क्या कुंडलिनी जागरण नये द्वारों पर दस्तक है? PART-02

कुंडलिनी ...नये द्वारों पर दस्तक:-

09 FACTS;-

1- जब तुम्हारी कुंडलिनी जागनी शुरू होती है तो वह कुछ ऐसे नये द्वारों पर भी चोट करती है जो सामान्य नहीं हैं। इनसे तुम्हें कुछ और चीजों का पता चलना शुरू होता है ;जो कि इन आंखों से ,हाथों से पता नहीं चलता था। अथार्त तुम्हारी अंतर इंद्रियों पर चोट होनी शुरू हो जाती है। अभी भी तुम्हारी कुंडलिनी की शक्ति ही इन आंखों को और कानों को चला रही है, लेकिन ये बहिर इंद्रिया हैं। और बहुत छोटी सी मात्रा से कुंडलिनी इनको चला लेती है। अगर तुम उस मात्रा में थोड़ी सी भी बढ़ती कर दो, तो तुम्हारे पास अतिरिक्त शक्ति होगी जो नये द्वारों पर चोट कर सके।उदाहरण के लिए हम यहां से पानी बहा दें। अगर पानी की एक छोटी सी मात्रा हो, तो पानी की एक लीक बन जाएगी और फिर पानी उसी में से बहता हुआ चला जाएगा। लेकिन पानी की मात्रा एकदम से बढ़ जाए तो तत्काल नई धाराएं शुरू हो जाएंगी; क्योंकि उतने पानी को पुरानी धारा न ले जा सकेगी।

2-तो कुंडलिनी को जगाने का गहरा शारीरिक अर्थ यह है कि तुम्हारे पास इतनी ऊर्जा हो कि तुम्हारे पुराने द्वार उसको बहाने में समर्थ न रह जाएं। तब अनिवार्यरूपेण उस ऊर्जा को नये द्वारों पर चोट करनी पड़ेगी और तुम्हारी नई इंद्रियां आनी शुरू हो जाएंगी।उन इंद्रियों में बहुत तरह की इंद्रियां हैं ;उनसे टेलीपैथी होगी, क्लेअरवायन्स होगा। तुम्हें कुछ चीजें दिखाई पड़ने लगेंगी, कुछ सुनाई पड़ने लगेंगी, जो कि कान की या आँख की नहीं हैं।तुम्हारे भीतर नई इंद्रियां सक्रिय हो जाएंगी। और इन्हीं इंद्रियों की सक्रियता का गहरे से गहरा फल होगा। तुम्हारे शरीर के भीतर जो अदृश्य लोक है ,जो सूक्ष्मतम अदृश्य छोर है,जिसको आत्मा कहते रहे हैं.. उसकी प्रतीति होनी शुरू हो जाएगी। तो कुंडलिनी के जागने से ही तुम्हारे भीतर यह संभावनाएं बढ़ेगी। शरीर से काम शुरू होगा।यह कुंडलिनी को जगाने का साधारणत: प्रयोग हुआ है। पर फिर भी कुंडलिनी पूरा कुंड नहीं है।

3- एक दूसरा प्रयोग भी है परन्तु पृथ्वी पर बहुत थोड़े से लोगों ने ही उस पर काम किया है। वह कुंडलिनी जगाने का नहीं है, बल्कि कुंड में डूब जाने का है। समग्र चेतना को अपने उस कुंड में डुबा देना है। तब कोई नई इंद्रिय नहीं जागेगी; न ही कोई अतींद्रिय अनुभव नहीं होंगे, और आत्मा का अनुभव एकदम खो जाएगा, परन्तु सीधा परमात्मा का अनुभव होगा।कुंडलिनी की शक्ति जगाकर जो अनुभव होंगे, वह तुम्हें पहले आत्मा का अनुभव होगा; और उसके साथ एक प्रतीति होगी कि दूसरे की आत्मा अलग है, मेरी आत्मा अलग है। जिन लोगों ने कुंडलिनी की शक्ति जगाकर अनुभव किए हैं, वे अनेक आत्मवादी हैं; वे कहेंगे कि अनेक आत्माएं हैं, हर एक के भीतर अलग आत्मा है। लेकिन जिन लोगों ने कुंड में डुबकी लगाई है, वे कहेंगे आत्मा है ही नहीं, परमात्मा ही है; अनेक नहीं हैं, एक ही है। क्योंकि उस कुंड में डुबकी लगते से ही तुम अपने ही कुंड में डुबकी नहीं लगाते तुम, सबका जो सम्मिलित कुंड है, उसमें तत्काल प्रवेश कर जाते हो ।

4-तुम्हारा , मेरा कुंड और उनका कुंड अलग-अलग नहीं हैं। इसीलिए तो कुंड अनंत शक्तिवान है। तुम उसमें से कितना ही उठाओ, तो भी कुछ नहीं उठता। तुम उसमें से कितनी बाल्टी पानी अपने घर के काम के लिए भर लाए हो , उससे वहां कुछ फर्क नहीं पड़ता। हम सागर से कुछ ले आए हैं। लेकिन एक व्यक्ति सागर में डूब गया! तब वह कहता है कि पानी की बाल्टी की कोई बात नहीं है, और किसी का पानी अलग नहीं है। सागर एक है, वह जिसे तुम घर ले गए हो, वह भी इसी का हिस्सा है। और कुछ दूर नहीं हो गया है, वह लौट आएगा। अभी धूप पड़ेगी और भाप बनेगी और बादल बनेंगे, वह सब लौट आएगा। वह कहीं दूर नहीं गया है, वह दूर जा नहीं सकता, वह सब यहीं लौट आएगा।तो जिन लोगों ने कुंडलिनी को जगाने के प्रयोग किए, उन लोगों को अतींद्रिय अनुभव हुए। जो कि साइकिक, जो कि मनस की बड़ी अदभुत अनुभूतियां हैं। और उन्हें आत्मअनुभव हुआ। जो कि परमात्मा का सिर्फ एक अंश है; जहां से तुम परमात्मा को पकड़ रहे हो।

5-तो आत्मा जो है.. वह परमात्मा को एक कोने से छूना है।और उसे छूने के लिए एक छोटी सी शक्ति भी जग जाए तो तुम छू लोगे।और इसलिए इस मार्ग से चलने पर एक दिन आत्मा को भी खोना पड़ता है, नहीं तो रुकावट हो जाती है । फिर आत्मा को भी खोकर कुंड में छलांग लगानी पड़ती है। लेकिन यह आसान है। कई बार ऐसा होता है कि लंबा रास्ता आसान रास्ता होता है, और निकटतम रास्ता कठिन रास्ता होता है। उसके कारण हैं।लंबा रास्ता सदा आसान रास्ता होता है।अब जैसे, किसीको अपनी ही शक्ल देखनी हो, तो भी एक आईना रखना पड़े। अब यह फिजूल की लंबी यात्रा है कि आईने में शक्ल जाएगी और आईने से वापस लौटेगी, तब देख पाऊंगा। यह इतनी यात्रा करनी पड़ेगी। लेकिन अपनी शक्ल को सीधा देखना, निकटतम तो है, लेकिन कठिनतम भी है।तो यह जो कुंडलिनी की छोटी सी शक्ति को उठाकर थोड़ी लंबी यात्रा तो होती है, क्योंकि अंतरइंद्रियों का सारा का सारा जगत खुलता है और आत्मा पर पहुंचते हैं, और फिर वहां से छलांग तो लेनी ही है, लेकिन बड़ी सरल हो जाती है। क्योंकि जिसको आत्मअनुभव हुआ, जिसने अपने को जाना और आनंद पाया, वह आनंद उसे पुकारने लगता है कि अब अपने को भी खो दो तो और परम आनंद पा लोगे।

6-अपने को जानने का ,पाने का एक आनंद है, और अपने को खोने का एक परम आनंद है। क्योंकि जब तुम अपने को जान लोगे तब तुम्हें सिर्फ एक ही पीड़ा रह जाएगी कि मैं हूं ,यह मेरा होना भी क्यों है और सब पीड़ाएं मिट जाएंगी। यह मेरा होना भी व्यर्थ, अनावश्यक है। इसलिए इससे भी तुम छलांग लगाओगे ही। एक दिन तुम कहोगे कि अब मैंने होना जान लिया, अब मैं न होना भी जानना चाहता हूं; मैंने बीइंग भी जान लिया, अब मैं नॉन-बीइंग भी जानना चाहता हूं; मैंने जान लिया प्रकाश, अब मैं अंधकार भी जानना चाहता हूं। और प्रकाश कितना ही बड़ा हो, उसकी सीमा है; और अंधकार असीम है। और बीइंग कितना ही महत्वपूर्ण हो, फिर भी सीमा है। अस्तित्व की सीमा होगी, अनस्तित्व की कोई सीमा नहीं।इसलिए गौतम बुद्ध को लोग नहीं समझ पाए। क्योंकि गौतम बुद्ध से जब लोगों ने जाकर पूछा कि हम वहां बचेंगे कि नहीं ? तो उन्होंने कहा कि तुम कैसे बचोगे? तुमसे ही तो छूटना है! तो उन्होंने पूछा कि फिर मोक्ष में कम से कम हम तो होंगे? और सब मिट जाए -वासना , दुख , पाप ..हम तो बचेंगे?गौतम बुद्ध ने कहा कि तुम कैसे बचोगे? जब वासना मिट जाएगी, पाप मिट जाएगा, दुख मिट जाएगा, तो एक दुख बचेगा 'तुम्हारा होने का दुख ; होना भी खलने लगेगा।

7-यह आश्चर्य की बात है कि जब तक वासना है ;तब तक तुम्हें होना नहीं खलता , क्योंकि तुम होने को काम में लगाए रखते हो। धन कमाना है, तो होने को तुमने धन कमाने में लगाया है; यश कमाना है, तो यश कमाने में लगाया है। जब यश की , धन की , काम की कामना न होगी;या जब कुछ भी करने को न होगा, तो बीइंग का क्या करोगे ? तब बीइंग सीधा गड़ने लगेगा, होना ही घबराने लगेगा कि अब यह होना भी नहीं चाहिए।तो गौतम बुद्ध कहते हैं कि नहीं, वहां कुछ भी नहीं होगा। जैसे दीया बुझ जाता है, फिर तुम क्या पूछते हो कि कहां गया?मरते समय तक लोग गौतम बुद्ध से पूछ रहे हैं कि जब आप मर जाएंगे तो फिर क्या होगा? तो गौतम बुद्ध कहते हैं, जब मर ही गए तो फिर होने को बचा क्या? फिर कुछ बचेगा ही नहीं, जैसे दीया बुझ गया ऐसे सब बुझ जाएगा ;बुझ गया, तो बुझ गया।तो आत्मा की उपलब्धि ही एक चरण है ..आत्मा को खोने की तैयारी का। लेकिन जो अभी वासना ही नहीं खो सका, उससे अगर सीधा कहो कि कुंड में डूब जाओ...अपने को ही खो दो।तो असंभव है.. क्योंकि वह कहेगा, अभी मुझे बहुत काम हैं।

8-वास्तव में,हम अपने को खोने से इसलिए डरते हैं कि काम तो बहुत करने को हैं, मैं खो दूंगा तो फिर ये काम कौन करेगा? एक मकान बनाया, वह अधूरा है। तो उसे मैं पूरा बना लूं फिर तैयार हो जाऊंगा। लेकिन तब तक दूसरे काम अधूरे रह जाएंगे। वास्तव में काम की वासना...कुछ पूरा करना है, उसकी वजह से ही तो मैं अपने को चला रहा हूं। तो जब तक वासना है तब तक अगर कोई कहे कि आत्मा को खो दो, तो तब तक बिलकुल संभव नहीं है। यह निकट का तो है, लेकिन संभव नहीं है। क्योंकि वह व्यक्ति जिसकी अभी वासना नहीं खोई, वह आत्मा को कैसे खोएगा? हां, वासना खो जाए तो फिर एक दिन वह आत्मा को खोने को राजी हो सकता है, क्योंकि अब आत्मा का भी करना क्या है! जिसने अभी दुख नहीं खोया, उससे कहो कि आनंद को खो दो तो वह कहेगा,आप पागल हैं।लेकिन जिस दिन दुख खो जाए, आनंद ही रह जाए, फिर आनंद का भी क्या करोगे?

8-फिर आनंद को भी खोने के लिए तुम तैयार हो जाओगे। और जिस दिन कोई आनंद को भी खोने को तैयार है, उसी दिन कोई घटना घटती है। दुख खोने को तो कोई भी तैयार हो जाता है, लेकिन एक घड़ी आती है जब हम आनंद को भी खोने को तैयार हो जाते हैं।तब उससे परम अस्तित्व में लीनता उपलब्ध होती है।यह सीधा भी हो सकता हैअथार्त सीधा कुंड में जाया जा सकता है। लेकिन राजी होना मुश्किल होता है।धीरे धीरे राजी होना आसान हो जाता है। वासना खोती है, वृत्तियां खोती हैं, क्रिया खोती है, वह सब खो जाता है जिनके सहारे तुम हो; फिर आखिर में तुम्हीं बचते हो जिसमें न नींव बची, न सहारे बचे। अब तुम कहते हो, इसको भी क्या बचाना! अब इसको भी जाने दे सकते हैं। तब तुम कुंड में डूब जाते हो। कुंड में डूबना ही निर्वाण है।अगर सीधा कोई डूबना चाहे तो कुंडलिनी मार्ग में नहीं आती। इसलिए कुछ मार्गों ने जिन्होंने सीधे ही डूबने की बात की,उसकी बात नहीं की; क्योकि उसकी कोई जरूरत नहीं थी। लेकिन वह कभी एकाध लोगों के लिए संभव हो सकता है।इसलिए लंबे रास्ते ही जाना पड़ेगा।बहुत बार अपने घर पहुंचने के लिए भी दूसरों के घर के द्वार खटखटाने ही पड़ते हैं और अपनी ही शक्ल पहचानने के लिए भी न मालूम कितनी शक्लों को पहचानना पड़ता है। और खुद को प्रेम करने के लिए भी न मालूम कितने लोगों को प्रेम करना पड़ता है।

9-सीधा तो यही था कि अपने को प्रेम कर लेते। उचित तो यही था कि अपने घर में सीधे आ जाते। लेकिन ऐसा नहीं है।वास्तव में, जब तक हम दूसरों के घरों में न भटक लें, तब तक अपने घर को पहचानना ही मुश्किल होता है। और जब तक हम दूसरों से प्रेम न मांग लें और दूसरों को प्रेम न कर लें, तब तक यह पता ही नहीं चलता कि असली सवाल अपने को प्रेम करने का है। यह पता ही नहीं चलता। तभी तो यह कुंडलिनी शरीर की तैयारी है...अशरीर में प्रवेश की, आत्मा में प्रवेश की। और तुम्हारी जितनी ऊर्जा अभी जगी है उससे तुम आत्मा में प्रवेश न कर सकोगे। क्योंकि तुम्हारी वह ऊर्जा तुम्हारे रोजमर्रा के काम में पूरी चुक जाती है। बल्कि करीब-करीब उसमें भी पूरी नहीं पड़ती, उसमें भी हम थक जाते हैं।इतने से इसको नहीं ले जाया जा सकता।और इसीलिए संन्यास की वृत्ति पैदा हुई, ताकि रोजमर्रा का काम बंद कर दिया जाए। क्योंकि हमारे पास शक्ति तो इतनी सी ही है...अब इसको किसी और यात्रा पर लगाना है, तो फिर काम बंद कर दो।लेकिन अगर वह किसी तरह बचा भी ले, तो बचाने में भी यह उतनी ही व्यय हो जाएगी। क्योंकि बचाने में भी बड़ी ताकत लग जाती है। बहुत बार तो क्रोध करने में उतनी ताकत व्यय नहीं होती जितना क्रोध रोकने में व्यय हो जाती है; बहुत बार लड़ने में उतनी व्यय नहीं होती जितना लड़ने से बचने में व्यय हो जाती है।तो यह जो संन्यास है ...कंजूसी का रास्ता है। वह यह कह रहा है कि इतने में ही हम उधर से बचा लेते हैं, इधर से बचा लेते हैं।परन्तु कंजूसी के रास्ते से नहीं चलेगा। और जगा लो ..ऊर्जा तो अनंत है; बचाते क्यों हो।

अनंत ऊर्जा को कैसे जगाये?-

03 FACTS;-

1-तुम्हारे पास इतनी ऊर्जा है कि तुम खर्च कर नहीं सकते , तो तुम उसे बचाने की फिक्र क्यों करते हो!उसे बचाने का सवाल नहीं है; और ऊर्जा है, उसे जगाने का सवाल है।उदाहरण के लिए कोई डर रहा है कि अगर मैंने पति /पत्नी को प्रेम किया तो मैं परमात्मा को कैसे प्रेम करूंगा? क्योंकि उसके पास प्रेम की इतनी छोटी सी तो ऊर्जा है कि इसी में चुक जाएगी। तो वह कह रहा है, इससे बचा लें। लेकिन अगर इसको बचा भी लिया, तो इस बचाने में उसको लड़ना पड़ेगा; लड़ने में व्यय होगी। और इतनी छोटी सी ऊर्जा से, जिससे वह पति /पत्नी तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया , परमात्मा तक कैसे पहुंच पाएगा ? यानी उतना छोटा सा जो ब्रिज तुमने बनाया था, वह भी तो पूरा नहीं पहुंचता था। उसमें भी बीच में ही सीढ़ियां चुक जाती थीं। उतनी सी ऊर्जा बचाकर तुम अनंत तक सेतु बनाने की सोचने बैठे हो, तो पागलपन में पड़ गए हो।एक बार वह अनंत ऊर्जा आनी शुरू हो जाए, तो वह जितनी जगती है, उतनी ही और जगने की संभावना प्रकट होने लगती है। उसका झरना फूटना शुरू हो जाए तो अनंत है। जगने/वेकनिंग की अनंत संभावना है, कितना भी तुम जगा सकते हो। और जितना तुम जगाते हो, उतना और जगाने के लिए तुम शक्तिशाली होते चले जाते हो। और जब तुम्हारे पास अंतर ऊर्जा काअतिरिक्त /एफ्लुएंस होता है , तभी तुम उसे उन रास्तों पर खर्च कर सकते हो जो अनजान हैं।

2-बाहर की दुनिया में भी एफ्लुएंस होता है। एक व्यक्ति के पास अतिरिक्त धन है,तो वह सोचता है कि चांद की यात्रा कर आएं। हालांकि चांद पर कुछ मिलने को नहीं है;लेकिन हर्ज भी कुछ नहीं है, क्योंकि उसके पास अतिरिक्त है, वह खो सकता है। जब तक तुम्हारे पास अतिरिक्त नहीं है,बल्कि उतना ही है जितनी तुम्हें जरूरत है या उससे भी कम है ;तब तक तुम इंच- इंच जांच -पड़ताल करके खर्च करोगे। इसलिए तुम ज्ञात की दुनिया से कभी बाहर न हटोगे। अज्ञात में जाने के लिए तुम्हारे पास अतिरेक चाहिए।और कुंडलिनी की शक्ति तुम्हें अतिरेक से भर देती है। तुम्हारे पास इतनी शक्ति होती है कि तुम्हारे सामने सवाल होता है कि इसको कहां खर्च करें? और ध्यान रहे, जिनके पास अतिरिक्त शक्ति होती है, अचानक वे पाते हैं कि उनके जो पुराने द्वार थे, वे एकदम बंद हो गए; क्योंकि उस अतिरिक्त शक्ति को बहाने में वे समर्थ नहीं होते। जैसे एक छोटी नदी हो और उसमें पूरा सागर आ गया है। वह नदी फौरन मिट जाएगी । उसका कहीं पता ही नहीं चलेगा कि वह कहां गई।

3- जिस दिन अतिरिक्त ऊर्जा आएगी, तुम्हारा क्रोधआदि के मार्ग अचानक खो जाएंगे। तुम अचानक पाओगे कि कुछ और ही हो गया! वह सब कहां गया जो कल छोटा -छोटा बचाकर कंजूस की तरह चल रहा था, और क्रोध दबा रहा था, और यह कर रहा था, और वह कर रहा था; वह सब अब कहां है? क्योंकि वे नदियां न रहीं, वे नहरें न रहीं; अब तो यह पूरा सागर आ गया है! अब इसको खर्च करने का तुम्हारे पास जब उपाय नहीं है, तब अनायास तुम पाते हो कि इसकी दूसरी यात्रा शुरू हो गई। यात्रा तो होगी ही, वह तो रुक नहीं सकती। ऊर्जा बहेगी ही, वह रुक नहीं सकती ।तो एक बार जगा लेने की बात है। और तब अनजान ,अपरिचित द्वार, जो बंद पड़े हैं, उनमें पहली दफे दरारें पड़ती हैं और उनसे ऊर्जा धक्के देकर बहने लगती है। तो वहां तुम्हें अतींद्रिय अनुभव शुरू हो जाते हैं। और जैसे ही अतींद्रिय द्वार खुलते हैं वैसे ही तुम्हें अपने शरीर का अशरीरी छोर, जिसको आत्मा कहें, उसकी तुम्हें प्रतीति शुरू हो जाती है।

कुंडलिनी का आरोहण -अवरोहण कैसे?-

09 FACTS;-

1-कुंडलिनी साधना में कुंडलिनी के आरोहण /एसेडं और अवरोहण/डिसेडं की बात आती है । तो यह जो डिसेडं है ...वह क्या कुंड में डूबना है या और कोई दूसरी बात है?वास्तव में,कुंड में डूबने में तो ये दोनों बातें ही नहीं हैं। वह उतरना ,चढ़ना नहीं है, मिट जाना है, समाप्त हो जाना है। बूंद जब सागर में गिरती है, न तो उतरती है,और न ही चढ़ती हैं। हां, बूंद जब सूरज की किरणों में सूखती है, तब आकाश की तरफ चढ़ती है ; और जब बादल में ठंडक पाती है तो जमीन की तरफ गिरती है अथार्त उतरती है। लेकिन जब सागर में जाती है तो फिर उतरना ,चढ़ना नहीं है ...डूबना है, मिटना है, मरना है।तो यह जो अवरोहण , अवतरण की बात है, यह बहुत दूसरे अर्थों में है। यह इस अर्थ में है कि कुंड से जिस शक्ति को हम उठाते हैं, इसे बहुत बार वापस कुंड में भी भेज देना पड़ता है।कई कारण हो सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ा कारण तो यह होता है कि बहुत बार जितनी शक्ति के लिए तुम तैयार नहीं होते, उतनी शक्ति जग जाती है; उसे वापस लौटाना पड़ता है, अन्यथा खतरे हो सकते हैं।

2-हमारे झेलने की भी क्षमताएं हैं ...सुख झेलने की भी क्षमता है, दुख झेलने की भी क्षमता है, शक्ति झेलने की भी क्षमता है। अगर हमारी क्षमता से बहुत बड़ा आघात हमारे ऊपर हो जाए, तो हमारा जो संस्थान है व्यक्तित्व का वह टूट सकता है। वह हितकर नहीं होगा। इसलिए बहुत बार ऐसी शक्ति उठ आती है जिसको वापस भेज देना पड़ता है।ऐसे प्रयोग हैं जो तुम्हारे भीतर आकस्मिक रूप से, जिनको सडन एनलाइटेनमेंट के प्रयोग कहते हैं, जो तात्कालिक, इंस्टैंट शक्ति को जगा सकते हैं। ऐसे प्रयोग में सदा खतरा है, क्योंकि शक्ति इतनी आ सकती है जितनी कि तुम तैयार न थे। वोल्टेज इतना हो सकता है कि तुम्हारा बल्व बुझ जाए, फ्यूज उड़ जाए, तुम्हारा पंखा जल जाए, तुम्हारी मोटर में आग लग जाए।यदि एक बड़ा बांध अचानक टूट जाए तो उसके पानी से बड़ा भारी नुकसान हो जाएगा, लेकिन उससे नहरें निकालकर उसी पानी को सुविधानुसार नियंत्रित रूप से प्रवाहित किया जा सकता है।

3-भारत में ऐसा कभी नहीं हो सकता कि पूरे भारत की बिजली चली जाए क्योंकि एक- एक शहर/गांव का अलग -अलग इंतजाम है।लेकिन अमेरिका में हो सकता है, क्योंकि वह सब पूरा का पूरा इंटरकनेक्टेड है। पूरे वक्त धाराएं एक शहर से दूसरे शहर शिफ्ट होती रहेंगी और कभी भी खतरा हो सकता है।मनुष्य के भीतर भी ठीक विद्युतधारा की तरह इंतजाम हैं। और ये विद्युतधाराएं जो हैं, ये अगर तुम्हारी क्षमता से ज्यादा तुम्हारी तरफ प्रवाहित हो जाएं... और ऐसी विधियां हैं जिनसे प्रवाहित हो सकती हैं। यानी तुम बैठे हुए हो, और सामने पचास लोग बैठे हुए हैं, तो ऐसे मेथड्स हैं कि तुम चाहो तो इन पचास लोगों की सारी विद्युतधारा तुम्हारी तरफ प्रवाहित हो जाए; ये सब पचास लोग यहां बिलकुल ही फेंट हालत में हो जाएं और तुम एकदम ऊर्जा के केंद्र बन जाओ। लेकिन उसमें खतरे भी हैं क्योंकि वह इतनी ज्यादा भी हो सकती है कि तुम उसे न झेल पाओ। और इससे उलटा भी हो सकता है कि जिस मार्ग से विद्युतधारा तुम तक आई, उसी मार्ग से तुम्हारी भी सारी विद्युत को लेकर दूसरी तरफ बह जाए। इन सबके प्रयोग हुए हैं। अगर कभी कोई अतिरिक्त मात्रा में तुम्हारी ही शक्ति ऊपर चली जाए, तो उसे वापस लौटाने की विधियां हैं।

4-लेकिन एक विधि का प्रयोग तुम्हारे भीतर पहले पात्रता पैदा करता है, पहले शक्ति को नहीं जगाता। तुम्हारे भीतर जितनी पात्रता बनती जाएगी उतनी ही तुम्हारे भीतर शक्ति जगती जाएगी। पहले जगह बनेगी, फिर शक्ति आएगी। और इसलिए कभी तुम्हारे पास ऐसा नहीं होगा कि तुम्हें कुछ भी वापस लौटाना पड़े।लेकिन एक दिन तुम खुद ही सब जानकर कुंड में छलांग लगा जाओगे , वह दूसरी बात है।दो तरह से हम परमात्म शक्ति को सोच सकते हैं. ..या तो अपने से ऊपर, या तो अपने से ऊपर कहीं आकाश में ,किसी भी ऊपर के भाव में।अथवा अपने से गहरे, पाताल के भाव में। और जहां तक जगत की व्यवस्था का संबंध है, ऊपर और नीचे शब्द का कोई अर्थ नहीं है; ये सिर्फ हमारे सोचने की धारणाएं हैं कि हम कैसा सोचते हैं।शीर्षासन करते हुए हम सब उलटे मालूम पड़ेंगे, और यह छत हमारे सिर के नीचे मालूम पड़ेगी। हम कहां से देखते हैं, इस पर सब निर्भर करता है।उदाहरण के लिए पूरब चलते जाओ, चलते जाओ, तो पश्चिम पहुंच जाओगे। और पश्चिम चलते जाओ, चलते जाओ, तो पूरब पहुंच जाओगे। जिस पश्चिम में चलते -चलते पूरब पहुंच जाते हैं उसको पश्चिम कहने का कोई मतलब नहीं है; रिलेटिव है।

5-यह हमारी कामचलाऊ सीमा रेखा है कि यह रहा पूरब, यह रहा पश्चिम.. जिनसे हमें सुविधा बनती है।ठीक ऐसे ही, ऊपर ,नीचे दूसरे डायमेंशन में वर्टिकल कामचलाऊ बातें हैं। पूरब ,पश्चिम हॉरिजेंटल कामचलाऊ बातें हैं । न कुछ ऊपर है, न कुछ नीचे है; क्योंकि इस जगत की कोई छत नहीं है और इस जगत का कोई बाटम नहीं है। इसलिए ऊपर -नीचे की सब बातें बेमानी हैं। लेकिन हमारी ये कामचलाऊ धारणाएं हमारे धर्म की धारणाओं में भी घुस जाती हैं।तो कुछ लोग ईश्वर को अबव/ऊपरअनुभव करते हैं । तो जब शक्ति उतरेगी तो उतरेगी, डिसेंड करेगी, हम तक आएगी। कुछ लोग ईश्वर कोअनुभव करते हैं नीचे, रूट्स में। तो जब शक्ति आएगी तो चढेगी, उठेगी, हम तक आएगी। लेकिन कोई मतलब नहीं है कि हम ईश्वर को कहां रखते हैं। लेकिन इस बात में भी अगर चुनाव करना हो, तो बजाय उतरने के, शक्ति का तुम्हारे भीतर से उठना ही ज्यादा सहयोगी होगा। क्योंकि जब शक्ति के उठने की धारणा तुम पकड़ोगे, तो तुम्हें कुछ करना पड़ेगा। और जब उतरने की बात है तो प्रार्थना रह जाएगी, और तुम कुछ भी न कर सकोगे। जब ऊपर से नीचे आना है तो हम हाथ जोडकर सिर्फ प्रार्थना ही कर सकते हैं।

6-इसलिए दुनिया में दो तरह के धर्म बने ... ध्यान करने वाले और प्रार्थना करने वाले। प्रार्थना करनेवाले वे धर्म हैं जिन्होंने ईश्वर को कहीं ऊपर अनुभव किया । अब हम कर भी क्या सकते हैं ..उसको ला तो सकते नहीं! क्योंकि अगर लाएं तो उतने ऊपर हमको जाना पड़ेगा और उतने ऊपर हम जाएंगे कैसे? उतने ऊपर जाएंगे तो हम परमात्मा ही हो जाएंगे । वहां हम जा नहीं सकते, जहां हम खड़े हैं वहीं पर ही रहेंगे। हम चिल्लाकर प्रार्थना कर सकते हैं लेकिन जिन धर्मों ने और जिन धारणाओं ने इस तरह सोचा कि नीचे से उठाना है , कहीं हमारी ही जड़ों में सोया हुआ है कुछ ..और हम ही कुछ करेंगे तो वह उठेगा, तो वे प्रार्थना के धर्म न बनकर फिर ध्यान के धर्म बने। तो मेडिटेशन और प्रेयर में इस ऊपर -नीचे की धारणा का फर्क है। प्रार्थना करनेवाला धर्म ईश्वर को ऊपर मानता है, ध्यान करनेवाला धर्म ईश्वर को जड़ों में मानता है, और वहां से उसको उठा लेता है।और ध्यान रहे, प्रार्थना करनेवाले धर्म धीरे -धीरे हारते जा रहे हैं और ध्यान करनेवाले धर्म की संभावना रोज प्रगाढ़ होती जा रही है।

7-हमें पश्चिम जाना हो तो हम पश्चिम की तरफ चलना शुरू करते हैं। हालांकि पूरब की तरफ चलें तो चलते -चलते पश्चिम पहुंच जाएंगे, लेकिन वह नाहक लंबा रास्ता हो जाएगा। तो साधक के लिए और भक्त के लिए फर्क पड़ेगा। भक्त ऊपर मानेगा, इसलिए हाथ जोड़कर प्रतीक्षा करेगा, साधक नीचे मानेगा, इसलिए कमर कसकर जगाने की कोशिश करेगा। वास्तव में, जब हम परमात्मा को नीचे मानते हैं, तो जिनको हम निम्न वृत्तियां कहते हैं, उनमें भी वह मौजूद हो जाता है। इसलिए हमारे चित्त में कुछ निम्न नहीं रह जाता। क्योंकि जब परमात्मा ही नीचे है, तो जिसको हम निम्नतम कहते हैं, वहां भी वह मौजूद है। और वहां से भी जगेगा; यानी ऐसी कोई जगह ही नहीं हो सकती जहां वह न हो।लेकिन जैसे ही हम उसे ऊपर मानते हैं, तो निंदा/ कंडेमनेशन शुरू हो जाता है, कि जो नीचे है वह कंडेम्‍ड हो जाता है क्योंकि वहां परमात्मा नहीं है।और अनजाने ही स्वयं की भी हीनता शुरू हो जाती है कि हम नीचे हैं और वह ऊपर है। तो उसके मनोवैज्ञानिक रूप से घातक परिणाम हैं।

और फिर जितनी शक्ति से खड़े होना हो, उतना उचित है कि शक्ति नीचे से आए। क्योंकि तुम्हारी जड़ों तक जायेगी और तुम्हारे पैरों को मजबूत करेगी।

8-शक्ति ऊपर से आए तो तुम्हारे सिर को स्पर्श करेगी। और जब ऊपर से आएगी तो तुम्हें हमेशा विदेशी मालूम पड़ेगी।इसलिए जिन लोगों ने प्रार्थना की, वे कभी नहीं मान पाते कि भगवान और हम एक हैं।इसलिए मुसलमानों का निरंतर सख्त विरोध रहा कि कोई कहे कि मैं भगवान हूं। क्योंकि यह सबसे बड़ा एक कुफ्र ही है उनकी नजर में ..कहां वह ऊपर और कहां हम नीचे! क्योंकि कहां वह ऊपर और कहां तुम नीचे जमीन पर सरकते कीड़े -मकोड़े! और कहां वह परम...तुम उसके साथ अपनी आइडेंटिटी नहीं जोड़ सकते।जब हम उसे ऊपर मानेंगे और अपने को नीचे मानेंगे, तो हम तत्काल दो हो जाएंगे । इसलिए इस्लाम को सूफी कभी पसंद नहीं पड़ सके , क्योंकि सूफी इस बात का दावा कर रहे हैं कि हम और वह एक हैं।

लेकिन हम और वह एक तभी हो सकते हैं जब वह जमीन से ही आता हो, आकाश से नहीं, तभी हम और वह एक हो सकते हैं। जैसे ही हम परमात्मा को ऊपर रखेंगे, पृथ्वी का जीवन निंदित हो जाएगा, पाप हो जाएगा; और जन्म लेना पाप का फल हो जाएगा।

9- और जैसे ही हम उसे नीचे रखेंगे, वैसे ही पृथ्वी का जीवन एक आनंद हो जाएगा; वह पाप का फल नहीं, वह परमात्मा की अनुकंपा हो जाएगा। प्रत्येक चीज, चाहे वह कितनी ही अंधेरी हो, उसमें भी उसकी प्रकाश की किरण मौजूद अनुभव होगी। और कैसा ही बुरा से बुरा आदमी हो, कितना ही शैतान हो, फिर भी उसके अंतरतम कोर पर वह मौजूद रहेगा।इसलिए हम उसे नीचे से ऊपर की तरफ उठना मानें। जो जानता है उसके लिए धारणाओं में कोई फर्क नहीं है, वह कहेगा, ऊपर ,नीचे दोनों बेकार की बातें हैं। लेकिन जब हम नहीं जानते हैं और यात्रा करनी है, तो उचित होगा कि हम वही मानें जिससे यात्रा आसान हो सके। इसलिए साधक के लिए उचित यही है कि वह समझे कि नीचे से शक्ति उठेगी और ऊपर की तरफ जाएगी; ऊपर की तरफ यात्रा है। इसलिए जिन्होंने ऊपर की तरफ की यात्रा को स्वीकार किया उन्होंने अग्नि को प्रतीक माना, क्योंकि वह निरंतर ऊपर की तरफ जा रही है। दीया है, आग है, वे निरंतर ऊपर की तरफ जा रहे हैं, तो उन्होंने इसको परमात्मा का प्रतीक माना । इसलिए अग्नि बहुत गहनतम मन में हमारे परमात्मा का प्रतीक बन गई। उसका कुल कारण इतना था कि कुछ भी करो, वह ऊपर की तरफ ही जाती है। और जितना ऊपर बढ़ती है, उतनी ही थोड़ी देर में खो जाती है, थोड़ी दूर तक दिखाई पड़ती है, फिर अदृश्य हो जाती है। ऐसा ही साधक भी ऊपर की तरफ जाएगा, थोड़ी देर तक दिखाई पड़ेगा और अदृश्य हो जाएगा।

ऊर्जा जागरण विधि:-

05 FACTS;-

1-तीव्र श्वास-प्रश्वास / Inhale Exale ,हू की ध्वनि और 'मैं कौन हूं' पूछने के प्रयत्न से अपने को पूरी तरह से थका डालना है ताकि गहरे ध्यान में प्रवेश संभव हो सके।हू की ध्वनि नाभि के ठीक नीचे जीवनस्रोत पर सीधे चोट करती है। क्योंकि तुम अपने जीवन से, अपनी मां से नाभि द्वारा ही जुड़े थे। नाभि के ठीक नीचे तुम्हारा अपना जीवनस्रोत है।जब तुम हू कहते हो तो नाभि के नीचे चोट पड़ती है।यदि तुम जीवन के बीज पर चोट करते हो तो यह मिट्टी में खोने लगता है, हरी पत्तियां, अंकुर निकलने लगते हैं। लेकिन ध्यान में प्रवेश के लिए अतिरिक्त ऊर्जा चाहिए तो थकान की ऊर्जा क्षीणता से ध्यान में प्रवेश कैसे संभव होगा?वास्तव में, थकान का मतलब ऊर्जाहीनता नहीं है। जब तुम अपने को थका डालते हो, तो दोहरी घटनाएं घटती हैं। तुम्हारी सारी इंद्रियां, तुम्हारा मन, तुम्हारा शरीर थक जाता है।और किसी तरह की ऊर्जा को वहन करने के लिए तैयार नहीं होता, इनकार कर देता है।तो एक तरफ तो यह प्रयोग तुम्हारे शरीर को, तुम्हारे मन को, तुम्हारी इंद्रियों को थकाता है, और दूसरी तरफ तुम्हारी कुंडलिनी पर चोट करता है।वहां से ऊर्जा जगती है और यहां से तुम थकते हो ..यह दोनों एक साथ चलता है।

2-और उस शक्ति को वहन करने के योग्य भी तुम नहीं रहते, कि तुम्हारी आंख देखना चाहे तो कहती है ... थकी हूं देखने का मन नहीं, तुम्हारा मन सोचना चाहे तो मन कहता है ..थका हूं सोचने का मेरा मन नहीं, तुम्हारे पैर चलना चाहें तो पैर कहते हैं ..हम थके हैं, हम चल नहीं सकते।तो अब अगर चलना है तो बिना पैरों की कोई यात्रा ..तुम्हारे भीतर करनी पड़ेगी; और अगर देखना है तो बिना आंखों के देखना पड़ेगा; क्योंकि आंख थकी है। तो तुम्हारा व्यक्तित्व जब थक जाता है, तो वह इनकार करता है कि हमें अभी कुछ करना नहीं है। और शक्ति जग गई है, जो कुछ करना चाहती है। तो तत्काल वह उन दरवाजों पर चोट करेगी जो थके हुए नहीं हैं, जो तुम्हारे भीतर सदा वहन करने के लिए तैयार हैं। लेकिन उनको कभी मौका ही नहीं मिला था या तुम ही खुद इतने सशक्त थे कि तुम सारी शक्ति को लगा डालते थे। तो जब देखने के लिए आंख इनकार कर दे और मन देखने की इच्छा से इनकार कर दे, तब भी जो शक्ति जग गई है तो तुम उससे किसी और आयाम में देखना शुरू कर दोगे। वह तुम्हारा बिलकुल नया हिस्सा होगा। तुम्हारे देखने के साइकिक सेंटर खुलने शुरू हो जाएंगे। तुम कुछ ऐसी चीजें देखने लगोगे जो तुमने कभी नहीं देखीं, और ऐसी जगह से देखने लगोगे ,जहां से तुमने कभी नहीं देखीं।

3- इधर शरीर को थका डालना है, मन को थका डालना है ...तुम जो हो, उसको थका डालना है। ताकि तुम जो अभी हो, लेकिन तुम्हें पता नहीं, वह तुम्हारे भीतर सक्रिय हो सके । और ऊर्जा जगेंगी, तो वह कहेगी काम चाहिए। और तुम्हारे अस्तित्व को उसे काम देना पड़ेगा । वह खुद काम खोज लेगी। तुम्हारे कान थके हैं, तो भी वह ऊर्जा जग गई है, तो वह सुनना चाहेगी तो नाद सुनेगी। उन नादों के लिए तुम्हारे कान की कोई जरूरत नहीं है।ऐसा प्रकाश देखेगी जिसके लिए तुम्हारी आंखों की कोई जरूरत नहीं है। ऐसी सुगंध आने लगेगी जिसके लिए तुम्हारी नाक की कोई जरूरत नहीं है।तो तुम्हारे भीतर सूक्ष्मतर इंद्रियां, या अतींद्रियां , जो भी हम नाम देना पसंद करें, वे सक्रिय हो जाएंगी। और हमारी सब इंद्रियों के साथ एक -एक अतींद्रिय का जोड़ है। यानी एक कान तो वह है जो बाहर से सुनता है, और एक कान और है तुम्हारे भीतर जो भीतर सुनता है। लेकिन उसको तो कभी मौका नहीं मिला। तो जब तुम्हारा बाहर का कान थका है और ऊर्जा जगकर कान के पास आ गई है, और कान कहता है, मुझे सुनना नहीं, तब वह ऊर्जा तुम्हारे उस दूसरे कान को सक्रिय कर देगी ...जो सुन सकेगा, जिसने कभी नहीं सुना।

4-इसलिए ऐसी चीजें तुम सुनोगे, ऐसी चीजें देखोगे, कि तुम किसी से कहोगे तो वह कहेगा, पागल हो , ऐसा कहीं होता है! किसी वहम में पड़ गए होओगे, कोई सपना देख लिया होगा! लेकिन तुम्हें तो वह भीतर की वीणा इतनी स्पष्ट होगी कि तुम कहोगे, हम कैसे मानें? अगर यह झूठ है तो फिर बाहर की वीणा का क्या होगा, वह तो बिलकुल ही झूठ हो जाएगी!तो तुम्हारी इंद्रियों का थकना तुम्हारे अस्तित्व के नये द्वारों के खुलने के लिए प्रारंभिक रूप से जरूरी है। एक दफा खुल जाए, फिर तो कोई बात नहीं। क्योंकि फिर तो तुम्हारे पास तुलना भी होती है कि अगर देखना ही है तो फिर भीतर ही देखो, क्योंकि इतना आनंद पूर्ण है। लेकिन अभी तुलना नहीं है तुम्हारे पास; अभी तो एक ही विकल्प है कि बाहर ही देखना है।एक बार तुम्हारी भीतर की आँख भी देखने लगे, तब तुम्हारे सामने विकल्प साफ है। तो जब भी देखने का मन होगा, तुम भीतर देखना चाहोगे। बाहर देखने से क्या मतलब है!बिलकुल दो तल पर बात हो रही है, क्योंकि वह दो अलग इंद्रियों की बात हो रही है। लेकिन अगर दूसरी इंद्रिय का तुम्हें पता नहीं, तो भीतर का कोई मतलब ही नहीं होता, बाहर का ही सब मतलब होता है।

5-इस प्रयोग में थकाने का अर्थ ऊर्जाहीनता नहीं है। ऊर्जा तो जग रही है ,उसको जगाने के लिए ही सारा काम चल रहा है। इंद्रियां थक रही हैं लेकिन वे ऊर्जा नहीं हैं, सिर्फ ऊर्जा के बहने के द्वार हैं।आँख कह रही है कि हम थक गए हैं, अब इधर से यात्रा मत करो। इंद्रियां थक रही हैं और इनका थकना उस अर्थ में प्राथमिक रूप से बडा सहयोगी है।यह ऊर्जा यदि अधिक है तो टायर्डनेस नहीं फ्रेशनेस लगनी चाहिए।धीरे धीरे तो तुम्हें बहुत ताजगी लगेगी, जैसी ताजगी तुमने कभी नहीं जानी। लेकिन शुरू में थकान इसलिए लगेगी कि तुम्हारी आइडेंटिटी इन इंद्रियों से है। इन्हीं को तुम ' मैं'समझते हो ।जब इंद्रियां थकती हैं, तो तुम कहते हो, मैं थक गया। इससे तुम्हारी आइडेंटिटी टूटनी चाहिए ।उदाहरण के लिए मैं घोड़ा हूं तो मैं थक गया।जिस दिन तुम जानोगे कि मैं घोड़ा नहीं हूं उस दिन तुम्हारी फ्रेशनेस और तरह से आनी शुरू होगी। इंद्रियां चूंकि थक गई हैं और काम नहीं कर रही हैं; इसलिए बहुत सी ऊर्जा जो उनसे विकीर्ण होकर व्यर्थ हो जाती थी, वह तुम्हारे भीतर संरक्षित हो गई है और पुंज बन गई है। और तुम ज्यादा कंजर्वेशन ऑफ एनर्जी अनुभव करोगे कि तुमने बहुत ऊर्जा बचाई जो तुम्हारी संपत्ति बन गई है। और चूंकि बाहर नहीं गई, इसलिए तुम्हारे रोएं -रोएं में भीतर फैल गई है। लेकिन इससे तुम एक हो, यह तुम्हें जब खयाल आना शुरू होगा, तभी तुम्हें फर्क लगेगा।तो धीरे धीरे तो ध्यान के बाद बहुत ही ताजगी मालूम होगी।बल्कि तुम ताजगी ही हो जाओगे /यू विल बी दि फ्रेशनेस। लेकिन जब आइडेंटिटी बदलेगी ...तब।


.....SHIVOHAM....