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उपनिषद के अनुसार क्या हैं "मैं की वृत्ति" या अहं भाव का उदय ?PART-02

क्या दुनिया में धर्म की कामना से भी अधर्म बढ़ता हैं ?-

06 FACTS;-

1-दुनिया में अधर्म तब तक बढ़ता ही चला जाएगा, जब तक हम धर्म की भी कामना करते रहेंगे और इस जमीन पर कोई भी नया नहीं है। सब इतने पुराने और प्राचीन हैं, जिसका हिसाब नहीं है। और सब इतने रास्तों पर, इतने मार्गों पर चल चुके हैं, जिसका हिसाब नहीं है। और उन सबमें असफलता पाकर आप निराश और हताश हो गए हैं। वह हताशा प्राणों में गहरे बैठ गई है। उस हताशा को तोड़ना ही आज सबसे बड़ी कठिनाई की बात हो गई है। और अगर कोई तोड़ना चाहे, तो एक ही उपाय दिखता है कि फिर आपकी कामना-वासना को कोई जोर से जगाए, और कहे कि इससे यह हो जाएगा, तभी

परिणाम लक्ष्य नहीं हैं।लेकिन वही 'जगाना' सारे उपद्रव की जड़ है।जब भी दुनिया में बुद्ध ,महावीर,या श्रीकृष्ण जैसे लोग पैदा होते हैं तो उनके पीछे हजारों साल तक एक छाया का काल व्यतीत होता है। उनको देख कर, उनके अहसास ,संपर्क में, उनकी हवा में हजारों लोग धर्म की कामना-वासना से भर जाते हैं। और उनको लगता है कि जब बुद्ध को हो सकता है, तो हमें भी हो सकता है। और अगर इन्होंने इस होने को वासना बनाने की भूल कर ली ,तो बुद्ध के बाद ये व्यक्ति हजारों साल तक उस वासना के कारण धीरे -धीरे परेशान होकर अधार्मिक हो जाएंगे।

2-वास्तव में,आनंद उपलब्ध हो सकता है, लेकिन आप उसको लक्ष्य न बनाएं। परम शांति उपलब्ध हो सकती है, लेकिन लक्ष्य न बनाएं। क्योकि वह दोनों लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य बनाएं ..अपने ज्ञान को, समझ को ,ध्यान को, अपने भीतर आ जाने कों , स्थिर हो जाने को, रुक जाने को और परिणाम में आनंद चला आएगा। वह उसके पीछे आ ही जाता है। परन्तु उलटा न करें अथार्त आनंद को लक्ष्य न बनाएं। जिसने आनंद को लक्ष्य बनाया, वह बस मुश्किल में पड़ गया।क्योकि परिणाम लक्ष्य नहीं हैं।

उदाहरण के लिए आप कोई खेल खेलते हैं ..फुटबाल हाकी, टेनिस ,कबड्डी आदि तो बड़ा आनंद अनुभव होता है। किसी से आप कहें कि खेलते हुए बड़ा आनंद आता है तो वह व्यक्ति कहेगा कि आनंद तो हमें भी चाहिए, कल हम भी आकर खेल कर देखेंगे कि आनंद आता है कि नहीं।

3-वह व्यक्ति खेलने आए, और सतत इस बात का खयाल रखे, कि आनंद आ रहा है कि नहीं। तो पहली बात इस खयाल की वजह से वह खेल में लीन ही नहीं हो पाएगा।उसके लिए खेल गौण हो जाएगा,और आनंद प्रमुख हो जाएगा।खेल के बाद वह सिर्फ थकेगा और कहेगा कि कुछ आनंद वगैरह नहीं मिलता, यह क्या है?जो खेल में आनंद पाने जाएगा ;उसका खेल भी

खराब हो जाएगा और आनंद तो मिलेगा ही नहीं।वास्तव में, आनंद तो बाइ -प्रॉडक्ट है ।खेल में पूरे लीन हो जाएं, तो आनंद

घटता है। आनंद का ही खयाल बना रहे तो लीन नहीं हो पाते। तो आनंद कैसे घट सकता है ?वास्तव में, यह पूरा जीवन ऐसा है जहां सब चीजें बाइ -प्रॉडक्ट हैं। जो भी महत्वपूर्ण है, वह चुपचाप घटता है। जो भी गहरा है, उसका लक्ष्य नहीं बनाना होता है क्योकि लक्ष्य बनाते ही उसका द्वार बंद हो जाता है।आनंद तो अनायास /आकस्मिक घटता है।कोई सचेत बैठा रहे, तो सचेत बैठने में ही इतना तनाव हो जाता है कि द्वार बंद हो जाते हैं,एक तनाव की दीवाल बन जाती है और आनंद नहीं घटता ।

4-यह सूत्र सभी शास्त्रों में है और खतरनाक है क्योकि जिसने भी उन शास्त्रों को पढ़ा है, उनकी वासना जग गई है।और वे खोज में लगे हैं कि कैसे 'मोक्ष' को हथिया लें ...कैसे आनंद पा ले।मोक्ष हथियाए नहीं जाते; लीन होकर मोक्ष मिलता है।आनंद पाया नहीं जाता। कुछ करें, जिसमें इतने डूब जाएं कि अपनी भी खबर न रहे, आनंद की भी खबर न रहे और अचानक जागने पर पता होता है कि आनंद ही आनंद रह गया है। आप जो खोजते थे, और जो खोज कर भी नहीं मिलता था, वह मिल गया

है।बुद्ध अपने जीवन में छह साल तक अथक कोशिश करते रहे कि मोक्ष मिल जाए, शांति और सत्य मिल जाए लेकिन नहीं मिला। सब गुरुओं के चरणों को टटोल आए। गुरु भी उनसे थक गए क्योंकि वे पक्के तलाशी थे। एक क्षत्रिय की जिद्द थी ,अहंकार था कि ऐसी क्या चीज हो सकती है जो हो और न मिले!वास्तव में, एक क्षत्रिय असंभव नहीं मानता है। तो वह जिस गुरु के भी पास गए, वे भी उनसे मुसीबत में पड़ गए। क्योंकि गुरु जो भी कहते, बुद्ध तत्काल करके दिखा देते। कितना ही कठिन हो .. शीर्षासन करना पड़े , धूप -वर्षा में खड़ा रहना हो या उपवास करना हो ;जो भी कुछ कहता वे पूरा करके बता देते और कुछ भी न होता!

5-वे सारे गुरु भी थक गए क्योंकि गुरु साधारण शिष्य से नहीं थकता।वास्तव में, साधारण शिष्य के साथ कभी ऐसी नौबत नहीं आती कि गुरु को यह कहना पड़े किअब हम क्या करें ..जो हम कर सकते थे, कर चुके! परन्तु बुद्ध जैसा शिष्य मिले तो बहुत मुश्किल खड़ी हो जाती है; क्योंकि बुद्ध, जो भी गुरु कहता ..पूरा करते। उसमें गुरु भी भूल नहीं निकाल सकता था। और एक गुरु कहता है कि अब मैं जो कर सकता था, बता सकता था, मैंने बता दिया, इसके आगे मुझे भी नहीं पता है, अब तुम

कहीं और चले जाओ! छह वर्ष तक, जिसने जो कहा ..सही, गलत ,संगत, असंगत उन्होंने सब बडी निष्ठा से पूरा किया। एक भी गुरु यह नहीं कह सका कि तुम पूरा नहीं कर रहे, इसलिए नहीं हो रहा है। क्योंकि वे इतना पूरा कर रहे थे कि गुरुओं तक ने उनसे क्षमा मांगी कि जब तुम्हें कुछ और ज्यादा हो जाए ,तो हमको भी खबर करना। क्योंकि जो भी हम जानते थे, वह पूरा बता दिया है।

6- बुद्ध का लक्ष्य प्रगाढ़ था।वे क्रिया कर रहे थे , लेकिन नजर लक्ष्य पर थी कि कब सत्य, आनंद और मोक्ष मिले! इस प्रकार

जो लक्ष्य था, वह बाधा बन रहा था।आखिर बुद्ध भी थक गए। छह वर्ष के बाद एक दिन उन्होंने सब छोड़ दिया। संसार तो पहले ही छोड़ चुके थे, फिर संन्यास भी छोड़ दिया। छह साल योग में बर्बाद किए थे,और फिर योग भी छोड़ दिया। और एक रात उन्होंने तय कर लिया कि अब कुछ भी नहीं करना; अब खोजना ही नहीं। समझ लिया कि कुछ मिलने वाला नहीं है । श्रम, प्रयास चरम हो गया था;आखिरी खोज के तनाव पर पहुंच गए थे।सब छोड़ दिया और उस रात वृक्ष के नीचे सो गए।

वह पहली रात थी , जब बुद्ध ऐसे सोए कि सुबह करने को कुछ भी बाकी नहीं था। संसार की सारी आयोजना छोड़ चुके थे,

दूसरी योजना पकड़ी थी, वह भी व्यर्थ हो गई थी। और जब कोई रात ऐसे सो जाता है कि जिस रात में सुबह की कोई योजना न हो, तो समाधि घटित हो जाती है। सुषुप्ति ही समाधि बन जाती है; क्योंकि सुबह की कोई वासना , कोई लक्ष्य शेष न रहा था, कुछ पाने को , कहीं जाने को नहीं था...उत्तर शून्य था।

क्या सारी क्रियाएं भीतर की निष्‍क्रियता से जन्मती है?-

10 FACTS;-

1-जब लक्ष्य जब नहीं होते,तो भविष्य नष्ट हो जाता है , समय व्यर्थ हो जाता है , योजनाएं टूट जाती हैं और मन की यात्रा बंद हो जाती है।क्योंकि मन की यात्रा के लिए योजना चाहिए ,लक्ष्य चाहिए ,कुछ पाने का बिंदु चाहिए भविष्य चाहिए और समय

चाहिए।बुद्ध उस रात सो गए, जैसे कोई व्यक्ति जिंदा ही मर गया हो ,और मौत घट गई हो। सुबह पांच बजे आंख खुली तो बुद्ध कहते है कि मैंने आंख नहीं खोली, आंख खुल गई। रात भर बंद थी, विश्राम पूरा हो गया, पलक खुल गई और भीतर शून्य था। क्योकि जब भविष्य नहीं होता, तो भीतर शून्य हो जाता है।उस शून्य में बुद्ध ने रात का आखिरी तारा डूबता हुआ देखा। और उस आखिरी तारे को डूबते देख कर बुद्ध परम ज्ञान को उपलब्ध हो गए। उस डूबते तारे के साथ बुद्ध का सब अतीत ,सारी यात्रा ,सारी खोज डूब गई।

2-बुद्ध ने कहा है कि मैंने पहली दफा निष्प्रयोजन आकाश में डूबते तारे को देखा।निष्प्रयोजन अथार्त कोई प्रयोजन नहीं था। आंख खुली थी, इसलिए तारा दिख गया जो डूब रहा था। तारा डूबता रहा और धीरे-धीरे आकाश तारों से खाली हो गया, इधर भीतर 'मैं 'बिलकुल खाली था, और दो खाली आकाशों का मिलन हो गया। बुद्ध कहते है कि जो खोज -खोज कर न पाया, वह उस रात बिना खोजे मिल गया। दौड़ कर जो न मिला, उस रात बैठे -बैठे मिल गया ।जो श्रम से न मिला, उस रात विश्राम से

मिल गया।पर क्यों मिल गया ? क्योकि जब आप भीतर शून्य होते हैं, तो आनंद उसका सहज परिणाम है। आनंद के लिए जब आप दौड़ते हैं, तो शून्य ही नहीं हो पाते ;इसलिए सहज परिणाम घटित नहीं होता है।जिसका मन ब्रह्म में लीन हुआ हो, वह निर्विकार और निष्‍क्रिय रहता है। जब ब्रह्म और आत्मा के एकत्व में लीन हुई वृत्ति विकल्परहित और मात्र चैतन्य रूप बनती है, तब प्रज्ञा कहलाती है। यह प्रज्ञा जिसमें सर्वदा होती है, वह जीवनमुक्‍त है।

3-‘ जब भीतर का आकाश और बाहर का आकाश एक हो जाता है,अथार्त भीतर का शून्य बाहर के शून्य से मिल जाता है, तब सब निर्विकार और निष्‍क्रिय हो जाता है।बिना विचार के विकार उठ ही नहीं सकते ;अथार्त विचार ही विकार है। विचार केवल इसलिए उठता है कि कुछ करना है। लोग कहते हैं कि विचार से छुटकारा नहीं होता।जबआपको कुछ करना है

तो विचार से छुटकारा नहीं होगा। कुछ करने की योजना ही विचार है। अगर आपको विचार से छुटकारा भी करना है, तो भी

छुटकारा नहीं होगा; क्योंकि वह उसकी योजना में विचार करेगा।लोग कहते हैं कि हम बैठते हैं, बड़ी कोशिश करते हैं कि

निर्विचार हो जाएं।वास्तव में, निर्विचार होने की योजना विचार के लिए मौका है। मन यही सोचता रहता है, कैसे निर्विचार हो जाएं? अभी तक निर्विचार नहीं हुए! कब होंगे? होंगे कि नहीं होंगे?

4-ध्यान रखिए, कोई भी वासना हो ..स्वर्ग की, मोक्ष की, या प्रभु की ..तो विचार जारी रहेगा। विचार का कोई कसूर नहीं है। विचार का तो इतना ही मतलब होता है कि आप जो वासना करते हैं, मन उसका चिंतन करता है कि कैसे पूरा करे। जब तक कुछ भी पाने को बाकी है, विचार जारी रहेगा। जिस दिन आप इस बात के लिए राजी हैं कि मुझे कुछ पाना ही नहीं है..निर्विचार भी नहीं पाना है ;तबआप अचानक पाएंगे कि विचार विदा होने लगे हैं और उनकी कोई जरूरत भी नही हैं । जब भीतर सब शून्य हो जाता है, कोई योजना नहीं रहती, कुछ पाने को नहीं बचता, कहीं जाने को नहीं रहता, तो सब यात्रा व्यर्थ मालूम पड़ने लगती है। जब चेतना रास्ते के किनारे बैठ मंजिल की बात छोड़ देती है तो मंजिल मिल जाती है।‘ब्रह्म में लीन

हुआ व्यक्ति निर्विकार और निष्‍क्रिय रहता है।उसके भीतर कुछ भी नहीं बनता ,अथार्त दर्पण खाली और निष्‍क्रिय रहता है।

5-इसका यह मतलब नहीं है कि वह कोई मुर्दे की तरह पड़ा रहता है। क्रियाएं घटित होती हैं; लेकिन क्रियाओं की कोई

योजना नहीं होती।इस फर्क को ठीक से समझना होगा।उदाहरण के लिए किसी को गीता के 12 वे अध्याय में बोलना है।

लेकिन अगर वह उसकी योजना करेगा कि क्या बोलना है और क्या नहीं बोलना है, तो चित्त में विचार चलेगा और विकार होगा; अथार्त चित्त में क्रिया चलेगी। अगर वह 12 वे अध्याय को देखे और बोलने लगे ; और जो भी निकल जाए, उससे राजी

रहे ; तो यह क्रिया ..क्रिया नहीं है। लेकिन अगर बोल कर जाने के बाद ;रास्ते में फिर यह खयाल आए कि जो बोला वह ठीक नहीं था, अच्छा होता कि यह बोल देता, या वह बोल देता; अच्छा होता कि यह छोड़ देता; तो विकार है।वह बोल कर चला जाये और जैसे ही बोलना बंद हो जाए, भीतर उस बोलने के संबंध में कुछ और न रह जाए, कोई धारा न चले, तो निर्विकार है।

व्याख्यान में क्रिया नहीं है,क्रिया तो उसकी आयोजन में है।तो अगर चित्त पहले से तय करता है और चित्त लौट कर विचार भी करता है, तो विकार है।क्रिया तो हमेशा जारी रहेगी। जब क्रिया न तो पूर्व आयोजित होती है, और न पश्चात चिंतन होता है ..तब क्रिया निष्‍क्रिय से निकलती है ।

6-गीता इसी अर्थ में कीमती है कि गीता में जो भी श्रीकृष्ण ने कहा है, वह एकदम सहज है। युद्ध के मैदान पर कोई व्याख्यान की तैयारी करके जाता भी नहीं है। कल्पना में भी कोई योजना नहीं हो सकती। अचानक/ अनायास एक आकस्मिक घटना हुई;

और श्रीकृष्ण से ज्ञान का झरना फूट पड़ा।यह बोलना क्रिया नहीं है, क्योकि यह निष्‍क्रिय से निकला हुये बोल है ; यह निष्‍क्रिय से जन्मी हुई क्रिया है।भगवत् गीता आकस्मिक थी, इसलिए इतनी कीमती हो गई। दुनिया में बहुत शास्त्र हैं, लेकिन भगवत् गीता जैसी आकस्मिक परिस्थिति किसी शास्त्र की नहीं है। युद्ध का मैदान है, शंख बज चुके हैं, योद्धा तैयार हैं मरने -मारने को, वहां ब्रह्मचर्चा... कोई, कहीं कोई संगति नहीं बैठती। भगवत् गीता किसी आश्रम में या किसी गुरुकुल में नहीं दी गई थी। चूंकि भगवत् गीता इतनी सहज है, इसीलिए इतनी गहरी भारतीय मन में उतर गई। निष्‍क्रिय से ,बिना आयोजन के निकली है ;इसीलिए हमने उसे भगवत् गीता /प्रभु का गीत / संदेश कहा है ।

7-अध्यात्म में दो तरह की मुक्ति की धारणा है ..एक तो जीवनमुक्‍त है, जो जीते जी मुक्त है। और एक है मुक्त, जो मृत्यु के साथ मुक्त होता है। ये दोनों घटनाएं घटती हैं।जब सारी क्रियाएं भीतर की निष्‍क्रियता से जन्मती हों, और विचार भी

निर्विचार से आता हो, और शब्द भी मौन में जन्म लेता हो, तो ऐसा व्यक्ति जीवनमुक्‍त कहलाता है।एक व्यक्ति जीवन

भर खोज करता है, और खोज करते -करते है एक दिन थक जाता हैं और घटना घट जाती है। कभी -कभी ऐसा होता है कि व्यक्ति जीवन भर खोज करता है और थकता नहीं है। वह खोजता जाता है और जब मौत आती है, तभी उसे अनुभव होता है कि सब खोज व्यर्थ गई, कुछ नहीं पाया ।उस मौत के क्षण में सारी खोज भी शिथिल हो जाती है।मरने के पहले अगर सारी खोज शिथिल हो जाए, और सारी योजना बंद हो जाए, और भविष्य न रहे, तो जो घटना बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे घटी , वह मृत्यु के वृक्ष के नीचे घट जाती है। तब मृत्यु और मुक्ति एक साथ घटित हो जाती है। क्योंकि मृत्यु बहुत रिलैक्स कर सकती है, अगर खोज व्यर्थ हो गई हो।

8-अगर आपको यह पक्का अनुभव आ गया हो कि सब खोजना बेकार है, कहीं कुछ मिला नहीं ;न संसार में कुछ पाया, न साधना में कुछ पाया ..कुछ भी नहीं पाया, और मन में आगे के लिए कोई मन न रह जाए कि कुछ पाने को जीवन चाहिए ; यह भी भाव न रह जाए कि अभी न मरूं, दो दिन बच जाऊं तो कुछ कर लूं तो व्यक्ति मौत के लिए राजी हो जाता है।

जैसे बुद्ध उस सांझ सो गए, यह भी सवाल न रहा कि सुबह क्या करेंगे। ऐसे ही अगर मरते क्षण में ऐसा कोई भाव न हो कि अब मर गए, कुछ काम अधूरे रह गए, कुछ करने को पूरा था, वह पूरा नहीं हुआ, दो दिन बच जाते तो कुछ पूरा कर लेते ... तो मृत्यु सहज उतर आती है। जैसे सांझ उतर आती है और व्यक्ति सो जाता है तो मृत्यु भी मुक्ति बन जाती है। ऐसे व्यक्ति को भी मुक्त कहा जाता है।

9-लेकिन यह घटना कभी जीवन के बीच में भी घट सकती है, और व्यक्ति मुक्ति के बाद भी बच सकता है।जब आप पैदा

होते हैं तो शरीर एक सीमित जीवन लेकर पैदा होता है कि अस्सी साल चलेगा, लेकिन अगर चालीस साल की उम्र में वह घटना घट जाए, तो वे जो चालीस साल बच गए हैं, वह तो शरीर पूरा करेगा। वह उसकी अपनी योजना, उसके अपने अणुओं की अपनी व्यवस्था है। वह अगर जन्म के साथ अस्सी साल चलने की क्षमता लेकर पैदा हुआ,तो वह अस्सी साल चलेगा।

भीतर तो चलना बंद हो जायेगा , लेकिन शरीर चलता रहेगा ।आपका शरीर तो एक यंत्र है।अगरआप परम ज्ञान को उपलब्ध

हो जाएं तो आज ही मर गए, लेकिन शरीर चलता रहेगा। भीतर की चेतना ऐसे हो जायेगी जैसे नहीं है,और ऐसी अवस्था

को ही जीवनमुक्‍त कहा जाता है।

10-जब ब्रह्म और आत्मा के एकत्व में लीन हुई वृत्ति विकल्परहित और मात्र ’चैतन्य रूप बनती है, तब प्रज्ञा कहलाती है।जब बुद्धि किसी और के संबंध में नहीं सोचती,तो असोच हो जाती है ।जब विचार गिर जाते हैं , केवल विचारणा की शक्ति भीतर रह जाती है,और बुद्धि भी किसी विषय के साथ नहीं जुड़ती ..तब शुद्ध हो जाती है। जैसे कि कोई दीया जल रहा हो, और दीए से कोई चीज प्रकाशित न होती हो, बस अकेला शून्य में दीया जल रहा हो ..तब चेतना प्रज्ञा हो जाती है। जब आप वास्तविक ज्ञान की ज्योति को उपलब्ध हो गए हो और जिसमें ऐसी प्रज्ञा सदा जलती रहती हो , वह जीवनमुक्‍त है।देह तथा इंद्रियों पर जिसको

अहंकार भाव न हो, और इनके सिवाय अन्य पदार्थों पर यह मेरा है, ऐसा भाव न हो, वह जीवनमुक्‍त कहलाता है।अहंकार के

गिरने के साथ ही ज्ञान होता है। मैं की कोई वृत्ति नहीं रहती ; केवल होना ..शुद्ध होना ही शेष रह जाता है। इस हूं -पन को, जीवनमुक्‍त अवस्था कहा गया है। मैं मिट जाए और होना रह जाए, तो आप जीते जी मोक्ष को उपलब्ध हो गए।इस दिशा में प्रयास वासनारहित हो, तो यह घटना तुरंत घट सकती है; और वासनापूर्ण हो, तो देर लगती है।



....SHIVOHA,M...