क्या योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है?




13 FACTS;-


1-भगवद्गीता में गीता अध्याय-6 श्लोक-46 में श्रीकष्ण कहते है ''योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र के ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, तथा सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इससे हे अर्जुन, तू योगी हो''।श्रीकष्ण ने योगी को तीन से श्रेष्ठ कहा है और चौथा बनने का आदेश दिया है। तीनों बातों को थोड़ा-थोड़ा देख लेना जरूरी है।तपश्चर्या दिखाई पड़ती है और योग दिखाई नहीं पड़ता है। योग है अंतर्साधना, और तपश्चर्या है बहिर्साधना।साधारणतः तपस्वी श्रेष्ठ मालूम पड़ता है, क्योंकि तपश्चर्या प्रकट ज है और योग अप्रकट।अगर कोई व्यक्ति घनी धूप में खड़ा है, भूखा खड़ा है, प्यासा खड़ा है, उपवासा खड़ा है, शरीर को सताता है-- तो सबको दिखाई पड़ता है। क्योंकि तपस्वी मूलतः शरीर से बंधा हुआ है। जैसे भोगी शरीर से बंधा होता है; उसके शरीरों की सजावट ,गहने, सारा का सारा शृंगार दिखाई पड़ते हैं। ऐसे ही तपस्वी का भी सारा का सारा शरीर-विरोध प्रकट दिखाई पड़ता है। लेकिन दोनों का केंद्र एक ही है--भोगी का भी शरीर है और तथाकथित तपस्वी का भी शरीर है।लेकिन योगी को पहचानना मुश्किल है, क्योंकि योगी शरीर से नहीं अंतस से शुरू करता है।योगी की यात्रा भीतरी है और वैज्ञानिक है। वैज्ञानिक इस अर्थों में है कि योगी साधनों का प्रयोग करता है, जिनसे अंतस चित्त को रूपांतरित किया जा सके।


2-त्यागी केवल शरीर से शत्रु की भांति लड़ता है और दमन करता हुआ मालूम पड़ता है।भोगी भोजन खाए चला जाता है; जितना उसका वश है और त्यागी भोजन छोड़ता चला जाता है। लेकिन योगी न तो भोजन किए चला जाता है और न ही भोजन का त्याग करता है। योगी रस का , स्वाद का त्याग कर देता हैऔर जितना भोजन जरूरी है, कर लेता है।लेकिन यह दिखाई न पड़ेगा;बहुत मुश्किल से पहचान में आएगा। यह तो योगी ही या जो बहुत निकट होंगे, वे धीरे-धीरे पहचान पाएंगे कि योगी कैसे उठता है, कैसे बैठता है, कैसी भाषा बोलता है।तपस्वी दिखाई पड़ जाएगा, क्योंकि तपस्वी का सारा प्रयोग शरीर पर है लेकिन योगी का सारा प्रयोग अंतस-चेतना पर है।योगी की समस्त साधना, अंतर्साधना है।इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि तपस्वी से महान है योगी। ऐसा कहने की जरूरत इसीलिए पड़ी होगी, क्योंकि तपस्वी सदा ही महान दिखाई पड़ता है। जो व्यक्ति रास्तों पर कांटे बिछाकर उन पर बैठ जाए, वह स्वभावतः उस व्यक्ति से महान दिखाई पड़ेगा ;जो अपनी आरामकुर्सी में बैठकर ध्यान करता हो।क्योंकि आरामकुर्सी में बैठना कौन-सी महानता है?लेकिन कांटों पर लेटना बड़ा काम नहीं है क्योंकि कोई भी थोड़ा-सा अभ्यास करे, तो बैठ जाएगा।


3-प्रत्येक मनुष्य की पीठ पर ऐसे ब्लाइंड स्पाट्स हैं, जहां कांटा चुभेगा, लेकिन आपको पता नहीं चलेगा।बस, उन्हीं ब्लाइंड स्पाट्स का थोड़ा-सा अभ्यास करना पड़ता है। व्यवस्थित कांटे रखने पड़ते हैं, जो ब्लाइंड स्पाट्स में लग जाएं।यह सीधी-सी ट्रिक है, इसमें कुछ मामला नहीं है।लेकिन कांटे पर कोई लेटा हो, तो चमत्कार हो जाएगा, भीड़ इकट्ठी हो जाएगी। लेकिन कोई आरामकुर्सी पर बैठकर ध्यान कर रहा हो, तो किसी को पता भी नहीं चलेगा। यद्यपि ध्यान को एकाग्र करना कांटों पर लेटने से बहुत कठिन काम है।क्योंकि ध्यान पारे की तरह हाथ से छिटक जाता है ; पकड़ भी नहीं पाए, कि छूट जाता है। एक क्षण भी एक जगह नहीं रुकता । इस ध्यान को एक जगह ठहरा लेना योग है।तपस्वी दिखाई पड़ता है; लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि योगी के जीवन में तपश्चर्या न होगी।जो तपश्चर्या कर रहा है, उसके जीवन में योग होगा, यह जरा कठिन मामला है।लेकिन योगी के जीवन में एक तरह की तपश्चर्या आ जाती है जो बड़ी सूक्ष्म होती है। गहरे अर्थों में वह सरल हो जाता है ,दुख को झेलने के लिए सदा तत्पर हो जाता है ,सुख की मांग नहीं करता। उस पर दुख आ जाएं, तो योगी दुख को ऐसे झेलता है, जैसे वह दुख न हो। सुख आ जाए, तो ऐसे झेलता है, जैसे वह सुख न हो।


4-योगी सुख और दुख में सम होता है।लेकिन तपस्वी दुख आ जाए, इसकी प्रतीक्षा नहीं करता; अपनी तरफ से दुख का इंतजाम करता है, आयोजन करता है। अगर एक दिन भूख लगी हो और खाना न मिले, तो योगी विक्षुब्ध नहीं हो जाता; भूख को शांति से देखता है; सम रहता है। लेकिन तपस्वी को भूख भी लगी हो, भोजन भी मौजूद हो, शरीर की जरूरत भी हो, भोजन भी मिलता हो, तो भी रोककर, हठ बांधकर बैठ जाता है कि भोजन नहीं करूंगा। यह आयोजित दुख है।ध्यान रहे, भोगी सुख की आयोजन करता है, तपस्वी दुख की आयोजन करता है।अगर भोगी सिर सीधा करके खड़ा है, तो तपस्वी शीर्षासन लगाकर खड़ा हो जाता है। लेकिन दोनों आयोजन करते हैं।योगी आयोजन नहीं करता। वह कहता है, प्रभु जो देता है, उसे सम भाव से मैं लेता हूं।वह अपनी तरफ से न सुख का आयोजन करता है, न दुख का आयोजन करता है। जो मिल जाता है, उस मिल गए में शांति से ऐसे गुजर जाता है, जैसे कीचड़ में खिला कमल ...लेकिन कीचड़ उसका स्पर्श न करता हो।


5-वास्तव में, किसी भी चीज का आयोजन करके मन को राजी किया जा सकता है।वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक जानते हैं कि दुख का आयोजन करके भी दुख में सुख लिया जा सकता है। दूसरे को सताने में सभी मजा लेते हैं; लेकिन दुनिया में एक बहुत बड़ा वर्ग है ऐसे लोगों का हैं, जो अपने को सताने में मजा लेते हैं;जिनका नाम Masochist/मैसोचिस्ट/स्‍वपीड़क है।अगर उसको खुद को सताने का मौका न मिले, तो वह ऐसी Tricks Invent करता है कि दुख आ जाए। जहां वह छाया में बैठ सकता था, वहां धूप में बैठता है। जहां उसे खाना मिल सकता है, वहां भूखा रह जाता है। जहां सो सकता था, वहां जगता है। जहां सपाट रास्ता था, वहां न चलकर कांटे-कबाड़ में चलता है!क्योंकि खुद को दुख देने से भी अहंकार की बड़ी तृप्ति होती है कि मैं कुछ हूं! मैं दुख झेल सकता हूं।यह जो स्वयं को दुख देने की वृत्ति है, यह दूसरे को दुख देने की वृत्ति का ही उलटा रूप है। चाहे दूसरे को दुख दें, चाहे अपने को दुख दें, असली रस दुख देने में है।


6-इसलिए जो आज का मनोविज्ञान कह रहा है कि जिसको खुद को सताने की वृत्ति है,वह बीमार है, श्रीकृष्ण हजारों साल पहले अर्जुन से कह रहे हैं कि तपस्वी से ऊंचा है योगी...।फिर कहते हैं कि शास्त्र को जो जानता है, उससे योगी श्रेष्ठ है।क्योंकि शास्त्र को जानने से सत्य तो नहीं मिल सकता; शब्द, सिद्धांत, फिलासफी ही मिल सकती है।और सारे सिद्धांत से या हजार शास्त्रों को निचोड़कर भी कोई पी जाए, तो भी रत्तीभर अनुभव भी उससे पैदा नहीं होगा।संत कबीर कहते है कि हम बेपढ़े-लिखे गंवार हैं।कागज में क्या लिखा है, हमें कुछ नहीं पता। हम तो कहते आंखन देखी, तू कहता है कागद लेखी।शास्त्र-ज्ञान में और योगी में यही फर्क है।शास्त्र-ज्ञान का मतलब है, कागज में जो लिखा है, उसे जान लिया। उसे जान लेने से जानने का भ्रम पैदा होता है, ज्ञान पैदा नहीं होता। ज्ञान तो पैदा होता है, स्वयं के दर्शन से। और दर्शन की विधि योग है। शुद्धतम चेतना शुद्ध होते-होते दर्शन के नए आयाम /न्यू डायमेंशंस आफ परसेप्शन को उपलब्ध होती है। जहां दर्शन /साक्षात्कार होता है, वहां हम देख पाते हैं, जान पाते हैं।


7-शास्त्र-ज्ञान प्रमाण बन सकता है,साक्षी हो सकता है लेकिन सत्य नहीं।इसलिए जब आप गीता पढ़ते हैं, तो उसका अर्थ दूसरा होता है ,पड़ोसी पढ़ता है, तो अर्थ दूसरा और जब कोई दूसरा पढ़ता है, तो अर्थ दूसरा होता है। जितने लोग पढ़ते हैं, उतने अर्थ होते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति वही पढ़ सकता है, जो उसकी क्षमता है।हम जब कुछ समझते हैं, तो वह हमारी व्याख्या है और शब्दों से बड़ी भ्रांतियां पैदा हो जाती हैं।एक ही शब्द से हजार अर्थ निकलते हैं;शब्द का अपने आप में अर्थ नहीं है।कोई कुछ समझता है,तो कोई दूसरा कुछ और समझता है।जब आप गीता में से कुछ पढ़ते हैं, तो यह मत समझना कि जो श्रीकृष्ण कहते हैं, वह आप समझते हैं। आप वही समझते हैं, जो आप समझ सकते हैं। सत्य का अनुभव हो, तो गीता में सत्य का उदघाटन होता है। सत्य का अनुभव न हो और अज्ञानी के हाथ में गीता हो, तो सिवाय अज्ञान के गीता में से कोई अर्थ नहीं निकल सकता।शास्त्र-ज्ञान दूसरी कोटि का ज्ञान है। प्रथम कोटि का ज्ञान तो अनुभव ...स्वानुभव है। पहली कोटि का ज्ञान हो, तो शास्त्र बड़े महत्वपूर्ण हैं। और पहली कोटि का ज्ञान न हो, तो शास्त्र बिलकुल रद्दी की टोकरी में है, उनका कोई मूल्य नहीं।


8-अगर योगी गीता पढ़ने जाएगा, तो गीता में अमृत का सागर है और बिना योग के तो सिवाय शब्दों के और कुछ भी नहीं है। कोरे खाली शब्द ऐसे हैं, जैसे कि चली हुई कारतूस होती है ...कितना ही चलाओ, कुछ नहीं चलता।गीता का एक सूत्र ,श्लोक कंठस्थ कर लो तो कुछ नहीं होगा ;प्राण तो अपने ही अनुभव से आते हैं।और श्रीकृष्ण तो खुद अर्जुन से कहते हैं कि, शास्त्र-ज्ञान भी उतना श्रेष्ठ नहीं है ;उससे भी ज्यादा श्रेष्ठ है 'योग'।और तीसरी बात कहते हैं, सकाम कर्मों से ,किसी आशा से की गई कोई भी प्रार्थना से, कोई भी पूजा से या कोई भी यज्ञ से -योग श्रेष्ठ है।क्योंकि योग की साधना का आधारभूत नियम /पहली कंडीशन यह है कि तुम निष्काम हो जाओ। आशा छोड़ दो, अपेक्षा छोड़ दो, फल की आकांक्षा छोड़ दो, तभी योग में प्रवेश है।तब यज्ञ तो बहुत छोटी-सी बात हो गई ... किसी के घर में बच्चा नहीं हो रहा है, धन नहीं बरस रहा है या पद नहीं मिल रहा है, तो यज्ञ कर रहा है।और अब श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि योग की यात्रा पर निकल। तेरा मन चाहेगा कि कोई सकाम भक्ति में लग जा, युद्ध जीत जाए, राज्य मिल जाए। लेकिन मैं कहता हूं कि सकाम होना धर्म की दिशा में सम्यक यात्रा-पथ नहीं है। तेरा मन करेगा कि योग के इतने उपद्रव में हम क्यों पड़ें! शास्त्र पढ़ लेंगे, सत्य उसमें मिल जाएगा।पर तू सावधान रहना। शास्त्र से शब्द के अलावा कुछ भी न मिलेगा। असली शास्त्र तो तभी मिलेगा, जब सत्य तुझे मिल चुका होगा ;उसके पूर्व नहीं ..।


9- क्योंकि अर्जुन कह रहा है कि दूसरों को मैं क्यों मारूं? इससे बेहतर है, मैं अपने को ही क्यों न सता लूं! वास्तव में, जब तक इस देश में ब्राह्मण प्रतिष्ठा में थे, तो तपस्वियों की कोई बहुत महत्ता न थी ...योगियों की महत्ता थी।उसका कारण है कि क्षत्रिय की तो पूरी की पूरी साधना ही तलवार की धार की होती है।वह तलवार की धार अपनी तरफ कर लेगा। उसका अभ्यास पुराना ही रहेगा।कल वह दूसरे को मारता था, अब वह अपने को मारेगा।लेकिन तपस्वियों ने योगियों की महत्ता को बुरी तरह नीचे गिराया, क्योंकि योग तो दिखाई नहीं पड़ता था। तपस्वियों ने कहना शुरू किया कि ...ये कहते तो हैं कि हम गुरुकुल में रहते हैं, लेकिन इनके पास दस-दस हजार गाएं हैं। इनके पास दूध-घी की नदियां बहती हैं। इनके पास सम्राट चरणों में सिर रखते हैं, हीरे-जवाहरात भेंट करते हैं। यह कैसा योग है...यह तो भोग चल रहा है!और बड़े आश्चर्य की बात है कि आश्रमों में संपत्ति, निश्चित ही आती थी, लेकिन उस संपत्ति के कारण उनका योग नहीं चल रहा था । बल्कि सच तो यह है कि वह संपत्ति इसीलिए आती थी कि जिनको भी उनमें योग की गंध मिलती थी, वे उनकी सेवा के लिए तत्पर हो जाते थे।


10-पर तपस्वियों ने कहा, धूप में खड़ा हुआ, भूखा, उपवास करता, शरीर को गलाता, सताता, योगी होगा। रात-दिन अडिग खड़ा रहने वाला योगी होगा।क्षत्रिय ऐसा कर सकते थे; ब्राह्मण ऐसा कर भी न सकते थे।उनका कभी कोई शिक्षण तलवार चलाने का ,युद्धों में लड़ने का, और घोड़ों पर चढ़कर दौड़ने का न था। क्षत्रियों का था तो वे तपश्चर्या में सरलता से उतर सकते थे ।इसलिए जब क्षत्रियों ने धर्म की साधना में गति शुरू की, तो उन्होंने तत्काल तपस्वी को प्रमुख कर दिया और योगी को पीछे कर दिया।लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं योग ही श्रेष्ठ है अर्जुन। क्योंकि अर्जुन के लिए भी तपश्चर्या सरल थी। अर्जुन भी आसानी से तपस्वी बन सकता था । योगी बनना कठिन था। इसलिए श्रीकृष्ण ने तीनों बातें कहीं; तू सरलता से सकाम भी बन सकता है ; युद्ध तुझे जीतना, राज्य तुझे पाना। शास्त्र भी पढ़ सकता है क्योकि शिक्षित है, सुसंस्कृत है।स्वयं को सताने वाला तपस्वी भी बन सकता है क्योकि तू क्षत्रिय है; तुझे कोई अड़चन न आएगी। लेकिन मैं तुझसे कहता हूं कि इन तीनों में योग श्रेष्ठ है । अर्जुन, तू योगी बन!


11- अध्याय-6 का अंतिम श्लोक श्रद्धा पर पूरा होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, ''और संपूर्ण योगियों में भी, जो श्रद्धावान योगी मेरे में लगे हुए अंतरात्मा से मेरे को निरंतर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है।''और श्रद्धा से मुझमें लगा हुआ योगी परम अवस्था को उपलब्ध होता है, वह मुझे सर्वाधिक मान्य है।दो तरह के योगी हो सकते हैं। एक बिना किसी श्रद्धा के योग में लगे हुए;जिन्हे मात्र जीवन के दुख से छुटकारा चाहिए।वह जीवन की ऊब से भागा हुआ हैं, जो अपने को किसी सुरक्षित अंतःस्थल में पहुंचा देना चाहता है।वह बिना परमात्मा में श्रद्धा के भी योग में संलग्न हो सकता है लेकिन यात्रा बहुत लंबी होगी। क्योंकि परमात्मा जो सहायता दे सकता है, वह उसे न मिल सकेगी। यह फर्क समझना हैं।इसलिए श्रीकृष्ण उसे कहते हैं, जो मुझमें श्रद्धा से लीन है, मेरी आत्मा से अपनी आत्मा को मिलाए हुए है, उसे मैं परम श्रेष्ठ कहता हूं।उदाहरण के लिए एक बच्चा रास्ते पर चल रहा है । कई बार बच्चा अपने पिता का हाथ पकड़ना पसंद नहीं करता। उसके अहंकार को चोट लगती है।पिता छोड़ दे या बेटा झटका देकर हाथ अलग कर ले, तो भी बेटा चलना सीख जाएगा, लेकिन यात्रा लंबी होगी । भूल-चूक ;होगी हाथ-पैर बहुत टूटेंगे।तो बेटा चलना तो चाहता है, लेकिन खुद के अहंकार के अतिरिक्त पिता या किसी के प्रति कोई भाव नहीं है।तो जरूरी नहीं है कि इसी जन्म में चलना सीख पाए। जन्म-जन्म भी लग सकते हैं।


12-श्रद्धा में जिसका जीवन है उसके अहंकार निर्मित न हो पाएगा। वह कहेगा, मेहनत मैं पूरी करता हूं, लेकिन फिर भी तेरी कृपा के बगैर तो मिलना नहीं होगा। मैं जरूर चलने की कोशिश करूंगा, लेकिन मैं गिर जाऊंगा ...तेरे हाथ का सहारा मुझे बना रहे। और आश्चर्य की बात यह है कि इस तरह का जो चित्त है, उसका द्वार सदा ही परम शक्ति को पाने के लिए खुला रहेगा।जो श्रद्धावान नहीं है, उसका द्वार क्लोज्ड है, उसका मन बंद है।श्रद्धावान व्यक्ति वह है, जिसके द्वार-दरवाजे खुले हैं। श्रद्धा का अर्थ है, मुझसे भी विराट शक्ति मेरे चारों तरफ मौजूद है, मैं उसके सहारे के लिए निरंतर निवेदन कर रहा हूं।मैं अकेला काफी नहीं हूं क्योंकि मैं जन्मा नहीं था, तब भी वह विराट शक्ति मौजूद थी। और आज भी मेरे हृदय की धड़कन मेरे द्वारा नहीं चलती, उसके ही द्वारा चलती है।आज भी मेरा खून मैं नहीं बहाता, वही बहाता है। और आज भी मेरी श्वास मैं नहीं लेता, वही लेता है। और कल जब मौत आएगी, तो मैं कुछ न कर सकूंगा। शायद वही मुझे अपने में वापस बुला लेगा। तो जो मुझे जन्म देता है, जो मुझे जीवन देता है, जो मुझे मृत्यु में भी ले जाता है, जिसके हाथ में सारा खेल है, मैं अकड़कर यह कहूं कि मैं ही चल लूंगा, मैं ही सत्य तक पहुंच जाऊंगा, तो थोड़ी-सी भूल होगी। व्यर्थ ही द्वार बंद हो जाएंगे।सहयोग के लिए विराट शक्ति मिल सकती थी , वह न मिल पाएगी।


13-इसलिए योग की इतनी लंबी चर्चा के बाद अंतिम सूत्र में श्रीकृष्ण श्रद्धा की बात कहते हैं।योग का तो अर्थ है, मैं कुछ करूंगा ; श्रद्धा का अर्थ है -मुझसे अकेले से न होगा।योग का अर्थ है -मैं करूंगा..विधि, साधन, प्रयोग, साधना आदि के द्वारा। और श्रद्धा का अर्थ है जरूर करूंगा ; लेकिन मैं काफी नहीं हूं, तेरी भी जरूरत पड़ती रहेगी। और जहां मैं कमजोर पड़ जाऊं, तेरी शक्ति मुझे मिले।और आश्चर्य की बात यह है कि जो इस भाव से चलता है, उसे इशारे मिलते हैं, सहारे मिलते हैं; उसे बल भी मिलता है, उसे शक्ति भी मिलती है। और जो इस भरोसे नहीं चलता, उसे भी इशारा मिलता है ,सहारा ,शक्ति मिलती है, लेकिन उसके द्वार बंद हैं, इसलिए वह नहीं देख पाता और शक्ति दरवाजे से ही वापस लौट जाती है।परमात्मा तो सभी को सहायता देता है। लेकिन जो श्रद्धा करते हैं, वे उस सहायता को ले पाते हैं। और जो श्रद्धा नहीं करते, वे नहीं ले पाते हैं।श्रद्धा का अर्थ है, Trust अथार्त मैं इस विराट जीवन के सागर में एक बूंद से ज्यादा नहीं हूं। इस अस्तित्व में एक छोटा-सा कण हूं।योग तो कहता है कि तू अपनी हस्ती को इकट्ठा कर और श्रम कर। और श्रद्धा कहती है, अपनी हस्ती को पूरा मत मान लेना। नाव को किनारे से खोलना जरूर, लेकिन तेरी नाव को तो हवाएं ही ले जाएंगी। ऐसी श्रद्धा बनी रहती है, तो एक छोटा-सा दीया भी सूरज की शक्ति का मालिक हो जाता है ;एक छोटा-सा अणु भी परम ब्रह्मांड की शक्ति के साथ एक हो जाता है।इसलिए योग की इतनी चर्चा करने के बाद भी श्रीकृष्ण ने कहा कि जो मुझमें श्रद्धायुक्त है, उसे मैं परम श्रेष्ठ कहता हूं।


... SHIVOHAM....