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क्या अर्थ है वाइब्रेशन्स/चैतन्य लहरियों की अनुभूति का?


क्या अर्थ है चैतन्य लहरियों /वाइब्रेशन्स की अनुभूति और कुण्डलिनी का?-


10 FACTS;-

1-अपने शरीर में वाइब्रेशन्स / चैतन्य लहरियों की अनुभूति करें। यह ह्दय मे प्रकाश की टिमटिमाती लपट है,जो हर समय जलती रहती है। यह परमात्मा का प्रतिबिम्ब है। जब कुण्डलिनी उठती है और ब्रह्मरन्द्र को खोलती है तो सदाशिव के दर्शन होते है,प्रकाश दैदीप्यमान होता है और चैतन्य लहरियॉ हमारे अन्दर से बहने लगती हैं।ये चैतन्य लहरियॉ हमारे शरीर में बहने वाली सूक्ष्म ऊर्जा का प्रवाह होना है ।यह तभी होता है जब कुण्डलिनी ब्रह्मरन्द्र का भेदन कर ऊपर सदा शिव से मिलन होता है । ये चैतन्य लहरियॉ हमें पूर्ण सन्तुलन प्रदान करती है,हमारी शारीरिक,मानसिक एवं भावनात्मक समस्याओं का निवारण करती है। ये हमें परमात्मा से पूर्ण आध्यात्मिक एकाकारिता का विवेक प्रदान करती है,तथा परमात्मा से पूर्णतः एकरूप कर देती है ।

सुषुम्ना नाडी अत्यन्त पतली नाडी है,पापों और बुराइयों के कारण इतनी संकीर्ण हो जाती है कि कुण्डलिनी के सूक्ष्म तन्तु ही इसमें से गुजर सकते हैं ।यह अत्यंत सूक्ष्म और गहन प्रक्रिया है।मूलाधार के इस पतले मार्ग में कम से कम एक सूक्ष्म तन्तु गुजर सकता है, उसी एक तन्तु से ये ब्रह्मरन्द्र का भेदन करती है।आरम्भ में अधिकतर लोगों में यह घटना आसानी से घट जाती है ।प्रकाश में देखने पर उन्हें लगता है कि ये सब चीजों उनके अन्दर निहित है और वे आनंदित हो जाते हैं । लेकिन बोझ के दवाव से पुनः नीचे की ओर खिंच जाती है,उन्हें बहुत बडा झटका लगता है तब वे घबराकर संशयालु बन जाते हैं ।

2- जब आप निर्विचारिता में होते हैं तो आप परमात्मा की सृष्टि का पूरा आनंद लेने लगते हैं, और बीच में कोई

बाधा नहीं रहती है ।विचार आना हमारे और सृजनकर्ता के बीच की बाधा है । हर काम करते वक्त आप निर्विचार

हो सकते हैं, और निर्विचार होते ही उस काम की सुन्दरता,उसका सम्पूर्ण ज्ञान और उसका सारा आनंद

आपको मिलने लगता है ।।समस्याओं को केवल निर्विचारिता को समर्पित कर दे ।मनुष्य की उम्र.. जितनी बढ़ती जाएगी, उतना ही ध्यान करना, निर्विचारिता की स्थिति पाना कठिन हो जाएगा। ध्यान की आदत बच्चो को बचपन से लगानी चाहिए क्योंकि बचपन मे बुरे अनुभवों का जहर मनुष्य के पास नहीं होता है। इसलिए बच्चों के जीवन मे विचारों का भंडार भी नही होता है। 7 वर्ष की आयु से ध्यान सीखना चाहिए। आनेवाले समय मे मन कि एकाग्रता की बड़ी आवश्यकता होगी। तब बच्चो के ध्यान की साधना ही काम आएगी क्योकि आनेवाला समय कठिन होगा। टेक्नोलॉजी और मीडिया के हुए व्यापक प्रभाव के कारण बच्चों को अपना चित्त दूषित वातावरण से बचाने में ध्यान ही काम आएगा। जितना समय के साथ साथ विचारों का प्रदूषण बढ़ने लगेगा, वैसे वैसे जीवन मे कठिनाइयां भी बढ़ने लगेगी।

3-ध्यान निर्विचारिता की स्थिति नहीं है बल्कि ध्यान की स्थिति निर्विचारिता के उपर की स्थिति होती है। और जब तालू भाग में स्पंदन का अनुभव होने लगता है तो हमें एक आत्मानंद प्राप्त होता है। इसी स्थिति का वर्णन संत कबीर ने अपने शब्दों में किया है..’’ शून्य शिखर पर अनहत बाजे’’ यानी जब आप शून्य शिखर यानी इस सहस्त्रार चक्र पर पहुंच जाते हैं तो आपको अनहत का नाद ..वह स्पंदन का नाद सुनाई देने लगता है। यह तो वही अनुभव कर सकता है जो इस चक्र तक पहुंचा हो।आत्म साक्षात्कार के बाद आप चक्रों की तरह घूमते हुय़े बहुत से छल्ले देख सकते हैं। आत्मा सभी तत्वों के कारण-कार्य़ सम्बन्धों से लीला करती है और ये सात छल्ले बनाती है ।आत्म साक्षात्कार के पश्चात आप चक्रों के इर्द-गिर्द घूमते हुये और एक छल्ले को दूसरे छल्ले में जाते हुये बहुत से छल्लों को देख सकते हैं।कभी-कभी तो एक छल्ले में बहुत से छल्ले और कभी एक छल्ले में चिंगारियों जैसे अर्धविराम चिन्ह भी आप देख सकते हैं ।ये चेतन्य होता है अथार्त मृत आत्मायें होती हैं ।लेकिन व्यक्ति पर कोई अन्य आत्मा बैठती है तो वह कोषाणु पर प्रतिविम्बित होती है।ये आत्मा किसी भी चक्र से या सभी चक्रों से जुड सकती है।जिससे व्यक्ति अचेतन हो जाता है और मादकता, मिर्गी, मस्तिष्क रोग तथा कैंसर आदि रोगों का कारण बनती है।

4- मूलाधार चक्र सबसे अधिक कोमल और सबसे अधिक शक्तिशाली है ।इसकी बहुत सी सतहें हैं और बहुत से आयाम। यदि मूलाधार ठीक नहीं है तो आपकी याददास्त खराब हो जायेगी .. आप में दिशा विवेक नहीं रहेगा। बहुत से असाध्य रोग दुर्बल मूलाधार के कारण कारण आते हैं ।90 प्रतिशत मानसिक रोगी दुर्बल मूलाधार के कारण होते हैं।यदि व्यक्ति का मूलाधार शक्तिशाली है तो उसे किसी भी प्रकार की तकलीफ नहीं होगी ।आप मस्तिष्क को दोष देते हैं यह मस्तिष्क के कारण नहीं बल्कि मूलाधार के कारण होता है। इसलिए मूलाधार के प्रति विवेकशील रहें ।आज्ञा चक्र में 2 नाड़ियां मिलकर कमल की आकृति बनाती है। यहां 2 ध्वनियां निकलती रहती है।आज्ञाचक्र पर दो दलों वाला कमल है, जिस पर 'हं' और 'क्षं 'विराजित हैं। तपःलोक है इसका। लिंगाकार यन्त्र है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस स्थान पर पिनियल और पिट्यूटरी 2 ग्रंथि मिलती है। योग शास्त्र में इस स्थान का विशेष महत्व है।यह एक अति प्रधान प्रवेश द्वार भी है।यहां ज्ञानदाता शिव अपनी शक्ति हाकिनी के साथ विराजते हैं।इस चक्र पर ध्यान करने से सम्प्रज्ञात समाधि की योग्यता आती है। मूलाधार से ´इड़ा´, ´पिंगला´ और सुषुम्ना अलग-अलग प्रवाहित होते हुए इसी स्थान पर मिलती है। इसलिए योग में इस चक्र को त्रिवेणी भी कहा गया है। क्षमा प्रार्थना आज्ञा चक्र का मंत्र हैं।हं और क्षं इसके दो पक्ष हैं ।हं अर्थात ‘मैं हूं’ और “क्षं‘अर्थात ‘मैं क्षमा करता हूं ‘।अतः जब आज्ञा चक्र पकडता है है तो आपको कहना पडता है “ मै क्षमा करता हूं“आपके अन्दर यदि प्रति अहं है तो भी आपको कहना होगा “मैं क्षमा करता हूं” ।

5-यदि हमारे अन्दर अहंकार है तो हमें कहना चाहिए ‘मैं हूं मै हूं’ तो ‘हं’ और ‘क्षं’ बीज मंत्र हैं।ये प्रार्थना के –क्षमा प्रवचन के बीज हैं। जब किसी चीज से अधिक लगाव होता है तो मेरा,तेरा शव्द का प्रयोग होने लगता है ।मेरा घर है ..मेरा शव्द को त्याग देना चाहिए, इसके स्थान पर हम शव्द का प्रयोग करें।हम अर्थात सब एक हैं..आप उस परमात्मा के अंग प्रत्यंग हैं । ये मेरा बच्चा है, निसंदेह आपने अपनी पति /पत्नी ,बच्चों की देख-भाल करनी है क्योंकि यह आपकी जिम्मेदारी है, लेकिन जितना आप अपने बच्चों के लिए करते हैं उससे अधिक अन्य बच्चों के लिए भी करें ,आपको विश्वास करना होगा कि आपका परिवार आपके पिता(परमात्मा)का परिवार है और आपकी मॉ (आदिशक्ति) इसकी देख-भाल कर रही है । किसी चीज को अपने तक सीमित न रखें, आप तभी करते हैं जब वह करवाता है ..डोर तो उसके हाथ में है ।मस्तिष्क में जब कुण्डलिनी का प्रकाश आता है तो मस्तिष्क के माध्यम से सत्य को समझा जा सकता है। इसी कारण इसे सत्य खण्ड कहा जाता है, अर्थात मस्तिष्क द्वारा समझे गये सत्य को आप देखने लगते हैं।क्योंकि अभी तक मस्तिष्क द्वारा जो कुछ भी आप देख रहे थे वह सत्य नहीं था,वह सिर्फ वाह्य पक्ष था।

6-हर शव्द का अपना महत्व है,और मंत्र इन्हीं शव्दों से बनें होते हैं, जैसे हमारे शरीर के अन्दर तीन देवियॉ विराजमान हैं महॉ सरस्वती , महॉलक्ष्मी, और महॉ काली,तो इन्हैं ऐं,हीं, क्लीं कहते हैं । क्षं शब्द का अर्थ है क्षमा करना। सहज योग प्रेम का पथ है,प्रेम में अधिक विश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं है।छोटे से शव्द प्रेम को संमझ लेने मात्र से ही व्यक्ति पंडित हो जाता है। कुण्डलिनी जब उठती है तो स्वर उत्पन्न करती है, सभी स्वरों के अलग-अलग अर्थ होते हैं । और चक्रो पर जो स्वर सुनाई देते हैं उनका उच्चारण इस प्रकार है-

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चक्र>>>>पंखुडियॉ>>>>स्वर>>>>मुख्य बीज मंत्र

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1-मूलाधार>> चार पंखुडियॉ >>चार स्वर निकलते हैं-व,श,ष,स->>मंत्र – ‘ लं ‘

2-स्वादिष्ठान >> छः पंखुडियॉ >> छः स्वर निकलते हैं-ब,भ,म,य,र,ल - >>मंत्र – ‘ वं ‘

3-मणिपुर >> दस पंखुडियॉ >> दस स्वर उत्पन्न होते हैं –ड, ढ,ण,त,थ,द,ध,न,प,फ- >>मंत्र – ‘ रं ‘

4-अनाहत चक्र >> बारह पंखुडियॉ हैं- >>बारह स्वर उत्पन्न होते हैं –क,ख,ग,घ,ड.च,छ,ज,झ,ञ,ट,ठ – >>मंत्र – ‘ यं ‘

5-विशुद्धि चक्र> सोलह पंखुडियॉ>सोलह स्वर उत्पन्न होते हैं-अ,आ, इ,ई,उ, ऊ,ऋं ,ॠं,ळं ,लृं,ए,ऐ,ओ,औं ,अं,अः >मंत्र- 'हं'

6-आज्ञा चक्र >>दो पंखुडियॉ >>दो स्वर उत्पन्न होते हैं---ह,क्ष >>मंत्र – ‘ ॐ ‘

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7-अपने मस्तिष्क द्वारा आप दिव्यता के विषय में कुछ नहीं जान पाते हैं।,जब तक कुण्डलिनी इस भाग में नहीं पहुंच जाती या जब तक आत्मा का प्रकाश मस्तिष्क में चमकने न लग जाय..किसी व्यक्ति की दिव्यता , कोई व्यक्ति सच्चा है या नहीं यह जान पाना कठिन है।वैसे आत्मा की अभिव्यक्ति ह्दय में होती है अर्थात आत्मा का केन्द्र ह्दय में होता है , लेकिन वास्तव में आत्मा की पीठ ऊपर है जिसे हम सर्व शक्तिमान परमात्मा ,,सदा शिव,परवर्दिगार कहते हैं ..जिस नाम से भी भगवान को बुलाया जाता है,बुलाते हैं। कुण्डलिनी के सहस्रार में प्रवेश करने में एकादश रुद्र सबसे बडी समस्या है ।यह समस्या भवसागर से आती है,इस प्रकार यह तालू क्षेत्र में भी प्रवेश करती है। सहस्रार का अर्थ है.. =हजार, अनंत, असंख्य ।इन सब चक्रों के ऊपर, महाचक्र है,जिसे सहस्रार के नाम से जाना जाता है।हजार दलों वालें महापद्म पर,जिसे साधना ही महासाधना है ;वही सत्यलोक है। अमरत्व, मुक्ति,निर्वाण सब कुछ वहीं पहुचने पर है।सारी तैयारी उसी की साधना की है।मनुष्य शरीर के कपाल के उर्ध्व भाग में स्थित सहस्रार चक्र के बारे में आदि शंकराचार्य जी कहते हैं कि “विद्युतधारा की तरह इन छह चक्रों से होती हुई, ऊपर सहस्रार कमल में तुम जा विराजती हो |सूर्य, चन्द्र और अग्नि (इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना) तुम्हारी कला पर आश्रित हैं | मायातीत जो परात्पर महापुरुष हैं, तुम्हारी ही आनंदलहरी में स्नान करते हैं” |

8-सहस्रार पर पहुंचने पर साधक निवर्विचार हो जाता है और कोई स्वर नहीं निकलता है | ह्दय में शुद्ध स्पंदनहोता है-लप-टप-लप- टप ।ये सारे स्वर एकत्रित होकर इस समन्वय से उत्पन्न होने वाला स्वर ओं …होता है।सूर्य के सातों रंग अंततः सफेद किरणें बन जाती हैं या स्वर्णिम रंग की किरणें । ह्दय सात चक्रों के सात परिमलों से घिरा हुआ है और इसके अन्दर आत्मा निवास करती है । आपके सिर के शिखर पर सर्व शक्तिमान सदाशिव निवास करते हैं ।कुण्डलिनी जब इस विन्दु को छूती है तो आपकी आत्मा प्रसारित होने लगती है,और आपके मध्य नाडी तन्त्र पर कार्य करने लगती है क्योंकि स्वतःचैतन्य लहरियॉ /वाइब्रेशन्स आपके मस्तिष्क में प्रवाहित होने लगती है ,और आपकी नाडियों को ज्योतिर्मय करती है।परन्तु अभी भी ह्दय में पहचान नहीं आई लेकिन आप शीतल लहरियॉ महसूस करने लगते हैं। आप उस स्थिति में दूसरों की कुंण्डलिनी उठा सकते हैं,लोगों को रोग मुक्त कर सकते हैं तथा और भी बहुत से कार्य कर सकते हैं।

9-परन्तु अभी भी यह पहचान नहीं है क्योंकि पहचान आपके ह्दय की मानसिक गतिविधि है । आपको याद रखना होगा कि ह्दय पूरी तरह से मस्तिष्क से जुडा हुआ है, ह्दय जब रुक जाता है तो मस्तिष्क भी रुक जाता है।सारा शरीर बेकार हो जाता है।कोई खतरा दिखने लगता है कि ह्दय धडकने लगता है। आपके ह्दय में जब दिव्यत्व और आध्यात्मिकता का अनुभव विकसित होने लगता है तब आप जान पाते हैं कि आप दिव्य व्यक्ति हैं ।और जब तक आप पूर्ण रूपेण विश्वस्त नहीं होते कि आप दिव्य व्यक्ति हैं तो चाहे जितनी क्षद्धा आपमें हो यह पहचान अधूरी है। हम जब भी और जहॉ भी विद्युत चुम्बकीय शक्ति को कार्य करते हुये देखते हैं तो यह हनुमान जी के आशीर्वाद से होता है।वे ही विद्युत चुम्बकीय शक्तियों का सृजन करते हैं ।

गणेश मूलाधार चक्र पर विराजमान हैं ।श्री गणेश जी के अन्दर चुम्बकीय शक्तियॉ हैं ; पदार्थ की अवस्था में वे मस्तिष्क तक जाते हैं । मस्तिष्क के विभिन्न पक्षों में सहसम्बंधों का सृजन करते हैं।अतः गणेश जी हमें बुद्धि प्रदान करते हैं तो श्री हनुमान हमें सद्विवेक प्रदान करते हैं ।क्योंकि कुण्डलिनी गौरी शक्ति है और गणेश जी हर क्षण उनकी रक्षा करने के लिए वहॉ होते हैं, इतना ही नहीं,बल्कि कुण्डलिनी के चक्र भेदन करने के बाद श्री गणेश उस चक्र को बन्द कर देते

हैं, ताकि कुण्लिनी फिर नीचे न चली जाय ।शिव आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं और आत्मा का निवास आपके ह्दय में है।वास्तव में,सदा शिव का स्थान आपके सिर के शिखर पर है परन्तु वे आपके ह्दय में प्रतिविम्बित होते हैं।आपका मस्तिष्क विठ्ठल है अथार्त हरिहर ।पूरी साधना हरिहर को समझने की ही है।हरि माया का प्रतिनिधित्व करते हैं और हर आत्मा का।जब तक दोनों ... मस्तिष्क और आत्मा में यह वाइब्रेशन नहीं पहुंचता ;हमारी साधना का लक्ष्य भी पूरा नहीं होता। आत्मा को आपके मस्तिष्क में लाने का अर्थ आपके मस्तिष्क का ज्योतिर्मय होना है।अर्थात परमात्मा का साक्षात्कार करने की आपके मस्तिष्क की सीमित क्षमता का असीमित बनना है।

10-जब आत्मा मस्तिष्क में आती है तो आप जीवन्त चीजों का सृजन करते हैं..मृत भी जीवित की तरह से व्यवहार करने लगता है। सहस्रार चक्र में ‘अ’ से ‘क्ष’ तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। पिट्यूटी और पीनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इसमें संबंधित है। यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाईं आंख को नियंत्रित करता है।यह आत्मज्ञान, आत्म दर्शन, एकीकरण, स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केंद्र है। सहस्रार को कैलास पर्वत के रूप में इंगित करने तथा भगवान शंकर के तप रत होने की स्थिति को भी कहते हैं। सहस्रार चक्र दोनों कनपटियों से दो-दो इंच अंदर और भौहों

से भी लगभग तीन-तीन इंच अंदर मस्तिष्क मध्य में महावीर नामक महारुद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योतिपुंज के रूप में अवस्थित है। तत्वदर्शीयों के अनुसार यह छोटे उलटे कटोरे के समान दिखाई देता है।सहस्रार को जागृत कर लेने वाला व्यक्ति संपूर्ण भौतिक विज्ञान की सिद्धियां हस्तगत कर लेता है। यही वह शक्ति केंद्र है जहां से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है। और विश्व में जो कुछ भी मानव-हित के लिए विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है उस का संपादन करता है। इसे ही दिव्य दृष्टि का स्थान कहते है। मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सभी चक्रों के जागरण की कुंजी सहस्रार चक्र के पास ही है ... यही सारे चक्रों का मास्टर स्विच है।

...SHIVOHAM....