काश्मीर शैव दर्शन PART-02



पिधान कृत्य / विलय कृत्य;-

निग्रह कृत्य / परमेश्वर के सृष्टि, स्थिति आदि पाँच कृत्यों में से एक कृत्य। इसे परमेश्वर के स्वरूप को भुला डालने या छिपा देने की पारमेश्वरी लीला कहते हैं। इस कृत्य के प्रभाव से प्राणी अज्ञान के गर्त में और नीचे चला जाता है, शिष्य दीक्षा को प्राप्त करके भी निष्ठा और विश्वास को खो देता है; गुरु की, शास्त्र की, मंत्र आदि की अवहेलना, निंदा आदि करने लग जाता है। ऐसी प्रवृत्तियों का मूल कारण परमेश्वर का पिधान कृत्य होता है। पीठ;-

तन्त्रालोक और उसकी जयरथ कृत टीका विवेक में बताया गया है कि आन्तर और बाह्य याग की निष्पत्ति के योग्य स्थान को पीठ कहा जाता है। पीठ भी बाह्य और आन्तर के भेद से द्विविध हैं। बाह्य पीठ की स्थिति बाहर देश विशेष में तथा आन्तरपीठ की स्थिति शरीर के भीतर स्थान विशेष में मानी गई है। भगवान् शिव की इच्छा शक्ति ही पीठ के रूप में परिणत होती है। बाह्य और आन्तर पीठस्थानों में उपासना के माध्यम से साधक अपने महतो महीयान संवित् स्वरूप की जानकारी प्राप्त कर सकता है। यह संवित्स्वरूपा शक्ति ही पीठ के रूप में परिणत होती है। शक्ति पीठ से बिन्दुमय और नादमय पीठ की अभिव्यक्ति होती है और ये ही तीन पीठ लोक में कामरूप, पूर्णगिरी और उड्डियान के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं।

  पीठों के अतिरिक्त उपपीठ, सन्दोह, उपसन्दोह, क्षेत्र और उपक्षेत्रों का भी इसी क्रम से प्रादुर्भाव होता है। शाम्भव, शाक्त और आणव धाम का तथा पर्वताग्र, नदीतीर और एकलिंग का प्रादुर्भाव भी इन्हीं पीठों से होता है। तन्त्रालोक में कुल मिलाकर 33 या 34 पीठों का वर्णन मिलता है। कौलज्ञाननिर्णय में भी इनमें से कुछ का उल्लेख है। इसी तरह से तन्त्रालोक के 29 वें आह्निक में और बौद्ध सम्प्रदाय के हेवज्रतन्त्र के सप्तम पटल में भी इनका विवरण मिलता है। उक्त विभागों के अतिरिक्त यहाँ मेलापक और उपमेलापक, पीलव और उपपीलव, श्मशान और उपश्मशान के नाम से भी पीठों का विभाग वर्णित है। तन्त्रालोक और कौलज्ञाननिर्णय में तीन-तीन संख्या के क्रम से पीठ, उपपीठ आदि का वर्णन है। वहाँ जालन्धर का पीठ में अन्तर्भाव नहीं किया गया है। हेवज्रतन्त्र में चार-चार की संख्या के क्रम से ये वर्णित हैं। वहाँ जालन्धर का नाम पीठों में परिगणित है। साधनामाला नामक बौद्ध ग्रन्थ में उड्डियान, जालन्धर, कामरूप और श्रीहट्ट नामक चार पीठ उल्लिखित हैं। किन्तु अब बौद्ध तथा शैव-शाक्त सम्प्रदायों में कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओड्डियान नामक चार पीठ प्रसिद्ध हैं। उक्त सभी विभागों के अन्तर्गत वर्णित पीठों की संख्या 32 से 34 तक होती है।
  योगिनीहृदय के पीठन्यास प्रकरण में तथा प्रपंचसार की  प्रयोगक्रमदीपिका में योगिनीन्यास के प्रसंग में 51 पीठों के नाम चर्चित हैं। ज्ञानार्णव तन्त्र में यद्यपि 50 ही पीठ वर्णित हैं, किन्तु भास्करराय के अनुसार यहाँ भी 51 ही पीठ मान्य है। शास्त्रों में वर्णित है कि विष्णुचक्र से विच्छिन्न सती के अंग जहाँ जहाँ गिरे, उन स्थानों की पीठ संज्ञा हो गई। इनकी संख्या 51 मानी जाती है।
  शारदातिलक की टीका में राघव भट्ट ने अष्टाष्टक, अर्थात् आठ अष्टकों के भेद से भैरव और योगिनियों के समान पीठों की संख्या भी 64 बताई है। वहाँ इनके नाम भी वर्णित हैं। देवीभागवत  में इन पीठों की संख्या 108 है। कुब्जिकातन्त्र के 7वें पटल में भी पीठों के शताधिक नाम हैं। डा. दिनेशचन्द्र सरकार ने पीठनिर्णय नामक लघुकाय ग्रन्थ के संपादन के प्रसंग में इस विषय पर विशद विचार प्रस्तुत किये थे। इसके लिये ‘दी शाक्त पीठाज्’ नामक ग्रन्थ देखना चाहिये।
  महार्थमंजरीकार इस शरीर को ही पीठ मानते हैं। यह स्थूल पीठ है। वृन्दचक्र सूक्ष्म पीठ और पंचवाह पर पीठ है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और पर के भेद से पीठ त्रिविध हैं। इस त्रिविध श्रीपीठ पर इष्टदेव की उपासना की जाती है।

(क) ओड्याण पीठ

  योगिनीहृदय  में बताया गया है कि प्रकाश और विमर्श की प्रतीक शांता और अंबिका शक्ति के सामरस्य से ओड्याण पीठ की सृष्टि होती है। इसकी स्थिति शरीर में रूपातीत, निरंजन, चिन्मय तत्त्व, अर्थात् चिन्मयता की अभिव्यक्ति के स्थान ब्रह्मरंध्र में हैं। यह तेजस्तत्त्वात्मक है। इसका आकार त्रिकोणात्मक है। यह रक्त वर्ण का है। यह पीठ चितमय है। इस पर लिंग अवस्थित है। इस पीठ की बाह्य स्थिति के विषय में विवाद है। कुछ लोग उड़ीसा में तथा अन्य कश्मीर में इसकी स्थिति मानते हैं। इस पीठ में भगवती त्रिपुरसुन्दरी निवास करती है, अतः अन्तिम पक्ष ही उचित प्रतीत होता है। सिद्ध परम्परा में कश्मीर को मेधापीठ कहते हैं।

(ख) कामरूप पीठ

   योगिनीहृदय में बताया गया है कि प्रकाश और विमर्श की प्रतीक ज्ञाना और ज्येष्ठा शक्ति के सामरस्य से कामरूप पीठ की सृष्टि होती है। इसकी स्थिति शरीर में कन्द, पिण्ड, कुण्डलिनी के निवास स्थान मूलाधार में है, जो कि सुषुम्णा नाडी का भी मूल स्थान है। यह पृथ्वीतत्त्वात्मक है। इसका आकार चतुरस्त्र और वर्ण पीत है। यह पीठ मनोमय है। इसमें स्वयंभू लिंग अवस्थित हैं। कामरूप पीठ ही कामाख्या पीठ के नाम से भी प्रसिद्ध है। कालिकापुराण प्रभृति ग्रन्थों में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है।

(ग) जालन्धर पीठ

   योगिनीहृदय में बताया गया है कि प्रकाश और विमर्श की प्रतीक क्रिया और रौद्री शक्ति के सामरस्य से जालन्धर पीठ की सृष्टि होती है। इसकी स्थिति शरीर में रूप बिन्दु, अर्थात् भ्रूमध्य में है। यह जलतत्त्वात्मक है। इसका आकार अर्धचन्द्र सदृश है। यह श्वेत वर्ण का है। यह पीठ अहंकारमय है। इसमें बाण लिंग की स्थिति मानी गई है। इस पीठ की अधिष्ठात्री देवी वज्रेश्वरी है। कांगड़ा में इस देवी का मन्दिर है। तन्त्रालोक की टीका में जयरथ ने श्रीशम्भुनाथ के नामोल्लेख के प्रसङ्ग में उसे जालन्धर पीठ का गुरू बताया है। चम्बा के संग्रहालय में जालन्धर पीठ दीपिका नामक पाण्डुलिपि विद्यमान है। तदनुसार जालन्धर पीठ का केन्द्र कांगड़ा में (वज्रेश्वरी स्थान) है और उसका विस्तार ज्वालामुखी, वैजनाथ (तारा), हडसर (बाला) और त्रिलोकनाथपुर तक है।

(घ) पूर्णगिरी पीठ

   योगिनीहृदय में बताया गया है कि प्रकाश और विमर्श की प्रतीक इच्छा और वामा शक्ति के सामरस्य से पूर्णगिरी पीठ की सृष्टि होती है। इसकी स्थिति शरीर में पद, हंस, अर्थात् प्राण के उद्भव स्थल हृदय में है। यह वायुतत्त्वात्मक है। इसका आकार वृत्ताकार स्थापित छः बिन्दुओं से बनता है। यह धूम्र वर्ण का है। यह पीठ बुद्धिमय है। इसमें इतर लिंग की स्थिति मानी गई है। कुछ लोग अल्मोड़ा के पास इस पीठ की स्थिति मानते हैं और अन्य कोल्हापुर स्थित महालक्ष्मी पीठ को ही उक्त नाम देते हैं। पूर्णगिरी पीठ की अधिष्ठात्री देवी भगमालिनी है। तदनुसार ही इस पीठ की बाह्य स्थिति निश्चित होनी चाहिये। 

दर्शन : शाक्त दर्शन

पीठ विभाग डा. प्रबोध चन्द्र बागची ने अपने ग्रन्थ ‘स्टडीज इन दी तन्त्राज’ में ब्रह्मयामल के प्रमाण पर तन्त्रशास्त्र को विद्यापीठ, मन्त्रपीठ, मुद्रापीठ और मण्डलपीठ नामक चार विभागों में बाँटा है। भैरवाष्टक और यामलाष्टक का अन्तर्भाव विद्यापीठ में, योगिनीजाल, योगिनीहृदय, मन्त्रमालिनी, अघोरेशी, अघोरेश्वरी, क्रीडाघोरेश्वरी, लाकिनीकल्प, मारीचि, महामारी, उग्रविद्या गणतन्त्र का भी विद्यापीठ में और वीरभैरव, चण्डभैरव, गुडकाभैरव, महाभैरव, महावीरेश का मुद्रापीठ में समावेश बताया गया है। जयद्रथयामल विद्यापीठ से संबद्ध तन्त्र है। किन्तु स्वच्छन्दतन्त्र को चतुष्पीठ महातन्त्र कहा गया है। इसका अभिप्रायः यह निकाला जा सकता है कि स्वच्छन्दतन्त्र में उन सभी विषयों का समावेश है, जिनका कि वर्णन उक्त चतुर्विध तन्त्रों में मिलता है।

  नित्याषोडशिकार्णव की अर्थरत्नावली टीका में उद्धृत संकेतपद्धति के एक वचन में ओड्याण पूर्णगिरी, जालन्धर और कामरूप पीठ को क्रमशः आज्ञापीठ, मन्त्रपीठ, विद्यापीठ और मुद्रापीठ बताया गया है। इससे यह तात्पर्य निकाला जा सकता है कि उक्त चतुर्विध तन्त्रों का आविर्भाव इन चतुर्विध पीठों में हुआ था। तन्त्रालोक के 29वें आह्निक में भी उक्त चार पीठों में विभक्त शास्त्रों की चर्चा आई है। उससे ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे शैव और वैष्णव आगम ज्ञान, क्रिया, चर्या और योग नामक विभागों में विभक्त हैं, उसी तरह से शाक्त आगम भी विद्या, मन्त्र, मुद्रा और मण्डल विभागों में विभक्त थे, अर्थात् उन शैव वैष्णव और शाक्त आगमों में उक्त विषयों का प्रतिपादन किया गया था। तन्त्रालोक में यह भी बताया गया है कि विद्यापीठ विभाग के अन्तर्गत आने वाले तन्त्रों में मालिनीविजयोत्तर तन्त्र प्रधान है। 

दर्शन : शाक्त दर्शन

पुत्रकदीक्षा;-

यह दीक्षा साधक को सद्यः आगे ले चलने वाली उत्कृष्ट प्रकार की क्रिया-दीक्षा होती है। इसमें बाह्य आचार के नियम ढीले पड़ जाते हैं और आंतरयोग का अभ्यास स्थिर होने लग जाता है। इस दीक्षा का पात्र बना हुआ शिष्य पुत्रक कहलाता है। ऐसा शिष्य उस गुरु के पुत्र तुल्य माना जाता है।इसी दृष्टि से आ. अभिनव गुप्त ने लक्ष्मण गुप्त को उत्पलज अर्थात् उत्पन्न देव का पुत्र, और उत्पल देव को सोमानंदात्मज कहा है। यह दीक्षा सभी पाशों से छुटकारा दिलाने वाली है तथा एकमात्र प्रारब्ध कर्म को छोड़कर शेष सभी भूत और भविष्यत् कर्मों का भी शोधन कर देती है। पुरातनरु ;-

02 FACTS;-

1-तमिलनाडु प्रदेश में 63 शैवसंत हो गये हैं। इन संतों को ही कन्‍नड़ भाषा में ‘पुरातनरु’ कहा जाता है। इन सबका आविर्भाव-काल नवीं शताब्दी माना जाता है। इनमें अठारह ब्राह्मण, बारह क्षत्रिय, पाँच वैश्य, चौबीस शूद्र, एक हरिजन तथा तीन स्‍त्रियाँ हैं। इस प्रकार इन तिरसठ संतों में सभी वर्णो के स्‍त्री-पुरुष पाये जाते हें। तमिल भाषा में इन्हें ’63 नायनार्’ कहा गया है। बारहवीं सदी में तमिल भाषा के सुप्रसिद्‍ध कवि ‘शेक्‍किलार’ने ‘तिरुत्‍तोण्डार-पुराणम्’ या ‘पेरियपुराणम्’ नामक बृहद् ग्रंथ की रचना की, जिसमें इन 63 संतों का विस्तृत चरित्र पाया जाता है। इस ‘पेरिय पुराणम्’ को तमिल साहित्य का पाँचवाँ वेद कहा गया है।

2-इन संतों की जीवनी से ज्ञात होता है कि इनमें से कुछ शिवलिंग की पूजा से तथा अन्य गुरुजनों के ज्ञानोपदेश से मुक्‍त हो गये हैं। कर्नाटक के अनेक वीरशैव संत तथा कवियों ने इन शैव संतों की स्तुति की है तथा इनके चरित्र का वर्णन किया है। इससे यह ज्ञात होता है कि वीरशैव संतों पर उन पुरातन शैव संतों का गहरा प्रभाव रहा है। कन्‍नड़ भाषा में इन शैव संतों के चरित्र-प्रतिपादक अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं, उनमें वीरभद्र कवि का ‘अरवत्‍तु-मूवर-पुराण’, निजगुण शिवयोगी का ‘अरवत्‍तुमूरुमंदि-पुरातन-स्तोत्र’, अण्णाजी का ‘सौंदर-विलास’ आदि प्रसिद्‍ध है। उपमन्यु मुनि के ‘भक्‍तिविलास सम्’ नामक संस्कृत ग्रंथ में भी इन सबका चरित्र वर्णित है।

पुरुष;-

02 FACTS;-

1-अन्तःकरण अथवा बुद्धि रूप पुरी में निवास करने के कारण निर्गुण बुद्धिसाक्षी आत्मा पुरुष कहलाता है। पुरुष न किसी का कार्य है और न किसी का कारण (‘नप्रकृति-नविकृति’) है। उपनिषदों का निर्गुण आत्मा (उपाधिहीन ब्रह्म) ही सांख्यीय पुरुष है। ‘अव्यक्तात् पुरुषः परः’ इस कठवाक्य में जिस पुरुष का प्रतिपादन है, वही सांख्यीय पुरुष है। उपनिषदों के कुछ व्याख्याकार इस पुरुष को एक तथा सुखस्वरूप कहते हैं। सांख्यीय दृष्टि में पुरुष असंख्येय है तथा वह चिद्रूपमात्र है, सुखस्वरूप नहीं है। यह पुरुष स्वरूपतः सर्वज्ञ -सर्वशक्ति नहीं है; उपाधियोग से ही सर्वज्ञ -सर्वशक्ति होता है। अन्तःकरण या चित्त सदैव पुरुष के द्वारा ही प्रकाशित होता है – विषयों का ज्ञाता होता है; उपादान की दृष्टि से अन्तःकरण या चित्त जड़ त्रिगुण का विकार है। इस पुरुष को ही द्रष्टा, चित्ति, चित्तिशक्ति, भोक्तृशक्ति, भोक्ता, चैतन्य आदि शब्दों से कहा जाता है; कहीं-कहीं भोक्ता आदि शब्द पुरुष -प्रकृति -संयोग जीव को लक्ष्य कर भी प्रयुक्त होते हैं।

2-यह पुरुष हेतुहीन, कूटस्थनित्य, व्यापी (=बुद्धिगत सभी विकारों का ज्ञाता), निष्क्रिय, एकस्वरूप (=एकाधिकभावहीन), निराधार, लयहीन, अवयवहीन, स्वतन्त्र, त्रिगुणातीत, असंग, अविषय (बाह्य-आभ्यन्तर इन्द्रियों का), असामान्य अर्थात् प्रत्येक, चेतन, अप्रसवधर्मा, साक्षी, केवल, उदासीन तथा अकर्त्ता है । सभी बुद्धियों के द्रष्टा (प्रकाशक) के रूप में एक ही पुरुष है – यह सांख्य नहीं मानता। प्रत्येक बुद्धिसत्व के द्रष्टा के रूप में एक-एक पुरुष है – यह सांख्यीय दृष्टि है। इस विषय में सांख्य की युक्तियाँ सांख्यका. 18 में द्रष्टव्य हैं। यदि पुरुष बहु नहीं होते, तो बहु बुद्धियों का आविर्भाव नहीं होता – यह सांख्य कहता है। योगदर्शन में पुरुष (चितिशक्ति) को अनन्त (सीमाकारक हेतु न रहने के कारण), शुद्ध (अमिश्रित), दर्शितविषय, अपरिणामी एवं अप्रतिसंक्रम (प्रतिसंचारशून्य) कहा गया है। व्यक्त -अव्यक्त से पृथक् पुरुष की सत्ता जिन युक्तियों से सिद्ध होती है, उनका उल्लेख सांख्यकारिका 17 में है। पूजन (ज्ञानयोग) ;-

शैवी साधना के ज्ञानयोग का वह उपाय, जिसमें साधक पुनः पुनः विमर्शन करता है कि पूजक, पूजन तथा पूज्य, इन तीनों रूपों में वस्तुतः शिव ही व्याप्त होकर ठहरा हुआ है, वह स्वयं शिव से किसी भी अंश में भिन्न नहीं है, अतः भिन्न भिन्न रूपों में सर्वत्र उसी की पूजा होती रहती है। इस प्रकार के भान से वह सदातृप्त होता रहता है। सभी अवस्थाओं में अपना ही रूप देखने के कारण पूजन न होने से न तो उसे खेद ही होता है और न ही पूजन होने से उसे तुष्टि होती है। इस प्रकार के शुद्ध विकल्पों के अंतः परामर्श को पूजन कहते हैं। पूजा महार्थमजरी , चिद्गगनचन्द्रिका प्रभृति क्रम दर्शन के ग्रन्थों में पूजा के चार प्रकार बताये गये हैं। वे हैं – चार, राव, चरु और मुद्रा। चार, चरु और मुद्रा शब्दों को यहाँ क्रमशः आचार विशेष, द्रव्यविशेष और शरीर के अवयवों की विशेष प्रकार की स्थिति अथवा विशेष प्रकार के वेश को धारण करने के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। ये तीनों क्रमशः राव के ही पोषक हैं। राव ही यहाँ प्रधान है। विमर्श अथवा अपनी आत्मशक्ति के साक्षात्कार को यहाँ राव कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि अपने स्वरूप की अपरोक्ष अनुभूति ही परम पूजा है। कुछ आचार्य निजबलनिभालन के नाम से इसका वर्णन करते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि साधक के अपने हृदय की स्फुरता ही परमेश्वर या इष्ट देवता है अपने इस स्वरूप की सतत अपरोक्ष (साक्षात्) अनुभूति ही निजबलनिभालन के नाम से अभिहित है। इस आत्मविमर्श का ही नामान्तर जीवन्मुक्ति है।

  योगिनीहृदय में परा, परापरा और अपरा के भेद से पूजा के तीन प्रकार बताये गये हैं। इनमें परा पूजा सर्वोत्तम है। यह बाह्य पत्र, पुष्प आदि से सम्पन्न नहीं होती, किन्तु अपने महिमामय स्वात्मस्वरूप अद्वय धाम में प्रतिष्ठित होना ही परा पूजा है। इस परा पूजा का निरूपण विज्ञान भैरव, संकेत पद्धति प्रभृति ग्रन्थों में विस्तार से मिलता है। 

दर्शन : शाक्त दर्शन पूर्णभगवान्;-

जब सत्त्वगुणात्मक, रजोगुणात्मक या तमोगुणात्मक शरीर विशेष रूप अधिष्ठान की अपेक्षा किए बिना स्वयं अभिगुणात्मक शुद्ध साकार ब्रह्म आविर्भूत होते हैं, तब वे स्वयं पूर्णभगवान हैं। ऐसे शुद्ध साकार ब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण ही हैं। यद्यपि वे भी अधिष्ठान रूप में लीला शरीर से युक्त हैं, तथापि उनका वह विग्रह अभिगुणात्मक होने से सर्वथा शुद्ध है।

पूर्णानन्द;-

वल्लभ वेदान्त में पुरुषोत्तम भगवान ही पूर्णानन्द हैं। अक्षरानन्द या ब्रह्मानन्द उसकी तुलना में न्यून हैं। इसीलिए ज्ञानियों के लिए ब्रह्मानंद भले ही अभीष्ट हों, परंतु भक्तों के लिए तो पूर्णानन्द पुरुषोत्तम भगवान ही परम अभिप्रेत हैं। पूर्ववत् ;-

अनुमान के तीन भेदों में यह एक है (अन्य दो हैं – शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट)। इसकी व्याख्या में मतभेद हैं। एक मत के अनुसार पूर्ववत् = कारण -विषयक ज्ञान, अर्थात् अतीत कारण के आधार पर भविष्यत् कार्य का अनुमान, जैसे मेघ की एक विशेष स्थिति को देखकर होने वाली वृष्टि का ज्ञान। यह देश भविष्यद् वृष्टिमान है, मेघ की अवस्था -विशेष से युक्त होने के कारण, अमुक देश की तरह – यह इस अनुमान का आकार है। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि उपयुक्त लक्षणवाक्य में कारण = कारण का ज्ञान और कार्य = कार्य का ज्ञान – ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि कार्यविशेष और कारण-विशेष के ज्ञान से ही अनुमान होता है। वाचस्पति के अनुसार पूर्ववत् अन्वयव्याप्ति पर आधारित एवं विधायक होता है । अन्वय = तत्सत्वे तत्सत्वम् – किसी के कहने पर किसी (साध्य) का रहना। पूर्ववत् में साध्य के समानजातीय किसी दृष्टान्त के आधार पर व्याप्ति बनती है। उदाहरणार्थ – पर्वत में जिस वह्नि का अनुमान किया जाता है, उस वह्नि के सजातीय वह्नि का प्रत्यक्ष ज्ञान पाकशाला में (धूम के साथ) पहले हो गया होता है।

पौरुष अज्ञान ;-

अपने आपको परिपूर्ण शिव न समझकर केवल अल्पज्ञ तथा अल्पकर्तृत्व वाला जीव मात्र ही समझना पौरुष अज्ञान कहलाता है। इसे मलरूप अज्ञान भी कहते हैं क्योंकि इसी के आधार पर प्राणी में आणव, मायीय तथा कार्म नामक तीनों मलों की अभिव्यक्ति हो जाती है। इस प्रकार से पौरुष अज्ञान स्वरूप संकोच को कहते हैं। पौरुष ज्ञान ;-

चित्तवृत्ति से सर्वथा असम्पृक्त अपने मूल स्वरूप को स्वयं अपने ही चित्प्रकाश से परिपूर्ण परमेश्वर ही समझना। अपने में स्वाभाविकतया परमेश्वरता का अनुभव करना। पौरुष ज्ञान बौद्ध ज्ञान के भी मूल में ठहरा रहता है। इसे अपने शिवभाव की साक्षात् अनुभूति कह सकते हैं। पौरुष ज्ञान में पूर्ण स्थिरता के लिए बौद्ध ज्ञान का होना बहुत आवश्यक माना गया है। प्रकाश ;-

जिस शक्‍ति के द्‍वारा पाशुपत साधक पदार्थों को सम्यक् रूप से जानता है, वह शक्‍ति प्रकाश कहलाती है तथा द्‍विविध होती है।अपर प्रकाश – जिस प्रकाश से साधक योग विधि के साधनों का उचित विवेचन करता है तथा ध्येयतत्व ब्रह्म पर समाहित चित्‍त को जानता है वह अपर प्रकाश कहलाता है।पर प्रकाश – जिस प्रकाश के द्‍वारा साधक समस्त तत्वों को उनके धर्मों तथा गुणों के सहित समझकर उनके सम्यक् रूपों का विवेचन करता है वह पर प्रकाश होता है।प्रकाश चेतना का सतत – चमकता हुआ ज्ञानात्मक स्वरूप। चेतना का अपना स्वाभाविक अवभास। ज्ञान। शुद्ध संविद्रूपतत्त्व। शुद्ध अहं रूप चेतना या आत्मा का अनुत्तर स्वरूप। जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति तथा सुख, दुःख आदि भिन्न भिन्न अवस्थाओं एवं भावों में अनुस्यूत रूप से विद्यमान रहते हुए भी इन सभी अवस्थाओं एवं भावों से उत्तीर्ण तुर्या में स्फुटतया चमकने वाला शुद्ध ज्ञान स्वरूप संवित्।शिव का नैसर्गिक स्वरूप। प्रकाश वह तत्त्व है जो स्वयं अपने ही स्वभाव से चमकता हुआ अन्य सभी वस्तुओं को, शरीरों को, अंतःकरणों को, इंद्रियों को, विषयों को, भुवनों को, भावों को अर्थात् समस्त संसार को ज्ञान रूप प्रकाश से चमका देता है। प्रकाश-विमर्श ;-

शैव और शाक्त अद्वैतवादी दार्शनिक प्रकाश शब्द को शिव का तथा विमर्श पद को शक्ति का वाचक मानते हैं। इन दोनों शब्दों का विवेचन सभी शैव और शाक्त ग्रन्थों में मिलता है। शब्द और अर्थ की तरह, पार्वती और परमेश्वर की तरह प्रकाश और विमर्श की भी स्थिति यामल भाव में ही रहती है। ये सदा साथ रहते हैं। वस्तुतः शब्द-अर्थ, पार्वती-परमेश्वर और प्रकाश-विमर्श शब्द पर्यायवाची हैं। अर्धनारीश्वर रूप में भगवान् शिव जैसे सतत यामल भाव में रहते हैं, वैसे ही प्रारम्भ में प्रकाश और विमर्श की स्थिति सामरस्य अवस्था में रहती है। इसी को समावेश दशा भी कहते हैं। समावेश दशा में जीव में परिमित प्रमाता का भाव गौण हो जाता है और वह अपने को स्वतन्त्र, बोधस्वरूप समझने लगता है, किन्तु शिव और शक्ति का यह समावेश (सामरस्य) प्रपंच के उन्मेष के लिए होता है। जीव जिस तरह शिव भाव में समाविष्ट होता है, उसी तरह से शिव और शक्ति का यह यामल भाव भी प्रपंच के रूप में समाविष्ट हो जाता है, प्रपंच के रूप में दिखाई देने लगता है। प्रकाश ज्ञान है और विमर्श क्रिया है। इस पारमेश्वरी क्रिया से सतत आविष्ट परम तत्त्व सदैव सृष्टि, संहार आदि लीलाओं के प्रति उन्मुख बना रहता है और वैसे बना रहना ही उसकी परमेश्वरता है। अन्यथा वह शून्य गगन की तरह जड़ होता।

प्रकाशविश्रांति ;-

अपनी शुद्ध प्रकाशरूपता का ही आश्रय लेकर उसी से सर्वथा कृतकृत्य हो जाना। प्रकाश विश्रांति का अभ्यास करने वाले योगी को उस अभ्यास में सतत गति से अपने असीम, शुद्ध और परिपूर्ण चिद्रूपता का अपरोक्ष साक्षात्कार होता रहता है। उसे प्रकाश के स्वभावभूत ऐश्वर्य की भी साक्षात् अनुभूति होती रहती है। उसे अपने से भिन्न किसी उपास्य देव का ध्यान नहीं रहता है और न ही किसी सुख, दुःख आदि आभ्यंतर विषय का तथा न ही किसी नील, पीत आदि बाह्य विषय का आभास ही शेष रहता है। न ही उसे अपने संकुचित जीव भाव का ही कोई संवेदन शेष रहता है। वह इन सब से ऊपर चला जाता है। इस अभ्यास से साधक में शिवभाव का समावेश हो जाता है। प्रकाशावरण ;-

योगसूत्र में कहा गया है कि प्राणायाम के अभ्यास से प्रकाशावरण का क्षय होता है। व्यास के अनुसार यह प्रकाशावरण विवेकज्ञान को ढकने वाला कर्म (कर्मसंस्कार) है, जो संसरण का हेतु है। यह कर्म संस्कार अधर्मप्रधान है – ऐसा कुछ व्याख्याकार कहते हैं।

प्रकृति ;-

सत्व-रजः-तमः की समष्टि प्रकृति है। ‘प्रकृति से सत्त्वादि उत्पन्न या आविर्भूत हुए’, ऐसे शास्त्रीय वाक्य गौणार्थक होते हैं। सत्त्वादिगुणत्रय के अतिरिक्त प्रकृति नहीं है; द्र. गुणशब्द। ‘प्रकृति’ का अर्थ है – उपादानकारण। सांख्य में मूलप्रकृति और प्रकृतिविकृति शब्द प्रायः व्यवहृत होते हैं। बुद्धि से शुरू कर सभी तत्वों का उपादान मूल प्रकृति है और बुद्धि-अहंकार-पंचतन्मात्र ‘प्रकृति-विकृति’ कहलाते हैं, क्योंकि वे स्वयं किसी तत्त्व का उपादान होते हुए तत्त्व के विकार भी हैं। चूंकि ये आठ पदार्थ प्रकृति हैं, अतः ‘अष्टो प्रकृतयः’ यह तत्त्वसमाससूत्र (2) में कहा गया है। सांख्यीय दृष्टि से मूल प्रकृति के विकार असंख्य हैं (यथा महत्तत्त्व संख्या में असंख्य हैं), पर मूल प्रकृति एक है। कोई भी विकार प्रकृति से पृथक् नही है। सत्त्वादिगुण भी परस्पर मिलित ही रहते हैं। प्रकृति की दो अवस्थाएँ हैं – साम्यावस्था एवं वैषम्यावस्था। साम्यावस्था में त्रिगुण का सदृशपरिणाम होता है और वैषम्य-अवस्था में विसदृश परिणाम। वैषम्यावस्था कार्य-अवस्था है, यह ‘व्यक्त’ नाम से अभिहित होती है। व्यक्त प्रकृति महत् आदि तत्त्वों के क्रम में है।

प्रकृति तत्त्व ;-

मूल प्रकृति। प्रधान तत्त्व। छत्तीस तत्त्वों के क्रम में तेरहवाँ तत्त्व। परमेश्वर की स्वतंत्र इच्छा ही संकोच की अवस्था में माया तत्त्व के रूप को धारण करती है। भगवान अनंतनाथ इस माया तत्त्व को प्रक्षुब्ध करके पाँच कंचुक तत्त्वों को प्रकट करते हैं। उनके संकोच के भीतर घिरा हुआ चिद्रूप प्रमाता पुरुष तत्त्व के रूप में प्रकट होता है और उसका सामान्याकार प्रमेय तत्त्व सामान्यतः ‘इदं’ इस रूप में प्रकट होता हुआ प्रकृति तत्त्व या मूल प्रकृति या प्रधान तत्त्व कहलाता है। इस सामान्याकार ‘इदं’ में आगे सृष्ट होने वाले सभी तेईस तत्त्व समरस रूप में स्थित रहते हैं। सत्त्व आदि तीन गुण भी इस अवस्था में साम्य रूप से ही स्थित रहते हैं। इसे गुण साम्य की अवस्था भी कहते हैं। प्रकृतिक्षोभ;-

साम्यावस्था में स्थित गुणत्रय (प्रकृति) का जो वैषम्य होता है, उसका हेतु है – पुरुष का उपदर्शन; पुरुष द्वारा उपदृष्ट होने पर ही गुणवैषम्य होता है। गुणों का यह वैषम्यभाव प्रकृतिक्षोभ कहलाता है। इस क्षोभ के कारण ही प्रकृति से महत् का आविर्भाव होता है जो अहंकार आदि रूप से परिणत होता रहता है। यह ज्ञातव्य है कि यह क्षोभ (साम्यावस्था से प्रच्युति) किसी काल में नहीं होता – यह अनादि है, अर्थात् महत्तत्त्व अनादि है। अनादि होने पर भी उसके दो कारण (पुरुष के रूप में निमित्त-कारण एवं गुणत्रय के रूप में उपादानकारण) माने गए हैं। ब्रह्माण्ड-विशेष की सृष्टि के प्रसंग में भी ‘प्रकृतिक्षोभ’ का प्रसंग आता है। भूतादिनामक तामस अहंकार ब्रह्माण्ड का उपादान है। यह अहंकार एक प्रकृति है जो अणिमादि-सिद्धिशाली सृष्टिकर्त्ता प्रजापति हिरण्यगर्भ में आश्रित है। प्रजापति के सृष्टिसंकल्प से यह अहंकार-रूप प्रकृति क्षुब्ध होकर तन्मात्र-भूतभौतिक रूप से परिणत होता है और ब्रह्माण्ड अभिव्यक्त होता है। क्षुब्ध होने से पहले यह अहंकार रुद्धप्राय सुप्तवत् अवस्था में रहता है, अतः पुराणों में प्रायः अव्यक्त प्रकृति के क्षुब्ध होने का उल्लेख (ब्रह्माण्डसृष्टि -प्रसंग में) मिलता है।

प्रकृतिलय ;-

सांख्ययोग के अनुसार भवप्रत्यय नामक समाधि जिन योगियों को होती है, वे ‘प्रकृतिलय’ कहलाते हैं। प्रकृति अर्थात् सांख्यशास्त्रीय अष्ट प्रकृतियों में जिनके चित्त का लय होता है, वे ‘प्रकृतिलय’ हैं। यह लय कैवल्य -साधक चित्तलय नहीं हैं। आत्मज्ञान न रहने के कारण इन प्रकृतिलयों का पुनःआवर्तन होता है। प्रकृतिलयों (ये प्रकृतिलीन भी कहलाते हैं) के चित्त उत्थित होने पर वे चित्त महैश्वर्यशाली भी हो सकते हैं – कोई-कोई प्रकृतिलीन ब्रह्माण्ड का सृष्टिकर्ता भी हो सकता है – ऐसा इस शास्त्र की मान्यता है। ‘लय’ के विषय में यह ज्ञातव्य है कि अष्ट प्रकृतियों में से अव्यक्त प्रकृति, महत्तत्व और अहंकार रूप प्रकृतियों में चित्त वस्तुतः लीन हो जाता है (निर्बीजसमाधि रूप निरोध के कारण), पर तन्मात्र रूप जो पाँच प्रकृतियाँ हैं, उनमें चित्त वस्तुतः लीन नहीं हो सकता, क्योंकि तन्मात्र चित्त का उपादान कारण नहीं है। तन्मात्र में तन्मय हो जाना ही उसमें लीन हो जाना है।

दर्शन : सांख्य-योग दर्शन

प्रकृतिविकृति ;-

सांख्यीय पच्चीस तत्त्वों में सात ऐसे हैं, जो प्रकृतिविकृति कहलाते हैं। ये हैं – अहंकार तथा पाँच तन्मात्र (शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध)। चूंकि ये सात अन्य तत्त्वों के उपादान हें, अतः प्रकृति कहलाते हैं, तथा ये किन्हीं तत्त्वों के कार्य भी हैं, अतः विकृति (विकार) भी कहलाते हैं। उदाहरणार्थ – महत्ततत्व अहंकार की प्रकृति (उपादान) है, अहंकार पाँच तन्मात्रों की प्रकृति है; पंचतन्मात्र पंचभूतों की; इसी प्रकार महत् प्रकृति की विकृति (= विकार, कार्य) है, अहंकार महत् की, तन्मात्र अहंकार की। इस प्रकार उपर्युक्त सात तत्त्व प्रकृतिविकृति कहलाते हैं ।

प्रचारसंवेदन ;-

परशरीरावेश (दूसरे के शरीर में प्रवेश) नामक सिद्धि के दो उपायों में से यह एक है (योगसूत्र 3/38)। प्रचार का अर्थ है – नाडी; प्रचार में संयम करना प्रचारसंवेदन है। चूंकि नाडीमार्ग से ही कोई दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकता है, अतः उपर्युक्त सिद्धि के लिए प्रचार में संयम करना आवश्यक होता है – यह व्याख्याकारों का कहना है।

प्रच्छर्दन;-

कोष्ठगत वायु (यहाँ कोष्ठ = उरोगुहा है, क्योंकि श्वास-वायु फुफ्फुस से ही सम्बन्धित है) का दोनों नासिकापुटों के द्वारा निष्कासन करना (योगशास्त्रीय प्रयत्नविशेष के बल पर) प्रच्छर्दन कहलाता है। किसी-किसी व्याख्याकार के अनुसार एक-एक नासिकापुट से भी प्रच्छर्दन-क्रिया की जा सकती है, जिस प्रच्छर्दन (विधारण के साथ) के द्वारा चित्त ‘स्थिति’ की ओर अग्रसर होता है, वह एक निश्चित प्रकार के प्रयत्न के द्वारा अभ्यसनीय है, जो गुरुपरंपरागम्य है। प्रर्च्छदन के लिए कभी-कभी प्रश्वास शब्द भी प्रयुक्त होता है।

प्रज्ञा;-

प्रज्ञा’ को योगशास्त्र में ‘उपायप्रत्यय’ के रूप में माना गया है। इस सूत्र से यह भी ज्ञात होता है कि यह प्रज्ञा समाधि से उत्पन्न होती है। भाष्यकार ने प्रज्ञा को प्रज्ञाविवेक कहा है, जो प्रज्ञा के स्वरूप को दिखाता है। प्रत्येक वस्तु में त्रिगुण का सन्निवेश कैसा है, यह जानकर वस्तु के स्वरूप की अवधारण करना प्रज्ञा है। इससे वस्तु को यथार्थ रूप से जाना जाता है। यही कारण है कि बुद्धि-पुरुषभेद-ज्ञान भी प्रज्ञा ही कहलाता है। इस प्रज्ञा की ही एक उत्कृष्ट अवस्था ‘ऋतंभरा’ है। जिस प्रकार अज्ञान का संस्कार होता है, उसी प्रकार प्रज्ञा का भी संस्कार होता है। ये संस्कार ही व्युत्थान -संस्कार को अभिभूत करता है। परवैराग्य के द्वारा इस प्रज्ञा-संस्कार का भी निरोध होता है। समाधिज प्रज्ञा के एक सप्तधाविभाग का उल्लेख योगसूत्र में मिलता है। इसको ‘प्रान्तभूमि’ प्रज्ञा कहते हैं।

प्रज्ञालोक;-

संयम-जय (संयम पर आधिपत्य या संयम का स्थैर्य) होने पर प्रज्ञा-लोक (= समाधिजात प्रज्ञा का प्रकर्ष) होता है। संयम के विकास के साथ-साथ प्रज्ञा का भी प्रकर्ष या वैशद्य (= अधिकतर सूक्ष्मार्थ -प्रकाशन) होता रहता है। ज्ञानशक्ति का स्थैर्य होने के कारण वह ध्येय विषय में प्रतिष्ठित हो जाती है, अतः संयम से प्रज्ञा का उत्कर्ष होता है। (आलोक यहाँ तेजसपदार्थ-विशेष नहीं है; आलोक=प्रकाशन -सामर्थ्य है – आ = चारों ओ; लोक = लोकन = अवलोकन।

प्रणव;-

प्रणव’ का अर्थ ओंकार है। चूंकि इसके द्वारा सम्यक् रूप से स्तुति की जाती है, अतः ओंकार प्रणव कहलाता है (प्रणूयते अनेनेति प्रणवः) – ऐसा व्याख्याकार कहते हैं। प्रणव को अनादिमुक्त ईश्वर का वाचक माना गया है। व्याख्याकार कहते हैं कि इस सर्ग की तरह अतिक्रान्त सर्गों में भी प्रणव ईश्वर का वाचक था और आगे भी रहेगा। प्रायेण यह माना जाता है कि प्रणव सार्ध -त्रिमात्र है अर्थात् प्रणव में 3 1/2 मात्राएँ हैं। प्रणव का जप (ध्वनि का उच्चारण) एवं प्रणवार्थ की भावना (= चिन्तन) से ईश्वर का प्रणिधान करना सहज होता है।

प्रणव कला प्रणव की बारह कलाओं का विवेचन स्वच्छन्द तन्त्र में एकादशपदिका प्रकरण में और तैत्रतन्त्र के 21 वें अधिकार में मिलता है। विज्ञानभैरव के टीकाकार शिवोपाध्याय ने 42वें श्लोक की व्याख्या में बताया है कि अकार की नाभि में, उकार की हृदय में, मकार की मुख में, बिन्दु की भ्रूमध्य में, अर्धचन्द्र की ललाट में, निरोधिनी की ललाट के ऊर्ध्व भाग में, नाद की शिर में, नादान्त की ब्रह्मरन्ध्र में, शक्ति की त्वक् में व्यापिनी की शिखा के मूल में, समना की शिखा में और उन्मना की स्थिति शिखा के अन्तिम भाग में है। इनमें से बिंदु से लेकर उन्मना पर्यन्त 9 कलाओं का प्रणव के समान कामकला प्रभृति बीजाक्षरों, नवात्म प्रभृति पिण्ड मन्त्रों तथा ह्रींकार (शाक्त प्रणव), हूंकार (शैव प्रणव), प्रभृति बीज मन्त्रों के उच्चारण में भी होता है। योगिनीहृदय के दीपाकारोSर्धमात्रश्व से लेकर तथोन्मनी निराकारा पर्यन्त श्लोकों में इनका आकार, स्वरूप, उच्चारण काल और स्थान वर्णित है। योगिनीहृदय के आधार पर यह विषय वरिवस्यारहस्य में भी प्रतिपादित है। इस ग्रन्थ के (अड्यार लाइब्रेरी, मद्रास) संस्करण के अन्त में दिये गये एक चित्र में इनके आकार को दिखाया गया है।

  योगिनीहृदय के अनुसार बिन्दु का स्वरूप दीपक के समान प्रभास्वर है। ललाट में गोल बिंदी के रूप में इसकी भावना की जाती है  और उसका उच्चारण काल अर्धमात्रा है। ‘अर्धमात्रास्थिता’  प्रभृति दुर्गा सप्तशती के श्लोक की व्याख्या (गुप्तवती) में भास्करराय ने “अनुच्चार्या अर्धचन्द्रनिरोधिन्यादि-ध्वन्यष्टकरूपा” ऐसा कहकर अर्धमात्रा में ही सबकी स्थिति मानी है। हस्व स्वर का उच्चारण काल ‘मात्रा’ कहलाता है। इसका आधा काल बिन्दु के उच्चारण में लगता है। अर्धचन्द्र का आकार बिन्दु के आधे भाग के जैसा होता है। दीपक के समान प्रभास्वर स्वरूप के अर्धचन्द्र की भावना बिन्दु स्थान ललाट में ही कुछ ऊपर की ओर की जाती है। इसका उच्चारण काल मात्रा का चतुर्थ भाग है। निरोधिका (निरोधिनी) का आकार तिकोना है। यह चाँदनी के समान चमकता है। इसका उच्चारण काल मात्रा का आठवाँ भाग है। उज्ज्वल मणि के समान कान्ति वाले नाद का आकार दो बिन्दु और उसके बीच में खिंची सीधी रेखा के समान है। इसका उच्चारण काल मात्रा का सोलहवाँ भाग है। विद्युत के समान कांति वाले नादान्त का आकार हल सरीखा है और इसकी बाईं तरफ एक बिन्दु रहता है। इसका उच्चारण काल मात्रा का बत्तीसवाँ भाग है। दो बिन्दुओं में से बायें बिन्दु से एक सीधी रेखा खींचने पर शक्ति की आकृति बनती है। व्यापिका (व्यापिनी) का आकार बिन्दु के ऊपर बने त्रिकोण का सा है। एक सीधी रेखा के ऊपर और नीचे बिन्दु बैठा देने से समना का और एक बिन्दु के ऊपर सीधी रेखा खींचने से उन्मना का आकार बनता है। शक्ति से लेकर समना पर्यन्त कलाओं का स्वरूप द्वादश आदित्यों के एक साथ उदित होने पर उत्पन्न हुए प्रकाश के समान है। शक्ति का उच्चारण काल मात्रा का 64 वाँ भाग, व्यापिका का 128 वाँ भाग, समना का 256 वाँ भाग और उन्मना का 512 वाँ भाग होता है। अन्य आचार्यों के मत से उन्मना कला मन से अतीत होती है। अतः इसका कोई आकार नहीं होता। विज्ञानभैरव के 42 वें श्लोक के ‘शून्या’ शब्द से उन्मनी का बोध कराया गया है।माण्डूक्यकारिका में प्रणव (ऊँकार) को अमात्र और अनन्तमात्र कहा गया है। भाष्यकार शंकराचार्य ने बताया है कि तुरीयावस्थापन ऊँकार अमात्र माना जाता है और अन्य अवस्थाओं में इसकी अनन्त मात्राएँ होती हैं। इन्हीं मात्राओं का तन्त्रशास्त्र में प्रणव कला के रूप में वर्णन है। निष्कल, निष्कलसकल और सकल के भेद से भी योगिनीहृदय प्रभृति ग्रन्थों में इनका वर्णन मिलता है। 

प्रणव कला ;-

प्रणव परमेश्वर का वाचक है। प्रणव की उपासना में परमेश्वरता की सूक्ष्म सूक्ष्मतर विशेषताओं का साक्षात्कार होता है। प्रणव की ध्वनि की उत्तरोत्तर गूंज के अभ्यास के साथ ही साथ योगी उन सभी विशेषताओं का साक्षात्कार क्रम से करता जाता है। उस क्रम में सूक्ष्मतर उच्चारण काल के विभाग की कलना भी होती है। परब्रह्म की उन विशेषताओं का साक्षात्कार कराने वाली प्रणव की ध्वनि की गूंज की उन सूक्ष्मतर कलाओं को प्रणव की कलाएँ कहा जाता है। वे कलाएँ बारह हैं जो क्रम से – अकार, उकार, मकार, बिंदु, अर्धचंद्र, निरोधी, नाद, नादांत, शक्ति, व्यापिनी, समता और उन्मना हैं। बिंदु का काल आधी मात्रा है और उससे आगे वाली कलाएँ उत्तर उत्तर आधे – आधे काल की होती हैं। इस प्रकार के सूक्ष्म सूक्ष्मतर काल-विश्लेषण के सामर्थ्य का उदय शिवयोगी में ही होता है। अंतिम कला उन्मना ब्रह्म की वह विशेषता है जहाँ काल की कलना ही सर्वथा विलीन हो जाती है और अकालकलित शिवतत्त्व ही चमकता हुआ शेष रह जाता है।

प्रतिबिंबवाद ;-

02 FACTS;-

1-वह वाद, जिसके अनुसार संपूर्ण विश्व परमशिव की शुद्ध एवं परिपूर्ण संविद्रूपता में दर्पण प्रतिबिम्ब न्याय से चमकता हुआ ठहरता है। जो कुछ भी जिस भी रूप में आभासित होता है वह उसी संविद्रूपता में आभासित होता है। इस प्रकार उससे भिन्न रूप में बाह्यरूपतया कुछ भी स्थित नहीं है। जिस प्रकार दर्पण में कोई भी प्रतिबिंब विपरीत रूप में प्रकट होता है, अर्थात् दायाँ बायाँ दिखाई देता है तथा बायाँ दायाँ दिखाई देता है, उसी प्रकार यह संपूर्ण विश्व भी परमशिव के प्रकाश रूप दर्पण में प्रतिबिंबित होता हुआ विपरीततया ही प्रकट होता है। यह वस्तुतः शुद्धि ‘अहं’ स्वरूप चिद्रूपप्रमता है, परंतु ‘इदं’ के रूप में अचिद्रूपतया और प्रमेयरूपतया दीखता है। यही इस प्रतिबिंब की प्रतीयता या उल्टापन है। यही भेदावभासन की प्रक्रिया है। समस्त विश्व को उसी के प्रतिबिंब के रूप में समझना मोक्ष है तथा भेद के रूप में समझना बंधन है।

2-वस्तुतः दर्पण में प्रतिबिंबित हो रही वस्तु के प्रतिबिंब की दर्पण से भिन्न कोई अलग सत्ता नहीं है। उसी प्रकार परमशिव की संविद्रूपता में प्रतिबिंबित हो रहे समस्त विश्व की संविद्रूपता से भिन्न कोई अलग सत्ता नहीं है। दर्पण एक जड़वस्तु है, परंतु संवित् चेतना है, प्रकाश और विमर्श का परिपूर्ण सामरस्य है। दर्पण किसी बिंब रूप वस्तु के सामने आने पर ही प्रतिबंब को ग्रहण कर सकता है; उसके बिना नहीं। परंतु संवित् एक चिद्रूप तथा स्वतंत्र दर्पण है, अतः अपनी ही शक्तियों के प्रतिबिंबों को अपने ही भीतर प्रकट करता रहता है। उसी की शक्तियों के प्रतिबिंब छत्तीस तत्त्वों के रूप में प्रमेयतया प्रकट होते रहते हैं और उसी की इच्छा से ऐसा होता रहता है। इस प्रकार शैव दर्शन के अनुसार परमशिव ही इस प्रतिबिंब न्याय से अपनी परिपूर्ण स्वातंत्र्य शक्ति द्वारा बिम्ब एवं प्रतिबिंब आदि के चित्र विचित्र रूपों में सतत रूप से अवभासित होता रहता है। इस तरह से जगत की सृष्टि प्रतिबिंब न्याय से ही हुआ करती है। ऐसा सृष्टि सिद्धांत ही शैवदर्शन का प्रतिबिंबवाद है। प्रतिष्ठा कला ;-

त्वों के सूक्ष्म रूपों को कला कहते हैं। एक एक कला कई एक तत्त्वों को व्याप्त कर लेती है। जल तत्त्व से लेकर पृथ्वी तत्त्व तक की समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म सृष्टि को व्याप्त करने वाली कला को प्रतिष्ठा कला कहते हैं। इस कला पर समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म प्रपंच प्रतिष्ठित हो कर रहता है। प्रतिष्ठा कला को प्राकृत अंड भी कहते हैं।

प्रतीकालंबन ;-

ब्रहमत्व की भावना से रहित प्रतीकमात्र जिसकी उपासना का विषय है, वह प्रतीकालंबन उपासक है अर्थात् सिद्धांत में श्रुतियाँ सर्वत्र ब्रह्मत्व रूप से ही उपासना का विधान करती हैं क्योंकि सभी उपास्य भगवद् विभूति रूप होने से शुद्ध ब्रह्मरूप हैं। किन्तु प्रतीकालंबन उपासकों की मान्यता के अनुसार उन उपास्यों में ब्रह्मत्व ज्ञान किए बिना भी की गयी उपासना को श्रुतियाँ सफल तो बताती हैं किंतु वे उपास्य ब्रह्मरूप हैं, ऐसा नहीं बतातीं। इस प्रकार की मान्यता वाले उपासक प्रतीकालंबन कहे गए हैं। इनके अनुसार प्रतीक की अपने रूप में उपासना भी निरर्थक नहीं हैं।

प्रतीकोपासना ;-

अतद्रूप की तद्रूप में उपासना प्रतीकोपासना है। जैसे, ‘मनो ब्रह्म इत्युपासीत’ यहाँ ब्रह्म भिन्न मन की ब्रह्म रूप में उपासना प्रतिकोपासना है तथा इस प्रकार प्रतीक का आलंबन कर ब्रह्म की उपासना करने वाले उपासक प्रतीकोपासक हैं ।

प्रत्यक्-चेतन;-

योगग्रन्थों में ‘प्रत्यक्चेतन’ शब्द ही प्रमुखतः प्रयुक्त होता है। योगसूत्र में यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। वाचस्पति के अनुसार विपरीत भाव का बोद्धा प्रत्यक् है; यह चेतन (अपरिणामी कूटस्थ ज्ञाता पुरुष) का विशेषण है, अतः प्रत्यक्चेतन का अर्थ होगा अचित् दृश्य का ज्ञाता अर्थात् अविद्यावान् पुरुष। भिक्षु कहते हैं कि प्रत्येक वस्तु में जो अनुस्यूत है, वह प्रत्यक् है, अर्थात् परमात्मा प्रत्यक् है। यह अर्थ वर्तमान सूत्र में अप्रयोज्य है – यह कई व्याख्याकारों ने भली-भांति दिखाया है। प्रत्यक्चेतन प्रत्यगात्मा भी कहलाता है।

प्रत्यक्षप्रमाण ;-

सांख्य -योग में स्वीकृत तीन प्रमाणों में यह एक है। सांख्यकारिका में इसका लक्षण है – प्रतिविषय-अध्यवसाय (5)। विषय के साथ इन्द्रिय का संपर्क होने पर जो अध्यवसाय (निश्चय) होता है, वह प्रत्यक्ष है। पूर्वाचार्य कहते हैं कि विषय (स्थूल-सूक्ष्म) के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष होने पर बुद्धिगत तमोगुण का अभिभव होने के साथ-साथ सत्त्वगुण का जो स्फुरण होता है, वह प्रत्यक्ष प्रमाण है, जो चित्तवृत्तिविशेष ही है। इसके साथ चेतन पुरुष का जो संबंध (अर्थात् चेतन में समर्पण) है, वह प्रत्यक्षप्रमा कहलाता है। यह प्रत्यक्ष संशय, विपर्यय और स्मृति से भिन्न है। सांख्यसूत्र में भी यही मत प्रतिपादित हुआ है। कारिका में प्रत्यक्ष के लिए ‘द्रष्ट’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। योगसूत्र का कहना है कि प्रत्यक्ष में विषयगत विशेषधर्म प्रधानतया भासमान होता है। इस प्रमाण से उत्पन्न होने वाली प्रमा को ‘पौरुषेय चित्तवृत्तिबोध’ कहा जाता है। उदाहरणार्थ ‘यह घट है’ ऐसा निश्चय (घटाकारा चित्तवृत्ति) प्रत्यक्ष प्रमाण है और ‘मैं घट जान रहा हूँ’ यह प्रत्यक्ष प्रमा है। बुद्धि में प्रतिबिम्बित होने के कारण बुद्धि के साथ पुरुष की अभिन्नता होती है। और इस प्रकार निर्धर्मक पुरुष में ज्ञानादिधर्मों का उपचार होता है; यही कारण है कि प्रमा को पौरुषेय कहा जाता है। प्रमाणों में प्रत्यक्ष प्रमाण सर्वाधिक बलवान् है। लौकिक प्रत्यक्ष की तुलना में योगज प्रत्यक्ष अधिकतर बलशाली है। समाधि प्रत्यक्षों में निर्विचारा समापत्ति उच्चतम है।

प्रत्यक्षाद्वैत;-

वेदांत आदि अद्वैत शास्त्रों की प्रक्रियाओं में या तो समाधि की अवस्था में अद्वैतता का साक्षात्कार होता है या शरीर के छूट जाने पर अशरीर मुक्ति की दशा में। परंतु शैवशास्त्र की प्रक्रियाओं में इन दो दशाओं के अतिरिक्त सांसारिक व्यवहार की इस जगत् रूपिणी दशा में भी अद्वैत तत्त्व का साक्षात्कार हो सकता है। तद्नुसार एक उत्कृष्टतर शिवयोगी अपनी बाह्य इंद्रियों से सर्वत्र एकमात्र शिवरूपता को ही देखता है। जिस तरह से एक योग्य स्वर्णकार की पैनी दृष्टि बीसों प्रकारों के अलंकारों में एकमात्र स्वर्ण की ही शुद्धि के स्तरों की दशाओं को देखा करती है, अलंकारों के बाह्य आकारों की ओर उसकी अवधान दृष्टि जाती ही नहीं, उसी तरह से ऐसा योगी सांसारिक विषयों के बाह्य आकार की ओर अपने अवधान को न लगाता हुआ सर्वत्र एकमात्र शुद्ध और परिपूर्ण शिवता को ही अपने अवधान की दृष्टि से देखा करता है। इस प्रकार से देखे जाने वाले अद्वैत को आ. अभिवनगुप्त के पिता आ. नरसिहंगुप्त ने प्रत्यक्षाद्वैत कहा है। प्रत्यभिज्ञा ;-

पहले जाने हुए, पर आगे विस्मृत हुए अपने परिपूर्ण ऐश्वर्ययुक्त संविदात्मक शुद्ध स्वरूप का पुनः स्मरणात्मक ज्ञान। परमेश्वर अपने स्वातंत्र्य से अपने ही आनंद के लिए जीव रूप में प्रकट होता हुआ अपने वास्तविक स्वरूप और स्वभाव को भुला डालता है। ऐसी अवस्था में आने के अनंतर जीव को जब कभी पुनः अपने परिपूर्ण आनंदात्मक शुद्ध स्वरूप की पहचान हो जाती है तो उसे प्रत्यभिज्ञा कहते हैं। समस्त व्यावहारिक ज्ञान बहिर्मुखी होता है, परंतु प्रत्यभिज्ञा अपने अंतर्मुखी स्वस्वरूप का साक्षात्कार करवाने वाली होती है। यही इसकी प्रतीपता है जो प्रति उपसर्ग से द्योतित होती है। प्रत्यय;-

चित्त की दो अवस्थाएँ हैं – ज्ञात या लक्षित अवस्था तथा अज्ञात या अलक्षित अवस्था। ज्ञात अवस्था प्रत्यय कहलाती है। चूंकि चित्त -वृत्तियाँ सदा ही ज्ञात रहती हैं , अतः वृत्ति प्रत्यय कहलाती है। संस्कार अलक्षित अवस्था में रहते हैं, अतः वे प्रत्ययात्मक नहीं हैं। विषयाकार चित्तवृत्ति का जो अनुभवांश है, उसके लिए विशेषतः प्रत्यय शब्द का प्रयोग होता है, जैसा कि 1/11 सूत्र के व्यासभाष्य से ज्ञात होता है। प्रत्यय संस्कारजनित होता है और संस्कार न रहने पर प्रत्यय उत्पन्न नहीं होते हैं। कारण के अर्थ में ‘प्रत्यय’ शब्द का प्रयोग कई योगसूत्रों में मिलता है ।

प्रत्ययैकतानता;-

प्रत्ययों की एकतानता ध्यान का स्वरूप है। प्रत्यय = ध्येयरूप आलम्बन से संबन्धित चित्तवृत्ति; एकतानता = एकाग्रता = सदृश प्रवाह। आलम्बन संबन्धी वृत्तियों की धारा जब इस प्रकार अखण्ड प्रतीत हो मानो एक ही वृत्ति उदित हुई है – तब वह एकतानता है – ऐसा पूर्वाचार्यों का कहना है।

प्रत्यवमर्श ;-

अपने शुद्ध एवं परिपूर्ण स्वरूप का विमर्श। अपने परिपूर्ण अहं के बारे में किया गया परामर्श। शिवशक्ति की परिपूर्ण सामरस्यात्मक अपनी संविद्रूपता का विमर्शन। अह्मात्मक असांकेतिक पर परामर्श। (तं.आ. 3-235; वही वि.पृ. 224)। व्यवहार में अवमर्श प्रायः बाह्य विषयों का या अधिक से अधिक सुख दुःख आदि आभ्यंतर भावों का ही हुआ करता है। जैसे यह नील है, यह पीत है, मैं सुखी हूँ, मुझे आश्चर्य हो रहा है इत्यादि। परंतु चेतना की अंतर्मुखी गति से उसे उल्टा (प्रतीय) अपने ही स्वरूप का अहंरूपतया भी विमर्शन होता ही रहता है। इसी अंतर्मुखी स्वात्म विमर्शन को प्रत्यवमर्श कहते हैं। प्रत्याहार;-

अष्टांग योग में प्रत्याहार का स्थान पंचम है; षडंग योग की जो गणना मिलती है, उसमें भी प्रत्याहार गिना जाता है। कई योगग्रन्थों में प्रत्याहार को ‘विषयों से इन्द्रियों को प्रयत्नपूर्वक हटा लेना’ कहा गया है। इस ‘हटा लेना’ मात्र को पतंजलि ने प्रत्याहार नहीं कहा। उनके अनुसार ‘शब्दादि विषयों से चित्त जब प्रतिनिवृत्त होता है जब इन्द्रियों के भी निवृत्त होने पर उनकी चित्त-स्वरूप के अनुकरण-सदृश जो अवस्था होती हैं वह प्रत्याहार है (2/54)। अनुकरण-सदृश कहने का गूढ़ अभिप्राय है। व्याख्याकारगण कहते हैं कि जिस प्रयत्न से चित्त निरुद्ध होता है, उससे इन्द्रियाँ भी निरुद्ध होती हैं, इस प्रकार निरोध-अंश में चित्त और इन्द्रियों में समता है। चित् निवृत्त होकर ध्येय विषय का अवलंबन करता है, पर इन्द्रियाँ विषय-निवृत्त होने पर भी ध्येय का अवलंबन नहीं करतीं – यह दोनों में भेद है। इस समता एवं भेद के कारण ही पतंजलि ने 2/54 सूत्र में ‘इव’ (अर्थात् ‘स्वरूपानुकार की तरह’) का प्रयोग किया है। प्रत्याहार के दृढ़ अभ्यास से इन्द्रियों की वश्यता पूर्णमात्रा में होती है।

प्रथमकल्पिक;-

योगियों के चार प्रकारों में यह प्रथम प्रकार है (द्र. व्यासभाष्य 3/51)। प्रथमकल्पिक वह योगाभ्यासी है जिसमें अध्यात्मज्ञान अर्थात् योगाभ्यास से उत्पन्न अत्नर्दृष्टि, का आरम्भ मात्र हुआ है। कहीं-कहीं प्राथमकल्पिक पाठ भी मिलता है।

प्रधान ;-

सत्त्व-रजः-तमः नामक तीन गुणों के समुदाय को अर्थात् उनकी साम्यावस्था को ‘प्रधान’ कहा जाता है – ‘प्रधीयतेस्मिन् इति प्रधानम्’ – सभी व्यक्त अनात्म वस्तु इसमें अवस्थित हैं, अतः यह प्रधान कहलाता है। गुणों का यह साम्यावस्था-रूप प्रधान, अलिंग, अव्यक्त आदि नामों से भी अभिहीत होता है। (वैषम्यावस्थ त्रिगुण के लिए प्रधान शब्द का व्यवहार नहीं होता)। प्रधान परार्थ है अर्थात् पुरुष के लिए प्रवर्तित होता है; यह हेतुहीन, परिणामी -नित्य, सर्वव्यापी, एकसंख्यक, अनाश्रित, उपादानकारणशून्य, निरवयव तथा स्वतन्त्र है – गुणसाम्यरूप प्रधान किसी चेतन के अधीन नहीं हैं। इस प्रधान की स्थिति एवं गति नामक दो अवस्थाएँ हैं । प्रधानजय;-

प्रधानजय नामक सिद्धि का उल्लेख योगसूत्र में है। अष्ट प्रकृति एवं सोलह विकारों पर आधिपत्य करना ही प्रधानजय है। प्रधानजय का नामान्तर प्रधानवशित्व है जिसका उल्लेख व्यासभाष्य में हुआ है। इस विभूति से कामनाओं की समाप्ति हो जाती है और विषयों के प्रति कोई आकर्षण नहीं रह जाता। काय एवं इन्द्रियों का यथेच्छ् निर्माण भी इस विभूति के कारण ही हो सकता है । प्रधानजयी जीव का उल्लेख व्यासभाष्य में है। अपने सर्ग काल में अर्थात् जिस ब्रहमाण्ड में वे हैं उस ब्रहमाण्ड के स्थितिकाल में, ये प्रधानजयी जीव अपनी इच्छा के अनुसार गुणत्रय को प्रवृत करा सकते हैं – ऐसा व्याख्याकारगण कहते हैं।

प्रबुद्ध;-

02 FACTS;-

1-जब दे सत्त्व-रजः-तमः नामक तीन गुणों के समुदाय को अर्थात् उनकी साम्यावस्था को ‘प्रधान’ कहा जाता है – ‘प्रधीयतेस्मिन् इति प्रधानम्’ – सभी व्यक्त अनात्म वस्तु इसमें अवस्थित हैं, अतः यह प्रधान कहलाता है। गुणों का यह साम्यावस्था-रूप प्रधान, अलिंग, अव्यक्त आदि नामों से भी अभिहीत होता है। (वैषम्यावस्थ त्रिगुण के लिए प्रधान शब्द का व्यवहार नहीं होता)। प्रधान परार्थ है अर्थात् पुरुष के लिए प्रवर्तित होता है; यह हेतुहीन, परिणामी -नित्य,सर्वव्यापी,एकसंख्यक,अनाश्रित,उपादानकारणशून्य, निरवयव तथा स्वतन्त्र है – गुणसाम्यरूप प्रधान किसी चेतन के अधीन नहीं हैं। इस प्रधान की स्थिति एवं गति नामक दो अवस्थाएँ हैं प्रमाणसम्बधी विचार सांख्ययोग का एक मुख्य विषय है। प्राचीनतम ग्रन्थों (जैसे षष्टितन्त्र) में प्रमाण सम्बन्धी जो विचार था, वह उन ग्रन्थों का नाश हो जाने के कारण जाना नहीं जा सकता। तत्त्वसमास-सूत्र में ‘त्रिविधं प्रमाणम्’ इतना ही कहा गया है; इसकी व्याख्याएँ भी अर्वाचीन हैं तथा भिक्षु आदि की व्याख्या का ही अनुसरण करती हैं। योगसूत्र , सांख्यकारिका तथा सांख्यसूत्र में प्रमाण -सम्बन्धी जो सांख्यमत हैं, वह टीकाकारों की दृष्टि के अनुसार यहाँ संक्षेपतः दिखाया जा रहा है। प्रमेय पदार्थों की सिद्धि (सत्ता का निश्चय) प्रमाण से होती है – यह माना जाता है । प्रमाण के विषय में सूक्ष्मदृष्टि से विचार वाचस्पति ने तत्त्वकौमुदी -टीका में किया है। प्रमा का जो करण है, वह प्रमाण है। यह प्रमा (सम्यक्ज्ञान) दो प्रकार का है – मुख्य तथा गौण। गौण प्रमा इन्द्रिय अर्थ सन्निकर्षजन्य होती है। यह असन्दिग्ध, अविपरीत एवं अनधिगतविषयक चित्तवृत्ति है।

2-मुख्य प्रमा को पौरुषेय बोध कहते हैं, जो चित्तवृत्ति का फलभूत है; यह पौरुषेयबोध पुरुष में उपचरित होता है, यद्यपि यह भी बुद्धि की ही वृत्ति है। गौण प्रमा का करण है सन्निकर्षयुक्त इन्द्रिय; उसी प्रकार मुख्य प्रमा का करण है – चित्तवृत्ति। सांख्यकारिका एवं योगसूत्र में चित्तवृत्ति -विशेष को ही प्रमाण माना गया है। यह प्रमाणरूप चित्तवृत्ति अध्यवसाय ही है; युक्तिदीपिका के अनुसार यह प्रमाण का प्रमारूप फल पुरुषाश्रित है। अनधिगत अर्थ का अवधारण प्रमा है; यह बुद्धि – पुरुष दोनों का धर्म भी हो सकता है, अथवा किसी एक का। द्र. सांख्यसूत्र 1/87। इस सूत्र की व्याख्या में भाष्यकार ने उपर्युक्त दोनों प्रकार की प्रमा का उल्लेख किया है तथा इन्द्रियसन्निकर्ष को गौण प्रमाण एवं बुद्धिवृत्ति को मुख्यप्रमाण कहा है। भिक्षु चूंकि इन्द्रिय-सन्निकर्ष को गौण प्रमाण कहते हैं; अतः चक्षु आदि इन्द्रियाँ उनके मत में परम्परया ही प्रमाण हैं। सांख्यकारिका की माठरवृत्ति, गौडपादभाष्य, जयमङ्गला-टीका में प्रमाण पर साधारण बातें कही गई हैं। युक्तिदीपिकाकार कहते हैं कि प्रमाण वस्तुतः एक है; एक ही बुद्धिवृत्तिरूप प्रमाण उपाधिभेद से तीन प्रकार की हो जाती है। योगसूत्र की व्याख्या में वाचस्पति ने प्रमा -प्रमाण के विषय में जो कहा है, वह तत्त्वकौमुदी में कथित मत ही है; सांख्यभाष्य में प्रतिपादित मत ही योगसूत्रीय भिक्षुटीका में मिलता है। प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम के भेद से यह प्रमाण त्रिविध है । उपमान, अर्थापत्ति, संभव, अभाव, ऐतिह्य आदि प्रमाणों का अन्तर्भाव इन तीन प्रमाणों में हो जाता है, जैसा कि सांख्यकारिका की व्याख्या में व्याख्याकारों ने दिखाया है। प्रमाण चूंकि अध्यवसायरूप है, अतः सभी प्रकार के जीवों में प्रमाण -रूप चित्तवृत्ति है; भले ही हमारी लौकिक दृष्टि में सभी प्राणियों में विद्यमान प्रमाणवृत्ति का स्फुट ज्ञान न होता हो।

प्रमाण ;-

1. देखिए सूर्य। 2. लौकिक – उस ऐंद्रियिक संवेदन, मानस बोध, अनुमान, शाब्द बोध आदि वस्तु को व्यवहार में प्रमाण कहते हैं जिसके द्वारा किसी प्रमेय के स्वरूप की व्यवस्था हो जाए कि यह अमुक वस्तु है या उसके स्वभाव की व्यवस्था हो जाए कि यह ऐसी या वैसी वस्तु है। प्रमाण रूप ज्ञान क्षणिक होता है। उसका प्रति क्षण उदय और लय होता रहता है। उसके संस्कार प्राणी में अंकित होकर रहते हैं। एक एक प्रमाण रूप ज्ञान का विषय एक एक वस्तु होती है जिसके लिए एक एक शब्द का प्रयोग किया जाता है। प्रमाण तभी तक प्रमाणरूपतया स्मृति के क्षेत्र में ठहरता है जब तक उसकी अपनी मान्यता किसी और बलवान् प्रमाण से बाधित न होने पाए। बाधित हो जाने पर उसकी प्रमाणता पूर्वकाल से ही उखड़ जाती है। प्रमाण वस्तु के और उसकी विशेषताओं के प्रकाश को कहते हैं और उनके विमर्श को प्रमा कहते हैं। माया क्षेत्र में ही प्रमाण का प्रशासन चलता है। माया से ऊपर जो परमेश्वर रूप मूल तत्त्व है वह कभी भी लौकिक प्रमाणों का विषय नहीं बन सकता है। वह तो स्वयं अपने ही प्रकाश से प्रकाशमान बना रहता है। शास्त्रज्ञान और योगाभ्यास भी उसे प्रकाशित नहीं कर सकते। ये उपाय साधक को उस स्थिति पर पहुँचा सकते हैं जहाँ वह स्वयं अपने वास्तविक स्वभावभूत परमेश्वरता के रूप में स्वयं अपने ही प्रकाश से चमकता रहता है। प्रमाण संकर;-

एक विषय में अनेक प्रमाणों का सांकर्य होना अर्थात् मिल जाना प्रमाण संकर है। जैसे, साक्षात्कार के प्रति शब्द को भी जनक मानने में प्रत्यक्ष और शब्द दोनों प्रमाणों का संकर हो जाता है। एक दूसरे के अभाव में रहने वाले दो धर्मों का किसी एक स्थान में समावेश हो जाना संकर है। इसके अनुसार प्रत्यक्ष और शब्द इन दोनों प्रमाणों का सांकर्य हो जाता है। क्योंकि अत्यंत असत् आकाशपुष्प आदि अर्थ में प्रत्यक्ष प्रमाण की प्रवृत्ति नहीं है, किन्तु शब्द प्रमाण वहाँ भी ज्ञान का जनक होता है, जैसा कि “अत्यंतासत्यापि ह्यर्थे ज्ञानं शब्दः करोतिहि” ऐसा कहा गया है (एवं शब्द प्रमाण का प्रयोग हुए बिना भी प्रत्यक्ष प्रमाण से घटादि वस्तु का ज्ञान होता है। किन्तु ‘तत्त्वमसि’ वाक्य स्थल में शब्द प्रमाण प्रयुक्त शाब्दत्व धर्म और प्रत्यक्ष प्रमाण प्रयुक्त साक्षात्कारत्व धर्म इन दोनों का एक जगह समावेश स्वीकार करने से प्रमाण संकर हो जाता है।

प्रमाता ;-

शैव और शाक्त दर्शन में प्रमाता के सात भेद किये गये हैं। ये हैं – शिव, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर, मन्त्र, विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल। शिव और शक्ति तत्त्व मिलकर शिव प्रमाता का रूप धारण करते हैं। इसकी स्थिति राजा के समान है। सदाशिव मन्त्रमहेश्वर, ईश्वर मन्त्रेश्वर और शुद्धविद्या मन्त्र के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनकी स्थिति अधिकारी राजपुरुष की सी है। विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल जीवों पर ये शिव प्रमाता रूपी राजा के प्रतिनिधि होकर शासन करते हैं। मायीय, कार्म और आणव- ये तीन प्रकार के मल माने गये हैं। इनमें से मायीय मल से आवृत विज्ञानाकल, दो मलों से आवृत प्रलयाकल और तीनों मलों से आवृत सकल प्रमाता कहे जाते हैं। ये सभी भेद परिमित प्रमाता के हैं। प्रथम चार भेद शुद्धि सृष्टि के और अन्तिम तीन अशुद्ध सृष्टि के अन्तर्गत हैं। अशुद्ध सृष्टि के प्रमाताओं को ही अपने मलीय आवरणों को हटाने के लिये उपायों का सहारा लेना पड़ता है।

  विरुपाक्षपंचाशिका की 41-44 कारिकाओं में अप्रबुद्ध, प्रबुद्धकल्प, प्रबुद्ध, सुप्रबुद्धकल्प और सुप्रबुद्ध नामक पाँच प्रकार के प्रमाताओं का विवेचन किया गया है। स्पन्दकारिका में भी अप्रबुद्ध, प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध प्रमाताओं का स्वरूप वर्णित है। 

दर्शन : शाक्त दर्शन

प्रमाता (तृ) (पारमार्थिक);-

समस्त प्रमाओं में स्वातंत्र्यपूर्वक विहरण करने वाला तथा उनके उदय और लय को करने वाला, समस्त प्रमारूपी नदियों का एकमात्र विश्रांति स्थान रूपी समुद्रकल्प परिपूर्ण संवित्स्वरूप परमेश्वर। प्रमातृ पद में तृ प्रत्यय कर्तृत्व का द्योतक है और कर्तृत्व स्वातंत्र्य का नाम है। परिपूर्ण स्वातंत्र्य एकमात्र परमेश्वर में ही है। अतः वही वस्तुतः एकमात्र प्रमाता है। शेष सभी लौकिक तथा अलौकिक प्रमातृगण उसी के आकार भेद हैं। प्रमाता (तृ) (व्यावहारिक);-

शुद्ध एवं परिपूर्ण संवित् ही जब अपने स्वातंत्र्य से प्रमाण तथा प्रमेय के भेद का दहन करने वाली चिद्रूप वह्नि (देखिए) का रूप धारण करती है तो उस अवस्था में पहुँचने पर उसके इस परिमित रूप को ही प्रमाता कहते हैं। शैवदर्शन में सात प्रकार के प्रमाता माने गए हैं : अकल, मंत्रमहेश्वर, मंत्रेश्वर, मंत्र (विद्येश्वर) विज्ञानाकल, प्रलयाकल तथा सकल। (यथास्थान देखिए)। ये प्रमाता प्रमेयों को विविध दृष्टियों से देखते हैं, जानते हैं और उनके विषय में निश्चय करते हैं। मंत्र, मंत्रेश्वर आदि उनका विमर्शन मात्र करते हैं। दर्शन, निश्चय आदि माया के क्षेत्र में ही होते हैं। शुद्ध विद्या में और शक्ति क्षेत्र में केवल विमर्शन ही होता है। प्रमाद ;-

योगसूत्रोक्त नौ अन्तरायों में प्रमाद एक है। भाष्यानुसार इसका स्वरूप है – समाधि के साधनों का अभावन (= न करना)। ‘प्रमाद’ का शाब्दिक अर्थ है – प्रच्युति। अतः प्राप्त कर्त्तव्य से विमुख होना ही प्रमाद है। विरोधी विषय का संग ही मुख्यतया प्रमाद का हेतु होता है। चेष्टा न करने पर भी समाधि स्वतः सिद्ध हो जायेगी – यह समझकर यमादि अंगों का अभ्यास न करना योगक्षेत्र का प्रमाद है। आत्मज्ञान -प्राप्ति में प्रमाद कितना बाधक है, यह मुण्डक उप. से जाना जाता है।

प्रयत्नशैथिल्य;-

जिन उपायों से आसन का अभ्यास दृढ़ होता है, उनमें से यह एक है। आसन में बैठकर शरीर के अवयवों को ढीला छोड़ देना ही इस अभ्यास का स्वरूप है। इसमें यह देखना पड़ता है कि इस शैथिल्य के कारण शरीर में टेढ़ापन न हो जाए। आसन में बैठने पर शरीर के विभिन्न अंगों में जो पीड़ा या अस्वस्थता का बोध होता है।वह प्रयत्नशैथिल्य से नष्ट हो जाता है।

प्रलय;-

पारमेश्वरी लीला की वह भूमिका, जिसमें समस्त बाह्य प्रपंच माया में पूर्णतया विलीन हो जाता है। इस प्रलय के करने वाले अधिकारी भगवान् अनंतनाथ हैं। प्रलय अवांतर पारमेश्वरी लीला की वह भूमिका, जिसमें सारी त्रिगुणात्मक सृष्टि, समस्त कार्यतत्त्व और करण तत्त्व मूल प्रकृति में विलीन हो जाते हैं।इस प्रलय को भगवान् श्रीकंठनाथ करते हैं। प्रलय महा पारमेश्वरी लीला की वह भूमिका, जिसमें सदाशिव तत्त्व तक का समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म प्रपंच शक्ति में विलीन हो जाता है तथा अंततः शक्ति का भी शिव में लय हो जाता है। इस प्रलय को अनाश्रित शिव ही स्वयं करते हैं। प्रलयाकल;-

प्रलयकेवली। प्रलयकाल तक ही अकल अर्थात् कला से और उसके विस्तार से रहित रहने वाले प्राणी। सुषुप्ति में ठहरने वाले प्राणी। इन प्राणियों में आणवमल के दोनों प्रकारों की अभिव्यक्ति होने के कारण इनके प्रकाशात्मक स्वरूप तथा विमर्शात्मक स्वभाव, दोनों में ही संकोच आ जाता हे। परिणामस्वरूप ये प्राणी शून्य, प्राण, बुद्धि आदि जड़ पदार्थे में से किसी एक को अपना वास्तविक स्वरूप समझने लगते हैं। अपने क्रिया स्वातंत्र्य के अत्यधिक संकोच हो जाने के कारण ये शून्य गगन की जैसी स्थिति में तब तक सुषुप्त हो कर पड़े रहते हैं जब तक भगवान् श्रीकंठनाथ इन्हें नई प्राकृत सृष्टि के समय जगाते नहीं। इनमें कार्ममल भी सुषुप्त होकर ही रहता है। सवेद्य सुषुप्ति में रहने वाले प्राणियों में मायीय मल का भी प्रभाव रहता है। ( प्रवाह पुष्टि भक्ति ;-

केवल भगवान् के लिए उपयोगी क्रियाओं में निरत जनों की वह भक्ति प्रवाह पुष्टि भक्ति है, जो अहन्ता ममता रूप संसार प्रवाह से मिश्रित हो। इसके उदाहरण निमि श्रुतिदेव प्रभृति हैं।

प्रवृत्ति त्रिगुण के प्रसंग में प्रवृत्ति का अर्थ है – ‘क्रिया’, जो रजोगुण का शील है (सांख्यकारिका 12)। योगसूत्र (2/18) में शब्दतः क्रिया को रजोगुण का शील कहा गया है। इस क्रियास्वभाव के कारण ही रजोगुण को ‘प्रवर्तक’, ‘उद्घाटक’ कहा जाता है। सांख्यकारिका (13) में इसको ‘उपष्टम्भक’ कहा गया है, जिसका अर्थ है – प्रवर्तक। प्रवर्तन के अर्थ में ‘प्रवृत्ति’ का अर्थ ‘परिणत होना’, ‘परिणाम प्राप्त करना’ है – ‘इच्छा’, ‘संकल्प’ आदि के साथ इस प्रवृत्ति का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। ‘विषयों की ओर अन्तःकरण का जाना’ इस अर्थ में भी ‘प्रवृत्ति’ शब्द प्रयुक्त होता है। यह इच्छा के बाद उत्पन्न होती है जो चेष्टाविशेष है। कुछ सांख्याचार्यों का मत है कि जिस प्रकार बुद्धि का धर्म है ‘प्रख्या’ (विज्ञानरूप वृत्ति), उसी प्रकार संकल्पक मन का धर्म है, प्रवृत्ति, जो पाँच प्रकार की है – संकल्प, कल्पना, कृति, विकल्पन एवं विपर्यस्त -चेष्टा।

प्राकाम्य ;-

अणिमादि अष्ट सिद्धियों में एक । इसका साधारण लक्षण है – इच्छा का अनभिघात (= बाधा का अभाव), पर इसका वस्तुतः स्वरूप है वह संकल्पशक्ति जिससे किसी एक प्रकार की वस्तु का अन्य प्रकार की वस्तु की तरह उपयोग किया जा सके, उदाहरणार्थ, कठिन भूमि का व्यवहार तरल जल की तरह करना – भूमि में जल की तरह उन्मज्जन -निमज्जन करना। शास्त्र में श्रुत स्वर्गादि में तथा लोकदृष्ट जलादि में बाधाहीन गति का होना प्राकाम्य है – यह कोई-कोई कहते हैं (द्र. योगसारसंग्रह, अ. 3)। प्राकाम्य के स्थान पर ‘प्राकाश्य’ सिद्धि का उल्लेख भी क्वचित् मिलता है। यह मत पातंजल संप्रदाय के आचार्यों में दृष्ट नहीं होता। प्राण ;-

1-प्राण’ के विषय में सांख्ययोगीय ग्रन्थों में विशद विवेचन नहीं मिलता। हठयोग आदि के ग्रन्थों में प्राण के अवान्तर भेदों के व्यापार आदि के विषय में बहुविध बातें मिलती हैं, यद्यपि प्राण के मूलस्वरूप को जानने में ये ग्रन्थ सहायक नहीं हैं।किसी के अनुसार प्राण शरीरान्तर्गत वायुविशेष है और विभिन्न अङ्गों में रहकर विभिन्न प्रकार का व्यापार करने के कारण उनके पाँच भेद हैं। अन्य व्याख्याकार कहते हैं कि प्राण अन्तःकरण की वृत्तिविशेष हैं, जो शरीर को धारण करने में सहायक हैं और स्थानभेद से उनके पाँच भेद होते हैं।

2-यह प्राण वायु-विशेष नहीं है। वायु और उसकी क्रिया प्राण नहीं हैं। यह मत ही संगत प्रतीत होता है, क्योंकि वायुभूत या भौतिक वायु से पृथक् करके ही प्राण का प्रतिपादन सर्वत्र किया गया है। वायुवत् संचार के कारण ही प्राण को ‘वायु’ कहा जाता है। एक मत यह भी है कि ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रिय की तरह प्राण भी बाह्य इन्द्रिय है, जिसका विषय है – बाह्य विषय को शरीररूप से व्यूहित करना। यह प्राण तमः प्रधान है; ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रिय क्रमशः सत्वप्रधान एवं रजःप्रधान हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्वाचार्यों ने चूंकि प्राण को वृत्तिविशेष माना था, अतः पृथक् तत्व के रूप में प्राण की गणना नहीं की गई। विज्ञान भिक्षु ने यह भी कहा है कि महत्तत्त्व की क्रियाशक्ति प्राण है और यह निश्चयशक्ति -रूप बुद्धि से पहले उत्पन्न होता है। प्राण के पाँच भेदों (प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान) के व्यापार संबंधित प्रविष्टियों के अंतर्गत बताए गए हैं।

प्राण ;-

1. प्राण, अपान आदि पाँच प्राणों में से प्रथम प्राण। विषयों का उत्सर्ग करने वाली जीवनवृत्ति जो जाग्रत् और स्वप्न दशाओं में चलती रहती है। हृदय से उठकर बाह्य द्वादशांत तक संचरण करने वाली प्रश्वास वायु।2. खात्मा अर्थात् शून्य प्रमाता भेद की ओर उन्मुख होता हुआ जिस प्रथम परिणाम को प्राप्त होता है उसे ही प्राण, स्पंदी, ऊर्मिक, स्फुरता आदि कहा जाता है। सृष्टि क्रिया के प्रति उन्मुख बने हुए संवित् तत्त्व के प्रथम परिणाम को प्राण कहा जाता है। इसे प्राणन शक्ति और जीवन शक्ति भी कहा जाता है इसी शक्ति से युक्त पदार्थ को प्राणी कहा जाता है। प्राण, अपान आदि पाँचों प्राणों में यही प्राणशक्ति स्पंदित होती है। इस प्रकार इन पाँच प्राणों को व्याप्त करके ठहरने वाला मूल प्राण। यह जीवनशक्ति अकल से लेकर सकल तक सभी प्राणिवर्गो में भिन्न भिन्न प्रकारों से जीवन व्यापारों को चलाती है। प्राण कुण्डलिनी;-

अनच्क कला की और आणव उपाय की व्याख्या के प्रसंग में प्राण शक्ति के संबन्ध में कहा जा चुका है। इसको कुण्डलिनी इसलिए कहते हैं कि मूलाधार स्थित कुण्डलिनी की तरह इसकी भी आकृति कुटिल होती है। जिस प्राण वायु का अपान अनुवर्तन करता है, उसकी गति इकार की लिखावट की तरह टेढ़ी-मेढ़ी होती है। अतः प्राण शक्ति अपनी इच्दा से ही प्राण के अनुरूप कुटिल (घुमावदार) आकृति धारण कर लेती है। प्राण शक्ति की यह वक्रता (कुटिलता=घुमावदार आकृति) परमेश्वर की स्वतन्त्र इच्छा शक्ति का ही खेल है। प्राण शक्ति का एक लपेटा वाम नाड़ी इडा में और दूसरा लपेटा दक्षिण नाडी पिंगला में रहता है। इस तरह के उसके दो वलय (घेरे) बनते हैं। सुषुम्ना नाम की मध्यनाडी सार्ध कहलाती है। इस प्रकार यह प्राण शक्ति भी सार्धत्रिवलया है। वस्तुतः मूलाधार स्थित कुण्डलिनी में ही प्राण शक्ति का भी निवास है, किन्तु हृदय में उसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति होने से ब्राह्मणवशिष्ठ न्याय से उसका यहाँ पृथक उल्लेख कर दिया गया है। इसका प्रयोजन अजपा (हंसगायत्री) जप को सम्पन्न करना है। इस विषय पर विज्ञानभैरव के 151 वें श्लोक की व्याख्या में पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।

  भर-पेट भोजन-पानी पाने से मोटी अक्ल के आरामतलबी आदमी का शरीर की नहीं, प्राण शक्ति भी मोटी हो जाती है। बाद में सद्गुरु का उपदेश पाकर जब वह योगाभ्यास में लग जाता है, कुम्भक प्रभृति प्राणायामों का अभ्यास करता है, तो धीरे-धीरे उनके शरीर के मोटापे के साथ ही प्राण शक्ति भी कृश होती जाती है, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाती है। शोत्र, चक्षु, नासिका, मुख, उपस्थ प्रभृति प्राण और अपान आदि वायुओं के निकलने के मार्गों को रोक देने पर वायु की गति ऊपर की ओर उठने लगती है। मूलाधार में अथवा हृदय में विद्यमान प्राण शक्ति पद्धति के अनुसार सुषुम्ना मार्ग के अथवा मध्यदशा के विकास के कारण द्वादशान्त तक जाते-जाते अत्यत्न सूक्ष्म होकर अन्त में प्रकाश में विलीन हो जाती है। आधार से लेकर द्वादशान्त पर्यन्त क्रमशः धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ रही इस प्राण शक्ति के द्वादशान्त में प्रविष्ट हो जाने पर स्वात्मस्वरूप का अनुभव होने लगता है। योगशास्त्र की परिभाषा में इसको पिपीलस्पर्श वेला कहा जाता है, जिसमें कि प्राण के ऊपर उठते समय जन्माग्र से लेकर मूल, कन्द प्रभृति स्थानों का स्पर्श होने पर उसी तरह की अनुभूति होती है, जैसी कि देह पर चींटी के चलने से होती है। इसी अवस्था में योगी इसकी परीक्षा कर पाते हैं कि प्राण आज अमुक स्थान से चल कर अमुक स्थान तक उठा। इस स्थिति तक पहुँच जाने पर योगी का चित्र परम आनन्द से भर जाता है और वह इसी अन्तर्मुख वृत्ति में रम जाता है।..शाक्त दर्शन  

प्राणलिंगार्चना ;-

02 FACTS;-

1-हृदय की द्‍वादश कमल कर्णिका में ज्योतिस्वरूप से विराजमान शिवविग्रह को ‘प्राणलिंग’ कह गया है और उसकी अर्चना ही ‘प्राणलिंगार्चना’ कहलाती है। इस ज्योतिर्मय प्राणलिंग के भावना-गम्य होने से उसकी अर्चना भी भावनामय वस्तुओं से ही की जाती है। वह इस प्रकार है- प्राणलिंग के अभिषेक के लिये क्षमा (सहनशीलता) ही जल है, नित्यानित्य वस्तुओं का विवेक ही उसे पहनाने का वस्‍त्र कहलाता है। सर्वदा सत्य बोलना ही उस लिंग के अलंकरणीय आभरण है। वैराग्य यही उसे पहनाने की पुष्पमाला है। चित्‍त के शांत हो जाने पर समाधि का लग जाना गंध-समर्पण है। निरहंकार-भावना ही अक्षत है। दृढ़ श्रद्‍धा ही धूप और आत्मज्ञान हो जाना ही दीप है। भ्रांति का निवृत्त हो जाना ही नैवेद्‍य बताया गया है। लौकिक व्यवहार में मौन हो जाना ही घंटानाद कहलाता है।

2-विषय का समर्पण ही ताम्बूल है, अर्थात् प्रमेय वस्तुओं का प्रमाण रूप ज्ञान में, उस प्रमाण रूप ज्ञान का प्रमातृरूप आत्मा में और उस आत्मा का ज्योतिस्वरूप प्राणलिंग में लय का चिंतन करना ही विषय-समर्पण रूप ताम्बूल कहलाता है। यह प्रपंच शिव से भिन्‍न है, इस प्रकार की भेद-बुद्‍धि की निवृत्‍ति हो जाना ही प्रदक्षिणा है। उपासना करने वाली उस बुद्‍धिवृत्‍ति का भी अंत में उस ज्योतिर्लिंग में लय हो जाना ही नमस्कार-क्रिया है। वीरशैवदर्शन में इस उपर्युक्‍त भावनाओं से प्राणलिंग की अर्चना बताई गयी है। इसका तात्पर्य यह है कि साधक की बहिर्मुख बुद्‍धिवृत्‍तियों का निरोध होकर उसके अंतःकरण में उपर्युक्‍त सद्‍गुण, सद्‍ज्ञान और सद्‍भावनओं का उदय होना ही प्राणलिंग की अर्चना है। अतएव इस प्राणलिंग की अर्चना के लिये कोई निश्‍चित समय नहीं है। जब-जब साधक के मन में ये भावनायें उठती रहती हैं तब-तब यह प्राणलिंग अर्चना होती रहती है।

प्राणापान ;-

ऊपर हृदय से बाह्य द्वादशान्त तक जाने वाला प्राण और नीचे बाह्य द्वादशान्त से हृदय तक जाने वाला जीव नामक अपान, यह प्राण शक्ति का उच्चारण है। प्राण शक्ति इनका निरन्तर उच्चारण करती रहती है, अर्थात् प्राण और अपान के रूप में स्पन्दित होती रहती है। स्वच्छन्दतन्त्र में प्राण और अपान को प्राण शक्ति का विसर्ग और आपूरण व्यापार बताया गया है। तदनुसार प्राण का अर्थ है श्वास छोड़ना और अपान का अर्थ है श्वास लेना। पालि बौद्ध वाङ्मय में इसके लिये आनापान (आश्वास-प्रश्वास) शब्द प्रयुक्त है। किन्तु वहाँ इनके अर्थ के विषय में विवाद है। आचार्य नरेन्द्र देव अपने ग्रन्थ बौद्ध-धर्मदर्शन में आश्वास-प्रश्वास शब्द पर टिप्पणी करते हैं- विनय की अर्थकथा के अनुसार ‘आश्वास’ साँस छोड़ने को और ‘प्रश्वास’ साँस लेने को कहते हैं। लेकिन सूत्र की अर्थ कथा में दिया हुआ अर्थ इसका ठीक उल्टा है। आचार्य बुद्धघोष विनय की अर्थ कथा का अनुसरण करते हैं। उनका कहना है कि बालक माता की कोख से बाहर आता है तो पहले भीतर की हवा बाहर निकलती है और पीछे बाहर की हवा भीतर प्रवेश करती है। तदनुसार आश्वास वह वायु है, जिसका निःसारण होता है और प्रश्वास वह वायु है, जिसका कि ग्रहण होता है। सूत्र की अर्थकथा में किया हुआ अर्थ पातंजल योगसूत्र के व्यासभाष्य के अनुसार है। योगभाष्य में वायु के आचमन (ग्रहण) को श्वास और निःसारण को प्रश्वास बताया गया है।

  विज्ञानभैरव के ‘ऊर्ध्वे प्राणः’ प्रभृति श्लोक में प्राण और अपान शब्द का बुद्धघोष प्रदर्शित अर्थ ही स्वीकृत है। ऊर्ध्व और अधः शब्द का अर्थ पहले और बाद में किया जाना चाहिये। पहले प्राण बाहर निकलता है और बाद में अपान का प्रवेश होता है। अपान को जीव इसलिये कहा जाता है कि प्राण के बाहर निकलने के बाद अपान जब शरीर में पुनः प्रविष्ट होता है, तभी यह बोध हो सकता है कि शरीर में जीवात्मा विद्यमान है। अपान के प्रवेश न करने पर शरीर शव कहा जायेगा। अपान के कारण ही शरीर में जीवात्मा की स्थिति बनी रहती है, अतः स्वाभाविक है कि अपान को जीव के नाम से जाना जाय।
  स्वच्छन्दतन्त्र भी इसी स्थिति को मान्यता देता है। भगवद्गीता की श्रीधरी टीका में प्राण और अपान के लिये उच्छवास और निश्वास शब्द प्रयुक्त हैं। लोक व्यवहार में संकेत (शक्ति=समय) के अनुसार शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं। कभी-कभी वे परस्पर विरोधी अर्थों में भी प्रयुक्त होने लगते हैं। जैसा कि प्राण और अपान तथा उनके पर्यायवाची श्वास-प्रश्वास शब्दों के विषय में देखने को मिलता है। इन शब्दों का हृदय स्थित प्राण वायु और पायु स्थित अपान वायु से कोई संबंध नहीं है, किन्तु प्राण शक्ति की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से ही इनका संबंध है। प्राण शक्ति की प्राण, अपान प्रभृति पाँच या दस वृत्तियाँ भी इनसे भिन्न हैं। 

प्राणायाम ;-

02 FACTS;-

1-योग के आठ अंगों में प्राणायाम चतुर्थ है। ‘प्राणायाम’ शब्दगत ‘प्राण’ शब्द अवश्य ही श्वासवायु का वाचक है। आयाम का अर्थ निरोध है। अतः प्राणायाम का मुख्य अर्थ ‘श्वासक्रिया का रोध’ है। यह रोध योगशास्त्रीय उपाय द्वारा यदि हो तभी प्राणायाम योगांग होता है, अन्यथा नहीं। हठयोगशास्त्र एवं पातंजल योगशास्त्र में प्राणायाम की प्रक्रिया सर्वथा एकरूप नहीं है। हठयोगीय प्राणायाम प्रधानतः वक्षसंचालनपूर्वक किया जाता है; पातंजल प्राणायाम उदरसंचालनपूर्वक। नासिका के सदैव दोनों छिद्रों द्वारा रेचनपूरण करना पातंजल प्रक्रिया है; हठयोग में मुख्यतया व्यासभाष्य 2/50 में तथा अन्य योगग्रन्थों में विस्तारतः मिलता है। प्राणायामाभ्यास में शरीर को ऋजु रखना आवश्यक है – वक्ष, कण्ठ एवं शिर को एक रेखा में रखना चाहिए। प्राणायामी को मिताहार आदि कई विषयों पर ध्यान देना चाहिए। प्राणायाम यद्यपि वायु -आश्रित क्रिया है, पर इस क्रिया के माध्यम से ज्ञानविशेष का अभ्यास किया जाता था। यही कारण है कि इस अभ्यास से प्रकाश के आवरण का क्षय होता है । हठयोगीय प्राणायामों में भी अंशतः यह लाभ होता है, यद्यपि उन प्राणायामों का मुख्य लाभ शारीरिक है (हठप्राणायाम के लिए स्वामी कुवलयानन्द कृत ‘प्राणायाम’ नामक ग्रन्थ दृष्टव्य है)।

2-रेचन-पूरण-विधारण का काल शनैः-शनैः बढ़ाया जा सकता है। वायु के आगमन-निर्गमन इतनी अल्पमात्रा एवं सूक्ष्मता के साथ किए जा सकते हैं कि नासाग्रस्थित तूला भी कंपित नहीं होती। प्राणायाम का अभ्यास देश, काल और संख्या के परिदर्शन के साथ किया जाता है; इस परिदर्शन का विवरण सारतः एकतर नासापुट से रेचनपूरण किए जाते हैं। हठयोग में प्राणायाम के जिन मुख्य आठ भेदों का उल्लेख मिलता है (उज्जायी, शीतली आदि), वे पातंजल दृष्टि में व्यर्थप्राय हैं (यद्यपि शारीरिक दृष्टि से उनकी जो निजी सार्थकता है, उसके विरोध में पातंजल शास्त्र का कुछ भी कहना नहीं है)। प्राणायाम-क्रिया सर्वथा वैज्ञानिक है; यथाविधि आचरित होने पर इससे शास्त्रोक्त लाभ होते ही हैं। प्राणायाम प्रक्रिया में पूरण या पूरक का अर्थ है – नासा द्वारा धीरे-धीरे वायु का ग्रहण करना; रेचन या रेचक का अर्थ है – अत्यन्त धीरता के साथ पूरित वायु को छोड़ना। रेचन या पूरण के बाद तत्काल वायु का पूरण या रेचन न करने पर वायु का जो विधारण होता है, वह कुम्भक कहलाता है। पातंजल शास्त्र में बाह्यवृत्ति का अर्थ है – रेचनोत्तर वायु का ग्रहण न करके अवस्थित रहना; आभ्यन्तरवृत्ति का अर्थ है – पूरणोत्तर वायु का त्याग न कर अवस्थित रहना; स्तम्भवृत्ति का अर्थ है – रेचन-पूरण कर ध्यान न देकर श्वास-प्रश्वास का निरोध करना।

प्राणायाम ;-

प्राण की पूरक, कुंभक और रेचक अवस्थाएँ स्वाभाविक रूप से बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील रहती हैं। हृदय स्थित कमलकोश में प्राण का उदय होता है। नासिका मार्ग से बाहर निकल कर यह बारह अंगुल चलकर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है। यह बाह्य आकाश योगशास्त्र में बाह्य द्वादशान्त के नाम से प्रसिद्ध है। प्राण की इस स्वाभाविक गति को रेचक कहते हैं। बाह्य द्वादशान्त में अपान का उदय होता है और नासिका मार्ग से चलकर यह हृदयस्थित कमलकोश में विलीन हो जाता है। अपान की यह स्वाभाविक आन्तर गति पूरक कही जाती है। प्राण बाह्य द्वादशान्त में और अपान हृदय में क्षण मात्र के लिये स्थिर होकर बैठता है। यही प्राण की कुंभक अवस्था है। बाहर और भीतर दोनों स्थलों में निष्पन्न होने से इसके बाह्य और आन्तर ये दो भेद होते हैं। इस तरह से प्राण शक्ति की ये चार क्रियाएँ बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील हैं। अर्थात् प्राण और अपान की यह चतुर्विध गति पुरुष के प्रयत्न के बिना निरन्तर स्वाभाविक रूप से चलती रहती है। पुरुष जब अपने विशेष प्रयत्न से मध्यदशा के विकास के द्वारा क्रमशः अथवा एकदम इसकी गति को रोकता है, इस पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना चाहता है, तो प्राण और अपान की गति की यह अवरोध प्रक्रिया योगशास्त्र में प्राणायाम के नाम से जानी जाती है।

  तन्त्रशास्त्र में भूतशुद्धि और प्राण प्रतिष्ठा की विधियाँ प्रसिद्ध हैं। ‘देवो भूत्वा दैवं यजेत्’ स्वयं देवता बनकर इष्टदेव की आराधना करे, इस विधि वाक्य के अनुसार साधक अपने देह में स्थित पाप पुरुष का, मल का शोष और दाह संपन्न कर देवत्वभावना को आप्यायित करता है। वायु बीज के उच्चारण के साथ का प्राणायाम का अभ्यास करने से शोषण, अर्थात् मल का नाश हो जाता है। अग्नि बीज के उच्चारण के साथ प्राणायाम का अभ्यास करने से दाह, अर्थात् वासनाओं का भी उच्छेद हो जाता है। सलिल बीज के उच्चारण के साथ प्राणायाम का अभ्यास करने से शरीर आप्यायित हो उठता है, ज्ञानरूपी अमृत से नहाकर पवित्र हो जाता है, देवतामय बन जाता है। इस प्रकार शोषण, दाहन और आप्यायन की सम्पन्नता के लिये भी प्राणायाम की उपयोगिता तन्त्रशास्त्र में मानी गई है।..शाक्त दर्शन

प्राणोत्क्रमण दीक्षा ;-

यह दीक्षा शिष्य को सद्यः शिव के साथ एक कर देती है। शिष्य के मरणक्षण को गुरु अपने ज्ञान बल से जान लेता है। तब मरणक्षण से जराभर पहले ब्रह्मविद्या के मंत्रों का उच्चारण करते करते शिष्य के प्राणों का पादांगुष्ठ से लेकर ब्रह्मरंध्र तक क्रम से पहुँचाकर उस द्वार से उनका उत्क्रमण करा देता है। तदनंतर शिष्य की आत्मा को मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति, कंचुक आदि पाशों में से ऊर्ध्व संक्रमण करवाता हुआ ब्रह्म विद्या के उन्हीं मंत्रों की सहायता से उसे माया के भी पार ले जाकर तथा शुद्ध विद्या के क्षेत्र से पार करा कर शिवशक्ति स्वरूप परमेश्वर के साथ उसे एक कर देता है। इस दीक्षा का विधान तंत्रालोक के तीसवें आह्मिक में विस्तारपूर्वक बताया गया है। इस दीक्षा को सद्योनिर्वाणदीक्षा या समुत्क्रमणदीक्षा भी कहते हैं। प्रातिपदावस्था [-

पाशुपत साधक क एक अवस्था।पाशुपत मत के अनुसार साधक को साधना की प्रथम अवस्था में अपनी जीविका भिक्षावृत्‍ति से चलानी होती है, गुरु के चरणों में निवास करना होता है। साधना की यह अवस्था प्रातिपदावस्था या प्रथम अवस्था कहलाती है। इस अवस्था में साधक हाथों तथा भिक्षापात्र का शोधन करके, मंत्रों का उच्‍चारण करके देवता और गुरु से आदेश लेकर किसी ग्राम में किसी धर्मार्जित धन का उपयोग करने वाले गृहस्थी के घर से भिक्षा मांग कर लाए, उसे देवता को और गुरु को निवेदन करके, उनसे आदेश लेकर सारी भिक्षावस्तुओं को एक साथ मिलाकर खाए। ऐसे भिक्षाव्रत का पालन प्रातिपदावस्था में करना होता है।

प्रातिभ ;-

योगसूत्र में कहा गया है कि पुरुषज्ञान (अर्थात् बुद्धि का पुरुष-सत्ता-निश्चय अथवा बुद्धिगत पुरुष-प्रतिबिम्ब का आलम्बन) के लिए स्वार्थसंयम आवश्यक है। पुरुषज्ञान होने से पहले जिन छः सिद्धियों का आविर्भाव होता है, उनमें प्रातिभ प्रथम सिद्धि है । इस सिद्धि से सूक्ष्म, व्यवहित, दूरस्थ, अतीत एवं अनागत वस्तुओं का ज्ञान होता है। किसी-किसी के अनुसार 3/36 सूत्रोक्त प्रातिभ आदि सिद्धियाँ पुरुष -साक्षात्कार के बाह्य फल हैं जो कामना के बिना भी उत्पन्न होती हैं। एक अन्य प्रातिभ ज्ञान भी है जो विवेकज ज्ञान का पूर्व रूप है। इस प्रातिभ नामक सिद्धि से अतीतानागतज्ञान, पूर्वजातिज्ञान, सर्वभूतरुतज्ञान आदि भी सिद्ध होते हैं, यह 3/33 का तात्पर्य है।

प्रातिभ ज्ञान;-

बिना शास्त्र अध्ययन के, बिना दीक्षा के और बिना योगाभ्यास के स्वयमेव अनायास ही उदय होने वाला ज्ञान। ऐसा ज्ञान प्रायः मध्य तीव्र शक्तिपात का पात्र बने हुए साधक में स्वयमेव उदित होता है। उसे समय दीक्षा, अभिषेक, याग, व्रत आदि की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। उसे न तो शिष्य ही कहा जा सकता है और न गुरु ही। उसके लिए एक और ही परिभाषा है – ‘शिष्ट’। कभी तो प्रातिभ ज्ञान सद्यः सुदृढ़ हो जाता है, परंतु कभी गुरु और शास्त्र की सहायता से ही दृढ़ता को प्राप्त कर जाता है। प्रातिभ ज्ञान के पात्र के विषय में यह माना जाता है कि शिव की शक्तियाँ उसे स्वयमेव उत्कृष्ट ज्ञान की दीक्षा देती हैं। उसी से उनमें ज्ञान का उदय हो जाता है। परंतु वह दीक्षा एक अंतः प्रेरणामयी दीक्षा होती है, कोई वैधी दीक्षा नहीं होती है। अतः उन्हें भी उस बात का कुछ पता ही नहीं चलता है। प्रान्तभूमिप्रज्ञा;-

समाधिजात प्रज्ञा के एक उत्कृष्ट रूप का नाम ‘प्रान्तभूमि’ है। (‘प्रान्त है भूमि जिसकी’ वह प्रान्तभूमि है; प्रान्त = चरम, भूमि (= अवस्था)। यह प्रज्ञा सात प्रकार की है जैसा कि योगसूत्र 2/27 के भाष्य में विस्तार के साथ दिखाया गया है। इस प्रज्ञा के दो भाग हैं – कार्यविमुक्ति तथा चित्तविमुक्ति। प्रथम भाग में चार प्रकार की प्रज्ञा होती है, जो यथाक्रम हेय, हेयहेतु हान और हानोपाय से सम्बन्धित हैं (हेय आदि शब्द द्रष्टव्य)। द्वितीय चित्तविमुक्ति भाग में तीन प्रकार की प्रज्ञा होती है, प्रथम – बुद्धि की चरितार्थता के विषय में; द्वितीय – गुणविकारभूत बुद्धि आदि के स्वकारण में लय के विषय में; तथा तृतीय – गुणसंबंधातीत पुरुष की सत्ता के विषय में। इस सप्तविध प्रज्ञा से युक्त योगी जीवन्मुक्त कहलाते हैं।

प्राप्‍ति;-

तप का तृतीय लक्षण।पाशुपत साधक को जब योग साधना में लाभसंबंध होता है, अर्थात् उसको ऐश्‍वर्य प्राप्‍ति होने पर सिद्‍धियों की उपलब्धि होती है, तो वह प्राप्‍ति कहलाती है। प्राप्‍ति के हो चुकने पर एक तो उसमें अपरिमित ज्ञानशक्‍ति उबुद्‍ध होती है और दूसरे असंभव को भी संभव बनाने की क्रिया सामर्थ्य उसमें प्रकट हो जाती है। इस तरह से वह शिवतुल्य बन जाता है।

यह अष्टसिद्धियों में एक है ‘पृथ्वी में रहकर ही हाथ की उंगली द्वारा चन्द्रमा को छूना’ अथवा ‘पाताल में रहकर ब्रह्मलोक को देखना’ प्राप्ति-सिद्धि का एक उदाहरण है।

प्राप्यकारित्व '-

इन्द्रियाँ प्राप्यकारी हैं या अप्राप्यकारी – इस पर दार्शनिक प्रस्थानों में मतभेद हैं। प्राप्यकारी का अर्थ है – संबंधित अर्थ का प्रकाशक। जब किसी विषय का सन्निकर्ष इन्द्रिय के साथ होता है – जब वह इन्द्रिय को उपरंजित करता है – तभी वह साक्षात्कृत होता है, अन्यथा नहीं। इन्द्रियाँ दूरस्थ विषय के साथ वृत्ति के माध्यम से संबंधित होती हैं। सांख्यीयदृष्टि में इन्द्रियाँ अव्यापक हैं (प्रत्येक व्यक्त पदार्थ अव्यापी है, यह सांख्यकारिका में कहा गया है; इन्द्रियाँ व्यक्त पदार्थ हैं), अतः स्वभावतः वे प्राप्यकारी (संबद्ध विषय की प्रकाशिका) ही होंगी। यद्यपि इन्द्रियाँ शारीरिक मन्त्रविशेष नहीं हैं, अहंकारोत्पन्न हैं, (शरीरस्थित मन्त्र इन्द्रियों के अधिष्ठान-मात्र हैं) तथापि वे असंबद्ध विषयों की प्रकाशिका नहीं होतीं। योगजसामर्थ्य-युक्त इन्द्रियाँ भी असंबद्ध विषयों का प्रकाशन नहीं करतीं। वे विषय सूक्ष्म, व्यवहित आदि होने पर भी इन्द्रिय से सम्बन्धयुक्त हो जाते हैं। इन्द्रियमार्ग से चित्त की वृत्तियाँ विषयदेश -पर्यन्त जाकर विषयाकार में परिणत होती हैं – ऐसा एक मत प्रचलित है। ऐसा होना न संभव है और न यह मत सांख्ययोग को अनुमत है – यह वर्तमान लेखक का मत है। चित्तपरिणामभूत वृत्तियों के लिए ऐसा प्रसर्पण करना असंभव है, क्योंकि चित्त और उसके परिणाम दोनों दैशिक व्याप्ति से शून्य हैं।

बटुक;-

शक्तिसंगम तन्त्र के प्रथम खण्ड के बारहवें पटल में बताया गया है कि भूत, प्रेत, वेताल आदि जप, पूजा आदि में विघ्न उपस्थित कर दिया करते हैं। भक्तों के कल्याण के लिये देवी ने बटुक का प्रादुर्भाव किया, जो कि इन विघ्नों को दूर भगा देते हैं। योगिनी, विद्या, भैरव तथा अनन्तकोटि मन्त्रों के तेजःपुंज से बटुक का आविर्भाव हुआ। साक्षात् भगवान् शिव ही बटुक का रूप धारण कर वेताल प्रभृति के उपद्रवों को शान्त कर भक्तों की रक्षा करते हैं। बटुक के प्रसाद से ही सारी विद्याएँ और शाबर प्रभृति मन्त्र फलद होते हैं। इनकी कृपा के बिना कोई भी विद्या अथवा मन्त्र सिद्ध नहीं होते। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी बटुक की तिथि मानी जाती है। इसी दिन इनका प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिये बटुक की जयन्ती के रूप में इसको मान्यता प्राप्त है। हेतु, त्रिपुरान्तक वह्नि वेताल, अग्निजिह्व, काल, कराल, एकपाद, भीम, त्रैलोक्यसिद्ध और बटुक के भेद से यह दशविध माने गये हैं। शक्ति की उपासना में गणपति, बटुक, योगिनी और क्षेत्रपाल की पूजा अनिवार्य है।

दर्शन : शाक्त दर्शन

बंधन ;-

अपने स्वरूप तथा स्वभाव को क्रमशः शुद्ध प्रकाश रूप तथा शुद्ध विमर्श रूप न समझकर केवल शून्य, प्राण, बुद्धि, देह आदि जड़ पदार्थों को ही अपना वास्तविक स्वरूप तथा अल्पज्ञता आदि को अपना स्वभाव समझना बंधन कहलाता है। वस्तुतः बंधन और मोक्ष में कोई भी अंतर नहीं है। दोनों का आधार केवल अभिमनन मात्र ही है। ये दोनों पारमेश्वरी लीला के मात्र दो प्रकार हैं। इसमें शिवभाव का अभिमनन मोक्ष तथा जीव भाव का अभिमनन बंधन कहलाता है। बन्ध ;-

02 FACTS;-

1-जीव की बद्ध अवस्था (संसारयुक्तता) को बन्ध कहा जाता है। सांख्ययोग की दृष्टि में बन्ध वस्तुतः चित्त की ही अवस्था है – चित्त ही बद्ध होता है, चित्त ही मुक्त होता है। पुरुष (तत्त्व) में बन्ध-मोक्ष का व्यवहार औपचारिक (गौण) है, अर्थात् चित्त की अवस्थाओं का गौण व्यवहार चित्तसाक्षी कूटस्थ पुरुष में किया जाता है। यह बद्धावस्था सहेतुक है; हेतु है अविद्या। अविद्या अनादि है, अतः यह सिद्ध होता है कि बद्धावस्था का भी आदि नहीं है, अर्थात् बद्ध पुरुष अनादि काल से बद्ध है (‘अनादिकाल से’ – ऐसा कहना न्याय की दृष्टि से सदोष है, पर इस विकल्पवृत्तिजात व्यवहार को करने के लिए हम बाध्य हो जाते हैं – यह ज्ञातव्य है)। जब तक भोग और अपवर्ग रूप दो पुरुषार्थ समाप्त नहीं होते, तब तक यह बद्धावस्था भी रहती है। प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि बन्ध का अभाव ही मुक्ति है। यह मुक्ति अविद्या का पूर्णतः नाश होने पर ही होती है।

2-अविद्यानाश विद्या (= विवेकख्याति) द्वारा ही साध्य है, जो योगांगों के अभ्यास से ही प्रकट होता है। बन्ध शब्द का एक विशिष्ट अर्थ में प्रयोग योगसूत्र 3/38 में है। शरीर में मन की (कर्माशयवशता के कारण) जो स्थिति होती है, वह भी बन्ध कहलाता है। (धारणा के प्रसंग में भी ‘बन्ध’ शब्द का प्रयोग होता है, जिसके लिए द्रष्टव्य है ‘देशबन्ध’ शब्द)। सांख्यशास्त्र में तीन प्रकार का बन्ध स्वीकृत हुआ है – प्राकृतिक, वैकृतिक (या वैकारिक) तथा दाक्षिण। अष्ट प्रकृति से सम्बन्धित जो बन्धन हैं, वह प्राकृतिक है। इस बन्धन से युक्त व्यक्ति भ्रमवश इन प्रकृतियों को आत्मा समझते हैं। सोलह विकारों (विकृतियों) से सम्बन्धित जो बन्धन है वह वैकृतिक है। इस बंधन से युक्त व्यक्ति भ्रमवश इन विकारों को आत्मा समझते हैं। दक्षिणासाध्य यज्ञादिकर्मों से संबंधित जो बन्ध है वह दाक्षिण बन्ध या दक्षिणाबन्ध है (दाक्षिणक शब्द भी प्रयुक्त होता है)। विभिन्न लोकों से संबंधित बन्धन वैकारिक बन्धन है – यह किसी-किसी का मत है।

बन्ध-मोक्ष;-

अद्वैतवादी तान्त्रिक दार्शनिकों के मत में बन्ध और मोक्ष की कोई वास्तविक स्थिति नहीं है। ये मात्र विकल्प के व्यापार हैं। विकल्प शब्द की व्याख्या अलग से की गई है। इस दर्शन में वस्तुतः जब बन्ध की ही कोई स्थिति नहीं है, तब मोक्ष की चर्चा कहाँ से उठेगी और मोक्ष प्राप्ति की इच्छा का तो कोई प्रश्न ही नहीं है। चिदानन्दात्मक स्वरूप का परामर्श ही आत्मा का स्वभाव है। इसी को मोक्ष भी कहा जाता है। यह स्वभाव अपूर्णता ख्याति रूप आणव मल से जब आवृत हो जाता है, तो इसी को बन्ध कह देते हैं। ज्ञानदान और पापक्षपण लक्षण दीक्षा से जब मल अपसारित हो जाता है, तो गुरु के कृपा-कटाक्ष से शिष्य पुनः स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। इसी को मोक्ष कहते हैं। इस दर्शन में वेदान्त आदि दर्शनों के समान ऐहिक और आमुष्मिक भोगों से विरक्ति को आवश्यक नहीं माना गया है। इस दर्शन की विशेषता यह है कि इसमें भोग और मोक्ष की समरसता प्रतिपादित है। इसकी अनुभूति जीवन्मुक्ति दशा में होती है।

बलप्रमथन ;-