश नहीं रहता। गायें दुहते समय मधुर बाजे बजाये जाते हैं, जिससे उनका स्नायु समूह उत्तेजित होकर अधिक मात्रा में दूध उत्पन्न करता है। नाम का दिव्य संगीत सुनकर मानव-मस्तिष्क में भी ऐसी Viberation होती है, जिसके कारण अनेक गुप्त मानसिक शक्तियाँ विकसित होती हैं, इस प्रकार भौतिक और आत्मिक दोनों ही दिशाओं में गति होती है।तीसरा लाभ एकाग्रता है। एक वस्तु पर, नाद पर ध्यान एकाग्र होने से मन की बिखरी हुई शक्तियाँ एकत्रित होती हैं और इस प्रकार मन को वश में करने तथा निश्चित कार्य पर उसे पूरी तरह लगा देने की साधना सफल हो जाती है।

3-मानव- प्राणी अपने सुविस्तृत शरीर में बिखरी हुई अनन्त द