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क्या साक्षी,समर्पण और समाधि है ध्यान की पूर्णता ?

साधना करने के लिए आवश्यक हैं अन्तर्नाद, सुमिरन तथा 'प्रेम अथवा भक्ति' ।अन्तर्नाद का अर्थ है परमात्मा के साथ संबंध स्थापित कर, उसका अंश होने की प्रतीत कर उसकी याद में जीना।अन्तर्नाद के द्वारा हम द्वैत से मुक्त हो सकते हैं।सुमिरन के लिए आवश्यक है गुरु का संग, नाद श्रवण, सहजता, गहरी सांस, आत्मस्मरण, नाद के स्रोत का ज्ञान, मन्त्र (Auto suggestion) और सांसारिक उत्तरदायित्व।प्रेम अथवा भक्ति का अर्थ है गोविन्द के साथ जीवन की सहभागिता का आनंद लेना। भक्ति रिक्तता से मुक्त करती है।प्रेम की मंजिल गोविन्द है, नित्य प्रेम है, अथवा मंजिल है ही नहीं, क्योंकि हमें गोविन्द तक जाना नहीं होता, बल्कि स्वयं गोविन्द हमारे पास आ जाते है ,हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते है।


वास्तव में,निराकार के प्रति सतत जागरूकता ध्यान है। ध्यान के द्वारा हम अहंकार से मुक्त हो सकते हैं। ध्यान की उपलब्धि मौन है और उसकी मंजिल है साक्षी होना। साक्षी होने का अर्थ है अपने निराकार स्वरूप का बोध रखते हुए कर्म करने का आनंद लेना। साक्षी के द्वारा हम षट् रिपुओं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष से मुक्त हो सकते हैं।साक्षी की उपलब्धि समर्पण है। समर्पण का अर्थ है अपने आत्मबोध में ,अवेयरनेस में स्थिर होना।समर्पण भाव के द्वारा हम शिकायत भाव से मुक्त हो सकते हैं और मंजिल है समाधि।

समाधि का अर्थ है अंतराकाश में विश्राम।जिसके लिए राजस्थान के संत दरिया कहते हैं-''जात हमारी ब्रह्म है, माता-पिता है राम। गृह हमारा सुन्न में, अनहद में बिसराम। एक ही बात याद रखना हैं कि परमात्मा के सिवा न हमारी कोई माता है, न हमारा कोई पिता है। और ब्रह्म के सिवाय हमारी कोई जात नहीं। ऐसा बोध अगर हो, तो जीवन में क्रांति हो जाती है। और तब तुम्हारे जीवन में पहली बार धर्म के सूर्य का उदय होता है। तब तुम्हें पता चलेगा कि शून्य में हमारा असली घर है। परम शून्य में, परम शांति में, जहां लहर भी नहीं उठती, ऐसे शांत सागर में , जहां कोई विचार की तरंग नहीं, कोई उपद्रव नहीं, जहां शून्य संगीत बजता है, जहां अनाहत नाद गूंज रहा है ....वहीं हमारा घर है और जिसने उस शून्य को पा लिया, उसने ही विश्राम पाया। और ऐसा विश्राम जिसकी कोई हद नहीं है, जिसकी कोई सीमा नहीं है। समाधि के द्वारा हम भय से मुक्ति पा सकते हैं।

..SHIVOHAM....