क्या है भगवान गणेश के 32 सबसे खास रूप औरअष्टविनायक मंदिर की महिमा?

गणेश चतुर्थी पर्व ;-

04 FACTS;-

1-हरतालिका तीज (Hartalika Teej) के अगले दिन से गणेश चतुर्थी पर्व की शुरुआत हो जाती है। ये पर्व पूरे 10 दिनों तक चलता है।शुक्रवार, 10 सितंबर 2021 को रिद्धि-सिद्धि के दाता, प्रथम पूज्य, लोक मंगल के देवता, सुख संपदा और समृद्धि प्रदान करने वाले देवता भगवान श्रीगणेश का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। इस साल गणेश चतुर्थी पर भद्रा का साया नहीं रहेगा। गणेश चतुर्थी के दिन 11 बजकर 09 मिनट से 10 बजकर 59 मिनट तक पाताल निवासिनी भद्रा रहेगी। शास्त्रों के अनुसार, पाताल निवासिनी भद्रा का योग शुभ माना जाता है।गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की कृपा से सुख-शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था। भाद्रपद माह की गणेश चतुर्थी पर भगवान गणपति घर-घर विराजते हैं। पंडालों में इनकी बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं सभी के आर्कषण का केंद्र बिन्दु होती हैं। भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र व रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्रीगणेश से अधिक लोकप्रिय शायद ही कोई देवता होंगे, क्योंकि हर शुभ कार्य का शुभारंभ ''श्री गणेशाय नमः'' से होता है।

2-भगवान गणेश ज्ञान और बुद्धि के देवता हैं। ये विघ्नहर्ता, परेशानियों को दूर करने वाले और सभी देवताओं में प्रथम पूज्य गणाधिपति ही हैं, जिन्हें किसी दूसरे का आदेश मानने की मजबूरी नहीं।हिंदू धर्म में गणपति का महत्व बहुत अधिक होता है।हर महीने की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी का व्रत भक्त रखते हैं। लेकिन भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की गणेश चतुर्थी का महत्व खास होता है। ये तीन से दस दिनों का महोत्सव होता है जो देश के हर कोने में धूम-धाम से मनाया जाता है। गण + पति = गणपति। संस्कृतकोशानुसार ‘गण’ अर्थात पवित्रक। ‘पति’ अर्थात स्वामी, ‘गणपति’ अर्थात पवित्रकों के स्वामी।गणेश का अर्थ होता है गणों का ईश और आदि का अर्थ होता है सबसे पुराना यानी सनातनी।

3-मान्यता ऐसी है कि गणेश चतुर्थी में जो लोग गणेश जी को अपने घरों में विराजते हैं उनके आशीर्वाद से भक्तों के घर में रिद्धि-सिद्ध, धन-धान्य भरा रहता है। साथ ही, मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। किंतु भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है।जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा-कलंक प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों का निर्देश है। यह अनुभूत भी है।इस गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले व्यक्तियों को उक्त परिणाम अनुभूत हुए, इसमें संशय नहीं है। यदि जाने-अनजाने में चन्द्रमा दिख भी जाए तो निम्न मंत्र का पाठ अवश्य कर लेना चाहिए-''सिहः प्रसेनम्‌ अवधीत्‌, सिंहो जाम्बवता हतः।सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्वमन्तकः॥''मानसिक परेशानियों दूर करने के लिए गणेश अथर्वशीष का पाठ करना चाहिए।

4-शास्त्रों में भगवान गणेश के कई स्वरूपों का वर्णन किया गया है और मान्यता है कि इनके हर एक रूप में सुख और समृद्धि का वास होता है।गणेश जी की अलग-अलग मूर्तियां अलग-अलग तरह के फल देती हैं। सबसे ज्यादा पीले रंग की और रक्त वर्ण की मूर्ति की उपासना शुभ होती है। नीले रंग के गणेश जी को नीले रंग के गणेश जी को "उच्छिष्ट गणपति" कहते हैं, इनकी उपासना विशेष दशाओं में ही की जाती है। हल्दी से बनी हुई या हल्दी का लेपन की हुई मूर्ति "हरिद्रा गणपति" कहलाती है, गणपति की ये मूर्ति कुछ विशेष मनोकामनाओं के लिए शुभ मानी जाती है। एकदंत गणपति श्यामवर्ण के होते हैं, इनकी उपासना से अदभुत पराक्रम की प्राप्ति होती है।

भगवान गणेश के 32 सबसे खास रूप;-

32 FACTS;-

1-श्री बाल गणपति ;-

भगवान गणेश का यह स्वरूप बाल गणपति के रूप में है। भगवान के इस स्वरूप में उनकी छ: भुजाओं में अलग-अलग फल है और उनका शरीर लाल रंग का है। गणेश चतुर्थी पर बाल गणपति के इस इस रूप की पूजा होती है। यह भगवा न गणेश का बाल रूप है। यह धरती पर बड़ी मात्रा में उपलब्ध संसाधनों का और भूमि की उर्वरता का प्रतीक है। उनके चारों हाथों में एक-एक फल है- आम, केला , गन्ना और कटहल। गणेश चतुर्थी पर भगवान के इस रूप की पूजा भी की जाती है। यह रूप संकट में भी बाल सुलभ सहजता की प्रेरणा प्रेरणा देता है। इंसान की आगे बढ़ने की क्षमता दर्शाता है।  

2-श्री तरुण गणपति; -

भगवान गणेश का यह स्वरूप उनके किशोर रूप को दर्शाता है। इनके इस रूप में आठ भुजाओं वाला रक्तवर्ण शरीर है। इनका यह स्वरूप युवावस्था में शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक माना गया है।यह गणेश जी का किशोर रूप है। उनका शरीर

लाल रंग में चमकता है। इस रूप में उनकी 8 भुजा एं हैं। उनके हाथों में फलों के साथसाथ मोदक और अस्त्र-शस्त्र भी हैं। यह रूप आंतरिक प्रसन्नता देता है। यह युवावस्था की ऊर्जा का प्रती क है। इस रूप में गणपति अपनी पूरी क्षमता से काम करने और उपलब्धियों के लिए संघर्ष की प्रेरणा देते हैं।

 3-श्री ढुण्ढि गणपति;-

रक्तवर्ण गणेशजी के इस रूप में उनके हाथ में रुद्राक्ष की माला है। रुद्राक्ष उनके पिता शिव का प्रतीक माना जाता है। यानी इस रूप में वे पिता के संस्कारों को लिए विराजित हैं। उनके एक हाथ में लाल रंग का रत्न-पात्र भी है। गणेशजी का यह रूप आध्यात्मिक विचारों के लिए प्रेरित करता है। जीवन को स्वच्छ बनाता है।

4-श्री वीर गणपति;-

भगवान गणेश के इस स्वरूप में वह एक योद्धा की तरह हैं। इस स्वरूप में इनके कई हाथ हैं जिसमें वह तरह-तरह के अस्त्रों से शुभोभित हैं। भगवान गणेश के इस स्वरूप में उन्हें साहस और वीरता का प्रतीक माना जाता है।यह गणेशजी का योद्धा रूप है। इस रूप में उनके 16 हा थ हैं। उनके हाथों में गदा , चक्र, तलवार, अंकुश सहित कई अस्त्र हैं। इस रूप में गणेश युद्ध कला में पारंगत बना ते हैं। इस रूप की उनकी पूजा साहस पैदा करती है। हार न मानने के लि ए प्रेरित करती है।इस रूप में गजानन बुराई और अज्ञानता पर विजय पने के लि ए पूरी क्षमता से लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

5-श्री शक्ति गणपति; -

गणेश जी इस स्वरूप में चार भुजाओं  के साथ उनका सिंदूरी रंग का शरीर है। इनका यह स्वरूप अभय मुद्रा में है।इस रूप में उनके चार हाथ हैं , जिनमें फूल और फल हैं इस रूप में गणपति इंसान के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं।एक हाथ से वे सभी भक्तों को आशीर्वाद दे रहे हैं। उनके अन्य हाथों में अस्त्र-शस्त्र भी हैं और माला भी । इस रूप में उनकी शक्ति भी साथ हैं। वे सभी भक्तों को शक्तिशाली बनने का आशीर्वाद देते हुए ‘अभय मुद्रा ’ में हैं।गणेश जी का यह रूप इस बात प्रतीक है कि इंसान के भीतर शक्ति पुंज है, जिसका उसे इस्तेमाल करना है।

6-श्री द्विज गणपति; -

इनके इस स्वरूप में चार भुजा है। यह दो गुणों का प्रतीक हैं पहला ज्ञान और दूसरा संपत्ति। सुख और संपदा की मनोकामना के लिए इनके इस रूप की पूजा की जाती है।इस रूप में उनके दो गुण अहम हैं- ज्ञान और संपत्ति । इन दो को पाने के लिए गणपति के इस रूप को पूजा जाता है। उनके चार मुख हैं। वे चार हाथों वाले हैं। इनमें कमंडल, रुद्रा क्ष, छड़ी और ताड़पत्र में शास्त्र लिए हुए हैं।वे द्विज इसलिए हैं क्यों कि वे ब्रह्मा की तरह दो बार जन्मे हैं। उनके चार हा थ चा र वेदों की शिक्षाओं का प्रतीक हैं।

7-श्री सिद्धि गणपति; -

इनकी यह मुद्रा बुद्धि और सफलता का प्रतीक है। इसमे यह आराम की मुद्रा में हैं। गणेशजी के इस स्वरूप में इनका रंग पीला यानी पीतवर्ण का है। मुंबई के प्रसिद्ध सिद्धि विनायक मंदिर में इनका स्वरूप सिद्धि गणपति के स्वरूप में विराजमान है। इस रूप में गणेशजी पीतवर्ण हैं। उनके चार हाथ हैं। वे बुद्धि और सफलता के प्रतीक हैं। इस रूप में वे आराम की मुद्रा में बैठे हैं। अपनी सूंड में मोदक लिए हैं।भगवान गणेश का यह रूप कि सी भी काम को दक्षता से करने की प्रेरणा देता है। यह सिद्धि पाने का प्रतीक है।

8-श्री विघ्न गणपति; -

भगवान गणेश के इस स्वरूप में वह दस भुजाधारी सुनहरी शरीर काया के रूप में हैं। इनका विघ्न स्वरूप तमाम तरह की बाधाओं को दूर करना वाला है। इनके हाथ में शंख और चक्र शुशोभित है।इस रूप में गणेशजी का रंग स्वर्ण के समान है। उनके आठ हाथ हैं।इस रूप में वे भगवान विष्णु के समान दिखाई देते हैं। उनके हाथों में शंख और चक्र हैं। वे कई तरह के आभूषण भी पहने हुए हैं। यह रूप सकारात्मक पक्ष देखने की प्रेरणा देता है। यह नकारात्मक प्रभाव और विचारों को भी दूर करता है।

9-श्री उच्चिष्ठ गणपति;-  

भगवान गणेश के इस स्वरूप का मंदिर तमिलनाडु में स्थित है। इनके इस रूप में इनका रंग नीलवर्ण का है।वे धान्य के देवता हैं। यह मोक्ष और ऐश्वर्य प्रदान करने वाला स्वरूप है।एक हाथ में वे एक वाद्य यंत्र लिए विराजित हैं। उनकी शक्ति साथ में पैरों पर विराजित हैं। गणेशजी के इस रूप का एक मंदिर तमिलनाडु में है। यह रूप ऐश्वर्य और मोक्ष में संतुलन का प्रतीक है। वे कामना और धर्म में संतुलन के लिए प्रेरित करते हैं।   

10-श्री हेरंब गणपति;-

गणेश जी के इस रूप में इनके पांच सिर है। यह हीन और असहायों के रक्षक का प्रतीक है। इसमें यह शेर की सवारी करते हैं।पांच सिरों वाले हेरम्ब गणेश दुर्बलों के रक्षक हैं। यह उनका विलक्षण रूप है। इस रूप में वे शेर पर सवार हैं। उनके दस हाथ हैं, जिनमें वे फरसा, फंदा , मनका , माला , फल, छड़ी और मोदक लिए हुए हैं। उनके सिर पर मुकुट है। इस रूप में गणेश कमजोर को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देते हैं।

11- श्री उद्धगणपति; -

इसमें भगवान गणेश का स्वरूप सोने के रंग का है। यह छ: भुजाधारी है।इस रूप में उनके आठ हाथ हैं। उनकी शक्ति साथ में विराजित हैं, जिन्हें उन्होंने एक हाथ से थाम रखा है। एक हाथ में टूटा हुआ दांत है। बाकी हाथों में कमल पुष्प सहित प्राकृतिक सम्पदाएं हैं। वे तांत्रिक मुद्रा में विराजित हैं।इस रूप में गणेशजी की आराधना भक्त को अपनी स्थिति से ऊपर उठने के लिए प्रेरित करती है।

12-श्री क्षिप्र गणपति ;-

भगवान गणेश का इस स्वरूप में भक्तों की इच्छाएं जल्द पूरी होती है। इनके चार हाथों में से एक में कल्पवृक्ष की शाखा है और सूंड में कलश है।इस रूप में गणेश जी रक्तवर्ण हैं। उनके चार हा थ हैं। वे आसानी से प्रसन्न होते हैं और भक्तों की इच्छाएं पूरी करते हैं।अपनी सूंड में वे एक कलश लिए हैं, जिसमें रत्न हैं।यह रूप कामनाओं की पूर्ति का प्रतीक है। कल्पवृक्ष इच्छाएं पूरी करता है और कलश समृद्धि देता है।इस रूप में गणेश इच्छा ओं को शी घ्रता सपूरा करते हैं और उतनी ही तेजी से गलतियों की सजा भी देते हैं। वे पवित्र घास से बने सिंहासन पर बैठे हैं। तमिलनाडु के कराईकुडी और मैसूर में भगवान के इस रूप का मंदिर है।गणेश जी का यह रूप सभी की शांति और समृद्धि के लिए काम करने की प्रेरणा देता है।

13-श्री लक्ष्मी गणपति; -

आठ भुजाधारी और गौर वर्ण शरीर के साथ इसमें गणेश जी बुद्धि और सिद्धि के साथ विराजमान हैं। इनके एक हाथ में तोता है।इस रूप में गणेशजी बुद्धि और सिद्धि के साथ हैं। उनके आठ हाथ हैं। उनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, जो सभी को सिद्धि और बुद्धि दे रहा है।तमि लनाडु के पलानी में गणेशजी के इस रूप का मंदिर है।गणेशजी इस रूप में उपलब्धियां और किसी काम में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए प्रेरित करते हैं।

14-श्री विजय गणपति; -

भगवान गणेश के इस स्वरूप का मंदिर पुणे के अष्टविनायक मंदिर में विराजमान है। भगवान गणेश यहां मूष की सवारी के साथ एक विशालकाय रूप में स्थापित हैं।इस रूप में वे अपने मूषक पर सवा र हैं, जि सका आका र सामा न्य सेबड़ा दि खाया गया है। महा राष्ट्र में पुणे के अष्टवि ना यक मंदि र में भगवा न का यह रूप मौ जूद है। मा न्यता है कि भगवा न के इस रूप की पूजा सेतुरंत राहत मि लती है। प्रेरणा - इस रूप में गणपति वि जय पा ने और संतुलन का यम करने के लि ए प्रेरि त करते हैं।

 15-श्री महागणपति; - 

गणपति के इस स्वरूप का मंदिर द्वारका में बना हुआ है। जहां पर भगवान कृष्ण ने गणेशजी की वंदना और आराधना की थी। यह रक्तवर्ण हैं जिसमें अपने पिता भोलेनाथ की तरह इनके तीन नेत्र हैं।उनके दस हाथ हैं और उनकी शक्ति उनके साथ विराजित हैं।इस रूप में महागणपति दसों दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे भ्रम से बचाते हैं।

16-श्री नृत्त गणपति ;-

गणेशजी के इस स्वरूप में वे कल्पवृक्ष के नीचे नाचते हुए की मुद्रा में हैं। इस रूप में गणेशजी कल्पवृक्ष के नीचे नृत्य करते

दिखाए गए हैं। वे प्रसन्न मुद्रा में हैं। उनके चार हाथ हैं। एक हाथ में युद्ध का अस्त्र परशु भी है। उनके इस रूप का तमिलनाडु के कोडुमुदी में अरुलमिगुमगुदेश्वरर मंदिर है।इस रूप का पूजन ललित कलाओं में सफलता दिलाता है। वे कलाओं में प्रयोग के लिए प्रेरित करते हैं।

17-श्री एकाक्षर गणपति; -

भगवान गणेश के एकाक्षर स्वरूप का मंदिर कर्नाटक के हम्पी में स्थित है। इसमें भगवान गणेश के मस्तक पर चंद्रमा और तीन नेत्र हैं।इस रूप में गणेशजी के तीन नेत्र हैं और मस्तक पर भगवान शिव के समान चंद्रमा विराजित है। मान्यता है कि इस रूप की पूजा से मन और मस्तिष्क पर नियंत्रण में मदद मिलती है ।एकाक्षर गणपति का बीज मंत्र है ‘गं’ है। यह हर तरह के शुभारंभ का प्रतीक है।

18-श्री हरिद्रा गणपति; -

हरिद्रा गणपति छ: भुजाधारी है और पीले रंग का शरीर है। इस रूप में गणेशजी हल्दी से बने हैं और राजसिंहासन पर बैठे हैं। इस रूप के पूजन से इच्छाएं पूरी होती हैं।माना जाता है कि हल्दी से बने गणेश रखने से व्यापा र में फायदा होता है।इस रूप में गणेश प्रकृति और उसमें मौजूद निरोग रहने की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

19-श्री त्र्यक्षर गणपति; -

सुनहरे शरीर वाले भगवान गणेश और तीन नेत्रों वाले चार भुजाधारी गणपति।यह भगवान गणेश का ओम रूप है। इसमें ब्रह्मा , वि ष्णु, महेश समाहित हैं। यानी वे सृष्टि के निर्माता , पालनहार और संहारक भी हैं। कर्नाटक के नारसीपुरा में गणेश के इस रूप का मंदिर है, जिसे तिरुमाकुदालु मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस रूप में उनकी आराधना आध्यात्मिक ज्ञान देती है। यह रूप स्वयं को पहचानने के लिए प्रेरित करता है।

20-श्री वरगणपति; -  

वर देने की मुद्रा में भगवान गणेश का स्वरूप सुख और समृद्धि प्रदान करने वाला है।गणपति का यह रूप वरदान देने के लिए जाना जाता है। अपनी सूंड में वे रत्न कुंभ थामे हुए हैं। वे सफलता और समृद्धि का वरदान देते हैं। कर्नाटक के बेलगाम में रेणुका येलम्मा मंदिर में भगवान का यह रूप विराजित है।इस रूप में उनके साथ विराजि त देवी के हाथों में विजय पताका है। वे विजयी होने के वरदान का प्रतीक हैं।

23-श्री ऋण मोचन गणपति;-

चार भुजाधारी लालवस्त्र धारी भगवान गणेश जी का यह रूप अपराधबोध और कर्ज से मुक्ति देता है। यह रूप भक्तों को मोक्ष भी देता है। वे श्वेतवर्ण हैं और उनके चार हाथ हैं। इनमें से एक हाथ में मीठा चावल है। इस रूप का मंदिर तिरुवनंतपुरम में है। इस रूप में गणेशजी परिवार, पिता और गुरू के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाने के लिए प्रेरित करते हैं।

24-श्री एकदंत गणपति;-

गणपति के एकदंत स्वरूप में यह सभी बाधाओं की दूर करने वाले हैं।इस रूप में गणेशजी का पेट अन्य रूपों के मुकाबले बड़ा है। वे अपने भीतर ब्रह्मांड समाए हुए हैं। वे रास्ते में आनेवाली बाधाओं को हटाते हैं और जड़ता को दूर करते हैं। इस रूप का पूजन पूरे देश में व्यापक रूप से होता है।इस रूप में गणेश अपनी कमियों पर ध्यान देने और खूबियों को निखारने के लिए प्रेरित करते हैं।

25-श्री सृष्टि गणपति ;-

इस स्वरूप में गणेश जी एक बड़े मूषक पर सवार हैं। यह प्रकृति की शक्तियों को दर्शाते हैं।गणेशजी का यह रूप प्रकृति की तमा म शक्ति यों का प्रतिनिधित्व करता है। उनका यह रूप ब्रह्मा के समान ही है। यहां वे एक बड़े मूषक पर सवार दिखाई देते हैं। तमिलनाडु के कुंभकोणम में अरुलमि गुस्वामीनाथन मंदिर में उनका यह रूप विराजि त है।यह रूप सही-गलत और अच्छे-बुरे में फर्क करने की प्रेरणा समझ देता है। इस रूप में गणेश निर्माण के प्रेरणा देते हैं।

26-श्री द्विमुख गणपति; -

पीले वर्ण के चार भुजाधारी और दो मुख वाले भगवान गणेश का स्वरूप।गणेशजी के इस स्वरूप में उनके दो मुख हैं, जो सभी दि शा ओं में देखने की क्षमता का प्रति नि धि त्व करते हैं। दो नों मुखों में वे सूंड ऊपर उठा ए हैं। इस रूप में उनके शरीर के रंग में नी ले और हरेका मि श्रण है। उनके चा र हा थ हैं। प्रेरणा - यह रूप दुनि या और व्यक्ति के आंतरि क और बाहरी, दो नों रूपों को देखने के लि ए प्रेरि त करता है।

27-श्री उद्दण्ड गणपति; -

इस स्वरूप में भगवान गणेश के 12 हाथ हैं और यह रूप न्याय का प्रतीक है।इस रूप में गणेश न्याय की स्थापना करते हैं। यह उनका उग्र रूप है, जिसके 12 हा थ हैं। उनकी शक्ति उनके साथ विराजित हैं। इस रूप में गणेश का देश में कहीं और

मंदिर नहीं है।गणेशजी का यह रूप सांसारिक मोह छोड़ने और बंधनों से मुक्त होने के लिए प्रेरित करता है।

28-श्री दुर्गा गणपति; -

इस रूप में भगवान गणेश अजेय की मुद्रा में विराजित हैं।भगवान गणेश का यह रूप अजेय है। वे शक्तिशाली हैं और हमेशा अंधकार पर विजय प्राप्त करते हैं। यहां वे अदृश्य देवी दुर्गा के रूप में है । इस रूप में वे लाल वस्त्र धारण करते हैं। यह रंग ऊर्जा का प्रतीक है। उनके हाथ में धनुष है। भगवान गणेश का यह रूप विजय मार्ग में आने वाली बाधाओं को हटाने के लिए प्रेरित करता है।

29-श्री त्रिमुख गणपति; -

इस रूप में गणेशजी के तीन मुख और छह हाथ हैं। दाएं और बाएं तरफ के मुख की सूंड ऊपर उठी हुई है। वे स्वर्ण कमल पर विराजि त हैं। उनका एक हाथ रक्षा की मुद्रा और दूसरा वरदान की मुद्रा में है। इस रूप में उनके एक हाथ में अमृत-कुंभ है। गणेश जी का यह रूप भूत, वर्तमान और भविष्य को ध्यान में रखकर कर्म करने के लिए प्रेरित करता है।

30-श्री योग गणपति; -

भगवान गणेश इसमें योग की मुद्रा में विराजित हैं और नीले वस्त्र पहने हुए हैं।इस रूप में भगवान गणेश एक योगी की तरह दिखाई देते हैं। वे मंत्र जाप कर रहे हैं। उनके पैर योगिक मुद्रा में है। मान्यता है कि इस रूप की पूजा अच्छा स्वास्थ्य देती है और मन को प्रसन्न बनाती है। उनके इस रूप का रंग सुबह के सूर्य के समान है। भगवान गणेश का रूप अपने भीतर छिपी शक्तियों को पहचानने के लिए प्रेरित करता है।

31-श्री सिंह गणपति;-

इसमें भगवान गणेश सिंह के मुख और हाथी की सूंड वाले हैं।इस रूप में गणेशजी शेर के रूप में विराजमान हैं। उनका मुख भी शेरों के समान है, साथ ही उनकी सूंड भी है। उनके आठ हाथ हैं।एक हाथ वरद मुद्रा में है, तो दूसरा अभय मुद्रा में है। गणेश जी का यह रूप निडरता और आत्मविश्वास का प्रतीक है, जो शक्ति और समृद्धि देता है।

32-श्री संकष्ट हरण गणपति; -

यह स्वरूप संकटों का दूर करने वाला है।इस रूप में गणेश डर और दुख को दूर करते हैं। मान्यता है कि इनकी आराधना संकट के समय बल देती है। उनके साथ उनकी शक्ति भी मौजूद है। शक्ति के हाथ में भी कमल पुष्प है। गणेशजी का एक हाथ वरद मुद्रा में है।


हर रंग की मिट्टी के गणेश के हैं अपने अलग-अलग फ़ायदे;-

05 FACTS;-

1-सफ़ेद मिट्टी;-

भगवान गणेश की मूर्ति अगर सफ़ेद रंग की मिट्टी से बनायीं जाए तो यह चन्द्र तथा शनि से जुड़े कष्टों से छुटकारा दिला सकती है।शादीशुदा ज़िंदगी में चल रही दिक्कत के लिए या फिर आपकी माँ को कोई कष्ट हो तो सफ़ेद रंग की मिट्टी के गणेश बनाएं और पूजा करें।

2-काली मिट्टी

दक्षिण दिशा में शनिदेव का प्रकोप अधिक होने के कारण पूरे दक्षिण भारत में भगवान गणेश की काले रंग की मूर्ति की पूजी जाती है।काले रंग की मिट्टी से गणेश निर्माण किया जाए तो यह व्यापर, चिकित्सा, वकालत आदि से संबंधित परेशानियों को दूर करते है।इसके अलावा शनिजनित पीड़ा का भी नाश करते है।

3-पीली मिट्टी

पीली मिट्टी के गणेश निर्माण से गुरु और केतु ग्रह से जुड़ी परेशानियां जैसे कि विद्या में रुकावट, संतान ना होना, आर्थिक कष्ट, उदररोग आदी का निवारण होता है।पीले रंग के गणपति वंश को बढ़ाने में सहायक होते हैं।

4-लाल मिट्टी

लाल रंग से अगर गणपति निर्माण किया जाए तो यह सूर्य ग्रह से जुड़े कष्टों से निज़ात दिला सकता है।इसके अलावा पति-पत्नी के मंगल दोष, भूमि, भाइयों में दुश्मनी, राजकीय पीड़ा, भवन आदि कष्ट लाल रंग के गणपति बनाकर पूजने से कम होते हैं।

5-हरी मिट्टी

बुध और राहू ग्रह से व्यापर और विद्या संबंधी दिकातें आ सकती हैं। इनके निवारण के लिए या किसी षड़यंत्र को भेदने के लिए हरे रंग के गणपति निर्माण को शुभ माना जाता है।

अष्टविनायक मंदिर की महिमा ;-

08 FACTS;-

पुणे के विभिन्‍न इलाकों में श्री गणेश के आठ मंदिर हैं, इन्‍हें अष्‍टविनायक कहा जाता है। इन मंदिरों को स्‍वयंभू मंदिर भी कहा जाता है। स्‍वयंभू का अर्थ है कि यहां भगवान स्‍वयं प्रकट हुए थे किसी ने उनकी प्रतिमा बना कर स्‍थापित नहीं की थी। इन मंदिरों का जिक्र विभिन्‍न पुराणों जैसे गणेश और मुद्गल पुराण में भी किया गया है। ये मंदिर अत्‍यंत प्राचीन हैं और इनका ऐतिहासिक महत्‍व भी है। इन मंदिरों की दर्शन यात्रा को अष्‍टविनायक तीर्थ यात्रा भी कहा जाता है। ये हैं वो आठ मंदिर .... 1-मयूरेश्वर या मोरेश्वर मंदिर ;- पुणे के मोरगाँव क्षेत्र में मयूरेश्वर विनायक का मंदिर है। पुणे से करीब 80 किलोमीटर दूर मयूरेश्वर मंदिर के चारों कोनों में मीनारें और लंबे पत्थरों की दीवारें हैं। यहां चार द्वार भी हैं जिन्‍हें सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग चारों युग का प्रतीक मानते हैं। यहां गणेश जी की मूर्ती बैठी मुद्रा में है और उसकी सूंड बाई है तथा उनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं। यहां नंदी की भी मूर्ती है। कहते हैं कि इसी स्‍थान पर गणेश जी ने सिंधुरासुर नाम के राक्षस का वध मोर पर सवार होकर उससे युद्ध करते हुए किया था। इसी कारण उनको मयूरेश्वर कहा जाता है। 2-सिद्धिविनायक मंदिर ;- करजत तहसील, अहमदनगर में है सिद्धिविनायक मंदिर। ये मंदिर पुणे से करीब 200 किमी दूर भीम नदी पर स्‍थित है। यह मंदिर करीब 200 साल पुराना बताया जाता है। सिद्धटेक के में भगवान विष्णु ने सिद्धियां हासिल की थी, वहीं एक पहाड़ की चोटी पर सिद्धिविनायक मंदिर बना हुआ है। इसका मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर है। इस मंदिर की परिक्रमा करने के लिए पहाड़ की यात्रा करनी होती है। सिद्धिविनायक मंदिर में गणेशजी की मूर्ति 3 फीट ऊंची और ढाई फीट चौड़ी है। यहां गणेश जी की सूंड सीधे हाथ की ओर है। 3-बल्लालेश्वर मंदिर;- पाली गांव, रायगढ़ में इस मंदिर का नाम गणेश जी के भक्‍त बल्‍लाल के नाम पर रखा गया है। बल्‍लाल की कथा के बारे में कहते हैं कि इस परम भक्‍त को उसके परिवार ने गणेश जी की भक्‍ति के चलते उनकी मूर्ती सहित जंगल में फेंक दिया था। जहां उसने केवल गणपति का स्‍मरण करते हुए समय बिता दिया था। इससे प्रसन्‍न गणेश जी ने उसे इस स्‍थान पर दर्शन दिया और कालानंतर में बललाल के नाम पर उनका ये मंदिर बना। ये मंदिर मुंबई-पुणे हाइवे पर पाली से टोयन और गोवा राजमार्ग पर नागोथाने से पहले 11 किलोमीटर दूर स्थित है। 4-वरदविनायक मंदिर;- इसके बाद रायगढ़ के कोल्हापुर में है वरदविनायक मंदिर। एक मान्यता के अनुसार वरदविनायक भक्तों की सभी कामनों को पूरा होने का वरदान देते हैं। एक कथा ये भी है कि इस मंदिर में नंददीप नाम का दीपक है जो कई वर्षों से लगातार जल रहा है। 5-चिंतामणी मंदिर;- थेऊर गांव में तीन नदियों भीम, मुला और मुथा के संगम पर स्‍थित है चिंतामणी मंदिर। ऐसी मान्‍यता है कि विचलित मन के साथ इस मंदिर में जाने वालों की सारी उलझन दूर हो कर उन्‍हें शांति मिल जाती है। इस मंदिर से भी जुड़ी एक कथा है कि स्वयं भगवान ब्रह्मा ने अपने विचलित मन को शांत करने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी। 6-गिरिजात्मज अष्टविनायक मंदिर;- लेण्याद्री गांव में है गिरिजात्मज अष्टविनायक मंदिर जिसका अर्थ है गिरिजा के आत्‍मज यानी माता पार्वती के पुत्र अर्थात गणेश। यह मंदिर पुणे-नासिक राजमार्ग पर पुणे से करीब 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। इसे लेण्याद्री पहाड़ पर बौद्ध गुफाओं के स्थान पर बनाया गया है। इस पहाड़ पर 18 बौद्ध गुफाएं हैं जिसमें से 8वीं गुफा में गिरजात्मज विनायक मंदिर है। इन गुफाओं को गणेश गुफा भी कहा जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 300 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। एक विशेषता ये है कि यह पूरा मंदिर एक ही बड़े पत्थर को काटकर बनाया गया है। 7-विघ्नेश्वर अष्टविनायक मंदिर;- यह मंदिर पुणे के ओझर जिले के जूनर क्षेत्र में स्थित है। पुणे-नासिक रोड पर करीब 85 किलोमीटर दूरी पर ये मंदिर बना है। एक किंवदंती के अनुसार विघनासुर नाम का असुर जब संतों को प्रताणित कर रहा था, तब भगवान गणेश ने इसी स्‍थान पर उसका वध किया था। तभी से यह मंदिर विघ्नेश्वर, विघ्नहर्ता और विघ्नहार के रूप में जाना जाता है। 8-महागणपति मंदिर;- राजणगांव में स्‍थित है महागणपति मंदिर। इस मंदिर को 9-10वीं सदी के बीच का माना जाता है। पूर्व दिशा की ओर मंदिर का बहुत विशाल और सुन्दर प्रवेश द्वार है। यहां गणपति की मूर्ति को माहोतक नाम से भी जाना जाता है। एक मान्यता के अनुसार विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा करने के लिए इस मंदिर की मूल मूर्ति को तहखाने में छिपा दिया गया है।


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