भगवान श्रीकृष्ण तथा क्रिया योग...


NOTE;-महान शास्त्रों और गुरूज्ञान का संकलन...

क्रिया योग क्या है?

10 FACTS;-

1-क्रिया योग की साधना करने वालों के द्वारा इसे एक प्राचीन योग पद्धति के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसे आधुनिक समय में महावतार बाबाजी के शिष्य लाहिरी महाशय के द्वारा 1861 के आसपास पुनर्जीवित किया गया और परमहंस योगानन्द की पुस्तकऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए योगी (एक योगी की आत्मकथा) के माध्यम से जन सामान्य में प्रसारित हुआ। इस पद्धति में प्राणायाम के कई स्तर होते है जो ऐसी तकनीकों पर आधारित होते हैं जिनका उद्देश्य आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया को तेज़ करना और प्रशान्ति और ईश्वर के साथ जुड़ाव की एक परम स्थिति को उत्पन्न करना होता है। इस प्रकार क्रिया योग ईश्वर-बोध, यथार्थ-ज्ञान एवं आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने की एक वैज्ञानिक प्रणाली है।परमहंस योगानन्द के अनुसार क्रियायोग एक सरल मनःकायिक प्रणाली है, जिसके द्वारा मानव-रक्त कार्बन से रहित तथा ऑक्सीजन से प्रपूरित हो जाता है। इसके अतिरिक्त ऑक्सीजन के अणु जीवन प्रवाह में रूपान्तरित होकर मस्तिष्क और मेरूदण्ड के चक्रों को नवशक्ति से पुनः पूरित कर देते है। प्रत्यक्ष प्राणशक्ति के द्वारा मन को नियन्त्रित करनेवाला क्रियायोग अनन्त तक पहुँचने के लिये सबसे सरल प्रभावकारी और अत्यन्त वैज्ञानिक मार्ग है।

2-बैलगाड़ी के समान धीमी और अनिश्चित गति वाले धार्मिक मार्गों की तुलना में क्रियायोग द्वारा ईश्वर तक पहुँचने के मार्ग को विमान मार्ग कहना उचित होगा।मनुष्य की श्वसन गति और उसकी चेतना की भिन्न भिन्न स्थिति के बीच गणित के अनुसार सम्बन्ध होने के अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। मन की एकाग्रता धीमे श्वसन पर निर्भर है। तेज या विषम श्वास भय, काम क्रोध आदि हानिकर भाव आवेगों की अवस्था का सहचर है।जैसा की योगानन्द द्वारा क्रिया योग को वर्णित किया गया है, "एक क्रिया योगी अपनी जीवन उर्जा को मानसिक रूप से नियंत्रित कर सकता है ताकि वह रीढ़ की हड्डी के छः केंद्रों के इर्द-गिर्द ऊपर या नीचे की ओर घूमती रहे (मस्तिष्क, गर्भाशय ग्रीवा, पृष्ठीय, कमर, त्रिक और गुदास्थि संबंधी स्नायुजाल) जो राशि चक्रों के बारह नक्षत्रीय संकेतों, प्रतीकात्मक लौकिक मनुष्य के अनुरूप हैं। मनुष्य के संवेदनशील रीढ़ की हड्डी के इर्द-गिर्द उर्जा के डेढ़ मिनट का चक्कर उसके विकास में तीव्र प्रगति कर सकता है; जैसे आधे मिनट का क्रिया योग एक वर्ष के प्राकृतिक आध्यात्मिक विकास के एक वर्ष के बराबर होता है।"

3- क्रिया साधना "आत्मा में रहने की पद्धति" की साधना है"। प्राचीन भारत में क्रिया योग भली भांति जाना जाता था, लेकिन अंत में यह खो गया, जिसका कारण था पुरोहित गोपनीयता और मनुष्य की उदासीनता। योगानन्द जी का कहना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता में क्रिया योग को संदर्भित किया है। जब "भगवान श्रीकृष्ण यह बताते है कि उन्होंने ही अपने पूर्व अवतार में अविनाशी योग की जानकारी एक प्राचीन प्रबुद्ध, वैवस्वत को दी जिन्होंने इसे महान व्यवस्थापक मनु को संप्रेषित किया। इसके बाद उन्होंने, यह ज्ञान भारत के सूर्य वंशी साम्राज्य के जनक इक्ष्वाकु को प्रदान किया। क्रिया योग शारीरिक अनुशासन, मानसिक नियंत्रण और ॐ पर ध्यान केंद्रित करने से निर्मित है। उस प्रणायाम के जरिए मुक्ति प्राप्त की जा सकती है जो प्रश्वसन / INSPIRATORYऔर अवसान/Fag end के क्रम को तोड़ कर प्राप्त की जाती है। क्रिया के साथ कई विधियां जुडी हुई हैं जो प्रमाणित तौर पर गीता, योग सूत्र, तन्त्र शास्त्र और योग की संकल्पना से ली गयी हैं।

4-क्रिया योग एक प्राचीन ध्यान की तकनीक है, जिससे हम प्राण शक्ति और अपने श्वास को नियंत्रण में ला सकते हैं।यह तकनीक 1861 में पुनरुज्जीवित हुई जब महान संत महावतार बाबाजी ने यह तकनीक अपने शिष्य लाहिड़ी महाशय को सिखाई। लाहिड़ी महाशय ने फिर यह तकनीक अपने शिष्यों को सिखाई, जिनमे से एक स्वामी श्री युक्तेश्वर जी थे, जिन्होंने अपने शिष्यों को यह तकनीक सिखाई, जिनमे से एक परमहंस योगानंद जी थे।योगानंद जी ने फिर अपनी किताब ‘एक योगी की आत्मकथा’ के द्वारा और पश्चिमी देशों में इसके शिक्षण द्वारा क्रिया योग को प्रचलित किया।परमहंस योगानंद जी के अनुसार- योग के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए , क्रिया योग आज के ज़माने में मनुष्य को उपलब्ध सबसे प्रभावशाली तकनीक है। क्रिया योग इतना प्रभावशाली इसलिए है क्योंकि वह विकास के स्रोत के साथ प्रत्यक्ष रूप से काम करता है।

5-हमारी मेरुदंड के भीतर आध्यात्मिक शक्ति है।सभी योग कीं तकनीकें इसी शक्ति के साथ काम करतीं है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से।उदाहरण स्वरूप, योगासन Spine के अंदर मार्ग खोलने में मदद कर सकते हैं, एवं Spine के भीतर की शक्ति को संतुलित कर सकते हैं। योग श्वास-नियंत्रण तकनीक अथार्त प्राणायाम, इस शक्ति को जागरूक करने में मदद कर सकतें हैं।

परन्तु क्रिया योग इनसे अधिक प्रत्यक्ष है। यह तकनीक अभ्यास करने वाले की प्राण-शक्ति को नियंत्रित करने में मदद करती है। जब इस तकनीक को चेतना और इच्छाशक्ति के साथ किया जाए तो प्राण-शक्ति मानसिक रूप से मेरुदंड में ऊपर और नीचे ले जाई जा सकती है।योगानंद जी के अनुसार, एक क्रिया, जिसको करने में आधे मिनट के करीब लगता है, एक साल के कुदरती आध्यात्मिक विकास के बराबर है।क्रिया योगी पातें है कि उनकी धारणा शक्ति बढ़ जाती है, ताकि वे व्यापार और गृहस्थ जीवन में प्रभावशाली बन सकें, और हर तरह से अच्छा इंसान बन सकें।क्रिया योग एक साधन है जिसके द्वारा मानवीय विकास को तीव्र किया जा सकता है। प्राचीन ऋषियों ने खोज की कि ब्रह्माण्डीय चेतना के रहस्य का श्वास पर नियंत्रण के साथ गहरा संबंध है। ह्रदय की धड़कन को कायम रखने में सामान्यतः जो प्राण शक्ति लगती है उसे श्वास की अंतहीन माँगों को शान्त करने और रोकने की विधि द्वारा, उच्चतर कार्यों के लिए मुक्त किया जाना चाहिए।

6-भगवान श्रीकृष्ण तथा क्रियायोग;-

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा :

“मैंने विवस्वत (सूर्य-देव) को यह अविनाशी योग प्रदान किया; विवस्वत ने यह ज्ञान मनु को दिया; मनु ने इसके बारे में इक्ष्वाकु (क्षत्रियों के सूर्यवंश के संस्थापक) को बताया। इस प्रकार क्रमपूर्वक एक-से-दूसरे तक आते हुए, राजर्षियों ने इसे जाना था। परन्तु, हे शत्रुओं को भस्मीभूत करने वाले (अर्जुन)! कालांतर में, यह योग धरती पर से लुप्त हो गया था।” “अन्य भक्त प्राण के भीतर जाते श्वास को अपान के बाहर जाते प्रश्वास में, तथा अपान के बाहर जाते प्रश्वास को प्राण के भीतर जाते श्वास में हवन करते हैं, और इस प्रकार प्राणायाम (क्रियायोग की प्राणशक्ति पर नियन्त्रण विधि) के निष्ठावान् अभ्यास द्वारा श्वास एवं प्रश्वास के कारण को रोक देते हैं अथार्त सांस लेना अनावश्यक बना देते हैं)।”इस प्रकार ये दो श्लोक राजसी योग की ऐतिहासिक पुरातनता की घोषणा करते हैं ..आत्मा और परमात्मा को जोड़ने वाला शाश्वत, अपरिवर्तनीय विज्ञान। इसके साथ ही, गूढ़ रूप में समझने पर, ये श्लोक इस विज्ञान का एक संक्षिप्त वर्णन करते हैं। ये श्लोक उन चरणों के बारे में बताते हैं जिनके द्वारा आत्मा, विश्व-चैतन्य से मानव शरीर के साथ पहचान की नश्वर अवस्था में उतरी है, तथा किस मार्ग के द्वारा यह परमानंदमय अनन्त परमात्मा रूपी अपने स्रोत तक वापस लौट सकती है।

7-आरोहण/ Ascent, अवरोहण/ Ascent-Descent के रास्ते का ठीक उलटा है। मनुष्य में यह रास्ता अनन्त को जाने का आंतरिक राजमार्ग है। सभी युगों में सभी धर्मों के अनुयायियों के लिये परमात्मा से मिलन का यह एकमात्र मार्ग है। इस एकमात्र राजमार्ग पर व्यक्ति विश्वासों या साधना-प्रणालियों के किसी भी उपमार्ग द्वारा पहुँचे : शरीरी चेतना से ब्रह्म तक का अंतिम आरोहण सबके लिये समान है। यह आरोहण, प्राण-शक्ति और चेतना का इन्द्रियों से प्रत्याहार होकर, सूक्ष्म मस्तिष्क मेरु केंद्रों (Cerebrospinal Centres) में प्रकाश के द्वारों के द्वारा ऊपर जाने से होता है। जड़-तत्त्व की चेतना प्राण-शक्ति में विलीन हो जाती है, प्राण-शक्ति मन में, मन आत्मा में, और आत्मा ब्रह्म में विलीन हो जाती है।आरोहण की विधि राजयोग है। राजयोग का अनन्त विज्ञान, सृष्टि के उत्पन्न होने के साथ ही, सृष्टि में अंतर्भूत रहा है।क्रिया प्राणायाम करने की राजयोग की एक विकसित विधि है। क्रिया मस्तिष्क व मेरुदंड में सूक्ष्म प्राण ऊर्जा को सुद्रढ एवं पुनर्जीवित करती है।

8-भारत के प्राचीन ऋषियों ने मस्तिष्क और मेरुदंड को जीवन के वृक्ष के रूप में निरूपित किया था। क्रिया के अभ्यास के परिणामस्वरूप अत्यंत शांति और आनंद प्राप्त होता है। क्रिया से प्राप्त आनन्द, समस्त सुखदायक भौतिक संवेदनाओं के एकत्रित आनन्द से अधिक होता है।इन्द्रिय जगत् से अनासक्त हो, योगी आत्मा के नित्य-नवीन आनंद का अनुभव करता है। आत्मा एवं परमात्मा के दिव्य मिलन में लीन हो, वह अविनाशी आनंद प्राप्त करता है।योगियों ने यह खोज निकाला था कि विशेष क्रियायोग की विधि के प्रयोग द्वारा प्राण ऊर्जा को निरंतर ऊपर और नीचे मेरुदंड के मार्ग से प्रवाहित करके, यह संभव है कि व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास और चेतना बहुत अधिक तीव्र गति से किया जा सके।प्रयोग का सही अभ्यास हृदय तथा फेफड़ों और तंत्रिका तंत्र की सामान्य गतिविधियों को स्वाभाविक रूप से धीमी गति में पहुंचा देता है जिससे शरीर और मन में आंतरिक शांति भर जाती है तथा बाहरी जगत में होने वाली हलचल जो विचारों, भावनाओं और इंद्रियों के विषयों के ग्रहण करने से उत्पन्न होती हैं, उन्हें शांत किया जा सकता है। स्थिर अंतःकरण की स्पष्ट अवस्था में, साधक को एक गहरी शांति का अनुभव होता है और वह स्वयं को अपनी आत्मा के और परमात्मा की चेतना के बहुत निकट अनुभव करता है।

9-जो लोग कभी क्रियायोग का अभ्यास किये बिना नहीं रहते, और जो ध्यान में लम्बे समय तक बैठते हैं एवं ईश्वर से तीव्रता से प्रार्थना करते हैं, वे उस चिर वांछित खज़ाने को अवश्य प्राप्त करेंगे।पहले अपने हृदय में एक अनन्त शान्ति, और इसके बाद एक परम आनन्द को अनुभव करने का प्रयास करते हुए इस विचार पर ध्यान लगाएँ, “मैं और मेरे परमपिता एक हैं।” जब उस परम आनन्द का अनुभव होने लगे, तो कहें, “परमपिता, आप मेरे साथ हैं। अपने अन्तर में स्थित आपकी शक्ति को मैं आदेश देता हूँ कि वह बुरी आदतों की मेरी मस्तिष्कीय कोशिकाओं को, और पुराने प्रवृत्ति-बीजों को भस्मिभूत कर दे।” ध्यान में ईश्वर की शक्ति ऐसा कर देगी। पुरुष या स्त्री होने की संकीर्ण चेतना से खुद को छुटकारा दिलाये, यह जानें कि आप ईश्वर के बच्चे हैं। फिर मानसिक रूप से प्रतिज्ञापन करें और ईश्वर से प्रार्थना करें : “मैं अपने मस्तिष्क की कोशिकाओं को आज्ञा देता हूँ कि वे बदल जाएँ, कि वे बुरी आदतों के उन खाँचों को ध्वस्त कर दें जिन्होंने मुझे एक कठपुतली बना दिया है। हे प्रभु! अपने दिव्य प्रकाश में इन्हें भस्म कर दें।” और जब आप विशेष रूप से ध्यान क्रियायोग की विधियों का अभ्यास करेंगे, तो आप वास्तव में देखेंगे कि परमेश्वर का प्रकाश आप को निर्मल कर रहा है।ईश्वर के साथ समस्वरता के द्वारा आप अपनी अवस्था को एक नश्वर जीव से एक अमर प्राणी में बदल सकते हैं। जब आप ऐसा करेंगे, आपकी सीमितताओं के सभी बंधन टूट जायेंगे। यह एक बहुत ही महान् नियम है जिसे याद रखना चाहिये।

10-जैसे ही आपका ध्यान केन्द्रित होता है, सभी शक्तियों की शक्ति आपकी सहायता के लिये आयेंगे और इसके साथ ही आप आध्यात्मिक, मानसिक और भौतिक सफलता प्राप्त कर सकेंगे।सबसे महान् प्रेम जो आप अनुभव कर सकते हैं वह ध्यान में ईश्वर के साथ एकत्व में ही प्राप्त किया जा सकता है। आत्मा और परमात्मा के बीच का प्रेम पूर्ण प्रेम है-वह प्रेम जिसे हम सब खोज रहे हैं।… यदि आप गहनता से ध्यान करेंगे तो एक ऐसा प्रेम आप पर छा जायेगा जो अवर्णनीय है और आप दूसरों को वह विशुद्ध प्रेम देने में सक्षम हो जायेंगे। जब आप उस दिव्य प्रेम का अनुभव करेंगे, तब आप फूल और जानवर में, एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य में कोई अंतर नहीं देखेंगे। आप सारी प्रकृति के साथ एकात्मता स्थापित करेंगे और समस्त मानवजाति से समान रूप से प्रेम करेंगे।भय की समाप्ति भी ईश्वर के संपर्क से ही आती है, अन्य किसी विधि से नहीं। योग के द्वारा आप उनसे वह संपर्क स्थापित कर सकते हैं।यदि आप प्रभु से प्रेम करते हैं तो आप क्रिया का अत्यधिक भक्ति और निष्ठा के साथ अभ्यास करेंगे। प्रभु को क्रियायोग और प्रार्थना द्वारा निरन्तर खोजें; प्रसन्नचित्त बनें, क्योंकि भगवद्गीता का उद्धरण देते हुए महावतार बाबाजी ने एक बार कहा था : “इस सच्चे धर्म का थोड़ा-सा भी अभ्यास (जन्म-मृत्यु के चक्र में निहित) महान् भय से तुम्हारी रक्षा करेगा।”जब क्रियायोग द्वारा मन इन्द्रियजन्य विकारों से रहित हो जाता है, तब ध्यान हमारे प्रत्येक अणु को भी ईश्वर की प्रतीति करा देता है। और ध्यान में हमारी प्रत्येक समस्या के लिये ईश्वर का तत्क्षण मार्गदर्शन, उसका समुचित प्रत्युत्तर, भी मिलता है।


क्रियायोग पथ की ध्यान की विधियां;-

परमहंस योगानंद एक योगी की आत्मकथा में क्रिया योग का विस्तार से विवरण प्रदान किए हैं।क्रिया योग ध्यान के प्रमुख तीन तकनीक हैं जो इस प्रकार हैं -

1- ऊर्जावान व्यायाम/शक्ति-संचार की प्रविधि

2- एकाग्रता की हंसः प्रविधि

3-ओम् ध्यान की तकनीक

1-शक्ति-संचार की विधि;-

परमहंस योगानन्दजी द्वारा वर्ष 1916 में विकसित की गई मनोभौतिक व्यायाम प्रणाली की श्रंखला शरीर को ध्यान के लिए तैयार करती है। नित्य प्रति के अभ्यास से मानसिक व बौद्धिक विश्राम प्राप्त होता है तथा उर्जस्वी संकल्प शक्ति का विकास होता है। सांस, प्राण वायु और एकाग्रता का प्रयोग करके यह विधि साधक को अपनी इच्छा अनुसार ऊर्जा अपने शरीर में आकर्षित करने में समर्थ बनाती है जिससे शरीर के अंगों का शुद्धिकरण होता है और साथ ही वह अधिक पुष्ट भी हो जाते हैं। शक्ति-संचार व्यायाम जो लगभग 15 मिनट में पूरे किए जाते हैं ...दबाव दूर करने व तंत्रिका तंत्र का तनाव मिटाने की विधियों में से एक सबसे अधिक प्रभावशाली विधि है। ध्यान से पहले इसका अभ्यास करने से चेतना की शांत, अंतर्मुखी अवस्था पाने में बहुत सहायता मिलती है।प्राणायाम की वैज्ञानिक विधि की सहायता से योगी अंततः उस बहिर्मुखी प्राण-शक्ति को उलटने में सफल होता है जिसने उसकी चेतना को श्वास एवं हृदय की कार्यशीलता में तथा विषयों में फँसे प्राण–प्रवाहों में बहिर्मुखी बना रखा था।वह आत्मा व परमात्मा के नैसर्गिक आंतरिक शांति साम्राज्य में प्रवेश करता है।Sensory और Motor तंत्रिकाओं से मन और प्राण-शक्ति को वापस हटा कर, योगी उन्हें मेरुदण्ड के द्वारा मस्तिष्क में, और फिर अनन्त प्रकाश में ले जाता है। यहाँ मन एवं प्राण-शक्ति, मस्तिष्क में अभिव्यक्त ब्रह्म के शाश्वत ज्ञान के साथ एक हो जाते हैं।

2-एकाग्रता की हंसःविधि ;-

हंसः प्रविधि एकाग्रता की सुप्त शक्तियों को जाग्रत करने में सहायता करती है।प्राण-शक्ति, जड़-सृष्टि और परमात्मा के बीच की कड़ी है। बहिर्मुखी होकर, यह इन्द्रियों के छद्म-आकर्षक जगत् को प्रकट करती है। अंतर्मुखी हो जाने पर यह चेतना को ईश्वर के सदा-संतुष्टिकारी परमानंद की ओर खींचती है। इस प्रविधि के अभ्यास से साधक बाह्य विकर्षणों से अपने विचारों और प्राणशक्ति को हटा कर उन्हें किसी वांछित लक्ष्य की प्राप्ति पर या फिर किसी समस्या के समाधान के लिए केंद्रित करना सीखता है। अथवा साधक उस एकाग्र किये गए मन को अंतर में स्थित दिव्य चेतना का बोध प्राप्त करने के लिए प्रयोग कर सकता है।

3-ओम् विधि;-

ध्यान की ओम् प्रविधि से साधक अपनी एकाग्रता की शक्ति को उच्चतम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयोग करना सीखता है – यानि अपने ही आत्म-स्वरुप के दिव्य गुणों को पहचानने एवं विकसित करने के लिए। यह पुरातन विधि सिखाती है ओमकार के रूप में सर्वव्यापी दिव्य शक्ति का अनुभव किस प्रकार किया जा सकता है, उस दिव्य शक्ति का जो संपूर्ण सृष्टि का सृजन करती है और उसका पालन-पोषण करती है। यह प्रविधि चेतना का विस्तार करती है जिससे साधक अपने शरीर और मन के परिसीमनों को लांघकर अपनी अनंत क्षमताओं का आनंदमय बोध प्राप्त करता हैं ।यदि कोई सर्वदा छः केन्द्रोंमें सनातन अक्षर ॐकार के माध्यम से ध्यान करता है, तब ॐ कारके ध्वनि एवं स्वरूपके माध्यमसे वह ध्वनिसे भी परे विशुद्ध कूटस्थमें एकाकार हो जाता है | समस्त देवता उसी ॐकार के प्रभावसे ही उत्पन्न हुए हैं |दूसरे शब्दोंमें सारे देवता क्रियासे ही प्रकट हुए हैं एवं सारे स्वर ॐकार से प्रकट हुए हैं | यह शब्दब्रह्म है, अर्थात् शब्दके साथ परमसत्ता, और निशब्द भी है, अर्थात् क्रिया परावस्थामें शब्दसे परे की स्थिति | अतः शब्द को छोड़कर और कुछ जानने में नहीं आता | इसीलिये सबकुछ, यहाँ तक पाताललोक, मर्त्यलोक एवं स्वर्गलोक भी ॐकार से प्रकट हुए हैं | पाताल है पैरों से नाभि पर्यन्त, मर्त्य है नाभि से कण्ठ पर्यन्त, स्वर्गलोक हैं कण्ठसे मस्तक पर्यन्त | शरीरस्थित कूटस्थब्रह्म ही जीव हैं, वही शिव हैं, चराचर तीनों लोकोंमें व्याप्त हैं | वही सत्ता , कूटस्थब्रह्म ही चराचर जगत में ॐकार हैं ।

.....SHIVOHAM....