क्या है गायत्री महामंत्र का तत्त्वज्ञान ?PART-02

गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण;- 19 FACTS;- 1-शरीर में अनेक साधारण और अनेक असाधारण अंग हैं। असाधारण अंग जिन्हें ‘मर्म स्थान’ कहते हैं, केवल इसलिए मर्म स्थान नहीं कहे जाते कि वे बहुत सुकोमल एवं उपयोगी होते हैं, वरन् इसलिए भी कहे जाते हैं कि इनके भीतर गुप्त आध्यात्मिक शक्तियों के महत्त्वपूर्ण केन्द्र होते हैं।इन केन्द्रों में वे बीज सुरक्षित रखे रहते हैं, जिनका उत्कर्ष, जागरण हो जाये तो मनुष्य कुछ से कुछ बन सकता है।उसमें आत्मिक शक्तियों के स्रोत उमड़ सकते हैं और उस उभार के फलस्वरूप वह ऐसी अलौकिक शक्तियों का भण्डार बन सकता है जो साधारण लोगों के लिए अलौकिक आश्चर्य से कम प्रतीत नहीं होती। 2-ऐसे मर्मस्थलों में मेरुदण्ड या रीढ़ का प्रमुख स्थान है। यह शरीर की आधारशिला है। यह मेरुदण्ड छोटे- छोटे तैंतीस अस्थि खण्डों से मिलकर बना है।इस प्रत्येक खण्ड में तत्वदर्शियों को ऐसी विशेष शक्तियाँ परिलक्षित होती हैं, जिनका सम्बन्ध दैवी शक्तियों से है।देवताओं में जिन शक्तियों का केन्द्र होता है, वे शक्तियाँ भिन्न- भिन्न रूप में मेरुदण्ड के इन अस्थि खण्डों में पाई जाती हैं, इसलिए यह निष्कर्ष निकाला गया है कि मेरुदण्ड तैंतीस देवताओं का प्रतिनिधित्व करता है। आठ वसु, बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, इन्द्र और प्रजापति इन तैंतीसों की शक्तियाँ उसमें बीज रूप से उपस्थित रहती हैं। 3-इस पोले मेरुदण्ड में शरीर विज्ञान के अनुसार नाडिय़ाँ हैं और ये विविध कार्यों में नियोजित रहती हैं। अध्यात्म विज्ञान के अनुसार उनमें तीन प्रमुख नाडिय़ाँ हैं- 1- इड़ा, 2- पिङ्गला, 3-सुषुम्ना। यह तीन नाडिय़ाँ मेरुदण्ड को चीरने पर प्रत्यक्ष रूप से आँखों द्वारा नहीं देखी जा सकतीं, इनका सम्बन्ध सूक्ष्म जगत् से है। यह एक प्रकार का विद्युत् प्रवाह है। जैसे बिजली से चलने वाले यन्त्रों में नेगेटिव और पोजेटिव, ऋण और धन धाराएँ दौड़ती हैं और उन दोनों का जहाँ मिलन होता है, वहीं शक्ति पैदा हो जाती है, इसी प्रकार इड़ा को नेगेटिव, पिङ्गला को पोजेटिव कह सकते हैं। इड़ा को चन्द्र नाड़ी और पिङ्गला को सूर्य नाड़ी भी कहते हैं। 4-मोटे शब्दों में इन्हें ठण्डी- गरम धाराएँ कहा जा सकता है। दोनों के मिलने से जो तीसरी शक्ति उत्पन्न होती है, उसे सुषुम्ना कहते हैं। प्रयाग में गंगा और यमुना मिलती हैं। इस मिलन से एक तीसरी सूक्ष्म सरिता और विनिर्मित होती है, जिसे सरस्वती कहते हैं। इस प्रकार तीन नदियों से त्रिवेणी बन जाती है। मेरुदण्ड के अन्तर्गत भी ऐसी आध्यात्मिक त्रिवेणी है। इड़ा, पिङ्गला की दो धाराएँ मिलकर सुषुम्ना की सृष्टि करती हैं और एक पूर्ण त्रिवर्ग बन जाता है। 5-यह त्रिवेणी ऊपर मस्तिष्क के मध्य केन्द्र से, ब्रह्मरन्ध्र से, सहस्रार कमल से सम्बन्धित और नीचे मेरुदण्ड का जहाँ नुकीला अन्त है, वहाँ लिङ्गं मूल और गुदा के बीच ‘सीवन’ स्थान की सीध में पहुँचकर रुक जाती है, यही इस त्रिवेणी का आदि- अन्त है।सुषुम्ना नाड़ी के भीतर एक और त्रिवर्ग है। उसके अन्तर्गत भी तीन अत्यन्त सूक्ष्म धाराएँ प्रवाहित होती हैं, जिन्हें वज्रा, चित्रणी और ब्रह्मनाड़ी कहते हैं। जैसे केले के तने को काटने पर उसमें एक के भीतर एक परत दिखाई पड़ती है, वैसे ही सुषुम्ना के भीतर वज्रा है, वज्रा के भीतर चित्रणी और चित्रणी के भीतर ब्रह्मनाड़ी है। यह ब्रह्मनाड़ी सब नाडिय़ों का मर्मस्थल, केन्द्र एवं शक्तिसार है। इस मर्म की सुरक्षा के लिए ही उस पर इतने परत चढ़े हैं। 6-यह ब्रह्मनाड़ी मस्तिष्क के केन्द्र में- ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचकर हजारों भागों में चारों ओर फैल जाती है, इसी से उस स्थान को सहस्रदल कमल कहते हैं। विष्णुजी की शय्या, शेषजी के सहस्र फनों पर होने का अलंकार भी इस सहस्रदल कमल से लिया गया है। भगवान् बुद्ध आदि अवतारी पुरुषों के मस्तक पर एक विशेष प्रकार के गुंजलकदार बालों का अस्तित्व हम उनकी मूर्तियों अथवा चित्रों में देखते हैं। यह इस प्रकार के बाल नहीं हैं, वरन् सहस्रदल कमल का कलात्मक चित्र है। यह सहस्रदल सूक्ष्म लोकों में, विश्वव्यापी शक्तियों से सम्बन्धित है। 7-रेडियो- ट्रान्समीटर से ध्वनि विस्तारक तन्तु फैलाये जाते हैं जिन्हें ‘एरियल’ कहते हैं। तन्तुओं के द्वारा सूक्ष्म आकाश में ध्वनि को फेंका जाता है और बढ़ती हुई तरंगों को पकड़ा जाता है। मस्तिष्क का ‘एरियल’ सहस्रार कमल है। उसके द्वारा परमात्मसत्ता की अनन्त शक्तियों को सूक्ष्म लोक में से पकड़ा जाता है। जैसे भूखा अजगर जब जाग्रत् होकर लम्बी साँसें खींचता है, तो आकाश में उड़ते पक्षियों को अपनी तीव्र शक्तियों से जकड़ लेता है और वे मन्त्रमुग्ध की तरह खिंचते हुए अजगर के मुँह में चले जाते हैं, उसी प्रकार जाग्रत् हुआ सहस्रमुखी शेषनाग- सहस्रार कमल अनन्त प्रकार की सिद्धियों को लोक- लोकान्तरों से खींच लेता है। 8-जैसे कोई अजगर जब क्रुद्ध होकर विषैली फुँफकार मारता है, तो एक सीमा तक वायुमण्डल को विषैला कर देता है, उसी प्रकार जाग्रत् हुए सहस्रार कमल द्वारा शक्तिशाली भावना तरंगें प्रवाहित करके साधारण जीव- जन्तुओं एवं मनुष्यों को ही नहीं, वरन् सूक्ष्म लोकों की आत्माओं को भी प्रभावित और आकर्षित किया जा सकता है। शक्तिशाली सहस्रार द्वारा निक्षेपित भावना प्रवाह भी लोक- लोकान्तरों के सूक्ष्म तत्त्वों को हिला देता है। 9-अब मेरुदण्ड के नीचे के भाग को, मूल को लीजिये। सुषुम्ना के भीतर रहने वाली तीन नाडिय़ों में सबसे सूक्ष्म ब्रह्मनाड़ी मेरुदण्ड के अन्तिम भाग के समीप एक काले वर्ण के षट्कोण वाले परमाणु से लिपटकर बँध जाती है। छप्पर को मजबूत बाँधने के लिए दीवार में खूँटे गाड़ते हैं और उन खूँटों में छप्पर से सम्बन्धित रस्सी को बाँध देते हैं। इसी प्रकार उस षट्कोण कृष्ण वर्ण परमाणु से ब्रह्मनाड़ी को बाँधकर इस शरीर से प्राणों के छप्पर को जकड़ देने की व्यवस्था की गयी है। 10-कूर्म से ब्रह्मनाड़ी के गुन्थन स्थल को आध्यात्मिक भाषा में ‘कुण्डलिनी’ कहते हैं। जैसे काले रंग का होने से आदमी का नाम कलुआ भी पड़ जाता है, वैसे ही कुण्डलाकार बनी हुई इस आकृति को ‘कुण्डलिनी’ कहा जाता है। यह साढ़े तीन लपेटे उस कूर्म में लगाये हुए है और मुँह नीचे को है। विवाह संस्कारों में इसी की नकल करके ‘‘भाँवर या फेरे’’ होते हैं। साढ़े तीन (सुविधा की दृष्टि से चार) परिक्रमा किये जाने और मुँह नीचा किये जाने का विधान इस कुण्डलिनी के आधार पर ही रखा गया है, क्योंकि भावी जीवन- निर्माण की व्यवस्थित आधारशिला, पति- पत्नी का कूर्म और ब्रह्मनाड़ी मिलन वैसा ही महत्त्वपूर्ण है जैसा कि शरीर और प्राण को जोडऩे में कुण्डलिनी का महत्त्व है। 11-इस कुण्डलिनी की महिमा, शक्ति और उपयोगिता इतनी अधिक है कि उसको भली प्रकार समझने में मनुष्य की बुद्धि लडख़ड़ा जाती है। भौतिक विज्ञान के अन्वेषकों के लिये आज ‘परमाणु’ एक पहेली बना हुआ है। उसके तोडऩे की एक क्रिया मालूम हो जाने का चमत्कार दुनिया ने प्रलयंकर परमाणु बम के रूप में देख लिया। अभी उसके अनेकों विध्वंसक और रचनात्मक पहलू बाकी हैं।यदि परमाणु शक्ति का पूरा ज्ञान और उपयोग मनुष्य को मालूम हो गया, तो उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं रहेगा।जड़ जगत् के एक परमाणु की शक्ति का आकलन करने पर उसकी महत्ता को देखकर आश्चर्य की सीमा नहीं रहती। फिर चैतन्य जगत् का एक स्फुल्लिंग जो जड़ परमाणु की अपेक्षा अनन्त गुना शक्तिशाली है, कितना अद्भुत होगा, इसकी तो कल्पना कर सकना भी कठिन है। 12-कुण्डलिनी को गुप्त शक्तियों की तिजोरी कहा जा सकता है। बहुमूल्य रत्नों को रखने के लिये किसी अज्ञात स्थान में गुप्त परिस्थितियों में तिजोरी रखी जाती है और उसमें कई ताले लगा दिये जाते हैं, ताकि घर या बाहर के अनधिकारी लोग उस खजाने में रखी हुई सम्पत्ति को न ले सकें। परमात्मा ने हमें शक्तियों का अक्षय भण्डार देकर उसमें छ: ताले लगा दिये। ताले इसलिये लगा दिये हैं कि वे जब पात्रता आ जाये, धन के उत्तरदायित्व को ठीक प्रकार समझने लगें, तभी वह सब प्राप्त हो सके। उन छहों तालों की ताली मनुष्य को ही सौंप दी गयी है, ताकि वह आवश्यकता के समय तालों को खोलकर उचित लाभ उठा सके| 13-जैसे कुंडली जागरण से षष्ट चक्र जागृत किये जातें हैं वैसे ही गायत्री के उच्चारण मात्र से लघु ग्रंथियों को जागृत किया जाता है।प्रत्येक वेद मन्त्र का एक देवता होता है जिसकी शक्ति से मन्त्र फलित और सिद्ध होता है । गायत्री महामंत्र का देवता सविता या सूर्य है।गायत्री मन्त्र की शक्ति सूर्य पर ही अवलंबित है । गर्मी, प्रकाश और रेडिएशन सूर्य की स्थूल शक्ति है इसके अलावा समस्त प्राणियों को उत्पान करने , उनके पोषण करने और अभिवर्धन करने की जीवनी-शक्ति उसकी सूक्ष्म शक्ति है। 14-सूर्य के उदय होने पर लोक में प्रकाश होता है और अन्धकार का विनाश होता है। सविता यधपि सूर्य को ही कहा जाता हैं लेकिन उसमें वही अंतर है जो आत्मा और शरीर में है। मन्त्र विज्ञान में शब्द शक्ति का प्रयोग है। मन्त्र के अक्षरों का अनवरत जप करने से उसका एक चक्र बन जाता है और उसकी गति सुदर्शन चक्र जैसी गति विद्युत चमत्कारों से परिपूर्ण होती है। मन्त्र शब्द बेधी बाण की तरह काम करते हैं। जो अभीष्ट लक्ष्य को बेधते हैं। 15-गायत्री महामंत्र का देवता सूर्य महाप्राण है जो जड़ जगत में परमाणु और चेतन जगत में चेतना बन कर तरंगित है। सूर्य के माध्यम से प्रस्फुटित होने वला महाप्राण ईश्वर का वह अंश है जिससे इस अखिल सृष्टि का संचालना होता है।सूर्य का सूक्ष्म प्रभाव शरीर के अलावा सूर्य मन और बुद्धि को भी प्रभावित करता है। इसलिए गायत्री मन्त्र द्वरा बुद्धि को सत्मार्ग की और प्रेरित करने की प्रार्थना सूर्य से की जाती है। 16-गायत्री मंत्र एक महामंत्र हैं जो प्रत्येक मन्त्र साधक और मंत्र के अधिष्ठाता – देव -सूर्य के मध्य एक अदृश्य सेतु का कार्य करता हैं । जब हम गायत्री -मंत्र का क्रमबद्ध, लयबद्ध और वृताकार क्रम से जाप करतें हैं तो ब्रह्माण्ड के मानस -माध्यम में एक विशिष्ट प्रकार की असाधारण तरंगें उठती हैं जो स्प्रिंगनुमा- पथ spiral –cirulatory –path का अनुगमन करती हुई सूर्य तक पहुँचती हैं | और उसकी प्रतिध्वनी BOOMERANG या प्रत्यावर्ती –बाण के पथ के सामान लौटतें समय सूर्य की दिव्यता,प्रकाश,तेज, ताप और अन्य आलोकिक गुणों से युक्त होती हैं और साधक को इन दिव्य – अणुओं से भर देतीं हैं।साधक शारीरिक,मानसिक और अध्यात्मिक रूप से लाभान्वित होता हैं। 17-गायत्री मन्त्र की उपासना से हमारे भीतर के दूषित प्रकाश अणु को हटाने और उनके स्थान पर दिव्य प्रकाश अणु भरने का माध्यम गायत्री का देवता सविता अर्थात सूर्य होता है। सूर्य परब्रह्म की प्रत्यक्ष प्रतीक प्रतिमा है। यह जड़ और और चेतन के अस्तितिव को बनाये रखता है। पञ्च प्राण उसी से आते है। उसकी आराधना से हम अपने आन्तरिक चुम्बकत्व संकल्प शक्ति से अभिष्ट मात्र में अभिष्ट स्तर के प्राण आकर्षित और धारण कर सकते हैं। गायत्री उपासना से सूर्य के विद्युत–चुम्बकीय प्रवाह से पीनल ग्रंथि का सम्बन्ध जुड़ जाता है और सूर्य तेज के कण हमारे शरीर में प्रवेश करते चले जातें है | 18-इस प्रकार प्राण शरीर विकसित होते जाता है और सूर्य प्रकाश के सामान हल्का , दिव्य और तेजस्वी होता जाता है।सर्वप्रथम अनुभव होता है -भ्रूमध्य यानि दोनों भोहों के बीच प्रकाश का अनुभव होना ।कुछ समय बाद व्यक्ति की नींद और भूख में क्रमशः कमी आना।मन का स्वतः ही शांत होना। लम्बे समय के जाप के बाद दोनों स्वर -इडा और पिंगला का साथ-साथ चलना । गायत्री मन्त्र के द्वारा विचार संशोधन और भावनात्मक परिष्कार होता है | गायत्री मन्त्र जाप से मस्तिष्क के दोनों हेमीस्फेरिक सिमिट्री पर प्रभाव पड़ता है | दायें और बाये दोनों गोलार्ध अपनी उन्नत अवस्था में आ जाते हैं और दोनों के क्रियाकलाप के मध्य अधिक सामंजस बैठ जाता है।गायत्री मन्त्र का प्रभाव सोलर–प्लेक्सस में भी होने से त्वचा की प्रतिरोधी क्षमता भी असाधारण रूप से बढती जाती है। 19-स्थूल शरीर[physical body] में सूर्य की किरणें आरोग्य, तेज, बल ,स्फूर्ति, ओज ,उत्साह,आयुष पुरषार्थ बलवर्धन करती हैं | शरीर के समस्त अंग-प्रत्यंग सविता की किरणों द्वारा लाभान्वित होते हैं। सभी परिपुष्ट और क्रियाशील बनतें हैं।सूक्ष्म शरीर[subtle body] मस्तिष्क प्रदेश में उसका प्रवेश बुद्धि, वैभव और प्रज्ञा उत्साह ,स्फूर्ति,प्रफुल्लता,साहस ,एकाग्रता, स्थिरता, धेर्य,संयम अनुदान की वर्षा करता है।कारण शरीर[casual body] यानि ह्रदय प्रदेश में भावना, श्रद्धा, त्याग, तपस्या, श्रद्धा, प्रेम,उपकार,विवेक,दया और विश्वास और सद्भावना की वृद्धि करता है।अंधकार रूपी विकार , इस प्रकाश से तिरोहित होता है, व्यक्तित्व निखरता है और स्थूल शरीर को ओजस, सूक्ष्म शरीर को तेजस और कारण शरीर को वर्चस्व उपलब्ध होता है। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; गायत्री का जप/ध्यान:- 05 FACTS;- 1-उपासना में जप प्रधान है। जप में वाणी की उच्चारण क्षमता द्वारा मस्तिष्क को प्रभावित किया जाता है। एक ही प्रकार के विचार एक समय में मस्तिष्क में छाये रहें इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक ही प्रकार की शब्दावली को लगातार जपा जाता है। इस पुनरावृत्ति प्रक्रिया को लगातार जारी रखने में मस्तिष्कीय विद्युत प्रवाह का एक चक्र बन जाता है जिससे चेतना को उस विशेष स्थिति में ढलने का अवसर मिलता है जिसके लिए मंत्र की संरचना हुई है। मंत्र जप के सूक्ष्म माहात्म्य असंख्य है पर मोटी जानकारी के रूप में यह समझा जा सकता है कि चेतना के स्तर को किसी विशेष स्तर का बनाने में मंत्र जप का बहुत महत्त्व है। जप और ध्यान दोनों को मिला देने से एक पूर्ण साधना चक्र बनता है। मुख गह्वर में होने वाली जप श्रम की सार्थकता ध्यान के रूप में मनोयोग का सम्मिश्रण हो जाने से ही बनती है। 2-गायत्री जप में होठ, कंठ, जिह्वा, तो चलते रहते हैं पर उच्चारण इतना अस्पष्ट होता है कि समीप बैठा व्यक्ति उसकी ध्वनि तो सुने पर साफ तौर से यह न समझ सके कि क्या कहा जा रहा है। माला में तर्जनी उँगली का स्पर्श नहीं किया जाता। अँगूठा, मध्यमा और अनामिका इन तीनों से ही मनके घुमाते रहते हैं। मध्य का बड़ा दाना ‘सुमेरू’ उल्लंघन नहीं किया जाता एक माला पूरी होने पर उसे वापस लौटा लेते हैं। 3-ध्यान में श्रद्धा की प्रमुखता रहती है। श्रद्धा- ईश्वर के प्रति उत्कृष्टता के प्रति इतनी प्रगाढ़ होनी चाहिए कि समीपता भर से काम न चले, परस्पर एकीभूत होने की भावना उभरे। मित्र की समीपता से काम चल सकता है। किन्तु पति- पत्नी के बीच समीपता मात्र पर्याप्त नहीं। उनमें सघन आत्मीयता का स्तर इतना ऊँचा होना चाहिए कि दोनों एक दूसरे के अन्तःकरण में निवास करने लगें। अपनी सत्ता को साथी की सत्ता मे घुला दें। दोनों की आकांक्षायें दिशाधारायें एक बन जायें। स्वार्थों में भिन्नता न रह कर पूर्ण एकता स्थापित हो जाय। अर्धांगिनी की यही स्थिति होनी चाहिए। 4-अर्धनारी नटेश्वर की प्रतिमाओं में आधा अंग शिव का आधा पार्वती का दिखाया गया है, ऐसी प्रतिमायें राधा कृष्ण और सीताराम की भी मिलती हैं जिनमें आधा अंग नर का और आधा नारी का दिखाया गया है। ध्यान योग में इसी आत्म समर्पण की स्थिति तक पहुँचने का प्रयत्न किया जाता है। मुक्ति के चार स्तर हैं उनमें सालोक्य, सामीप्य, तो मैत्री, स्थिति है। सारूप्य और सायुज्य को समर्पण माना गया है।आत्मा और परमात्मा के बीच इसी स्तर की एकता होनी चाहिए जिसमें भक्त को भिक्षुक और भगवान को दानी बनकर रहना पड़े। दोनों के बीच एकत्व का अद्वैत का भाव विकसित हो। दोनों की आकांक्षाएँ आस्थाएँ और मान्यताएँ एक जैसी हों। मतभेद की गुन्जायश न रहे। यही ध्यान योग का लक्ष्य है। 5-आरम्भिक ध्यान माता का है। तदुपरान्त पिता का। गायत्री को माता और सविता को पिता कहा गया है। बालक का प्रथम परिचय माता से होता है और अनुग्रह भी उसी का मिलता है। पिता का परिचय और सहयोग बाद में मिलना आरम्भ होता है। माता स्नेह देती है पिता प्रखर बनाने का उत्तरदायित्व संभालता है। माता की आंख में प्यार भरा रहता है। पिता की आंख में विकास और सुधार। दोनों के समन्वय से ही प्रगति का समानपथ प्रशस्त होता है।आरम्भिक साधकों को माता के साकार रूप को और आगे बढ़ चलने पर सविता पिता के निराकार तेजस्वी रूप का ध्यान करना चाहिए। जप के साथ ध्यान की प्रक्रिया चलाते रहने से मन के न लगने की कठिनाई दूर हो जाती हैं। गायत्री का सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वसुलभ ध्यान;- 09 FACTS;- 1-मानव- मस्तिष्क बड़ा ही आश्चर्यजनक, शक्तिशाली एवं चुम्बक गुण वाला यन्त्र है। उसका एक- एक परमाणु इतना विलक्षण है। इन अणुओं को जब किसी विशेष दिशा में नियोजित कर दिया जाता है, तो उसी दिशा में एक लपलपाती हुई अग्रिजिह्व अग्रगामी होती है। जिस दिशा से मनुष्य इच्छा, आकांक्षा और लालसा करता है, उसी दिशा में, उसी रंग में, उसी लालसा में शरीर की शक्तियाँ नियोजित हो जाती हैं। 2-पहले भावनाएँ मन में आती हैं। फिर जब उन भावनाओं पर चित्त एकाग्र होता है, तब यह एकाग्रता एक चुम्बक शक्ति, आकर्षण तत्त्व के रूप में प्रकट होती है और अपने अभीष्ट तत्त्वों को अखिल आकाश में से खींच लाती है। ध्यान का यही विज्ञान है। इस विज्ञान के आधार पर, प्रकृति के अन्तराल में निवास करने वाली सूक्ष्म आद्यशक्ति ब्रह्मस्फुरणा गायत्री को अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है; उसके शक्ति भण्डार को प्रचुर मात्रा में अपने अन्दर धारण किया जा सकता है। 3-जप के समय अथवा किसी अन्य सुविधा के समय में नित्य गायत्री का ध्यान किया जाना चाहिये। एकान्त, कोलाहल रहित, शान्त वातावरण के स्थान में स्थिर चित्त होकर ध्यान के लिये बैठना चाहिये। शरीर शिथिल रहे। यदि जप काल में ध्यान किया जा रहा है, तब तो पालथी मारकर, मेरुदण्ड सीधा रखकर ध्यान करना उचित है। यदि अलग समय में करना हो, तो आरामकुर्सी पर लेटकर या मसनद, दीवार, वृक्ष आदि का सहारा लेकर साधना करनी चाहिये। 4-शरीर बिलकुल शिथिल कर दिया जाय, इतना शिथिल मानो देह निर्जीव हो गयी। इस स्थिति में नेत्र बन्द करके दोनों हाथों को गोदी में रखकर ऐसा ध्यान करना चाहिये कि ‘‘इस संसार में सर्वत्र केवल नीला आकाश है, उसमें कहीं कोई वस्तु नहीं है।’’ प्रलयकाल में जैसी स्थिति होती है, आकाश के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाता, वैसी स्थिति का कल्पना चित्र मन में भली भाँति अंकित करना चाहिए। जब यह कल्पना चित्र भावना- लोक में भली- भाँति अंकित हो जाए, तो सुदूर आकाश में एक छोटे ज्योति- पिण्ड को सूक्ष्म नेत्रों से देखना चाहिए। सूर्य के समान प्रकाशवान् एक छोटे नक्षत्र के रूप में गायत्री का ध्यान करना चाहिये। यह ज्योति- पिण्ड अधिक समय तक ध्यान रखने पर समीप आता है, बड़ा होता जाता है और तेज अधिक प्रखर हो जाता है। 5-चन्द्रमा या सूर्य के मध्य भाग में ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो उसमें काले- काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं, इसी प्रकार उस गायत्री तेज- पिण्ड में ध्यानपूर्वक देखने से आरम्भ में भगवती गायत्री की धुँधली- सी प्रतिमा दृष्टिगोचर होती है। धीरे- धीरे ध्यान करने वाले को यह मूर्ति अधिक स्पष्ट, अधिक स्वच्छ, अधिक चैतन्य, हँसती, बोलती, चेष्टा करती, संकेत करती तथा भाव प्रकट करती हुई दिखाई पड़ती है।ध्यान आरम्भ करने से पूर्व भगवती गायत्री के चित्र का कई बार बड़े प्रेम से, गौर से भली- उस मूर्ति को मन:क्षेत्र में इसी प्रकार बिठाना चाहिये कि ज्योति- पिण्ड में ठीक वैसी ही प्रतिमा की झाँकी होने लगे। थोड़े दिनों में यह तेजोमण्डल से आवेष्टित भगवती गायत्री की छवि अत्यन्त सुन्दर, अत्यन्त हृदयग्राही रूप में ध्यानावस्था में दृष्टिगोचर होने लगती है। 6-जैसे सूर्य की किरणें धूप में बैठे हुए मनुष्य के ऊपर पड़ती हैं और वह किरणों की उष्णता को प्रत्यक्ष अनुभव करता है, वैसे ही यह ज्योति पिण्ड जब समीप आने लगता है, तो ऐसा अनुभव होता है मानो कोई दिव्य प्रकाश अपने मस्तिष्क में, अन्त:करण और शरीर के रोम- रोम में प्रवेश करके अपना अधिकार जमा रहा है। जैसे अग्रि में पडऩे से लोहा भी धीरे- धीरे गरम और लाल रंग का अग्रिवर्ण हो जाता है, वैसे ही जब गायत्री माता के तेज को ध्यानावस्था में साधक अपने अन्दर धारण करता है, तो वही सच्चिदानन्द स्वरूप, ऋषिकल्प होकर ब्रह्मतेज से झिलमिलाने लगता है। उसे अपना सम्पूर्ण शरीर तप्त स्वर्ण की भाँति रक्तवर्ण अनुभव होता है और अन्त:करण में एक अलौकिक दिव्य रूप का प्रकाश सूर्य के समान प्रकाशित हुआ दिखता है। 7-इस ‘तेज धारण’ ध्यान में कई बार रंग- बिरंगे प्रकाश दिखाई पड़ते हैं, कई बार प्रकाश में छोटे- मोटे रंग- बिरंगे तारे प्रकट होते, जगमगाते और छिपते दिखाई पड़ते हैं। ये एक दिशा से दूसरी दिशा की ओर चलते हैं तथा उलटे वापस लौट पड़ते हैं। कई बार चक्राकार एवं बाण की तरह तेजी से इस दिशा में चलते हुए छोटे- मोटे प्रकाश खण्ड दिखाई पड़ते हैं। यह सब प्रसन्नता देने वाले चिह्न हैं। अन्तरात्मा में गायत्री शक्ति की वृद्धि होने से छोटी- छोटी अनेकों शक्तियाँ एवं गुणावलियाँ विकसित होती हैं, वे ही ऐसे छोटे- छोटेरंग- बिरंगे प्रकाश पिण्डों के रूप में परिलक्षित होती हैं। 8-जब साधना अधिक प्रगाढ़, पुष्ट और परिपक्व हो जाती है, तो मस्तिष्क के मध्य भाग या हृदय स्थान पर वही गायत्री तेज स्थिर हो जाता है। यही सिद्धावस्था है। जब वह तेज बाह्य आकाश से खिंचकर अपने अन्दर स्थिर हो जाता है, तो ऐसी स्थिति हो जाती है, जैसे अपना शरीर और गायत्री का प्राण एक ही स्थान पर सम्मिलित हो गये हों। भूत- प्रेत का आवेश शरीर में बढ़ जाने पर मनुष्य उस प्रेतात्मा की इच्छानुसार काम करता है, वैसे ही गायत्री शक्ति का आधान अपने अन्दर हो जाने से साधक विचार, कार्य, आचरण, मनोभाव, रुचि, इच्छा आकांक्षा एवं ध्येय में परमार्थ प्रधान रहता है। इससे मनुष्यत्व में से पशुता घटती जाती है और देवत्व की मात्रा बढ़ती जाती है। 9-उपर्युक्त ध्यान गायत्री का सर्वोत्तम ध्यान है। जब गायत्री तेज- पिण्ड की किरणें अपने ऊपर पडऩे की ध्यान- भावना की जा रही हो, तब यह भी अनुभव करना चाहिये कि ये किरणें सद्बुद्धि, सात्विकता एवं सशक्तता को उसी प्रकार हमारे ऊपर डाल रही हैं, जिस प्रकार कि सूर्य की किरणें गर्मी तथा गतिशीलता प्रदान करती हैं। इस ध्यान से उठते ही साधक अनुभव करता है कि उसके मस्तिष्क में सद्बुद्धि, अन्त:करण में सात्त्विकता तथा शरीर में सक्रियता की मात्रा बढ़ गयी है। यह वृद्धि यदि थोड़ी- थोड़ी करके भी नित्य होती रहे, तो धीरे- धीरे कुछ ही समय में वह बड़ी मात्रा में एकत्रित हो जाती है, जिससे साधक ब्रह्मतेज का एक बड़ा भण्डार बन जाता है। ...SHIVOHAM...