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क्या ध्यान में जाना जा सकता है कि मैं कौन हूँ?

आत्मज्ञान ;-

16 FACTS;-

1-ईश्वर के दर्शन नहीं हो सकते। लेकिन चाहो तो स्वयं ईश्वर अवश्य हो सकते हो।ईश्वर को पाने और जानने की खोज बिलकुल ही अर्थहीन है। जिसे खोया ही नहीं है, उसे पाओगे कैसे? और जो तुम स्वयं ही हो, उसे जानोगे कैसे? वस्तुत: जिसे हम देख सकते हैं, वह हमारा स्वरूप नहीं हो सकता। दृश्य बन जाने के कारण ही वह हमसे बाहर और पर हो जाता है। परमात्मा है हमारा स्वरूप और इसलिए उसका दर्शन असंभव है।वास्तव में, परमात्मा के नाम से जो दर्शन होते हैं, वे हमारी ही कल्पनाएं है। मनुष्य का मन किसी भी कल्पना को आकार देने में समर्थ है। किन्तु इन कल्पनाओं में खो जाना सत्य से भटक जाना है। सत्य को जानने के पूर्व स्वयं को जानना तो अनिवार्य ही है।और स्वयं को जानते ही जाना जाता है कि अब कुछ और जानने को शेष नहीं है।आत्मज्ञान की कुंजी के पाते ही सत्य का ताला खुल जाता है।सत्य तो सब जगह है। समग्र सत्ता में वही है। किन्तु उस तक पहुंचने का निकटतम मार्ग स्वयं में ही है। स्वयं की सत्ता ही चूंकि स्वयं के सर्वाधिक निकट है, इसलिए उसमें खोजने से ही खोज होनी सम्भव है। और जो स्वयं में ही खोजने में असमर्थ है, जो निकट ही नहीं खोज पाता है तो दूर कैसे खोज पाएगा? दूर की खोज का विचार.. निकट की खोज से बचने का एक उपाय भी हो सकता है।

2-संसार की खोज चलती है ताकि स्वयं से बचा जा सके और फिर ईश्वर की खोज चलते लगती है। क्या स्वयं के अतिरिक्त शेष सब खोजें स्वयं से पलायन की ही विधियां नहीं है? भीतर देखें कि वहां क्या दिखता है ...अंधकार, अकेलापन, रिक्तता। इस अंधकार, इस अकेलेपन, इस रिक्तता से भागकर ही हम कहीं शरण लेने को भागते रहते हैं। किन्तु इस भांति के भगोड़ेपन से दुख के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं लगता है। स्वयं से भागे हुए के लिए विफलता ही भाग्य है। क्योंकि जो खोज स्वयं से पलायन है, वह कहीं भी नहीं ले जा सकती है।और दो ही विकल्प हैं ... स्वयं से भागो या स्वयं में जागो। भागने के लिए बाहर लक्ष्य होना चाहिए और जानने के लिए बाहर के सभी लक्ष्यों की सार्थकता का श्रम भंग। ईश्वर जब तक बाहर है, तब तक वह भी संसार है, वह भी माया है, वह भी मूर्च्छा है। उसका आविष्कार भी मनुष्य ने स्वयं से बचने और भागने के लिए ही किया है। इसलिए ईश्वर, सत्य, निर्वाण, मोक्ष...यह सब न खोजें। खोजें उसे जो सब खोज रहा है। उसकी खोज ही अन्‍ततः ईश्वर की, सत्य की और निर्वाण की खोज सिद्ध होती है।

3-ज्ञान की पूर्ण शुद्धावस्था का नाम ही है आत्मज्ञान। और भी उचित है कि हम उसे ज्ञान ही कहें, क्योंकि वहां न कोई आत्म है और न अनात्म। आत्मानुसंधान के अतिरिक्त और कोई खोज धार्मिक खोज नहीं है। लेकिन, ‘आत्म ज्ञान’, ‘आत्म दर्शन’, आदि शब्द बड़े भ्रामक हैं। क्योंकि, स्वयं का जान कैसे हो सकता है? ज्ञान के लिए द्वैत चाहिए, जहां दो नहीं हैं, वहां ज्ञान कैसे होगा? दर्शन कैसे होगा? वास्तव में, ज्ञान, दर्शनादि सभी शब्द द्वैत के जगत के हैं। और जहां अद्वैत है, जहां एक ही है, वहां वे एकदम अर्थहीन हो जाते हों तो कोई आश्रर्य नहीं।वास्तव में, ‘आत्म दर्शन’ शब्द ही असंगत है। जो जाना जा सकता है, वह स्व कैसे होगा? वह तो पर ही हो सकता है। जानना तो पर का ही हो सकता है। स्व तो वह है जो जानता है।जहां ज्ञान/knowledge है, वहां कोई ज्ञाता/ knower है, कुछ ज्ञेय/known है। स्व अनिवार्यरूप से ज्ञाता knower है। उसे किसी भी उपाय से ज्ञेय known नहीं बनाया जा। उदाहरण के लिए कुत्तों को स्वयं अपनी ही पूंछ को पकड़ने की असफल चेष्टा करते आपने कभी देखा होगा । वे जितनी तीव्रता से झपटते हैं, पूंछ उतनी ही शीघ्रता से हट जाती है। इस प्रयास में वे पागल भी हो जाएं तो भी क्या उन्हें पूंछ की प्राप्ति हो सकती है? किन्तु हो सकता है कि वे अपनी पूछ पकड़ लें, लेकिन स्वयं को ज्ञेय बनाना, तो संभव नहीं है।

4-हम सबको जान सकते है लेकिन उसी भांति स्वयं को नहीं। शायद इसीलिए आत्मज्ञान जैसी सरल घटना कठिन और दुरूह बनी रहती है। फिर इस ज्ञान को पाने की विधि ,मार्ग क्या है ?उदाहरण के लिए एक घर तो बड़ा था, किन्तु सामान की अधिकता से बिलकुल छोटा हो गया था। वस्तुत: वहां सामान ही सामान था और घर था नहीं, क्योंकि घर तो दीवारों से घिरे रिक्त स्थान का ही नाम है।गृहपति कहता है कि ‘घर में जगह बिलकुल नहीं है, लेकिन जगह लाएं भी कहां से।वास्तव में, रिक्त स्थान घर में पर्याप्त है। वह यहीं है, और कहीं गया नहीं, केवल सामान से आपने उसे ढांक लिया है। सामान हटावें और वह अभी और यहीं है।आत्म- ज्ञान की विधि भी यही है।सोते -जागते, उठते -बैठते, सुख में, दुख में ...मैं तो हूं ही। ज्ञान हो, अज्ञान हो, मैं तो हूं ही। मेरा यह होना असंदिग्ध है। सब पर संदेह किया जा सके, लेकिन स्वयं पर तो संदेह नहीं किया जा सकता है। मेरा होना ,मेरा अस्तित्व और मेरी जानने की क्षमता ,मुझमें ज्ञान का होना, इन दोनों के आधार पर ही मार्ग खोजा जा सकता है।मैं हूं लेकिन ज्ञात नहीं कौन हूं? अब क्या करूं? ज्ञान जो कि क्षमता है, ज्ञान जो कि शक्ति है, उसमें झांकूं, और खोजूं। इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प ही नहीं है?

5-ज्ञान की शक्ति है, लेकिन वह ज्ञेय से /विषयों से ढंकी है। एक विषय हटता है, तो दूसरा आ जाता है।एक विचार जाता है तो दूसरे का आगमन हो जाता है। ज्ञान एक विषय से मुक्त होता है तो दूसरे से बंध जाता है, लेकिन रिक्त नहीं हो पाता।ज्ञान जहां ज्ञेय से /विषय से मुक्त है, वहीं वह शुद्ध है।और वह शुद्धता ,शून्यता ही आत्मज्ञान है।चेतना जहां निर्विषय है, निर्विचार है, निर्विकल्प है, वहीं जो अनुभूति है, वही स्वयं का साक्षात्कार है। किंतु यहां इस साक्षात्कार में न तो कोई ज्ञाता है, न ज्ञेय है। यह अनुभूति अभूतपूर्व है। उसके लिए शब्द असम्भव है।वास्तव में सत्य के संबंध में जो भी कहो, वह कहने से ही असत्य हो जाता है।ज्ञान है शब्दातीत।किन्तु सत्य के संबंध में किए गए अधूरे इंगितों को पकड़ लेने से बडी भ्रांति हो जाती है।आत्मज्ञान की खोज में जो व्यक्ति आत्मा को एक ज्ञेय पदार्थ की भांति खोजने निकल पड़ता है, वह प्रथम चरण में ही गलत दिशा में चल पड़ता है। आत्मा ज्ञेय नहीं है और न ही उसे किसी आकांक्षा का लक्ष्य ही बनाया जा सकता है, क्योंकि वह विषय भी नहीं है। वस्तुत: उसे खोजा भी नहीं जा सकता क्योंकि यह खोजनेवाले का ही स्वरूप है।

6-उस खोज में खोज और खोजी भिन्न नहीं है। इसलिए आत्मा को केवल वे ही खोज पाते है, जो सब खोज छोड़ देते है और वे ही जान पाते हैं जो सब जानने से शून्य हो जाते हैं।स्‍वप्‍न खोते ही सत्य उपलब्ध है। स्‍वप्‍न जहां नहीं है, तब जो शेष है, वही है स्‍व-सत्ता, वही है सत्य, वही है स्वतन्त्रता। मैं जिसे नहीं खौ सकता हूं वही तो है स्वरूप , वही तो है परमात्मा।और जो सदा है, सनातन है, वही तो है सत्य।रूप खोते ही सत्य उपलब्ध है। जिसे खोया जा सकता है, उस सबको खोकर ही वह जान लिया जाता है, जो सत्य है।विस्मरण हमारी आदत नहीं है और सब कुछ हमें स्मरण है।सिर्फ एक बात स्मरण नहीं है। इसलिए हम कपड़े भी ठीक से पहन लेते हैं और जूते भी, और घर भी ठीक से बसा लेते हैं, लेकिन जीवन हमारा ठीक नहीं हो पाता है। जो जीवन में केंद्रीय है उसकी हमें कोई स्मृति नहीं।हम सभी एक दूसरे को वस्त्रों से ही पहचानते हैं।लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि हम अपने को भी अपने वस्त्रों से पहचानते हैं।

7-अपनी आत्मा का ,अपने स्वरूप का तो हमें तो कोई बोध नहीं। हम जो वस्त्र पहने हुए हैं वे सारे धन के, पदवियों के, पदों के, सामाजिक प्रतिष्ठा के, अहंकार के, उपाधियों के, वस्त्र हैं और उनसे ही हम अपने को भी पहचानते हैं।वस्त्रों से जो अपने को पहचानता है उसका जीवन यदि अंधकारपूर्ण हो जाए, दुख से , पीड़ा और विपन्नता से भर जाए, तो आश्चर्य नही है क्योंकि वस्त्र हमारे प्राण नहीं हैं, और वस्त्र हमारी आत्मा नहीं हैं। लेकिन हम अपने को अपने वस्त्रों से ही जानते हैं। उससे गहरी हमारी कोई पहुंच नहीं है।जीवन में सारा दुख और सारा अंधकार इस आत्म-अज्ञान से पैदा होता है। अपने स्वयं के केंद्र पर अंधकार होता है और हम सारे रास्तों पर दीये जलाने की कोशिश करते हैं। वे सब दीये काम नहीं पड़ते क्योंकि हमारे भीतर अंधकार होता है । तो हम जहां भी जाते हैं अपने साथ अंधकार ले जाते हैं।जब तक हम स्वयं को नही जानते तब तक अंधकार ही हैं। जीवन में एक-एक व्यक्ति उतने अंधकार में है और सारे लोग अपने-अपने अंधकार को लिए फिरते हैं। हम सब जहां इकट्ठे हो जाते हैं वहाँ अंधकार बहुत घना हो जाता है।

8-अपने भीतर जीवन की सुगंध को , जीवन की धन्यता को, कृतार्थता को कोई अनुभव नही करता हैएक अर्थहीनता, एक मीनिंगलेसनेस हमें पकड़े है। लेकिन किसी भांति हम कल की आशा में जीए जाते हैं । शायद कल सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जिसका आज गलत है उसका कल कैसे ठीक होगा? क्योंकि कल तो आज से ही निकलेगा, आज से ही पैदा होगा।तो यदि आज दुखी हैं तो जान लें कि कल भी दुखी रहेंगे। कल की सुख की आशा में आज के दुख को झेला तो जा सकता है। लेकिन कल के सुख को निर्मित नहीं किया जा सकता है।इसलिए आनंद है.. केवल आशा और जीवन है.. दुख ऐसा हमारे सबके अनुभव में है। यह कोई सिद्धांत की बात नहीं है। जो भी अपने जीवन को थोड़ा सा खोल कर देखेगा उसे यह दिखाई पड़ेगा। जीवन के संबंध में पहला तथ्य यही है कि जिस भांति हम उसे जी रहे हैं उस भांति कहीं कोई, कहीं आनंद का फूल उसमें नहीं लगता है और ना लग सकता है। इसीलिए कल ठीक हो जाएगा, कल आने वाले वर्ष या आने वाली जिंदगी में, परलोक में, पुर्नजन्म में सब ठीक हो जाएगा ये सब कल की आशा का विस्तार है।

9-कोई सोचता हो कि इस जन्म के बाद अगले जन्म में सब ठीक हो जाएगा। वह उसी तरह की भ्रांति में है जिस तरह की भ्रांति में जो सोचता है आज दुख है कल शांति, कल सुख हो जाएगा। कोई सोचता हो मोक्ष में सब ठीक हो जाएगा तो भ्रांति में है। क्योंकि कल मुझसे पैदा होगा। आने वाला जन्म भी, मोक्ष भी, जो भी होने वाला है वह मुझ से पैदा होगा। और अगर मेरा आज अंधकारपूर्ण है तो कल मेरा प्रकाशित नहीं हो सकता।तो फिर क्या हम निराश हो जाएं और कल की सारी आशा छोड़ दें ?लेकिन इससे निराश होने का भी कोई कारण नहीं है। आज के प्रति आशा से भरा जा सकता है। आज को परिवर्तित किया जा सकता है। मैं जो हूँ उस होने में क्रांति लाई जा सकती है। मैं कल क्या होऊंगा इसके द्वारा नहीं बल्कि जो मैं अभी हूँ उसके ज्ञान, उसके बोध उसके प्रति जागरण से, उसे जान लेने से ...आत्म स्मृति से क्रांति उत्पन्न हो सकती है। यदि हम स्वयं को जान सके तो वह दीया उपलब्ध हो जाएगा जो जीवन से अंधकार को नष्ट कर देगा और स्वयं को जाने बिना न कोई दीया है और न कोई प्रकाश है, न कोई आशा है।

10-ये जान लेना स्वयं को जानने के प्रति पहला चरण है कि हम स्वयं को नहीं जानते हैं। । कोई सोचता हो कि मैं स्वयं को जानता हूँ तो स्वयं को जानने के प्रति द्वार बंद हो जायेंगे और धर्म की बहुत सी शिक्षाओं ने, हजारों वर्ष से दोहराए गए सिद्धांतों ने, आत्मा और परमात्मा की बातों ने हममें से बहुतों को यह भ्रम पैदा कर दिया है कि हम अपने को जानते हैं। इस भ्रम ने हमारे आत्म-अज्ञान को गहरा किया है। स्वयं को जानने के भ्रम से बड़ा, आत्म-ज्ञान में और कोई दूसरा अटकाव कोई दूसरी दीवाल, कोई दूसरा अवरोध नहीं है। छोटे से बच्चे भी जानते हैं कि हम आत्मा हैं और बूढ़े भी दोहराते हैं कि हम आत्मा हैं। यह सत्य है, यह सत्ता का अनुभव हो तो जीवन बिलकुल दूसरा हो जाएगा। ये सिद्धान्त हैं, ये स्वयं की प्रतीति और साक्षात हो तो जीवन नया हो जाए और जीवन आनंद से भर जाए।लेकिन अज्ञान में इन शब्दों से पैदा हुए झूठे ज्ञान को हमने बहुत तीव्रता से पकड़ा है उसे छोड़ने में भी भय मालूम होता है। इसलिए जैसे-जैसे व्यक्ति मृत्यु के करीब पहुंचता है वैसे-वैसे इन शब्दों को और जोर से पकड़ लेता है। वैसे-वैसे गीता, कुरान और बाइबिल उसके मस्तिष्क पर और जोर से बैठते जाते हैं।

11-वैसे-वैसे वह मंदिरों के द्वार खटखटाने लगता है। और साधु-संन्यासियों के सत्संग में बैठने लगता है ताकि इन शब्दों को जोर से पकड़ ले, ताकि आती हुई मौत के विरोध में कोई सुरक्षा का उपाय बना ले। इसलिए जितने लोग मृत्यु से भयभीत होते हैं वे सभी आत्मा की अमरता में विश्वास कर लेते हैं। उनका यह विश्वास उनका ज्ञान नहीं है। कोई विश्वास कभी ज्ञान नहीं होता। सब विश्वास अज्ञान होते हैं। जीवन के प्रति जो भी हम माने हुए बैठे हैं वह सब हमारा अज्ञान है और उस मानने के कारण ज्ञान तक जाने का सारा द्वार बंद है।हमारे विश्वास बाधा हैं। और जो व्यक्ति जितने ज्यादा विश्वासों से ग्रसित हो जाता है उसके जीवन में विवेक के अवतरण का और जगने की संभावना का, उतना ही उसी मात्रा में ह्रास हो जाता है।यह बात असंभव हो जाती है कि हम स्वयं को जान सकें। क्योंकि स्वयं को जानने के सिद्धांत हमें यह भ्रम पैदा कर देते हैं कि हम जानते हैं और ये भ्रम बहुत तलों पर हैं।इस ‘मैं’ का तो हमें कोई भी पता नही है। तो या तो हम अपने नाम को, अपने घर को, अपने परिवार को समझते हैं कि यह मेरा होना है, अगर किसी भांति इससे हमारा छुटकारा हो जाए और ये हम जान सकें कि मेरा नाम, मेरा घर, मेरा वंश, मेरा राष्ट्र, मेरी जाति, मेरा धर्म यह मेरा होना नहीं है अगर किसी भांति यह बोध भी आ जाए तो फिर हम तोतों कि भांति उन शब्दों को दोहराने लगते हैं जो ग्रंथों में लिखे हैं और शास्त्रों में कहे हैं।

12-तब हम दोहराने लगते हैं कि मैं आत्मा हूँ ,मैं परमात्मा हूँ । अहं-ब्रह्मास्मि और-और न मालूम क्या-क्या हम दोहराने लगते हैं। जिस भांति यह कहा गया है कि आप का यह नाम है और आपने पकड़ लिया है, उसी भांति यह भी कहा गया है कि आपके भीतर परमात्मा है और आपने यह भी पकड़ लिया है। इन दोनों बातों में कोई फर्क नहीं है। जब तक हम बाहर से आए हुए शब्दों को पकड़ते हैं तब तक हम स्वयं से परिचित नहीं हो सकेंगे वे शब्द चाहे पिता ने दिए हो, चाहे समाज ने, चाहे ऋषियों ने, मुनियों ने, साधु ने, संतों ने किन्हीं ने भी वे शब्द दिए हों।तब तक उस परिचय का जन्म नहीं हो सकेगा जो हमारा परिचय है। तब तक हम उसे नहीं जान सकेंगे ...कोई मार्ग नहीं है।तुम्हारा नाम, धन, पद और प्रतिष्ठा तुम्हारा परिचय नहीं है। तुम जिस दिन स्वयं को पा लोगे उस दिन उसे भी पा लोगे जो सबके भीतर है। क्योंकि जो मेरे भीतर है और जो किसी और के भीतर है और जो सबके भीतर है, वह बहुत गहरे में संयुक्त है, और एक है और समग्र है।ज्ञानी होने में अहंकार की खूब तृप्ति है। जितना ये ज्ञान की बातें करने वाले लोग अहंकार से पीड़ित हो जाते हैं उतना तो कोई और अहंकारी नहीं होता।

13-कुछ शब्दों ,कुछ विचारों को इकट्ठा करके हमें यह खयाल पैदा होता है कि हमने जान लिया है।वास्तव में, जानते तो हम कुछ भी नहीं, हमारा ‘मैं’ जरूर मजबूत होता है और भर जाता है। और फिर जिस चीज से भरने लगता है उसको हम इकट्ठा करने लगते हैं। कोई धन इकट्ठा करने लगता है क्योंकि धन के इकट्ठे करने से अहंकार भरता हुआ मालूम पड़ता है। कोई त्याग करने लगता है क्योंकि उससे अहंकार भरता है और हमारा अहंकार बड़ा सूक्ष्म है। वह निरंतर अपने को भरने की कोशिश करता है। अगर त्याग को प्रशंसा मिलती हो आदर मिलता हो तो हम त्याग कर सकते हैं, उपवास कर सकते हैं, धूप में खड़े रह सकते हैं, सिर के बल खड़े रह सकते हैं, शरीर को सुखा सकते हैं। अगर चारों तरफ जय जयकार होता हो तो हम मरने को राजी हो सकते हैं,