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क्या है आनन्दमय कोश की कला साधना और तुरीय स्थिति साधना ?PART-02

आनन्दमय कोश के चार अंग प्रधान हैं...

1- नाद, 2- बिन्द 3- कला और 4- तुरीया

इन साधनों द्वारा साधक अपनी पंचम भूमिका को उत्तीर्ण कर लेता है तो उसे और प्राप्त करना कुछ शेष नहीं रह जाता।

1-कला- साधना,-

‘कला का अर्थ है –किरण।’ प्रकाश यों तो अत्यन्त सूक्ष्म हैं, उस पर सूक्ष्मता का ऐसा समूह, जो हमें एक निश्चित प्रकार का अनुभव कराये ‘कला’ कहलाता है। सूर्य से निकलकर अत्यन्त सूक्ष्म प्रकाश तरंगें भूतल पर आती हैं, उनका एक समूह ही इस योग्य बन पाता है कि नेत्रों से उसका अनुभव किया जा सके। सूर्य किरणों के सात रंग प्रसिद्ध हैं, परमाणुओं के अन्तर्गत जो ‘प्रमाणु’ होते हैं उनकी विद्युत तरंगें जब हमारे नेत्रों से टकराती है, तभी किसी रंग रूप का ज्ञान हमें होता है। रूप को प्रकाशवान् बनाकर प्रकट करने का काम कला द्वारा ही होता है।


कलाएँ दो प्रकार की होती हैं ...1- आप्ति, 2- व्याप्ति

1- आप्ति किरणें;-

आप्ति किरणें वे हैं, जो प्रकृति के अणुओं से प्रस्फुटित होती हैं। व्याप्ति वे है, जो पुरुष के अन्तराल से आविर्भूत होती हैं, इन्हें ‘तेजस्’ भी कहते हैं। वस्तुएँ पञ्च तत्वों से बनी होती हैं इसलिए परमाणु से निकलने वाली किरणें अपने प्रधान तत्व की विशेषता भी साथ लिए होती हैं, वह विशेषता रंग द्वारा पहचानी जाती हैं। किसी वस्तु का प्राकृतिक रंग देखकर यह बताया जा सकता है कि इन पञ्च-तत्वों में कौन सा तत्व किस मात्रा में विद्यमान है ?

2- व्याप्ति किरणें;-

व्याप्ति कला, किसी मनुष्य के ‘तेजस्’ में परिलक्षित होती हैं, यह तेजस् मुख के आस- पास प्रकाश मण्डल की तरह विशेष रूप से फैला होता है, यों तो यह सारे शरीर के आस- पास प्रकाशित रहता है। इसे अँग्रजी में ‘ओरा’ और संस्कृत में तेजोवलय’ कहते हैं। देवताओं के चित्र में उनके मुख के आस-पास एक प्रकाश का गोला सा चित्रित होता है, यह उनकी कला का ही चिन्ह है। अवतारों के सम्बन्ध में उनकी शक्ति का माप उनकी कथित कलाओं से किया जाता है। परशुराम जी में तीन, रामचन्द्र जी में बारह, कृष्ण में सोलह कलाएँ बताई गई हैं। इसका तात्पर्य यह है कि उनमें साधारण मात्र से इतनी गुनी आत्मिक शक्ति थी।

सूक्ष्मदर्शी लोग किसी व्यक्ति या वस्तु की आन्तरिक स्थिति का पता उनके तेजोवलय और रंग, रूप, चमक और चैतन्यता को देखकर मालूम कर लेते हैं। ‘कला’ विद्या की जिसे जानकारी है, वह भूमि के अन्तर्गत छिपे हुए पदार्थो को, वस्तुओं के अन्तर्गत छिपे हुए गुण, प्रभाव एवं महत्वों को आसानी से जान लेता है। किस मनुष्य में कितनी कलाएँ हैं, उसमें क्या-क्या शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विशेषताएँ हैं तथा किन-किन गुण, दोष, योग्यताओं, सामर्थ्यों की उनमें कितनी न्यूनाधिकता है ? यह सहज ही पता चल जाता है। इस जानकारी के होने से किसी व्यक्ति से समुचित सम्बन्ध रखना सरल हो जाता है।

कला-विज्ञान का ज्ञाता अपने शरीर की सात्विक न्यूनाधिकता का पता लगाकर इसे आत्म-बल से ही सुधार सकता है और अपनी कलाओं में समुचित संशोधन- परिमार्जन एवं विकास कर सकता है। कला ही सामर्थ्य है। अपनी आत्मिक सामर्थ्य का, आत्मिक उन्नति का माप कलाओं की परीक्षा करके प्रकट हो जाता है और साधक यह निश्चित कर सकता है कि उन्नति हो रही है या नहीं ? उसे सन्तोषजनक सफलता मिल रही है या नहीं।

सब ओर से चित्त हटाकर नेत्र बन्द करके भृकुटी के मध्य भाग में ध्यान एकत्रित करने से मस्तिष्क में तथा उसके आस-पास रंग-बिरंगी धज्जियाँ, चिन्दियाँ तथा तितलियाँ-सी उड़ती दिखाई पड़ती हैं। इनके रंगों का आधार तत्वों पर निर्भर होता है। पृथ्वी तत्व का रंग पीला, जल का श्वेत, अग्नि का लाल, वायु का हरा, आकाश का नीला होता है। जिस रंग की झिलमिल होती है, उसी के आधार पर यह जाना जा सकता है कि इस समय हममें किन तत्वों की अधिकता और किनकी न्यूनता है।


रंग और चक्रों में परस्पर सम्बन्ध - चिकित्सा के लिए उपयोगी


प्रत्येक रंग में अपनी-अपनी विशेषता होती है। पीले रंग में क्षमा, गम्भीरता, उत्पादन, स्थिरता, वैभव, मजबूती, संजीदगी, भारीपन। श्वेत रंग में शान्ति, रसिकता, कोमलता, शीघ्र प्रभावित होना, तृप्ति, शीलता, सुन्दरता, बुद्धि, प्रेम। लाल रंग में गर्मी, उष्णता, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष अनिष्ट, शूरता, सामर्थ्य, उत्तेजना, कठोरता, कामुकता, तेज, प्रभावशीलता, चमक, स्फूर्ति। हरे रंग में चंचलता, कल्पना, स्वप्नशीलता, जकड़ना, दर्द, अपहरण धूर्तता, गतिशीलता, विनोद, प्रगतिशीलता, प्राण, पोषण, परिवर्तन। नीले रंग में- विचारशीलता, बुद्धि सूक्ष्मता, विस्तार, सात्विकता, प्रेरणा, व्यापकता, संशोधन, सम्वर्धन, सिंचन, आकर्षण आदि गुण होते हैं।


जड़ या चेतन किसी भी पदार्थ के रंग एवं उससे निकलने वाली सूक्ष्म प्रकाश-ज्योति से यह जाना जा सकता है, कि इस वस्तु या प्राणी का गुण स्वभाव एवं प्रभाव कैसा हो सकता है ? साधारणतः यह पाँच तत्वों की कला हैं, जिनके द्वारा यह कार्य हो सकता है-

1- व्यक्तियों तथा पदार्थों की आन्तरिक स्थिति को समझना,

2- अपने शारीरिक तथा मानसिक क्षेत्र में असन्तुलित किसी गुण- दोष को सन्तुलित करना,

3- दूसरों के शारीरिक तथा मन की विकृतियों का संशोधन करके सुव्यवस्था स्थापित करना,

4- तत्वों के मूल आधार पर पहुँचकर तत्वों की गति-विधि तथा किया-पद्धति को जानना,

5-तत्वों पर अधिकार करके सांसारिक पदार्थों का निर्माण, पोषण तथा विनाश करना।

यह उपरोक्त पाँच लाभ ऐसे हैं, जिनकी व्यवस्था की जाय तो वे ऋद्धि-सिद्धियों के समान आश्चर्यजनक प्रतीत होंगे। यह पाँच भौतिक कलाएँ हैं, जिनका उपयोग राजयोगी, हठयोगी, मन्त्रयोगी तथा तांत्रिक अपने-अपने ढंग से करते हैं और इस तान्त्रिक शक्ति का अपने-अपने ढंग से सदुपयोग-दुरुपयोग करके भले-बुरे परिणाम उपस्थित करते हैं। कला द्वारा सांसारिक भोग, वैभव भी मिल सकता है, आत्म-कल्याण भी हो सकता है और किसी को शापित, अभिचारिता एवं दुख शोक सन्तृप्त भी बनाया जा सकता है। पञ्च तत्वों की कलाएँ ऐसी ही प्रभावपूर्ण होती हैं।

आत्मिक कलाएँ तीन होती हैं- सत, रज, तम। तमोगुणी कलाओं का माध्यम केन्द्र शिव है। रावण, हिरण्यकश्यपु, भस्मासुर, कुम्भकरण, मेघनाद आदि असुर इन्हीं तामसिक कलाओं के सिद्ध पुरुष थे। रजोगुणी कलाएँ विष्णु से आती हैं। इन्द्र, कुबेर, वरुण, वृहस्पति, ध्रुव, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, कर्ण आदि में इन राजसिक कलाओं की विशेषता थी। सतोगुणी सिद्धियाँ ब्रह्म से आविर्भूत होती हैं। व्यास, वशिष्ठ, अत्रि, बुद्ध, महावीर, ईसा, गाँधी, आदि ने सात्विकता के केन्द्र से ही शक्ति प्राप्त की थी।

आत्मिक कलाओं की साधना गायत्री-योग के अन्तर्गत ग्रन्थि-भेद द्वारा होती है। रुद्र ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और ब्रह्म ग्रन्थि के खुलने से इन तीनों ही कलाओं का साक्षात्कार साधक को होता है। पूर्वकाल में लोगों के शरीर में आकाश तत्व अधिक था। इसलिए इन्हें उन्हीं साधनाओं से अत्यधिक आश्चर्यमयी सामर्थ्य प्राप्त हो जाती थी, पर आज के युग में जन-समुदाय के शरीर में पृथ्वी-तत्व प्रधान हैं इसलिए अणिमा, महिमा आदि तो नहीं पर सत्, रज, तम की शक्तियों की अधिकता से अब भी आश्चर्यजनक हित-साधना हो सकता है।

पाँचकलाओं द्वारा तात्विक साधना;-

पृथ्वी तत्व- इस तत्व का स्थान मूलाधार चक्र अर्थात् गुदा से दो अंगुल अंडकोश की ओर हटकर सीवन में स्थित है। सुषुम्ना का आरम्भ इसी स्थान से होता है। प्रत्येक चक्र का आधार कमल के पुष्प जैसा है। यह ‘भूलोक’ का प्रतिनिधि है। पृथ्वी तत्व का ध्यान इसी मूलाधार चक्र में किया जाता है।

पृथ्वी तत्व- मूलाधार चक्र एवं बीज मंत्र;-

पृथ्वी तत्व की आकृति चतुष्कोण, रंग पीला, गुण गन्ध है। इसलिए इसको जानने की इन्द्रिय नासिका तथा कर्मेन्द्रिय गुदा है। शरीर में पीलिया, कमलवाय आदि रोग इसी तत्व की विकृति से पैदा होते हैं। भय आदि मानसिक विकारों में इसकी प्रधानता होती है। इस तत्व के विकार मूलाधार चक्र में ध्यान स्थित करने से अपने आप शान्त हो जाते हैं।

साधन विधि- सबेरे जब एक पहर अँधेरा रहे, तब किसी शान्त स्थान और पवित्र आसन पर दोनों पैरों को पीछे की ओर मोड़कर उन पर बैठें। दोनों हाथ उल्टे करके घुटनों पर इस प्रकार रखी, जिससे उँगलियों के छोर पेट की ओर रहें। फिर नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुए मूलाधार चक्र में ‘ल’ बीज वाली चौकोर पीले रंग की पृथ्वी पर ध्यान करें। इस प्रकार करने से नासिका सुगन्धि से भर जाती है और शरीर उज्ज्वल कान्ति वाला हो जाता है। ध्यान करते समय ऊपर कहे पृथ्वी तत्व के समस्त गुणों को अच्छी तरह ध्यान में लाने का प्रयत्न करना चाहिए और ‘ल’ इस बीज मन्त्र का मन ही मन (शब्द रूप से नहीं, वरन् ध्यान रूप से) जप करते जाना चाहिए।

जल तत्व-स्वाधिष्ठान चक्र एवं बीज मंत्र;-

जल तत्व- पेढू के नीचे जननेन्द्रिय के ऊपर मूल भाग में स्वाधिष्ठान चक्र में जल तत्व का स्थान है। यह चक्र ‘भव’ लोक का प्रतिनिधि है, रंग श्वेत, आकृति अर्धचन्द्राकार और गुण रस है। कटु, अम्ल, तिक्त मधुर आदि सब रसों का स्वाद इसी तत्व के कारण आता है। इसकी ज्ञानेन्द्रिय जिह्वा और कर्मेन्द्रिय लिंग है। मोहादि विकार इसी तत्व की विकृति से होते हैं।

साधन विधि- पृथ्वी तत्व का ध्यान करने के लिए बताई हुई विधि से आसन पर बैठकर ‘व’ बीज वाले अर्धचन्द्राकार चन्द्रमा की तरह कान्ति वाले जल तत्व का स्वाधिष्ठान चक्र में स्थान करना चाहिए। इनसे भूख-पास मिटती है और सहन- शक्ति उत्पन्न होती है।

अग्नि तत्व -मणिपूर चक्र एवं बीज मंत्र ;-

अग्नि तत्व-नाभि स्थान में स्थिति मणिपूरक चक्र में अग्नि तत्व का निवास है। यह ‘स्व’ लोक का प्रतिनिधि है। इस तत्व की आकृति त्रिकोण, लाल गुण रूप है। ज्ञानेन्द्रिय नेत्र और कर्मेन्द्रिय पाँव हैं। क्रोधादि मानसिक विकार तथा सृजन आदि शारीरिक विकार इस तत्व की गड़बड़ी से होते हैं, इसके सिद्ध हो जाने पर मन्दाग्नि, अजीर्ण आदि पेट के विकार दूर हो जाते हैं और कुण्डलिनी शक्ति के जाग्रत होने में सहायता मिलती है।

साधन विधि- नियत समय पर बैठकर ‘र’ बीज मन्त्र वाले त्रिकोण आकृति के और अग्नि के समान लाल प्रभा वाले अग्नि- तत्व का मणि पूरक चक्र में ध्यान करें। इस तत्व के सिद्ध हो जाने पर सहन करने की शक्ति बढ़ जाती है।

वायु तत्व- यह तत्व हृदय देश में स्थिति अनाहत चक्र में है एवं ‘महलोक’ का प्रतिनिधि है। रंग हरा, आकृति षट्कोण तथा गोल दोनों तरह की है, गुण-स्पर्श, ज्ञानेन्द्रिय-त्वचा और कर्मेन्द्रिय-हाथ हैं। वात-व्याधि, दमा आदि रोग इसी की विकृति से होते हैं।

वायु तत्व - अनाहत चक्र एवं बीज मन्त्र ;-

साधन विधि- नियत विधि से स्थित होकर ‘य’ बीज वाले गोलाकर, हरी आभा वाले वायु-तत्व का अनाहत चक्र में ध्यान करें। इससे शरीर और मन में हल्कापन आता है।

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जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरियावस्था क्या है ? जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरियावस्था क्या है ? मानव शरीर में आत्मा ही सब कुछ है अन्य सभी प्रकृति है जो जड़ है । हमारे शरीर में जो कुछ भी जड़ है वह आत्मा के प्रकाश से ही प्रकाशित होता है। स्थूल शरीर हो, सूक्ष्म शरीर हो ,चाहे कारण शरीर हो ,उसमें सारी क्रियाओं का कारण यह आत्मा ही है ।अन्य सभी पदार्थ एवं अवयव जड़ प्रकृति से निर्मित होने के कारण कोई क्रिया नहीं कर सकते ।स्थूल शरीर में देखना, स्वाद लेना, सुनना, स्पर्श करना आदि तथा कर्मेंद्रियों की सभी क्रियाओं का कारण यह आत्मशक्ति ही है । मन, बुद्धि,चित्त, अहंकार का कारण भी यह चेतन तत्व ही है ।चेतना के अभाव में यह शरीर कुछ भी नहीं कर सकता ।यह चेतन शक्ति चार अवस्थाओं में विद्यमान रहती है ।जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरिया अवस्था। जागृत अवस्था -जागृत अवस्था में यह आत्मशक्ति इस संसार का अनुभव करती है । आदि गुरु भगवान शंकराचार्य ने आत्म तत्व की चार जागृत अवस्था को समझाते हुए लिखा है --"जागृत अवस्था आत्मा का स्थूल शरीर है ।इंद्रियों में विषयों की उपलब्धि ही जागृत अवस्था है।" अर्थात जागृत अवस्था वह अवस्था है जिसमें यह आत्म तत्व समस्त सांसारिक कार्यों का संपादन एवं उपभोग करता है । हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियां हैं तथा इनके पाँच विषय हैं। इनके द्वारा जो विशेष अनुभव प्राप्त होता है उसी को "जागृत अवस्था" कहते हैं। इस अवस्था में स्थूल शरीर का अभिमान रहने से आत्मा विश्व नाम वाला होता है ।चेतना कि इसी अवस्था को "वेश्वानर" कहते हैं । जिस प्रकार से वानर कभी भी एक स्थान पर टिक नहीं सकता उसी प्रकार से जागृत अवस्था में जीवात्मा की चेतन शक्ति चंचल बनी रहती है। ऐसा जीवात्मा स्थूल ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से इस संसार का अनुभव करता है । स्वप्नावस्था- जागृत अवस्था में मनुष्य को जो भी ज्ञान प्राप्त होता है। वह पांँचों ज्ञानेंद्रियों द्वारा होता है। इसके सिवा ज्ञान प्राप्ति का अन्य कोई साधन नहीं है किंतु स्वप्नावस्था में इंद्रियां विषयों को ग्रहण नहीं कर सकती। जिससे उनसे कोई ज्ञान प्राप्त नहीं होता ।स्वप्न में जो भी दृश्य दिखाई देते हैं वे जागृत अवस्था में जो कुछ देखा, सुना गया है उसकी सूक्ष्म वासना मन में समाहित रहती है। मन की इसी वासना के कारण निद्रा काल में जगत का जो व्यवहार दिखाई देता है उसी को स्वप्नावस्था कहते हैं। वस्तु के होते हुए भी उसका दिखाई देना मन की वासना के कारण ही होता है इस अवस्था में स्थूल शरीर तो निष्क्रिय हो जाता है किंतु सूक्ष्म शरीर जागृत रहता है आत्मा को उस समय सूक्ष्म शरीर का अभिमान होता है कि मैं सूक्ष्मा शरीर हूं इस अवस्था में आत्मा तेजस रूप वाला होता है आत्मा के तेज से ही सभी दृश्य दिखाई देते हैं आदि गुरु भगवान शंकराचार्य ने कहा है कारणों का उपसंहार हो जाने पर जागृत के संस्कार से उत्पन्न जो सविषयक वृत्ति है उसी को स्वप्नावस्था कहते हैं। सुषुप्तावस्था- जागृत अवस्था में ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से होता है। स्वप्नावस्था में यह ज्ञान मन से उसकी वासना के अनुसार होता है जबकि सुसुप्तावस्था में मन भी सुप्त हो जाता है। इस अवस्था में उसे किसी प्रकार का अनुभव नहीं होता मात्र निद्रा का अनुभव होता है । इस अवस्था में आत्म चेतना को अपने कारण शरीर का अभिमान रहता है । वह इसी को अपना वास्तविक स्वरूप मानता है ।आत्मा की यह अवस्था 'प्राज्ञ'कहलाती है जिसमें यह अनुभव स्वयं आत्मा द्वारा होता है। वास्तव में यदि देखा जाए तो जानने वाला केवल आत्मा है। आत्मा की उपस्थिति में ही जानने योग्य विषय वस्तु को जाना जाता है । आत्मा सीधा ही ज्ञान का कारण है। जागृत अवस्था में ज्ञान का कारण शरीर की ज्ञानेंद्रियां होती है। स्वप्ना अवस्था में ज्ञान का कारण मन होता है । इस अवस्था में मन भी शांत हो जाता है इसलिए यहां पर ज्ञान का बोध सिर्फ आत्मा के द्वारा किया जाता है। तुरियावस्था- जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति में आत्मा विश्वानर, तेजस और प्राज्ञ अवस्था में रहती है। इसकी चौथी अवस्था "तुरीया "कही गयी है। इस अवस्था में सभी दृश्य तथा ज्ञान का विलय हो जाता है। केवल परब्रह्म के समान निर्विकल्प ,निर्विचार ,शून्य अवस्था प्राप्त हो जाती है। इस स्थिति में सभी विकल्प समाप्त होकर केवल ज्ञान ही शेष रह जाता है। यही जीवात्मा की मुक्तावस्था है। आरंभ की तीन अवस्थाओं में जीव और आत्मा के बीच भेद बना रहता है ।ज्ञाता और ज्ञान का भेद रहता है। अभेद का ज्ञान होने पर भी भेद बना रहता है। जीव और ब्रह्म में भेद रहने से ही जीव ब्रह्म की साधना करता है । जीवात्मा उसी का अंश है किंतु प्रकृति के आवरण में आकर वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाती है। नाशवान जड़ तत्वों से बने हुए भौतिक शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझने लगती है । इसी के दुख एवं सुख को अपना दुख एवं सुख मानने लगती है। जब निरंतर ध्यान के अभ्यास से उसे अपने वास्तविक स्वरूप का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर हो जाता है तो वह अपने वास्तविक स्वरूप को ही धारण कर लेती है । साधक के हृदय में "आत्मवत् सर्वभूतेषु "की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।उसे संपूर्ण संसार अपना ही स्वरूप दिखाई देने लगता है।न कोई अपना न कोई पराया ,सब कुछ अपना ही स्वरूप दिखाई देने लगता है अर्थात उसकी चेतना ब्रह्मांड व्यापी अस्तित्व को धारण कर लेती है। इस स्थिति में साधना की आवश्यकता ही नहीं रहती । अब कौन किसकी साधना करें? तुझमें मुझमें बस भेद यही मैं नर हूंँ तू नारायण है किंतु यहां पर पहुंचने के बाद योगी की यह स्थिति समाप्त हो जाती है । फिर जो स्थिति उत्पन्न होती है उसमें साधक कह उठता है- तुझमें मुझमें अब भेद नहीं तू नारायण ,मैं भी नारायण हूँ। एक ही में साधना नहीं हो सकती ।इसलिए तुरियावस्था में सभी साधनाएं समाप्त हो जाती हैं क्योंकि इसमें आत्मा को परमात्मा से एकत्त्व का अनुभव हो जाता है ।नदी पार होने पर फिर नाव की आवश्यकता नहीं रहती।उसे भी छोड़ना पड़ता है। इस स्थिति में योगी को जगत अपना ही स्वरूप ज्ञात होने लगता है ।वह वासना शून्य हो जाता है ।वासना ही जन्म का कारण बनती है तथा वासना शून्य होना ही वास्तविक मुक्ति है ।जिस साधक के मन में इस संसार के प्रति कोई वासना नहीं ,कोई आसक्ति नहीं! वह समस्त बंधनों से मुक्त होकर हमेशा हमेशा के लिए इस संसार के आवागमन से मुक्त हो जाता है।

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तुरीयावस्था;- मन को पूर्णतया संकल्प- रहित कर देने से रिक्त मानस की निर्विषय स्थिति होती है, उसे तुरीयावस्था कहते हैं। जब मन में किसी भी प्रकार का एक भी संकल्प न रहे। ध्यान, भाव, विचार, संकल्प, इच्छा, कामना का पूर्णतया बहिष्कार कर दिया जाय और भाव रहित होकर केवल आत्मा के एक केन्द्र से अपने अन्तःकरण को पूर्णतया समाविष्ट कर दिया जाय, तो साधक तुरीयवस्था में पहुँच जाता है, इस स्थि ति में इतना आनन्द आता है कि उस आनन्द के अतिरेक में अपनेपन की सारी सुधि-बुधि छूट जाती हैं और पूर्ण मनोयोग होने से बिखरा हुआ आनन्द एकीभूत होकर साधक को आनन्द से परितृप्त कर देता है, इसी स्थिति को समाधि कहते हैं। समाधि काल में अपना संकल्प ही एक सजीव एवं अनन्त शक्तिशाली देव बन जाता है और उसकी झाँकी दृश्य जगत् से भी अधिक स्पष्ट होती है। नेत्रों के दोष और चंचलता से कोई वस्तुऐं हमें धुँधली दिखाई पड़ती है और उनकी बारीकियाँ नहीं सूझ पड़ती। परन्तु समाधि अवस्था में परिपूर्ण दिव्य इन्द्रियों और चित्त वृत्तियों का एकीकरण जिस संकल्प पर होता है, वह संकल्प सब प्रकार मूर्तिमान एवं सक्रिय परिलक्षित होता है। जिस किसी को जब कभी भी ईश्वर का मूर्तिमान साक्षात्कार होता है तथा समाधि अवस्था में उसका संकल्प ही मूर्तिमान हुआ होता है। भावावेश में भी क्षणिक समाधि हो जाती हैं। भूत, प्रेत, आवेश, देवोन्माद, हर्ष, शोक की मूर्छा, नृत्य, वाद्य में लहरा जाना, आवेग में अपनी या दूसरे की हत्या आदि भयंकर कृत्य कर डालना, क्रोध का व्यतिरेक, बिछुड़ों से मिलन का प्रेमावेश, कीर्तन आदि के समय भाव विह्वलता , अश्रुपातः चीत्कार, आर्तनाद करुण- क्रन्दन, हूक आदि में आशिक समाधि होती है। संकल्प में, भावना में आवेश की जितनी अधिक मात्रा होगी, उतनी ही गहरी समाधि होगी और उसका फल भी सुख या दुख के रूप में उतना ही अधिक होगा। भय का व्यतिरेक या आवेश होने पर डर के मारे भावना मा त्र से लोगों की मृत्यु तक होती देखी गई है। कई व्यक्ति फाँसी पर चढ़ने से पूर्व ही डर के मारे प्राण त्याग देते हैं। आवेश की दशा में अन्तरंग शक्तियों और वृत्तियों का एकीकरण हो जाने से एक प्रचण्ड भावोद्वेग होता है। यह उद्वेग भिन्न-भिन्न दशाओं में मूर्छा , उन्मा द आवेश आदि नामों से पुकारा जाता है। पर जब वह दिव्य भूमिका में आत्म तन्मयता के साथ होता है तो उसे समाधि कहते हैं। पूर्ण समाधि में पूर्ण तन्मयता के कारण पूर्णानन्द का अनुभव होता है। आरम्भ स्वप्न मात्रा की आंशिक समाधि के साथ होता है। दैवी भावनाओं से एकाग्रता एवं तन्मयतापूर्ण भा वावेश जब होता है तो आँखें झपक जाती हैं, सुस्ती तन्द्रा या मूर्छा भी आने लगती है, माता हाथ से छूट जाती है, जप करते- करते जिह्वा रुक जाती है। अपने इष्ट की हल्की सी झाँकी होती है और एक ऐसे आनन्द की क्षणिक अनुभूति होती है, जैसा कि संसार के किसी पदार्थ में नहीं मिलता। यह स्थिति आरम्भ में स्वल्प मात्रा में ही होती है पर धीरे-धीरे उसका विकास होकर परिपूर्ण तुरीयावस्था की ओर चलने लगती है और अन्त में सिद्धि मिल जाती है। आनन्दमय को श के चार अंग प्रधान हैं। १- नाद, २- बिन्दु३- कला और ४- तुरीया। इन साधनों द्वारा साधक अपनी पंचम भूमिका को उत्तीर्ण कर लेता है। गायत्री के इस पाँचवें मुख को खोल देने वाला साधक जब एक- एक करके पाँच मुखों से माता का आशीर्वाद प्राप्त कर लेता है, तो उसे और प्राप्त करना कुछ शेष नहीं रह जाता।