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एक शांत मन को कैसे पाया जाए?क्या है निर्विचारिता?-PART 02

एक शांत मन को कैसे पाया जाए?"-

05 FACTS;-

1-वास्तव में, मन कभी शांत ,मौन नहीं नहीं होता; अ-मन शांत होता है क्योंकि मन का स्वभाव ही है तनावग्रस्त होना, उलझन में पड़ रहना। मन कभी भी स्पष्ट नहीं होता, क्योंकि मन स्वभाव से उलझन है, अस्पष्टता है। स्पष्टता तभी संभव है जब मन ना हो; मौन तभी संभव है जब मन ना हो, इसलिय कभी भी शांत मन को पाने की चेष्ठा ना करें। यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम आरम्भ से ही एक असंभव आयाम में जा रहे हो। सदा स्मरण रखें कि जो कुछ भी तुम्हारे आस-पास घट रहा है उन सब की जड़े तुम्हारे मन में निहित है। मन ही सदा कारण होता है। वह एक प्रक्षेपण करने वाला यंत्र है, और बाहर केवल पर्दे ही पर्दे हैं--तुम उन पर्दों पर अपने आप को प्रक्षेपित कर लेते हो। यदि तुम्हे प्रतीत होता है कि जो कुछ भी मन से आ रहा है वह नारकीय है और भयानक है, तो मन को गिरा दो।मन पर कार्य करना है, परदे पर नहीं; परंतु एक समस्या है, क्योंकि तुम सोचते हो कि तुम मन हो तो तुम इसे गिरा कैसे सकते हो? तुम सब-कुछ गिरा सकते हो, सब कुछ बदल सकते हो, उसे फिर से रंग सकते हो, फिर से संवार सकते हो, पुनर्व्यवस्थित कर सकते हो, किन्तु तुम खुद को कैसे गिरा सकते हो? यही सारे उपद्रव की जड़ है।

2- वास्तव में, तुम मन नहीं हो, तुम मन के पार हो। यह सत्य है कि तुमने उसके साथ तादात्म बना लिया है । और तुम्हे यही छोटी झलकियां दिखाना कि तुम मन नहीं हो..ध्यान का उद्देश्य है। यदि कुछ क्षण के लिए भी मन ठहर जाए, तुम तब भी वहीँ के वहीँ हो! इसके विपरीत तुम्हारी उपस्थिति और भी ज्यादा प्रवाहमान हो जाती है। मन का ठहर जाना ऐसा होता है जैसे एक जल-निकास जो लगातार तुम्हे खाली कर था, रुक जाये। अचानक तुम ऊर्जा से भर गए। तुम और संवेदनशील हो गए। यदि तुम क्षण भर के लिए भी इस बात के प्रति सचेत हो जाओ कि मन नहीं है, केवल "मैं हूँ", तुम सत्य के भीतरी केंद्र तक पहुँच गए। तब मन को गिरा देना सरल हो जाएगा।

3-लेकिन पहले तादात्म को गिराना होगा, तब मन को गिराया जा सकता है। जब मन के साथ सारे तादात्म गिरा दिए जाये, तब तुम पर्वत पर बैठे एक द्रष्टा रह जाते हो और मन अँधेरी घाटियों की गहराइयों में छूट जाता है।तब तुम सूर्य से प्रकाशित शिखरों पर होते हो, बस शुद्ध साक्षी, द्रष्टा मात्र, देखते हुए, परंतु किसी भी चीज़ से कोई तादात्म्य ना बनाते हुए..।उस द्रष्टा भाव में सब प्रश्न मिट जातें हैं..अच्छा या बुरा, पापी या पुण्यात्मा, यह या वह, केवल एक शुभ उपस्तिथी,एक श्वांस, एक धड़कता हुआ ह्रदय रहता है, मन मिट जाता है, पिघल जाता है, भाप बन कर उड़ जाता है। तुम बस एक शुद्ध आत्मा की तरह रह जाते हो,..क्षण में पूर्णता .. ना अतीत, ना भविष्य इसलिए वर्तमान भी नहीं । मन भ्रामक है, माया है, मात्र एक स्वप्न है, एक प्रक्षेपण है...एक पानी का बुलबुला--जिस में कुछ भी नहीं है, परन्तु ये एक पानी का बुलबुला नदी में तैरता प्रतीत होता है ।

सूरज बस उग ही रहा है, किरने बुलबुले में प्रवेश करती हैं और इंद्रधनुष निर्मित हो जाता है और उस में कुछ भी नहीं है। जब तुम बुलबुले को छूते हो तो वहटूट जाता है और सब-कुछ मिट जाता है ..वो इंद्रधनुष, वो सौन्दर्य--कुछ भी नहीं बचता। केवल शून्यता ही अनंत शून्य के साथ एक हो जाती है। 4-तुम्हारा मन एक बस एक बुलबुले की दीवार है : छेद दो, और मन विदा हो जाएगा। केवल वे ही लोग जो मन के बिना होना जान लेते हैं ...मन का उपयोग करने में सक्षम हो जाते हैं । यह मन ही है जो तुम्हारा उपयोग कर रहा है, परन्तु मन बहुत चालाक है, वह तुम्हे धोखा दिए चला जाता है कि "तुम मेरा उपयोग कर रहे हो।" यह मन तुम्हारा मालिक बन गया है, तुम उसके गुलाम, परन्तु वह कहता है "मैं केवल एक उपकरण हूं, तुम मेरे मालिक हो।" तुम्हे लगता है कि तुम इसका उपयोग कर रहे हो।परन्तु तुम उसका उपयोग तभी कर सकते हो जब तुम्हे पता हो कि तुम इससे पृथक हो; तुम इससे तादात्म बनाए हुए हो।क्या मन और चेतना दो अलग वस्तुएं हैं? मन का अर्थ है उधार लिया गया, वह जो बनाया गया हो, वह जो समाज ने तुम में भर दिया है।

5- चैतन्य तुम्हारा स्वभाव है; मन बस एक परिधि है, समाज द्वारा तुम्हारे आस-पास निर्मित की हुई, तुम्हारी संस्कृति द्वारा, तुम्हारी शिक्षा ,संस्कार द्वारा। मन समाज का उपोत्पाद है। और जब तक यह मन मिट नहीं जाता तुम भीतर प्रवेश नहीं कर सकते; तुम मूलतया अपने स्वभाव को नहीं जान सकते, प्रमाणिक रूप से तुम्हारा क्या आस्तित्व है, तुम्हारा चैतन्य क्या है । ध्यान के लिए संघर्ष करना मन के विरुद्ध संघर्ष करना है। मन कभी ध्यानपूर्ण नहीं होता और न ही मन कभी शांत होता है, तो "शांत-मन" कहना एक निरर्थक बात है, । यह ऐसा कहना है जैसे कि "एक स्वस्थ रोग।" यह अर्थहीन है। रोग तो रोग है, और स्वास्थ्य रोग का आभाव है। शांत मन जैसी कोई चीज़ नहीं होती। जब शान्ति होती है तब मन नहीं होता। जब मन होता है तब शान्ति नहीं होती। मन, एक तरह से उपद्रव है, एक रोग। ध्यान अ-मन की चित्त-दशा है , मौन मन की ,स्वस्थ मन की या एकाग्र मन की नहीं। ध्यान अ-मन की स्थिति है: तुम्हारे भीतर कोई समाज नहीं, कोई संस्कृति नहीं- बस तुम, तुम्हारी शुद्ध चेतना के साथ होते हो । क्या है निर्विचारिता?-

03 FACTS;- 1-हमारे अंदर लगातार पॉजिटिव और नेगेटिव विचार श्रंखला चलती रहती है । प्रसन्न रहने के लिए और खुशी पाने के लिए हमें इन विचारों से ऊपर उठना होगा। निर्विचारिता की स्थिति भी हमारे अंदर गहन शांति का एहसास कराती है; जिससे हमें एक ऐसी खुशी का अनुभव होता है जो किसी भी चीज़ से प्राप्त नहीं हो सकती। नश्वर वस्तुओं से प्राप्त होने वाली खुशी स्थाई नहीं होती। अतः हमें अपने अंदर चलने वाले असंख्य विचारों को कम करने का अभ्यास या सजग रहने का अभ्यास करना चाहिए। हमें यह ध्यान देना चाहिए की हमारे अंदर कम से कम विचार उठे और जो विचार आते - जाते हैं उन्हें हम सिर्फ साक्षी भाव से और सजगता से देखें । यह ध्यान रखे कि हमारे अंदर उठने वाले सकारात्मक या नकारात्मक दोनों प्रकार के विचारों का प्रभाव हम पर ना पड़े, और इसका एक ही उपाय है कि हम वर्तमान में ही रहे भूतकाल और भविष्य काल के बारे में ना सोचे।इसके है लिए जरूरी कि पूरे दिन में आप अपने शौक को पूरा करने वाले कार्य के लिए अवश्य समय निकालें। इससे आपके ध्यान को एकाग्रता मिलेगी।

2-मस्तिष्क को विचार शून्य रखें यही निर्विचारिता है।जब आप निर्विचारिता में होते हैं तो आप परमात्मा की सृष्टि का पूरा आनंद लेने लगते हैं, बीच में कोई वाधा नहीं रहती है ।विचार आना हमारे और सृजनकर्ता के बीच की बाधा है।हर काम करते वक्त आप निर्विचार हो सकते हैं, और निर्विचार होते ही उस काम की सुन्दरता,उसका सम्पूर्ण ज्ञान और उसका सारा आनंद आपको मिलने लगता है । निर्विचारिता एक औलौकिक स्थिति है जहॉ से परमात्मा के दर्शन होते हैं, निर्विचारिता की अवस्था में जो भी घटित होता है वह प्रकाशवान होता है, निर्विचारिता में आपके मन में जो विचार आता है वह एक अन्तःप्रेरणा होती है।निर्विचारिता में आप परमात्मा की शक्ति के साथ एक रूप हो जाते है,अर्थात आप परमात्मा में आकर मिल जाते हैं। परमात्मा की शक्ति आपके अन्दर आ जाती है।

3-कोई भी निर्णय लेने से पहले निर्विचारिता में जाओ, अब जो निर्णय सामने आ जाए, वही सबसे उपयुक्त, आलौकिक व चमत्कारिक निर्णय होगा, क्योंकि उसमें आपका ईगो और सुपर ईगो दोनों काम करते हैं। आप ऎसा निर्णय लेंगे जो बडे-बडे लोगों के बस में नहीं। निर्विचारिता में रहना सीखें ..यही आपका स्थान है, आपका धन, आपका बल, शक्ति, आपका स्वरूप, सौन्दर्य तथा यही आपका जीवन है। निर्विचार होते ही बाहर का यन्त्र पूरा आपके हाथ में घूमने लग जाता है। सिर्फ जीवंतता का दर्शन होगा, जहॉ से जीवन की धारा बहती है। इसलिए निर्विचारिता समाधि से स्वयं को ज्योतिर्मय बनाइये ..यह कार्य कठिन नहीं है । यह स्थिति आपके अन्दर है,क्योंकि विचार तो इधर या उधर से आते है।ये आपके मस्तिष्क की लहरियॉ /वाइब्रेशन्स नहीं बल्कि आपकी प्रतिक्रियायें हैं ।लेकिन ध्यान धारण करने पर आप निर्विचार चेतना में चले जाते हैं।यह स्थिति प्राप्त करना आवश्यक है और तब आपके मस्तिष्क में आने वाले मूर्खता पूर्ण एवं व्यर्थ विचार समाप्त हो जाते है।इन विचारों को समाप्त होने पर ही आपका उत्थान सम्भव है तभी हम उन्नत होते हैं।

निर्विचार कैसे हुआ जाए?-

06 FACTS;-

1-जिसे निर्विचार होना हो, उसे व्यर्थ के विचारों को लेना बंद कर देना चाहिए ।इसकी सजगता उसके भीतर होनी चाहिए कि वह व्यर्थ के विचारों का पोषण न करे, उन्हें अंगीकार न करे, उन्हें स्वीकार न करे और सचेत रहे कि मेरे भीतर विचार इकट्ठे न हो जाएं। इसे करने के लिए जरूरी होगा कि वह विचारों में जितना भी रस हो, उसको छोड़ दे। हमें विचारों में बहुत रस है। अगर आप एक धर्म को मानते हैं, तो उस धर्म के विचारों में आपको बहुत रस है। जिसे निर्विचार होना है, उसे विचारों के प्रति विरस हो जाना चाहिए। उसे यह सोचना चाहिए कि विचार से कोई प्रयोजन नहीं और यह संभव होगा विचारों के प्रति जागरूकता से। अगर हम अपने विचारों के साक्षी बन सकें तो क्रमशः जिस मात्रा में आपका साक्षी होना विकसित होता है, उसी मात्रा में विचार शून्य होने लगते हैं। विचार को शून्य करने का उपाय है विचार के प्रति पूर्ण सजग हो जाना।उदाहरण के लिए घर में रौशनी होगी तो चोर न आएंगे और घर में अंधकार होगा तो चोर झांकेंगे और अंदर आना चाहेंगे। भीतर जो होश को जगा लेता है, उतने ही विचार क्षीण होने लगते हैं।भीतर जितनी मूर्च्छा होती है , जितना सोयापन होता है, उतने ज्यादा विचारों का आगमन होता है। जितना जागरण होता है, उतने ही विचार क्षीण होने लगते हैं।

2-निर्विचार होने का उपाय है: विचारों के प्रति साक्षी-भाव को साधना। कोई एक क्षण में , एक दिन में सध जाएगा, यह नहीं कहा जा सकता है लेकिन अगर निरंतर प्रयास हो, तो थोड़े ही दिनों में आपको पता चलेगा कि जैसे-जैसे आप विचारों को देखने लगेंगे...कभी घंटे भर को किसी एकांत कोने में बैठ जाएं और कुछ भी न करें, सिर्फ विचारों को देखते रहें।और देखते-देखते ही धीरे-धीरे आपको पता चलेगा, वे कम होने लगे हैं। देखना जैसे-जैसे गहरा होगा, वैसे-वैसे वे विलीन होने लगेंगे। जिस दिन देखना पूरा हो जाएगा, जिस दिन आप अपने भीतर आर-पार देख सकेंगे, जिस दिन आपकी आंख बंद होगी और आपकी दृष्टि भीतर पूरी की पूरी देख रही होगी, उस दिन आप पाएंगे..कोई विचार का कोलाहल नहीं है, वे गए। और जब वे चले गए होंगे, उसी शांत क्षण में आपको अदभुत दृष्टि, अदभुत दर्शन, अदभुत आलोक का अनुभव होगा। वह अनुभव ही सत्य का दर्शन है। और वही अनुभव स्वयं का दर्शन है।

3-ज्ञान की उपलब्धि निर्विचार में होती है। स्वयं के माध्यम से ही सत्य जाना जाता है और कोई द्वार नहीं है और सत्य को जान लेना आनंद में प्रतिष्ठित हो जाना है। असत्य में होना दुख में ,अज्ञान में होना है और सत्य की उस ज्ञान-दशा में आनंद उपलब्ध होता है। आनंद और आत्मा अलग न समझें। आनंद और सत्य अलग न समझें। स्वयं और सत्य अलग न समझें। ऐसी जो प्रक्रिया का उपयोग क्रमशः अपने जीवन में करेगा, वह कभी निर्विचार को अनुभव कर लेता है। निर्विचार को जो अनुभव कर लेता है, उसकी पूरी विचार की शक्ति जाग्रत हो जाती है, जैसे किसी ने अंधेरे में प्रकाश कर दिया हो या जैसे किसी ने अंधे को आंख दे दी हों, ऐसा उसे अनुभव होता है।

4-ज्ञान निर्विचार अवस्था में ही रहता है और उपलब्धि हो जाए तो वह हर अवस्था में अथार्त विचार की अवस्था में भी रहता है। फिर तो उसे खोने का कोई उपाय नहीं है।अभिव्यक्ति विचार से भी हो सकती है, लेकिन उपलब्धि निर्विचार में होती है।क्योंकि विचार की तरंगें मन को दर्पण नहीं बनने देतीं। लेकिन अगर सोचते हों कि विचार से उपलब्धि कर लेंगे, तो कभी न होगी, विचार बहुत बाधा डालेगा।जब तक विचार चलते हैं, तब तक निर्विचार का खयाल भी सिर्फ एक विचार है कि मैं निर्विचार हूं; और इधर विचार चल रहे हैं । क्योंकि इसकी स्थिति तो तभी स्मरण में आएगी, जब विचार नहीं चल रहे होंगे। असल में मन की तरकीब ही यही है कि आप कुछ भी कहो, वह उसको वासना में निर्मित कर देता है। वह कहता है, मोक्ष चाहिए .. उसमे बड़ा आनंद है कोशिश करो, खोजो, मिल जाएगा। अब मोक्ष की खोज शुरू हो गई। और जिस मोक्ष को मन खोजता है, वह मोक्ष नहीं है। असल में, जहां मन नहीं होता.. वहां मोक्ष है। इसलिए मन का खोजा हुआ मोक्ष तो मोक्ष नहीं हो सकता। निर्विचार की बात सुनते-सुनते मन में बैठ जाता है, निर्विचार होना चाहिए। अब अगर इस विचार पर आप जिद्द देकर पड़ जाएं, तो मन आपको दूसरा धोखा देगा। वह कहेगा कि देखो, भीतर तो निर्विचार है, आस-पास विचार घूम रहे हैं; आर-पार चल रहे हैं विचार, मैं तो बाहर खड़ा हुआ हूं।

5-लेकिन मैं जो बाहर खड़ा हुआ हूं, यह क्या है?वास्तवमें, यह भी एक विचार है। पर इससे भी थोड़ा सुख , थोड़ी शांति मिलेगी जो कि मन को सदा मिलती है, जब भी वह अपनी किसी वासना को पूरा कर लेता है। लेकिन वह शांति नहीं, जो कालजयी है;, जिसका कोई नाम नहीं है।उदाहरण के लिए दीया जलता है,आग जलती है, लौ जलती है। लौ पहले तेल को जलाती रहती है। फिर तेल चुक जाता है। फिर लौ बाती को जलाने लगती है। फिर बाती चुक जाती है। फिर लौ खो जाती है।अथार्त लौ पहले तेल को जला देती है, फिर बाती को जला देती है, फिर स्वयं को जला लेती है। विचार को छोड़ दें, विचार काट डालें। फिर स्वयं को भी छोड़ दें। तब कुछ नहीं बचता। तुम अशांत हो और मन तुम्हें धोखा दे रहा है कि तुम शांत हो। तुम्हें कुछ पता नहीं है और तुम कहते हो, मुझे मालूम है कि भीतर आत्मा है। तुम्हें कुछ पता नहीं और तुम कहते हो, यह सारा संसार परमात्मा ने बनाया है। तुम्हें कुछ भी पता नहीं है और तुम कहते हो कि आत्मा अमर है। मन के इस धोखे में जो पड़ेगा, वह फिर उसे न जान पाएगा जो जानने जैसा है। और उसे न जान पाए, इसलिए मन ये सारे धोखे निर्मित करता है। तो जब तक तुम्हें पता चलता हो कि विचार चल रहा है ,तब तक तुम जानना कि मन ने अपने दो हिस्से किए: एक हिस्सा विचार चलाने वाला, और एक हिस्सा एक विचार का कि मैं विचार नहीं हूं, मैं निर्विचार हूं।

6-यह मन का ही द्वैत है। सच तो यह है कि मन के बाहर द्वैत होता ही नहीं। मन के बाहर अद्वैत हो जाता है। और अद्वैत का कोई बोध नहीं होता, कि तुम कह सको, ऐसा है। ज्यादा से ज्यादा तुम इतना ही कह सकोगे, ऐसा नहीं है।तब एक निर्विकार भाव-अवस्था, एक निर्विकार अस्तित्व, एक मौन-शांत सत्ता, शेष एक्जिस्टेंस रह जाता है, जहां मैं का भंवर नहीं बनता। पानी में जोर चक्कर से भंवर बनता है। और भंवर की एक खूबी होती है, आप कुछ भी डाल दो तो वह भंवर उसको फौरन खींच कर घुमाने लगता है। 'मैं' एक भंवर है। जिसमें आप कुछ भी डालें, वह किसी भी चीज को पकड़ कर घुमाने लगेगा।इस निर्विचार, निरहंकार स्थिति में कोई भंवर नहीं रह जाता, कोई घूमने की स्थिति नहीं रह जाती। और तब जिसे कैवल्य कहते हैं..घटित होता । कैवल्य का अर्थ है, कुछ भी न बचा, केवल होना ही बचा; कोई उपाधि न रही, कोई विशेषण न रहा; सिर्फ अस्तित्व रह गया। मात्र होना, जस्ट बीइंग! जैसे कोई एक गहन गङ्ढ में झांके, या जैसे कोई खुले आकाश में झांके--न कोई बादल, न कोई तारे, खाली आकाश रह गया। ऐसा ही जब भीतर रह जाता है, झांकने वाला भी नहीं रह जाता, सिर्फ खालीपन रह जाता है, तब पता चलता है उसका, उस पथ का, जिस पर विचरण संभव नहीं है, उस पथ का, जो अविकारी है। और तब पता चलता है उस सत्य का, जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता, जो कालजयी है, जो कालातीत है, जो सदा एकरस है, जो केवल स्वयं है।

क्या अंकुश ही मार्ग है?

08 FACTS;-

1- उपनिषद में ऋषि कहते है, अंकुशो मार्ग: अथार्त अंकुश ही मार्ग है।बड़े छोटे सूत्रों में बड़ी अमृत सूचनाएं हैं।इस मन पर जो फैलाव करता , स्वप्‍नों को जन्माता है, प्रक्षेपण करता है...इस मन को रोकना, इस मन को ठहराना, इस मन को न चलने देना, इस मन को गतिमान न होने देना, इस मन को सक्रिय न होने देना-..इस पर अंकुश ही मार्ग है। धीरे -धीरे, इस मन को विसर्जित कर देना ही सिद्धि है।उदाहरण के लिए एक शिष्य जब अपने गुरु के पास गया तो उसने कहा, मैं मन को कैसा बनाऊं कि सत्य को जान सकूं? तो गुरु बहुत हंसने लगा। उसने कहा, मन को तू कैसा भी बना, सत्य को तू न जान सकेगा। तो उसने पूछा कि क्या मैं सत्य को जान ही न सकूंगा? गुरु ने कहा, यह मैंने नहीं कहा। सत्य को तू जान सकेगा, लेकिन कृपा कर मन को छोड़ दे।ऋषि कहते है, इस मन पर अंकुश रखना पड़े, इस मन को धीरे—धीरे विसर्जित करना पड़े और वह क्षण लाना पड़े, जहां हम कह सकें, अब कोई मन नहीं। वास्तव में, जहां मन नहीं, चेतना और सत्य का मिलन हो जाता है। वहीं आनंद है और वहीं नित्य की प्रतीति और अनुभूति है।


2-वास्तव में, मन का न होना /नो माइंड इज मेडिटेशन ...ध्यान है। तू मन को बनाने की कोशिश मत कर कि ऐसा बनाऊं, अच्छा बनाऊं, बुरा बनाऊं। यह रंग दूं वह रंग दूं। साधु का बनाऊं, संत का बनाऊं। किसका मन बनाऊं? मन से नहीं होगा, क्योंकि मन कैसा भी होगा, तो प्रक्षेपण करेगा। अच्छा मन अच्छे प्रक्षेपण करेगा, बुरा मन बुरे प्रक्षेपण करेगा। लेकिन प्रक्षेपण जारी रहेगा। मन ही न हो, तो हमारे और जगत के बीच, हमारे और सत्य के बीच जो -जो जाल है, वह तत्काल गिर जाता। हम वही देख पाते हैं, जो है। ध्यान भी नो माइंड, अ-मन अथार्त मन को फेंक देना है, हटा देना है।पहले तो, धीरे -धीरे अंकुश से ही यात्रा शुरू करनी पड़ेगी।उदाहरण के लिए बैठे हैं, धूप पड़ रही है। मन कहेगा, बड़ी तकलीफ हो रही है। मन को कहें कि तू चुप रह। मुझे जरा धूप को अनुभव करने दे कि क्या हो रहा है। मन कहेगा,धूप में बड़ा आनंद आ रहा है । तो कहना, तू जरा चुप रह, तू बीच में मत आ। धूप और मुझे सीधा मिलने दे। और तब बड़े फर्क पड़ेंगे। तब धूप जैसी है, वैसी ही अनुभव में आएगी। ..यह बीच में मन व्याख्या न करेगा। ये सारी व्याख्याएं हैं और एक दफा फैशन बदल जाए, तो व्याख्याएं बदल जाती हैं।


4- फैशन के बदलने के साथ सब बदल जाता है। ऐसी कौमें हैं, जो स्त्रियों का सिर घुटवा देती हैं। वे कहती हैं, घुटा हुआ सिर बहुत सुंदर है। वे कहती हैं, जब तक सिर घुटा न हो, तब तक स्त्री के चेहरे का पूरा सौंदर्य पता ही नहीं चलता, बाल की वजह से सब ढंक जाता है। असली सौंदर्य तो तभी पता चलता है, जब सिर घुटा हुआ हो, साफ सुथरा ,स्वच्छ हो, स्वच्छ।और ऐसी कौमें भी हैं, जो मानती हैं, बिना बाल के सौंदर्य नहीं हो सकता, तो स्त्रियां विग लगाती हैं, झूठे बाल ऊपर से लगा लेती हैं। हमारे मन का ही सारा खेल है। जैसा हम पकड़ लें, बस वैसा ही मालूम होने लगता है।तो तुम्हे सबसे पहले तुम्हें अवधान साधना होगा और उसे करके ही तुम उसका विकास कर सकते हो; इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है। अवधान का अर्थ है कि जब तुम फूल को देखते हो तो तुम फूल को ही देखते हो, कोई दूसरा काम नहीं करते हो-मानो मन ठहर गया है, अब कोई विचारणा नहीं है, फूल का सीधा अनुभव भर है।

5-यदि यह संभव हो तो अचानक तुम्हारा अवधान फूल से लौट कर स्वयं पर आ जाएगा। एक वर्तुल बन जाएगा। तुम फूल को देखोगे और वह दृष्टि वापस लौटेगी; फूल उसे वापस कर देगा, द्रष्टा पर ही लौटा देगा। अगर विचार न हो तो यह घटित होता है। तब तुम फूल को ही नहीं देखते, तुम देखने वाले को भी देखते हो। तब देखने वाला और फूल दो आब्जेक्ट हो जाते हैं और तुम दोनों के साक्षी हो जाते हो।लेकिन पहले अवधान को प्रशिक्षित करना होगा। तुम एक क्षण के लिए भी अवधानपूर्ण नहीं रहते हो।अवधान दो, उसे बढ़ाते जाओ; प्रयोग से वह विकसित होगा। कुछ भी करते हुए, कहीं भी तुम अवधान को विकसित कर सकते हो। तुम कार में या रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे हो, वहीं अवधान को बढ़ाने का प्रयोग करो। समय मत गंवाओ। तुम बस वहां होओ, विचार मत करो। किसी व्यक्ति को देखो, रेलगाड़ी को देखो या बाहर देखो, पर द्रष्टा रहो। तुम्हारी दृष्टि सीधी, प्रत्यक्ष और गहरी हो जाएगी।


6-और तब सब तरफ से तुम्हारी दृष्टि वापस लौटने लगेगी और तुम द्रष्टा के प्रति बोध से भर जाओगे।तुम्हें अपना बोध नहीं है। तुम अपने प्रति सावचेत नहीं हो। क्योंकि विचारों की एक दीवार है। पूरे दिन तुम अनेक चीजों पर यह प्रयोग कर सकते हो। और धीरे-धीरे तुम्हारा अवधान विकसित होगा।तुम जो भी कर रहे हो, भोजन कर रहे हो, या स्नान कर रहे हो, बस अवधानपूर्ण होओ।लेकिन समस्या यह है कि हम सब काम मन के द्वारा करते हैं और हम निरंतर भविष्य के लिए योजनाएं बनाते रहते हैं। तुम रेलगाड़ी में सफर कर रहे हो और तुम्हारा मन किन्हीं दूसरी यात्राओं के आयोजन में व्यस्त है, उनके कार्यक'म बनाने में संलग्न है। इसे बंद करो।एक संत ने कहा है: 'मैं यही एक ध्यान जानता हूं। जब मैं भोजन करता हूं तो भोजन करता हूं। जब मैं चलता हूं तो चलता हूं। और जब मुझे नींद आती है तो मैं सो जाता हूं। जो भी होता है, होता है; उसमें मैं कभी हस्तक्षेप नहीं करता।'


7-इतना ही करने को है कि हस्तक्षेप न करो। और जो भी घटित होता हो उसे घटित होने दो। तुम सिर्फ वहां मौजूद रहो। यही चीज तुम्हें अवधानपूर्ण बनाएगी। तुम स्वयं पर लौट आओगे। सारा अस्तित्व दर्पण बन जाएगा; पूरा अस्तित्व तुम्हें प्रतिबिंबित करेगा।जब समस्त अस्तित्व दर्पण बन जाता है, केवल तभी तुम प्रतिबिंबित हो सकते होऔर केवल तभी तुम स्वयं को जान सकते हो, बस, स्वयं को स्मरण करो।इस विधि के सहयोगी होने का एक गहरा कारण है। तुम एक गेंद को दीवार पर मारो; गेंद वापस लौट आएगी। जब तुम किसी फूल या किसी चेहरे को देखते हो तो तुम्हारी कुछ ऊर्जा उस दिशा में गति कर रही है। तुम्हारा देखना ही ऊर्जा है। तुम्हें पता नहीं है कि जब तुम देखते हो तो तुम ऊर्जा दे रहे हो, थोड़ी ऊर्जा फेंक रहे हो। तुम्हारी ऊर्जा का, तुम्हारी जीवन-ऊर्जा का एक अंश फेंका जा रहा है। यही कारण है कि दिन भर रास्ते पर देखते-देखते तुम थक जाते हो और आराम करने के लिए आंखें बंद कर लेना चाहते हो। क्योकि तुम ऊर्जा फेंकते रहे हो।


8-बुद्ध और महावीर दोनों इस पर जोर देते थे कि उनके शिष्य चलते हुए ज्यादा दूर तक न देखें, जमीन पर दृष्टि रख कर चलें। बुद्ध कहते हैं कि तुम सिर्फ चार फीट आगे तक देख सकते हो। इधर-उधर कहीं मत देखो, सिर्फ अपनी राह को देखो जिस पर चल रहे हो। चार फीट आगे देखना काफी है; क्योंकि जब तुम चार फीट चल चुकोगे, तुम्हारी दृष्टि चार फीट आगे सरक जाएगी। उससे ज्यादा दूर मत देखो, क्योंकि तुम्हें अकारण अपनी ऊर्जा का अपव्यय नहीं करना है।जब तुम देखते हो

तो तुम थोड़ी ऊर्जा बाहर फेंकते हो। रुको, मौन प्रतीक्षा करो, उस ऊर्जा को वापस आने दो। और तुम चकित हो जाओगे; अगर तुम ऊर्जा को वापस आने देते हो तो तुम कभी थकोगे नहीं। इसे प्रयोग करो। कल सुबह इस विधि का प्रयोग करो। शांत हो जाओ, किसी चीज को देखो , उसके बारे में विचार मत करो, और एक क्षण धैर्य से प्रतीक्षा करो। ऊर्जा वापस आएगी; असल में, तुम और भी प्राणवान हो जाओगे।निर्विचार अवस्था में ऊर्जा लौट आती है; कोई बाधा नहीं पड़ती है। और अगर तुम वहां मौजूद हो तो तुम उसे पुनः आत्मसात कर लेते हो। और वह पुनः आत्मसात करना तुम्हें पुनरुज्जीवित कर देता है। ... SHIVOHAM....