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क्या ओम् साध्य है, साधन नहीं?


15 FACTS;-

1-ओम् सातवीं अवस्था का प्रतीक है, सूचक है। सातवीं अवस्था किसी भी शब्द से नहीं कही जा सकती।ओम् शब्द की खोज भी चौथे शरीर के अनुभव पर हुई है।वास्तव में, जब चित्त सब भांति शून्य हो जाता है -कोई विचार नहीं होते...तब भी शून्य की ध्वनि शेष होती है।अगर कभी बिलकुल सूनी जगह में आप खड़े हो गए हों ...जहां कोई ध्वनि नहीं ...तों वहां शून्य का भी एक सन्नाटा है।शून्य भी बोलता है ....Zero Sound। उस सन्नाटे में, जो मूल ध्वनियां हैं, वे ही केवल शेष रह जाती हैं। अ, ऊ, म..A,U,M मूल ध्वनियां हैं।हमारा सारा ध्वनि का विस्तार उन तीन ध्वनियों के ही नये -नये संबंधों और जोड़ों से हुआ है।जब सारे शब्द खो जाते हैं, तब ध्वनि शेष रह जाती है।चौथे शरीर की, मनस शरीर/ Mental Body की शून्यता में जो ध्वनि होती है, वहां ओम् को खोजा गया है।तो इस ओम् का यदि साधक प्रयोग करे, तो दो परिणाम हो सकते हैं।वास्तव में, सभी शरीरों की दो संभावनाएं हैं और चौथे शरीर की भी..।किसी भी शब्द को अगर बार-बार दोहराया जाए, तो उसका एक सा संघात, लयबद्धता, जैसे कि सिर पर कोई ताली थपक रहा हो, ऐसा ही परिणाम करती है और निद्रा पैदा कर देती है। यदि साधक ओम् का ऐसा प्रयोग करे कि उस ओम् के द्वारा sleepiness पैदा हो जाए ; तो चौथे मनस शरीर की जो पहली प्राकृतिक स्थिति है...कल्पना, स्वप्न।

2-अगर ओम् का इस भांति प्रयोग किया जाए कि उससे तंद्रा आ जाए तो आप एक स्वप्न में खो जाएंगे।वह स्वप्न सम्मोहन तंद्रा जैसा होगा।उस स्वप्न में जो भी आप देखना चाहें, देख सकेंगे।भगवान के दर्शन कर सकते हैं, स्वर्ग-नरकों की यात्रा कर सकते हैं।लेकिन वह सब स्वप्न ही होगा ;उसमें सत्य कुछ भी नहीं होगा।आनंद का अनुभव कर सकते हैं, शांति का अनुभव कर सकते हैं।ओम् की ध्वनि को जोर से पैदा करके उसमें लीन हो जाना बहुत ही सरल है, रसपूर्ण है। जैसे सुखद ,मनचाहा स्वप्न होता है ,ऐसी रसपूर्ण है।इसमें बहुत कठिनाई नहीं है और मनस शरीर के दो ही रूप हैं ...कल्पना का, स्वप्न का; और दूसरा रूप है संकल्प का ,दिव्य दृष्टि का, विजन का।जिसे योग तंद्रा कहते हैं, वह तो ओम् के संघात से पैदा हो जाती है।तो अगर ओम् का मन में Repetition किया जाए , तो उसके Collision/संघात से तंद्रा पैदा होती है।लेकिन यदि ओम् का उच्चारण किया जाए, और पीछे साक्षी को भी कायम रखा जाए अथार्त दोहरे काम किए जाएं तो चौथे शरीर की दूसरी संभावना पर काम शुरू हो जाता है।

3-ओम् की ध्वनि पैदा की जाए और पीछे जागकर इस ध्वनि को सुना भी जाए ...इसमें लीन या डूबा न जाए।तो यह ध्वनि एक तल पर चलती रहे और हम दूसरे तल पर खड़े होकर इसको सुननेवाले, साक्षी, द्रष्टा, श्रोता हो जाएं। इस ध्वनि में लीन न हों, बल्कि जाग जाएं ; तब आप स्वप्न में नहीं जाएंगे,अथार्त योग-तंद्रा में नहीं जाएंगे,बल्कि योग-जागृति में चले जाएंगे।किसी मंत्र का उपयोग करने पर, 99% लोग तो तंद्रा में चले जाते हैं। उसके कारण हैं कि हमारा चौथा शरीर निद्रा का आदी है; वह सोना ही जानता है और रोज सपने देखता ही है।तो मंत्र के उपयोग से बहुत संभावना यही है कि आपका वह स्वप्न देखने का आदी मन अपनी यांत्रिक प्रक्रिया से तत्काल स्वप्न में चला जाएगा। लेकिन यदि साक्षी को जगाया जा सके और पीछे तुम खड़े होकर देखते भी रहो कि यह ओम् की ध्वनि हो रही है..इसमें लीन न होओ, डूबो मत...तो ओम् से भी वही काम हो जाएगा। इसके अतिरिक्त

अगर ' मैं कौन हूं ' को भी तुम निद्रा की भांति पूछने लगो और पीछे साक्षी न रह जाओ, तो जो भूल ओम् से स्वप्न पैदा होने की होती है, वह ' मैं कौन हूं ' से भी पैदा हो जाएगी।

4-लेकिन ओम् की बजाय ‘मैं कौन हूं? से स्वप्न पैदा होने की संभावना थोड़ी कम है। उसका कारण है कि ओम् में कोई प्रश्न नहीं है, सिर्फ थपकी है; ' मैं कौन हूं' में प्रश्न है, सिर्फ थपकी नहीं है।और प्रश्न आपको जगाए रखेगा।यह बड़े आश्चर्य की बात है कि अगर चित्त में प्रश्न हो तो सोना मुश्किल हो जाता है। अगर दिन में भी आपके चित्त में कोई बहुत गहरा प्रश्न घूम रहा है, तो रात आपकी नींद खराब हो जाएगी...प्रश्न आपको सोने न देगा। वह जो क्वेश्चन मार्क है ...अनिद्रा का बड़ा सहयोगी है।अगर चित्त में कोई प्रश्न खड़ा है, चिंता खड़ी है, कोई सवाल खड़ा है, कोई जिज्ञासा खड़ी है, तो नींद मुश्किल हो जाएगी।तो ओम् की जगह ' मैं कौन हूं' का प्रयोग ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योकि उसमें मौलिक रूप से एक प्रश्न है।और चूंकि प्रश्न है, इसलिए उत्तर की गहरी खोज के लिए तुम्हें जागा ही रहना होगा। ओम् में कोई प्रश्न नहीं है; उसमें कहीं चोट नहीं है। और उसका निरंतर संघात, निद्रा ले आएगी।

5- इसके अतिरिक्त ' मैं कौन हूं' में संगीत नहीं है। ओम् बहुत संगीतपूर्ण है और जितना ज्यादा संगीत है उतना स्वप्न में ले जाने में समर्थ है। शब्दों के भी आकार हैं, संगीत है और उनकी चोट का भी भेद है। अगर कोई सोया भी पड़ा हो, और उसके पास हम बैठकर कहने लगें... ' मैं कौन हूं ', ' मैं कौन हूं', तो सोया हुआ भी जग सकता है। लेकिन सोए हुए व्यक्ति के पास अगर हम बैठकर ओम्, और ओम्, दोहराने लगें, तो उसकी नींद और गहरी हो जाएगी।संघात के फर्क हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि ओम् से नहीं किया जा सकता।अगर कोई ओम् के पीछे जागकर खड़ा हो सके तो उससे भी यही काम हो जाएगा।

लेकिन अगर ओम् की साधना करेंगे तो चौथे शरीर से ओम् का अनिवार्य एसोसिएशन हो जाएगा और वह रोकनेवाला सिद्ध होगा। ओम् प्रतीक तो है सातवें शरीर का, लेकिन उसका अ